आपदा प्रबन्धन की एक परिचर्चा में गया था। आपदा प्रबन्धन का विषय भारत के लिये गंभीर होता जा रहा है। आपदा के बाद किस तरह से जनजीवन की रक्षा की जाये, किस तरह से पूर्वसंकेतों को पढ़ा जाये और क्या तैयारी करके रखी जाये, ये परिचर्चा के प्रमुख विषय थे। परिचर्चा बड़ी रोचक थी और अन्य व्यस्ततायें होने के बाद भी वहाँ से उठकर आना संभव नहीं हुआ। कितने पहले से कितनी तैयारी करके रखी जाये, क्या संसाधन सीमित समय में जुटाये जायें, इस पर मतभिन्नता स्वाभाविक थी। मतभिन्नता इसलिये कि कुछ मानते थे कि पहले से इतनी तैयारी करके रखी जाये कि आपदा के समय कम सोचना पड़े, कुछ मानते थे कि आपदा की दृष्टि से संसाधन जुटाकर रखना संसाधनों को व्यर्थ करने जैसा होगा, क्यों न हम निर्धारित करें कि आपदा के संकेतों के अनुसार हम संसाधन जुटायें।
इस तरह की कई परिचर्चायें हुयीं। उत्तराखंड में आयी बाढ़ और उड़ीसा में आये चक्रवात, हमारी स्मृतियों में अभी तक जीवित थे। उनसे जो भी सीखने को मिला, वे आगामी आपदाओं में हमें दृढ़ रखेंगे। निश्चय ही हम अनुभव के आधार पर ही सीखते हैं और तब अधिक सीखते हैं, जब पीड़ा गहरी होती है। हमारी सामान्य बुद्धि को आश्चर्य तब अधिक होता है जब हम नये को अपनाने की व्यग्रता और मूढ़ता में सदियों पुरानी बुद्धिमत्ता को तिलांजलि दे बैठते हैं।
बात बाढ़ और सूखे की चल रही थी, वक्ता डॉ विश्वनाथ थे, कर्नाटक में आई ए एस, बागलकोट और कोलार के पूर्व डीएम। यद्यपि उनसे व्यक्तिगत भेंट नहीं हो पायी, पर उनके अनुभवों ने प्रभावित अवश्य किया। उन्होंने बागलकोट में आयी बाढ़ और कोलार में पड़ने वाले सूखे के बारे में चर्चा की। जहाँ बाढ़ जैसी आपदा चार-पाँच दिनों में ही आ जाती है हमें सोचने के लिये पर्याप्त समय नहीं मिल पाता है, वहीं सूखे जैसी आपदा हमारे सामाजिक कुप्रबन्धन के इतिहास की गाथायें भी कह सकती है। उदाहरण कोलार का लिया जा सकता है पर बात पूरे भारतीय समाज पर ही लागू होती है।
कोलार में सूखे की समस्या है, पेयजल तक की गम्भीर समस्या है, कारण कम वर्षा भी है। यहाँ तक कि कुओं का जलस्तर १२०० से १६०० फीट तक चला गया है। इतनी बोरिंग के बाद भी पानी निकले, इसकी संभावना घटती जा रही है। रेलवे ने भी वहाँ कभी कई ट्रेनों में पानी भरने की व्यवस्था कर रखी थी पर पानी की कमी के कारण उसे बहुत वर्ष पहले छोड़ देना पड़ा है। सैकड़ों गावों और नगरीय क्षेत्रों में टैंकर से पानी भेजना पड़ता है। पहले यही समस्या और गहरी और व्यापक थी।
समस्या से जूझने वाले उसके मूल में जाते हैं, उस समय से पीछे जाना प्रारम्भ करते हैं जहाँ से समस्या प्रारम्भ होती है। इतिहास में झाँकते हैं, वे कालखण्ड देखते हैं जब सूखे की समस्या नहीं थी। वे तात्कालिक कारण देखते हैं, जो समस्या के मूल में थे। साथ ही उन उपायों को देखते हैं जिससे समस्या का कारण निष्प्रभावी हो सके।
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| कल्याणी या पुष्करणी |
डॉ विश्वनाथ ने भी वही किया, पता किया कि पहले क्या व्यवस्था थी। कोलार आज से चार सौ साल पहले मैसूर राजा के अधिकार क्षेत्र में आता था। राजाओं ने व्यापक स्तर पर पूरे क्षेत्र में कल्याणी बनवायी थीं। कल्याणी या पुष्करणी के नाम से सीढ़ीदार और पक्के तालाबों का निर्माण उन स्थानों पर किया जाता था, जहाँ स्वाभाविक रूप से जल बह कर आता था, उस जलक्षेत्र के सबसे निचले स्तर पर। हर गाँव में एक कल्याणी या पुष्करणी तो अवश्य रहती थी। अंग्रेजों के आने के पहले तक पूरे मैसूर राज्य में जल के संचय की इतनी व्यवस्था थी कि उस समय किसी ने सोचा ही नहीं होगा कि आने वाली संततियाँ मूढ़ता की सीमायें पार कर प्यासे मरने की कगार पर खड़ी होंगी।
कल्याणी का भी वही हुआ जो भारतीय शिक्षा पद्धति का हुआ। उन्हें पाश्चात्य से बदल दिया गया, इसलिये नहीं कि पाश्चात्य पद्धतियाँ श्रेष्ठ थीं, इसलिये भी नहीं कि वे वैज्ञानिक थीं, बस इसलिये कि उत्कृष्ट और स्वायत्त प्राच्य पद्धतियों को उनके मूल से मिटाकर पाश्चात्य के द्वारा अधिरोपित कर दिया जाये, इसलिये कि भारतीय अपने समृद्ध इतिहास का गौरव न कर सकें। अंग्रेजों ने लोक निर्माण विभाग बनाया और कल्याणी पर होने वाला राजकीय व्यय कम होता चला गया। जो गाँव कर सकते थे, उनकी कल्याणी जीवित रही, उनका कल्याण जीवित रहा। जो गाँव असमर्थ थे, उनकी कल्याणी रख रखाव के अभाव में सूख गयीं।
सार्वजनिक, अनुपयोगी और कीचड़ बनी कल्याणी कूड़ाघर बनती गयीं। जनसंख्या का दबाव बढ़ा और कल्याणी अतिक्रमित होती गयीं। पहले नदियाँ, फिर गर्भजल का दोहन होता रहा। जब गर्भजल का स्तर १६०० फिट के नीचे चला, जब पेयजल के लिये संघर्ष होने लगा, पेयजल टैंकर व्यवसाय बन गया, तब कल्याणी याद आयीं। डॉ विश्वनाथ ने जहाँ पर भी संभव था, श्रमदान के माध्यम से कल्याणी जीवित कीं, आसपास के अवैध निर्माणों को सप्रयास हटाया। ऐसा लगा कि कल्याणी की आत्मा कल्याण हेतु अब तक जीवित थीं, उनमें जल न जाने कहाँ से आना प्रारम्भ हो गया, सब एक ही वर्षा में लबालब भर गयीं।
शताब्दियों की उपेक्षा धीरे धीरे भरती है। कल्याणी जलप्लावित रहेंगी तो भूजल का स्तर धीरे धीरे बढ़ता रहेगा, क्षेत्र का एकत्र जल क्षेत्र में ही संचित रहेगा।
बंगलोर में ही २०० से भी अधिक झील थीं, वर्षा वर्ष में ८ माह, जल इतना गिरता है कि वह न केवल बंगलोर को वरन आसपास के कई नगरों को जल दे सके। हम इसे कुप्रबन्धन की पराकाष्ठा ही कहेंगे कि फिर भी बंगलोर में जल १०० किमी दूर बहती कावेरी नदी से पंप करके लाया जाता है, वह भी तीन स्तरों पर पंप करके। जनसंख्या ने यहाँ बसने की लालसा में झीलों को बाहर निकाल दिया, अपना भाग्य बाहर निकाल दिया, उस भविष्य के लिये जो स्वायत्तता से हमें पराश्रय की ओर लिये जा रहा है।
यह एक अच्छा संकेत है कि हम पाश्चात्य के भ्रमजाल से निकल आपनी सामर्थ्य ढूढ़ पा रहे हैं। देश के अन्य भागों से भी प्राकृतिक जलतन्त्र को जीवित करने के प्रयासों की सूचनायें मिल रही है। आशा है कल्याणी हमारी गौरवगाथा और हमारे कल्याण को पुनर्जीवित कर पायेंगी।
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