21.9.16

चीन यात्रा - १५

चाय हाउस
पीपुल्स पार्क नाम के अनुरूप सबके लिये बनाया गया है, यहाँ पर प्रत्येक के लिये कुछ न कुछ है। आप पैडल नौका में घंटों घूमिये, टी हाउस में चाय पीजिये, पेड़ की छाया में बैठिये, अखबार या पुस्तक पढ़िये, ओपेरा या नाटक देखिये, बैंड के सम्मुख संगीत सुनिये, उनके साथ गुनगुनाइये, धुनों पर थिरकिये, गाना चाहें तो गाना गाइये, वृद्धों के साथ धीमा और सामूहिक नृत्य कीजिये, उछलिये, कूदिये, चांग खेलिये, मित्रों के साथ ताश खेलिये, कहीं कोने में बैठकर शतरंज के मोहरों की चाल समझिये, मन करे तो बाँसुरी बजाइये, हरी घास और पौधों को निहारिये। बच्चों के लिये झूले, युवाओं के लिये प्रकृति और एकांत, साधकों के लिये एकाग्रता और वृद्धों के लिये अपने जैसों का संग, सबके लिये बना है पीपुल्स पार्क।

सामूहिक नृत्य
अच्छे सामाजिक जीवन के लिये यह आवश्यक है कि हम ऐसे स्थानों का निर्माण करें जहाँ लोग मिल जुल सकें, विचारों और भावों का आदान प्रदान कर सकें। यदि हम नहीं बनायेंगे तो मानव मन की उत्कट सामाजिकता कोई न कोई मार्ग ढूढ़ निकालती है, कभी सहज, कभी असहज। समुचित दिशा न दिखायी गयी तो सामाजिकता की यही प्यास घातक भी हो जाती है। भले ही चीन में स्वयं को व्यक्त करने की लोकतान्त्रिक स्वतन्त्रता न हो पर सामाजिक स्थानों को बहुत ही सुन्दर ढंग से विकसित कर जीवन का सामाजिक पक्ष सुदृढ़ रखा गया है। भारत में मंदिर ऐसे ही स्थान होते थे, गाँवों की पंचायत, त्योहार, मेले और अब मॉल। चीन में मंदिर नहीं हैं, मेले और त्योहार भी गिने चुने एक दो ही हैं, मॉल भी नगरों तक ही सीमित हैं अतः सामाजिकता का पूरा दायित्व पार्कों के ऊपर ही है। संस्कृति, मनोरंजन और वाणिज्य, ये तीनों पक्ष इन पार्कों में सम्मिलित रहते हैं।

ताइ ची अभ्यास
हम लोग बस से पीपुल्स पार्क पहुँचे और दक्षिण द्वार से अन्दर गये। सबसे पहले बच्चों के खेलने का स्थान था। एक चौतरफा घुमाने वाले झूले में कुछ बच्चे उत्साह से चीख रहे थे, कुछ भय से। नीचे खड़े अभिभावक हाथ भींचे मनोरंजन और कष्ट की सीमारेखा को लहराता हुये देख रहे थे। दृश्य बड़ा ही रोचक था, कभी हम अभिभावकों की बद्ध मनःस्थिति में रहते और कभी बच्चों की उन्मुक्त मनःस्थिति में। थोड़ा समय बिताकर हम आगे बढ़ गये। पार्क का अधिकांश भाग हरा भरा था, अन्दर एक झील थी, दो ऐतिहासिक स्मारक थे। एक स्मारक रेलवे को निजी कम्पनियों के हाथ में जाने से बचाने का था। १९११ में राजा द्वारा धन कमाने हेतु रेलवे को विदेशी कम्पनियों को बेच दिया गया था। उसके विरुद्ध उमड़े आन्दोलन के हुतात्माओं की याद में यह स्मारक खड़ा है। हम सायं के समय वहाँ पहुँचे थे, बहुत लोग टहल रहे थे, कई लोग पारम्परिक ध्यान मुद्राओं में एकाग्र थे, युवा अपनी आत्मीय बातचीत में तल्लीन थे। हम लोग चाह रहे थे कि उस दिन कोई और स्थान भी देख लिया जाये पर जब पाया कि यहीं पर ही देखने के लिये कितना कुछ था तो अपना मन बदल दिया और पीपुल्स पार्क में ही सारा समय बिताकर रात को ही वापस आये। आनन्द पूर्ण आया, हम लोगों की तरह ही स्थानीय निवासी अपने दैनिक कार्यक्रम से पर्याप्त समय निकाल कर यहाँ आते होंगे। यह स्थान छूकर आने वाले स्थानों में से नहीं है, यहाँ का आनन्द यहाँ बिताये समय पर निर्भर करता है।

जिनली का द्वार
वू हाउ मंदिर और जिनली रोड आसपास हैं। जिनली रोड एक बहुत पुराना व्यापारिक केन्द्र है। वू हाउ मंदिर के पूर्व में स्थित यह रोड २०० वर्ष ई पूर्व में भी इतनी ही व्यस्त रहती थी। वू हाउ मंदिर में उस कालखण्ड के स्मृतिचिन्ह रखे हुये हैं। उसी कालखण्ड में जिनली रोड कपड़े के व्यापार के लिये प्रसिद्ध रही है। बाहर एक बड़ा सा द्वार है और अन्दर सड़क के दोनों ओर पारम्परिक भवन, खानपान, कपड़े, हस्तकारी, चाय और मसालों आदि की दुकानें। पीपुल्स पार्क और चुन्क्सी रोड की तुलना में यहाँ पर चहल पहल कहीं अधिक थी। हम लोग कपड़ों की दुकान में गये, एक विशेष प्रकार के रेशम का मूल्य देखकर दंग रह गये। एक महिला अत्यन्त सुमधुर वाद्ययन्त्र बजा रही थी, हमने फोटो लेनी चाही तो उसने शालीनता से मना कर दिया। खानपान के स्टालों के पास भी हम खड़े नहीं हो पाये, पशु बसा में पकाये गये पकवानों की गन्ध वितृष्णा उत्पन्न कर रही थी। 

भित्ति कमल
दीवारों और द्वारों पर बने भित्तिचित्र और आकार बड़े ही रुचिकर थे। एक दुकान में विशेष प्रकार का धनुषबाण देखा। उसका छोटा प्रतिरूप लेकर आने की इच्छा थी, पर भार अधिक होने के कारण और कस्टम द्वारा पारित न करने की संभावना के कारण उसका विचार त्याग दिया गया।  यहाँ की हस्तकारी अन्य स्थानों की तुलना में अच्छी और विविधता भरी थी, पर मोल भाव तनिक भी न था। हमारे समूह का एक भाग दुकानों की विविधता में ही व्यस्त हो गया, हम उसे छोड़कर जिनली रोड के अन्य पक्ष देखने आगे बढ़ गये। हमें एक तिब्बती दुकान भी मिली, वहाँ पर बड़ा अपनत्व लगा। उस युवा ने न केवल बड़े उराव से वस्तुओं को दिखाया वरन उनके मूल्य भी कम कर दिये। उसी परिसर में स्थित वू हाउ मंदिर झूग लियांग को समर्पित है, जिन्हें बुद्धिमत्ता और अच्छी राजनीति का प्रतीक माना जाता है। मंदिर सुन्दर है पर रात में बन्द हो जाने के कारण हम उसे देख नहीं पाये। जिनली रोड से बाहर आने के पहले वहाँ की छतों में रंगबिरंगी लालटेनों से सारा परिवेश जगमगा उठा था। इसी जगमग को निहारने में हमें बाहर निकलने में देर भी हो गयी।

लटकी लालटेनें
जो आनन्द और संतोष अन्य जनस्थानों पर मिला, वह बात यहाँ नहीं मिल पायी। संभवतः अधिक भीड़ और कम क्षेत्रफल के कारण यह क्षेत्र वह प्रभाव उत्पन्न नहीं कर पाया। वातावरण आधुनिक मॉलों जैसा था। जो शान्ति और शालीनता एक मंदिर परिसर में होनी चाहिये उसका सर्वथा आभाव इस स्थान पर मिला। यहाँ सौम्यता की तुलना में व्यवसायिकता कहीं अधिक थी, पर हमारे आनन्द में कोई कमी नहीं रही। जिनली रोड के बाहर भी मुख्य सड़क के दोनों ओर कई दुकानें थी जिनमें पर्यटक व्यस्त दिखे। हम लोग वापस आने के दो दिन पहले ही वहाँ गये थे अतः सब लोगों में घर के लिये कुछ न कुछ खरीद लेने की व्यग्रता थी। खरीददारी के लिये जिनली रोड और उसके आसपास का क्षेत्र बड़ा उपयोगी सिद्ध हुआ।


अगले ब्लॉग में क्वेंगश्वेंग पर्वत और दूजिआनयान बाँध।

6 comments:

  1. पशु बसा अर्थात् चर्बी से ही अधिकत्तर खाना और पकवान बनाया जाता है।तब तो शाकिहारी के लिए खाना बहुत दूर्लभ होगा ।

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  2. पीपुल्स पार्क भी क्या चेन्दू मे ही है?

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    1. जी, गिरधारी जी।

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  3. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 22-09-2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2473 में दी जाएगी
    धन्यवाद

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  4. बहुत बढ़ि‍या..अच्‍छा लगा जानकर।

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