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9.10.21

मुक्ति का उपहार दे दो

 

अनवरत रत, पथ चली शत, 

जीवनी रुक गयी मानो।

प्रबल कल कल, सकल उद्धत,

ऊर्जा चुक गयी मानो।


विषय अनगिन किन्तु मन का,

सिकुड़ता विस्तार सहसा।

प्राप्त सब जो प्राप्य लगता,

अकर्मक आधार सहसा।


क्या प्रयोजन, क्यों अकारण,

कौन से संकेत भ्रमवत।

क्यों नहीं स्पष्ट धारण,

काल के आदेश भ्रमवत।


समय के रुक गये जल की,

गंध रह रह सताती है ।

विकल गति छटपटाती है ।

सुप्त होकर अनमनी सी,

समय यूँ ही बिताती है ।।

 

रुके जल को धार दे दो,

प्रगति का आसार दे दो ।

निराशा से रुग्ण मन को,

मुक्ति का उपहार दे दो ।।

17.6.21

हनुमानबाहुक - क्रम


हनुमानबाहुक में कुल ४४ छन्द हैं, अवधी में। पहले १३ छन्दों में स्तुति है, हनुमानजी के महान कृत्यों और विशिष्ट गुणों का वर्णन है। पहले छन्द में ही वह, अपने सेवकों को सुगमता से प्राप्त होने वाले, उनकी भलाई करने वाले, उनके समीप रहने वाले और उनके संकटों का नाश करने वाले कहे गये हैं। दूसरे छन्द में, उनका विकराल रूप जिसके हृदय में बसता है, उसके पास पाप और दुःख स्वप्न में भी निकट नहीं आते हैं। इस प्रकार पहले दो छन्द ही “गुणी के गुण” और “सेवक की आवश्यकता” के मध्य एक तन्तु जोड़ देते हैं। शेष ११ छन्द हनुमान के उन गुणों का वर्णन करते हैं जिनके द्वारा उन्होंने असंभव, विकट और कठिन कर्म सम्पादित किये हैं। उनकी विकरालता उन्हें “काल का भी काल” कह कर व्यक्त की गयी है।


१४वें छन्द में पहली बार तुलसीदास ने अपने स्वामी से अपना सम्बन्ध कहा है, “मन की बचन की करम की तिहूँ प्रकार, तुलसी तिहारो तुम साहेब सुजान हौ”, मन से, वचन से, कर्म से, तीनों प्रकार से तुलसी आपका दास है, आप सब जानने वाले स्वामी हैं। उसके बाद भी यथासंदर्भ सम्बन्ध, आश्रयता, निर्भरता वर्णित की गयी है।


१५वें छन्द से उलाहना प्रारम्भ होती है और शेष ३० छन्दों में लगभग १४ बार भिन्न भिन्न प्रकार से व्यक्त जाती है। पाठकों की सुविधा के लिये उन सारे संवादों को क्रम से सूचीबद्ध किया है। जैसे जैसे आप पढ़ेंगे, तुलसीदास की हनुमान के प्रति प्रगाढ़ता, श्रद्धा और आस्था स्फुरित होती दिखेगी, साथ ही साथ पीड़ा और विलम्ब का निदान न होने पर आश्चर्य और हताशा के भाव भी।   


  1. हे दुर्धर्ष योद्धा, आपका बल तुलसी के लिये क्यों घट गया है? (बीर बरजोर घटि जोर तुलसी की ओर)
  2. यदि मैं आपका स्नेह हार गया हूँ तो मुझे मेरा दोष सुना दीजिये, जिससे मैं भविष्य में सचेत हो जाऊँ (दोष सुनाये तैं आगेहुँ को होशियार ह्वैं हों मन तो हिय हारो)
  3. मेरी ही बार बूढ़े हो गये हो या बहुत शरणागतों को पालने में थक गये हो (बूढ भये बलि मेरिहिं बार, कि हारि परे बहुतै नत पाले)
  4. आपके जैसे समर्थ स्वामी की सेवा के बाद तुलसी यह कष्ट सहे, यह आश्चर्य ही है (तोसो समत्थ सुसाहेब सेई सहै तुलसी दुख दोष दवा से)
  5. यदि अपराधी हूँ तो सहस्रों भाँति मारिये, परन्तु जो लड्डू देने से मारता हो उसे विष देकर मत मारिये (अपराधी जानि कीजै सासति सहस भान्ति, मोदक मरै जो ताहि माहुर न मारिये)
  6. आपके प्रमुख दास के हृदय में दुख है, वहाँ पर रह कर उसे देखिये तो (खास दास रावरो, निवास तेरो तासु उर, तुलसी सो, देव दुखी देखिअत भारिये )
  7. हे महावीर, तुलसी भारी सोच में है कि किस संकोच के कारण आप इस बाँह की पीड़ा से भय खा रहे हैं (भीर बाँह पीर की निपट राखी महाबीर, कौन के सकोच तुलसी के सोच भारी है )
  8. इतने दिन तुलसी को बाँह की पीड़ा रही, यह आपका आलस्य है, या क्रोध, या परिहास है या कोई शिक्षा (आलस अनख परिहास कै सिखावन है, एते दिन रही पीर तुलसी के बाहु की )
  9. आपकी यह ढील मुझे मेरी पीड़ा से अधिक पीड़ित कर रही है (ढील तेरी बीर मोहि पीर तें पिराति है )
  10. तुलसी को अपने बाँह की थोड़ी सी पीड़ा पर बड़ी ग्लानि हो रही है, पता नहीं कि मेरे किस पाप या क्रोध से आपका प्रभाव लुप्त हुआ जा रहा है (थोरी बाँह पीर की बड़ी गलानि तुलसी को, कौन पाप कोप, लोप प्रकट प्रभाय को )
  11. राम ऐसा हाल किया है कि अगस्त्य मुनि का सेवक भी गाय के खुर में डूब गया है (कुंभज के किंकर बिकल बूढ़े गोखुरनि, हाय राम राय ऐसी हाल कहूँ भई है )
  12. तुलसी ने गोसाँई होने के बाद अपने कष्टप्रद दिन भुला दिये, उसी का फल आज पा रहा हूँ (तुलसी गुसाँई भयो भोंडे दिन भूल गयो, ताको फल पावत निदान परिपाक हौं )
  13. जो राम का नमक खाकर भुला दिया, वही अब बरतोर बन शरीर से फूट फूट कर निकल रहा है ( ता तें तनु पेषियत घोर बरतोर मिस, फूटि फूटि निकसत लोन राम राय को )
  14. यदि आप से नहीं हो पायेगा तो मुझे बता दीजिये, मौन रहूँगा और मान लूँगा कि जो बोया है वही काट रहा हूँ (तुम्ह तें कहा न होय हा हा सो बुझैये मोहिं, हौं हूँ रहों मौनही बयो सो जानि लुनिये )


तुलसीदास को इतने विश्वास से अपने आराध्य से संवाद करते देख मन रोमाञ्च से भर जाता है, भावों का अतिरेक होने लगता है, शब्द गौड़ हो जाते हैं, स्नेहिल सम्बन्ध आँखों में डबडबाने लगते हैं। शब्द समझ आ गये हैं, इन शब्दों में बसे प्रेम की थाह नहीं पा रहा हूँ, प्रयासरत हूँ, संभवतः एक दिन समझ आ जायें। 

17.7.13

उथल पुथल में क्रम

एक बहुत पुराना व्यसन है, हम मानवों का। हम हर क्रिया, हर रहस्य, हर गतिविधि को किसी सिद्धान्त से व्यक्त करने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार हम उसे सुलझाने का प्रयत्न करते हैं। इन्हें हम उस तन्त्र के, उस समाज के, उस प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्तों का नाम दे देते हैं।

कितना आवश्यक है, अन्तर्निहित सिद्धान्त ढूढ़ने का प्रयास करना। घटनाओं को होने दिया जाये, हम अपना जीवन जीते रहें, जो भी मार्ग निकलें, जो भी मार्ग हमें सुरक्षित रखे। पशु ऐसा ही करते हैं, किस क्रिया की प्रतिक्रिया में क्या करना, यह उनके मस्तिष्क और इन्द्रियों में पहले से संचित होता है। इस प्रकार वे आगत समस्याओं से निपट कर अपना जीवन जीने में व्यस्त हो जाते हैं, उससे अधिक वे कुछ करते भी नहीं हैं।

मनुष्य पर वहाँ नहीं रुकता है, वह अपने मन में एक जाँच समिति बिठा देता है, संभावित कारणों और संभावित समाधानों की छानबीन के लिये। बहुत सोच विचार होता है और तब निष्कर्ष स्वरूप एक सिद्धान्त निकलता है, जो न केवल घटित की व्याख्या करता है वरन उस पर किस प्रकार नियन्त्रण गाँठा जा सके, इसके भी उपाय निकालता है।

नियन्त्रण का कीडा हमारे गुणसूत्रों में स्थायी रूप से विद्यमान है। भौतिक रूप से न ही सही, पर बौद्धिक रूप से हम सब क्रियाओं पर नियन्त्रण करने के रूप में जुट जाते हैं, सिद्धान्त की खोज में लग जाते हैं, क्रियाओं की उथल पुथल में एक क्रम देखने लगते हैं।

उथल पुथल में क्रम देखने का यही गुण हमें न केवल पशुओं से भिन्न करता है वरन अपने वर्ग, समाज, देश आदि में सुस्थापित करता है। जिनके अन्दर यह गुण अधिक होता है, उनकी दृष्टि और दिशा अधिक स्पष्ट होती है और उनके अन्दर ही मानवता के नेतृत्व करने और उसकी समस्यायें सुलझाने की संभावनायें होती हैं।

इस प्रक्रिया को बुद्धिमान होने, शक्तिवान होने या सामर्थ्यवान होने से न संबद्ध किया जाये, यह एक विशेष गुण होता है जिसके आधार पर कोई बुद्धिमान, शक्तिवान या सामर्थ्यवान स्वयं को विशिष्ट स्थापित करता है। कुछ उदाहरणों से इसे और समझा जा सकता है।

आप कोई पुस्तक या लेख पढ़ रहे हैं और यदि आप केवल शब्दों की उथल पुथल या वाक्यों के अर्थ में सिमटकर रह जायेंगे, तो आप कब खो जायेंगे, पता ही नहीं चलेगा। शब्दों की उथल पुथल में वाक्य का अर्थ, वाक्यों की उथल पुथल में अनुच्छेद का अर्थ, अनुच्छेदों की उथलपुथल में अध्याय का अर्थ, अध्यायों की उथलपुथल में पुस्तक का अर्थ। पुस्तक को अन्ततः उसके अर्थ में जानने के लिये उसमें अन्तर्निहित क्रम समझना होता है हमें, उथल पुथल में अन्तर्निहित क्रम।

फ़ुटबॉल के पीछे भाग रहे बीसियों खिलाड़ियों का श्रम आपको अव्यवस्थित सा लग सकता है, पर खेल का ज्ञान रखने वालों को उसमें भी एक क्रम दिखता है। कोच को दिखता है कि किस प्रकार और कितनी गति से फुटबॉल और खिलाड़ी एक पूर्वनिश्चित क्रम में गुँथे हुये हैं।

एक सुलझा प्रबन्धक कार्यों की बहुलता में, उनकी अस्तव्यस्तता में एक क्रम ढूँढ कर आगे बढ़ता रहता है। यदि वह समस्याओं में खो जायेगा तो कभी नेतृत्व नहीं दे पायेगा। किसी नगर की भीड़भरी गलियों को समझने के लिये उसका मानचित्र एक क्रम प्रदान करता है। हाथ में या स्मृति में मानचित्र हो तो न ही दिशा खोती है और न ही दृष्टि।

कुरुक्षेत्र में अर्जुन के भावों की उथल पुथल में कृष्ण को एक क्रम दिखा और उन्होंने बड़े व्यवस्थित और तार्किक दृष्टिकोण से उसका समाधान किया, अर्जुन की आशंकाओं से प्रभावित हुये बिना।

देखा जाये तो हमारी यह प्रवृत्ति हमें मानसिक विस्फोट से बचाती है। यदि यह न हो तो हम बहुत शीघ्र ही अपना संतुलन खो बैठेंगे। इतनी सारी सूचना, इतना सारा ज्ञान, इतनी सारी घटनायें, इतनी सारी स्मृतियाँ, यदि हम इन्हें सिद्धान्त या सूत्र के रूप में संचित नहीं करेंगे, तो कहीं खो जायेंगे, इनकी बहुलता में।

पुरातन मनीषियों ने समझ लिया था कि ज्ञान को यदि सदियों के कालखण्ड पार करने हैं तो उन्हें सूत्रों के रूप में रखना होगा। ब्रह्म सूत्र, गीता, उपनिषद, सुभाषित आदि की रचना उन्हीं ज्ञान की हलचल को संजोकर आगे ले जाने का कर्म है।

धीर व्यक्ति कभी भी इस उथल पुथल से भयभीत या आशंकित नहीं होता है, वह सदा ही उसमें क्रम ढूंढ़ता रहता है, घटनाओं का मर्म समझता चलता है। विवरणों और विस्तारों का अधिक ध्यान रखने वाले या तो उसमें भ्रमित हो जाते हैं या उलझ जाते हैं। वर्तमान की उथल पुथल में एक निश्चित क्रम पढ़ लेने वाले भविष्य के दुलारे होंगे, क्योंकि दिशा भूल चुके हम सब उन्हीं के नेतृत्व के सहारे होंगे।