6.12.15

परिचय

अतुलित रूप सम्पदा तेरी,
मादकता मधु का निर्झर ।
नयनों में अप्रतिमाकर्षण,
चेहरे का सौन्दर्य प्रखर ।।१।। 

नयन तुम्हारे कान्ति-सरोवर,
चेहरे पर अभिराम ज्योत्सना ।
परिचय तेरा शब्द रहित है,
तुम पृथ्वी पर अमर-अंगना ।।२।।

मधुरस के इस महासिन्धु में,
मन नैया चुपचाप बढ़ रही ।
मेरी सृजना, चुपके चुपके,
तेरा यह आकार गढ़ रही ।।३।।

पर यथार्थ में मिली नहीं तुम,
स्वप्नों में आ जाती प्रतिदिन ।
राग सभी अनसुने हैं अभी,
जो आकर गा जाती हर दिन ।।४।।

ना जानूँ, तुम कौन स्वप्न में,
मनस पिपासा जगा रही हो ।
ना जाने क्यों आशाआें के,
पुष्प सुनहरे खिला रही हो ।।५।।

अनुभूतित सौन्दर्य अतुल है,
पर अन्तः उत्सुक अतीव है ।
मैं जीवन की प्रथम संगिनी,
में तेरी आकृति चाहूँगा ।।६।।


11 comments:

  1. छायावाद की याद दिलाती कविता।

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  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" मंगलवार 08 दिसम्बर 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  3. कुछ लोगों के लिए ये हिंदी का एक क्लिष्ट रूप हो सकता है. पर मेरे लिए मधुरतम है. 'नैया' शब्द थोड़ा सा सरल है नौका भी हो सकता था पर मेरी समझ नौका को रुखा और नैया को तुलनात्मक रूप से मधुर मानती है. बेहद मीठी है यह रचना. आपकी रचना की मिठास दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही है. :-)

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  4. जैसे मनस प्रयुक्त हुआ है, सुन्दर. अंत में अन्तः की जगह अन्तस सरलता और मिठास बढ़ा देगा........!!!!!
    ज्यादा बोल रहा हूँ ना ....!!!!!!
    :-P

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  5. बहुत ही सुन्‍दर।

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  6. बहुत सुन्दर रचना ....

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  7. Very Beautiful poem with saunrdrya bhav.

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  8. सुन्दर रचना
    www.ramcharitmanas.in

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  9. सुन्दर रचना
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  10. अति सुन्दर !!!

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