हम कहेंगे, तुम कहोगे, तथ्य जो है,
तभी निकलेगा हृदय से, सत्य जो है।
रंग पक्षों के चढ़ाये घूमना था,
क्यों बताओ सूर्य का शासन चुना था?
मूढ़ से मुण्डी हिलाते, हाँ या ना,
सीखनी थी मध्य की अवधारणा।
गुण रहे आधार, चिन्तन-मूल के,
तब नहीं हम व्यक्ति को यूँ पूजते।
भय सताये, प्रीति आकुल, भ्रम-मना,
मिल रही है सत्य को बस सान्त्वना।
मन बहे निष्पक्ष हो, निर्भय बहे,
तार झंकृत, स्वरित लहरीमय बहे।
नियत कर निष्कर्ष, बाँधे तर्क शत,
बुद्धिरथ दौड़ा रहे, आश्वस्त मत।
हो सके तो सत्य को भी बाँट लो,
यथासुविधा, हो सके तो छाँट लो।
या तो फिर निर्णय करो, मिल बैठ कर,
तथ्य के आधार, गहरे पैठ कर।
त्यक्त संशय, धारणा, मन व्यक्त हो,
जूझना, जब तक न एकल सत्य हो।
साधनारत बुद्धि का उत्पाद जग को चाहिये,
एक सम्मिलित सार्थक संवाद जग को चाहिये।
कहें पीड़ा और की हम, कथ्य जो है,
आज सब मिलकर कहेंगे, सत्य जो है।