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16.3.11

डायरी के कार्य

आज एक बड़े ही व्यस्त और व्यवस्थित मित्र की डायरी देखने को मिली, व्यक्तिगत नहीं, प्रशासनिक। व्यवस्थित इतने कि हर कार्य अपनी डायरी में लिख लेते हैं। उनकी काली जिल्द वाली भरकम डायरी को गहनता से देखें तो पता चल जायेगा कि किस दिन कितने कार्य करने के लिये उन्होंने सोचा था, कितने नये कार्य और आये, किस तात्कालिक कार्य ने दिन भर का सारा समय व्यर्थ कर दिया और अन्ततः कितने कार्य हो पाये। किस पर समय निवेश हुआ और तत्पश्चात क्या शेष रहा। एक साथ कार्य करने के कारण मुझे उन कार्यों के संदर्भों को समझने के लिये विशेष प्रयास नहीं करना पड़ा, इस तथ्य ने पूरे अवलोकन को और भी रोचक बना दिया।

कुछ कार्य उसी दिन लिखे गये और हो गये, कुछ भिन्न तिथियों में उपस्थित पाये गये, उन कार्य को कई कई बार लिखा गया। एक या दो कार्य बहुत ही बड़े थे, कुछ माह तक चिपके रहे। कुछ कार्य किसी दिशा विशेष से प्रारम्भ होकर नदी के प्रवाह में कहीं दूर जाकर लगे, हर कुछ दिनों बाद उनका स्वरूप बदलता गया, पर अन्ततः हो गये। एक कार्य होने से उससे सम्बन्धित दूसरे कार्य निकल आये, श्रंखला इतनी रोचक थी कि उस पर प्रबन्धन का एक शोधपत्र तो लिखा ही जा सकता है।

बड़ा अच्छा होता कि एक नियत कार्य रहता हम सबका तो ऐसे न जाने कितने खाते लिखे जाने से बच जाते। हमारे मित्रजी के भाग्य में भला वह सुख कहाँ? उसी डायरी में बीच बीच में कुछ पारिवारिक कार्य भी थे, राशन इत्यादि ले आने के, अब पारिवारिक कार्यों के लिये एक और डायरी तो नहीं रखी जा सकती है। उन आवश्यक विवशताओं पर ध्यान न देकर हमने उस विषय को महिमामण्डित होने से बचा लिया।

स्मृति पर यदि अधिक विश्वास होता तो डायरी की आवश्कता न पड़ती, पर बहुधा कार्यों और निर्देशों की बहुतायत को सम्हालना हमारे बस में नहीं होता है। जिनका जीवन कार्यवृत्त जितना फैलता जाता है, उनके लिये कार्यों को लिख लेना उतना ही आवश्यक हो जाता है। नगरीय जीवन में ग्रामीण जीवन से अधिक जटिलता होती है, हमें तो सूची न दी जाये तो मॉल से सौंफ की जगह जीरा व जीरा की जगह अजवायन घर आ जायेगी।

दिन भर के न हुये कार्यों को अगले पृष्ठ पर तो उतारना ही होगा, अब यदि इतनी बार किसी कार्य को लिखें तो वैसे ही स्मृति में बना रहेगा वह कार्य। हर प्रभात में एक नयी सूची कार्यों की, हर रात में न पूरे हो पाये कार्यों की उदासी और कारण व कारक पर क्षोभ, सफलता का समुचित श्रेय भी। यदि कार्य कुछ बढ़ता है तो हम और उत्साहित होते हैं उसे अगले दिन सर्वप्रथम करने के लिये। बड़े कार्यों को मान मिलता है, समय व ध्यान भी अधिक मिलता है।

परिस्थितियाँ किसी कार्य को जीवित रखती हैं, कर्म उस कार्य में गति बनाये रखता है। काली डायरी में न जाने कितने कार्यों का उद्गम, विस्तार व अन्त था। कितने ही कार्य परिचित हो जाते हैं, उनका जीवन काल लम्बा जो होता है।

इसके पहले कि कार्य मुझसे बाते करने लगते, मैंने डायरी वापस कर दी, कार्यों की यह यात्रा, पृष्ठ दर पृष्ठ चलती ही रहेगी।

हम सब भी किसी कार्य की भाँति ही ईश्वर की डायरी में विद्यमान है, हमारे निरर्थक होने का क्षोभ तो उसको भी होता होगा, नित्य ही वह हमें पिछले दिन के पृष्ठ से उठाकर नये पर रख देता है, बिना किसी गति के, बस जड़वत।

क्या हम जैसे थे, वैसे ही उठाकर रख दिये गये हैं, अगले दिन के लिये? क्या हम कुछ विकसित हुये उस दिन? हमें ढोने की पीड़ा प्रकृति को भी होती होगी।

अगले पृष्ठ पर उत्साह के साथ चलें, प्रगति के साथ चलें, सार्थकता के साथ चलें, डायरी को भी प्रसन्नता दें।