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1.1.14

सांस्थानिक समर्थन के उन्नत पक्ष

ब्लॉग के लिये एक आधारभूत ढाँचा तैयार करने और उसके प्रवाह को सुनिश्चित करने के बाद उसके संवर्धन के प्रयास आवश्यक होने चाहिये। ऐसा हो रहा है, पर प्रयास संस्थागत न होकर पूरी तरह से व्यक्तिगत हैं। कुछ ब्लॉगर जिनके अन्दर सहायता करने की प्रवृत्ति रही है, जिन्हें अपने प्रारम्भिक काल में सहायता मिली है, उनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति नवागुन्तकों को हर संभव सहायता पहुँचाने की रहती है। यदि यही प्रयास एक सांस्थानिक स्वरूप ले लें तो निश्चय ही ब्लॉग जगत में गुणात्मक परिवर्तन आ जायेंगे।

सामूहिकता और विकास
उत्साहवर्धक, मार्गदर्शक और व्यावसायिक उत्प्रेरक, इन तीन स्तरों को मैं सांस्थानिक समर्थन के उन्नत पक्ष कहता हूँ। उन्नत पक्ष इसलिये क्योंकि इनके होने से ब्लॉग की आयु बढ़ती है। ब्लॉगरों के पिछले दस वर्षों के अनुभव में एक तत्व सदा ही उपस्थित रहा है और उस तत्व ने उनके ब्लॉगिंग के कालखण्ड का निर्धारण किया है। सभी लोग उत्साह के साथ ब्लॉगिंग प्रारम्भ करते हैं, सबके अन्दर अभिव्यक्ति की स्वाभाविक चाह भी होती है, सब चाहते हैं कि पाठक उन्हें पढ़ें भी। प्रारम्भ सदा ही पूरी ऊर्जा के साथ होता है, किसी लम्बी दौड़ की तरह। जैसे जैसे आगे बढ़ते हैं, अपेक्षाओं को समुचित मान नहीं मिल पाता है। संवेदनशील ब्लॉगर इसे एक चुनौती के रूप में लेते हैं और अपने अनुभव का विस्तार करते हैं, विषयगत अध्ययन पर ध्यान देते हैं, अभिव्यक्ति को परिवर्धित करते हैं। कइयों के लिये यह संभव नहीं हो पाता है और तब ये तीन स्तर ब्लॉगिंग के लिये संजीवनी बन जाते हैं।

उत्साहवर्धक की आवश्यकता सबको होती है, शिखर तक पहुँचने में न जाने कितने हाथों का सहारा मिलता है। ब्लॉगजगत में टिप्पणियों को दिये अन्यथा महत्व को लेकर भले ही आलोचकों ने वक्र टिप्पणियाँ की हों, पर मेरे लिये उनका महत्व सदैव विशेष रहा है। प्रारम्भिक पोस्टों में विशेषकर एक एक टिप्पणियों को बड़े ध्यान से पढ़ता था और अभिव्यक्ति के स्तर में किस तरह और सुधार किया जा सकता है, यह जानने के लिये सदा ही लालायित रहता था। संभवतः यही कारण है कि अभी तक उन टिप्पणियों का ऋण कर्तव्य मानकर चुका रहा हूँ। किसी नवागन्तुक के लेख में छिपी भूलों को उजागर करने से कहीं अच्छा होता है उसमें किये गये प्रयास का उत्साहवर्धन करना। उत्साहवर्धन ब्लॉगिंग की अवधि को दुगना कर देता है। साहित्य और ब्लॉगिंग, दोनों में ही मैं भी अधिक अनुभवी नहीं हूँ पर निश्चय ही किसी के प्रयासों को समझना और उनकी प्रशंसा करने को एक मूलभूत कारण अवश्य मानता हूँ, जिसमें ब्लॉगिंग के विकास की अथाह संभावना छिपी है।

मार्गदर्शन उत्साहवर्धन से कहीं अधिक गहरा और व्यवस्थित कार्य है। जहाँ उत्साहवर्धन में किसी व्यक्ति की क्षमताओं का ज्ञान सतही रहता है, मार्गदर्शन में क्षमताओं को सही सही समझना होता है। मार्गदर्शन बड़ा ही व्यक्तिगत कार्य है और वह मार्गदर्शक का समय और ऊर्जा माँगता है। उत्साहवर्धन पीछे से ढकेलने जैसा है, मार्गदर्शन ऊँगली पकड़ कर चलने सा। लिखते रहने की पुकार उत्साहवर्धन है, कुछ विशेष लिखने का परामर्श देना मार्गदर्शन है। उत्साहवर्धन में किसी क्षमता का पूरा दोहन किया जाता है, मार्गदर्शन में क्षमताओं को विशिष्ट व उत्कृष्ट किया जाता है। सांस्थानिक समर्थन का एक अतिविशिष्ट स्तर है, मार्गदर्शन। मार्गदर्शन की क्षमता न केवल विषय के अनुभव से आती है, वरन उसके लिये सामने वाले के व्यक्तित्व का समुचित आकलन भी आवश्यक है।

उत्साहवर्धन और मार्गदर्शन एक स्थान तक ही ले जा पाते हैं, उसके आगे का पंथ लेखक व ब्लॉगर को स्वयं ही नापना होता है। आगे की खोज नितान्त एकान्त है, उत्कृष्टता के सोपान किसी की प्रतिलिपि बनने में नहीं वरन स्वयं को सत्यता से पूर्ण स्थापित करने में है। पर इस राह में एक बाधा है। जब किसी को अपने श्रम और लगन का समुचित मोल नहीं मिलता है, तब उससे लगने लगता है कि उसके प्रयास व्यर्थ ही जा रहे हैं। पाठक आपको एक प्रतिष्ठित लेखक के रूप में जानने लगें, यह निश्चय ही एक महान उपलब्धि है, पर उपलब्धि का वह भाव शुष्क न रह जाये, इसके लिये आवश्यक है कि आपका कार्य आपकी जीविका में आपका हाथ बटाये।

सुदृढ़ और सक्षम
ब्लॉग लेखन में व्यवसाय की संभावना तो दिखी है, पर बहुत अधिक नहीं। बाजारवाद तो यह कहता है कि माँग यदि अधिक हो तो आपूर्ति को सही मूल्य मिलता है। अच्छा साहित्य सब पढ़ना चाहते हैं, अच्छी पुस्तकों के लिये लोग धनव्यय को सम्मान और मानसिक विकास का अंग मानते हैं। परिस्थितियाँ अनुकूल होने पर भी लेखकों को बाजार के अनुरूप अर्थप्राप्ति नहीं हो पा रही है। सांस्थानिक समर्थन का सर्वाधिक प्रभावी कार्य उस व्यावसायिक उत्प्रेरक के रूप में कार्य करना है, जिससे ब्लॉग स्वतः ही गतिमान बना रहे, सदा के लिये। किन्तु जब तक उस स्थिति तक हम नहीं पहुँच जाते हैं, सांस्थानिक समर्थन को बने रहना होगा। यह कालखण्ड एक दशक तक भी हो सकता है, पर उस पथ पर चलते चलते जब हम स्वावलम्बित हो जायेंगे, हमें हिन्दी की सुदृढ़ स्थिति पर गर्व होगा।

व्यावसायिक उत्प्रेरण ही सांस्थानिक समर्थन के महत प्रयासों का तार्किक निष्कर्ष हो सकता है, तब तक प्रयास की आवश्यकता बनी रहेगी। माता पिता अपने बच्चों को तब तक समर्थन देते रहते हैं, जब तक वे आर्थिक रूप से सक्षम न हो जायें, अपने पैरों पर स्वयं न खड़े हो जायें, अपनी संततियों को समर्थन देने की स्थिति में न पहुँच जायें। हिन्दी के जो पक्ष सक्षम होते जायें, उन्हें विकसित होने के लिये छोड़ दिया जाये। जिन पक्षों को आवश्कता हो, उन पर ध्यान दिया जाये, क्रमवार, एक के बाद एक। अभी जो भी प्रयास हो रहे हैं, उनकी तुलना मैं उस बच्चे से करूँगा जो वयस्क होने का अभिनय कर रहा हो। अभिनय होने तक तो विश्वास बना रहता है, पर जब परिवेश का बोध होता है, यथास्थिति समझ में आ जाती है। 

ब्लॉग लेखन में अधिकतम कितना धन है, इसकी गणना बहुत अधिक कठिन नहीं है। कितनी संभावना है, यह भी कठिन प्रश्न नहीं है। साहित्य के प्रति लगाव नैसर्गिक होता है। सामाजिक ढाँचे में संवाद की प्रमुखता रहती है, मन के भावों को व्यक्त करने में जितना उत्साह होता है, उतना ही उत्साह औरों के भावों को समझने में भी रहता है। हम यदि साहित्य की परम्परागत परिधि में बने रहे तो अपनी संभावनायें सीमित कर बैठेगें। ज्ञान के हर संभावित क्षेत्र में ब्लॉग की अभिव्यक्ति ले जाने के क्रम में न केवल ब्लॉग के लिये व्यावसायिकता के सूत्र मिलने लगेंगे, वरन साहित्य को भी अपना विस्तार दिखने लगेगा। सामान्य जन से जुड़ी विज्ञान की बातें साहित्य का विषय क्यों नहीं हो सकती, इतिहास से समझी गयी शासकों की भूलें साहित्य का अंग क्यों नहीं बन सकतीं। जब हम ज्ञान को विभागों में बाटने लगते हैं, हम यह मान बैठते हैं कि उनमें परस्पर कोई संबंध है ही नहीं, जबकि हमारे मस्तिष्क में ज्ञान का एकीकृत स्वरूप ही रहता है। उसी रूप में सृजन हो, उसी रूप में वह ग्रहण हो, उसी रूप में संवाद हो, वही साहित्य हो।

ब्लॉग को यदि विषयगत विस्तार मिलेगा तो व्यावसायिक संभावनायें स्वतः ही सिद्ध हो जायेंगी। ब्लॉग में अभी जितना भी धन है वह प्रचार के रूप में है, पर ब्लॉगतन्त्र में प्रचार कितना धन बटोर पायेगा, यह एक यक्ष प्रश्न है। वह धन क्या सांस्थानिक समर्थन के लिये या स्वावलम्बन के लिये पर्याप्त होगा, यह भी विचारणीय है। जब प्रचार केन्द्र में हो तो गुणवत्ता से अधिक संख्या महत्वपूर्ण हो जाती है। प्रचार पर पूर्णतया निर्भर रहने से गुणवत्ता से कैसे समझौते करने होंगे? केन्द्रबिन्दु तब सृजन न होकर पाठकों की रुचि हो जायेगी, बाजारवाद तब गुणवत्ता को प्रभावित करने लगेगा। इन स्थितियों में व्यावसायिक उत्प्रेरक का स्वरूप ऐसा हो जो न केवल आत्मनिर्भर हो, वरन उसकी जड़ें साहित्य की धरती में ही हों, न कि प्रचार के अस्थिर आसमान में।

प्रश्न अनुत्तरित हैं, पर आशान्वित हैं, हिन्दी के सुधीजन और प्रेमीजन उत्तर लेकर अवश्य आयेंगे।

चित्र साभार - www.chumans.comwww.clinicalnutritioncenter.com

28.12.13

सांस्थानिक समर्थन का अर्थ

पिछले दस वर्ष के इतिहास और भविष्य की अपेक्षाओं के संदर्भ में देखता हूँ तो मुझे सांस्थानिक समर्थन का अर्थ ९ स्पष्ट कार्यों या स्तरों में समझ आता है। उसमे प्रथम ६ स्थूल हैं और भिन्न भिन्न रूपों में उपस्थित हैं, पर वे आधार कितने दृढ़ हैं और उन पर कितना निर्भर रहा जा सकता है, यह एक यक्ष प्रश्न है। यदि हिन्दी ब्लॉग के लिये एक व्यापक आधार बनाना है तो हर स्तर को आत्मनिर्भर, स्वतन्त्र और सुदृढ़ बनाना होगा। अन्तिम ३ विरल हैं, ब्लॉग जगत में यत्र तत्र छिटके भी हैं, पर इतने आवश्यक हैं कि प्रत्येक ब्लॉगर उनको चाहता है।  

प्रथम ६ हैं, आधार(प्लेटफ़ार्म), प्रेषक(फीडबर्नर), फीडरीडर, चर्चाकार, संकलक, संग्रहक। अन्तिम ३ हैं, उत्साहवर्धक, मार्गदर्शक, व्यावसायिक उत्प्रेरक। चर्चा के लिये प्रत्येक बिन्दु पर प्रकाश डालना आवश्यक है। हो सकता है कि कोई पक्ष सहज या सरल लगे, पर समग्रता की दृष्टि से उन पर भी विहंगम दृष्टि आवश्यक है।

प्रत्येक आधार है आवश्यक
पहला है आधार या प्लेटफार्म। ब्लॉगर या वर्डप्रेस ऐसे ही दो आधार हैं। उनकी निशुल्क सेवाओं का निश्चय ही बहुत महत्व रहा है और यदि वे न होतीं तो ब्लॉग जगत अपने वर्तमान स्वरूप में न होता। अधिकांश ब्लॉग अभी भी निशुल्क हैं, उन पर उपयोगकर्ताओं को अभिव्यक्ति का अधिकार है। उन पर लिखा हुआ साहित्य और प्रचार की दृष्टि से उनका व्यावसायिक उपयोग सेवा देने वाली कम्पनियों के हाथ में ही है। भला सोचिये, कोई आप पर धन व्यय कर रहा है, कोई न कोई निहितार्थ तो होगा ही। आपका माध्यम आपके नियन्त्रण में है ही नहीं। भगवान न करे, कभी कोई कुदृष्टि हो गयी औऱ आपकी वर्षों की साधना स्वाहा। यह प्रथम पग है और बिना इस पग के कहीं पर भी छलांग लगाना अन्धश्रद्धा है। ऐसा नहीं है कि इस प्लेटफार्म का निर्माण करने में बहुत धन व्यय होगा। थोड़ा बहुत तो निश्चय ही होगा, साइट, सर्वर, सुरक्षा आदि में, पर सांस्थानिक समर्थन के लिये वह अत्यावश्यक भी है।

एक बार लोगों ने अपना ब्लॉग बना लिया, तब प्रेषक या फीडबर्नर का कार्य प्रारम्भ होता है। जब कभी भी आप अपने ब्लॉग पर कुछ नया लिखेंगे, उसे फीडबर्नर तुरन्त ही जान लेता है। ऐसा वह उस प्रक्रिया के रूप में करता है जिसमें सारे ब्लॉगों की स्थिति फीडबर्नर सतत जाँचता रहता हैं और पिछली स्थिति की तुलना में हुये बदलाव को एकत्र करता रहता है। इन कम्पनियों का धन कमाने का अपना कोई साधन नहीं होता है क्योंकि इनका कार्य परोक्ष में चलता है और इन्हें प्रचार का अवसर नहीं मिल पाता है। प्लेटफार्म या फीडरीडर यह कार्य भी करते रहते हैं क्योंकि ऐसा करने से उन तक भी पाठकों का प्रवाह बना रहता है और प्रचार से  होनी वाली आय के लिये प्रचार मिलता है।

एक बार प्लेटफार्म या ब्लॉग पर लिखी लेखक की बात फीडबर्नर की सहायता से पाठक तक पहुँचा दी जाती है तो पाठक को भी अपनी रुचि के विभिन्न ब्लॉगों को सुविधानुसार पढ़ने के लिये एक जगह एकत्र करने की आवश्यकता होती है। यह कार्य फीडरीडर करता है। कुछ महीने पहले जब गूगल रीडर बन्द हुआ था तो पूरी की पूरी ब्लॉग व्यवस्था पर बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा हो गया था। लगा था कि अब कैसे ब्लॉग पढ़े जा सकेंगे, बिना पाठक कैसे लेखकों में उतना ही उत्साह रह पायेगा? वह तो भला हो फीडली का कि हम लगभग पहले की तरह ही लेखन व पठन कर पा रहे हैं। वैकल्पिक व्यवस्था के अन्तर्गत फीडबर्नर नयी पोस्टों की जानकारी ईमेल के माध्यम से भी प्रेषित कर सकता है, पर पाठकों को ईमेल में सैकड़ों अनपढ़े लेखों को रखने की तुलना में एक अलग व्यवस्था भाती है। फीडरीडर में भी आत्मनिर्भरता सांस्थानिक समर्थन का तीसरा स्तर है।

एक बार लेखक और पाठक में संपर्क स्थापित हो जाता है तो लिखने और पढ़ने का प्रवाह बना रहता है। तब लेखक को अधिक पाठक मिले, पाठक को अधिक लेखक मिले, ये निष्कर्ष सहज ही हैैं, ब्लॉग के विकास और विस्तार के लिये। इस स्तर पर चर्चाकार और चर्चामंच अपना कार्य करते हैं। सौभाग्य से हिन्दी ब्लॉग में यह कार्य अच्छे ढंग से चल रहा है। सुधीजन न केवल अच्छे ब्लॉग लिखते और पढ़ते हैं, वरन उन्हें सबके सामने लाते हैं और प्रेरित करते हैं। आज भी चर्चाकारों के माध्यम से हर दिन कुछ न कुछ नये और स्तरीय ब्लॉगों से जुड़ता रहता हूँ और उनको पढ़ता रहता हूँ। यह एक साझा मंच होता है जहाँ पर ब्लॉग नित विकसित होता है। यह अभी तक व्यक्तिगत स्तर पर ही हो रहा है, इस प्रक्रिया को भी सांस्थानिक समर्थन की आवश्यकता है और वह भी व्यापकता में। यह एक पूर्णकालिक कार्य है, ढेर सारे ब्लॉगों को पढ़ना और उनमें से स्तरीय चुनना वर्षों के साहित्यिक अनुभव से ही आता है। अनुभवी चर्चाकारों की उपस्थिति हिन्दी ब्लॉग व साहित्य के लिये शुभ लक्षण है, यह लक्षण और भी घनीभूत हो और साहित्य का स्थायी अंग हो जाये। 

अगला स्तर है संकलक का, चर्चाकारों के सहित हर पाठक को ऐसा मंच चाहिये जहाँ पर हिन्दी ब्लॉग जगत की प्रत्येक पोस्ट के बारे में जाना जा सके। नये लेखकों के लिये यह मंच प्रारम्भिक पड़ाव हो। अपना ब्लॉग बनाने के बाद वे इसमें स्वयं को पंजीकृत कर सकते हैं जिससे वह ब्लॉग पढ़ने वाले सारे पाठकों की दृष्टि में आ सकें। यही नहीं, संकलकों में इस बात की भी जानकारी हो कि कोई पोस्ट कितनी बार पढ़ी गयी, हर बार उसे कितनी देर पढ़ा गया, लेखन के कितने वर्षों के बाद भी उसे पढ़ा जा रहा है। इस तरह के मानकों से कालान्तर में पाठकों को अच्छा साहित्य ढूढ़ने में सहायता मिलेगी। यही नहीं संकलकों में खोज की उन्नत व्यवस्था हो, जिससे किसी भी विषय पर क्या लिखा जा रहा है, कितना लिखा जा रहा है, सब का सब सहज रूप से सामने आ जाये। संकलकों के माध्यम से न केवल नये लेखकों को सहायता मिलेगी वरन हर स्तर पर पाठकों को ब्लॉग जगत को समग्रता से देखने का अवसर भी मिलेगा।

अगला स्तर संग्रहक का है। यह एक व्यापक कार्य है, इस स्तर में अब तब हिन्दी साहित्य में लिखा हुया एक एक शब्द संग्रहित हो। प्रश्न यह उठ सकता है कि क्या संग्रहणीय है, क्या नहीं? इस पर अधिक चर्चा न कर इतिहास की दृष्टि से अधिकाधिक संग्रहित किया जाये। संभव है जो आज संग्रहण योग्य न लगे, हो सकता है वह भविष्य में सर्वाधिक पढ़ा जाये। साहित्य का इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा है औरर उनसे सीखने के क्रम में सबकुछ संग्रहित किया जाये। डिजिटल रूप में संग्रहण सरल भी है और अधिक समय तक सुरक्षित भी रखा जा सकता है।
   
इस समय देखा जाये तो प्रत्येक स्तर के लिये एक अलग व्यवस्था है। कहीं पर भी कोई क्रम टूटा तो ब्लॉग आंशिक या पूर्ण रूप से प्रभावित हो जायेंगे। कहीं पर भी लगा तनिक सा भी झटका हमें पूरी तरह से हिला जाता है। आवश्यकता इस बात की है कि ये सारे स्तर एकीकृत हों और हमारे नियन्त्रण में हों। इस परिप्रेक्ष्य में सांस्थानिक समर्थन से मेरा आशय ब्लॉग की व्यवस्था को न केवल और अधिक सुविधाजनक बनाना है, वरन उसे अनिश्चितता से पूर्णतया बाहर लाना है।

इन सारे स्तरों को स्कीकृत करने में कोई समस्या नहीं होनी चाहिये। हमारा एक ही वेबपेज हो, उसी में संबंधित सारे ब्लॉग हों। उसी वेबपेज में हमारी रुचियों के अनुसार फीडरीडर भी हो। फीड भेजे जाने की प्रक्रिया पूर्णतया आन्तरिक हों। संकलक भी उसी पृष्ठ से ही दिख जाये, किसी विषय से संबंधित सारी पठनीय पोस्टें हमारे सम्मुख हों। चर्चा के लिये हम उसी पेज से उन पर अपनी संस्तुति देकर चर्चा के लिये प्रेषित कर सकते हों। एक व्यवस्था के अनुसार विषयानुसार सर्वाधिक संस्तुति की गयी पोस्टें स्वतः ही उसी क्रम में चर्चामंचों में दिखायी पड़ें। इस प्रकार ब्लॉग के लिये एक स्थान पर ही जाना पड़ेगा और वहीं से सारे कार्य सम्पादित हो जाया करेंगे, बिना किसी घर्षण के। 

भारत में न प्रतिभा की कमी है, न धन की और न ही संसाधनों की। हिन्दी के प्रति प्रेम भी हमारा है और उत्तरदायित्व भी हमको ही लेना होगा। स्वयं सक्षम होते हुये भी किसी अन्य पर आश्रित बने रहना और आधार हटने पर सामूहिक विलाप करना हम जैसे प्रतिभावान समाज को शोभा नहीं देता है। हम ब्लॉग व्यवस्था के लिये किसी से भी अच्छा मंच तैयार कर सकते हैं, जो भी सांस्थानिक समर्थन करें, उसे गुणवत्ता और क्रियाशीलता की दृष्टि से उत्कृष्ट बना सकते हैं। पहल तो करनी ही होगी, कहीं ऐसा न हो कि अपेक्षायें हमसे कहीं आगे निकल जायें और हम योगदान के स्थान पर अश्रुदान करने में लगे रहें।

अन्तिम ३ स्तरों पर चर्चा अगली पोस्ट में।

चित्र साभार - www.oxy.edu

25.12.13

हिन्दी ब्लॉग और सांस्थानिक समर्थन

आज से दस वर्ष पहले आलोकजी ने पहला हिन्दी ब्लॉग नौ दो ग्यारह बनाया था। तब संभवतः किसी को अनुमान नहीं होगा कि डायरीनुमा ढाँचे में स्वयं को इण्टरनेट पर व्यक्त करने वाला यह माध्यम इतना व्यापक, सशक्त और लोकप्रिय होकर उभरेगा। अभावों से प्रारम्भ हुयी यात्रा संभावनाओं का स्रोत बन जायेगी, यह किसने सोचा था? हिन्दी ब्लॉग न केवल पल्लवित हो रहा है, वरन लाखों रचनाकारों के लिये एक आधारभूत मंच तैयार कर रहा है, जिस पर भविष्य के साहित्यिक विस्तार मंचित होंगे, भाषायी आकार संचित होंगे। अंग्रेजी की तुलना में देखा जाये तो हिन्दी ब्लॉगिंग अभी भी विस्तारशील है, पर उसका कारण हिन्दी रचनाकारों में उत्साह व प्रतिभा की कमी नहीं है। जैसे जैसे कम्प्यूटर और इण्टरनेट हिन्दी जनमानस को उपलब्ध होता जायेगा, हिन्दी ब्लॉगिंग का आकार बढ़ता जायेगा।

संख्या के पश्चात गुणवत्ता की सुध लेनी होती है। यह सत्य है कि गुणवत्ता के लिये प्रतिभा के साथ सतत श्रम की आवश्यकता होती है, श्रेष्ठ अभिव्यक्तियाँ आने में समय लेती हैं। इसके लिये आवश्यक है कि लोग ब्लॉगिंग में बने रहें। पहले वर्ष के बाद ही लगभग १५ प्रतिशत लोग ब्लॉगिंग छोड़ देते हैं, जो बने रहते हैं उन्हें रस आने लगता है। ब्लॉगिंग में रोचकता बनाये रखने के लिये सृजनात्मकता भी चाहिये और विषयात्मक गहराई भी, यही दो पक्ष गुणवत्ता के वाहक बनते हैं। गुणवत्ता से भरी अभिव्यक्तियाँ न केवल स्वयं को संतुष्ट करती हैं, वरन पाठकों को भी वांछित आहार देती हैं, एक बार नहीं, बार बार। मुझे आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता तब होती है जब आज से चार वर्ष पूर्व लिखे गये किसी लेख पर पाठक की टिप्पणी आ जाती है। यहीं ब्लॉगिंग का सशक्त पक्ष है, यही ब्लॉगिंग का सौन्दर्य भी है, नहीं तो कौन चार वर्ष पुराने समाचार पत्रों या पत्रिकाओं को पढ़ता है, और न केवल पढ़ता है वरन लेखक को अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराता है।
 
कुछ ब्लॉगरों को जब मैं कहता हूँ कि उनकी कोई पोस्ट संग्रहणीय हैं तो वे बहुधा सकुचा जाते हैं। उन्हें लगता है कि स्वान्तः सुखाय के लिये लिखी गयी पोस्ट को इतना मान क्यों? विनम्रता एक अच्छा गुण है पर वह साहित्यिक प्रभातों को प्रकाश फैलाने देने में सकुचाने क्यों लगता है। प्रतिभा अपना आकार, प्रभावक्षेत्र और कालक्षेत्र स्वयं निर्धारित करती है, रचनाकार को उसे विनम्र भाव से ही फैलने देना चाहिये। स्वान्तः सुखाय में यदि तुलसीदास भी सकुचाये रहते तो रामचरितमानस का अमृत कोटि कोटि कण्ठों में कैसे पहुँचता? हमने जो भी साहित्य पढ़ा है, वह इसलिये संभव हो सका कि हमारे पूर्वजों ने केवल संग्रहणीय लिखा वरन उसे आगामी पीढ़ियों के लिये संग्रहित रखा। हमारा भी दायित्व बनता है कि हम भी आगामी पीढ़ियों के लिये पढ़ी जा सकने योग्य गुणवत्ता बनाये और साथ ही साथ यह प्रयास भी करें कि ज्ञानसंग्रह यथारूप बना रहे।

स्वप्न बड़े हैं, अड़े खड़े हैं
कुछ लोगों को संशय हो सकता है कि जो भी हिन्दी ब्लॉगों में लिखा जा रहा है, वह स्तरीय नहीं है। माना जा सकता है कि स्थापित मानकों पर पहुँचने के लिये वर्षों लग जायेंगे। यह भी माना जा सकता है कि ब्लॉग के माध्यम से सबको लेखन का अधिकार मिल जाने से कोई भी अपने मन की कह सकता है, बिना स्तर पर ध्यान दिये। किन्तु यह प्रक्रिया तो सदा से होती आयी है। जब ब्लॉग नहीं भी होते थे तब भी ढेरों ऐसी पुस्तकें प्रकाशित होती थीं जिन्हें लेखक के अतिरिक्त कोई पढ़ता भी नहीं था। कोई पुस्तक पठनीय है या नहीं, इसके पीछे अनुभवी संपादकों का संचित ज्ञान और विवेकपूर्ण निर्णय रहा करते थे। पुस्तकालय में शोभायमान और अपना एकान्तवास झेल रही ऐसी पुस्तकों से कहीं अधिक व्यावहारिक है ब्लॉग में व्यक्त किसी नवल किशोर का प्रयास, जिसके माध्यम से वह शब्दों में स्वयं को ढूँढता है।

जैसा भी हो, जो भी है, उसी स्तर के आगे सोचना प्रारम्भ करना है और प्रवाह की मात्रा और गति बनाये रखनी है। आने वाले दशकों में लोग आश्चर्य करेंगे कि किस तरह से हिन्दी ब्लॉगिंग ने लाखों की संख्या में साहित्यकारों का निर्माण किया है, किस तरह से हिन्दी पढ़ने वालों की संख्या बढ़ायी है, किस प्रकार से लेखन ली गुणवत्ता बढ़ाने में सहयोग दिया है और किस प्रकार से साहित्योत्तर अन्यान्य विषयों को हिन्दी से जोड़ा है। यदि इस स्वप्न को साकार करने की इच्छा को फलीभूत होते देखना है तो हमें निकट भविष्य की कम, दूरस्थ भविष्य की संरचना सजानी होगी। दूरस्थ भविष्य, जिसमें लाखों की संख्या में साहित्यकार होंगे, करोड़ों की संख्या में पाठक होंगे, सैकड़ों की संख्या में विषय होंगे, विषयवस्तु इतनी स्तरीय कि उन पर शोधकार्य किया जा सके। यदि वह दूरस्थ भविष्य पाना है तो ब्लॉग के माध्यम को न केवल स्वीकारना होगा वरन उसके हर पक्ष को सशक्त करना होगा। यह महतकर्म वैयक्तिक स्तर पर संभव नहीं है, इसमें संस्थागत प्रयास लगेंगे, और इन प्रयासों को कोई नाम देना हो तो उसे सांस्थानिक समर्थन कहा जायेगा। वर्धा में भी सांस्थानिक समर्थन पर प्रारम्भिक चर्चा हुयी थी।

हिन्दी के साथ दुर्भाग्य यह रहा है कि उसे प्रेम तो व्यापक मिला है, सदा मिला है, भावनात्मक मिला है। किन्तु जो ढाँचा विस्तार और विकास के लिये तैयार होना था, उसे यह मान कर प्रमुखता नहीं दी गयी कि जब इतने बोलने वाले हैं तो स्वतः ही यह भाषा विकसित हो चलेगी। ऐसा पर है नहीं, यदि ऐसा होता तो दशा चिन्तनीय न होती। मेरा यह स्थिर विचार है कि बिना सांस्थानिक ढाँचे के हिन्दी अपने सुदृढ़ व सुगढ़ आकार में नहीं आ सकती है। पारम्परिक ढाँचे पारम्परिक माध्यमों के लिये तो ठीक थे पर ब्लॉग के प्रवाह को सम्हालने के लिये एक विशेष और सुव्यवस्थित ढाँचा चाहिये, एक ढाँचा जो कई दिशाओं से आने वाले महत प्रवाह को अपने में समेट सके।

शत द्वार हमारे घर में हों
हिन्दी ब्लॉग का सौभाग्य यह भी है कि इसमें न जाने कितनी दिशाओं से लोग आ रहे हैं। अभिव्यक्ति की क्षमता हर ओर छिटकी है, यही नहीं पाठक भी नये विषयों को पढ़ना चाहता है, अपना ज्ञानवर्धन विभिन्न विमाओं में ले जाना चाहता है। सोचिये कितना ही अच्छा होगा कि कोई वैज्ञानिक अपने विषय की विशेष विमा ब्लॉगिंग के माध्यम से व्यक्त करेगा, कितना ही अच्छा होगा कि कोई खिलाड़ी, कोई घुमक्कड़, कोई प्रशासक, कोई संगीतज्ञ ब्लॉग के माध्यम का आधार लेकर पाठक के लिये नयापन लेकर आयेगा। यही नहीं ब्लॉगिंग सीखने का भी माध्यम बनकर उभर रहा है। लोगों का इस प्रकार जुटना सबके लिये लाभप्रद रहेगा।   

हमें न केवल नये विषयों को समाहित करना है, वरन उनको विस्तारित और गुणवत्तापूर्ण करने के लिये भी करने के लिये प्रेरित करना है। केवल साहित्य तक ही केन्द्रित न रह जाये हिन्दी का विस्तार, ज्ञान के सभी नये क्षेत्रों को समझने और व्यक्त करने की क्षमता हो हिन्दी में। इसके लिये ब्लॉग सा माध्यम सहज ही मिला जा रहा हो तो उसे छोड़ना नहीं चाहिये, वरन त्वरित अपनाना चाहिये।

हमने जिस स्तर पर सफलता को पूजा है, उसे जितना मान दिया है, उसका शतांश भी यदि संघर्ष और असफलता के ऊपर  खपाया होता तो हमारे पास प्रतिभाओं का समुद्र होता। सांस्थानिक समर्थन न केवल सफलता को उभारेगी वरन संघर्ष को सहलायेगी और असफलता को पुनः उठ खड़ा होने के लिये प्रेरित भी करेगी। हमें सफल तो दिखते हैं पर असफल नहीं। यह उपक्रम सफल की चर्चा का न होकर उस असफलता के विश्लेषण का हो जिसके माध्यम से लाखों को जोड़ा जा सके।

कभी कभी सांस्थानिक समर्थन के नाम पर बड़े और सक्षम संस्थान एक लाठी का सहारा टिका कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं। इस बात में संशय न हो कि प्रभाव प्रयास से लेशमात्र भी अधिक नहीं होगा। व्यापक प्रभाव की अपेक्षा है तो प्रयास भी वृहद हों। ऐसा नहीं है कि कोई आधार ही उपस्थित नहीं है, पर जो है वह निश्चय ही अपर्याप्त और अस्थिर है।

आने वाली कड़ियों में इस बात की चर्चा करेंगे कि सांस्थानिक समर्थन का आकार, आधार और रूपरेखा क्या हो। यह विषय हम सबको न केवल प्रिय है वरन हमारी ब्लॉगिंग के भविष्य की रीढ़ भी है। चलें, अपनी राह समझने के क्रम में थोड़ा और चलें।