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3.8.13

संकटमोचक मंगलवार

यदि आप ईश्वर से पूर्ण मन से अपनी समस्याओं का समाधान चाहेंगे तो वह भेजेगा अवश्य। ऐसा ही कुछ हमारे साथ भी हो गया। कुछ दिन पहले सप्ताहान्त में कार्य की प्राथमिकताओं को लेकर तर्कों के पात्र उबाल पर थे, श्रीमतीजी के लिये गृहकार्य और हमारे लिये लेखकीय सत्कार्य महत्वपूर्ण थे। भौतिक और बौद्धिक कार्यों को एक समय में मेरे द्वारा कर पाना या श्रीमतीजी के द्वारा करवा पाना, दोनों ही संभव नहीं था। भौतिक और बौद्धिक कार्यों के बीच का यह संघर्ष पूर्णतया मानसिक हो चला था। एक महीने का राशन या एक महीने का लेखन, निर्णय असमंजस में था। मन ही मन पुकारा, हे प्रभु, कुछ तो संकेत या संदेश भेजो। लगता है कि सुन लिया गया है और घर का संवैधानिक संकट हल होने की प्रतीक्षा में है। जब पूर्णतया हल हो जायेगा और संभावित लाभ मिलने लगेगा, तब ही पता चलेगा कि किसको माध्यम बना कर कैसे समस्या सुलझायी प्रभुजी ने।

जब सप्ताहान्त के दो दिन, शनिवार और रविवार अत्यधिक दवाब में थे तो सप्ताह के किसी अन्य दिन को बचाव में आना ही था, सो मंगलवार मंगल करने आ पहुँचा। अब मंगलवार ही क्यों, यह समझने के लिये कुछ बाजार की महिमा समझनी होगी और कुछ मंगलवार की। आइये समझते हैं कि किसने किसको कैसे प्रभावित किया। मॉल के उदाहरण से स्थिति स्पष्ट करने में सरलता रहेगी।

सप्ताहान्त में मॉलों में अत्यधिक भीड़ रहती है, स्वाभाविक भी है, सबको वही समय मिलता है अपने कार्य निपटाने का, शेष दिन तो कार्यालय बाहर जाने का अवसर ही नहीं देता है। फिल्म देखना हो, मटरगस्ती करनी हो, मनोरंजन करना हो, कहीं बाहर खाना हो, खरीददारी करनी हो, सब के सब कार्य सप्ताहान्त को ही निकल पड़ते हैं। सड़कों में ट्रैफिक जाम को देखने के बाद बंगलोर की जनसंख्या का जो अनुमान लगता है, वह सप्ताहान्त में मॉलों में एकत्र हुये जनमानस को देखकर तुरन्त ही ढेर हो जाता है। मॉल के सबसे ऊपर वाले तल से नीचे देखने पर इतने नरमुण्ड दिखते हैं, मानो लगता हो कि गूगल मैप से काले वृक्षों के किसी वन को निहार रहे हों।

भीड़ का जहाँ अपना आनन्द है, वहाँ व्यवधान भी है। आनन्द उनको, जिनको अपने वहाँ होने की सामाजिक स्वीकृति चाहिये होती है। अच्छा किया यहाँ घूमने चले आये, देखो तो कितने लोग जुट आये हैं। आनन्द उनको भी, जिन्होने औरों को दिखाने के लिये अच्छे अच्छे कपड़े सिलवाये होते हैं। आनन्द उनको भी, जिन्हें अपने उत्पाद बेचने के लिये प्रचार कार्यक्रम करने होते हैं। आनन्द उनको भी, जिनके लिये अधिक भीड़ का होना उनकी प्रेमवार्ता के लिये किसी एकान्त कवच का कार्य करता है। किसी मेले में होने वाले आनन्दकारी भाव मॉल के सप्ताहन्त में आपको मिल जायेंगे। व्यवधान बस उनको रहता है, जो अपना कार्य कर परमहंसीय भाव से शीघ्र बाहर निकलना चाहते हैं। हम कभी आनन्द में तो कभी व्यवधान में जीते हैं, जिस दिन जैसा मनोभाव और परिवेश रहे।

इसके विपरीत सप्ताह के अन्य दिनों में एक शान्ति व्यापी रहती है, लगता है कोई प्रेमी प्रतीक्षा में है, अपने प्रियतम की, जो पाँच दिन बाद पुनः आने वाला है।

यही वे दिन होते हैं, जब मॉल की दुकानों में होने वाला व्यवसाय न्यून होता है। ऐसा नहीं है कि उन दिनों कोई नहीं आता है। लोग आते हैं, पर सायं और रात में और वह भी मुख्यतः दो कारणों से, फिल्म देखने और भोजन करने। अनुभव यह भी बताता है कि लोग जब भी आते हैं, बहुधा दोनों ही कार्य करते हैं और यदि समय मिल सके तो खरीददारी भी कर लेते हैं। अगले दिन कार्यालय जाने की शीघ्रता में तीनों कार्य सुपरमैन के जैसे लगते हैं। जब बंगलोर में यातायात के प्रकोप को देखते हुये मॉल तक आना जाना भी एक कार्य के जैसा ही है, तो यह मानकर चला जा सकता है कि लोगों को दो कार्यों से अधिक निपटाने का समय नहीं मिल पाता है।

उस पर भी मंगलवार का दिन और विशेष है। इस दिन लोगों की धार्मिकता जागृत अवस्था में रहती है और अधिकांश लोग मांसाहार नहीं करते हैं। दक्षिण में लोक व्यंजन मुख्यतः शाकाहारी होने पर भी सप्ताह मेंं एक दो बार स्वाद के लिये मांसाहार करने की जनसंख्या भी पर्याप्त लगती है। वे लोग भी अपने एक दो दिन के स्वाद के लिये मंगलवार को क्रुद्ध नहीं करना चाहते हैं, उसे पवित्र बनाये रखने के लिये हर संभव प्रयास करते हैं। यह जनसंख्या मंगलवार को मॉल में नहीं दिखायी पड़ती है। इसके अतिरिक्त धार्मिकता के प्रभावक्षेत्र में अग्रणी होने के कारण कई लोग मंगलवार का व्रत रखते हैं, ये लोग भी मंगलवार को मॉल में नहीं दिखायी पड़ते हैं।

सप्ताह के सात दिनों में संभवतः मंगलवार ही ऐसा होगा जब मॉल में आने वालों की संख्या न्यूनतम होती होगी। यह तथ्य मॉल वालों को भली भाँति ज्ञात होगा। किसी दिन विशेष में ही क्यों, किस समय मॉल के अन्दर कितने लोग थे, इसकी भी संख्या आधुनिक तकनीक के माध्यम से मॉल संचालकों को ज्ञात रहती होगी।

अब सप्ताह में एक दिन बिक्री शून्य हो जाये तो १५ प्रतिशत हानि तो पक्की है। यही कारण रहा होगा कि मॉल स्थित एक विशेष मल्टीप्लेक्स सिनेमाघर ने फिल्म की टिकटें केवल मंगलवार के लिये १०० रु की कर दी हैं। ये टिकटें सप्ताहन्त में ३०० और सप्ताह के अन्य दिनों में २५० रु तक की रहती हैं। हाँ, भीड देखकर ये फिल्म टिकट भी कुप्पा हो जाते हैं। अब जितने धन में सप्ताहन्त में एक व्यक्ति फिल्म देख सकता है, उतने में मंगलवार के दिन तीन लोग देख सकते हैं। यही तथ्य हमारे लिये वरदान बन कर आया।

एक कुशल गृहणी और धन बचाने के हर अवसर को न गँवाने वाली भारतीय नारी के रूप में हमारी श्रीमतीजी ने फिल्म देखने के लिये मंगलवार का दिन नियत कर दिया। हमें कोई आपत्ति नहीं। उस दिन कार्यालय के पश्चात और सोने के पहले चार पाँच घंटे का समय निकल ही आता है, जिसमें फिल्म देखी और बाहर भोजन किया जा सकता है। यही नहीं, भोजन के प्रतीक्षा समय में हम और पृथु जाकर थोड़ी बहुत खरीददारी भी कर आते हैं। यदि खरीददारी तनिक अधिक होती है तो श्रीमतीजी फिल्म प्रारम्भ होने के पहले जाकर खरीददारी कर लेती हैं, जिससे फिल्म और भोजन बिना किसी व्यवधान के बीते।

ऐसा नहीं है कि हर मंगलवार को ही जाना हो, पर अब हमारे सप्ताहान्त विशुद्ध लेखकीय सत्कार्य में लग रहे हैं। यदा कदा बाहर जाना भी होता है पर वह श्रम नहीं लगता, उसे लेखन के बीच में मध्यान्तर के रूप में भी देखा जा सकता है। जहाँ तक मंगलवार का प्रश्न है, वह वैसे भी कार्यालय से आने के बाद टीवी आदि के सामने बीतता था। कार्यालय से आने के बाद भला मन में इतनी शक्ति कहाँ रहती है कि कुछ नया सोचा जा सके। अब बाहर जाकर सारे कार्य निपटा आने से संतुष्टि की अनुभूति अलग होती है।

यह सुखद स्थिति बहुत भा रही है, बहुत काम आ रही है, पर लगता नहीं है कि यह टिकी रह पायेगी। बाजार के संतुलन में उसका भी स्थायित्व टिका हुआ है। यदि ऐसा हुआ कि हम जैसे परिवार पर्याप्त मात्रा में हो गये और मॉल में मंगलवार को भी चहल पहल रहने लगी तो संभवतः मल्टीप्लेक्स वाले अपना निर्णय बदल दें, तब संभवतः टिकट १०० रु का न रह जाये, तनिक मँहगा हो जाये। तब हमारी श्रीमतीजी संभवतः अपनी रणनीति बदल दें।

हम यह सब क्यों सोचें, जो हो गया है और जो होने वाला है, उसके बारे में विद्वान शोक नहीं करते हैं, हम नहीं कहते, गीता के द्वितीय अध्याय में लिखा है। हम वर्तमान से अत्यन्त प्रसन्न हैं, हमारी पारिवारिक उलझन सुलझाने में बाजार का और मंगलवार का बहुत बड़ा योगदान है। जय संकटमोचक मंगलवार।