19.6.16

रेलवे का ऑलराइट तन्त्र

कभी आपने ध्यान दिया है कि जब भी कोई ट्रेन किसी स्टेशन, गेट आदि से निकलती है तो ड्राइवर, गार्ड, स्टेशन मास्टर व गेटमैन आदि हरे रंग की झण्डी लहराते हैं। इसे ऑलराइट संकेत कहते हैं और इसका अर्थ है कि सब ठीक है। देखने में तो यह अत्यन्त साधारण सा कार्य लगता है, परन्तु इस पर रेलवे की सुरक्षा का पूरा आधार अवस्थित है। 

रेलवे अपनी विशालता के लिये जाना जाता है, डेढ़ किलोमीटर तक लम्बी ट्रेनें, तीन हजार किलोमीटर तक की यात्रायें, प्रतिदिन चलने वाली २० हजार ट्रेनें, उस व्यवस्था में लगे लाखों कर्मचारी। यदि व्यवस्थायें सुदृढ़ और सुव्यवस्थित न हों तो इतने विशाल तन्त्र को सम्हाल पाना असम्भव हो जायेगा। ऑलराइट की व्यवस्था रेलवे की आधारभूत व्यवस्थाओं में से एक है। यह समझना होगा कि यह कैसे कार्य करती है,  इसका महत्व क्या है और किसी बड़े तन्त्र को सम्हालने में यह कैसे सहायक हो सकती है?

रेलवे तन्त्र के प्रत्येक भाग को प्रतिदिन मानवीय स्तर पर गहनता से देखा जाता है, एक दो नहीं वरन सैकड़ों आँखों द्वारा, दसियों स्तर पर। पटरियाँ, ट्रेन, इन्जन, गेट, पुल, स्टेशन, बिजली के खम्भे आदि सभी स्थान। यहीं नहीं, प्रत्येक कर्मचारी अपना कार्य कैसे निष्पादित कर रहा है, इस पर भी अन्य की सतत और सजग दृष्टि रहती है। ऐसा नहीं है कि रेलवे में मशीनों और तकनीक द्वारा सुरक्षा नहीं देखी जाती है, पर मशीनों की अनुपस्थिति में डेढ़ सौ वर्षों से जो कार्यप्रणाली चली आ रही है उसे छोड़ पाना या ढीला करना, इसका साहस अभी हमें नहीं हो पाया है। मशीनें कभी नहीं बिगड़ेंगी और अर्थ का अनर्थ नहीं करेंगी, इसका विश्वास पूर्णतया नहीं आ पाया है। मशीनें सुरक्षा के अतिरिक्त स्तर के रूप में ही अपने आपको प्रतिस्थापित कर पायी हैं। 

जब भी ट्रेन चलती है, उसमें चलने वाले ड्राइवर, सहायक और गार्ड अपने दृश्य में आने वाले सभी स्थानों और सभी कर्मचारियों पर दृष्टि रखते हैं। पटरियों में किसी प्रकार की टूट, रेल फाटक का खुला होना, ट्रेन का डब्बा बीच में छूट जाना, नियत स्थान से किसी कर्मचारी की अनुपस्थिति, पैट्रोलमैन का न दिखना, स्टेशन पर कोई संदिग्ध गतिविधि, किसी तार का टूटना, पेड़ का गिरना आदि न जाने कितनी स्थितियों पर उनकी दृष्टि रहती है। और जब वे अपने रास्ते में मिलने वाले किसी भी कर्मचारी को हरी झण्डी हिलाकर ऑलराइट करते हैं तो इसका अर्थ होता है कि पिछले खण्ड में उपरिलिखित कोई समस्या नहीं है। इसी प्रकार जो कर्मचारी स्टेशन, गेट आदि स्थानों पर होते हैं, वे सब चलती हुयी ट्रेन के हर पहिये पर दृष्टि रखते हैं। कहीं कोई पहिया असामान्य ध्वनि तो नहीं कर रहा है, उसका कोई भाग असामान्य रूप से गर्म तो नहीं हो गया, ट्रेन का कोई पुर्जा झूल तो नहीं रहा है। ऐसी न जाने कितनी बातों के बारे में सुनिश्चित होने के बाद ही वे ड्राइवर व गार्ड को अपना ऑलराइट संकेत देते हैं। इसी प्रकार स्टेशनों पर भी गार्ड जब यह सुनिश्चित कर लेता है कि सारे यात्री चढ़ गये हैं तभी वह ड्राइवर को गाड़ी चलाने के लिये ऑलराइट संकेत देता है।

हर १० किमी पर एक स्टेशन, हर तीन किमी पर एक गेट, बीच में पटरियों और पुलों की सुरक्षा में लगे हुये न जाने कितने पैट्रोलमैन। आप यह मानकर चलें कि हर २ मिनट में कोई न कोई आपकी ट्रेन को अपनी सतर्क दृष्टि से देख रहा है, आपको पता चले न चले पर वह आपकी ट्रेन की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुये ऑलराइट संकेत संप्रेषित कर रहा है। इसी प्रकार पटरी, स्टेशन और पुलों के ऊपर से हर पाँच मिनट में एक गाड़ी निकल रही है, उसमें तैनात कर्मचारी अपनी पटरी के साथ बगल वाली पटरी पर भी दृष्टि रखते हैं। साथ ही पैट्रोलमैन पटरियों पर लगी एक एक चाभी का निरीक्षण और उनकी सुनिश्चितता दिन में एक से अधिक बार कर लेते हैं। इस प्रकार रेलवे  हर चालायमान या स्थायी तन्त्रों को दो से तीन मिनट में देखकर ऑलराइट सुनिश्चित करता रहता है। सुरक्षा का वृहद आधार ही इतने बड़े तन्त्र को चला पाने में समर्थ हो सकता है।  

जब तन्त्र बड़ा हो तो ऑलराइट संकेतों की व्यवस्थायें उसको सुचारु रूप से चलाने के लिये अनिवार्य अंग हैं। विशाल मध्य को साधने और छाँटने के लिये सिरों का आपस में संवाद बना रहना एक महती आवश्यकता है।  ट्रेन का मध्य हो या पटरियों का मध्य, उसे कोई देखे व सिरों को उसके बारे में बताये, यह व्यवस्था ऑलराइट तन्त्र में विद्यमान है। ठहराव व छटपटाहट मध्य में होती ही है, संचार व संवाद सुचारु न हो तो मध्य आवश्यकता से अधिक फूलने और फैलने लगता है।

रेलवे की भाँति ही अपना भी देश बड़ा है, उसे चलाने के लिये स्थापित तन्त्र भी बड़े हैं। अवलोकन करें कि उनमें कोई ऑलराइट संकेतों जैसी व्यवस्था है कि नहीं, और यदि नहीं है तो उसका क्या कुप्रभाव देश पर पड़ रहा है। रेलवे जैसे गतिमान तन्त्र में बीच में यदि कोई डब्बा छूट जाये तो तुरन्त पता लग जाता है। अन्य तन्त्रों की गति बहुत कम होने के कारण किसी के छूट जाने का पता तुरन्त नहीं लग पाता है और जब तक पता चलता है, बहुत देर हो जाती है। देश के विकास की ट्रेन गति पकड़ रही है, एक समुचित ऑलराइट तन्त्र के अभाव में संभवतः हमें पता ही न चल पाये कि कौन उस ट्रेन में चढ़ पाया है कि नहीं। गरीबों के लिये न जाने कितनी योजनायें बनी हैं, कितना लाभ दूसरे सिरे तक पहुँच पाता है, मध्य कितना फूल रहा है, यह सब तब पता चलेगा जब एक ऑलराइट तन्त्र सुचारु रूप से अवस्थित होगा।

जिनका अपना स्वार्थ सधता है, वे कभी नहीं चाहेंगे कि इस तरह के तन्त्र विकसित हों। अव्यवस्था बनी रहने से उनका लाभ है, फिर भी बड़े देश की व्यवस्थायें सुचारू रूप से चलाते रहने के लिये ऑलराइट तन्त्रों का पुनरुत्थान आवश्यक है। अपने जीवन काल में ही मैनें न जाने कितनी सरकारी संस्थाओं को टूटते देखा है, जीआईसी स्कूल, सरकारी अस्पताल, राशन तन्त्र, सरकारी योजनायें, बीएसएनएल, सब की सब ढेर होती हुयी देखी हैं। काश नीतिनिर्माताओं और लाभन्वितों के सिरे किसी ऑलराइट तन्त्र से जुड़े होते तो ये बड़ी व्यवस्थायें न ढहतीं। आगे सिरे में बैठे नियन्ताओं को तो सदैव ही लगता है कि उन्होंने अभूतपूर्व योजना क्रियान्वित की है, उन्हें क्या ज्ञात कि कितने डब्बे बीच पटरियों में पड़े रह गये। दुष्यन्त कुमार के शब्दों में सूखी जाती नदियों का कारण मार्ग में कहीं ठहरा पानी होगा। काश गंगासागर गंगोत्री को बता पाता कि कितना गंगाजल उस तक पहुँच पाया है।

वर्तमान में बहुत कार्य हुआ है। आईटी, सोशल माडिया, आधार, मोबाइल, जनधन बैंक आदि न जाने कितने ऑलराइट तन्त्र और उनके अंग अपने अस्तित्व का पूर्ण लाभ व्यवस्था को दे रहे हैं। जन जन का संवाद, अपने सिरे के बारे में सब ठीक होने या न होने की सूचना दूसरे सिरे तक पहुँचा रहे हैं। इन सूचनाओं की आवृत्ति और पहुँच अभी उतनी नहीं है जितनी वांछित है। सरकार के द्वारा इस तरह की व्यवस्थाये और स्थापित हों और दूसरे छोर पर स्थित प्रत्येक सिरा ऑलराइट संकेत भेजे तब अपने देश के बड़े तन्त्र पूर्णतया सध पायेंगे।

12 comments:

  1. अत्यंत उपयोगी आलेख ।

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  2. बढ़िया लगा। आल राइट की व्वस्था हर विभाग में है। फर्क इतना कि बिना हरी झंडी मिले ट्रेन एक पग नहीं चलती, दूसरे विभाग एक्सिडेंट के बाद भी हरी झण्डी ले लेते हैं।

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  3. बढ़िया लगा। आल राइट की व्वस्था हर विभाग में है। फर्क इतना कि बिना हरी झंडी मिले ट्रेन एक पग नहीं चलती, दूसरे विभाग एक्सिडेंट के बाद भी हरी झण्डी ले लेते हैं।

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  4. अच्छा आलेख, परंतु रेल्वे के कुछ स्वार्थी अफ़सर ऑल राइट तंत्र में खेल करते रहते हैं. उदाहरण के लिए, भोपाल मंडल में रेल्वे स्टेशनों में लगे सुविधा पूर्ण, अल्फ़ा-न्यूमेरिक ट्रेन कोच डिस्प्ले सिस्टम को बदल कर घटिया और समस्या कारक न्यूमेरिक कोच डिस्प्ले सिस्टम लगाया गया, और जब यात्रियों ने कोई साल भर हल्ला मचाया तब वापस वही सुविधापूर्ण पुराना सिस्टम लगाया गया जिसमें करोड़ों का खेल हुआ.
    और, ये तो केवल एक उदाहरण है. ऐसे कई-कई उदाहरण नजरों में आते जाते रहते हैं :(
    ऐसे नॉन-ओके सिस्टम पर रोक या इन्हें पहचानने या इन्हें खोज कर समाप्त करने का भी कोई सिस्टम होना चाहिए.

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  5. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (20-06-2016) को "मौसम नैनीताल का" (चर्चा अंक-2379) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  6. यदि आल राइट व्यवस्था फूलप्रुफ हो जाये तो राम राज्य की कल्पना साकार हो उठेगी।

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  7. गहन एवं महत्वपूर्ण जानकारी ।

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  8. वाह उम्दा आलेख ..एक बड़े तंत्र का सूक्ष्म विश्लेषण और उसके माध्यम से सार्थक सन्देश शुक्रिया :)

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  9. ये तो रेलवे को देखकर ही लगता है कि सुचारू तंत्र को चलाने के लिए सतत निगरानी की जरूरत होती है। एक भी चेन ढिलाई बरते, तो समस्या आ जाती है। रेल में सुरक्षा को भी इसी प्राथमिकता के साथ देखा जाए तो लूटपाट की घटनाओं पर लगाम लग सकती है। वैसे रेल के साथ-साथ देश के विकास की गाड़ी का भी सटीक निरक्षिण किया है। बात से बात जुड़ती है और दूर तलक जाती है।

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  10. आप का पुनः गद्य में लिखना बहुत अच्छा लगा । आप का लेख ज्ञानवर्धक होता है । मुझे बेसब्री से इसकी प्रतीक्षा रहेगी ।

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