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7.10.21

राम का निर्णय (प्रस्तुत)

 

राम शान्त थे और संतुष्ट भी। सीता के आक्षेपपूर्ण शब्दों ने राम को आहत नहीं किया था वरन मन का यह विश्वास दृढ़ किया था कि वनगमन का निर्णय सीता का अपना होना चाहिये। निर्णय परिस्थितियों की दैन्यता पर आधारित नहीं वरन व्यक्तित्व की दृढ़ता पर केन्द्रित होना चाहिये। सीता की सामर्थ्य के बारे में राम को कभी कोई संशय नहीं रहा है। धरती से उत्पन्न कन्या को जब धरा से मातृत्व मिलता हो तो उसे आधारों की क्या कमी? शिवधनुष को कौतुकवश उठा लेने वाली शक्ति को भला कौन सा भय? आज के भीषण घटनाक्रम में, दैव की मदत्त उठापटक में, शोकाकुल वेदना में, कातरता के विलाप में और क्रोध भरे प्रश्नोत्तरों में यदि कोई राम को निष्प्रभ होने से रोक रहा था तो वह था प्रियतमा सीता का दृढ़ चरित्र। कृतज्ञ राम सीता के हृदयस्पंदों से बल पा रहे थे और चाह रहे थे कि वह क्षण, वह अनुभूति, वह विश्वास, वह आधार वहीं स्थिर रहे, कहीं विलग न हो। यह आलिङ्गन परस्पर आश्रयता का प्रतीक था। प्रकृति का पुरुष पर, पुरुष का प्रकृति पर।


गहरी श्वास भर कर, प्रिय सीता के कन्धों को दोनों हाथों से सम्हाले और उनके अश्रु पोंछते हुये राम बड़े ही सहज, स्नेहपूर्ण और सान्त्वना के स्वर में सीता से कहते हैं।


देवि, तुम्हें दुख देकर मैं स्वर्ग को भी नहीं लेना चाहूँगा क्योंकि तुम्हारे बिना मुझे स्वर्ग भी अच्छा नहीं लगेगा। मुझे किसी का भय नहीं है। मैं वन में तुम्हारी रक्षा करने में पूर्णतया सर्वसमर्थ हूँ। पर बिना तुम्हारा अभिप्राय जाने मैं तुम्हें वन जाने के लिये प्रेरित नहीं करना चाहता था। जब तुम मेरे साथ वन जाने को प्रस्तुत हो, मैं तुम्हें साथ चलने की अनुमति देता हूँ। तुम्हारा यह निर्णय धर्मानुकूल और कुल के गौरव को बढ़ाने वाला है। सुन्दरी, वनगमन की तैयारी करो। वनवास के अनुसार अपना धन रत्नादि ब्राह्मणों, भिक्षुओं और सेवकों को दान करने का प्रबन्ध करो। पति की अनुकूलता पर सीता प्रमुदित हो गयीं और उनकी आज्ञानुसार दानकर्म में प्रवृत्त हो गयीं।


लक्ष्मण सारा संवाद सुन रहे थे। हर शब्द, हर क्षण उनका मुख भिगो रहा था। सहसा भाई का विरह का भाव लक्ष्मण के लिये असहनीय हो गया। उन्होंने शीघ्रता से और जकड़कर राम के पैर पकड़ लिये और सीता सहित राम से कहा। आर्य, आप दोनों ने वन जाने का निश्चय कर लिया है तो मैं भी धनुष बाण लेकर आपके साथ वन चलूँगा। राम ने अयोध्या की व्यवस्थाओं और माता पिता के हित का विचार कर लक्ष्मण को मना कर दिया। अधीरता के स्वर में लक्ष्मण ने पुनः राम से कहा कि जब आप मुझे सदा साथ रहने की आज्ञा दे चुके हैं तो वन जाने से क्यों रोक रहे हैं। भरत अपने पिता और माताओं की समुचित सेवा करेंगे और यदि वह इससे विमुख होते हैं तो मैं यहाँ आकर उन्हें उनका कर्तव्य करने पर विवश कर दूँगा। मातायें भी समर्थ हैं उनको सहस्र गाँव मिले हुये हैं। उस पर से राजमहल की व्यवस्थायें भी सक्षम हैं। पर भैया आप माँ सीता के साथ वन में कैसे रहेंगे? आप जब विश्राम करेंगे तो आप दोनों की रक्षा कौन करेगा? पर्णकुटी और आवासीय व्यवस्थायें, भोजन का प्रबन्ध, यज्ञसामग्री का संग्रहण आदि कौन करेगा? 


राम एक क्षण विचार करते हैं और लक्ष्मण के प्रबल आग्रह को स्वीकार कर लेते हैं। ठीक है अनुज, अपनी माता और सुहृदों से इस बारे में अनुमति लेकर आ जाओ। साथ में सारे दिव्य आयुध, बाण, कवच, खड्ग और तरकस आदि गुरु वशिष्ठ के आवास से ले आओ। उसके बाद मेरे पास जो धन है, उसे वशिष्ठपुत्र सखा सुयज्ञ और अन्य ब्राह्मणों में दान करने में मेरा सहयोग करो। शीघ्रता करो, हमें आज ही वन के लिये प्रस्थान करना है।


सीता और लक्ष्मण राम द्वारा निर्देशित कार्यों को यथाशक्ति गति देने में लग जाते हैं। सखा सुयज्ञ और उनकी भार्या को राम और सीता अपने वस्त्राभूषण, पलंग, हाथी, गौ, रथ और धनादि देकर प्रसन्नचित्त विदा करते हैं। अगस्त्य, विश्वामित्र, मुनि त्रिजट और अन्य वैदिक परम्परा के ब्राह्मणों को उनके उपयोग की सामग्री, गौवें व अन्य धन देने का निर्देश लक्ष्मण को देते हैं। चित्ररथ सूत, अन्य परिचितों और व्यक्तिगत सेवकों को अपने उपयोग की सामग्री और चौदह वर्ष जीविका चलाने के लिये धन देकर यह सुनिश्चित करते हैं कि उनकी अनुपस्थिति में सेवकों को कोई असुविधा न हो। जिसकी भी आवश्यकता को जो स्मरण आया और सम्मुख जो भी दान करने योग्य वस्तु दिखायी दी या याद आयी, उसका समुचित निर्देश देकर राम ने वनगमन से पूर्व अपने भौतिक संग्रहण को न्यूनतम कर लिया, साथ ही सीता और लक्ष्मण को इसकी प्रेरणा भी दी। आयुधों का विधिपूर्वक पूजन व ससम्मान धारण कर तथा ऐश्वर्य के समस्त साधनों का दान कर राम भार्या सीता और अनुज लक्ष्मण के साथ पिता को सूचित करने माँ कैकेयी के महल की ओर पैदल चले।


तब तक राम के वनगमन की सूचना सारे नगर में प्रसारित हो चुकी थी। राम को नगर की वीथियों में चलता देख नगरवासियों का हृदय विदीर्ण हो उठा। जिसने भी सुना, सब दौड़े आये। जो राज्याभिषेक देखने के लिये पहले से उपस्थित थे, वे आश्चर्यवत विलाप कर रहे थे। नगरपथ पर अपार जनसमूह और अट्टालिकाओं पर कुलवधुओं को अश्रु में आर्द्र देखकर राम का मन विकल हो उठा। जिसको सदा ही सौन्दर्य और ऐश्वर्य के रूप में रथारूढ़ नगरवासियों ने देखा था उस सीता को पैदल ही अनुगामी बना देख नगरवासियों के दुख का बन्ध टूट गया। यह करुण दृश्य देखकर सबका मन व्याकुल और अस्तित्व शोकाकुल हो गया। जनसमूह में उठे स्वर सप्रयास न सुनते हुये और भूमि पर दृष्टि टिकाये अपना पथ देखते हुये राम अधिक गति से नहीं बढ़ पा रहे थे। आदरवश नगरवासी चलने का पथ दे रहे थे पर हाथ जोड़कर और सम्मुख लेटकर रुक जाने की प्रार्थना भी कर रहे थे। दिनभर का पूर्वप्रारुप बनाये राम को इस दृश्य की किञ्चित भी कल्पना नहीं थी।


जिस पिता के सत्य का मान रखने के लिये राम वन जा रहे हैं, वह पिता निश्चय ही पिशाच से ग्रसित हो अनुचित कार्य कर रहा है। पिता तो अपने गुणहीन पुत्र को भी घर से निकालने का साहस नहीं कर सकता। जिस पिता का राम जैसा गुणवान पुत्र वन जाये उस राजा द्वारा पालित अयोध्या रहने योग्य नहीं है। चलो हम सब भी राम के साथ ही वन जायेंगे। जहाँ राम जायेंगे वही नगर हो जायेगा और जिस अयोध्या को राम छोड़ेंगे, वह दुर्भाग्य से ग्रसित हो वन हो जायेगी। माँ कैकेयी की आलोचना, पिता दशरथ की कामप्रियता, इन आक्षेपों से अवलेहित नगरवासियों का संवाद राम को अशान्त कर रहा था। फिर भी बिना कोई विकार व्यक्त किये राम माँ कैकेयी के महल में प्रवेश करते हैं।


जनकोलाहल से राम के आने की आहट पाकर सुमन्त्र राम की प्रतीक्षा में अन्तःपुर के बाहर ही खड़े थे। सुमन्त्र के जीवन में भी यह क्षण अपार शोक लेकर आया। आज प्रातः से पूरे राजपरिवार को बिखरते देख रहे थे सुमन्त्र। उस पर राम को पैदल आता देखना, धैर्य की सारी सीमायें पार कर गया। शान्तस्वर में राम ने कहा “आप पिताजी को मेरे आगमन की सूचना दे दीजिये।” 


सुमन्त्र भारी हृदय से दशरथ के समक्ष जाते हैं और शोकनिमग्न राजा को राम के आगमन का समाचार सुनाते हैं। “हे पृथ्वीनाथ, आपके पुत्र राम अपना सारा धन ब्राह्मणों व आश्रित सेवकों में दान कर और समस्त सुहृदों से मिलकर वनगमन के पूर्व आपके दर्शन के लिये द्वार पर खड़े हैं।” दशरथ को लगा कि वह उस क्षण को सह पाने की क्षमता में नहीं हैं। राम वनगमन का निश्चय कर सम्बन्धित शेष प्रबन्ध व्यवस्थित कर चुके हैं। संभवतः यह उनकी विदाई का अवसर होगा। एक क्षण सोचकर उन्होंने सुमन्त्र को राम के पहले शेष रानियों को भी बुला लाने का निर्देश दिया।


कक्ष भरा था, मध्य में राजा, एक ओर माँ कैकेयी, दूसरी ओर माँ कौशल्या और माँ सुमित्रा, उनके पीछे राजपरिवार से सम्बन्धित समाज और कुलस्त्रियाँ। कुलगुरु वशिष्ठ और सुमन्त्र राजा से कुछ दूर खड़े थे। आर्त भाव से संघनित कक्ष में राम सीता और लक्ष्मण के साथ प्रवेश करते हैं।

5.10.21

राम का निर्णय (संबल)


यद्यपि सीता वन में निवास को सहज बता रही थी, राम का मन उसे स्वीकार नहीं कर पा रहा था। राम को लग रहा था कि देवी सीता को या तो उन कठिनाइयों का आभास नहीं है या उनका वनसम्बन्धी ज्ञान मात्र मौखिक ही है। फिर भी सीता हर प्रकार से राम को आश्वस्त करने का प्रयास कर रही थी।


मैं जैसे अपने पिता के घर निवास करती थी, वैसे ही वन में निवास कर लूँगी। पतिव्रतधर्म का पालन और आपकी सेवा का अवसर वन में रहने के पर्याप्त कारण हैं, मेरे लिये। हे वीर, आप सबकी रक्षा करने वाले हैं, तब मेरी रक्षा करना आपके लिये कौन सी बड़ी बात है? मुझे वन जाने से कोई रोक नहीं सकता है। मैं आपको कोई कष्ट नहीं दूँगी और आपकी जीवनचर्या में रम जाऊँगी। मैं स्वयं ही सुन्दर वनों, सरोवरों, पर्वतों और पक्षियों को आपके साथ देखना चाहती हूँ। इस प्रकार सहस्रों वर्षों तक आपके साथ रहना मुझे स्वर्गादि से अधिक प्रिय है, पर आपसे वियोग में मेरी मृत्यु निश्चित है।


सीता के वचनों में दृढ़ता थी, नयनों में अश्रु और स्वर में साथ ले चलने की याचना। राम सीता की दृढ़ता को कम नहीं आँकना चाहते थे पर मात्र सौन्दर्य पक्ष के विवरण से वनों की भीषणता कम नहीं हो जाती है। राम को आवश्यक लगा कि वनों के कष्टों का सही चित्रण सीता के समक्ष कहा जाये।


सीते, आप अत्यन्त उत्तम कुल में उत्पन्न हुयी हो। मेरे मन को संतोष होगा यदि आप यहीं रह कर धर्म का पालन करोगी। यह आपके हित में है और आपका कर्तव्य भी है। वन दुर्गम हैं और हर प्रकार के कष्टों से भरे भी हैं, वे सदा सुख नहीं देते। सिंहों की गर्जना, गजों का मदत्त हो विचरना, हिंसक पशुओं द्वारा अकारण आक्रमण कर देना, नदियों में ग्राहों का निवास और पार करने में कठिनाई, काँटो से भरे बीहड़ मार्ग, पत्तों के बिछौनों पर शयन, जल की कमी, आँधी पानी में आश्रयहीनता, फलाहार पर ही संतोष, विषाक्त कीट पतंग और न जाने कितनी अघोषित अनिश्चिततायें। हे सीते, वन में दुख ही दुख है।


राम के वचनों से सीता के आँखों में अश्रु डबडबा आये और मन दुखी हो चला। सीता को यह तथ्य भी ज्ञात थे पर आज इन तथ्यों को इतना महत्व देना अनावश्यक था। दुखी पर निश्चयात्मक स्वर में सीता धीरे धीरे बोलती हैं।


हे वीर राम, आपने जो वन के बारे में दोष बताये हैं वे सब आपका स्नेह पाकर मेरे लिये गुणरूप हो जायेंगे। आपसे तो सभी डरते हैं तो ये सब पशु आपको देखकर ही भाग जायेंगे। वन्यजीव तो क्या, आपके सानिध्य में तो स्वयं इन्द्र भी मेरा तिरस्कार नहीं कर सकते। किन्तु आपके वियोग में मेरे प्राण जाना निश्चित हैं क्योंकि आपने ही बताया है कि पतिव्रता स्त्री पति के वियोग में जीवित नहीं रह सकती। वन जाने के लिये मैं स्वयं को बाल्यकाल से ही तैयार कर रही हूँ क्योंकि कई मूर्धन्य ऋषियों से मैंने यह सत्य सुना है। पिता के साथ हुयी चर्चा में उन्होंने उद्घाटित किया था कि मेरे भाग्य में वन जाने का योग है। इसी कारण आज से पहले मैंने आपसे कई बार वनविहार के लिये प्रार्थना भी की थी जो आपने स्वीकार भी की थी, तो आज यह बाध्यता क्यों?


प्रार्थना, तर्क, अश्रु, धर्म, ओज आदि आग्रहों से राम को अप्रभावित देखकर सीता और भी दुखी हो चलीं। राम उनको बार बार समझा रहे थे पर सीता का मन बिछोह के भाव से व्याकुल हो चला था। उससे भी अधिक उनको राम की चिन्ता थी। वन के एकान्त में और क्षात्रकर्म से वंचित राम नैराश्य के किस समुन्दर समा जायेंगे। राम मूलतः सात्विक प्रकृति के थे। एकान्त, ऋषियों का संग, आगत की अनिश्चितता, भोजन का व्यतिक्रम, आवासीय व्यवस्थाओं का श्रम, राम का मन हर प्रकार उलझ जायेगा। इस स्थिति में चौदह वर्ष रहने के बाद राम क्या से क्या हो जायेंगे? राम को निश्चय ही व्यवस्थाओं का आधारतन्त्र आवश्यक होगा। पत्नी से अधिक व्यवस्थित आधार भला पति को कौन दे सकता है। प्रिय राम की संभावित स्थिति की कल्पना कर सीता का विरही मन और भी व्याकुल हो चला। मेरे राम को वन में कौन सम्हालेगा? जो कठिनाई मुझे लक्ष्य कर बतलायी जा रही हैं, वे सब राम पर भी तो प्रयुक्त होती हैं। माना मेरे राम उनका निर्वहन कर सकेंगे पर अन्ततः उसी में उलझ कर रह जायेंगे।


राम मेरे जिस योगक्षेम के लिये वन नहीं ले जाना चाह रहे हैं, उनके योगक्षेम का ध्यान वन में कौन रखेगा? न वानप्रस्थ सा जीवन बिताने में सक्षम हैं प्रिय राम और न ही ऋषियों सा। तब राम को वन में किसका साथ मिलेगा? एक युवा हाथ में धनुषबाण लिये वन वन भटकेगा, यह दृश्य तो विचित्र सा ही होगा? सीता की व्याकुलता द्विगुणित हो जाती है। अपनी तनिक भी चिन्ता न करते हुये और सबकी सुविधा के हित तर्क प्रस्तुत करते हुये राम जो सहनशीलता का उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं, वह अब सीता को अनुचित लगने लगा। राम का संबल सीता है, राम का संबल लक्ष्मण हैं। क्या लक्ष्मण भी साथ नहीं जा रहे हैं, सीता को सहसा याद आया। जिस निराशा और शोक में लक्ष्मण खड़े हैं, लगता है कि इस सम्बन्ध में बात अभी तक हुयी नहीं है।


सीता पर्याप्त प्रार्थना कर चुकी थी, राम मान नहीं रहे थे। राम व्यहारिकता के परिप्रेक्ष्य में अपना हित नहीं सोच रहे थे केवल धर्म पर अपना कर्म निश्चित कर रहे थे। वनगमन की अकारण शीघ्रता में अपनी निर्णय प्रक्रिया को सरलतम करने के प्रयास में राम के निर्णय दोषपूर्ण थे। सीता यह नहीं होने देगी। वह राम की अर्धांगिनी है, उनका भी राम पर समानता का अधिकार है। सीता ने निश्चय किया कि उन्हें भी अपना मन कठोर करना होगा और जिस सत्य को राम सुनना नहीं चाहते हैं, उसे भी व्यक्त करना होगा। सीता पर इस समय तर्क नहीं करना चाहती थी वरन पत्नी के रूप में अपने अधिकार को सरोष व्यक्त करना चाहती थी। सीता व्यंगपूर्ण पर कठोर स्वर में बोलीं। सीता राम पर वनगमन की व्याकुलता में अपना धर्म न निभाने का आक्षेप लगाने जा रही थी।


हे नाथ, पता नहीं विवाह करते समय मेरे पिता को यह ज्ञात था कि नहीं कि जिस पुरुषविग्रह से वह मेरा विवाह कर रहे हैं, वह हृदय से स्त्री है। सीता का यह वाक्य पूरे कक्ष को स्तब्ध कर गया। जो साहस, जो स्पष्टवादिता न कैकेयी में थी और न ही कौशल्या में, वह सीता के मुख से सुनकर लक्ष्मण अचम्भित थे। उनका क्रोध सबको निगलने में सक्षम था पर जहाँ बात राम पर आती थी वहाँ वह निःशब्द हो जाते थे। यह वाक्य मात्र पत्नी के अधिकारक्षेत्र से ही निकल सकता था। राम अब तक सीता को हितपूर्वक अधिकारमना हो उपदेश दे रहे थे। इस वाक्य ने वह बन्धन सहसा तोड़ दिये। राम को केवल इस वाक्य से ही सीता का निश्चय समझ आ गया था। राम भी मन में एक निश्चय कर चुके थे पर वह सीता को सुनना चाहते थे। राम सीता को अपने पति पर पूर्ण अधिकार व्यक्त करने का समय देना चाहते थे। वह चाहते थे कि यदि सीता चलें तो वह उनका अपना निर्णय हो, न कि पति द्वारा आदेशित या आरोपित निर्णय। सीता के आक्षेप ने राम की किंकर्तव्यविमूढ़ता की मनःस्थिति सहसा भंग कर दी थी।


आपके इस तरह छोड़कर जाने में सब यही कहेंगे कि सूर्यवंशी राम में पराक्रम का अभाव है। यह सुनना मेरे लिये अपार दुःख का कारण होगा। ऐसा क्या विषाद या भय है आपको कि केवल आप पर ही आश्रय रखने वाली सीता का परित्याग करना चाहते हैं। जिस प्रकार सावित्री सत्यवान की अनुगामिनी थी मैं भी आपके पीछे वैसे ही चलूँगी। मैं आप पर निर्भर हूँ और आप द्वारा अर्जित आहार पर ही जीवन निर्वाह करूँगी। जिस भरत के कारण आपको वन जाना पड़ रहा है, उसकी राजाज्ञों के पालन का कर्तव्य आप निभाइये, मुझे विवश मत कीजिये। आप तपस्या कीजिये, वन में रहिये या स्वर्ग में, सभी जगह मैं आपके साथ रहना चाहती हूँ। आपके साथ वन की कठिन जीवनशैली मुझे स्वीकार है पर आपके बिना मुझे स्वर्ग भी स्वीकार नहीं हैं। आपका विरह मैं दो घड़ी के लिये सहन नहीं कर सकती, चौदह वर्ष को सहन करने का प्रश्न ही नहीं है। यदि आप फिर भी नहीं माने तो मैं विष पीकर प्राण त्याग दूँगी।


सीता का शोक मुखर हो बह रहा था, अश्रु अब तक बँधे थे। जब सीता के शब्द रुके, अश्रुओं ने संवाद प्रारम्भ कर दिया। अपनी पूरी शक्ति से पति से लिपटकर, करुणाजनित विलाप करती हुयी सीता शिथिल हो गयी थी। अपने आश्रय पर आधार ले स्वयं को व्यक्त कर चुकी सीता ने निर्णय पति पर छोड़ दिया था। राम के कंधे पर गिर रहे सीता अश्रुओं ने पूरे वातावरण को आर्द्र कर दिया था। अश्रु संवाद की अधिकारपूर्ण पराकाष्ठा हैं। जिस पर गिरते हैं, उसको ही द्रवित कर जाते हैं। राम का हृदय जिस अकस्मात शोक ने वज्रवत कर दिया था, सीता के अश्रुओं ने उसे पुनर्जीवित हो संवेदनापूर्ण कर दिया था।


राम सीता को दोनों हाथों से सम्हालते हैं और हृदय से लगा लेते हैं। राम अपना निर्णय परिवर्धित कर चुके थे।

30.9.21

राम का निर्णय (सीता)


लक्ष्मण आगे कुछ नहीं कहते हैं, तर्क का उद्देश्य निर्णय के सभी विकल्पों के पक्षों को सामने लाना था। सब जानकर और सब सुनकर राम ने अपना निर्णय नहीं बदला था। लक्ष्मण निर्णय का मान करते हैं। लक्ष्मण का क्रोध तो शान्त हो गया था पर शोक स्वाभाविक था। मन क्षुब्ध था पर राम का निर्णय अब उनका भी था।


राम माँ कौशल्या के पास जाकर उन्हें पुनः सान्त्वना देते हैं और वन जाने की अनुमति माँगते हैं। अपने राम के लिये माँ अपने शोक से सयत्न बाहर आती है और भारी मन से वनगमन की अनुमति देती है। जो सामग्री अभिषेक के लिये रखी थी, उसी को उपयोग में लाकर विधिपूर्वक स्वस्तिवाचन कर्म करती है।


माँ का स्वर तनिक रुद्ध है पर मन्त्रों का गाम्भीर्य वातावरण को स्थिर करने लगता है। अन्तरिक्ष, पृथिवी, जल, औषधि, वनस्पति, दिशा, काल, देव, ब्रह्मा, सबको आह्वान करता शान्ति पाठ कौशल्या के मन को निश्चिन्त नहीं कर पा रहा था। पुत्र के कल्याण की जो कामना वनगमन से रोक रही थी अब वही कामना सभी देवों से प्रार्थना कर रही थी कि राम जहाँ जायें, सब देव उनकी रक्षा करें। वन से, वृक्ष से, वन्य जीवों से, नदियों से, सबसे अपने राम की रक्षा के मन्त्र उच्चार रही थी माता। सबसे आह्वान कर चुकने के बाद माता पुत्र को निहारने लगती है। आँसू झर झर बह रहे हैं। स्वस्तिकर्म का समापन पुत्र की परिक्रमा कर समाप्त करती है माँ। पुत्र के चारों ओर अपनी शक्ति का घेरा स्थापित करती है माँ। अन्ततः हृदय से लगा लेती है अपने राम को। एक क्षण रुकते हैं राम, माँ की आज्ञा पाने की अनुकूलता है और माँ की पीड़ा का शोक भी, दोनों का अनुभव होता है राम को। राम झुककर प्रणाम करते हैं, बार बार माँ के चरणों का स्पर्श करते हैं और लक्ष्मण के साथ महल के बाहर निकल जाते हैं।


मार्ग के प्रतीक्षा कर रहे जनसमुदाय की मनःस्थिति भ्रमित थी। राम वन जा रहे हैं, यह कुछ को ज्ञात था, कईयों को यह तथ्य ज्ञान नहीं था, कुछ को ज्ञात हो रहा था, यह दुखद समाचार नगरवासियों में फैल रहा था। राम के मुख की शान्ति यथावत थी, वह चाह कर भी प्रसन्नमना हो अभिवादन स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। एक तो वनगमन की शीघ्रता, पिता दशरथ और माँ कौशल्या के शोकसंतप्त चेहरे की छवि, लक्ष्मण का क्रोध और सीता की संभावित स्थिति और अनिश्चितता, इन सबके तात्कालिक प्रभाव से राम अपनी सर्वप्रियता के अभिवादन का यथायोग्य उत्तर नहीं दे पा रहे थे। साथ ही माँ कैकेयी के महल से निकलते ही उन्होंने युवराज पद मानसिक रूप से त्याग दिया था अतः जनसमुदाय के उस रूप में किये गये उल्लास पर सप्रयास ध्यान नहीं दे रहे थे। यथासंभव स्वयं को संयतकर प्रजा के बीच से निकलते हुये राम सीता के महल पहुँचते हैं।


सीता को राम के वनगमन प्रकरण का समाचार ज्ञात नहीं था। वह सकल सामयिक कर्तव्यों का पालनकर, सारे देवताओं की अर्चना कर प्रसन्नचित्त मन से अपने प्रिय राम की प्रतीक्षा कर रही थीं। अन्तःपुर में पहले से उपस्थित जनसमुदाय की दृष्टि से स्वयं को छिपाते हुये राम महल में प्रवेश करते हैं, उस समय लज्जा से उनका मुख झुका हुआ था। राम की यह छवि सीता के हृदय में कम्प उत्पन्न कर देती है। वह सहसा खड़ी हो जाती हैं और चिन्ता से इस प्रकार व्याकुल अपने पति को निहारने लगती हैं।


राम सीता के सम्मुख पहुँचने पर अपना मानसिक वेग रोक नहीं पाते हैं और उनका शोक सकल अंगों से प्रकट हो जाता है। सीता पति की दशा समझ जाती है। राम के मुखमण्डल पर सतत दमकती कान्ति को अनुपस्थित पा सीता अनर्थ की आशंका से अश्रु-प्लावित हो जाती है। शुभ लक्षणों की अनुपस्थिति को इंगित करते हुये अपने प्रिय राम से इसका कारण पूछती है। मन के भावों और वेगों को बिना छिपाये राम व्यग्र हो सीता को बताते हैं। सीते, आज पिताजी मुझे वन भेज रहे हैं। राम सीता को प्रातः से घट रहे प्रकरण की पृष्ठभूमि बताते हैं। पिता की प्रतिज्ञा के पालन हेतु वनगमन के औचित्य पर चर्चा न करते हुये सीता को इस कालखण्ड हेतु आवश्यक मंत्रणा देना प्रारम्भ करते हैं।


जहाँ राम सारे कथन यह मानकर कर रहे थे कि वह स्वयं ही वन जा रहे हैं, वहीं सीता शोक और आश्चर्य से राम को देखे जा रही थी। किस विषय की शीघ्रता है कि बिना कुछ बात किये इस कालखण्ड में सीता के क्या कर्तव्य उचित होंगे, क्या नहीं, राम कहे ही जा रहे हैं। सीते धैर्य धारण करना, सीते भरत को राजा का मान देना, भरत के समक्ष मेरी प्रशंसा मत करना, माँ कौशल्या और पिताजी की सेवा करना, किसी को कोई मानसिक कष्ट मत देना, धर्म का आचरण करना।


सीता हतप्रभ थी और पति की व्याकुलता पर आर्द्र भी। पति की दशा पर मन में शोक था और उनके स्वयं ही सब निर्णय लिये जाने पर क्रोध भी। पति ने वनगमन का निर्णय पिता की प्रतिज्ञा के पालन हेतु ले लिया। वह उनका अधिकार क्षेत्र था और परिस्थितियाँ देखते हुये इतना समय भी नहीं था कि निर्णय प्रक्रिया में पत्नी को सम्मिलित किया जाता। पर राम अब स्वयं ही जाने का प्रलाप किये जा रहे हैं, यह अधिकार उन्हें किसने दिया? माना, पति के रूप में पत्नी का योगक्षेम उनके हाथों में है और उस संदर्भ में उपदेश उचित भी हैं। पर अकेले ही वन जाने का निर्णय सीता को स्वीकार नहीं है। सीता राम के प्रवाह को रोकती नहीं है अपितु उस समय को अपने संवाद व्यवस्थित करने में लगाती है। राम अपनी बात समाप्त करते हैं तब सीता तात्कालिक शोक भुला कर स्पष्ट कुपित स्वरों में राम से कहती है। 


हे नरश्रेष्ठ, आप मुझे अत्यन्त लघु या ओछा समझ कर किस प्रकार बात कर रहे हैं? आपकी यह बातें सुनकर मुझे हँसी आ रही है। आप जो कह रहे हैं, वह धर्म के जानने वालों के योग्य नहीं है और न ही आप जैसे राजकुमार के योग्य है। आर्यपुत्र, सभी सम्बन्धी, माता, पिता, भाई, पुत्र आदि जीवन में अपने अपने भाग्य के अनुसार जीवन निर्वाह करते हैं। केवल पत्नी ही अपने पति के भाग्य का अनुसरण करती है। केवल इसी कारणमात्र से मुझे आपके साथ वन जाने की अनुमति प्राप्त हो जाती है। यदि आप वन में प्रस्थान करने का निर्णय कर चुके हैं तो मैं कुश और काँटों को कुचलती आपके आगे आगे चलूँगी। यदि आपको मेरे इस निर्णय से ईर्ष्या हो कि कैसे एक स्त्री वन जाने का साहस कर रही है या आपको रोष हो कि कैसे मेरी पत्नी मेरी आज्ञा का पालन नहीं कर रही है तो इन दोनों ही भावों को अपने मन से दूर कर दीजिये और जिस प्रकार पीने से बचा शेष जल भी यात्रा में साथ रखा जाता है, मुझे भी अपने साथ ले चलिये। मैंने कोई भी ऐसा पाप या अपराध नहीं किया है कि आप मुझे यहाँ त्याग दें।


मेरे लिये जीवन की सभी सुख सुविधायें तभी तक कुछ मूल्य रखती है जब आप उनमें सम्मिलित हों। किस सम्बन्धी से मुझे किस प्रकार का व्यवहार करना है, इस विषय ने मेरे माता पिता ने मुझे हर प्रकार से शिक्षा दी है, इस विषय में इस समय मुझे आपके उपदेश की आवश्यकता नहीं है। मैं आपके साथ वन अवश्य चलूँगी।


राम का शोक सहसा वाष्पित हो चला था। मन के द्रवित भाव पत्नी सीता के स्पष्ट और सपाट कथन सुनकर स्थिर हो गये थे। माँ कैकेयी के कुटिल वचन, दशरथ का मौन, माँ कौशल्या की दैन्यता और लक्ष्मण का क्रोध, उन सबके भावों से दग्ध होने के बाद सीता के ये वचन उद्विग्नता को सहसा विश्राम दे देते हैं। पत्नी की प्रेमपूरित रूप की परिकल्पना की परिधि में यह गुणश्रेष्ठता संभवतः छिपी रह जाती। सीता ने एक बार भी किसी पर प्रश्न नहीं उठाया, एक बार भी रुकने के लिये नहीं कहा और एक बार भी इस बारे में आशंका व्यक्त नहीं की। साथ ही जब सीता को अपने न जाने की बात पता लगी तो जिस तीक्ष्णता और तीव्रता से उसका विरोध किया, वह देखकर राम के मन में सीता के लिये गर्व की अनुभूति हो आयी।


गर्वानुभूति के वह क्षण वनजीवन की कठिनाइयों से पुनः विचलित हो उठे। सीता अपना मन्तव्य स्पष्ट कर चुकी थी।