6.2.21

मित्र - ६(विद्यालय और नियति)

विजय विद्यालय में मेरे प्रथम मित्र थे, २ फरवरी को उनका जन्मदिन था और हम सभी पुनः गूगल मीट पर बैठे थे। व्यस्तता के कारण सब नहीं आ पाते हैं पर जितने भी मित्र रहते हैं, उन्ही के बीच चर्चा का एक विशेष क्रम चल जाता है। उन घटनाओं की चर्चा जिनके बारे में अन्यथा कभी पता ही नहीं चलता। कभी वह स्वयं या कभी कोई मित्र ऐसे विशिष्ट तथ्य बता देता है जो इतने लम्बे समय में बिसरा गये थे या जीवन के अतिमहत्वपूर्ण पड़ावों में छिप से गये थे। “याद है जब तुमको वहाँ पर…” से प्रारम्भ होता हुआ, स्मृति की एक एक परत खोलता हुआ, आनन्द और आश्चर्य से तृप्त करता हुआ, “अच्छा तुमने यह किया…” पर सिमटता हुआ। एक अद्भुत सुख मिल रहा है हम सबको। मनीष के इन प्रयासों को ईश्वर सदा ऊर्जा और उत्साह से परिपूर्ण किये रहे, सबके लिये रोचक बनाये रखे।

मनीष के एक प्रश्न पर, कि कौन सा वह कारण था जिसने आपको दीनदयाल विद्यालय में आने को प्रेरित किया, विजय के साथ हुआ घटनाक्रम सबसे भिन्न और निराला था। कक्षा ३ में विजय जिस विद्यालय में पढ़ते थे वह उनके घर के निकट था। विद्यालय में घट रही सारी गतिविधियाँ उनकी छत से दिखती थीं। एक दिन विजय की माँ देखती हैं कि किसी अध्यापक द्वारा विजय की पिटाई हो रही है। सायं पूछा गया कि क्या उत्पात किया था कि दण्ड मिल रहा था। उत्तर वही था जो हम सबके साथ कभी न कभी घटित हुआ था, कि हमने कुछ नहीं किया था, सबके साथ हम भी कूटे गये। अगले दिन उस विद्यालय को छोड़कर विजय को सरस्वती शिशु मन्दिर में डाला गया और दीनदयाल विद्यालय के संपर्क में होने से कक्षा ६ की प्रवेश परीक्षा में बैठना हो गया।


कहते हैं कि एक तितली के पंख हिलाने से सुनामी आ जाती है, विजय के कारण में तो फिर भी बहुत हाथ चले थे। सन्तोष ने बताया कि “बटरफ्लाई इफेक्ट” के नाम से प्रसिद्ध इस सिद्धान्त के अनुसार अत्यन्त छोटी लगने वाली घटना या प्रारम्भिक स्थिति आने वाली भविष्य की बड़ी घटनाओं का कारण बन सकती है। हम सब एक साथ बैठकर गूगल मीट कर रहे थे, एक साथ ७ साल पढ़े थे, भिन्न स्थानों और भिन्न परिवेशों से उठकर आये और एकत्र हुये, सबकी तितलियाँ कहीं न कहीं हिली ही होंगी, एक दूसरे से बतिया कर कि इन सबको एक साथ जोड़ना है, मित्र बनाकर।


मनीष के प्रश्न, विजय के उत्तर और सन्तोष के विश्लेषण ने मेरी कल्पना के रथ दौड़ा दिये। मैं भी अपनी तितली ढूढ़ने निकल गया और आश्चर्य यह कि मुझे एक नहीं ५ तितलियाँ मिलीं। किस कारण ने कितना प्रभावित किया होगा इसका विश्लेषण कठिन होगा पर यदि उनमें एक भी कारण न होता तो मेरी दीनदयाल विद्यालय में पढ़ने की संभावना नगण्य होती।


पहला कारण था माँ का अध्यापन कार्य। कुछ दिन माँ के साथ उनके विद्यालय गया पर जब कार्यस्थल दूर हो गया या प्रशिक्षण या जनसंख्या गणना आदि के कार्य हुये तो साथ ले जाना अत्यन्त दुष्कर हो गया। घर में देखने वाला कोई नहीं था, कुछ दिन नानी के घर बिताये और जैसे ही स्वयं को व्यक्त करने की स्थिति में पहुँचा, सरस्वती शिशु मन्दिर में पढ़ने भेज दिया गया। वहाँ अन्य मित्रों की तुलना में बहुत छोटा।


दूसरा कारण था आपातकाल। स्पष्ट याद है जब एक दिन अपने चचेरे भाई के साथ विद्यालय पहुँचा तो देखा वहाँ कोई आचार्य नहीं आया था। एक पुलिसजी ने बताया कि कुछ आचार्य गिरफ्तार हो गये हैं और कुछ भाग गये हैं अब यह विद्यालय बन्द रहेगा। घटना की भयावहता से अनभिज्ञ हम दोनों के मन में घर लौटते समय एक बालसुलभ आनन्द था, छुट्टी का और दण्ड देने वाले आचार्यों के जेल जाने का। यह मूर्खता और छुट्टी अधिक दिन नहीं रहे और हमें एक सामान्य विद्यालय में भेज दिया गया। वहाँ पर पढ़ाई और अनुशासन का स्तर निम्न था।


तीसरा कारण था कक्षा ५ में पुनः पढ़ना। आपातकाल के बाद सरस्वती शिशु मन्दिर में पुनः पढ़ने आये हम सबका स्तर बहुत अच्छा नहीं था, समझ और पाठ्यक्रम अस्तव्यस्त थे। हमारे प्रधानाचार्यजी ने ही परामर्श दिया कि अवस्था कम होने से पुनः कक्षा ५ में पढ़ाना ठीक रहेगा। शारीरिक और बौद्धिक, दोनों ही आधार दृढ़ हो जायेंगे। जहाँ एक ओर पुराने मित्रों से बिछोह असह्य था वहीं दूसरी ओर पढ़े हुये में अधिक श्रम न करने का सुख भी था।


चौथा कारण था मेधावी छात्र परीक्षा में प्रदेश में तीसरा स्थान आना। कक्षा ५ में दूसरा वर्ष सामान्य पाठ्यक्रम के अतिरिक्त कुछ विशिष्ट ज्ञान अर्जित करने में बीता। प्रदेश में स्थान सबके लिये प्रतिभा के उद्घोष होने जैसा था। यह एक तात्कालिक कारण हो गया कि अच्छे विद्यालय और अन्य नगर में भेजना है। नगर के अन्य विद्यालय सबको अयुक्त से लगने लगे।


पाँचवाँ कारण था आचार्यों का विशेष स्नेह। दूसरे ही दिन शुभचिन्तकों ने प्रधानाचार्यजी से परामर्श कर आगामी विकल्पों के बारे में निश्चय किया। एक विशेष पत्र लेकर जब पिताजी दीनदयाल विद्यालय पहुँचे तो समय निकल गया था और दो दिन बाद प्रवेश परीक्षा थी। एक अन्य आचार्यजी ने नियम तोड़ते हुये फार्म निकाल कर दिया और दो दिन बाद हुयी प्रवेश परीक्षा में सफलता मिली।


यदि उपरोक्त में एक भी कारण नहीं होता तो संभवतः उस स्थान पर न पहुँच पाता जहाँ पर आ सका हूँ, उन मित्रों से न मिल पाता जो सहायक रहे हैं उस भविष्य को रचने में जो अभीप्सित था, वह सब न सीख पाता जो विद्यालय में प्राप्त कर सका, अपना शतांश भी नहीं हो पाता। उन सबको याद कर कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर मिल गया, अभिभूत हूँ।

4 comments:

  1. प्रणाम sir
    बढ़िया संस्मरण

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  2. भुलते भागते क्षण सर अति उतम

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  3. बचपन के सुनहरी यादें

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