जब कार्य के घंटे बहुत अधिक हो जाते हैं और आपके साथ लगे कर्मचारियों और सहयोगियों के चेहरे पर थकान झलकने लगती है, तो मुखिया के रूप में आपका एक कार्य और बढ़ जाता है, कार्य का प्रवाह बनाये रखने का कार्य। यद्यपि उत्साह बढ़ाने से कार्य की गति बढ़ती है और बनी भी रहती है, पर बार बार उत्साह बढ़ाते रहने से उत्साह भी थकने लगता है, ऊर्जा भी समझने लगती है कि अब क्षमतायें खींची जा रही हैं।
वरिष्ठों से सीखा है कि अधिक समय तक जुटे रहना है तो वातावरण को हल्का बनाये रखिये। कार्य के समय निर्णयों का निर्मम क्रियान्वयन, पर उसके बाद सबके प्रयासों का सही अवमूल्यन और सबकी समुचित सराहना। भीड़ का बढ़ना दोपहर से प्रारम्भ होता था और मध्य रात्रि के दो घंटे बाद तक ही कार्य समाप्त होता था, उस दिन के अन्तिम यात्री को विशेष गाड़ी में बैठा कर भेजने तक। चौदह घंटों तक स्टेशन पर बने रहने, वहीं पर भोजन करने और अनुभव को बाटने का क्रम तीन दिन तक चला। थकान आपके शरीर में अपना स्थान खोजने लगती है, मन को संकेत भेजती है कि अब बहुत हुआ, विश्राम का समय है। उस समय थका तो जा सकता था पर रुकना संभव नहीं था। हर थोड़े समय में परिस्थितियाँ बदल रही थीं, मन और मस्तिष्क चैतन्य बनाये रखना आवश्यक था।
पलायन के नीरव वातावरण में कोई ऐसा विषय नहीं था जो मन को थोड़ी स्फूर्ति देता। मीडिया के बन्धुओं को दूर से देख रहा था, सब के सब कैमरे में घूरते हुये भारी भारी शब्दों और भावों में डूबे पलायन के विषय को स्पष्ट कर रहे थे, सबको वर्तमान स्थिति सर्वप्रथम पहुँचाने की शीघ्रता थी, अधैर्य भी था। यात्रियों के चेहरों पर प्रतीक्षा और अनिश्चितता के भाव थे, रेलवे के बारम्बार बजाये जा रहे आश्वासन भी उन्हें सहज नहीं कर पा रहे थे। सुरक्षाकर्मी सजग थे और यात्रियों को उनके गंतव्य तक सकुशल पहुँचाने के भरसक प्रयास में लगे हुये थे, उनके लिये आपस का समन्वय ही किसी अप्रिय घटना न होने देने की प्राथमिक आवश्यकता थी। विशिष्ट कक्ष में उपस्थित मंत्रीगण व उच्च अधिकारीगण या तो परामर्श में व्यस्त थे या मोबाइल से अद्यतन सूचनायें भेजने में लगे थे। किसी को किसी से बात तक करने का समय नहीं मिल रहा था।
एक तो शारीरिक थकान, ऊपर से वातावरण में व्याप्त व्यस्तता और नीरवता, एक स्थान पर खड़ा रहना कठिन होने लगा। साथ ही साथ यह भी लगने लगा कि अन्य कर्मचारियों की भी यही स्थिति होगी। दूसरा दिन था, चार नियत गाड़ियों में से दो विशेष गाड़ी जा चुकी थीं, तीसरी जाने में दो घंटे का समय था, रात्रि का भोजन सम्मिलित स्टेशन पर ही हुआ था। प्लेटफार्म पर सभी लोग शान्त बैठे प्रतीक्षा कर रहे थे, स्थिति नियन्त्रण में लग रही थी। एक साथी अधिकारी साथ में थे, मन बनाया गया कि स्टेशन पर ही अन्य कार्यस्थलों तक घूम कर आते है और कार्यरत कर्मचारियों का उत्साह बढ़ाते हैं। किसी भी बड़े स्टेशन के दो छोरों के बीच की दूरी एक किलोमीटर से कम नहीं होती है, दोनों छोर जाकर वापस आने में दो किलोमीटर का टहलना हो जाता है।
साथी अधिकारी स्थानीय थे, यहाँ कई वर्षों से भी थे, उन्हें बंगलोर के बारे में अधिक पता था। चलते चलते बात प्रारम्भ हुयी, मेरा मत था कि यह पलायन होने के बाद बंगलोर अब पहले सा नहीं रह पायेगा, बहुत कुछ बदल जायेगा। पता नहीं जो लोग गये हैं, उनमें से कितने वापस आयेंगे? बंगलोर की जो छवि सबको समाहित करने की है, उसकी कितनी क्षति हुयी है? यदि पूर्वोत्तर से कुछ लोग वापस आ भी जायेंगे तो वो पहले जैसे उन्मुक्त नहीं रह पायेंगे। जीविकोपार्जन के लिये बंगलोर आने का उत्साह अब पूर्वोत्तर के लोगों में उतना नहीं रह पायेगा जितना अभी तक बना हुआ था? इसी तरह के ढेरों प्रश्न मन में घुमड़ रहे थे, जो अपना उत्तर चाहते थे। समय था और साथी अधिकारी के पास अनुभव भी, उन्होंने विषय को यथासंभव और बिन्दुवार समझाने का प्रयास किया और अपने प्रयास में सफल भी रहे।
उनके ही माध्यम से पता लगा था कि पूर्वोत्तर के लोग यहाँ पर किन व्यवसायों से जुड़े हैं। अन्य व्यवसायों में ब्यूटी पार्लर का ही व्यवसाय ऐसा था जिसमें उनका प्रतिशत बहुत अधिक है। उनके चले जाने से इस पर गहरा प्रभाव पड़ेगा और संभव है कि बंगलोर की सौन्दर्यप्रियता में ग्रहण लग जाये। न चाहते हुये भी विषय बड़ा ही रोचक हो चुका था क्योंकि यह हम सबको को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित करने वाला था। प्रत्यक्ष रूप से इसलिये क्योंकि यहाँ की आधी जनसंख्या यदि अपनी सौन्दर्य आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पायेगी तो यहाँ के फूलों से प्रतियोगिता कौन करेगा भला? यदि ब्यूटी पार्लर नहीं खुले तो विवाह आदि उत्सवों में महिलाओं की उपस्थिति बहुत कम हो जायेगी। मॉल इत्यादि में उतनी चहल पहल और रौनक नहीं रहेगी जो बहुधा अपेक्षित रहती है।
शेष आधी जनसंख्या पर इसका परोक्ष प्रभाव यह पड़ने वाला था। यदि सौन्दर्य समुचित अभिव्यक्त नहीं हो पाता है तो उसका कुप्रभाव घर वालों को झेलना पड़ता है। आधी जनसंख्या सुन्दर नहीं लगेगी तो उनका मन नहीं लगेगा, मन नहीं लगा तो घर के काम और भोजन आदि बनाने से ध्यान बटेगा। पारिवारिक अव्यवस्था के निष्कर्ष बड़ा दुख देते हैं। पारिवारिक सत्यं और शिवं बिना सुन्दरं के असंभव हैं। विडम्बना ही थी कि यहाँ के सौन्दर्य के पोषक और रक्षक यहाँ से पलायन कर रहे थे और यहाँ की जनसंख्या को आने वाली पीड़ा का भान नहीं था।
जब तक इस विषय पर चर्चा समाप्त हुयी हम सबसे मिलते हुये वापस अपने स्थान पर आ चुके थे। अगली ट्रेन स्टेशन पर आने ही वाली थी। ज्ञानचक्षु खुलने के बाद लगने लगा कि यह केवल पूर्वोत्तर के लोगों की पीड़ा ही नहीं है, वरन सारे बंगलोरवासियों की पीड़ा है। ब्यूटीपार्लर के व्यवसाय से जुड़े लोगों से हमारी यही करबद्ध प्रार्थना है कि भले ही शेष लोग थोड़ा समय लेकर आये, आप लोग शीघ्र ही वापस आ जाईयेगा, पूरी संख्या में। आपके नहीं आने तक यहाँ का सामाजिक शास्त्र बड़ा ही असंतुलित रहने वाला है, बड़ा जटिल रहने वाला है।
बंगलोर का सौन्दर्य छिना जा रहा है और बिना पूर्वोत्तर के लोगों के वापस आये उसे पुनर्स्थापित करना असंभव है।
(कल ही पता चला है कि लोग वापस आने लगे हैं, आस बँधी है, बंगलोर का सौन्दर्य बना रहेगा।)
वरिष्ठों से सीखा है कि अधिक समय तक जुटे रहना है तो वातावरण को हल्का बनाये रखिये। कार्य के समय निर्णयों का निर्मम क्रियान्वयन, पर उसके बाद सबके प्रयासों का सही अवमूल्यन और सबकी समुचित सराहना। भीड़ का बढ़ना दोपहर से प्रारम्भ होता था और मध्य रात्रि के दो घंटे बाद तक ही कार्य समाप्त होता था, उस दिन के अन्तिम यात्री को विशेष गाड़ी में बैठा कर भेजने तक। चौदह घंटों तक स्टेशन पर बने रहने, वहीं पर भोजन करने और अनुभव को बाटने का क्रम तीन दिन तक चला। थकान आपके शरीर में अपना स्थान खोजने लगती है, मन को संकेत भेजती है कि अब बहुत हुआ, विश्राम का समय है। उस समय थका तो जा सकता था पर रुकना संभव नहीं था। हर थोड़े समय में परिस्थितियाँ बदल रही थीं, मन और मस्तिष्क चैतन्य बनाये रखना आवश्यक था।
पलायन के नीरव वातावरण में कोई ऐसा विषय नहीं था जो मन को थोड़ी स्फूर्ति देता। मीडिया के बन्धुओं को दूर से देख रहा था, सब के सब कैमरे में घूरते हुये भारी भारी शब्दों और भावों में डूबे पलायन के विषय को स्पष्ट कर रहे थे, सबको वर्तमान स्थिति सर्वप्रथम पहुँचाने की शीघ्रता थी, अधैर्य भी था। यात्रियों के चेहरों पर प्रतीक्षा और अनिश्चितता के भाव थे, रेलवे के बारम्बार बजाये जा रहे आश्वासन भी उन्हें सहज नहीं कर पा रहे थे। सुरक्षाकर्मी सजग थे और यात्रियों को उनके गंतव्य तक सकुशल पहुँचाने के भरसक प्रयास में लगे हुये थे, उनके लिये आपस का समन्वय ही किसी अप्रिय घटना न होने देने की प्राथमिक आवश्यकता थी। विशिष्ट कक्ष में उपस्थित मंत्रीगण व उच्च अधिकारीगण या तो परामर्श में व्यस्त थे या मोबाइल से अद्यतन सूचनायें भेजने में लगे थे। किसी को किसी से बात तक करने का समय नहीं मिल रहा था।
एक तो शारीरिक थकान, ऊपर से वातावरण में व्याप्त व्यस्तता और नीरवता, एक स्थान पर खड़ा रहना कठिन होने लगा। साथ ही साथ यह भी लगने लगा कि अन्य कर्मचारियों की भी यही स्थिति होगी। दूसरा दिन था, चार नियत गाड़ियों में से दो विशेष गाड़ी जा चुकी थीं, तीसरी जाने में दो घंटे का समय था, रात्रि का भोजन सम्मिलित स्टेशन पर ही हुआ था। प्लेटफार्म पर सभी लोग शान्त बैठे प्रतीक्षा कर रहे थे, स्थिति नियन्त्रण में लग रही थी। एक साथी अधिकारी साथ में थे, मन बनाया गया कि स्टेशन पर ही अन्य कार्यस्थलों तक घूम कर आते है और कार्यरत कर्मचारियों का उत्साह बढ़ाते हैं। किसी भी बड़े स्टेशन के दो छोरों के बीच की दूरी एक किलोमीटर से कम नहीं होती है, दोनों छोर जाकर वापस आने में दो किलोमीटर का टहलना हो जाता है।
साथी अधिकारी स्थानीय थे, यहाँ कई वर्षों से भी थे, उन्हें बंगलोर के बारे में अधिक पता था। चलते चलते बात प्रारम्भ हुयी, मेरा मत था कि यह पलायन होने के बाद बंगलोर अब पहले सा नहीं रह पायेगा, बहुत कुछ बदल जायेगा। पता नहीं जो लोग गये हैं, उनमें से कितने वापस आयेंगे? बंगलोर की जो छवि सबको समाहित करने की है, उसकी कितनी क्षति हुयी है? यदि पूर्वोत्तर से कुछ लोग वापस आ भी जायेंगे तो वो पहले जैसे उन्मुक्त नहीं रह पायेंगे। जीविकोपार्जन के लिये बंगलोर आने का उत्साह अब पूर्वोत्तर के लोगों में उतना नहीं रह पायेगा जितना अभी तक बना हुआ था? इसी तरह के ढेरों प्रश्न मन में घुमड़ रहे थे, जो अपना उत्तर चाहते थे। समय था और साथी अधिकारी के पास अनुभव भी, उन्होंने विषय को यथासंभव और बिन्दुवार समझाने का प्रयास किया और अपने प्रयास में सफल भी रहे।
शेष आधी जनसंख्या पर इसका परोक्ष प्रभाव यह पड़ने वाला था। यदि सौन्दर्य समुचित अभिव्यक्त नहीं हो पाता है तो उसका कुप्रभाव घर वालों को झेलना पड़ता है। आधी जनसंख्या सुन्दर नहीं लगेगी तो उनका मन नहीं लगेगा, मन नहीं लगा तो घर के काम और भोजन आदि बनाने से ध्यान बटेगा। पारिवारिक अव्यवस्था के निष्कर्ष बड़ा दुख देते हैं। पारिवारिक सत्यं और शिवं बिना सुन्दरं के असंभव हैं। विडम्बना ही थी कि यहाँ के सौन्दर्य के पोषक और रक्षक यहाँ से पलायन कर रहे थे और यहाँ की जनसंख्या को आने वाली पीड़ा का भान नहीं था।
जब तक इस विषय पर चर्चा समाप्त हुयी हम सबसे मिलते हुये वापस अपने स्थान पर आ चुके थे। अगली ट्रेन स्टेशन पर आने ही वाली थी। ज्ञानचक्षु खुलने के बाद लगने लगा कि यह केवल पूर्वोत्तर के लोगों की पीड़ा ही नहीं है, वरन सारे बंगलोरवासियों की पीड़ा है। ब्यूटीपार्लर के व्यवसाय से जुड़े लोगों से हमारी यही करबद्ध प्रार्थना है कि भले ही शेष लोग थोड़ा समय लेकर आये, आप लोग शीघ्र ही वापस आ जाईयेगा, पूरी संख्या में। आपके नहीं आने तक यहाँ का सामाजिक शास्त्र बड़ा ही असंतुलित रहने वाला है, बड़ा जटिल रहने वाला है।
बंगलोर का सौन्दर्य छिना जा रहा है और बिना पूर्वोत्तर के लोगों के वापस आये उसे पुनर्स्थापित करना असंभव है।
(कल ही पता चला है कि लोग वापस आने लगे हैं, आस बँधी है, बंगलोर का सौन्दर्य बना रहेगा।)