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12.8.21

ब्लाग यात्रा - ४ (प्रवृति निवृत्ति)


बारह वर्ष की ब्लागयात्रा के कई अध्याय रहे। “गाय” से लेकर “मधुगिरि” तक लगभग ४० साप्ताहिक ब्लाग ज्ञानदत्तजी के अतिथि रूप में लिखने के बाद तनिक साहस आया कि स्वयं अपना ब्लाग प्रारम्भ कर सकूँ। यद्यपि अपना ब्लाग प्रारम्भ करने की इच्छा प्रारम्भ से ही थी पर अतिथि की सुविधाभोगिता मन में आलस्य उत्पन्न करने लगी थी। एक तो ज्ञानदत्तजी के पाठकों की संख्या बहुत अधिक थी, उसका लोभ बना रहा। दूसरी थी उनकी सदाशयता कि हर टेढ़ी मेढ़ी पोस्ट को ठीक से सजा कर और संपादन कर के वह परिमार्जित करते रहे। तीसरा था मेरे द्वारा लिखित विषय पर उनका दृष्टिकोण और विशेष संवादक्रम। इन तीन सुखों में भला कहाँ भविष्य की सुध संभव थी? अपने पैरों पर सुदृढ़ खड़ा हो सकूँ, इस हेतु उनके विशेष आग्रह ने ही “न दैन्यं न पलायनम्” के उद्घोष से ब्लाग प्रारम्भ करने के लिये प्रेरित किया।


“न दैन्यं न पलायनम्” के उद्घोष ने सदा ही प्रभावित किया है। यह उद्घोष अर्जुन ने भगवद्गीता के संवाद के बाद और युद्ध प्रारम्भ होने के पहले किया था। राजपुत्र होकर भी सदा ही छले जाने के बाद, वीर होकर भी जंगल जंगल फिरने के बाद, न्यायोचित न होने पर भी पाँच गाँव का विनम्रतम प्रस्ताव नकार दिये जाने के बाद और अन्ततः परिवार के मोह में युद्ध न कर सकने की स्थिति में कृष्ण से फटकार सुनने के बाद, अर्जुन का यह उद्घोष अत्यन्त अर्थमय हो जाता है। बहुधा अपना व्यक्तित्व अर्जुन की तरह ही लगता रहा। अर्जुन के समान ही, सामर्थ्य होने के बाद भी सामान्य सा जीवन व्यतीत करने के कई आक्षेप मैंने स्वयं पर लगाये हैं। लगा कि यह वाक्य मेरे जीवन में समय की स्पष्ट थाप बनेगा। पता नहीं कि इस प्रारम्भिक ध्येय को कितना चरित्रार्थ कर पाया मैं?


अपने ब्लाग पर पहली पोस्ट “स्वर्ग” लिखी, पारिवारिक विनोदमयी परिस्थितियों पर। आने वाले कई माह तक ज्ञानदत्त जी मेरी सारी पोस्टों को अपने ब्लाग से प्रचारित करते रहे और यह स्तुत्य कृत्य उन्होंने तब तक निभाया जब तक उन्हें लगा नहीं कि मैं अपने पैरों पर खड़ा हो गया हूँ। पता नहीं और ब्लागरों को इतना सुदृढ़ आधार मिला कि नहीं पर यदि मुझे नहीं मिलता तो न इतना लिख पाता और न इतने आत्मविश्वास से लिख पाता।


एक बार लिखने का क्रम चल पड़ा तो उन्मुक्त भाव से लिखा। परिवेश पर लिखा, परिवार पर लिखा, तकनीक पर लिखा, ब्लागिंग पर लिखा, कविता लिखी, विनोद लिखा, गाम्भीर्य लिखा। लगभग ५ वर्षों तक सप्ताह में दो बार लिखा। व्यस्तता आयी तो सहसा लिखना कम हो गया। लगभग दो वर्ष के लिये सप्ताह में बस एक बार ही लिख सका और बहुधा कविता ही लिख सका। लगभग ३ वर्ष ऐसे बीते जिसमें कुछ भी नहीं लिखा। उस समय कई बार ऐसा लगा कि संभवतः कभी लिख सकूँगा कि नहीं? एक वर्ष कुछ विषय विशेष ऐसे मिले कि औसतन दो सप्ताह में एक बार लिख सका। इस वर्ष के प्रारम्भ में भी शिथिलता और आलस्य घेरे था पर तलहटी स्पर्श होने के बाद जिस वेग से ऊपर आना चाहिये उस प्रवाह से लिख रहा हूँ, एक सप्ताह में लगभग ३ पोस्ट। यही नहीं, यथासंभव पाडकास्ट भी कर पा रहा हूँ।


प्रवृत्ति और निवृत्ति के कालखण्ड बहुधा प्रकृति के गुणों से मेल खाते हैं। सर्वाधिक ऊर्जा का कालखण्ड रजस का होता है। तमस में आलस्यजनित ऊर्जा कम होती है और सत्व में ऊर्जा व्यक्त होने के क्षेत्र ही सिमट जाते हैं। ऐसा ही कुछ लेखन में भी हुआ। जब सृजनात्मकता का उछाह आया तब बहुत से कारक थे और उनका वर्णन और विश्लेषण एक कठिन विषय हो जायेगा। किन्तु जब जीवन में लेखनीय निष्क्रियता पसरी रही तब के दो कारण स्पष्ट रहे।


पहला कारण कार्यक्षेत्र की अतिव्यस्तता रही। व्यस्तता उत्पादक होती है जब तन्त्र व्यवस्थित होता है। जब परिवेशीय अव्यवस्थित हो और सारी ऊर्जा तन्त्र को सुधारने में लगे तो उस प्रयत्न को जूझना कहते हैं। प्रकृति के गुणों के आधार पर देखा जाये तो यह तमस और रजस के बीच की स्थिति है। परिवेश तामसिक और उससे जूझना राजसिक। आप जब परवेशीय तमस में स्वयं ही तमस में जीते हैं तब एक साम्य आ जाता है, मन उतना खट्टा नहीं होता है। आपको भान ही नहीं होता है कि आप क्या कर रहे हैं, आप तो बहने लगते हैं सामाजिक प्रवाह में। किन्तु जब प्रवृत्तियाँ सात्विक हों तो तम से जूझने के लिये रजस में उतरना पड़ता है क्योंकि सीधे सत्व से तम को नहीं जीता जा सकता। बुद्धि के स्तर पर भले ही सत्व रहे पर व्यवहार और विस्तार में बिना रजस आये तम अपराजित ही रहता है। इस नितयु्द्ध सी स्थिति में सृजन असंभव होता है, मन अशान्त सा रहता है, नित नीति और कार्यवृत्त में रत रहना पड़ता है। ऐसे ही कुछ कालखण्ड रहे जिसमें लेखन नहीं हो सका, हाँ, अनुभव अपार जुड़ा।


दूसरा कारण अतिबौद्धिकता का रहा, शु्द्ध सात्विकता का रहा। अच्छे लेखन के लिये आवश्यक है कि आप उत्कृष्ट पढ़ते भी रहें। सामान्य अध्ययन और अवलोकन तो वैसे भी चलता रहता है और उसमें से ही न जाने कितने लेखनीय विषय निकल आते हैं। पिछले ७ वर्षों में पर कई ऐसे कालखण्ड आये जब बौद्धिक और आध्यात्मिक चेतना उछाह पर रही। संस्कृत, दर्शन, आयुर्वेद, मानस, गीता, रामायण और न जाने संस्कृति के कितने पक्ष आये जिनसे साक्षात्कार होता गया। सामर्थ्यानुसार जितना पढ़ सका, अभिभूत रहा। पूर्वजों का बौद्धिक विस्तार, तार्किक तीक्ष्णता, सूत्रबद्ध संक्षिप्तता और सर्वोपकार की भावना में उतराकर यह लगने लगा कि इनकी तुलना में मैं जो सृजन कर पा रहा हूँ वह महावट के सम्मुख तृणमात्र सा है। तुच्छता के उस सतत अनुभव ने भी सृजन के क्रम में बाधा पहुँचायी। पूर्वजों का मन जानना आवश्यक था। यदि नहीं जाना होता तो अपनी क्षुद्रता पर इतराये बैठा होता। इस कालखण्ड में लिख नहीं पाया पर सीखा बहुत।


यह निवृत्ति के कालखण्डों का प्रभाव था या कोई अन्य कारण, यह तो पता नहीं पर पहले की अपेक्षा विषय अब श्रृंखलाओं में अधिक व्यक्त होते हैं। पहले विविध विषयों पर लिखता था, हर एक विषय दूसरों से भिन्न रहता था और कार्यक्षेत्र या परिवेश से जुड़ा रहता था। समय के साथ अब श्रृंखलायें लिखने लगा हूँ। प्रश्न उठ सकता है कि यदि लम्बा ही लिखना है तो पुस्तक क्यों नहीं? अब अधिक सोचने को विवश नहीं करता है यह प्रश्न। उत्तर यही है कि जब ब्लाग में आनन्द आ रहा है तो पुस्तक क्यों? 


प्रवृत्ति और निवृत्ति की धूप छाँव में सृजन गतिमान है।

10.8.21

ब्लाग यात्रा - ३ (टिप्पणी)


जो लोग ब्लाग लिखते हैं और उसमें रुचि लेते हैं, वे टिप्पणियों के महत्व को भी समझते हैं। उत्साह बढ़ाने में, सृजनात्मकता बनाये रखने में टिप्पणियाँ अमृत सा कार्य करती हैं। यह इस विधा का ही वैशिष्ट्य है कि पाठकों को लेखक से संवाद का अवसर मिलता है।


जब लगभग एक पृष्ठ पर आपने कोई विषय, घटना या कविता रखी हो तो यह स्वाभाविक ही है कि उस पर कहने को बहुत कुछ होगा। कई पक्ष छूटे होंगे, कई पर असहमति होगी, कई पर दृष्टिकोण भिन्न होंगे, कई पर आत्मिक अनुभव भी होंगे। ब्लाग का प्रारूप इन सब पर प्रतिक्रियाओं का अवसर देता है। ब्लाग में संवाद का जो स्वरूप पल्लवित होता है वह बहुधा मूल से कहीं अधिक रोचक और पठनीय होता है।


एक सिंहावलोकन करता हूँ तो लगता है कि यदि पाठक अपना योगदान टिप्पणियों में न देते तो संभवतः ब्लाग का स्तर अतिसामान्य ही रह गया होता।


जब २००९ में ब्लाग से जुड़ा, उस समय पढ़ना और विषय से सम्बद्ध टिप्पणी करना अच्छा लगता था। यह क्रम कुछ माह चला होगा। यद्यपि हिन्दी में गतिमय टाइप कर पाना अपने आप में संघर्ष था पर ब्लाग जगत का एक सामूहिक महाप्रयत्न रहा कि सबने उस बाधा को पार किया। जिनको तनिक भी तकनीक की सहजता थी उन्होंने सबकी सहायता की। दो तीन वर्ष का वह काल टाइप करने की विधियों का संक्रमणकाल कहा जायेगा। अभी तो फिर भी एक स्थायित्व आ गया है। उसके तकनीकी और व्यवहारिक पक्ष पर विस्तृत चर्चा फिर कभी। 


उस समय ब्लाग बहुत अधिक नहीं थे और समय मिल जाता था कि सबको पढ़ सकें। सबको पढ़ना अपने आप में एक संतोष देता था और लगभग सभी पढ़े ब्लागों पर टिप्पणी हो ही जाती थी। लगभग सौ ब्लागों को पढ़ने के क्रम में एक दिन में तीस टिप्पणियाँ तक हो ही जाती थीं। लगभग सब यही करते थे, सब सबका उत्साह बढ़ाते थे। एक अद्भुत सी ऊर्जा व्यापी थी उस समय ब्लागजगत में। किसी ब्लाग पर की हुयी टिप्पणी को भी सहेज कर रखने के क्रम में असम्बद्ध रूप में विचारों के न जाने कितनी लड़ियाँ रखे बैठे हैं हम। कभी समय मिला तो उनको भी ब्लाग का आकार दिया जायेगा।


एक बार लय आने पर पाठक टिप्पणियों से अपने मन की कहने लगे और ब्लाग व्यापकता पाने लगे। अभी तो उतनी लम्बी टिप्पणी नहीं लिख पाता हूँ पर प्रारम्भिक काल में  टिप्पणी बहुधा पर्याप्त लम्बी हो जाती थीं, बड़ी विस्तृत हो जाती थीं। यह देख कर ज्ञानदत्तजी ने कहा कि इस तरह की तीन चार टिप्पणियाँ जोड़कर, संदर्भ, उपसंहार बताकर या एक प्रश्न उठाकर ब्लागपोस्ट बनायी जा सकती है। केवल उत्साहित ही नहीं, उन्होंने आमंत्रित भी किया अपने ब्लाग मानसिक हलचल पर सप्ताह में एक अतिथि पोस्ट लिखने के लिये।


सितम्बर २००९ को पहली पोस्ट लिखी ‘गाय’। पहली पोस्ट का आनन्द व्यक्त नहीं किया जा सकता था। पोस्ट का विषय गायों की मार्मिक स्थिति पर था कि किस प्रकार हम गायों का दूध महत्वपूर्ण तो मानते हैं पर गायों को नहीं। पता नहीं पर इस विषय की गम्भीरता में सृजन के आनन्द की रेख चमक जाती थी। एक विचित्र सी स्थिति थी मन की। यह एक शोध का विषय हो सकता है कि एक पीड़ाजनित विषय पर किये सृजन की संतुष्टि और प्रशंसा का आनन्द क्या विषयगत पीड़ा से अधिक हो सकता है? या तीनों ही साथ साथ रह सकते हैं? जब कविता या लेख पढ़ें तो मन दुखी हो, उसके बाद यह ध्यान आते ही कि यह आपके द्वारा रचित है तब एक संतुष्टि का भाव और जब उसी पर किसी पाठक की टिप्पणी के रूप में प्रशंसा मिले तो आत्मिक आनन्द। औरों की तो कह नहीं सकता पर मेरे लिये नीरवता के परिवेश में तीनों भाव एक साथ रह सकते हैं।


ज्ञानदत्तजी का ब्लाग अत्यन्त पठित और चर्चित था अतः मेरी पोस्ट भी उसी उत्साह से पढ़ी गयी। आशीर्वादात्मक टिप्पणियाँ आयीं जिन्होनें ब्लागजगत में मेरा स्वागत किया पर मुख्यतः टिप्पणियाँ गायों की उस दयनीय दशा पर आयीं जिसे विषय में वर्णित किया गया था। कुछ ने अपने अनुभव  लिखे, कुछ ने समाधान बताये, कुछ ने धर्म को अधिक उत्तरदायी ठहराया, कुछ ने समाज को कोसा। संवाद के जिस स्तर पर सामान्य से विषय को पहुँचना था, ब्लाग और टिप्पणियों के माध्यम से वह वहाँ पहुँच सका। यदि टिप्पणियों में ढूढ़ेगें तो आपको ब्लागजगत के सारे आधारभूत और चर्चित नाम मिल जायेंगें। न केवल वे स्वयं ही बहुत अच्छा लिखते थे अपितु औरों के लिखे को भी संवाद की स्थिति तक पहुँचाते थे।


ब्लाग की प्रारम्भिक स्थिति प्रतिस्पर्धात्मक नहीं थी। जब पाठक बहुत हों, विषय पर्याप्त हों, टिप्पणियों के माध्यम से संवाद सतत हो, तो प्रतिस्पर्धा कैसी? ब्लागजगत एक खुला विस्तृत नभ था जिसके नीचे सबको आश्रय मिला था। सबकी अपनी विशेषसिद्धता थी, सभी महारथी थे। एक नयी विधा के क्षेत्र में वही आया था जिसकी पठन पाठन में रुचि थी, अभिव्यक्ति के लिये जिसके शब्द उत्कण्ठित थे पर पारम्परिक विधाओं को वे इसके लिये अपर्याप्त मानते थे। 


यद्यपि टिप्पणियों का अपना महत्व था। उत्साह, विषय विस्तार और संवाद, तीनों ही इसके माध्यम से बल पाते थे। कुछ समय पश्चात टिप्पणियों की संख्या एक अनकही प्रतिस्पर्धा के प्रतीक रूप में स्थान पाने लगी। ब्लाग बढ़ने लगे और सब पढ़ पाना संभव नहीं हुआ तो टिप्पणियों का पारस्परिक आदान प्रदान प्रारम्भ हुआ। अधिक ब्लाग पढ़ने के प्रयास में और की गयी टिप्पणियों की अधिक संख्या होने से उनकी गुणवत्ता प्रभावित होने लगी। कालान्तर में कई स्थानों पर टिप्पणी उपस्थिति दर्शाने का माध्यम सा बन गयी। अपने इस अर्थोपकर्ष में भले ही टिप्पणी अपना व्यापक पूर्वप्रभाव न लिये हो पर संवाद का माध्यम अवश्य है। आशा है कि सोशल मीडिया के कई नवमाध्यमों के बीच भविष्य में ब्लाग अपना स्थान पुनः पायेगा और वह भी टिप्पणीतन्त्र के प्रभावी होने से।

3.8.21

ब्लाग यात्रा - १ (संख्यायें)


संख्याओं का महत्व बस इतना ही है कि वे थाह दे जाती हैं, एक माप दे जाती है। “मा” धातु से ज्ञान सम्बन्धी न जाने कितने संस्कृत शब्द अपनी निष्पत्ति पाते हैं। प्रमा, प्रमाण, अनुमान, उपमान, सम्मान, परिमाण, माप आदि। बड़ी प्रसिद्ध कहावत है कि किसी क्षेत्र में सुधार चाहते हैं तो उसे मापना प्रारम्भ कर दें। तब कम या अधिक की तुलना सरल हो जाती है। पता चलता रहता है कि कितना बढ़ चुके हैं और कितना अभी चलना है। यद्यपि कई अनुभूतियाँ संख्याओं पर निर्भर नहीं करती हैं पर कोई न कोई ऐसी मापने योग्य विमा निकल ही आती है जिसके आधार पर हम उस विषय से सम्बद्ध विकास को व्यक्त कर सकते हैं।


सन् २००९ से अब तक चल रही ब्लाग की यात्रा ऐसा ही एक क्षेत्र है। संभवतः संख्याओं पर ध्यान न जाता यदि ब्लागर ने उसे प्रमुखता से मुखपृष्ठ पर न चिपकाया होता। १२ वर्षों की इस यात्रा में कई बार व्यस्तता बढ़ी, समय की कमी रही, मन उचाट हुआ, विषयों में शुष्कता रही, सृजनात्मकता का हृास हुआ पर जब कभी भी ब्लागर का मुखपृष्ठ खोलकर देखा तो लगा कि पाठक ब्लाग पढ़ रहे हैं। तब लिखते रहना आवश्यक हो गया। संख्यायें उकसाती रहीं, यात्रा चलती रही।


एक दिन बिटिया देवला भी साथ बैठकर ब्लाग देख रही थी। यद्यपि हिन्दी पर उसका अधिकार तनिक कम है पर पिता को इस रुचि में लगा देखकर परामर्श दे देती है। ब्लाग के प्रारम्भिक काल में “मेरी बिटिया पढ़ा करो” के शीर्षक से उसके ऊपर एक कविता लिखी थी। वह कविता हम दोनों को ही बहुत अच्छी लगती है। यह लगाव भी एक कारण है कि बिटिया गाहे बगाहे परिमार्जन के कुछ सूत्र बताती रहती है, उत्साह बढ़ाती रहती है।


उस दिन देखा कि ब्लाग को अब तक दस लाख से भी ऊपर लोग पढ़ चुके हैं। नयी पीढ़ी के लिये “एक मिलियन” की यह संख्या अत्यन्त प्रभावित करने वाली है। यूट्यूब आदि में गानों के एक मिलियन दृष्टिपात यश की सीमा समझी जाती है, सफलता का मापदण्ड माना जाता है, उत्साह बढ़ाने वाला माना जाता है। मुझे जब उस संख्या का महत्व बताया गया तब लगा कि यह कोई लघु उपलब्धि नहीं है।


संख्यागत उपलब्धि

औसतन एक ब्लाग १५०० बार पढ़ा गया। १२ वर्ष पहले लिखे ब्लाग भी वर्तमान में पढ़े जा रहे हैं। नये और पुराने ब्लागों में लगभग समान रूप से पाठक आते हैं। औसतन एक ब्लाग पर ४० टिप्पणियाँ की गयीं। पूरी अवधि में औसतन २५० पाठक प्रतिदिन आये। प्रारम्भ में यह संख्या कम होगी पर वर्तमान में प्रतिदिन लगभग १५०० पाठक कोई न कोई ब्लाग पढ़ते हैं। बिटिया ने जब ये संख्यायें समझायीं तो विशिष्ट सा अनुभव होने लगा।


संख्यायें जानने के तुरन्त बाद तुलना की प्रवृत्ति जागती है। पर किससे तुलना करें, क्या तुलना करें? यह कोई ऐसा क्षेत्र तो नहीं या कक्षा तो नहीं कि जिसमें सबको एक सा पढ़ाया गया हो और उसकी परीक्षा ली जाये। सबके अपने ब्लाग हैं, अपने विषय हैं, अपनी अभिरुचियाँ हैं, देखा जाये तो सब के सब विशिष्ट हैं।


तब क्या मापदण्ड रहे जिसके आधार पर ये संख्यायें संतुष्टि प्रदान कर सकें? संतुष्टि तो इसलिये भी नहीं है कि लिखने को कितना कुछ शेष है, व्यक्त करने के कितने कुछ विषय हैं। लेखक या कवि असंतुष्ट ही रहे तो अच्छा है, इसी कारण वह लिखता रहेगा और अच्छा लिखता रहेगा।


तब इस यात्रा को किस कोटि में रखा जाये। यह अवमूल्यन सूक्ष्म नहीं होगा। स्थूल ही सही पर जीवन के बहुत से आकलन हम कोटिबद्ध कर देते हैं। कहीं घूमने गये तो पूछते हैं कि वह यात्रा कैसी रही? कोई अंक तो देते नहीं हैं, यही कहते हैं कि बहुत अच्छी रही, सामान्य रही या अनुभव ठीक नहीं रहे।


संभवतः यह मानव स्वभाव है किसी के बारे में एक वाक्य में निर्णय सुना देना। घटनाओं का समुच्चय, अनुभवों को संग्रह किसी एक कोटि में रखा भी नहीं जा सकता है। उसे विस्तार से विश्लेषित करने और समझने की आवश्यकता होती है।


कई उतार रहे, कई चढ़ाव रहे, कई बार ठहराव रहा, कभी स्थिरता रही, कभी अस्थिरता ने व्यवधान डाला।


यात्रा के इस ओर संख्याओं के साथ खड़े हैं। क्या करें इनका? संख्यायें ही सुख देती तो उसी को जुटाने में लगे रहते। संख्यायें यात्रा में संभवतः उतनी महत्वपूर्ण नहीं रहीं जितनी अभी लग रही हैं। कुछ भी हो, कैसे भी हो, ये संख्यायें स्मृति में उतराने का एक अवसर तो दे ही गयी हैं।