खाई बड़ी थी मतभेदों की,
भरने की करता अभिलाषा,
कितने ही थे समझौते,
जो मैने अपने साथ किये ।
और अभी भी जीवन के जीवन ही इसमें बह जायेंगे ,
नहीं किन्तु वह भर पायेंगे, किञ्चित दुख बढ़ा जायेंगे ।
और अभी भी मुक्त विवशता आयेगी मेरे ही द्वारे,
समझौतों का भार लिये और पीड़ाआें का हार लिये ।
रहने दो इन मतभेदों को,
क्यों मतैक्य की लिये लालसा,
जीवन के अनुपम मूल्यों को,
मैं व्यर्थों में व्यर्थ करूँ ।
किन्तु तुम्हारा श्रेय रहा है,
मेरे इस अवमूल्यन में,
तुमने ही आँखें खोली,
तुम धन्यवाद स्वीकार करो ।