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10.9.11

तरणताल में ध्यानस्थ

तैरना एक स्वस्थ और समुचित व्यायाम है, शरीर के सभी अंगों के लिये। यदि विकल्प हो और समय कम हो तो नियमित आधे घंटे तैरना ही पर्याप्त है शरीर के लिये। पानी में खेलना एक स्वस्थ और पूर्ण मनोरंजन है, मेरे बच्चे कहीं भी जलराशि या तरणताल देखते हैं तो छप छप करने के लिये तैयार हो जाते हैं, घंटों खेलते हैं पर उन्हें पता ही नहीं चलता है, अगले दिन भले ही नाक बहाते उठें। सूरज की गर्मी और दिनभर की थकान मिटाने के लिये एक स्वस्थ साधन है, तरणताल में नहाना। गर्मियों में एक प्रतीक्षा रहती है, शाम आने की, तरणताल में सारी ऊष्मा मिटा देने की। कोई भी कारण हो, तैरना आये न आये, आकर्षण बना रहता है, तरणताल, झील, नदी या ताल के प्रति।

उपर्युक्त कारणों के अतिरिक्त, एक और कारण है मेरे लिये। पानी के अन्दर उतरते ही अस्तित्व में एक अजब सा परिवर्तन आने लगता है, एक अजब सी ध्यानस्थ अवस्था आने लगती है। माध्यम का प्रभाव मनःस्थिति पर पड़ता हो या हो सकता है कि पिछले जन्मों में किसी जलचर का जीवन बिताया हो मैंने। मुझे पानी में उतराना भाता है, बहुत लम्बे समय के लिये, बिना अधिक प्रयास किये हुये निष्क्रिय पड़े रहने का मन करता है। मन्थर गति से ब्रेस्टस्ट्रोक करने से बिना अधिक ऊर्जा गँवाये बहुत अधिक समय के लिये पानी में रहा जा सकता है। लगभग दस मिनट के बाद शरीर और साँसें संयत होने लगते हैं, एक लय आने लगती है, उसके बाद घंटे भर और किया जा सकता है यह अभ्यास।

प्रारम्भिक दिनों में एक व्यग्रता रहती थी तैरने में, कि किस तरह जलराशि पार की जाये। तब न व्यायाम हो पाता था, न ही मनोरंजन, होती थी तो मात्र थकान। तब एक बड़े अनुभवी और दार्शनिक प्रशिक्षक ने यह तथ्य बताया कि जलराशि शीघ्रतम पार कर लेने से तैरना नहीं सीखा जा सकता है, तैरना चाहते हो तो पानी में लम्बे समय के लिये रहना सीखो, पानी से प्रेम करो, पानी के साथ तदात्म्य स्थापित करो। शारीरिक सामर्थ्य(स्टैमना) बढ़ाने और पानी के अन्दर साँसों में स्थिरता लाने के लिये प्रारम्भ किया गया यह अभ्यास धीरे धीरे ध्यान की ऐसी अवस्था में ले जाने लगा जिसमें अपने अस्तित्व के बारे में नयी गहराई सामने आने लगी। इस विधि में शरीर हर समय पानी के अन्दर ही रहता है, बस न्यूनतम प्रयास से केवल सर दो-तीन पल के लिये बाहर आता है, वह भी साँस भर लेने के लिये। पानी के माध्यम में लगभग पूरा समय रहने से जो विशेष अनुभव होता है उसका वर्णन कर पाना कठिन है, तन और मन में जलमय तरलता और शीतलता अधिकार कर लेती है। पता नहीं इसे क्या नाम दें, जल-योग ही कह सकते हैं।

कभी कभी इस अवस्था को जीवन में ढूढ़ने का प्रयास करता हूँ। समय बिताना हो या समय में रमना हो, समय बिताने की व्यग्रता हो या समय में रम जाने का आनन्द, जीवन भारसम बिता दिया जाये या एक एक पल से तदात्म्य स्थापित हो, जीवन से सम्बन्ध सतही हो या गहराई में उतर कर देखा जाये इसका रंग? यदि व्यग्रता से जीने का प्रयास करेंगे तो वैसी ही थकान होगी जैसे कि तैरते समय पूरे शरीर को पानी के बाहर रखने के प्रयास में होती है। साँस लेने के लिये पूरे शरीर को नहीं, केवल सर को बाहर निकालने की आवश्यकता है। जिस प्रकार डूबने का भय हमें ढंग से तैरने नहीं देता है, उसी प्रकार मरने का भय हमें ढंग से जीने नहीं देता है।

तैरने का आनन्द उठाना है तो ढंग से तैरना सीखना होगा। जीवन का आनन्द उठाना है तो ढंग से जीना सीखना होगा।