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1.9.12

बंगलोर का सौन्दर्य

जब कार्य के घंटे बहुत अधिक हो जाते हैं और आपके साथ लगे कर्मचारियों और सहयोगियों के चेहरे पर थकान झलकने लगती है, तो मुखिया के रूप में आपका एक कार्य और बढ़ जाता है, कार्य का प्रवाह बनाये रखने का कार्य। यद्यपि उत्साह बढ़ाने से कार्य की गति बढ़ती है और बनी भी रहती है, पर बार बार उत्साह बढ़ाते रहने से उत्साह भी थकने लगता है, ऊर्जा भी समझने लगती है कि अब क्षमतायें खींची जा रही हैं।

वरिष्ठों से सीखा है कि अधिक समय तक जुटे रहना है तो वातावरण को हल्का बनाये रखिये। कार्य के समय निर्णयों का निर्मम क्रियान्वयन, पर उसके बाद सबके प्रयासों का सही अवमूल्यन और सबकी समुचित सराहना। भीड़ का बढ़ना दोपहर से प्रारम्भ होता था और मध्य रात्रि के दो घंटे बाद तक ही कार्य समाप्त होता था, उस दिन के अन्तिम यात्री को विशेष गाड़ी में बैठा कर भेजने तक। चौदह घंटों तक स्टेशन पर बने रहने, वहीं पर भोजन करने और अनुभव को बाटने का क्रम तीन दिन तक चला। थकान आपके शरीर में अपना स्थान खोजने लगती है, मन को संकेत भेजती है कि अब बहुत हुआ, विश्राम का समय है। उस समय थका तो जा सकता था पर रुकना संभव नहीं था। हर थोड़े समय में परिस्थितियाँ बदल रही थीं, मन और मस्तिष्क चैतन्य बनाये रखना आवश्यक था।

पलायन के नीरव वातावरण में कोई ऐसा विषय नहीं था जो मन को थोड़ी स्फूर्ति देता। मीडिया के बन्धुओं को दूर से देख रहा था, सब के सब कैमरे में घूरते हुये भारी भारी शब्दों और भावों में डूबे पलायन के विषय को स्पष्ट कर रहे थे, सबको वर्तमान स्थिति सर्वप्रथम पहुँचाने की शीघ्रता थी, अधैर्य भी था। यात्रियों के चेहरों पर प्रतीक्षा और अनिश्चितता के भाव थे, रेलवे के बारम्बार बजाये जा रहे आश्वासन भी उन्हें सहज नहीं कर पा रहे थे। सुरक्षाकर्मी सजग थे और यात्रियों को उनके गंतव्य तक सकुशल पहुँचाने के भरसक प्रयास में लगे हुये थे, उनके लिये आपस का समन्वय ही किसी अप्रिय घटना न होने देने की प्राथमिक आवश्यकता थी। विशिष्ट कक्ष में उपस्थित मंत्रीगण व उच्च अधिकारीगण या तो परामर्श में व्यस्त थे या मोबाइल से अद्यतन सूचनायें भेजने में लगे थे। किसी को किसी से बात तक करने का समय नहीं मिल रहा था।

एक तो शारीरिक थकान, ऊपर से वातावरण में व्याप्त व्यस्तता और नीरवता, एक स्थान पर खड़ा रहना कठिन होने लगा। साथ ही साथ यह भी लगने लगा कि अन्य कर्मचारियों की भी यही स्थिति होगी। दूसरा दिन था, चार नियत गाड़ियों में से दो विशेष गाड़ी जा चुकी थीं, तीसरी जाने में दो घंटे का समय था, रात्रि का भोजन सम्मिलित स्टेशन पर ही हुआ था। प्लेटफार्म पर सभी लोग शान्त बैठे प्रतीक्षा कर रहे थे, स्थिति नियन्त्रण में लग रही थी। एक साथी अधिकारी साथ में थे, मन बनाया गया कि स्टेशन पर ही अन्य कार्यस्थलों तक घूम कर आते है और कार्यरत कर्मचारियों का उत्साह बढ़ाते हैं। किसी भी बड़े स्टेशन के दो छोरों के बीच की दूरी एक किलोमीटर से कम नहीं होती है, दोनों छोर जाकर वापस आने में दो किलोमीटर का टहलना हो जाता है।

साथी अधिकारी स्थानीय थे, यहाँ कई वर्षों से भी थे, उन्हें बंगलोर के बारे में अधिक पता था। चलते चलते बात प्रारम्भ हुयी, मेरा मत था कि यह पलायन होने के बाद बंगलोर अब पहले सा नहीं रह पायेगा, बहुत कुछ बदल जायेगा। पता नहीं जो लोग गये हैं, उनमें से कितने वापस आयेंगे? बंगलोर की जो छवि सबको समाहित करने की है, उसकी कितनी क्षति हुयी है? यदि पूर्वोत्तर से कुछ लोग वापस आ भी जायेंगे तो वो पहले जैसे उन्मुक्त नहीं रह पायेंगे। जीविकोपार्जन के लिये बंगलोर आने का उत्साह अब पूर्वोत्तर के लोगों में उतना नहीं रह पायेगा जितना अभी तक बना हुआ था? इसी तरह के ढेरों प्रश्न मन में घुमड़ रहे थे, जो अपना उत्तर चाहते थे। समय था और साथी अधिकारी के पास अनुभव भी, उन्होंने विषय को यथासंभव और बिन्दुवार समझाने का प्रयास किया और अपने प्रयास में सफल भी रहे।

उनके ही माध्यम से पता लगा था कि पूर्वोत्तर के लोग यहाँ पर किन व्यवसायों से जुड़े हैं। अन्य व्यवसायों में ब्यूटी पार्लर का ही व्यवसाय ऐसा था जिसमें उनका प्रतिशत बहुत अधिक है। उनके चले जाने से इस पर गहरा प्रभाव पड़ेगा और संभव है कि बंगलोर की सौन्दर्यप्रियता में ग्रहण लग जाये। न चाहते हुये भी विषय बड़ा ही रोचक हो चुका था क्योंकि यह हम सबको को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित करने वाला था। प्रत्यक्ष रूप से इसलिये क्योंकि यहाँ की आधी जनसंख्या यदि अपनी सौन्दर्य आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पायेगी तो यहाँ के फूलों से प्रतियोगिता कौन करेगा भला? यदि ब्यूटी पार्लर नहीं खुले तो विवाह आदि उत्सवों में महिलाओं की उपस्थिति बहुत कम हो जायेगी। मॉल इत्यादि में उतनी चहल पहल और रौनक नहीं रहेगी जो बहुधा अपेक्षित रहती है।

शेष आधी जनसंख्या पर इसका परोक्ष प्रभाव यह पड़ने वाला था। यदि सौन्दर्य समुचित अभिव्यक्त नहीं हो पाता है तो उसका कुप्रभाव घर वालों को झेलना पड़ता है। आधी जनसंख्या सुन्दर नहीं लगेगी तो उनका मन नहीं लगेगा, मन नहीं लगा तो घर के काम और भोजन आदि बनाने से ध्यान बटेगा। पारिवारिक अव्यवस्था के निष्कर्ष बड़ा दुख देते हैं। पारिवारिक सत्यं और शिवं बिना सुन्दरं के असंभव हैं। विडम्बना ही थी कि यहाँ के सौन्दर्य के पोषक और रक्षक यहाँ से पलायन कर रहे थे और यहाँ की जनसंख्या को आने वाली पीड़ा का भान नहीं था।

जब तक इस विषय पर चर्चा समाप्त हुयी हम सबसे मिलते हुये वापस अपने स्थान पर आ चुके थे। अगली ट्रेन स्टेशन पर आने ही वाली थी। ज्ञानचक्षु खुलने के बाद लगने लगा कि यह केवल पूर्वोत्तर के लोगों की पीड़ा ही नहीं है, वरन सारे बंगलोरवासियों की पीड़ा है। ब्यूटीपार्लर के व्यवसाय से जुड़े लोगों से हमारी यही करबद्ध प्रार्थना है कि भले ही शेष लोग थोड़ा समय लेकर आये, आप लोग शीघ्र ही वापस आ जाईयेगा, पूरी संख्या में। आपके नहीं आने तक यहाँ का सामाजिक शास्त्र बड़ा ही असंतुलित रहने वाला है, बड़ा जटिल रहने वाला है।

बंगलोर का सौन्दर्य छिना जा रहा है और बिना पूर्वोत्तर के लोगों के वापस आये उसे पुनर्स्थापित करना असंभव है।

(कल ही पता चला है कि लोग वापस आने लगे हैं, आस बँधी है, बंगलोर का सौन्दर्य बना रहेगा।)

29.8.12

देख रहा था व्यग्र प्रवाह

पता नहीं था कि यह कितने दिन चलेगा? पूर्वोत्तर के लगभग दो लाख लोग बंगलोर में हैं, मुख्यतः विद्यार्थी है, सेक्योरिटी सेवाओं में है, होटलों में हैं, ब्यूटी पार्लर में हैं और पर्याप्त मात्रा में आईटी में भी हैं। पहले दिन के बाद लगा कि यदि यही क्रम चलता रहा तो २०-२५ दिन तक लगे रहना पड़ेगा। अगले दिन के समाचार पत्र और न्यूज चैनल बस इसी समाचार से भरे हुये थे, हर ओर बस यही आग्रह था कि देश सबका है, कोई पलायन न करे, किसी को कोई भय नहीं है, सबको सुरक्षा दी जायेगी।

आशा थी कि इन आग्रहों का प्रभाव शीघ्र ही देखने को मिलेगा, लोग आश्वस्त हो पूर्वोत्तर जाने का विचार त्याग देंगे। व्यक्तिगत आशा और रेलवेगत कर्तव्यों में अन्तर बना हुआ था, तैयारी फिर भी रखनी थी। अगले दो दिन प्रवाह और बढ़ा, लगभग ११००० और १४००० के आस पास लोग गये। रेलवे स्थितियों से निपटने के लिये तैयार थी, पहले दिन की गुहार काम आयी, पहले दिन का अनुभव काम आया, कुल तीन दिनों में और ४८ घंटों के अन्तराल में ११ ट्रेनें लगभग ३३००० यात्रियों के लेकर पूर्वोत्तर गयीं। उसके बाद भी प्रवाह कुछ दिन रहा पर संख्या घट कर प्रतिदिन ५०० के आसपास ही रही। रेलवे का तन्त्र कार्यरत था, हमारी उपस्थिति कर्मचारियों का उत्साह बढ़ाये रखने के दृष्टिकोण से अधिक उपयोगी थी। अगले दो दिन प्रवाह के अवलोकन में निकले, यह समझने में निकले कि भय का प्रभाव कितना व्यापक होता है, यह कल्पना करने में निकले कि देश के विभाजन के समय जनमानस के मन की क्या स्थिति रही होगी?

भीड़ में व्यग्रता थी, चेहरे पर भयमिश्रित दुख था, एक आशा भी थी कि अपने घर वापस जा रहे हैं। कुछ के पास केवल हैण्डबैग ही थे जिनसे यह लग रहा था कि वे शीघ्र ही लौटेंगे। कई लोग सपरिवार जा रहे थे, उनके पास सामान अधिक था। हर ट्रेन को विदा करते समय खिड़कियों से झाँकते यात्रियों की आँखों में उन भावों को पढ़ रहा था, जिन्हें लेकर वे बंगलोर से प्रस्थान कर रहे थे। कुछ चेहरों पर धन्यवाद के भाव थे, कुछ के चेहरे अभी तक शून्य में थे, कुछ युवा हाथ हिलाकर आभार प्रकट कर रहे थे।

इसके पहले जब कभी भी पूर्वोत्तर के युवाओं का समूह देखता था, उनके भीतर की जीवन्तता प्रभावित करती थी। प्रसन्नचित्त रहने वाले लोग हैं पूर्वोत्तर के, सीधे, शर्मीले और मिलनसार। कृत्रिमता का कभी लेशमात्र स्पर्श नहीं देखा था उनके व्यवहार में, सदा ही सहज। पहाड़ों की कठिनता में गठा स्वस्थ शरीर और प्रकृति के सोंधेपन से प्राप्त सरल मन। जीवन के प्रति कोई विशेष दार्शनिक आग्रह नहीं, हर दिन को पूर्ण देने और पूर्ण जीने का उत्साह। ट्रेन से जाते हुये लोगों में उस छवि को ढूढ़ने का प्रयास कर रहा था पर वह मिली नहीं। दूसरे दिन भय कम था, तीसरे दिन चेहरों पर भय नहीं था पर वे भाव भी नहीं थे जिसके लिये पूर्वोत्तर के लोग पहचाने जाते हैं।

यह समझना बहुत ही कठिन था कि उनके मन में क्या चल रहा है। स्टेशन पर मीडियाकर्मियों का जमावड़ा बना रहा इन तीन दिनों, उन्होंने जानने का प्रयास किया पर पलायन कर रहे लोगों ने कुछ बोलने की अपेक्षा शान्त रहना उचित समझा। राज्य के मंत्रीगण अपने वरिष्ठतम पुलिस अधिकारियों के साथ वहाँ उपस्थित थे, प्रयासरत थे कि पलायन रोका जा सके, पर उन तीन दिनों तक पलायन रुका नहीं। कई गैर सरकारी संगठनों के लोग वहाँ उपस्थित थे, उन्हें मनाने के लिये, पर मन में घाव गहरा था, संवेदनीय सान्त्वनाओं से भरने वाला नहीं था। भय जब व्याप्त होता है तो आशाओं को भी क्षीण कर देता है, गहरे तक, शक्ति को भी संदेह से देखने लगता है, अविश्वास करने लगता है सारी व्यवस्थाओं पर। यही कारण रहा होगा कि सुरक्षा के सारे आश्वासन होने के बाद भी उनका मन यह मानने को तैयार नहीं था कि वे यहाँ सुरक्षित हैं।

क्या पलायन ही विकल्प था? कई बार तो लगा कि ट्रेनों की उपलब्धता ने उन्हें एक सरल विकल्प दे दिया है, पलायन कर जाने का। यदि इतनी अधिक मात्रा में ट्रेनें नहीं रहती तो संभव था कि लोग अपने स्थानों पर बने रहते और अधीर न होते, कोई और विकल्प ढूढ़ते। परिस्थितियों से भाग जाना तो उपाय नहीं है, समस्यायें तो हर जगह खड़ी मिलेंगी, कहीं छोटी मिलेंगी, कहीं बड़ी मिलेंगी। पर भावनाओं के उफान में तार्किक चिन्तन संभव नहीं होता है, व्यक्ति सरलतम विकल्प की ओर भागता है। हमें भी उस समय तो अपने सामने दसियों हजार लोगों को सकुशल पूर्वोत्तर पहुँचाने का कर्म दिख रहा था। क्या उचित है, क्या नहीं, इस पर विचार करने की न तो शक्ति थी, न समय था और न अधिकार ही था।

उन्हें जब लगेगा कि परिस्थितियाँ ठीक हो गयी हैं, तो लोग वापस लौटना प्रारम्भ करेंगे। जब बिना किसी विशेष घटना के इतना बड़ा पलायन हो गया तो किन प्रयासों से विश्वास वापस लौटेगा, यह समझना कठिन है। यह संभव है कि कुछ दिनों के बाद उनके मन का उद्वेग शान्त हो जायेगा, उनको अपने आप पर विश्वास स्थापित हो जायेगा, हवा में व्याप्त अविश्वास छट जायेगा, तब वे वापस लौट आयेंगे।

हम अपनी सांस्कृतिक एकता के लिये पहचाने जाते हैं, विविधतायें हमारी संस्कृति के शरीर में विभिन्न आभूषणों की तरह हैं, हर कोई अपनी तरह से संस्कृति को सुशोभित करने में लगा हुआ है। विविधता को विषमता से जोड़कर उपाधियों और आकारों में अपने आप से भिन्न लोगों के प्रति विद्वेष की भावना संस्कृति को आहत कर रही है, लोकतन्त्र के प्रतीकों पर निर्मम प्रहार कर रही है। यह प्रवृत्ति कोई सामान्य अपराध नहीं, इसे किसी भी स्वरूप में देशद्रोह से कम जघन्य नहीं समझा जा सकता है, यह देश के स्वरूप पर एक आत्मघाती प्रहार है। भविष्य में कभी पलायन न हो, यह सुनिश्चित करने के लिये हमारे निर्णय कठोर हों अन्यथा हमें अपना हृदय कठोर करने का अभ्यास डालना चाहिये क्योंकि पलायन कर रहे लोगों की पीड़ा को देखने की शक्ति तभी विकसित हो पायेगी।

इसके पहले अपना जीवन बचाने हेतु अकाल से प्रभावित क्षेत्रों से जीविका की खोज में पलायन होते देखा था, उस समय भी मन द्रवित हुआ था। पर यह पहला अनुभव था जब लोगों को अपना जीवन बचाने के लिये अपनी जीविका छोड़कर भागते देखा है। तीन दिन तक कार्य की थकान शरीर को उतना कष्ट नहीं दे पायी जितना कष्ट पलायन करते लोगों के चेहरों के भाव दे गये। प्रलय के पश्चात मनु के मन में सब कुछ खो जाने के भाव थे, वैसे ही कुछ भाव आँखों में तैर रहे थे, दोनों की ही आँखें नम थीं। अन्तर बस इतना था कि मनु पहाड़ पर बैठे थे, मैं स्टेशन पर, मनु जल का प्रलय प्रवाह देख रहे थे, मैं जन का व्यग्र प्रवाह।

यदि यह अलगाववाद का नृशंस नृत्य न रुका तो आगामी इतिहास के अध्याय इसी पंक्ति से प्रारम्भ होंगे…

एक पुरुष भीगे नयनों से देख रहा था व्यग्र प्रवाह…..