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14.12.16

लेखन में इष्टतम विलम्ब

देखा जाये तो लेखन में भी इष्टतम विलंब का वृहद उपयोग है। उपरिलिखित वाक्य सोचना और उसे लिखना, वैसे तो बड़ा स्वाभाविक लगता है पर यदि उस पर विचार करें तो सोचने की प्रक्रिया समाप्त होने के बाद ही लिखने का निर्णय होता है। कभी कभी तो लिखते या टाइप करते समय भी चिन्तन चलता रहता है और लेखन परिवर्धित हो जाता है। समुचित वाक्य बनाने के पहले कितनी देर सोचना है, यह बड़ा प्रश्न है। लिखते समय सोचने में व्यवधान होता है और सोचते समय लिखा नहीं जा सकता है। अभ्यास होते होते दोनों मिश्रित से हो जाते है और दोनों की भिन्नता का पता नहीं चलता है। लिखते लिखते ही सोच लेने में लेखन अत्यन्त शीघ्र हो सकता है। संभव है कि सरल विषय पर लेखन करने में ऐसा हो या किसी ज्ञात विषय को शब्दबद्ध करने में विचार स्वतः निकल आयें। कठिन, अज्ञात या कल्पनामयी पर चिन्तन करना ही पड़ता है। बौद्धिक क्षमता के अनुपात में समय भी लगता है। यदि उससे कम समय देंगे तो अभिव्यक्ति में भूल होने की संभावना है। हो सकता है कि वह पूर्ण न हो या जो अभीप्सित था वह संप्रेषित न हो पाया हो। आवश्यकता से अधिक सोचने में संभव है कि समय व्यर्थ हो रहा हो या जो अभिव्यक्ति हो वह समझने की दृष्टि से कठिन हो। पढ़ने वाले की दृष्टि से इष्टतम विलंब इतना हो कि वह भूल रहित हो, अधिक कठिन न हो, सुगाह्य हो, इष्टतम हो।   

पुस्तक लिखने का निर्णय भी इष्टतम विलंब के आधार पर लिया जा सकता है। जिस विषय पर लिखना है, उस पर कितना शोध और अध्ययन पर्याप्त हो। यदि कम शोध करके लिखा तो संभव हो पुस्तक की गुणवत्ता कम हो। बहुत अधिक शोध करके लिखें तो संभव हो कि लिखने में अधिक देर हो जाये या यह भी संभव है कि पुस्तक अत्यन्त कठिन हो जाये। जैसे ही कोई नया विचार या नयी खोज आती है, व्यवसायी या उद्यमी इस बात पर लग जाता है कि किस प्रकार उसका उपयोग करके आर्थिक लाभ अर्जित किया जा सके। तुरन्त ही उस कार्य में लग जाने से आप औरों से आगे तो हो जाते हैे, पर संभव हो उस समय तक शोध का स्तर अच्छा न हो, इस कारण आपके उत्पाद में वह गुणवत्ता न आ पाये जो व्यवसाय में अग्रणी रहने के लिये आवश्यक है। बहुत अधिक विलंब करने से आपके प्रतियोगी स्पर्धा में आगे निकल जायेंगे और आपके लिये कुछ शेष नहीं छोड़ेगे।  थोड़ा रुककर आर्थिक निर्णय लेने से या कहें तो इष्टतम विलंब के बाद निर्णय लेने से, हो सकता है कि आपके उत्पाद का प्रभाव महत्तम हो।

इस विषय पर जब गूगल में भ्रमण कर रहा था तो एक बड़ा ही रोचक ब्लॉग मिला। यह ब्लॉग ‘ऑपरेशन रिसर्च’ के क्षेत्र में था। इष्टतम विलंब पर गणेश और व्यास का उदाहरण उसमें दिया गया था। गणितीय शब्दावली का उपयोग न करते हुये उसे सरल भाषा में समझाता हूँ।

यह कथा सबको विदित है कि महाभारत के बाद जब व्यासजी ने उस कथानक को लिपिबद्ध करने का निर्णय किया तो उन्होने स्वयं लिखने के स्थान पर लेखक से कराने का निर्णय लिया। व्यासजी महाभारत सर्वसाधारण के लिये लिखना चाहते थे और इस कारण ग्रन्थ का आकार बड़ा होना स्वाभाविक था, लगभग एक लाख श्लोकों का। सारा कथानक उनके मस्तिष्क में स्पष्ट था, बस उसे शब्दबद्ध करना था। कथा का प्रवाह न टूटे, इसके लिये आवश्यक था कि वह बोलते रहें और कोई और उसे लिखता रहे। अब विचार किया गया कि सबसे अधिक गति से कौन लिख सकता है, गणेशजी का नाम आया, बुद्धिमान और ज्ञानवान, सबका हित चाहने वाले। प्रस्ताव भेजा गया, गणेशजी सहमत हो गये।

गणेशजी ने एक बाध्यता रखी कि यदि व्यासजी की बोलने की गति गणेशजी की लिखने की गति से कम हो गयी तो वह लिखना बन्द कर देंगे। कारण स्पष्ट था, जब सबकुछ उनके मस्तिष्क में स्पष्ट था तो बोलने में विलंब नहीं होना चाहिये। व्यासजी के लिये यह कठिन नहीं था पर बोलने की गति अधिक रखने के लिये सोचने के लिये कम समय मिलता। अधिक गति में त्रुटियों की संभावना अधिक हो जाती है। इस पर व्यासजी ने भी एक प्रतिबाध्यता रखी। व्यासजी ने गणेशजी से कहा कि आप श्लोक सुनने के बाद जब तक उसे पूरा समझ नहीं जायेंगे तब तक उसे लिखेंगे नहीं। यहाँ पर एक इष्टतम बिलंब की स्थिति उत्पन्न हो गयी, जिससे सोचने के लिये व्यासजी को तनिक अधिक समय मिल गया। यह महाभारत के त्रुटिरहित और अक्लिष्ट लेखन के लिये वरदान था।

यहाँ पर गति और समझ के बीच एक संतुलन स्थापित हुआ, त्रुटि और क्लिष्टता के बीच संतुलन स्थापित हुआ। यदि व्यासजी कम सोच कर, बड़ा सरल सा श्लोक गढ़ते तो उसमें त्रुटि की संभावना रहती।  साथ ही साथ गणेशजी उसे तुरंत ही समझकर लिख भी देते। इससे व्यासजी को अगले श्लोक के लिये कम समय मिलता, जिससे त्रुटि की संभावना और भी बढ़ जाती। इस प्रकार त्रुटि की मात्रा ग्रन्थ में उत्तरोत्तर बढ़ती जाती। यदि व्यासजी बहुत अधिक सोचकर क्लिष्ट सा श्लोक गढ़ते तो गणेशजी को उसे समझने में अधिक समय लगता। इससे व्यास को अगले श्लोक के लिये और अधिक समय मिलता। इस प्रकार महाभारत के श्लोक उत्तरोत्तर और भी क्लिष्ट होते जाते। दोनों ही अवांछित निष्कर्ष महाभारत जैसे ग्रन्थ के लिये व्यासजी को स्वीकार्य नहीं थे अतः उन्होने इष्टतम विलंब का मार्ग अपनाया जिससे महाभारत त्रुटिरहित और अक्लिष्ट हो सका।

यदि व्यास से कम मेधा का कोई वाचक होता, यदि गणेश से कम श्रुतलेखन का कोई लेखक होता, इन दोनों ही परिस्थितियों में महाभारत का वर्तमान स्वरूप सामने न आ पाता। महाभारत का संयोजन अद्भुत है। गीता जैसी कालजयी रचना उसी में से उद्धृत है। सांख्य, कर्म और भक्ति आदि के तत्व जिस सरलता से समझाये गये हैं, वह उसकी सर्वग्राह्यता सिद्ध करते हैं। पतंजलि योग सूत्र पढ़ने के बाद जब पुनः गीता पढ़ी तो लगा कि प्रत्येक सूत्र की विशद व्याख्या कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं। जब कभी भी आप गीता पढ़ें तो कृष्ण-अर्जुन, संजय-धृतराष्ट्र के संवादों के साथ साथ व्यास-गणेश की इष्टतम बिलंब के संवाद को भी याद रखें।