26.1.21

मित्र - ३

वाह्य रुक्षता बहुधा संवेदित मन को बचा कर रखती है, प्रकृति भी आवरण के सिद्धान्त पर चलती है। यदि हर बात चुभने लगती तो हर रात विदीर्ण हृदय कराह रहा होता, एक आवरण आवश्यक हो जाता है। घर के समशीतोष्ण वातावरण से कहीं दूर शीत और ऊष्ण, दोनों को सह सकने के लिये तैयार हो रहे थे हम सब। भविष्य उतना दयालु नहीं होता है, वर्तमान को ही समझाना पड़ता है। प्रश्न अस्तित्व के हों, आत्म की बोली लगी हो, आगत से जूझना हो और सफलता की संजीवनी दृष्टिगत हो, तो रुक्षता जाना स्वाभविक है।

उद्दण्डता उसी अस्तित्व की अभिव्यक्ति थी। इस वाक्य से मैं उन सारे कृत्यों का महिमामण्डन नहीं कर रहा हूँ जो कि परित्याज्य थे पर कभी कभी घटनाओं को सही परिप्रेक्ष्य में रखने से उनके प्रति हमारा अपराधबोध कम हो जाता है। पिछले ब्लाग में मुझसे वर्ष कनिष्ठ रहे डा ज्योति कुमार गुप्ता ने मुझे स्मरण दिलाया कि विशालकक्ष में एक बार मैने उनकी आँखों में विक्स लगा दी थी और उन्हें पूरी प्रार्थना लगभग आँखों में आँसू भरे करनी पड़ी थी। मेरी क्षमता और मानकों के आधार पर यह उद्दण्डता बड़ी थी और अक्षम्य भी। संतरों के छिलकों तक तो ठीक था पर विक्स आँखों के लिये कष्टकर हो जाती है। सिनेमा में तो अभिनेता विक्स लगा कर भाव उभार लाता है पर ईश्वर तो आर्त और विक्सकृत आँसुओं का भेद जानता ही होगा। मुझे उस कृत्य के लिये अपराधबोध तो हुआ ही और आश्चर्य इस बात पर भी हुआ कि कैसे इतनी बड़ी बात मेरी स्मृति से बिसर गयी।


यह तो डा ज्योति का औदार्य था कि उन्होंने इस बात को तब किसी से नहीं कहा अन्यथा किन किन स्तरों पर क्या क्या सुनना पड़ता, इसकी कल्पना भर से रोमाञ्च हो आता है। तब तो निश्चय ही यह घटना स्मृति पटल पर अमिट रूप से छप भी जाती। शीघ्र ही मेरा यह प्रयास रहेगा कि डा ज्योति से कानपुर या लखनऊ में भेंट कर इस ग्लानि को दूर करूँ।


उपरोक्त घटना एक अपवाद ही कही जायेगी क्योंकि हम सबके लिये उद्दण्डता का ध्येय किसी का अहित करना कभी नहीं रहा है। यदि किसी को चोट पहुँची होती तो मन क्षोभ से भर गया होता। बहुधा इन उद्दण्डताओं में वीरता की सिद्धि, उपलब्धि की भारशून्यता, फल की भावशून्यता और सृजनशीलता प्राप्य रहे। हानिपक्ष में अनुशासनहीनता, समय की व्यर्थता प्रमुख थे पर कुछ घटनाओं में विद्यालय को अपयश भी मिला। ऐसा ही कुछ था, कटरी काण्ड, हर बैठक में तथ्यों की परतों को उघाड़ता सा। कथा लम्बी है और कई स्तरों पर है। कई पात्र हैं, वीर भी, लज्जित भी। आजकल की फिल्मों में - कहानियाँ कई अलग स्थानों पर चलते हुये एक स्थान पर मिल जाती हैं। इसे एक तो नाटकीयता की पराकाष्ठा माना जाता है और साथ ही साथ इस विधि में किसी मुख्य घटना के पहले पात्रों की चारित्रिक स्पष्टता से कथा में रस ठूँस ठूँस कर भरा हुआ मिलता है।


कटरी काण्ड में कई कथायें एक साथ चलती हैं, इस आधार पर कि कौन किसके साथ था? काण्ड के बाद सब कैसे वापस पहुँचे, इसकी भी कई कथायें। कैसे पकड़े गये और किन आशंकाओं में दिन बीते। कैसे दण्डित, प्रताड़ित और लज्जित हुये, यह पूरा वृत्तान्त इसी संरचना पर बनी जाने कितनी फिल्मों को धूमिल कर दे।


सरल भाव से प्रारम्भ होता है। वार्षिक खेलकूद, एक बड़े क्रीड़ास्थल के अभाव में बगल के एसडी कालेज में प्रतियोगितायें होती थीं। सब खिलाड़ी नहीं होते, उत्साहवर्धन भी अपने प्रियमित्रों का, खेलों के बीच में व्यवस्थाओं का समय और अध्यापकों की व्यस्तता, एक समूह अनमना सा निकल लेता है, -१० मित्रों का (कुछ के अनुसार - समूह थे) गंगाजी में स्नान, गप्पें, जाड़े की गुनगुनी धूप सेकते हुये और निष्प्रयोज्य टहलते हुये एक अमरूद का बगीचा दिखता है। जिन्हें वहाँ के अमरूदों की मिठास ज्ञात है उन्हें छात्रों की मनःस्थिति का पूर्ण चित्रण स्पष्ट हो गया होगा। आकर्षण था अमरूदों की मिठास का या एक मनभावों का सहज प्रकटन, मित्रों ने तोड़कर अमरूद खाये और वापस गये। उसके बाद संभवतः एक दल और पहुँचा, तब तक उस बाग के रक्षक गये थे, कुछ झगड़ा, फिर लोग भाग लिये।


बात प्रधानाचार्यजी तक पहुँची, किससे पहुँची यह अभी तक रहस्य है। बाग के संरक्षक के द्वारा बताया गया या किसी की स्वीकारोक्ति? बात काण्ड में सम्मिलित सभी छात्रों तक भी पहुँची कि प्रधानाचार्यजी को पता चल गया है। जिन्हें विद्यालय की अनुशासनप्रिय छवि और प्रधानाचार्यजी के बारे में ज्ञात नहीं है उनके लिये यह कल्पना करना असंभव है कि सम्मिलित छात्रों के हृदय में आशंका के कितने उद्दाम सागर हिलोरें ले रहे होंगे। एक मित्र के अनुसार यदि गंभीरता की दृष्टि से देखा जाये तो अलिखित दण्डसंहिता निष्कासन के अतिरिक्त किसी अन्य दण्ड की संस्तुति नहीं कर सकती थी। अन्तिम निष्कर्ष के पहले पर कितनी मानसिक प्रताड़ना होनी थी, कितना सार्वजनिक और पारिवारिक अपमान होना लिखा था, विधि को भी ज्ञात नहीं था।


क्या न्याय हुआ? क्या अन्य तत्व उसको प्रभावित कर बैठे? किन पर पहला संशय हुआ? प्रारम्भिक कठोरता किस प्रकार प्रक्रिया में अपनी तीक्ष्णता खो बैठी? उद्दण्डता के हानि पक्ष को किन प्राप्यों के आधार पर धुँधला दिया गया, इन सब परिप्रेक्ष्यों पर चर्चा अगले ब्लाग में। 

2 comments:

  1. एकदिन कल्लू चाट वाला याद कर रहा था।

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    1. उनकी चाट का आकर्षण था कि बार बार भाग कर जाते थे।

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