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13.7.13

अनुवर्तन

कार्यालय से आते समय सड़क पर एक दृश्य देखा, दृश्य बहुत ही रोचक था। उस प्रक्रिया के लिये कोई एक शब्द ढूढ़ना चाहा जिसे शीर्षक रूप में रख सकूँ, तो वह तुरन्त मिला नहीं। कई शब्द कौंधे मन में, पर सब के सब प्रक्रिया में निहित भाव को समग्रता से समेट नहीं पाये, कुछ उसे अर्धव्यक्त कर पाये, कुछ प्रक्रिया के हाव भाव समझे तो मूल मंतव्य न समझ पाये। बड़ी ही उहापोह की स्थिति बनी रही। शब्द कोष में खोजा, वहाँ भी नहीं मिला। आधुनिक प्रबन्धन में समझने का प्रयास किया, वहाँ भी नहीं मिला। अन्त में जब प्रशासनिक शब्दकोष में देखा, तब कहीं उपयुक्त शब्द मिला, अनुवर्तन।

पहले अनुवर्तन का शाब्दिक अर्थ समझ लें। उसकी आवश्यकता साहित्य, प्रबन्धन आदि में कम क्यों है और प्रशासन में उसके सूत्र क्यों पाये जाते हैं? यह समझने के लिये, जो दृश्य देखा है, जो प्रक्रिया देखी है, उसे अपने पूर्ण रूप में व्यक्त होना आवश्यक है।

अनुवर्तन का अर्थ है, बार बार कहना या करना। कह कर कुछ याद दिलाना हो, कुछ समझाना हो, कुछ पता करना हो, किसी की स्थिति जाननी हो, हर रूप में अनुवर्तन का प्रयोग किया जा सकता है। जहाँ प्रवर्तन का प्रयोग किसी कार्य को निश्चित रूप से करवाने के लिये होता है, अनुवर्तन का प्रयोग किसी कार्य के पीछे भीषण रूप से लग जाने के लिये होता है, बार बार उसकी परिस्थिति समझने के लिये, बार बार संबंधित निर्देश देने के लिये और इसी प्रकार की कार्य संबंधी व्यग्रता दिखाने के लिये।

अब उदाहरण देख लेते हैं, तत्पश्चात यह देखेंगे कि साहित्य और प्रबन्धन इस प्रशासनिक सिद्धान्त व संबद्ध प्रक्रिया से कैसे लाभान्वित हो सकते हैं?

वाहन की गति अतिमन्द थी, सिग्नल तो कोई नहीं था पर वाहनों की गति बरनॉली प्रमेय को पूर्णतया पालन कर रही थी। जहाँ पर गति अधिक होती है, दबाव कम हो जाता है। इसे उल्टा कर देखें तो जहाँ यातायात पर दबाव अधिक होता है, उसकी गति कम हो जाती है। बरनॉली जी को यह सब समझने के लिये द्रव्य पर प्रयोग करने पड़े थे, यहाँ होते और एक दो दिन बंगलोर में घूम लिये होते तो यह सिद्धान्त दो दिनों में ही उद्घाटित हो गया होता। वाहनों की यह दुर्दशा भी किसी सिद्धान्त का पालन कर सकती है, सोच कर आश्चर्य ही हो सकता है।

बाहर देखा तो एक व्यक्ति पर्चे बाँट रहा था, दूर से दिख नहीं रहा था कि किसके पर्चे थे। पर उसका पर्चा बाँटना सामान्य नहीं लग रहा था, गति कुछ कम लग रही थी। सामान्यतः पर्चे बाटने वाले बड़ी त्वरित गति से पर्चे बाँटते हैं, किसी को एक देते हैं, किसी समूह को तीन चार एक साथ पकड़ा देते हैं, कभी वाहन की खुली खिड़की देख अन्दर टपका देते हैं, तो कभी पार्क किये हुये वाहनों के वाइपर में फँसा देते हैं। संक्षिप्त में कहा जाये तो बड़ी व्यग्रता से बाँटे जाते हैं पर्चे, जो दिख जाये, जैसा दिख जाये, जब दिख जाये। इसका पर्चा बाँटना पर विचित्र लग रहा था। वह व्यक्ति बड़े ही व्यवस्थित और अनुशासित ढंग से पर्चे बाँट रहा था, धीरे धीरे।

पर्चे प्रमुखतः प्रचार के लिये बाँटे जाते हैं। जब ज्ञात हो कि किसी क्षेत्र विशेष में प्रचार की आवश्यकता है तो उसके लिये सर्वाधिक उपयुक्त माध्यम पर्चे ही होते हैं। समाचार पत्र आदि में प्रचार देना पर्याप्त मँहगा पड़ता है और वे लक्षित क्षेत्र से कहीं अधिक प्रचार कर जाते हैं। पर्चों के माध्यम से जितने क्षेत्र में आवश्यक हो, प्रचार किया जा सकता है। कभी आपने देखा हो कि सुबह के समाचार पत्रों में इस तरह के पर्चे निकल आते हैं, कभी हम उन पर ध्यान देते हैं, कभी हम उन्हें रद्दी में डाल देते हैं। इसी प्रकार भीड़ भरे स्थानों में भी पर्चों को बाँटा जाता है, पर बहुधा वहाँ भी वे व्यर्थ ही होते हैं।

पर्चों के बारे में ऐसी ही कुछ धारणा थी, जब उस व्यक्ति को इतने व्यवस्थित ढंग से पर्चे बाँटते देखकर मन ठिठका। उसे चार पाँच और लोगों को बाँटते हुये देखा। हर बार पर्चा देकर वह तनिक ठहर रहा था, जैसे कि किसी को कुछ दिखाना चाह रहा है। थोड़ा दूर देखा तो एक दूसरा व्यक्ति उसकी फोटो ले रहा था। रोचक, हर बार वह फोटो ले रहा था, जितने पर्चे मेरे सामने बँटे, हर बार फोटो उतारी गयी, इतनी दूर से कि पर्चे पाने वाले को पता न चले।

मेरे स्यानु तन्तु पूरी तरह से जग चुके थे, ऐसा मैं पहली बार देख रहा था। सबसे पहले तो मैंने पर्चा देखा, सौभाग्यवश हमारे ड्राइवर महोदय के पास एक प्रति थी। उसकी एक प्रति लेकर हमारे ड्राइवर महोदय न चाहते हुये भी अपनी फोटो दे चुके थे। देखा तो पास में एक नया होटल खुला था, पर्चे पर चित्र बड़ा मनोहारी था, देखकर लार आ जाना पक्का था।

पर्चे के हर वितरण की फोटो खींचे जाने के दो अर्थ स्पष्ट थे। पहला यह कि वितरक पर दृष्टि रखी जा रही है और यह तथ्य वितरक को ज्ञात भी है। दूसरा यह कि फोटो के रूप में उसका साक्ष्य भी रखा जा रहा है। जब दृष्टि रखी ही जा रही थी तो साक्ष्य रखने का क्या अर्थ? संभवतः उन दोनों के ऊपर जो बैठता हो, उसे दिखाने के लिये। हो सकता है कि एक भी पर्चा व्यर्थ न जाये, इसके लिये उसने अतिरिक्त व्यक्ति को कैमरे के साथ भेजा हो।

पर्चे के व्यर्थ न होने के लिये एक और व्यक्ति को भेजने के पीछे कारण आर्थिक तो पक्का नहीं हो सकता। जितना पैसा एक व्यक्ति को दृष्टि रखने के लिये दिया जा रहा होगा, उतने से कहीं अधिक पर्चे छपवाये जा सकते थे। उद्देश्य तो शत प्रतिशत पर्चों का वितरण कराने का था। कितने पढ़े गये या नहीं, पर एक भी पर्चा व्यर्थ न हो, इसके लिये कितना भी पैसा लगाने को तैयार दिखते हैं प्रचारक महोदय। प्रचार कार्य को इतने गहन ढंग से करने के लिये प्रबन्धन के सामान्य शब्द साथ छोड़ देते हैं। इस ुूरी प्रक्रिया के लिये अनुवर्तन ही सटीक दिखता है।

अब फोटो तो डिजिटल हो चली हैं, कितनी भी खींच ली होंगी, उसमें तो अधिक धन लगना नहीं है। हाँ यदि रील वाला समय होता तो निश्चय ही प्रचारक महोदय को इस प्रक्रिया में तगड़ा चूना लगता। आगे प्रचारक महोदय ने यह भी सुनिश्चित किया ही होगा कि लोग उन पर्चों को पढ़े और होटल भी आयें भी, तब कहीं जाकर उनका प्रचारचक्र पूरा होगा।

यह भी एक उद्देश्य हो सकता है कि यह पता किया जाये कि पर्चे द्वारा प्रचार करना कितना प्रभावी होता है? जितने लोगों को पर्चे दिये गये, उनमें से कितने लोग होटल पधारे, यही वितरण के प्रभाव का मानक है और यही भविष्य में पर्चे द्वारा किये गये प्रचार के योगदान को सिद्ध कर सकेगा। यह पता करने के लिये वितरण के समय उतारे गये फोटों और ग्राहकों की फोटो का मिलान आधुनिक डिजिटल तकनीक से बड़ी आसानी से किया जाना संभव है। संभव है जब हमारे ड्राइवर महोदय जायें तो पर्चा वितरण की सार्थकता सिद्ध हो जाये और विश्लेषण की स्क्रीन पर टूँ स्वर का उद्घोष हो।

जिस प्रकार से उद्देश्य पाने के लिये जिस गहनता और जीवटता से प्रक्रिया पर दृष्टि और उपदृष्टि रखी गयी, उसके लिये अनुवर्तन से अधिक सटीक शब्द मिला ही नहीं। साहित्य लेखन में और किताबी प्रबन्धन में इतनी जीवटता होती तो यह शब्द वहाँ भी उपस्थित रहता। साहित्य में लेखक इसी अनुवर्तन का आधार लेकर अपने अच्छे लेखन को अपने पाठकों तक भी पहुँचा सकते हैं, ठीक वैसे ही जैसे होटल के प्रचारक महोदय ने अपने ग्राहकों को अच्छे व्यंजनों का स्वाद चखाने के लिये किया।

22.12.12

और बाल कट गये

पिछले शनिवार को बाल कटाने गये, एक नियत दुकान है, वहीं पर ही जाकर कटाते हैं। प्रारम्भ में एक दो बार जाने से परिचय हो गया, कैसे बाल कटाने से चेहरा अच्छा दिखेगा, दोनों को समझ आ गया, तब से वहीं जाने का क्रम बन गया। अब महीने में एक बार जाना हो ही जाता है, कभी कभी देर हो जाने पर दर्पण डरा देता है, बालों को लहराकर काढ़ने में कभी सौन्दर्य दिखता ही नहीं है, बिखरा बिखरा सा व्यक्तित्व लगता है। छोटे छोटे बाल ही सुहाते हैं, तब चेहरा बालों से अधिक संवाद करता हुआ लगता है।

सर के बालों को लेकर सबका अपना सौन्दर्यबोध है, सबका अपना दर्शनशास्त्र है। श्रंगार रस के कवियों ने न जाने कितना कुछ लिखा है, नारियों के खुले और लम्बे बालों पर, कई तरह से बाँधी हुयी चोटियों पर, चोटियों पर सजे हुये पुष्पों के अलंकरण पर और उन पुष्पों के सौन्दर्य पर डोलते पुरुषों के हृदयों पर। कविगण तनिक परम्पराओं से हिलमिल कर चलते हैं, परन्तु आधुनिकाओं को छोटे छोटे बाल ही सुहाते हैं, उनके रखरखाव पर उन्हें समय व्यर्थ करने का मन ही नहीं होता है, हो सकता है उन्हें भी मेरी तरह ही बालों से अधिक चेहरे से संवाद करने का दर्शन भाता हो। ईश्वर ने बाल दिये हैं, कोई उसे कैसे रखता है और उसका प्रयोग किन किन लौकिक और अलौकिक अनुसंधानों में करता, वह सर्वथा उसी का विषय है, अपना मत व्यक्त होने के पहले ही वापस आ जाने का भय रहता है, ऐसे विषयों में।

अब योगियों को ही ले लीजिये, उन्हें भी सर, मूछों और दाढ़ी के बालों पर समय व्यर्थ करना नहीं भाता है। कुछ तो उन्हें सदा बढ़ाते रहते हैं, जो बहुधा एक दूसरे से उलझ उलझ कर गर्म वस्त्रों का स्वरूप ले लेते हैं। कुछ योगी बाल रखते ही नहीं हैं, उनका मानना है कि बाल न या छोटे रहने पर उसके रख रखाव पर कम समय व्यर्थ होगा और तब भगवत्भजन के लिये अधिक समय मिल जायेगा। ईश्वर ने निश्चय ही अपने भक्तों को एक कार्य तो दे ही दिया है, भक्तों ने अपने दर्शन के अनुसार हल भी निकाल लिया है।

हमारे पृथु को भी बाल कटाना अच्छा नहीं लगता है, उन्हें तो सर पर तेल लगाना और बाल काढ़ना भी नहीं अच्छा लगता है, देशी भाषा में कहें तो उन्हें मोगली बने रहना अच्छा लगता है। बहुत कुरेदने पर बताया कि यह 'आउट ऑफ फैशन' है, सर पर तेल लगाकर काढ़ने से सब उन्हें चीकू और अच्छा बच्चा समझने लगते हैं और चिढ़ाते हैं। हे भगवान, हम तो ३६५ दिन सर पर तेल लगाते हैं पर हमें तो कभी किसी ने नहीं चिढ़ाया, अच्छा दिखना भला कब से आउट ऑफ फैशन होने लगा। पृथु के अध्यापकगण पृथु के नये फैशनबोध पर पूरी तरह सहमत नहीं हैं, उनके कारण पृथु को बाल तो छोटे रखने पड़ते हैं पर तेल लगा कर काढ़ने को अभी तक अनुशासन की परिधि में नहीं लाया गया है। नयी पीढ़ी की नयी मान्यतायें विकसित हो रही है, उनसे छेड़ छाड़ करना बाल-अधिकारों के हनन के रूप में आरोपित हो जायेगा।

बाल काटने के व्यवसाय पर काल, स्थान और व्यवस्था का प्रभाव सहज ही दृष्टिगोचर होता रहा है। बचपन में एक छोटे स्थान पर रहते थे और बहुधा नाई महोदय घर पर ही आ जाते थे, लगे हाथों शरीर की मालिश भी हो जाती थी। धीरे धीरे उनका कार्य बढ़ गया, उन्होंने अपनी दुकान खोल ली, आत्मीयता होने के कारण हम लोग वहीं जाकर बाल कटाने लगे। आगे पढ़ने कानपुर में आये तो भी नियत दुकानों में जाकर बाल कटाते रहे पर पहले जैसी आत्मीयता कहीं नहीं रही। रेलवे की सेवा में व्यस्तता का प्रभाव कहें या अंग्रेजों की विरासत का, हर स्थान पर नाई महोदय बाल काटने घर ही आते रहे। बाल कटवाने के बाद चम्पी करवाना सदा ही आकर्षण का विषय रहता था, बड़ा ही आनन्द आता रहा उसमें। रेलवे की अन्य पोस्टों पर बाजार कभी हावी नहीं रहा, व्यक्तिगत स्तर पर सेवायें मिलती रहीं, विशिष्ट स्तर बना रहा, उन छोटे नगरों में रेलवे ही नगर का प्रमुख अंग हुआ करता था।

बंगलोर बड़ा नगर है, यहाँ पर आप उतने विशिष्ट नहीं होते हैं, यहाँ पर रेलवे के अतिरिक्त विकास के अन्य प्रतिमान उपस्थित हैं। घर पर आकर बाल काटने के लिये कोई तैयार नहीं है, ग्राहक अधिक हैं, समय कम हैं। हम भी अन्य की तरह महीने में एक बार बाल कटवाने चले जाते है। वहाँ जाने का लाभ यह होता है कि अपना चेहरा देखने के अतिरिक्त बहुत कुछ सुनने और जानने को मिल जाता है। आस पास की बातें, राजनीति की बातें, फ़िल्मों की बातें, गानों की बातें, बहुत ज्ञान बढ़ जाता है।

चार लोग हैं उस दुकान में जो बाल काटते हैं, एक मैनेजर है जो व्यवस्था करता है। हमें तो पहले लगता था कि एक बाल काटने वाला ही अपनी सारी व्यवस्था कर लेता है पर थोड़ी बातें सुनने के बाद स्थिति और स्पष्ट हो गयी। दुकान का मालिक कोई और है और मालिक की अन्य कई दुकानें और व्यवसाय हैं। उसके लिये यह संभव नहीं है कि अपनी सब दुकानों में समय दे पाये, अतः उसके लिये हर स्थान पर एक मैनेजर नियुक्त कर रखा है। सारे आर्थिक अधिकार मैनेजर के पास हैं, चार कर्मचारी अपना कार्य करते हैं और अपना पारिश्रमिक ले कर चले जाते हैं। कर्मचारी उत्तर भारत के हैं, मैनेजर स्थानीय है।

पिछले तीन वर्षों में एक बड़ी मज़ेदार बात देखने को मिली है। दो कर्मचारी पिछले तीन वर्षों से हैं और उनमें से एक ही मेरे बाल काटता है। जब भी मैं वहाँ पहुँचता हूँ, यदि वह थोड़ा व्यस्त होता है, मैं तनिक प्रतीक्षा कर लेता हूँ। दूसरा भी उसी के गाँव का है। दो अन्य कर्मचारी इस बीच जा चुके हैं और उनके स्थान पर जो नये कर्मचारी आये हैं, वे भी उसी गाँव के हैं और पहले से उपस्थित कर्मचारी के संबंधी भी हैं। इस समय चारों कर्मचारी एक ही गाँव के हैं, बाहर एक साथ रहते हैं और दुकान में एक साथ कार्य करते हैं। अनौपचारिक चर्चा से पता लगा कि दोनों नये कर्मचारी गाँव में कुछ कार्य नहीं करते थे पर यहाँ पर संभावना होने पर नाई का कार्य सीख कर यहाँ आ गये। दो तीन और लोग हैं उसी गाँव में जो अपने अवसर की प्रतीक्षा कर रहे हैं, आने को तैयार बैठे हैं।

जहाँ कर्मचारियों का स्थायीकरण और एकत्रीकरण होता जा रहा है, मैनेजर की स्थिति दयनीय है। इस बार जब मैं गया, पाँचवा चेहरा मुझे मैनेजर के स्थान पर दिखा। नये मैनेजर का दूसरा या तीसरा दिन रहा होगा, क्योंकि आधे घंटे में ही अनुशासन की जितनी मात्रा उसने अपने जमे जमाये कर्मचारियों पर झोंक दी, उसे देख कर तो लग रहा था कि वह स्वयं को स्थापित करने को बहुत व्यग्र है। या तो पिछले मैनेजरों को अधिक पारिश्रमिक नहीं मिलता होगा या वे आर्थिक हिसाब किताब या प्रबन्धन में कोई अव्यवस्था किये होंगे। इतनी जल्दी जल्दी मैनेजर बदलने का कोई अन्य कारण समझ ही नहीं आया मुझे।

मोबाइल पर बात मत करो, बीच में चाय मत पियो, आपस में बात मत करो, यह फ़ोटो इधर से हटाकर उधर पर लगाओ, अख़बार और मैगज़ीन व्यवस्थित रखो, रेडियो की आवाज़ कम रखो, ऐसे न जाने कितने आदेश मेरे ही सामने झोंक दिये नये मैनेजर ने। चारों कर्मचारी दूसरी ओर मुँह करके बीच बीच में मुस्कुरा रहे थे, मुझे देखने में बड़ा आनन्द आ रहा था। 'साहब बाल कट गये' सहसा ध्यान भंग हुआ, रुक कर थोड़ा और देखने का मन तो था पर कोई बहाना नहीं था। अब तो एक महीने बाद ही पुनः आनन्द लेने का अवसर मिलेगा, तब तक आप भी प्रतीक्षा कीजिये।

2.11.11

विदाई संदेश

आदरणीय महाप्रबंधक महोदय, मैडम, उपस्थित महानुभावों और साथियों

आज सुबह जब रेलवे क्लब के सचिव श्री हरिबाबू ने मुझे आपके विदाई समारोह में बोलने का आग्रह किया तो मन में एक अवरोध सा था। प्रमुखतः दो कारण होते हैं इस अवरोध के, या तो सेवानिवृत्त हो रहे व्यक्ति के पास उल्लेखनीय गुण ही न हों, या व्यक्तिगत कारण हों जिनके कारण आप उनके बारे में कुछ कहना न चाह रहे हों। मेरा कारण तीसरा था। आपके लिये मन में जितना आदर निहित है, उसे शब्दों में पिघला पाना मेरी सामर्थ्य के बाहर था। कैसे उस आदर को वाक्यों में संप्रेषित कर पाऊँगा, यह दुविधा थी मेरी। भाव शब्दों में ढल कहीं अपनी महक न खो दे, यह भय था मेरा। फिर भी मैंने बोलने का निश्चय किया, क्योंकि आज भी यदि मैं नहीं बोलता तो यह अन्तिम अवसर भी खो देता और वे सारे भाव मेरे हृदय और आँखों को सदा ही नम करते रहते, अप्रेषित और रुद्ध।

आने वाले कई वक्ता आपकी प्रशासनिक उपलब्धियों पर निश्चय ही प्रकाश डालेंगे, मैं केवल उन बातों की चर्चा करूँगा जिन्होंने मुझे व्यक्तिगत रूप से प्रभावित किया है।

एक ही सेवा में होने के कारण, अपने प्रशिक्षण के समय में, मैं आपसे पहली बार १९९६ में मिला था, उस समय आप पश्चिम रेलवे में मुख्य वाणिज्य प्रबन्धक थे। जिस तन्मयता से आपने हमारी समस्या सुनी और जिस सहज भाव से उसका समाधान किया, वह मेरे लिये प्रबन्धन की प्रथम शिक्षा थी। उसके पश्चात कई बार आपसे भेंट हुयी, पर दक्षिण-पश्चिम रेलवे में पिछले २ वर्षों के कार्यकाल में आपसे ३ बातें सीखी हैं। कहते हैं कि प्रसन्नता बाटने से बढ़ती है। मैं आपसे अपनी वह प्रसन्नता बाटना चाहता हूँ जो मुझे इन ३ शिक्षाओं के अनुकरण से मिली है।

पहला, आपके चेहरे का समत्व व स्मित मुस्कान किसी भी आगन्तुक को सहज कर देती है, अतुलनीय गुण है किसी के हृदय को टटोल लेने का। आगन्तुक का तनाव, पद का भय, बीच में आने का साहस भी नहीं कर पाता है। पूरा अस्तित्व और संवाद शान्तिमय सागर में उतराने लगता है। लोग कह सकते हैं कि यह एक व्यक्तिगत गुण है, प्रशासनिक नहीं, पर अपने कनिष्ठों को सहजता की अवस्था में ले आना, उन्हें उनकी सर्वोत्तम क्षमता के लिये प्रेरित करने की दिशा में पहला पग है। केवल अभागे और मूर्ख ही इस गुण का लाभ नहीं ले पाते हैं।

दूसरा, आपकी उपस्थिति पूरी टीम में ऊर्जा का संचार करती है। मुझे स्पष्ट रूप से याद है, दो वर्ष पूर्व जब मुझे वाणिज्य प्रबन्धक के रूप में मन्त्रीजी के द्वारा होने वाले एक साथ कई उद्घाटनों की व्यवस्था सम्हालनी थी। मंडल रेल प्रबन्धक किसी कार्यवश बाहर थे। कार्यक्रमों की अधिकता और कई स्थानों पर समन्वय करने के कारण गड़बड़ी की पूरी आशंका बनी हुयी थी। पर आपके वहाँ आ जाने से और अन्त तक बने रहने से सारे कार्यक्रम सुन्दरतम तरीके से सम्पन्न हो गये। इसी तरह न जाने कितने अन्य कार्यक्रमों में भी आपकी उपस्थिति हम सबकी ऊर्जा बढ़ाती रही, हम लोग सदा ही अपने चारों ओर एक अव्यक्त सुरक्षा कवच का अनुभव करते रहे।

तीसरा, यद्यपि नेतृत्व का अपने सारे कर्मचारियों से नियमित सम्पर्क न हो पर वह नेतृत्वशैली संस्था के हर कार्य में परिलक्षित होती है, ऊपर से नीचे सभी परतों पर। मैंने रेलवे सेवा में १५ वर्ष पूरे कर लिये हैं और २१ वर्ष और सेवारत रहना है। किसी का भी सेवाकाल एक बड़ी दौड़ के जैसा होता है और जिस प्रकार किसी भी बड़ी दौड़ में गति और स्टैमना का संतुलन बिठाना पड़ता है उसी प्रकार एक लम्बे सेवाकाल में कार्य, स्वास्थ्य और परिवार के बीच भी एक संतुलन आवश्यक होता है। यह संतुलन तब ही आ सकता है जब सब अपना अपना कार्य समझें और करें। किसी और के कार्य करने की व स्वयं के कार्यों को टालने की प्रवृत्ति न केवल आपका तनाव बढ़ाती है वरन औरों के विकास का मार्ग भी अवरुद्ध करती है। सब अपने अपने वेतन का औचित्य व सार्थकता सिद्ध करें, तभी संस्था को सामूहिक गति व दिशा मिल सकती है। आपकी नेतृत्वशैली में इस तथ्य की छाप स्पष्ट रूप से अंकित थी। आपने सबको इस बात की पूरी स्वतन्त्रता भी दी कि वे अपना कार्य अपनी पूर्ण क्षमता व नयेपन से कर सकें और सतत यह भी निश्चित किया कोई और उनके कार्य में दखल न दे पाये। प्रबन्धन का यह मूल तत्व नेतृत्व का स्थायी गुण है जो आपने बड़ी सहजता व सरलता से निष्पादित किया।

उपरोक्त तीन गुण, सामने वाले को तनावमुक्त कर देना, टीम में ऊर्जा का संचार करना और सबका कार्य उसके पदानुसार करते रहने देना, इन तीनों को मैं अपने जीवन में उतारने का प्रयास कर रहा हूँ और बड़े निश्चयात्मक रूप से कह सकता हूँ कि इसके लिये न केवल आप जैसी स्थिर और शान्तिमय बुद्धि चाहिये वरन आप जैसा ही एक हीरे का हृदय भी चाहिये।

ईश्वर करे, आप जहाँ भी रहें, हीरे की तरह चमचमाते रहें। आपका अनुसरण कर मैं भी हीर-कणिका बनने का प्रयास कर रहा हूँ, आवश्यक भी है क्योंकि मेरी श्रीमतीजी बहुधा हीरे की माँग करती रहती हैं।

मैं सच में बहुत बड़ा अन्याय करूँगा यदि आप जैसे विरल हीरे को तराशने में मैडम द्वारा प्रदत्त योगदान का उल्लेख नहीं करूँगा।

अन्ततः मेरा भय फिर भी सिद्ध हुआ, हृदय भरा सारा आदर शब्दों में नहीं पिघल पाया। वे कोमल मृदुल भाव मेरे हृदय और आँखों को सदा ही नम करते रहेंगे, अप्रेषित और रुद्ध।

धन्यवाद

(यह विदाई संदेश मैंने अपने महाप्रबन्धक श्री कुलदीप चतुर्वेदी के लिये पढ़ा था। श्री चतुर्वेदी पिछले माह सेवानिवृत्त हुये हैं और अभी कोलकता में उप चेयरमैन रेलवे दावा प्राधिकरण में पदस्थ हैं। उन्ही पर देवेन्द्रजी के भावमयी व काव्यमयी उद्गारों को भी रख रहा हूँ।)

कुलदीप हो 

गरिमामयी,सौम्यतामयी
करुणामयी व्यक्तित्व हो
नैनृत्य रेल कुटुम्ब के,
ज्योतिमय देवदीप हो
कुलदीप हो।

प्रदीप्त भाल देह विशाल
दिव्य प्रभाष गजमय चाल
मधुर संवाद करते निहाल
शुभ कांतिमय स्नेह हो,
कुलदीप हो।

प्रभातरवि सम कांति मय
शशि पूर्णिमा सम शांति मय
व्यवहार अमृत प्रेममय,
ज्ञानमय तुम कल्पनामय हो
कुलदीप हो।