विश्व ने सदा ही अन्वेषकों को बड़ा मान दिया है, कुछ ने लुप्त प्रजातियाँ ढूढ़ निकाली, कुछ ने लुप्त सभ्यतायें, कुछ ने जीवाणुओं को तो कुछ ने पूरे के पूरे महाद्वीपों को ढूढ़ निकाला। आस्ट्रेलिया और अमेरिका न खोजे जाते तो विश्व का इतिहास और भूगोल, दोनों ही बदले हुये होते। जो भी ब्रह्माण्ड में बिखरा पड़ा है, उस बारे में हमारी उत्सुकता की प्यास बुझाने का कार्य करते हैं अन्वेषक। ज्ञान का विश्व इतना विशाल है कि कोई एक अन्वेषक कुछ विषयों से परे आपको संतुष्ट नहीं कर सकता है। दूसरे शब्दों में कहा जाये तो ज्ञान-संतुष्टि के बाजार में माँग बहुत अधिक है, माँग पूरी करने वाले बहुत कम।
इस क्षेत्र में एक नया व्यापारी उभरा है, गूगल। यदि आपका बाजार व्यवस्था और व्यापारियों से विरोध है तो आप उसे कॉमरेड भी कह सकते हैं, पर उसका कार्य सारे ज्ञान का संग्रहण और व्यापार करना ही है और इस तथ्य पर हम सबकी सहमति निश्चयात्मक ही होगी। जैसे मोबाइल का नाम लेते ही आपके मन में नोकिया या एप्पल का नाम उभरता है उसी तरह ज्ञान का संदर्भ आते ही लोग गूगलाने लगते हैं।
तो क्या गूगल के पहले ज्ञान नहीं था? बिल्कुल था, पर थोड़े भिन्न स्वरूप में। पुस्तकों में था, बुजुर्गों के अनुभवों में था, गुरुजनों की मेधा में था, संस्कृति की परम्पराओं में था, हमारे संस्कारों में था, था ऐसे ही थोड़ा बिखरा हुआ सा। हमारे प्रश्न या तो तथ्यात्मक होते थे या निर्णयात्मक होते थे, उत्तर कहीं न कहीं मिल ही जाते थे, श्रम भले ही थोड़ा अधिक लग जाये। प्रश्न जितना गहराते थे, उत्तर उतने ही गम्भीर होते जाते थे। पीड़ा की निर्बल घड़ियों में हमारे ज्ञान के पारम्परिक स्रोत हमारे बिखरे अस्तित्व को एक स्थायी संबल दे जाते थे।
आज विदेशी महाव्यापारियों के आगमन से और उनके द्वारा खुदरा क्षेत्र पर होने वाले संभावित आक्रमण से आधा देश व्यथित है। पर ज्ञान के क्षेत्र में गूगल के द्वारा हमारे पारम्परिक ज्ञानस्रोतों के संभावित शतप्रतिशत अधिग्रहण से हम तनिक भी संशकित नहीं दिख रहे हैं। ज्ञान के क्षेत्र में सबका अधिकार है और सारी जानकारी किसी पर निर्भर हुये बिना मिलनी भी चाहिये। देखा जाये तो गूगल बौद्धिक स्वतन्त्रता का प्रतीक बनकर उतरा है, ठीक उसी तरह जिस तरह वालमार्ट आर्थिक लोकतन्त्र के राग आलाप रहा है।
गूगल का गणित जो भी हो पर गूगल के द्वारा गणित का गहन प्रयोग ही उसे वर्तमान स्थान पर ले आया है। ज्ञान के हर शब्द को गणितीय विधि से विश्लेषण कर उन्हें आगामी खोजों के लिये सहेज कर रखना ही गूगल की कार्यशैली है। किसी भी शब्द को खोज में डालते ही लाखों लिंक छिटक कर सामने आ जाते हैं, जिसमें हम अधिकतम पहले दस ही उपयोग में ला पाते हैं। कई मित्रों ने इस बात की सलाह दी कि किस तरह से खोज-शब्द डालने से निष्कर्ष सर्वाधिक प्रभावी होते हैं। कई बार यह सलाह काम आयी तो कई बार दसवें पन्ने तक पढ़ने का धैर्य। पहले कुछ निष्कर्षों में उनकी कम्पनी का नाम आ जाये, इसके लिये कम्पनियों में कुछ भी करने की होड़ लगी रहती है। गूगल किस लिंक को किस आधार पर वरीयता देता है, यह घोर गणितीय शोध का विषय है और यही उसका धारदार हथियार।
ज्ञान के किसी भी पक्ष को लेकर हमारी निर्भरता इतनी बढ़ गयी है कि छोटी छोटी बातों के उत्तर जानने के लिये हम कम्प्यूटर खोलकर बैठ जाते हैं और खो जाते हैं गूगल की अनगिनत गलियों में। कहीं एक दिन ऐसा न हो जाये कि हमारे ज्ञान-प्रक्रिया पर गूगल का एकाधिकार हो।
यहाँ तक तो ठीक है कि हम जो जानना चाहते हैं, जान जाते हैं। पर पता नहीं कितना और सम्बद्ध ज्ञान है जिसके बारे में हमें पता ही नहीं चल पाता है क्योंकि उसके बारे में हम कभी गूगल से पूछते ही नहीं, तो वह कभी बताता ही नहीं। मैं सगर्व कह सकता हूँ कि ज्ञान की बहुत सी अनुपम फुहारें मित्रों के द्वारा पता लगी हैं, न कि गूगल से। हाँ गूगल से उनके बारे में और जानकारी प्राप्त होती है।
ज्ञात के बारे में अधिक ज्ञान पर अज्ञात के बारे में मौन, गूगल का गणित बस यहीं पर ही गच्चा खा जाता है। ज्ञान की मात्रा तो ठीक है पर उसकी दिशा कौन निर्धारित करेगा? प्रसन्न रहने के ढेरों उपाय तो निश्चय ही गूगल बता देगा पर उसमें कौन सा आप पर सटीक बैठेगा, आपको ढंग से जानने वाले आपके शुभचिन्तक या आपके मित्र ही बता पायेंगे, अतः उनसे सम्पर्क में बने रहें। गूगल की गणितीय पहुँच उन क्षेत्रों में निष्प्रभ हो जाती है। सम्बन्धों के सम्बन्ध में गूगल का गणित निर्बन्ध हो जाता है।
तथ्यात्मक ज्ञान मिलने के बाद उन पर निर्णय लेने की समझ गूगल नहीं सिखा सकता। ज्ञान के परम्परागत स्रोत भले ही कई क्षेत्रों में गूगल से कमतर हों पर उसमें जो समग्रता हमें मिलती है, गूगल का गणित वहाँ नहीं पहुँच पाता है।
कृपया इस तर्क को खुदरा क्षेत्र से जोड़कर न देखा जाये, ज्ञान और सामान में कई असमानतायें भी हैं।
गूगल का गणित जो भी हो पर गूगल के द्वारा गणित का गहन प्रयोग ही उसे वर्तमान स्थान पर ले आया है। ज्ञान के हर शब्द को गणितीय विधि से विश्लेषण कर उन्हें आगामी खोजों के लिये सहेज कर रखना ही गूगल की कार्यशैली है। किसी भी शब्द को खोज में डालते ही लाखों लिंक छिटक कर सामने आ जाते हैं, जिसमें हम अधिकतम पहले दस ही उपयोग में ला पाते हैं। कई मित्रों ने इस बात की सलाह दी कि किस तरह से खोज-शब्द डालने से निष्कर्ष सर्वाधिक प्रभावी होते हैं। कई बार यह सलाह काम आयी तो कई बार दसवें पन्ने तक पढ़ने का धैर्य। पहले कुछ निष्कर्षों में उनकी कम्पनी का नाम आ जाये, इसके लिये कम्पनियों में कुछ भी करने की होड़ लगी रहती है। गूगल किस लिंक को किस आधार पर वरीयता देता है, यह घोर गणितीय शोध का विषय है और यही उसका धारदार हथियार।
ज्ञान के किसी भी पक्ष को लेकर हमारी निर्भरता इतनी बढ़ गयी है कि छोटी छोटी बातों के उत्तर जानने के लिये हम कम्प्यूटर खोलकर बैठ जाते हैं और खो जाते हैं गूगल की अनगिनत गलियों में। कहीं एक दिन ऐसा न हो जाये कि हमारे ज्ञान-प्रक्रिया पर गूगल का एकाधिकार हो।
यहाँ तक तो ठीक है कि हम जो जानना चाहते हैं, जान जाते हैं। पर पता नहीं कितना और सम्बद्ध ज्ञान है जिसके बारे में हमें पता ही नहीं चल पाता है क्योंकि उसके बारे में हम कभी गूगल से पूछते ही नहीं, तो वह कभी बताता ही नहीं। मैं सगर्व कह सकता हूँ कि ज्ञान की बहुत सी अनुपम फुहारें मित्रों के द्वारा पता लगी हैं, न कि गूगल से। हाँ गूगल से उनके बारे में और जानकारी प्राप्त होती है।
ज्ञात के बारे में अधिक ज्ञान पर अज्ञात के बारे में मौन, गूगल का गणित बस यहीं पर ही गच्चा खा जाता है। ज्ञान की मात्रा तो ठीक है पर उसकी दिशा कौन निर्धारित करेगा? प्रसन्न रहने के ढेरों उपाय तो निश्चय ही गूगल बता देगा पर उसमें कौन सा आप पर सटीक बैठेगा, आपको ढंग से जानने वाले आपके शुभचिन्तक या आपके मित्र ही बता पायेंगे, अतः उनसे सम्पर्क में बने रहें। गूगल की गणितीय पहुँच उन क्षेत्रों में निष्प्रभ हो जाती है। सम्बन्धों के सम्बन्ध में गूगल का गणित निर्बन्ध हो जाता है।
तथ्यात्मक ज्ञान मिलने के बाद उन पर निर्णय लेने की समझ गूगल नहीं सिखा सकता। ज्ञान के परम्परागत स्रोत भले ही कई क्षेत्रों में गूगल से कमतर हों पर उसमें जो समग्रता हमें मिलती है, गूगल का गणित वहाँ नहीं पहुँच पाता है।
कृपया इस तर्क को खुदरा क्षेत्र से जोड़कर न देखा जाये, ज्ञान और सामान में कई असमानतायें भी हैं।