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10.11.10

शिवसमुद्रम्

कावेरी को सांस्कृतिक महत्व, प्राकृतिक सौंदर्य और जीवनदायिनी जलस्रोत के रूप में तो सब जानते हैं पर 1902 में इस पर बने जलविद्युत संयन्त्र ने भारत में सर्वप्रथम किसी नगर में विद्युत पहुँचायी, यह तथ्य संभवतः बहुतों को ज्ञात न हो। बंगलोर प्रथम नगर था जहाँ पर 1906 में ही विद्युत पहुँच गयी थी।

बंगलोर से 130 और मैसूर से 65 किमी दूर, देश का दूसरा और विश्व का सोलवाँ सर्वाधिक ऊँचा जलप्रपात, कर्नाटक के माण्ड्या नगर में है। वर्षा ऋतु में इसके विकराल रूप का दर्शन, प्रकृति की अपार शक्ति में आपकी आस्था को बढ़ा जायेगा, हर क्षण निर्बाध। नास्तिकों को यदि अपना दर्शन संयत रखना है तो कृपया इसका दर्शन न करें। यात्रा की थकान, प्रपात की जलफुहारों के साथ हवा में विलीन हो जाती है। विज्ञान और प्रकृति के स्वरों को भिन्न रागों में सुनाने और समझने वालों को यह स्थान भिन्न भिन्न कारणों से आकर्षित करेगा किन्तु समग्रता के उपासकों के लिये यह स्थान एक सुमधुर लयबद्ध संगीत सुनाता है।


वहाँ पहुँच कर निर्णय लिया गया कि सर्वप्रथम जलविद्युत संयन्त्र देखा जाये। हम सब ऊँचाई पर थे और संयन्त्र पहाड़ के नीचे। जाने के लिये कोई लिफ्ट नहीं, बस रेलों पर रखी एक ट्रॉली, लगभग खड़ी दीवार पर, लौह-रस्से से बँधी। देखकर भय दौड़ गया मन में। बच्चों के सामने भय न दिखे अतः तुरन्त ही जाकर बैठ गये। बच्चों का उत्साह देखने लायक था, एक बड़े खिलौने जैसी गाड़ी पर पहाड़ों से उतरना। दो ट्रॉलियाँ थीं, जब एक नीचे जाती थी तब दूसरी ऊपर आती थी। लौह-रस्से पर जीवन का भार टिका था, जब प्राण पर बनती है तब ही यह विचार आता है कि हे भगवान, इस रस्से को बनाने में कोई भ्रष्टाचार न हुआ हो, कोई मिलावट न हुई हो। जैसे जैसे नीचे पहुँचे, हृदयगति संयत हुयी।

जब बहुत बड़े पाइप में जल सौ मीटर तक नीचे गिर, टनों भारी टरबाइनों को सवेग घुमाता है, तब हमें विद्युत मिलती है। प्रकृति और विज्ञान, दोनों ही मनोयोग से लगे हैं, अपने श्रेष्ठ पुत्र की सेवा में, पर विद्युत का दुरुपयोग कर हम उस भाव का नित ही अपमान करते रहते हैं। पाइप से निकल रहे जल का नाद एक विचित्र ताल पैदा कर रहा था, हृदय की धड़कनों से अनुनादित।

वापस चढ़ने में ही प्राकृतिक सौन्दर्य को ठीक से निहार सके हम सब। गाइड महोदय ने बताया कि इसकी पूरी संरचना मैसूर के दीवान सर शेषाद्री अय्यर ने बनायी थी। मन उस निष्ठा, ज्ञान, गुणवत्ता और लगन को देख श्रद्धा से भर गया। संयन्त्र अभी भी निर्बाधता से विद्युत उत्पन्न कर रहा है।

यहाँ पर कावेरी एक पहाड़ीय समतल पर फैल कर दो जलप्रपातों के माध्यम से गिरती है, पश्चिम में गगनचुक्की व पूर्व में भाराचुक्की।
  
भोजनादि के बाद सायं जब भाराचुक्की देखने पहुँचे, पश्चिम में सूर्य डूब चुके थे और परिदृश्य पूर्ण रूप से स्पष्ट था। हरे जंगल के बीच दूधिया प्रवाह बन बहता जल का लहराता, मदमाता स्वरूप। जल-फुहारें नीचे से ऊपर तक उड़ती हुयीं, उस ऊँचाई को देखने को उत्सुक जहाँ से गिरकर उनका निर्माण हुआ। बताया गया कि अभी इसका रूप सौम्य है, मनोहारी है, शिव समान। जब यह प्रपात अपने पूर्ण रूप में आता है, लगता है कि शिव अपनी जटा फैलाये, रौद्र रूप धरे दौड़े चले आते हों। पता नहीं इस प्रपात का नामकरण कैसे हुआ पर वहाँ पहुँचकर शिव का स्मरण हो आया।

वह दृश्य देखने में सारा समय चला गया और हम सब दूसरा प्रपात देखने से वंचित रह गये।

प्रकृति, विज्ञान और इतिहास की यात्रा कर सब के सब मुग्ध थे। यात्रायें हमारा ज्ञान बढ़ाती हैं और हमें एक नयी दृष्टि दे जाती हैं अपने अतीत को समझने के लिये, हर बार।