Showing posts with label धर्म. Show all posts
Showing posts with label धर्म. Show all posts

28.9.19

अभ्यास और वैराग्य - १२

सत्य के संदर्भों से शास्त्र भरे पड़े हैं। संभवतः इसलिये क्योंकि इस पर नियमन किये बिना जगत का ताना बाना सम्हाल पाना अत्यधिक कठिन है। सत्य बोलने की प्रवृत्ति विश्वास उत्पन्न करती है, बिना विश्वास समाज की संरचना ढह जायेगी। सत्यनिष्ठा बनी रहेगी तो संबंध सहेजे जाते रहेंगे। सामाजिक संदर्भों में सत्य से बलवती और कोई अभिव्यक्ति नहीं है।

धर्मशास्त्रों के प्रणेताओं ने यह तथ्य भलीभाँति समझा है। मनु, व्यास, चाणक्य आदि ने सत्य को यथासंभव संशयमुक्त किया है,  स्पष्टीकरण देकर। सत्य के अनुप्रयोग में इन सूक्ष्मताओं को नहीं समझा जाये तो हित के स्थान पर अहित हो जायेगा, साधने के स्थान पर अस्थिरता आ जायेगी। सत्य प्रेरित स्थिरता सदैव ही यह आशा बनाये रखती है कि वर्तमान स्थिति कैसी भी हो, उत्थान होगा ही। जब सत्य अपनी पकड़ खो देता है, सारी आशायें अंधकार में प्लावित हो जाती हैं। आइये सत्य की शास्त्रीय थाह लेते हैं।

सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् , न ब्रूयात् सत्यम् अप्रियम् । प्रियं च नानृतम् ब्रूयात् , एष धर्मः सनातन: (प्रिय सत्य बोलना चाहिये, अप्रिय सत्य या प्रिय असत्य नहीं बोलना चाहिये, यही सनातन धर्म है)। मनुरचित सर्वाधिक प्रचलित श्लोक सत्य को प्रिय-अप्रिय की विमा से जोड़ता है। अप्रियता कष्टकारी है, किञ्चित हिंसात्मक भी। एक सीमा तक स्पष्टवादिता स्वीकार्य होती है, सुधारात्मक हो, अस्तित्व को झिंझोड़े, पर आहत न करे। परिहास करना भी असत्य तब तक नहीं है जब तक वह किसी को आहत न करे, कम से कम सामने वाले के समझने तक। प्रशंसा यदि प्रेरणात्मक हो तो वह प्रिय असत्य भी स्वीकार्य है। प्रशंसा यदि स्वार्थ साधे तो वह ठगने वाली हो जाती है, चाटुकारिता हो जाती है, वह असत्य भी है। 

न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः, वृद्धाः न ते ये न वदन्ति धर्मम् ।धर्मो न वै यत्र च नास्ति सत्यम्, सत्यं न तद्यच्छलनानुविद्धम्। (वह सभा नहीं जहाँ वृद्ध न हो, वह वृद्ध नहीं जो धर्म की बात न करे, वह धर्म नहीं जो सत्य न कहे, वह सत्य नहीं जिसमें छल हो)। महाभारत के उद्योगपर्व का यह श्लोक सामूहिक निर्णय प्रक्रिया की नींव रखता है। भीष्म और द्रोण सम महारथियों का दुर्योधन की सभा में चुप रहने के ऊपर यह तीक्ष्णतम प्रहार है।

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते। (उद्वेग न पैदा करनेवाला, प्रिय और हितकारक सत्यभाषण तथा स्वाध्याय व अभ्यास वाणी का तप कहा जाता है)। यह गीता में कहा गया है। सत्य उपद्रव न पैदा करे, प्रिय और हितकारक हो। सत्य का दम्भ भरने वाले बहुधा स्थिति बिगाड़ते ही हैं। जो सत्य का वास्तविक स्वरूप समझते हैं, वह सत्य को संवेदनात्मकता से व्यक्त करते हैं, सौम्यतापूर्वक, अन्यथा मौन ही रह जाते हैं।

मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम्। मनस्यन्यत् वचस्यन्यत् कर्मण्यन्यत् दुरात्मनाम्॥ (महात्माओं के मन, वचन और कर्म में समानता पाई जाती है पर दुष्ट व्यक्ति सोचते कुछ और हैं, बोलते कुछ और हैं और करते कुछ और हैं॥) यद्यपि मन और वाणी में एकरूपता सत्य को परिभाषित करती है, कर्म की एकरूपता उसे महात्मा बना देती है।

नास्ति सत्यात् परं तपः, सत्यं स्वर्गस्य साधनम्, सत्येन धार्यते लोकः।(सत्य से परमं कोई तप नहीं है, सत्य स्वर्ग का साधन है, सत्य से लोक का धारण होता है)। चाणक्य ने अर्थशास्त्र में सत्य को स्पष्टता से वर्णित किया है।

युधिष्ठिर का सत्य मन से नहीं था क्योंकि वह जानते थे कि द्रोणाचार्य यदि अश्वथामा के बारे में पूँछ रहे थे तो वह उनका पुत्र ही होगा और यह तथ्य युधिष्ठिर जानते थे। मनसा यह असत्य है।

सत्य धर्म के लिये अत्यन्त महत्वपूर्ण है। कहते हैं कि सत्य से धर्म उत्पन्न होता है, दया और दान से धर्म बढ़ता है। क्षमा करने से धर्म स्थिर रहता है और क्रोध करने से नष्ट हो जाता है। मनु ने झूठ बोलने वाले को चोर की तरह माना है, वह अपनी आत्मा का हनन करने वाला चोर है। कहते हैं कि जिनका सत्य सिद्ध हो जाता है, वह कुछ भी कह दें, वह सत्य हो जाता है। पतंजलि सत्य की सिद्धि बताते हैं। सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम्(२.३६) (जो वरदान शाप या आशीर्वाद दे, वह सत्य हो जाये या उसे आश्रय मिल जाये)

अगले ब्लाग में अन्य यम देखेंगे।

17.9.19

अभ्यास और वैराग्य - ९

यम और नियम कुल दस गुण हैं। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह यम कहलाते हैं। शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान नियम हैं। यम निषेधपरक हैं, नियम विधिपरक। यम में हम अपनी उन प्रवृत्तियों को रोकते हैं जो हमें अस्थिर करती हैं। हम एक स्तर ऊपर उठ जाते हैं, संभवतः इसलिये कि बात आगे न बढ़े, अस्थिरता न बढ़े। नियम में हम उन गुणों को विकसित करते हैं जिससे हमें यम स्थिर रखने हेतु कुछ और मानसिक बल मिलता है। नियम से यम और भी नियमित हो जाते हैं।

मन साधने के लिये यह आवश्यक है कि शरीर सधे, परिवार सधे, समाज सधे। यदि ऐसा नहीं होगा तो मन वहीं लगा रहेगा। यदि समाज स्थिर नहीं रहेगा तो मन कैसे स्थिर रहेगा। इनको साधते साधते पर हम इतना खो जाते हैं कि मन साधने का प्रारम्भिक लक्ष्य भूल जाते हैं, नये पथ में रथ बढ़ा देते हैं। परिवार और समाज संबंधों का विस्तृत आकाश है, उसमें यदि सब मनमानी पर उतर आयेंगे तो अव्यवस्था पसर जायेगी। सुचारु व्यवस्था हेतु न्यूनतम आवश्यकतायें तो हमें माननी ही होंगी। सहजीवन के धर्म मानने होंगे।

धर्म वर्तमान का संभवतः सर्वाधिक शापित शब्द है, कोई इसका अर्थ समझना ही नहीं चाहता। इस शब्द को बहुधा कठघरे में उन शब्दों के साथ खड़ा कर दिया जाता है जिन पर हम अपनी दुर्गति और अवनति के आरोप थोपते आये होते हैं। संस्कृत की धृज् धातु से धर्म शब्द बना है, अर्थ है धारण करना। धार्यते इति धर्मः। जो समाज को धारण करे, आधार दे, स्थिरता दे, आश्रय दे, वह धर्म है। धर्म जोड़ने का कार्य करता है, तोड़ने का नहीं। धर्म की गति न्यायवत है, अन्यायवत नहीं। 

मित्र से बात हो रही थी। धर्म के नाम पर प्रचलित कई कुरीतियाँ, रूढ़ियाँ, और विक्षेपों से वह आहत हो जाते हैं। यह सब होते हुये धर्म को किस प्रकार समझा जाये, स्वीकार किया जाये। क्या माना जाये, क्या न माना जाये। धर्म के विषय में अपना दिशायन्त्र तब क्या हो भला? पशोपेश है कि संस्कृति की धरोहर न छोड़ते बनती है और न ही सहर्ष स्वीकार हो पाती है। 

जब डोर उलझ जाये तो सिरे ढूढ़ने होते हैं। मूल समझने से विकार का आकार और प्रकार सब समझ आ जाता है। क्या धर्म है और क्या नहीं, इस विषय पर सदा मनु द्वारा बताये धर्म के लक्षणों को ही स्मरण करने से भ्रम अवगलित हो जाता है। 

मनु धर्म के दस लक्षण बताते हैं। दशकम् धर्म लक्षणम् - धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, धी, विद्या, सत्यम्, और अक्रोध। यदि कोई विचार, कृत्य, व्यक्ति आदि इन लक्षणों के विपरीत वर्ताव करता है तो वह धर्मसम्मत नहीं है। कर्मकाण्ड और पद्धतियाँ धर्म के लिङ्ग या चिन्ह तो हो सकते हैं पर मूल यही दस लक्षण ही होंगे। इससे स्पष्ट कोई और प्रमाण या परीक्षा हो ही नहीं सकती। यही नैतिकता भी है, वह जो आगे ले जाये। ‘नी’ धातु ‘ले जाने’ के अर्थ में आती है, नेता, नायक, नौका आदि।

ध्यान से देखे तो यम और नियम में वर्णित दस गुण और मनु द्वारा नियत धर्म के दस लक्षण लगभग एक ही हैं। अर्थ स्पष्ट है, यम और नियम का पालन सामाजिक, पारिवारिक और मानसिक स्थायित्व देता है। संभवतः योग पथ में बढ़ने के लिये इससे सशक्त आधार और कुछ हो भी नहीं सकता है। 

यम यदि वाह्य साम्य स्थापित करता है तो नियम आन्तरिक साम्य। यम और नियम का क्रम अत्यन्त महत्वपूर्ण है, हम बाहर से अन्दर की ओर बढ़ रहे हैं। आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि से हम और भी अन्दर तक जाते जायेंगे। अन्दर जानना आवश्यक है योग के लिये। जिसको जानना है, उसी के माध्यम से जानना है। मन को जानना है, मन के माध्यम से जानना। योग यही है, कठिन इसीलिये है, समय इसीलिये लगता है, इसीलिये मन की वृत्तियों को रोकना है अन्यथा न मन देख पायेगा और न मन दिख पायेगा। अन्दर देखने से मन की अन्य गति सीमित हो जाती है, तब बस दृष्टा और मन।

अगले ब्लाग में यम और नियम के व्यावहारिक और यौगिक पक्ष।