मन की दिशा प्रबल है,
तर्क, बुद्धि सब यन्त्र प्राय हैं,
सत्य सदैव अबल है ।
आज समाज कालिमा पर, क्यों श्वेत रिक्तता पोत रहा है,
अनसुलझे उन संदिग्धों को, सत्य बनाकर थोप रहा है ।
किन्तु विरोध विरल है ।
तर्क, बुद्धि सब यन्त्र प्राय हैं, सत्य सदैव अबल है ।।१।।
कुछ विचित्र सिद्धान्त बने हैं, स्रोतों का कुछ पता नहीं है,
धन्य हमारी अन्धभक्तिता, जो होता है वही सही है ।
अब जन पीता छल है ।
तर्क, बुद्धि सब यन्त्र प्राय हैं, सत्य सदैव अबल है ।।२।।
सोचो जीवन का रस जाने कहाँ कहाँ पर शुष्क हो गया,
यन्त्रों के अनुरूप बन गया, अर्थहीन, रसहीन हो गया ।
अन्तः बड़ा विकल है ।
तर्क, बुद्धि सब यन्त्र प्राय हैं, सत्य सदैव अबल है ।।३।।
चिन्तन आवश्यक है मन का, सत्य कोई सिद्धान्त नहीं है,
होगी परिपाटी वह कोई, परख बिना स्वीकार्य नहीं है ।
सत्य सदा उज्जवल है ।
मात्र विचारों की दो लड़ियाँ, शान्ति सुधा प्रतिफल है ।।४।।