15.6.21

हनुमानबाहुक - संवाद


शब्द का प्रभाव भिन्न होता है, निर्भर करता है कि वक्ता कौन है, निर्भर करता है कि वक्ता की मनःस्थिति क्या है? गुड़ खाने वाले साधु की कहानी तो सुनी ही होगी। एक माँ अपने पुत्र को लेकर एक साधु के पास जाती है, अधिक गुड़ खाने कारण। साधु सुनते हैं और एक माह बाद आने को कहते हैं। एक माह बाद साधु उस बालक को गुड़ छोड़ देने के लिये समझाते हैं। कालान्तर में गुड़ तो छूट जाता है पर माँ के मन में प्रश्न रह जाता है कि यदि समझाना ही था तो साधु ने पहली बार में ही क्यों नहीं समझा दिया? अगली भेंट में संशय शमित होता है, उत्तर सरल था और कठिन भी। साधु ने कहा कि बेटा उस समय मुझे भी गुड़ से अत्यधिक अनुराग था और जब एक माह के प्रयत्न के बाद मन से भी गुड़ छोड़ सका तब ही इस योग्य हो पाया कि किसी और को समझा सकूँ।


योगसूत्र के साधनपाद(२.३६) में पतंजलि उद्घोष करते हैं कि जिसने सत्य पर संयम किया है, जिसने सत्य का अभ्यास और अनुशीलन किया है, जिसमें सत्य की प्रतिष्ठा हो जाती है, उसके शब्द सत्य की सामर्थ्य रखते हैं, उसका कहा हुआ सच हो जाता है। मन्त्रों का भी यही प्रभाव रहता होगा। काव्यविनोद और गूढ़साधना में लिखे गये शब्दों के प्रभाव में अन्तर तो रहता ही होगा। क्या कारण है कि मेरी बिटिया को पिता की बातें सामान्य लगती हैं और वही बातें जब रतन टाटा के अनुभवों के रूप में कहीं उद्धृत होती हैं तो बिटिया को अभिभूत कर जाती हैं। बिटिया को अपने पिता के प्रति कितना भी स्नेह हो पर रतन टाटा की उपलब्धियों के सामने तो वह कुछ भी नहीं।


जब तुलसीदास कुछ लिखते हैं तो उसका प्रभाव व्यापक होता है। शब्द चक्षुओं से भीतर प्रविष्ट होते हैं और सारे तन्त्र को झंकृत कर जाते हैं। यह अद्भुत अभिव्यंजना उनकी सतत साधना के कारण ही आयी होगी। प्रभाव बौद्धिक स्तर पर नहीं, सब कुछ भेदते हुये आत्मा पर होता है। कुछ तो विशेष कारण होगा कि तुलसीदास के शब्द भारतीय जनमानस के हृदय में गहरे बैठे हैं और परिस्थितियाँ आने पर स्वतः व्यक्त होने लगते हैं। कुछ तो कारण रहा होगा कि तुलसीदास जब किसी घटना का वर्णन करते हैं तो लगता है कि सब कुछ सामने ही घट रहा है। लगता है कि तुलसीदास के माध्यम से देव संवाद करना चाहते हैं, लगता है कि हनुमान संवाद करना चाहते हैं।


हनुमानबाहुक के रचनाकाल में और पीड़ा के उन कालखण्डों में तुलसीदास और हनुमान के बीच का संवाद और मुखर हो गया है। संवाद व्यक्तिगत है, सीधा सीधा। तुलसीदास की अन्य रचनाओं में कई स्थानों पर हनुमान उन्हें प्रेरित करते हुये दिखते हैं, दोनों ही एक दिशा में। हनुमानबाहुक में तुलसीदास हनुमान से सीधा संवाद करते हैं, प्रश्न करते हैं, उलाहना देते हैं। कुछ स्थानों पर श्रीरघुबीर को भी पुकारते हैं। कहीं कहते हैं कि आपके अतिरिक्त तो किसी को भजा भी नहीं, आपको ही सब कुछ माना, फिर भी आप ध्यान नहीं दे रहे हो? कई स्थानों पर आत्मग्लानि में चले जाते हैं, कहते हैं कि आपके उपकार को मैंने भुला दिया इसीलिये यह प्रतिफल पा रहा हूँ। कहीं अपनी भक्ति पर विश्वास आता है तो हनुमान से कृपा करने में विलम्ब का कारण पूछने लगते हैं। कहीं निराश हो बैठ जाते हैं कि यहीं भुगतना था तो मान लेंगे कि कुछ कुकर्म किये होंगे। कहीं विनोदवश उलाहना देते हैं कि आप अब बूढ़े हो चले हो या थक गये हो। 


तुलसीदास को अभिव्यक्ति में इतना मुखर कहीं नहीं देखा है। पीड़ाजनित व्यक्तिगत संवाद में यदि कहीं इसके समानान्तर उदाहरण मिलता है तो वह पीड़ा में डूबे बच्चे का अपनी माँ किया गया संवाद होता है। चोट खाकर भी उसे लगता है कि माँ के होते हुये उसे पीड़ा क्यों हो रही है? माँ पर क्रोध करता है, माँ को पीड़ा आने का कारण मानने लगता है, कोई पुरानी घटना बताता है कि आपने ऐसा कहा था, तभी चोट लगी है। जब हम आपके पुत्र हैं तो हमारी पीड़ा के सारे कारण, निवारण, उच्चारण, सब आप ही है। अपार समर्पण, अपार आश्रय, अपार विश्वास का प्रकटीकरण होता है यह प्रकरण। 


इन संदर्भों में हनुमानबाहुक न स्तुति है, न अर्चना है, न प्रार्थना है और न ही आरती। जब भी मैं पाठ करता हूँ, मेरे हृदय के अनुभवहीन स्पंद मुझे यही बताते हैं कि यह एक पुत्र का अपनी माँ से पीड़ा के घोर क्षणों में किया हुआ संवाद है। पुत्र तुलसीदास का माँ समान पालने वाले हनुमान से किया गया संवाद। “पाल्यो हो बाल जो आखर दू, पितु मातु सों मंगल मोद समूलो”, आनन्द-मंगल के मूल दो अक्षरों (राम) से आपने माता-पिता के समान मेरा पालन किया है। अपनी माँ के जन्म देते ही चले जाने और पिता द्वारा उसको अमंगलकारक मानकर त्यागने के बाद राम और राम की भक्ति ने तुलसीदास को पाला। हनुमान तब से उनके साथ माता-पिता के समान बने रहे।


हनुमानबाहुक के माध्यम से तुलसीदास ने भक्ति की परम्परागत श्रेणियों से परे एक नयी श्रेणी स्थापित की है। तुलसीदास अपनी सामाजिक चेतना के कहीं ऊपर चले गये हैं। वह क्षमता कहाँ है मुझमें जो वातजातं द्वारा संरक्षित तुलसीदास को बौद्धिक रूप से समझने का प्रयास भी कर सकूँ। वायु को कौन समेट पाया है? कभी लगता है कि यदि तुलसीदास को ऐसी पीड़ा न होती तो हनुमानबाहुक जैसी कृति नहीं आ पाती। कभी लगता है कि तुलसीदास अपनी व्यक्तिगत नहीं वरन हम सबकी पीड़ा झेल रहे थे। उनका संवाद उनका अपना व्यक्तिगत नहीं वरन हम सबका साझा और सम्मिलित संवाद था।


पीड़ा का उच्चारण गहरा होता है, आर्तनाद आत्मा से होता है। हम जैसे सामान्यजनों को पीड़ा झकझोर जाती है पर वही पीड़ा तुलसीदास से हनुमानबाहुक जैसी दुर्लभ और सबका कल्याण करने वाली कृति लिखवा जाती है। अपने आराध्य के प्रति जो स्नेहिल भाव तुलसीदीस ने सामाजिक मर्यादावश कहीं और व्यक्त नहीं किये गये, वे उस पीड़ा से द्रवित होकर शब्द पा जाते हैं। वे शब्द जो पीड़ा को सम्हाल लेते हैं, वे शब्द जो हाहाकार को रोक लेते हैं, वे शब्द जो सब सह सकने की शक्ति देते हैं।


प्रश्न अधिक हो जाते हैं तो हनुमानबाहुक के शब्दों में उत्तर ढूढ़ने लगता हूँ। हनुमानबाहुक को तनिक और जानेंगे अगले ब्लाग में। 

12.6.21

मिल के साथ आयें हम


मिल के साथ आयें हम,

देश को बचायें हम ।

खो गये जो लब्ध शब्द,

पुनः ढूढ़ लायें हम । 

 

केश हैं खुले हुये, द्रौपदी के आज फिर,

पापियों के वक्ष से रक्त सोख लायें हम ।

मिल के साथ आयें हम ।।१।।

 

जंगलों में घूमती, क्यों रहे जनक-सुता,

लांछन लगा रही जो जीभ काट लायें हम ।

मिल के साथ आयें हम ।।२।।

 

प्रेम का स्वरूप क्यों, यूँ छिपा छिपा रहे,

ढूढ़ कर स्वयं उसे, हृदय में बसायें हम ।

मिल के साथ आयें हम ।।३।।

 

मातृ के स्वरूप को, देख कर हर एक में,

गिर रहे चरित्र-मूल्य, उन्हें फिर उठायें हम ।

मिल के साथ आयें हम ।।४।।

 

लाज का जो आवरण, गिर रहा है शीश से,

खुद उठायें, स्वयं ही, हाथ से सजायें हम ।

मिल के साथ आयें हम ।।५।।

 

पीछे पीछे रह गयीं, आज सारी नारियाँ,

मार्ग मे हर एक पग, साथ ही बढ़ायें हम ।

मिल के साथ आयें हम ।।६।।


रही व्यक्त देवियाँ, शूरता में, ज्ञान में,

हर दिवस यही निनाद जागरण बनायें हम।

मिल के साथ आयें हम ।।७।।

 

पुरुष की है पूर्णता, प्रकृति के उछाह पर,

उठें अर्धविश्व को प्रसन्नतम बनायें हम ।

मिल के साथ आयें हम ।।८।।


10.6.21

हनुमानबाहुक - अभिव्यक्ति


यद्यपि हम एक ही अर्थों में प्रयोग करते हैं पर स्तुति, अर्चना, प्रार्थना और आरती में मूलभूत भिन्नता है। कौन ईश्वर को भज रहा है और किस अभिप्राय से भज रहा है, इस पर निर्भर करता है कि उसका विभाग क्या होगा। श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि चार प्रकार के व्यक्ति उन्हें भजते हैं, ज्ञानी, जिज्ञासु, अर्थार्थी और आर्त। किसकी मनःस्थिति क्या है, वैसे तो शब्दों से स्पष्ट है, पर निहित भावों पर एक चर्चा आवश्यक है।


गुण से गुणी को जोड़ना स्तुति है। स्तु धातु का अर्थ होता है, प्रशंसा। स्तवन या प्रशंसा के द्वारा किसी को सम्मान देना स्तुति कहलाती है। औपचारिक परिवेश में, भय या राग से विलग, गुणों का सम्भाषण स्तुति कहलाता है। जब भाव स्वार्थतिक्त होते हैं या मद प्रबल होता है तब गुणी के गुणों को आवश्यकता से अधिक या कम बतलाना क्रमशः चाटुकारिता या दम्भ कहा जाता है। ग्रन्थ इस प्रकार के संवादों से भरे पड़े हैं, अद्भुत स्तुतियों से। ईश्वर को अपने प्रकार से समझ सकने और व्यक्त करने के उपक्रम में स्तुतियाँ भिन्न हो जाती हैं। इसके मूलतः दो सार्थक उद्देश्य होते हैं। पहला है यथार्थ का यथोचित ज्ञान, जो जैसा है, वैसा व्यक्त करने की सहज प्रवृत्ति। दूसरा है, संवाद को पाठकों और श्रोताओं की ओर लक्ष्य कर समाज में अनुकरणीय गुणों को उद्भाषित करना। यदि किसी स्तुति में ईश्वर को भक्तवत्सल कहा जाता है तो पहला संदेश यह है कि आप भक्ति में प्रवृत्त हों और ईश्वर आपका भला करेगा। दूसरा संदेश आपको अपने अधीनस्थों और आश्रितों के प्रति भला करने का भाव जागृत करना है, यह अनुकरणीयता का पक्ष है।


अर्चना स्तुति से अधिक व्यक्तिगत और अभ्यासयुक्त है। आपका अपने आराध्य से सम्बन्ध उन गुणों से प्रभावित होता है जिन्हें आप अपने अन्दर चाहते हैं या जिन्हें देखकर आपका मन मुदित हो जाता है, अस्तित्व प्रसन्न हो जाता है। अपनी प्रवृत्ति के अनुसार अपना आराध्य पाना और उससे नित्य का संवाद स्थापित करना अर्चनाकृत भक्ति का प्रमुख बिन्दु है। अभ्यास अपनी स्थिति में बने रखने के लिये आवश्यक है। नित्य अर्चना, विधान पूर्वक पूजा उस स्नेह, सम्मान और श्रद्धा का प्रतीक है जो आप अपने इष्ट को अर्पित करना चाहते हैं। इष्ट शब्द भी यज् धातु से निकला है, यज् धातु में क्त प्रत्यय लगाने से, यज देवपूजने, देव के पूजन के लिये। स्तुति की भाँति ही इसमें कोई वस्तु या वर की चाह नहीं होती है, बस दैनिक संवाद अभीप्सित गुणों तक ही सीमित रहता है। एक विश्वास रहता है कि आपके आराध्य आपके आश्रय हैं। आश्रयता का पथ कठिन है, अहं तजना होता है, पुत्र का माँ के प्रति आश्रयता जैसा। यह साधनापथ देखने में सरल लग सकता है पर पूर्ण समर्पण अत्यन्त कठिन है। सुख में विस्मरण और दुख में दोषारोपण आश्रयता के विध्न हैं। अर्चना में भी गुण से गुणी को जोड़ा जाता है और साथ में आश्रयता का सम्बन्ध भी प्रस्तुत किया जाता है या स्वीकार किया जाता है।


स्तुति और अर्चना मुख्यतः ज्ञानी और जिज्ञासु के स्तर पर होती है। ज्ञानी और जिज्ञासु के बीच संशय और उसके शमन में लगे समय भर का अन्तर है। दोनों की दिशा एक होती है, कालान्तर में एक जिज्ञासु ज्ञानी बनकर स्थापित होता है।


प्रार्थना किसी अर्थ विशेष की चाह के लिये होती है। शब्द से ही स्पष्ट है कि किसी विशेष अर्थ के लिये होती है। वैशेषिक के अनुसार द्रव्य, गुण और कर्म के समुच्चय को अर्थ कहते हैं। यद्यपि यह वैशेषिक की वैज्ञानिक परिभाषा है पर अर्थ का प्रयोग सदा ही भौतिक निरूपण में किया जाता है। अर्थ का धन के रूप में प्रयोग एक अत्यन्त सीमित दृष्टि है, ठीक वैसे ही जैसे काम का रतिकर्म में प्रयोग। काम इच्छा है और अर्थ भौतिक जगत का निरूपण। पदार्थ पद की भौतिक अभिव्यक्ति है। आम पद है, एक शब्द है और आम पदार्थ है, एक रूप, भौतिक वस्तु। हमें कोई वस्तु मिल जाये, हमें कोई गुण विशेष मिल जाये या हमारा कोई कार्य हो जाये, एक प्रार्थना में कोई न कोई भाव प्रमुख रहता है। प्रार्थना अर्थार्थी करता है। एक प्रार्थना में पहले गुण से गुणी का सम्बन्ध स्थापित होता है, फिर गुणी के उस सामर्थ्य का चित्रण होता है जो अभीप्सित है, फिर गुणी का याचक से सम्बन्ध जोड़ा जाता है और अन्त में उस अर्थ में बारे में निवेदन किया जाता है जो प्रार्थना का उद्देश्य है। कार्य सिद्धि या अर्थ प्राप्ति तक ही प्रार्थना की जाती है।


आर्त आरती करता है। आरती आर्त का ही शब्दान्तर है। आर्त, जो कष्ट में है। गुणों की प्राप्ति और अर्थ की कामना में तो थोड़ी प्रतीक्षा की भी जा सकती है, पर जब कष्ट आ जाते हैं तो जीवन असह्य हो जाता है। जब तक उनका निवारण नहीं हो जाता, जीवन असामान्य ही बना रहता है। उस समय तो अपनी योग्यता सिद्ध करने का भी समय नहीं होता है। जब सहसा कुछ आवश्यकता आती है तो व्यक्ति अपनों के पास ही जाता है। भक्त अपने आराध्य की शरणागति होता है। उस समय अहं का कोई स्थान नहीं रहता। संभवतः पीड़ा से अधिक अहं का नाश करने वाला कुछ भी नहीं है। पूर्ण समर्पण के अतिरिक्त कुछ और संभावना रहती भी नहीं है तब। आर्त की इस अभिव्यक्ति में क्रम लगभग प्रार्थना जैसा ही रहता है पर अर्थ के स्थान पर कष्टनिवारण को प्राथमिकता मिलती है। पहले गुण और गुणी का सम्बन्ध, विशेषकर उन गुणों का जो कष्टनिवारण या आर्त से सम्बन्ध में सहायक होने वाले हैं। इस समय जहाँ एक ओर आराध्य की करुणा, अहैतुकी कृपा, भक्तवत्सलता आदि गुण उभरते हैं और दूसरी ओर आर्त की दयनीयता प्रदर्शित होती है। पहले से पूजा या अर्चना न करने का कारण, भविष्य में नियमित देवस्थान जाने की प्रतिज्ञा, अच्छे गुण अपनाने के आश्वासन, ये सब भी अपनी अभिव्यक्ति पा जाते हैं। गुणी और याचक का सम्बन्ध यथासंभव मधुर रखा जाता है और भूत में हुयी भूलें पूरी तरह से भ्रम की श्रेणी में आती है। अन्त में कष्ट का विवरण और कृपा प्राप्ति की इच्छा। आरती का यह रूप जनसामान्य में बहुतायत में देखने को मिलता है। 


इन चारों में भिन्नता जानना तो आवश्यक है पर आपसी तुलना उचित नहीं है क्योंकि कुछ भी हीन नहीं है। स्तुति, अर्चना, प्रार्थना और आरती, अपने आराध्य के प्रति एक व्यक्ति की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। अपने अपने स्तर पर सब उचित है। देखा जाये तो लगभग सब कुछ ही हमको प्रकृति से प्राप्त होता है, जो शुभ शेष रहा, वह सत्संग, गुरु के आशीर्वाद और ईश्वर की कृपा से प्राप्त होता है। सफलता, लाभ आदि में श्रम, बुद्धि आदि का महत्व है पर दैवयोग का भी लगभग उतना ही योगदान है। देवों को मान लेने से अपना महत्व कम हो जायेगा, ऐसी मानसिकता रखने वाले लोग इस पर आपत्ति कर सकते हैं। ब्रह्माण्ड में क्या हमारी स्थिति है और बड़े बड़े राजाओं का क्या अन्त हुआ है, इस पर तनिक सा भी विचार कर लेने से सारे विभ्रम प्रयाण कर जाते हैं। सरल, सुहृद भक्त अपने आराध्य को अपनी समस्या बता कर व्यस्त करने से पहले स्वयं उपाय करता है, जितना संभव हो सके उतना सहता है और असहनीय होने की स्थिति में पुकारता है।


हनुमानबाहुक को आप किस श्रेणी में रखेंगे? तुलसीदास अद्भुत ज्ञानी थे, सत्य का स्वरूप समझने वाले, स्वप्रेरित भक्ति में लीन, अपने आराध्य के नित्य उपासक, अपने आराध्य के शब्द उपासक। भक्ति के अतिरिक्त किसी और अर्थ की कामना भी नहीं थी उनमें, भौतिकता की तो लेश मात्र भी नहीं। बाँह की पीड़ा उन्हें हुयी, सारे उपाय भी उन्होंने किये, जितना संभव हो सका, सहा भी। अन्ततः हनुमानबाहुक के रूप में अभिव्यक्ति हुयी।


हनुमानबाहुक के संवाद में इस प्रश्न के उत्तर निहित हैं। वह विवेचना अगले ब्लाग में।

8.6.21

हनुमानबाहुक - आर्तनाद


शरीर है तो कष्ट मिलेगा ही। अंग शिथिल होंगे, विकार पनपेंगे, प्रक्रियायें समय लेंगी, अवरोह प्रारम्भ होगा। युवा शरीर अधिक सक्षम होता है। प्रकृति के नियम भेद नहीं करते हैं। अन्य दुख जो प्रारब्ध में होते हैं, जो संस्कार कर्माशय में पड़े होते हैं, वे पकते हैं, समय और परिस्थियाँ पाकर। सबको यही अनुभव होता है, सबको पीड़ा होती है। औरों की पीड़ा न हम अनुभव कर सकते हैं और न ही उसकी स्वयं से तुलना कर सकते हैं। एक ही तरह की चोट में, रोग में किसको अधिक पीड़ा हुयी, कहना अत्यधिक कठिन है। पीड़ा का उच्चारण लिखा तो पाठकों ने कहा कि आपके लेख ने पीड़ा को मूर्तमान कर दिया है, पर यह प्रश्न तो फिर भी अनुत्तरित रहा कि पीड़ा के उच्चारण को मापें कैसे? कराह के स्वर से, बहते अश्रु से, मुख चढ़े गाम्भीर्य से या शब्दों की तीक्ष्णता से जिनसे उनको व्यक्त करने का प्रयास हुआ?


जब कहूँगा कि जीवन के उत्तरार्ध में तुलसीदास को बाँह में अपार पीड़ा हुयी तो पाठक प्रमाण माँग सकते हैं। स्वीकारोक्ति से बड़ा भला क्या और प्रत्यक्ष प्रमाण हो सकता है। मर्यादित व्यक्ति पीड़ा के बारे में सबसे नहीं कहता है, नीति भी यही कहती है। एक तो पीड़ा सहना गुण माना जाता है और न सहते हुये उसे व्यक्त करना दुर्बलता। दूसरा उसको बताने का भी क्या लाभ जब सामने वाला उसे माप ही नहीं सकता है। यदि पूर्व में अनुभव किया होगा तभी अपने निवारण के बारे में बता सकता है, पर उससे आपको कितना लाभ होगा, यह कहना कठिन है। मैं तो अपनी माथे की पीड़ा के पिछले दो अनुभव में तुलना नहीं कर सकता हूँ कि किस बार अधिक हुयी थी? पीड़ा व्यक्त करने का तीसरा कारण रहीमदास बताते हैं “सुन अठिलैंहें लोग सब, बाँट न लैहें कोय” सब आनन्द ही लेंगे, कोई बाँटेगा नहीं। सब हितैषी नहीं होते हैं कि आपकी पीड़ा से द्रवित हो जायें। पीड़ा अत्यन्त व्यक्तिगत होती है, केवल सहते बनती है, न अपनी कहते बनती है, न औरों की समझते बनती है। 


चिकित्सक को भी तो हम यही न बताते हैं कि पीड़ा कहाँ हो रही है? कितनी हो रही है, यह तो चिकित्सक भी नहीं माप पाता है। तात्कालिक निवारण तो उस संवेदन को ही शिथिल करना होता है जो प्रभावित भाग में या मार्ग में अनुभव किया जा रहा है। अब वह निवारण सिकाई से हो, या पीड़ा निवारक जेल से, या पीड़ा निवारक औषधि से या फिर मालिश से। अब कितनी पीड़ा कम हुयी है, यह अनुभव भी अत्यन्त व्यक्तिगत है। पीड़ा के इस उच्चारण में हम सब उस गूँगे के भाँति ही असमर्थ हैं जो किसी स्वादिष्ट व्यञ्जन में प्राप्त तृप्ति बताना चाहता है। तब पीड़ा के बारे में किससे कहा जाये? या कुछ न कहा जाये, शान्त रहा जाये और सहा जाये। सहनीय पीड़ा तो सह ली जाती है पर असहनीय होते ही आर्त स्वर फूटने लगते हैं। नास्तिकों को छोड़ दिया जाये तो शेष सब परमात्मा की शरण ही लेते हैं, वह परमात्मा जो सतत हमारे साथ ही रहता है।


तुलसीदास ने भी उस अपार पीड़ा के क्षणों में अपने आराध्य को पुकारा। यह पुकार प्रारम्भिक कालखण्ड में मानसिक या मौखिक रही होगी पर अन्ततः शब्दों में व्यक्त हुयी। इस अभिव्यक्ति को हम सब “हनुमानबाहुक” के नाम से जानते हैं। करुण पुकार यदि लिखी गयी तो निश्चित ही बहुत अधिक समय के लिये वह पीड़ा रही होगी, साथ ही सारे उपचार करने के बाद भी निवारण नहीं हुआ होगा। तुलसीदास ने इसका वर्णन भी किया है कि “औषध अनेक जन्त्र मन्त्र टोटकादि किये, बादि भये देवता मनाये अधिकाति है”। अर्थात सब प्रयास कर डाले, औषधि और अन्य प्रचलित उपचार से कुछ भी लाभ नहीं हुआ। देवताओं को भी मनाया पर पीड़ा बढ़ती ही गयी।


जिन्होने तुलसीदास को पढ़ा है, वे जानते होंगे कि किसी अन्य स्थान पर उन्होंने अपनी शारीरिक पीड़ा को व्यक्त नहीं किया है। मानसिक वेदना, दुख, व्याप्त कुरीतियाँ, सामाजिक विद्रूपतायें आदि तो व्यक्त हैं, पर शारीरिक पीड़ा केवल हनुमानबाहुक में ही व्यक्त है। रामचरितमानस के रचयिता ने श्रीराम के चरित्र का अनुशीलन मर्यादापालन में किया है। कभी अपनी मर्यादा लाँघी नहीं है। विनयपत्रिका उनके इस आचरित व्यवहार का स्पष्ट उदाहरण है कि किस प्रकार उन्होंने सभी देवताओं और निकटस्थों के माध्यम से श्रीराम के दरबार को अपनी पत्रिका भेजी। कैसी भी परिस्थिति हो, तुलसीदास सदा ही विनयशील बने रहे। पीड़ा के एक स्पंद के अनुभव के पश्चात और दूसरे स्पंद की प्रतीक्षा के पहले, निश्चय ही इसी कालखण्ड में उनके आर्त स्वर “हनुमानबाहुक” बनकर फूटे होंगे।


कहते हैं कि जैसे जैसे तुलसीदास ने हनुमानबाहुक की रचना की और उनकी पीड़ा जाती रही। वातजनित पीड़ा वातजातं के प्रभाव से ही गयी। यही कारण है कि हनुमानबाहुक को उपचार काव्य माना जाता है, या कहा जाये तो मन्त्रशक्ति से संचित रचना माना जाता है। हनुमान का अपना आराध्य मानने वाले जहाँ एक ओर भयमुक्त रहने के लिये हुनमानचालीसा पढ़ते हैं, शारीरिक और मानसिक पीड़ा के निवारण के लिये हनुमानबाहुक का पाठ किया जाता है। बचपन से न जाने कितनी बार हनुमानचालीसा ने निर्भय रहना सिखाया है, मन में शक्ति का संचरण किया है। हनुमानबाहुक ने वर्तमान बाँह की पीड़ा के प्रकरण में उबारा है। तुलसीदास को साधने वाले हनुमान उनकी रचना का पाठ करने वाले को भी साधते हैं। हनुमानबाहुक के उच्चारण में तुलसीदास के प्रति हनुमान का प्रेम उमड़ता है।


हनुमान और तुलसीदास का सम्बन्ध अद्भुत है। अपने आराध्य का उत्कृष्ट चरित रचने और उसे प्रसारित करने वाले तुलसीदास के प्रति हनुमान के मन में कितना वात्सल्यभाव भरा होगा, इसकी थाह लगाने के लिये हनुमानबाहुक के वे भाग पढ़ने होंगे जहाँ तुलसीदास उनसे ऐसे बात करते हुये दिखते हैं जैसे कोई पुत्र अपनी माता को उलाहना देता है। सामाजिकता में सामान्यतः मर्यादा में छिपे मन के भाव, पीड़ा की पराकाष्ठा में उभर कर सामने आये हैं, स्पष्ट दिखायी पड़े हैं। यदि तुलसीदास को बाँह की पीड़ा न होती तो उलाहना और वात्सल्य का यह अनुपम दृश्य हमें देखने को न मिलता। जब मैंने पहली बार इन भागों को समझा तो अपने मित्र अशोक से चर्चा में अनायास ही बोल उठा कि कहीं कोई भक्त अपने आराध्य को इस तरह कुछ कहता है? यह तो लग रहा है कि कोई छोटा पुत्र अपनी माँ से बात कर रहा है। अशोक जो तुलसीदास और हनुमान के नित्य उपासक हैं, इतना ही कह कर रह गये कि आपको जैसा लग रहा है, हो सकता है कि वैसा ही हो।


देखिये न, पीड़ा के इस प्रकरण ने कितना सुखद रहस्य हमें दिखाया है। स्तुति, अर्चना, प्रार्थना और आरती के भेद और उस संदर्भ में हनुमानबाहुक की चर्चा अगले ब्लाग में।

5.6.21

दीखता स्पष्ट वह नर


(एक ऊँची अट्टालिका में रस्से से लटके और काँच पोंछते हुये श्रमिक पर)


दीखता स्पष्ट वह नर,

बादलों के बीच स्थिर,,

गगन पथ पर अग्रसर वह,

एक रस्से डटा टिककर।


आज नीचे दृष्टि जाकर,

दे रही आनन्द आकर,

सभी चींटी से खड़े है,

स्वप्नसम आकार पाकर।


स्वेद से माथा भिगोता,

कर्म में सब श्रम डुबोता,

देखता प्रतिबिम्ब में जब,

रूप अपना मुग्ध होता।


बादलों के लोक आकर,

आज उनसे शक्ति पाकर,

संग में तुम और हम भी,

दौड़ लेंगे जी लगाकर।


तनी जो अट्टालिकायें,

पद तले निर्मम दबायें,

नाप ली हमने सहज ही,

गर्व की सारी विमायें।


पोंछता है काँच दिनभर,

जा सके निर्बाध दिनकर,

शेष सब नेपथ्य छिपते,

दीखता स्पष्ट वह नर। 

3.6.21

हनुमानबाहुक - तुलसीदास


वाल्मीकि और तुलसीदास, दोनों ही क्रमशः रामायण और रामचरितमानस में राम के चरित्र को समग्रता से व्यक्त करते हैं। यद्यपि कथानक, घटनाक्रम, पात्र आदि समान हैं, भेद का मुख्यतः एक ही कारण है। स्थूल रूप में अन्तर अधिक नहीं है पर किस घटना को कितना महत्व देना है, किस पात्र का कौन सा पक्ष उभारना है, पाठक को क्या संदेश देना है, इन पक्षों पर अन्तर तनिक स्पष्ट हो जाता है।


राम से रचयिता का सम्बन्ध ही भेद का मुख्य कारण है। सम्बन्ध का प्रभाव अभिव्यक्ति पर पड़ता है। वाल्मीकि राम के समकालीन थे। राम स्वयं वनगमन में उनके आश्रम गये, पत्नी सीता उनके आश्रम में रहीं, पुत्र लव और कुश उनसे शिक्षा पाये, स्वाभाविक है कि वाल्मीकि को राम का चरित्र लिखने में अन्याश्रयों की आवश्यकता नहीं थी।  वाल्मीकि ने रामकथा, लवकुश के माध्यम से व्यक्त की, दरबार में अपने पिता के समक्ष गाते हुये। घटनायें या तो प्रत्यक्ष थीं या सीतावर्णित रही होंगी। वैसे भी उस समय ऋषिसमाज में कथाओं का बड़ा महत्व था। ज्ञान, नीति, समाज के उजले पक्ष कथाओं में अवलेहित कर संरक्षित रखे जाते थे। आश्रमों के सत्संग, तीर्थ यात्रायें ज्ञान के अदानप्रदान के सुदृढ़ आधार थे। इस वातावरण में रामायण की रचना की शैली इतिवृत्तात्मक थी और उद्देश्य रामराज्य के उदाहरण से प्रेरित अम्युदय। वाल्मीकि ने राम का चरित्र एक अत्यन्त अनुकरणीय रूप में प्रस्तुत किया है। वाल्मीकि के राम सहज ही प्रश्न पूछते हैं, लोकाचार जानते हैं और निभाते भी हैं, सम्बन्धों में विनम्रता, करुणा और स्नेह की मर्यादा तक भी जाते हैं, यह सब एक मानव के रूप में, एक अनुकरणीय उदाहरण के रूप में।


यही नहीं, वाल्मीकि के अन्य पात्र भी एक सहज और सरल चिन्तन शैली लिये हुये लगते हैं, देवत्व और प्रभुत्व के प्रदर्शन से बचते बचाते। समकालीनता का एक लाभ यह भी होता है कि उस समय की मनःस्थिति रचयिता के मन में लगभग पात्र के अनुरुप ही रहती है। हनुमान जब सीता को रावण के महलों में ढूढ़ते होते हैं तो रावण के महलों के विलासिता के दृश्यों से निस्पृह हो मात्र कर्तव्य ही नहीं कर रहे होते हैं। उस समय वाल्मीकि के हनुमान हम सबकी तरह सोचते भी हैं कि मुझ ब्रह्मचारी को इस कार्य के लिये क्या क्या अर्धनग्न दृश्य देखने पड़ रहे हैं। वाल्मीकि के हनुमान न केवल इस प्रश्न को स्वीकार करते हैं वरन उसका तर्क और नीति से निवारण भी करते हैं।


वहीं दूसरी ओर तुलसीदास के राम उस भाव के परिवाहक थे जो कई सहस्रवर्षों से भारतीय जनमानस में ज्योतिर्मय था। सम्बन्धों में मर्यादा की पराकाष्ठा, शासन में रामराज्य का परमोत्कर्ष और पराक्रम में धनु सायक धरे राम, ये तीनों रूप सतत ही हमारे आदर्शों को एक निर्विवाद दिशा प्रदान करते हैं। राम और तुलसीदास के राम के बीच संस्कृति के सहस्रवर्षों का अन्तर था, विस्तार था। मध्य में इतनी कथाओं का प्रसार था कि जिन्हें समाहित कर पाना सरल नहीं था। सबके अपने नायक राम, सबके अपने पालक राम, सबके अपने बालक राम, सबकी अपनी एक भिन्न परिकल्पना पल्लवित हो चुकी थी राम और तुलसीदास के राम के बीच। तुलसीदास के समय का तात्कालिक परिवेश वाल्मीकि के समय से भिन्न था। वाल्मीकि ने जिस समय रामायण की रचना की, उस समय राक्षस मारे जा चुके थे, रामराज्य का उत्कर्ष दृष्टव्य था। जहाँ वाल्मीकि का परिवेश उत्थान का परिवेश था वहीं तुलसीदास के सारे रचनाकाल का परिवेश संघर्ष का था। आक्रांताओं के अनैतिक शासन के विरुद्ध आह्वान का केन्द्रबिन्दु था तुलसीदास का रचनावृत्त।


इस दृष्टि से देखा जाये तो तुलसीदास के राम को न केवल मर्यादा की सीमा के रूप में प्रस्तुत होना था, न केवल वीरता के प्रतिरूप के रूप में व्यक्त होना था, न केवल आदर्श शासक के मानदण्ड स्थापित करने थे, वरन संगठन, संघर्ष, संस्कृति, समरूपता, समाज के उत्थानबिन्दु पर राष्ट्र को ले जाने का दायित्व भी था। रचना पर कर्तव्यों और आकांक्षाओं के महत्भार का निर्वहन तुलसीदास ने अकेले नहीं किया और न कभी उसका श्रेय ही लिया। 


तुलसीदास ने किसी एक वक्ता के मुख से रामचरितमानस नहीं कहलायी, जिस समय जिस शैली की आवश्यकता हुयी, उस प्रकार के संवाद द्वय के प्रश्नोत्तरों से उसे व्यक्त किया। शिव पार्वती, याज्ञवल्क्य भरद्वाज, काकभुशुण्डि गरुड़ के संवादों से कथानक बढ़ाते हुये कई स्थानों पर तुलसीदास ने अपने श्रोताओं से सीधा संवाद स्थापित किया। जनमानस के भीतर की अग्नि जगानी हो या समाज का विक्षोभ मथना हो, तुलसीदास “पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं” का उद्घोष करते हैं। वेद, उपनिषद, पुराण आदि का सार हो या विज्ञान, संगीत, कृषि, ज्योतिष, तर्क के विषय, तुलसीदास अपनी संस्कृति के उत्कृष्ट अंगों का वर्णन करते हैं। आस्था के प्रतिमान हों या अपने स्वामी पर सर्वस्व न्योछावर करने का भाव हो, तुलसीदास भक्ति की शक्ति यथासंभव उभारते हैं। समाज में व्याप्त कुरीतियों हों या शैव वैष्णव, सगुण निर्गुण के विभ्रम, सबको एक निर्विवादित सार के रूप प्रस्तुत करते हैं तुलसीदास।


रामचरितमानस का प्रभाव भारतीय जनमानस में इतना व्यापक और गहरे उतरा है कि उसे शब्दों में उतार पाना असंभव है। घर घर में, गाँव गाँव में, सभाओं में, ज्ञानियों में रामचरितमानस की चौपाइयाँ, दोहे, छन्द प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किये जाते हैं। तुलसीदास के शब्द मन्त्र की शक्ति रखते हैं, उच्चारण भर कर लेने से मन निर्भय हो जाता है। तुलसीदास के शब्द मन का कलुष, व्यक्तित्व की क्षुद्रता, आचरण की न्यूनता, सबकुछ पिघलाकर अश्रु रूप में बहा डालते हैं। तुलसीदास के शब्द भक्ति की पराकाष्ठा हैं, शक्ति का उत्कर्ष हैं, भावनाओं का सौन्दर्य है और सम्बन्धों की कोमलता। रामचरितमानस के इस निर्मल आनन्द ने जब हम जैसे अधमों को इतना रुलाया है, कल्पना कीजिये किस भाव विभोरता में तुलसीदास ने रामचरितमानस का एक एक छन्द पिरोया होगा?


इस महत्कृति का तुलसीदास ने कभी भी तनिक भी श्रेय नहीं लिया और न ही कभी दंभ भरा राम से अपनी निकटता का। हर स्थान पर हनुमान उनके पथ प्रदर्शक के रूप में आते रहे। अपने आराध्य से जुड़ने में तुलसीदास को सदा ही अपने स्वामी हनुमान का आश्रय था। वाल्मीकि को राम से अपनी समकालीनता का लाभ था तो तुलसीदास को राम के भक्त और दरबार के रखवाले हनुमान का साथ और आशीर्वाद।


आश्रयता के इस चरम पर जब सेवक तुलसीदास को बाँह की पीड़ा हुयी होगी तो उनके अपने स्वामी हुनमान के प्रति क्या उद्गार होंगे, यदि इस रहस्य को जानना है तो “हनुमानबाहुक” का पाठ आवश्यक है, एक समझ आवश्यक है। भक्ति की अंतरंगता के इस पक्ष को व्यक्त कर सकने का प्रयास भर करूँगा अगले ब्लाग में। 

1.6.21

हनुमानबाहुक - आराध्य


अपने आराध्य का भीरुभक्त हूँ, सम्मुख होने का साहस नहीं जुटा पाता। मेरी क्षुद्रता मेरे आत्मविश्वास को हर लेती है। जब मन की दुर्बलतायें पैरों में बन्ध बन कर पड़ी हों तब वह उत्साह कहाँ से जुटाऊँ जो बढ़ने के लिये प्रेरित करे। अपने ही स्वार्थ-उपक्रमों में इतना मुग्ध हूँ कि छोड़ने की इच्छा ही नहीं होती। एक भय सा लगता है कि यदि यह सब छूट गया तो जीवन में शेष क्या रहेगा, एक रिक्त, एक सन्नाटा, एक स्तब्धता। अपने श्रीराम के चरित्र से अभिभूत हूँ और प्रेरित भी। यदि वह पूँछ बैठे कि क्यों इतना स्नेह रखते हो, क्यों इतनी श्रद्धा रखते हो तो उत्तर देना असंभव हो जायेगा। क्या उत्तर रहेगा? मर्यादा, धैर्य, प्रेम, समत्व, वात्सल्य, शरणागत रक्षा, कौन सा ऐसा गुण नहीं है,  कौन सी ऐसा प्रकरण नहीं है, कौन सा ऐसा कर्म नहीं है जो अभिभूत न करता हो, जो मन को स्पर्श न करता हो। अगले ही क्षण तब लगेगा कि कौन मुझ सा पाखण्डी है, कपटी है कि कहता कुछ हूँ और करता कुछ। एक भी ऐसा गुण नहीं जिसका लेश मात्र भी अनुसरण कर सकूँ। मेरे पूरे व्यक्तित्व को स्वार्थ इस प्रकार घेरे है, तम इस प्रकार जकड़े है कि आराध्य का अनुसरण कैसे हो?


आराध्य यह सब देखता है, आपके मन को समझता है, आपकी दुर्बलता को जानता है। जब आपकी किंकर्तव्यविमूढ़ता अपने चरम पर होती है तो वह स्वयं ही निश्चित करता है कि किस प्रकार आपको आपके आवरण से बाहर निकालना है। अपने आराध्य पर यह विश्वास ही भक्त की शक्ति है, उसका एक मात्र गुण है। दो ही मार्ग है तब, या तो अपना प्रिय जानकर आपका तात्कालिक सुख देखे या आपका दीर्घकालिक हित देखे। आपका आराध्य तब संभवतः एक ऐसा मार्ग चुनता है जिसमें दोनों ही तत्व रहें। उस मार्ग में पीड़ा होती है जो कि बन्धन टूटने में स्वाभाविक ही है। उस समय भी यदि आपका अपने आराध्य पर विश्वास बना रहता है तो पीड़ा भयावह नहीं लगती, पीड़ा सहनीय हो जाती है। यदि उस समय आप अपना धैर्य खो देते हैं और आपकी निष्ठा डिग जाती है तो आपका आराध्य आपको दिशा दिखाना बन्द कर देता है। अपने आराध्य पर स्थिर श्रद्धा ही आपकी स्वीकारोक्ति है।


यह सिद्धान्त समझने में सरल पर निभाने में कठिन लगता है। भक्ति की राह शक्ति के दम्भ से भिन्न है। आप अपने आराध्य को आमन्त्रित करते हैं कि वह आपको राह दिखाये, सही निर्णय लेने को प्रेरित करे। कार्य तो आपको करना है, पुरुषार्थ भी आपको करना है, पर किस क्षण प्रवृत्ति हो या किस क्षण निवृत्ति इस विभ्रम में एक प्रेरणा मिल जाती है। बहुधा आपके ऐसे व्यक्ति मिल जाते हैं, ऐसी परिस्थितियाँ मिल जाती हैं कि श्रम तनिक न्यून और समय तनिक शीघ्र हो जाता है। आराध्य की कृपा का यही स्वरूप मन में लिये जीता हूँ।


आराध्य के सम्मुख जाने में मेरी भीरुता और फिर भी आराध्य की कृपा पाने की उत्कट अभिलाषा मुझे उनके अनन्य भक्तों के पास जाने को प्रेरित करती है। कुछ मेरा भय कम होगा और कृपा का स्रोत भी बना रहेगा। बाल्यकाल से नित्य हनुमान की प्रतिमा के दर्शन मात्र से ही उन पर एक अटूट विश्वास सा उत्पन्न हुआ है और बना हुआ है। भय के न जाने कितने क्षणों में उनकी आराधना ने बाहर निकाला है। तनाव से जीर्णशीर्ण मन को यदि किसी आकृति ने हर बार आश्रय दिया है तो ध्वजा और गदा धारे बजरंगबली ने। जगत विरुद्ध हो चला हो, कुछ उपाय समझ न आ रहा हो, भीषणतम काल प्रवाह हो, एक अभिभावक के रूप में सदा ही उनको निकट पाया है। तब निष्कर्षों के सभी संभावित विकल्प अपने हनुमान के चरणों में अर्पित कर निश्चिन्त हो जाता हूँ, जो भी प्रसाद मानकर मिल जाये।


अपने विशिष्ट व्यक्तित्व और कृतित्व के कारण हनुमान हम सबके नायक हैं और यथासमय, यथास्थान हमें प्रेरणा भी देते रहते हैं। तुलसीदासजी के भी प्रेरक हनुमान थे। कल्पना कीजिये, जब जनमानस आक्रांताओं के अधर्म, बर्बरता औऱ क्रूरता के कारण नैराश्य में डूबा था, उस समय सबके सम्मिलित आर्त भावों को किसी अभिव्यक्ति की प्रतीक्षा थी। उस अभिव्यक्ति की जो व्याप्त अन्याय के विरुद्ध, प्रचलित राक्षसत्व के विरुद्ध न केवल एक विचारधारा उत्पन्न कर सके वरन उस पर विजय पाने का उदाहरण भी प्रस्तुत करे। श्री राम का जीवन तो सदा ही अन्याय को मिटाने में बीता है, हाथ में धनुष, उत्पातियों और अधर्मियों का संहार। हनुमान स्वयं ही उस महत्कार्य में सहायक रहे हैं और उन्ही की साक्षात प्रेरणा से श्रीरामचरितमानस ग्रन्थ की रचना हुयी जो शताब्दियों से हमारे जनमानस को प्राणवन्त करता आया है।


न जाने कितने रामभक्तों के आर्त स्वर तुलसी के शब्दों से फूटे हैं। अपने आराध्य का चरित्र रचकर तुलसी दास ने उन्हें शब्दों का भोग अर्पित किया है। तुलसीदास के इन्हीं शब्दों में बँध सा जाता हूँ जब भी कुछ पढ़ने बैठता हूँ। एक अद्भुत गहराई है विचारों की, सारल्य है अभिव्यक्ति का, एक निचोड़ है संस्कृति के सहस्रों वर्षों का, लगता है कि कोई आपका अपना आपसे आपकी व्यथा कह रहा हो। तुलसीदास को जितना पढ़ता हूँ, उतनी ही उत्कण्ठा बढ़ जाती है और पढ़ने की। संस्कृति, संगीत, संस्कृत, काव्य, छन्द, नीति, वेद, दर्शन, क्या नहीं मिला तुलसीदास की रचनाओं में? संस्कृति पर गर्व करने वाले हर व्यक्ति को तुलसीदास के ग्रन्थ चेतना के नये स्तर पर ले जाते हैं, हर बार, बार बार। यही कारण रहा कि जैसे जैसे अपनी संस्कृति का उत्कर्ष बुद्धि को आकर्षित करता गया, तुलसीदास मन और मस्तिष्क में स्थायी रूप से बिराजने लगे।


तुलसीदास सदा ही हनुमान को अपना संरक्षक, मार्गदर्शक और स्वामी मान कर रचनाकर्म में निरत रहे हैं। संकटमोचन मंदिर में हनुमान को खोजना, उनसे मिलना और उनके माध्यम से अपने आराध्य श्रीराम के दर्शन करना  आज भी उनके किंकरों को रोमांचित कर जाता है। हनुमान का आश्वासन तुलसीदास की एकमात्र सम्पदा थी, वही उनका आत्मविश्वास औऱ वही उनका मनोबल था। अकबर के द्वारा कारागार में डालना और तत्पश्चात वानरों का उपद्रव तुलसीदास की निर्भयता और आश्वस्तता का एक उदाहरण मात्र था।


अपने संरक्षक पर निर्भरता के इस चरम पर जब तुलसीदास को बाँह की पीड़ा हुयी और अन्य कई उपाय करने पर शीघ्र ठीक नहीं हुयी तो तुलसीदास ने उस वेदना को एक कृति के माध्यम से व्यक्त किया। कई साधक और हनुमानभक्त उस परम अभिव्यक्ति से परिचित भी हैं। तुलसीदास की उस पीड़ा के शब्दस्पंद “हनुमान बाहुक” के मर्म को जानेंगे अगले ब्लाग में।

29.5.21

हम काल कला से छले गये


गिरिजेशजी का जाना हृदय विदीर्ण कर गया, 

एक अद्भुत व्यक्तित्व चला गया, 

एक अश्रुपूरित शब्दांजलि......


हम काल कला से छले गये,

गिरिजेश! कहाँ तुम चले गये?


गहरे रहस्य, उद्भट प्रकथ्य,

सुर शब्दों में, संनिहित सत्य,

करना था कितना और व्यक्त,

सब कुछ पसार कर चले गये?

हम काल कला से छले गये ।।१।।


श्रम डूबे सब वांछित प्रयत्न,

मेधा से ढूढ़े अलख रत्न,

साझे, साधे अनगिनत यत्न,

सब कुछ बिसार कर चले गये?

हम काल कला से छले गये ।।२।।


दस वर्ष अधिक सम्बन्ध रहा,

संवाद सतत निर्द्वन्द्व बहा,

सोचा जो भी स्पष्ट कहा,

सब कुछ उतार कर चले गये?

हम काल कला से छले गये ।।३।।


संस्कृत संस्कृति के रहे प्राण

प्रस्तुत उत्तर, विस्तृत प्रमाण,

आगत प्रज्ञा, संशय प्रयाण,

सब कुछ विचार कर चले गये?

हम काल कला से छले गये ।।४।।


अलसाया चिठ्ठा रहे भुक्त,

हत मघा, करेगा कौन मुक्त,

कविता के सुन्दर स्रोत सुप्त,

सब पर प्रहार कर चले गये?

हम काल कला से छले गये ।।५।।


बाऊ बैठे, मनु उर्मि शान्त,

सब रामायण के पात्र क्लान्त,

शत शोकमग्न तिब्बत नितान्त,

सबको निहार कर चले गये?

हम काल कला से छले गये ।।६।।


माता बिन बीता एक माह,

मन पिता मन्त्र बहता प्रवाह,

क्यों लिये विकट स्मृति उछाह,

यह जगत पार कर चले गये?

हम काल कला से छले गये ।।७।।


जब रहे सनातन कालपथिक,

किसकी बाधा, क्यों हृदय व्यथित,

रुक जाते थोड़ा और तनिक,

जग तार तार कर चले गये?

हम काल कला से छले गये ।।८।।


27.5.21

बाँह की पीड़ा - उच्चारण

 

पीड़ा के क्षणों में, जब मन अपने मन की नहीं कर पाता है, तब क्या संवाद चलता है? पीड़ा के क्षणों का उच्चारण क्या होता है? स्वर आर्त होते हैं, करुणा होती है, क्रोध आता है या अस्तित्व निशान्त हो जाता है। अनमना सा लगता है, किसी एक विषय में ध्यान नहीं लगता है, रह रह कर सारा ध्यान पीड़ा के स्थान पर पहुँच जाता है, पीड़ा के कारण एक के बाद एक सामने आने लगते हैं, लगता है तब कि काश यह न करते या वह न करते, प्रायश्चित के स्वर फूटने लगते हैं।


बाँह की पीड़ा के कालखण्ड में चिन्तन बहुत हुआ। कारण स्पष्ट था। रात्रि में जब निद्रा नहीं आती थी, बाँह, कन्धे, गर्दन या पीठ में कहीं भी पीड़ा होती थी तो उठ बैठना ही पीड़ा कम करने का एकमात्र उपाय लगता था। इस स्थिति में बाँह सीधी लटकती थी और पीड़ा की तीव्रता कम हो जाती थी। एक बार निद्रा उचट जाये तो पुनः आ पाना सरल नहीं होता था, या तो सिकाई करनी पड़ती थी, या स्वयं हाथ से दाबना पड़ता था, या पीड़ानिवारक जेल लगाना पड़ता था और किसी से कुछ लाभ न होता था तो पीड़ानिवारक औषधि लेकर सोने का प्रयास करना होता था। कई बार इस प्रयास में हर बार घंटे भर के ऊपर का जागरण हो जाता था, कभी कभी रात्रि में दो बार भी। इसके अतिरिक्त ४ बजे के बाद कभी भी निद्रा टूटी तो पुनः सोने का प्रयत्न न करते हुये दिनचर्या प्रारम्भ कर दी जाती थी। रात्रि में पीड़ा को अर्पित हुये निद्रासमय की क्षतिपूर्ति दिन में करने का प्रयास रहता था पर इस पूरे प्रकरण में गाढ़ी निद्रा एक स्वप्न ही रही।


रात्रि की स्तब्धता में जब शरीर हाहाकार कर रहा हो तो मन चिन्तन में डूब ही जाता है। पहला चिन्तन तो पीड़ा  यथासंभव कम करने के उपायों पर होता था। दूसरा उन द्वितीयक कष्टों पर होता था जो कम निद्रा के कारण आयी थकान के कारण होने वाले थे। तीसरा चिन्तन वापस उन संभावित कारणों पर होता था जिनके कारण यह हृदयविदारक स्थिति में शरीर पड़ा हुआ है। हर संभावित कारण का कोई न कोई उपाय भी मन में आता था। उसकी पुनरावृत्ति न हो अतः मन हर कारण के सुधार की प्रतिज्ञा कर बैठता था। सुधारवादी विचारों का प्लावन भविष्य की इतनी सुन्दर छवि बनाने लगता है कि उसमें वर्तमान की पीड़ा कुछ क्षणों के लिये विस्मृत सी हो जाती है। न केवल कारण सुधारने की प्रतिज्ञा होती है वरन उससे भी आगे जाकर मन न जाने क्या क्या कर लेना चाहता है। पीड़ा के क्षणों में मन जितना सुधारशील हो जाता है, यदि सामान्य क्षणों में उसका शतांश भी हो जाये तो अधिकांश कष्ट हमारे पास ही न पहुँचे।


चौथा चिन्तन उन विचारों पर टिकता है जिनसे पीड़ा भुलायी जा सके। इसे चिन्तन शब्द से परिभाषित करना उचित नहीं होगा क्योंकि यह मन से ही मन को भरमाने के उपाय पूछने जैसा है। कुछ रोचक सा देखना या सोचना। यह पक्ष प्रायः असफल ही रहा, यदि सफल हुआ भी तो अत्यल्प समय के लिये। पाँचवाँ चिन्तन उस भविष्य पर होता है जब आप मान बैठते हैं आपका सर्वाधिक अहित होने वाला है। स्वजनित मानसिक पीड़ा शारीरिक पीड़ा को कुछ समय के लिये तो भुलाने में सहयोग तो करती है पर जैसे ही विचार अवसान पाता है, कृत्रिमता का आवरण हटता है, शारीरिक पीड़ा वापस लौट आती है।


छठा चिन्तन उन वर्तमान दृश्यों पर दृष्टिपात करके होता है जब आप सारे आयातित विचार त्याग कर अपने वर्तमान में आ जाते हैं। जो दिखता है उसी पर सोचना प्रारम्भ कर देते हैं। कमरे की छत पर भागती हुयी छिपकली, मच्छरदानी के बाहर प्रयासरत संगीतमय मच्छर, बाहर टहलते समय झींगुर के बोलने का स्पष्ट नाद या पेड़ों के पत्ते खड़खड़ाने के स्वर। दो तीन फिल्मों में देखा था कि जेल की अंधकोठरी किस प्रकार किसी कीड़े या चूहे से खेलकर अपने वर्तमान पर अधिरोपित कर नायक एक और वर्तमान ढूढ़ लेता है। अपनी स्थिति देखकर कुछ वैसी ही भावना मन में घर कर गयी, बस अंधकोठरी के स्थान पर एक पीड़ा की कोठरी थी। रात्रि में अंधकार की गहनता मापना भी ऐसे चिन्तन का एक स्वरूप हो सकता है। रात्रि के दो तीन बजे तब किसी अन्य वस्तु से भय भी नहीं लगता है, पीड़ा ऐसी निर्भयता उत्पन्न कर देती है।


सातवाँ चिन्तन आर्त भाव से युक्त होता है। आर्तनाद अपने आराध्य के प्रति होता है। प्रार्थना पीड़ा से निवारण की, प्रार्थना उस शक्ति के उपयोग की जो आपके आराध्य के पास है, प्रार्थना उस प्रकृति को संयत करने की जिसने आपके शरीर में या जीवन में उत्पात मचा रखा है। आर्तनाद करने कोई व्यक्ति उसी के पास जाता है जो सक्षम हो और सुदृद भी, शरणागत हो और भक्तवत्सल भी। न्यायप्रियता से कहीं अधिक एक विशेषकृपा की चाह रहती है इस भाव में। गीता में श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा गया है, चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन। आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ। मुझे अच्छा कर्म करने वाले चार विधाओं में भजते हैं, आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी। पीड़ा कैसे भी हो, आपको आपके आराध्य के पास ले जाती है। पीड़ा आपको सामान्य जीवनक्रम से परे कुछ सोचने को विवश करती है। पीड़ा आपको वह समय देती है जब आप अपने भविष्य को भूत की भूलों से विलग कर सकें। पीड़ा का अनुभव आपके जीवन के दिशा बदलने में सक्षम होता है।


कहते हैं कि कोई घटना जीवन को पूरी तरह बदल देती है। विशेषता उस घटना में नहीं वरन उस प्रभाव में होती है जो आप पर पड़ता है, आपके शरीर पर पड़ता है, आपकी मनस्थिति पर पड़ता है। पीड़ा सहसा कोई पक्ष उजागर कर आपके चिन्तनपथ को झकझोर जाती है। गाँधी को अपमान की पीड़ा हुयी, बुद्ध को जीवन में व्याप्त कष्ट पीड़ा दे गये, दशरथ माँझी को पत्नी के देहावसान में उभरी एक विवशता पीड़ा दे गयी। कब क्या आपको हिला जाये, क्या आपके जीवन को नये पथ की ओर मोड़ जाये? पीड़ा आपके जीवन को दो भिन्न भागों में विभक्त देती है, बहुधा आपके कल्याण के लिये। पीड़ा भले ही किसी ने आप पर सहृदयता के उद्देश्य से न थोपी हो पर पीड़ा अन्ततः आपका भला कर के ही जाती है, अयस्क को कनक बना कर जाती है।


ऐसा नहीं है कि पीड़ा पहली बार हुयी और ज्ञान चक्षु खुल गये, ऐसा भी नहीं है कि पीड़ा इतने लम्बे समय के लिये पहली बार हुयी है, पर पहली बार ऐसा हुआ है कि पीड़ा के पक्षों को देखने का प्रयास किया है, पीड़ा के अन्दर झाँकने का प्रयास किया है। पीड़ा का यह अनुभव मेरे लिये पूर्णरूपेण वैयक्तिक अवश्य था पर पीड़ा का व्यक्त स्वरूप हर ओर दिखायी पड़ता है। मेरे मन और मस्तिष्क में स्थायी रूप से बिराजे तुलसीदास को भी एक बार बाँह की पीड़ा हुयी थी। उसका स्वरूप और उच्चारण अगले ब्लाग में।



25.5.21

बाँह की पीड़ा - निवारण


संभावित कारणों के विश्लेषण के बाद निवारण का कार्य चिकित्सीय परामर्श से ही होना था। स्वयं उपचार कर पाने की न तो योग्यता थी और न ही समय। दो सप्ताह की आंशिक प्रयोगधर्मिता के बाद भी पीड़ा बनी हुयी थी, न केवल बनी हुयी थी अपितु बढ़ गयी थी। स्वास्थ्य को लेकर लघु प्रयोग सब ही करते रहते हैं, कभी कुछ बदल कर देखा, कुछ नया लेकर देखा, कुछ दिनचर्या बदली, कुछ रुचियों को तिलांजलि दी। अब प्रयोगों का समय नहीं रहा था, तात्कालिकता प्रबल हो चुकी थी। 


बहुधा मन यह कामना करता है कि चिकित्सक के यहाँ न जाना पड़े, लघुविकार स्वतः ही ठीक हो जायें, न जाने के पहले सारे उपाय कर लेता है, आपको भी समझाता है, अनावश्यक समझ कर टालने का प्रयत्न करता है। कभी कभी यह भय भी रहता है कि छोटे से और स्वतः ठीक होने वाले विकार के लिये चिकित्सक भारीभरकम उपचार बता देगा। न केवल शारीरिक और मानसिक दृष्टि से वरन आर्थिक दृष्टि से भी भारी रहेगा। इस कारण से जहाँ तक खींचा जा सकता है, चिकित्सक के यहाँ जाना टाला जाता है। कई बार ऐसे निर्णय, दीर्घसूत्रता या आलस्य हानिकारक हो जाता है। बिलासपुर में एक बार छोटी सी फुंसी को स्वतः ही ठीक होने देने की वीरता के अभिमान में पता ही नहीं चला कि कब उसमे संक्रमण हो गया, निष्कर्ष अत्यधिक पीड़ा और स्वयं के प्रमाद पर क्रोध।


इस घटनाक्रम में पीड़ा सहने के बाद भी कुछ दिनों का आलस्य हो गया। करोनाजनित असामान्य परिस्थितियों के कारण इस दीर्घसूत्रता को और बल मिला। जब कठोर चेतावनी मिली तब निढाल होकर चिकित्सक भाई से परामर्श लिया। समर्पण की इस स्थिति में मन स्वीकार कर लेता है कि जो भी बताया जायेगा, शब्दशः पालन किया जायेगा, चाहे जितने भी टेस्ट हो, चाहे जितनी भी औषधि हों। एक प्रवृत्ति जो कई वर्षों में दृढ़ होती गयी है कि ऐलोपैथिक औषधियाँ जितनी कम लेनी पड़ें उतना ही अच्छा। पता नहीं क्या कारण रहा पर वर्षों से प्राकृतिक विधि से शरीर प्रफुल्लित रहा और अधिक समस्यायें उत्पन्न नहीं की। एक स्वस्थ जीवनशैली रहे, व्यायाम और प्राणायाम किया जाये और भोजनादि में आयुर्वेद का सिद्धान्त पिरोया हो तो शरीर पुष्ट और मन सन्तुष्ट रहता है। पीड़ा के अतिरिक्त, वर्तमान परिस्थिति एक और विशेष कारण से सामान्य नहीं रही अतः समर्पण कर बैठे।


प्राकृतिक रूप से स्वतः स्वस्थ होने में एक तत्व जो सदा ही उपयोगी रहा है, वह है समुचित निद्रा। समुचित निद्रा हो जाये तो विकार क्षीण हो ही जाता है। छोटे मोटे कष्ट हों तो प्रथम अवसर मिलते ही सो जाते हैं, उठने के बाद या तो कष्ट चला जाता है या सहनीय हो जाता है। लघुविकार कालान्तर में बढ़कर बड़े न हो जायें, उसमें भी समुचित निद्रा संकेत के रूप में कार्य करती है। यदि आपको भरपूर निद्रा आ रही है तो शरीर स्वस्थ है। असहजता, तनाव, चिन्ता, विकार आदि रोगों के प्रथम लक्षण सबसे पहले निद्रा पर दुष्प्रभाव डालते हैं। समुचित निद्रा का मानक वह स्फूर्ति है जो उठने के बाद आती है, वह इस बात का द्योतक है कि शरीर के सब तन्त्र सुचारु रूप से चल रहे हैं। अधिक निद्रा आलस्य और कम निद्रा थकान लाती है। यदि समुचित व्यायाम, भोजन, चिन्तन और मानसिक प्रसन्नता नहीं होगी, समुचित नींद आना संभव ही नहीं है। यह सिद्धान्त मेरे लिये समग्रता से कार्य करता है।


बाँह की पीड़ा ने मेरे इस ब्रह्मास्त्र को मुझसे छीन लिया था। रात्रि में ७ घंटे के स्थान पर ४ घंटे से अधिक की नींद नहीं हो पा रही थी, वह भी कम से कम ३ भागों में। निद्रा की कमी को दिन में पूरा करने का प्रयास किया, पीड़ानिवारक जेल लगाकर निद्रा में कुछ मिनट बढ़ाये, सिकाई के लिये हीटिंगपैड लगाकर सोये, पर कोई विशेष लाभ नहीं हुआ और दो तीन दिन में ही शरीर अस्तव्यस्त होने लगा। जब पीड़ानिवारक औषधि लेकर सोने का प्रयास किया तो उठने पर भारी और मन्द अनुभव हुआ, लगा कि सुधार होने के स्थान पर कष्ट बढ़ता ही जा रहा है। 


निद्रा ही नहीं, अन्य कार्य भी बन्द हो गये। टहलना बन्द क्योंकि झूलती बाँह के साथ पीड़ा भी लहराती थी। सूर्यनमस्कार और तीरन्दाजी भी बन्द। यहाँ तक कि प्राणायाम भी इसलिये बन्द हो गया क्यांकि साँस लेने में फेफड़े फूलने से पीड़ा गहरा जाती थी। स्नान करते समय शरीर मलने में कष्ट, साबुन लगना बन्द, किसी तरह शावर का पानी शरीर में डालकर बाहर आ जाते थे। जो गतिविधियाँ जीवन में महत्व भी नहीं रखती थीं और स्वतः होती रहती थीं, वे सब भी करने में महत प्रयास करने पड़ रहे थे। सो पाने के लिये तकियों को बाँह पर पड़ने वाले दबाव को कम करने के प्रयास में व्यवस्थित सजाना पड़ता था। ऐसे ही एक दिन सजाते समय श्रीमतीजी बोलीं कि इतना तो राजा अपने सिंहासन भी नहीं सजाते हैं। उस दिन लगा कि थक हार कर बिस्तर पर निढाल गिरते ही नींद आने का सुख विश्व का सबसे बड़ा सुख है।


लेटने से अधिक बैठने में और बैठने से अधिक स्थिर खड़े रहने में सहज लग रहा था। मन जितना हो सकता था, अस्थिर था। कोई सार्थक कार्य करने योग्य मन की न तो सामर्थ्य थी और न इच्छा। पीड़ा से मन का ध्यान हटाने के लिये कुछ वेबसीरीज भी देखी पर अन्ततः पीड़ा ही प्रधान रही। कहीं पढ़ा था कि पीड़ा तो मानसिक होती है, मन में ही अनुभव होती है, यदि मन अभ्यास कर ले तो अनुभव नहीं होगी। प्रयास किया और अपनी मूढ़ता पर ढंग से हँसा भी। पीड़ा जैसा सत्य का प्रत्यक्ष कुछ भी नहीं होता है, पूर्ण ध्यास्थ हो मन वहीं लगा रहता है।


पाँच दिन की औषधि और संलग्न प्रताड़ना के बाद देव प्रसन्न हुये और पीड़ा तनिक सहनीय हुयी। प्राणायाम प्रारम्भ कर दिया है, प्रातः थोड़ा टहलना भी हो जाता है, सम्यक रूप से बिना करवटों से सो रहा हूँ, भोजन संतुलित ले रहा हूँ, नींद की मात्रा और गुणवत्ता बढ़ रही है, साथ में लेखन भी कर पा रहा हूँ। ईश्वर शीघ्र ही दिनचर्या के शेष अंगों को भी मुझसे जोड़ देंगे, यही प्रार्थना है।


पीड़ा के समय मन क्या संवाद करता है, क्या आर्त स्वर फूटते हैं, सुधार के क्या शपथ धरी जाती हैं, जानेगे पीड़ा के उच्चारण में, अगले ब्लाग में।