26.12.12

कोई हो

खड़ा मैं कब से समुन्दर के किनारे,
देखता हूँ अनवरत, सब सुध बिसारे ।
काश लहरों की अनूठी भीड़ में अब,
कोई पहचानी, पुरानी आ रही हो ।
कोई हो जो कह सके, मत जाओ प्यारे,
कोई हो जो मधुर, मन को भा रही हो ।।१।।

कोई कह दे, नहीं अब मैं जाऊँगी,
संग तेरे यहीं पर रह जाऊँगी ।
कोई हो, एकान्त की खुश्की मिटाने,
नीर अपने आश्रय का ला रही हो ।
कोई हो जो बह रहे इन आँसुओं के,
मर्म की पीड़ा समझती जा रही हो ।।२।।        

कोई कह दे, छोड़कर पथ विगत सारा,
तुझे पाया, पा लिया अपना किनारा ।
कोई कह दे, भूल जाओ स्वप्न भीषण,
कोई हो जो हृदय को थपका रही हो ।
कोई कह दे, देखता जो नहीं सपना,
कोई हो जो प्रेयसी बन आ रही हो ।।३।।

53 comments:

  1. ...अब लहरों से ही आस बची है !

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  2. शानदार रचना

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  3. अभी भी "कोई" हो ?

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  4. वाह मन तरंगों का अल्हणपन व सौंदर्य में आत्मसात हो जाने की सुंदर व सजीव अभिव्यक्ति।
    अति सुंदर।
    सादर- देवेंद्र
    मेरी नयी पोस्ट - कुछ डिप्रेसिंग व कुछ इंस्पायरिंग.....

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  5. प्रवीण जी, हो सके तो अपना EMail Add. दे दीजिए। आपसे बात करने मेँ अच्छा लगेगा।
    amitbharteey@gmail.com

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  6. It is both relaxing and invigorating to occasionally set aside the worries of life, seek the company of a loved and just do nothing :)

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  7. वो कोई ही तो होता है, जो ज़िन्दगी को खूबसूरत बनाकर उसे मायने दे देता है...
    :)

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  8. Waah waah kya Baat Hai Praveen bhai

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  9. पता नहीं,कुल साँसे अपनी
    हम खरीद कर , लाये हैं !
    कल का सूरज नहीं दिखेगा
    आज समझ , ना पाए हैं !
    भरी वेदना, मन में लेकर,कैसे समझ सकोगे प्रीत?
    मूरखमन फिर चैन न पाए,जीवन भर अकुलायें गीत !

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  10. सागर की लहरों को देखते रहो तो मन भी वैसा ही होने लगता है-पूर्णिमा की रात में ट्राई कीजियेगा कभी!

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  11. कोई कह दे, नहीं अब मैं जाऊँगी,
    संग तेरे यहीं पर रह जाऊँगी ।
    कोई हो, एकान्त की खुश्की मिटाने,
    नीर अपने आश्रय का ला रही हो ।
    कोई हो जो बह रहे इन आँसुओं के,
    मर्म की पीड़ा समझती जा रही हो ..

    बहुत ही शुन्दर भावों से सजी ... कल्पना के पंकों पे सवार रचना ...
    बहुत लाजवाब ...

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  12. "काश लहरों की अनूठी भीड़ में अब,
    कोई पहचानी, पुरानी आ रही हो।"

    वाह, सुन्दर रचना।

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  13. काश लहरों की अनूठी भीड़ में अब,
    कोई पहचानी, पुरानी आ रही हो ।
    नीर अपने आश्रय का ला रही हो ।
    कोई हो जो प्रेयसी बन आ रही हो।

    आहहहहहहहहहहहहाहाहा....................... भाई साहब, दिल अन्दर तक भीग गया ! :)

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  14. शानदार लेखन,
    जारी रहिये,
    बधाई !!!

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  15. प्रभाशाली कविता

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  16. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ...
    सादर

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  17. इस 'कोई' की अनवरत तलाश !

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  18. हृदयस्पर्शी सुंदर अभिव्यक्ति ....!!

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  19. इन्तजार के सागर में मन की हलचल!!

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  20. बहुत खूब...
    एक अपरिभाषित, अनजाना 'कोई'....

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  21. याने, समन्‍दर किनारे प्रतीक्षारत बैठा एक प्‍यासा।

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  22. एक प्रतीक्षा,महासागर सी अनंत. सुंदर प्रस्तुति

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  23. सागर किनारे दीर्घ प्रतीक्षा !!!!

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  24. मन को छूती बहुत ही सुंदर प्रस्तुति,,,,

    recent post : नववर्ष की बधाई

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  25. bahut hi sundar rachna...waah..

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  26. उम्दा अभिव्यक्ति...

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  27. सुध बिसराती हुई रचना.....

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  28. http://urvija.parikalpnaa.com/2012/12/blog-post_6742.html

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  29. खड़ा मैं कब से समुन्दर के किनारे,
    देखता हूँ अनवरत, सब सुध बिसारे ।
    काश लहरों की अनूठी भीड़ में अब,
    कोई पहचानी, पुरानी आ रही हो ।
    कोई हो जो कह सके, मत जाओ प्यारे,
    कोई हो जो मधुर, मन को भा रही हो ।।१।।
    इधर आओ एक बार फिर प्यार कर लें ,

    निगाहों से रूहों को बे -जार कर लें .

    ये जो मन की गति है बड़ी न्यारी है .बढ़िया रचना है जीवन लहरों में उतराती लहराती .

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  30. खड़ा मैं कब से समुन्दर के किनारे,
    देखता हूँ अनवरत, सब सुध बिसारे ।
    काश लहरों की अनूठी भीड़ में अब,
    कोई पहचानी, पुरानी आ रही हो ।
    कोई हो जो कह सके, मत जाओ प्यारे,
    कोई हो जो मधुर, मन को भा रही हो ।।१।।
    इधर आओ एक बार फिर प्यार कर लें ,

    निगाहों से रूहों को बे -जार कर लें .

    ये जो मन की गति है बड़ी न्यारी है .बढ़िया रचना है जीवन लहरों में उतराती लहराती .



    Virendra Sharma ‏@Veerubhai1947
    ram ram bhai मुखपृष्ठ http://veerubhai1947.blogspot.in/ बृहस्पतिवार, 27 दिसम्बर 2012 दिमागी तौर पर ठस रह सकती गूगल पीढ़ी

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  31. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    --
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शुक्रवार (28-12-2012) के चर्चा मंच-११०७ (आओ नूतन वर्ष मनायें) पर भी होगी!
    सूचनार्थ...!

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  32. खड़ा मैं कब से समुन्दर के किनारे,
    देखता हूँ अनवरत, सब सुध बिसारे ।
    काश लहरों की अनूठी भीड़ में अब,
    कोई पहचानी, पुरानी आ रही हो ।
    कोई हो जो कह सके, मत जाओ प्यारे,
    कोई हो जो मधुर, मन को भा रही हो ।।१।।
    इधर आओ एक बार फिर प्यार कर लें ,

    निगाहों से रूहों को बे -जार कर लें .

    ये जो मन की गति है बड़ी न्यारी है .बढ़िया रचना है जीवन लहरों में उतराती लहराती .

    Virendra Sharma ‏@Veerubhai1947
    ram ram bhai मुखपृष्ठ http://veerubhai1947.blogspot.in/ बृहस्पतिवार, 27 दिसम्बर 2012 खबरनामा सेहत का

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  33. खड़ा मैं कब से समुन्दर के किनारे,
    देखता हूँ अनवरत, सब सुध बिसारे ।
    काश लहरों की अनूठी भीड़ में अब,
    कोई पहचानी, पुरानी आ रही हो ।
    कोई हो जो कह सके, मत जाओ प्यारे,
    कोई हो जो मधुर, मन को भा रही हो ।।१।।
    इधर आओ एक बार फिर प्यार कर लें ,

    निगाहों से रूहों को बे -जार कर लें .

    ये जो मन की गति है बड़ी न्यारी है .बढ़िया रचना है जीवन लहरों में उतराती लहराती .

    Virendra Sharma ‏@Veerubhai1947
    ram ram bhai मुखपृष्ठ http://veerubhai1947.blogspot.in/ बृहस्पतिवार, 27 दिसम्बर 2012 खबरनामा सेहत का



    Virendra Sharma ‏@Veerubhai1947
    ram ram bhai मुखपृष्ठ http://veerubhai1947.blogspot.in/ बृहस्पतिवार, 27 दिसम्बर 2012 दिमागी तौर पर ठस रह सकती गूगल पीढ़ी

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  34. स्पेम में गईं हैं टिप्पणियाँ भाई साहब .

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  35. प्रिय -प्रतीक्षा!

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  36. बहुत बढ़िया प्रस्तुति |

    मेरी नई पोस्ट:-ख्वाब क्या अपनाओगे ?

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  37. खूबसूरत ख्याल ...

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  38. Sir ji .deep expression like sea.

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  39. पूर्णिमा की चांदनी रात जैसा एहसास हो रहा है, बहुत ही सुमधुर रचना.

    रामराम

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  40. ,मन पे काबू रखो ,निर्भया बनो ! वर्ष 2012 ने जो चिंगारी छेड़ी है अन्ना जी से निर्भया तक ,जब अकेली जान आधी दुनिया की पूरी तथा इंसानियत की लड़ाई लड़ सकती है मौत को

    धता बता सकती है तब एक फर्ज़ हमारा

    भी है सेकुलर वोट की बात करने वालों को हम भी मुंह की चखाएं .

    ,शुक्रिया आपकी सद्य टिपण्णी का .

    सागर का किनारा हो और साथ तुम्हारा हो ,

    शरमाई सी हंसी हो और प्यार हमारा हो .

    साहिल पे लहरों को सर पटकते देखा ,

    इश्क में गफलत का बाज़ार गर्म देखा .

    एक साहिल और हजार लहरें ,

    किस किस की सुने .


    ram ram bhai
    मुखपृष्ठ

    शुक्रवार, 28 दिसम्बर 2012
    एक ही निर्भया भारी है , इस सेकुलर सरकार पर , गर सभी निर्भया बाहर आ गईं , तब न जाने क्या होगा ?

    http://veerubhai1947.blogspot.in/

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  41. क्‍या लिखा है यार! बहुत ही बढ़िया पद्य है।

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  42. कोई हो जो बह रहे इन आँसुओं के,
    मर्म की पीड़ा समझती जा रही हो ।।

    भावों में डूबी सुंदर रचना....

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  43. ♥(¯`'•.¸(¯`•*♥♥*•¯)¸.•'´¯)♥
    ♥नव वर्ष मंगबलमय हो !♥
    ♥(_¸.•'´(_•*♥♥*•_)`'• .¸_)♥




    खड़ा मैं कब से समुन्दर के किनारे,
    देखता हूँ अनवरत, सब सुध बिसारे ।

    कोई कह दे, छोड़कर पथ विगत सारा,
    तुझे पाया, पा लिया अपना किनारा ।
    कोई कह दे, भूल जाओ स्वप्न भीषण,
    कोई हो जो हृदय को थपका रही हो ।
    कोई कह दे, देखता जो नहीं सपना,
    कोई हो जो प्रेयसी बन आ रही हो ।।

    देखिए, सचमुच कोई आ गई तो गृहयुद्ध की स्थिति बन सकती है
    ;)

    आदरणीय प्रवीण पाण्डेय जी
    आपकी छवि हमारे मनों में कवि/गीतकार की नहीं है ...
    लेकिन आपकी पद्य रचनाएँ पढ़ने पर स्वतः ही मन बोल उठता है -
    वाऽह ! क्या बात है !
    सुंदर भाव !
    सुंदर शब्द !
    खूबसूरत रचना !
    आपकी लेखनी से और भी सुंदर , श्रेष्ठ गीत निसृत हों …
    अस्तु !

    नव वर्ष की शुभकामनाओं सहित…
    राजेन्द्र स्वर्णकार
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  44. मन की कोमल सी ख़्वाहिश लहरों को संबोधित करते हुये .... बहुत सुंदर भाव ।

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  45. कोई हो, एकान्त की खुश्की मिटाने,
    नीर अपने आश्रय का ला रही हो ।
    कोई हो जो बह रहे इन आँसुओं के,
    मर्म की पीड़ा समझती जा रही हो

    सुमधुर, सुंदर, खूबसूरत रचना.

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  46. कोई हो, एकान्त की खुश्की मिटाने,
    नीर अपने आश्रय का ला रही हो ।
    कोई हो जो बह रहे इन आँसुओं के,
    मर्म की पीड़ा समझती जा रही हो

    सुमधुर, सुंदर, खूबसूरत रचना.

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  47. कुछ भावनाएं गाहे बगाहे कवि होने का प्रमाण दे ही डालती हैं । खूबसूरत से भाव ।

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  48. यह अनन्त की ही तलाश है

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