30.1.13

ताकि सुरक्षित रहे आधी आबादी

पहले ही स्पष्ट कर दूँ कि यह लेख पूर्णतया व्यक्तिगत अनुभवों और लेखक की सीमित बौद्धिक क्षमताओं के आधार पर ही लिखा गया है। जीवन में संस्कार, संस्कृति, शिक्षा, सामाजिकता आदि के अंश समुचित रूप से विद्यमान रहते हैं अतः विचार प्रक्रिया में उनका उपस्थित रहना स्वाभाविक है। विचार पद्धतियों के मत भिन्न हो सकते हैं, एक छोर पर बैठे व्यक्ति को दूसरा छोर स्पष्ट न दिखता हो, पर बिना दोनों छोरों को समाहित किये कोई संगठित सूत्र निकलना कठिन होता है। दूसरे तथ्यों और सत्यों की उपस्थिति हीन सिद्ध कर देना भले ही बौद्धिक धरातल पर विजय ले आये पर वह विजय समाज की विजय नहीं हो सकती। जीवन एकान्त या घर्षण में नहीं जिया जा सकता है, एक राह निकलनी ही होती है, सबके चलने के लिये। एकरंगी आदर्श की तुलना में बहुरंगी यथार्थ ही सबको भाता है, वही समाज की भी राह होती है।

बहुत दिनों से इस विषय पर लिखना चाह रहा था, पर पिछले माह हुये घटनाक्रम और सामाजिक परिवेश में मचे हाहाकार ने इस विषय पर चिन्तन के सारे कपाट बन्द कर दिये। लगा कहीं कुछ भी ऐसा लिख दिया जो परोक्ष रूप से भी हाहाकार के स्वर में नहीं हुआ तो हमारी मानसिकता को दोषी मान उसे भी कटघरे में खड़ा कर दिया जायेगा। एक पक्षीय संवेदनशीलता को दूसरी ओर से संवेदनहीनता घोषित कर दिया जायेगा। वादी, विवादी, संवादी, न जाने कितने स्वर उठ खड़े होंगे। भिन्न वादों के बादल धीरे धीरे छट रहे हैं, विवादों के स्वर मंद पड़ रहे हैं, संभवतः यही समय है कि विगत विचारों को संघनित कर एक सार्थक संवाद किया जाये, उन समस्याओं पर जो हमें व्यथित किये हैं, उस मूलभूत माध्यम से जो हम सबको छूकर निकलता है।

पुरुषों के प्रति अपराध और महिलाओं द्वारा महिलाओं के प्रति किये अपराध विषयक्षेत्र से बाहर रखे गये हैं। यह लेख मात्र पुरुषों के द्वारा महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराधों पर ही केन्द्रित है और उसी में ही सीमित रहेगा। यद्यपि तीनों प्रकार के अपराध समाज में विद्यमान है और एक दूसरे से प्रभावित भी, पर पुरुषों के द्वारा महिलाओं के प्रति किये गये अपराध कहीं अधिक मात्रा में हैं और कहीं अधिक संवेदनहीन हैं। यदि मात्र उनके कारणों की विवेचना व निदान कर लिया जाये तो शेष दो स्वयं ही सध जायेंगे।

समाज परिवारों से बनता है, परिवार संबंधों से बनते हैं, संबंध व्यक्तियों के बीच पल्लवित होते हैं। यदि समाज के किसी विकार का विश्लेषण करना हो तो चिन्तनपथ संबंधों से होकर जायेगा। मेरी वर्तमान स्थिति में वह प्रमुखतः ४ संबंधों से होकर निकलता है, माँ, बहन, पत्नी और बेटी। कई लोगों के लिये यह चारों संबंध भले ही उपस्थित न हों, पर हमारा अस्तित्व माँ के संबंध और उपकार का ही प्रतिफल है। यह एक विमा तो बनी ही रहेगी, जन्म हुआ है तो संबंध भी बना है। प्रस्तुत लेख में मेरा आग्रह और विचारदिशा बस यही दिखाने की रहेगी कि यदि इन चार संबंधों की संवेदनशीलता को जिया जाये और उसे सदा याद रखा जाये तो उपस्थित समस्या का सहज निदान ढूढ़ा जा सकता है।

माँ की महानता को उजागर करता हुआ पूरा का पूरा साहित्य है, पूरा का पूरा भावनात्मक पक्ष है। जीवन देने से लेकर लालन पालन तक माँ के ममत्व का कोई मोल नहीं, बस उसे एक पक्षीय अहैतुक कृपा ही मानी जायेगी। ममत्व बड़ा ही प्राकृतिक है, हर जीव में विद्यमान है, सब जानते हैं कि किस तरह अपनी संतानों की रक्षा करनी है। यदि किसी भी वस्तु के प्रति कृतज्ञता प्रथम वरीयता में खड़ी है तो वह है माँ की ममता। ऐसा नहीं है कि एक पुत्र इस तथ्य को नहीं जानता है, कोई भी औसत बुद्धि वाले के लिये यह निष्कर्ष निकालना कठिन नहीं है और पुत्र की मौलिक विचारप्रवाहों में इसका महत्व रहता भी है। तब कुछ लोगों में महिलाओं के प्रति आदर क्षीण कैसे होता है, यहाँ तक कि कैसे अपनी ही वृद्ध माताओं को उनके पुत्र ध्यान नहीं देते। उत्तर संभवतः उनके परिवार में ही छिपा रहता है। बच्चे अपने माँ और पिता के संबंधों को ही देख कर सीखते हैं, उन्हें ही अपना आदर्श मानते हैं। उनका आपसी व्यवहार पुत्र के लिये बहुत महत्वपूर्ण होता है।

अब जिन परिवारों में पत्नी को प्यार व सम्मान नहीं मिलेगा, वहाँ के बच्चे क्या देखेंगे और क्या सीखेंगे? जीवन की प्रथम शिक्षा ही यदि महिलाओं के प्रति अनादर की हुयी तो कहाँ तक माँ का किया उपकार बच्चों के मस्तिष्क में सर्वोपरि बना रहेगा। उसे भी लगने लगेगा कि ममता आदि सब भावनात्मक विषय हैं पर पारिवारिक परिस्थितियों में महिलाओं की यही स्थिति है, यही सम्मान है। माता पिता के बीच सामञ्जस्य के आभाव में दो तरह की मानसिकता ही विकसित होती है, या तो पुत्र पिता की तरह रुक्ष व असंवेदनशील हो जाता है या माँ के प्रति अपने उपकार से बद्ध अतिसंवेदनशील हो जाता है, भावुक हो जाता है। दोनों ही परिस्थितियाँ संतुलित विकास में अवरोध हैं। महिलाओं के प्रति हमारे व्यवहार के प्रथम बीज हमारे माता पिता ने ही बोये होते हैं। यदि किसी व्यक्ति ने महिला के प्रति कोई अपराध किया है तो प्रथम प्रश्न माता पिता पर उठना चाहिये, संभावना बहुत है कि उत्तर वहीं मिल जायेगा।

महिलायें आधी आबादी हैं, यदि उनके साथ निभा कर जीना नहीं आ पाया तो हम अर्धजगत से विलग ही अनुभव पा पायेंगे, अर्धशिक्षित ही रह जायेंगे। अनुभव की दूसरी शिक्षा बहन के माध्यम से आती है। हर घर में बहन होनी आवश्यक है, यदि घर में बहन नहीं होगी तो ममता के द्वारा प्राप्त महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता भी घुल जाने का भय है तब। एक निकट संबंधी के परिवार को जानता हूँ, सारे पुत्र ही हैं, उनके घर का वातावरण काटने को दौड़ता है, किस समय वहाँ क्या बोल दिया जायेगा, पता नहीं चलता है। ऐसा नहीं है कि सारे परिवार ऐसे ही होते हैं पर बहन का घर में होना पुत्र को महिलाओं के प्रति और संवेदनशील बनाता है। मैं बुंदेलखण्ड से आता हूँ और वहाँ की एक मान्यता मुझे सदा आशा की किरण दिखाती है। वहाँ माँ की कोख तब तक शुद्ध नहीं मानी जाती जब तक वह किसी बिटिया को जन्म न दे दे। संभवतः मेरे घर में भी तीसरी सन्तान के रूप में मेरी छोटी बहन को आना इसी मान्यता की पुकार रही होगी। अत्यधिक पुत्रमोह और पुत्रियों को गर्भ में ही समाप्त कर देने की प्रथा न जाने कहाँ जन्मी, न जाने क्यों जन्मी, कहना कठिन है। पर वही प्रारम्भिक अपराध है, महिलाओं को प्रति और उनका बहनों के रूप में परिवार में न आना एक और कारण है, भाईयों के अन्दर वह संवेदनशीलता न उत्पन्न होने का, जो पुत्रों को संतुलित रूप से विकसित करने के लिये आवश्यक है।

तीसरा और महत्वपूर्ण पड़ाव पत्नी के रूप में आता है। इस पड़ाव में ही पुरुष की समझ और संवेदनशीलता विकसित और परिपक्व होती है, उसे साथ में मिलकर कार्य करने वाला साथी मिलता है। अब तक वह परिवार का अंग रहता था, पत्नी के आने के बाद उस पर परिवार चलाने का उत्तरदायित्व भी आ जाता है। जब मिलकर किसी एक ध्येय के लिये दो लोग कार्य करते हैं, एक दूसरे को समझने के लिये उससे अच्छा माध्यम नहीं हो सकता है। परिवार के माध्यम से समाज से जुड़ना, दूसरे पक्ष के संबंधियों से जुड़ना, समाज को और अधिक समझ पाना, ये सब उस प्रक्रिया का अंग है जो हमें समाज के रूप में रहना सिखाती है। बच्चों को एक प्रभावी नागरिक के रूप में विकसित करना और उन्हें समाज और विशेषकर महिलाओं के प्रति संवेदनशील बनाना, परिवार का ही कार्य है। एक प्रसन्न परिवार संवेदनाओं का केन्द्र होता है, यही वह केन्द्र है जिसका सुचारु और अधिकारपूर्ण संचालन महिलाओं के प्रति अपराधों पर सशक्त नियन्त्रण रख सकता है।

चौथा और सर्वाधिक मधुर संबंध बिटिया का होता है। प्रथम तीन संबंधों में तो पुरुष ने केवल कुछ ग्रहण ही किया होता है, यह वह समय होता है जब कुछ देने की स्थिति में होते हैं हम। किसी बिटिया को पालना और बड़े होते देखना ही महिलाओं की संवेदना समुचित समझने का माध्यम है। व्यक्तिगत अनुभव से ही कह सकता हूँ कि पुरुष के दायित्वबोध का निष्पादन बिटिया के लालन पालन में ही उभर कर आता है, पुरुष के रुक्ष भाव उसी समय अपनी गाँठ खोल देते हैं, पितृत्व के निर्वाह में ही पूर्णता पाता है पुरुष का अस्तित्व। जब आप एक के प्रति लालन पालन का भाव लेकर जी रहे होते हैं तो किसी अन्य के प्रति अपराध का भाव भी कैसे ला सकते हैं।

जो इन चारों संबंधों को पर्याप्त मान देता है, वह सहायक होता है सुख में, समृद्धि में, वह सहायक होता है सभ्यता को उत्कृष्ट स्थान पर पहुँचाने के लिये, वह सहायक होता है ऐसी मानसिकता फैलाने में जहाँ सबका समुचित सम्मान हो, सबका समुचित आदर हो। फिर भी ऐसे तत्व बने रहेंगे जो सधा सधाया संतुलन बिगाड़ने का प्रयत्न करेंगे। कानून व्यवस्था ऐसे ही अपवादों से निपटने के लिये बनी है, सामाजिक व्यवस्था को यथा रूप चलने देने के लिये। वृहद बदलाव पर अन्दर से आता है, भव्यता का प्रकटीकरण पहले हृदय के अन्दर होता है तब कहीं वह वास्तविकता में ढलता है। जो चार संबंध हमें सर्वाधिक प्रिय हैं, उन्हीं में हमारी सामाजिक स्थिरता व संतुलन के बीज छिपे हैं। उन्हीं को साधने से सब सध जायेगा, शेष साधने के लिये तन्त्र उपस्थित हैं।

मुझे बड़ा ही आश्चर्य लगा कि अब तक मचे हाहाकार में कठिनतम दण्ड की बात तो सबने की, जो निसंदेह आवश्यक भी है, पर संबंधों के जिन सशक्त तन्तुओं से एक सार्वजनिक चेतना का विकास संभव था, उस पर सब मौन रहे। अधिकारों की लड़ाई खिंचती है, तनाव लाती है। संबंधों की उपासना जोड़ती है, आनन्द लाती है। हमारे सामूहिक कलंक के मुक्ति का मार्ग संभवतः यही है कि हम सब अपने इन चार संबंधों को प्रगाढ़ करें, और संवेदनशील करें।

(यह लेख राजस्थान पत्रिका के २६ जनवरी विशेषांक में भी छपा है, बंगलोर संस्करण में)

26.1.13

ठंड में स्नान

कुम्भ में कई श्रद्धालुओं को स्नान करते हुये देख रहा हूँ, शरीर से भाप का उठना स्पष्ट देखा जा रहा है। उधर ज्ञानदत्तजी के फेसबुक पर कोहरे और ठंड की व्यापक आख्या भी प्रस्तुत है। परिचितों और संबंधियों से फोन पर बात करते समय स्वर में ठंड के कंपन गूँज रहे हैं, शरीर पर कपड़ों की कई परतें चढ़ी हुयी हैं, उत्तर भारत का सारा कपड़ा अल्मारियों और दुकानों से बाहर आ कँपकपाते शरीरों को आश्वासन दे रहा है। सूर्य के अतिरिक्त जो वस्तु जैसे भी ऊष्मा दे सकती है, अपने कार्य में लगी हुयी है। ऐसे में टीवी पर कुम्भ स्नान के चित्र देखने से श्रद्धालुओं की श्रद्धा की जीवटता का अनुमान लगाने में किसी को भी सन्देह नहीं हो सकता है। एक दो नहीं, करोड़ों शरीर प्रचण्ड ठंड में अपनी शरीर की ऊष्मा आहुति स्वरुप गंगा मैया को चढ़ा रहे हैं, ठंड में भला इससे अधिक क्या आहुति हो सकती है। अब ईश्वर को विवश होकर ही सही, प्रसन्न तो होना ही पड़ेगा।

हम चाह कर भी अपने शरीर की ऊष्मा तज ईश्वर को प्रसन्न नहीं कर पा रहे हैं। क्या करें, यहाँ पर ठंड पड़ती ही नहीं है, ठंड तो क्या यहाँ पर गर्मी भी नहीं पड़ती। ईश्ववर को प्रसन्न करने के दोनों ही मार्ग बन्द हैं। यहाँ बंगलोर में ठंड के नाम पर पूरी बाँह की शर्ट ही पर्याप्त होती है, ठंड का आनन्द चाह कर भी नहीं मिल पाता है। वैसे तो सादे पानी से ही नहा लेते हैं पर कभी कभी विलासिता सूझती है तो गीज़र के गुनगुने पानी से नहा कर थकान दूर कर लेते हैं।

देखा जाये तो स्नान का पवित्रता से नाता है और पवित्रता का ईश्वर से, यही कारण है कि जब भी हम पूजा करने बैठते हैं तो नहा धोकर बैठते हैं। कलियुग में पापों की कमी नहीं रहेगी, चाहेंगे, न चाहेंगे, पाप हो ही जायेगा। प्रत्यक्ष से न होगा तो विचारों से ही हो जायेगा। पाप धुलने का कोई उपाय नहीं, जो हो गया सब खाते में लिख गया। बस पूजा और प्रार्थना ही उपाय बचता है लिखे हुये को धोने का। एक दिन में ही इतने पाप हो जाते हैं कि नियमित पूजा करना आवश्यक है। कभी आप सोच भी लें कि दो दिन में एक बार ही पूजा कर के काम चला लिया जाये तो आपको पिछले दिन के पाप याद ही नहीं आयेंगे, कलियुग में स्मरण शक्ति भी कम कर रखी है ईश्वर ने। ले देकर आप पाप करने को बाध्य हैं, पाप धोने के लिये नित पूजा करने को बाध्य हैं, पूजा करने के लिये नित स्नान करने को बाध्य हैं। ऐसा लगता है कि सारा कालचक्र हमें नित नहाने के लिये ही रचा गया है।

अब आपको लग सकता है कि यदि किसी तरह से पाप करने से बच जायें तो नित नहाने की बाध्यता भी समाप्त हो जायेगी। न पाप करेंगे, न पूजा करनी पड़ेगी और न ही स्नान करना पड़ेगा। विचार सशक्त है, पर ईश्वर ने उसका भी तोड़ निकाल रखा है। आप पाप नहीं करेंगे तो अति सज्जन हो जायेंगे, अति सज्जन होने के कारण आपकी अपने आस पास के लोंगों से पटेगी नहीं। आपके साथ कार्य करने वाले आपको अपने मार्ग का काँटा समझेंगे, आपके पड़ोसी आप पर हँसेंगे। साथी आप पर कुटिल चालों से आघात करेंगे, आपको झूठा ही फँसा देंगे। पड़ोसी आप पर व्यंग बाण छोड़ेंगे। जब आहत और बिंधे हुये घर आयेंगे तो घरवालों से भी पर्याप्त झिड़की खायेंगे। इतना सब होने के बाद आपका तन मन अशान्त हो जायेगा, आप वाह्य विश्व का मैल उतार फेंकना चाहेंगे। मानसिक अशान्ति के लिये पुनः पूजा और पूजा के लिये पुनः स्नान। कुछ भी कर लीजिये स्नान तो ईश्वर आपसे नित करवा के ही रहेंगे। गर्मी हो तो आनन्द से कीजिये, ठंड हो तो कष्ट में कीजिये, बरसात में तो वह स्वयं स्नान की व्यवस्था सम्हाले रहते हैं।

सर्वाधिक पुण्य कमाना हो तो ठंड में ठंडे पानी से ही स्नान करना चाहिये। जानकार कहते हैं कि चाहे आप ठंडे पानी से स्नान करें या गर्म पानी से कष्ट उतना ही होता है और आनन्द भी उतना ही आता है। गर्म पानी से स्नान करने में स्नान करते समय आनन्द आता है पर स्नान के बाद ऐसी कँपकपी छूटती है कि आप कई घंटों तक संयत नहीं हो पाते हैं। वहीं दूसरी ओर यदि आप ठंडे पानी से स्नान करें तो पहले दस सेकेण्ड का ही कष्ट रहता है। पहले दस सेकेण्ड के पश्चात शरीर इतनी ऊष्मा उत्सर्जित करता रहता है कि दिन भर ठण्ड नहीं लगती है। भयंकर से भयंकर ठंड हो, ठंडे पानी में किया स्नान अन्ततः हानि नहीं पहुँचाता है। प्रशिक्षण के समय उदयपुर में और जनवरी के माह में पूरे ३१ दिन तक ठंडे पानी में सुबह सुबह स्नान करने के अनुभव के आधार पर आपको बता रहा हूँ कि ऐसा करने से दिन भर चेतना अपने उत्कर्ष पर रहती है।

वैसे भी गर्म पानी से नहाना आपके लिये पूर्ण आध्यात्मिक शुद्धि लेकर नहीं आयेगा, तब आपको पूजा अधिक करनी पड़ेगी। पानी गर्म करने के लिये या तो आप कहीं से लकड़ी काटेंगे, गैस जलायेंगे या बिजली का प्रयोग करेंगे। इन तीनों ही दशाओं में आप प्रकृति को क्षति पहुँचा रहे हैं। यमराज के यहाँ खुले नये कार्यालय में आपको कार्बन डेबिट मिल जायेगा और आपके पापों पर सरचार्ज भी जुड़ जायेगा। कितना पाप और जुड़ेगा कुछ नहीं कह सकते। जिन्हें रिलायन्स के टेलीफ़ोन बिल चुकाने का अनुभव है, वे ही बता सकते हैं कि दिन भर के पापों से भी अधिक सरचार्ज लग सकता है, स्नान के बाद की गयी पूजा से भी अधिक का। अत श्रेयस्कर है कि स्नान न करें, पूजा न करें पर गर्म पानी से नहाने की सोचे भी नहीं। ईश्वर के नियम ठंड में ठंडे पानी से नहाने की ओर इंगित करते हैं, उनका उल्लंघन निश्चय ही प्रकृतिविरुद्ध है।

जब ईश्वर के नियम आपसे जबरिया स्नान करवाने के लिये बने हों तो क्यों न स्नान में आनन्द उठाया जाये। बचपन का सारा समय स्नान में आनन्द उठाने की स्मृतियों से भरा हुआ है। गर्मियों में नदी नहाने में घंटों निकल जाते थे, जितनी देर पानी के अन्दर रहे उतनी देर सूरज के क्रोध को ठेंगा दिखाते रहे, प्रकृति के एक अंग से दूसरे का सामना। गर्मियों में नहाना कष्ट नहीं है, न नहाना कष्ट है, फिर भी नहाने का आनन्द तो उठाना ही होता है। ठंड का स्नान भी बहुधा छत पर होता था, धूप में, कड़वे तेल से मालिश करने के बाद, गिन चुन कर उतना ही जितना शरीर भिगो कर धोने और सुखाने के लिये पर्याप्त हो। ठंड में स्नान करने के लिये मन बनाने, सामग्री एकत्र करने, पहला पानी का डब्बा उड़ेलने में ही घंटों समय लग जाता है, पहला डब्बा डालते ही शेष के सारे कार्य यन्त्रवत कुछ मिनटों में ही सम्पन्न हो जाते हैं। आप अब पूछ सकते हैं कि इसमें आनन्द कहाँ? असली आनन्द तब आता है जब दूसरे को ठंड में स्नान करते हुये देखते हैं और अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं।

छात्रावास में भी स्नान करना अनिवार्य था, न नहाने वालों को विशेष संबोधनों से धोया जाता था। सुबह के समय ट्यूबवेल की धार बहती थी और हम बच्चे एक एक करके दस सेकेण्डों के लिये उस धार के नीचे खड़े हो जाते थे। धार से ही जितना मैल कट जाये उतना ही अच्छा, शेष हाथ से ही रगड़ कर साफ कर लेते थे। कुछ साहसी बच्चे ही साबुन लगा कर पुनः ट्यूबवेल के नीचे जाने की प्रतीक्षा का कष्ट उठा पाते थे। ट्यूबवेल का पानी तनिक गर्म होता है और उतना कष्टकारी नहीं लगता है स्नान। हाँ, स्नानागार से वापस कमरे तक जाने में लगभग ५० मी की दूरी तय करनी होती थी, किस गति से हम अपने कमरे पहुँच जाते थे पता ही नहीं चलता था। यदि वहीं दूरी १०० मी की कर दी जाती तो हमारे छात्रावास के कई कीर्तिमान हो जाते १०० मी फर्राटा दौड़ में।

भारतीय बच्चों को नित नहाने के लिये प्रेरित करने में हमारी माताओं का विशेष योगदान है। यदि मातायें खाना न देने की चेतावनी न दें तो संभव है बहुत से शीतभीरु बालक दो माह स्नान ही न करें। क्या करें, जाड़े में भूख भी तगड़ी लगती है, एक दो दिन उपवास में निकालना कठिन हो जाता है, अब ले देकर नहाना ही पड़ेगा। लीजिये, श्रीमतीजी भी पुकार रही हैं कि आप नहा लीजिये तो नाश्ता लगाया जाये। उठते हैं, नहा ही लेते हैं, कुंभ में इतने लोगों को नहाते देख कर अपनी ठंड तुच्छ ही लग रही है।

हर हर गंगे, सयत्न संचित शारीरिक ऊष्मा का तुच्छ भोग स्वीकार करो, माँ।

23.1.13

बख्शा तो हमने खुद को भी नहीं है

एक साथी अधिकारी के कार्यालय में बैठे थे, किसी समन्वय के विषय पर बात चल रही थी। एक कर्मचारी आता है, एक बड़ी ग़लती के संदर्भ में, आरोप तय हो चुके थे, दण्ड के बारे में बख्श देने की बात कर रहा था। बातों से लग रहा था कि ग़लती हुयी नहीं है वरन की गयी थी और वह भी अक्षम्य थी। अधिकारी अपनी न्यायप्रियता के लिये जाने जाते थे, अच्छे कर्मचारियों के चहेते और ठीक से कार्य न करने वालों के लिये भयकारक। उनका उत्तर सुनकर मैं दंग रह गया। उन्होने कहा कि कैसे बख्श दें, बख्शा तो हमने खुद को भी नहीं है।

बात सच थी, मैं उन्हें जितना जानता था, स्वानुशासन में कसे किसी भी और व्यक्ति से अधिक अनुशासित, किसी भी समय हो, कैसी भी परिस्थिति हो, कार्य के प्रति और अनुशासन के प्रति कठोर। जो स्वयं के लिये कठिन मापदण्ड निश्चित करता है वही दूसरे के प्रति कठोरता भी दिखा सकता है। अनौपचारिक रूप से पूछने पर बताया कि यदि कर्मचारी का व्यवहार उनके प्रति व्यक्तिगत रूप से अप्रिय होता तो उसे क्षमा करने में उन्हें एक पल भी न लगता। आरोप ऐसा था जो रेलवे के प्रति अप्रिय था, उस दशा में क्षमा कर देना उनके अधिकार क्षेत्र के बाहर था। व्यक्तिगत जीवन में अत्यन्त सहनशील और अनुशासित व्यक्ति का प्रशासनिक रूप में इतना कठोर व्यवहार देख मन सोचने को विवश हो गया।

दण्ड के बारे में इतिहासों में न जाने कितने उदाहरण बिखरे पड़े हैं। दो छोर हैं, कम आरोप के लिये अधिक दण्ड और अधिक दण्ड को भी क्षमा कर देने का उदारहृदय। इन दोनों छोरों के बीच में सब प्रशासक अपने आप को पाते हैं। प्रशासनिक मानक सदा ही ज्ञात रहे हैं, किस आरोप के लिये कितना दण्ड हो यह बहुत कुछ नियत है, दण्ड कितने प्रकार के हों यह भी नियत है। मानवीय हस्तक्षेप दो ही रूप में आता है। पहला आरोपों को किस परिप्रेक्ष्य में लिया जाये, गलती अनजाने में हुयी या जानबूझ कर की गयी। दूसरा यह कि यदि उसका दण्ड कम रखा जाये तो भविष्य में पुनरावृत्ति की क्या संभावनायें हैं? इस क्षमा के लिये क्या वह कृतज्ञ रहेगा और भविष्य में अधिक मन लगा कर कार्य करेगा?

हर प्रशासक के लिये मानवीय हस्तक्षेप का अर्थ भिन्न होता है। यह दो कारकों पर निर्भर करता है। पहला कि प्रशासक के अन्दर अपने कर्मचारियों को लेकर कितनी आशावादिता शेष है, आशावादी प्रशासक सदा ही एक और अवसर देने को प्राथमिकता देते हैं। दूसरा कि प्रशासक अपने जीवन में स्वयं ही कितने अनुशासित हैं, अधिक अनुशासित उसी तरह का प्रशासन चाहते हैं जो उन्होंने स्वयं पर लागू कर रखा होता है। आशावादिता और अनुशासनप्रियता दोनों ही अलग विमायें हैं, एक प्रमुखतः सामाजिक है, दूसरी प्रमुखतः व्यक्तिगत, पर मानवीय हस्तक्षेप पर इनका प्रभाव मिलाजुला होता है।

अब मित्र अधिकारी का कठोर निर्णय उनकी क्षीण आशावादिता से अधिक प्रभावित था या अनुशासनप्रियता से, यह स्पष्ट कहना कठिन है। अधिक पूछने का अर्थ उनके अर्धन्यायिक अधिकारक्षेत्र में दखल देने जैसा था, पर इस विषय ने स्वयं के बारे में सोचने को प्रेरित अवश्य किया। मेरे कर्मचारी बहुधा जो पीठ पीछे चर्चा करते रहते हैं. वह परोक्ष रूप से देर सबेर पता ही चल जाती है। उनकी राय में मेरा चित्रण कार्य करवाने में कठोर पर कार्य के समय की गयी गलतियाँ क्षमा कर देने में सहदृय प्रशासक के रूप में किया जाता है। सुनकर बहुत अच्छा लगता है, यदि संस्था का कार्य सिद्ध हो रहा है तो दण्ड का क्या महत्व है? सबको ही कम दण्ड दिया है ऐसा भी नहीं है, कई कठोर उदाहरण भी हैं, पर मुख्यतः निर्णयप्रक्रिया में आशावादिता सर चढ़ बोली है।

मुझे ज्ञात है कि दण्ड के विषय में सहृदय हो जाना लगभग १५ प्रतिशत घटनाओं में उल्टा बैठा है या कहें कि क्षमा किये लोगों पर कोई सुधार नहीं हुया और उन्होंने गलतियाँ पुनः की। लगभग ५० प्रतिशत लोगों पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा, पर वे नकारात्मकता की ओर भी उद्धत नहीं हुये। पर जिन ३५ प्रतिशत लोगों ने क्षमा का महत्व समझा और अधिक श्रम कर अपनी पुरानी गलतियों को भर दिया, वे मेरे लिये दण्ड प्रक्रिया का आनन्द रहे हैं, दण्ड न देने से ही सुधरने वाले। अनुशासन के मार्ग पर मध्यम और आशावादिता के मार्ग पर उच्च विश्वास सदा ही मेरी निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करते रहे हैं।

आशावादिता के निष्कर्ष कई लोगों के लिये १५ प्रतिशत घटनाओं से कहीं अधिक नकारात्मक रहे होंगे। इस प्रतिशत का अधिक होने का अर्थ है, धीरे धीरे आशावादिता से विश्वास उठ जाना। यही सामाजिक और पारिवारिक क्षेत्र में भी लागू होता है, नकारात्मकता की एक घटना किन स्थानों पर किस रूप में सामने खड़ी हो जायेगी, कहना कठिन होता है। किसी घटना को लेकर समाज के स्वर इन्हीें विमाओं के सतरंगे स्वरूप होते हैं, संदर्भों के परिप्रेक्ष्य में सभी अपने अपने स्थान पर सच भी होते हैं। किसी अपराध के लिये कोई मृत्युदण्ड माँगता है, कोई उन्हें सुधरने देना चाहता है, बिना यह जाने कि उन दोनों का का अर्थ है अपराधी के लिये। अपराधी के लिये इन सब माँगों में सब अपने मन को व्यक्त करते हैं, कि यदि अपराध उनने किया होता तो क्या दण्ड मिलना चाहिये?

बड़े महान होते हैं वे जो स्वयं के लिये तो बड़े कठिन मापदण्ड बनाते हैं पर अन्य को क्षमा करने में बड़े उदार हो जाते हैं, ऐसे लोग उदाहरण प्रस्तुत करते हैं उनके लिये जिन्हें उन्होने क्षमा किया है। वहीं दूसरी ओर बड़े ही धूर्त होते हैं वे लोग जो स्वयं के लिये तो रीढ़विहीन मापदण्ड बनाते हैं पर दूसरों को कठिनतम दण्ड देने के लिये सदा उद्धत रहते हैं। दूसरी प्रकार के लोग दण्डप्रक्रिया में नकारात्मकता भरने का कार्य बड़ी शीघ्रता से कर डालते हैं, भययुक्त वातावरण बनने में देर नहीं होती तब।

पता नहीं मैं ठीक करता या नहीं, पर संभवतः उस दिन कर्मचारी को क्षमा कर के एक और अवसर देता, कुछ अच्छा करने के लिये, जिससे उसका ग्लानिभाव कम हो जाये। आरोप व दण्ड का भारीपन जीवन में नकारात्मकता न ले आये, उसमें तनिक सहायक बनने का कार्य करता। उस कर्मचारी के आरोप के आधार पर संभावना अवश्य थी कि भविष्य में मेरा निर्णय सही नहीं ठहराया जाता, फिर भी उत्कट आशावादिता से बच पाना कठिन है मेरे लिये भी।

19.1.13

समाचार संश्लेषण

शीर्षक पढ़कर थोड़ा सा अटपटा अवश्य लगा होगा। स्वाभाविक ही है क्योंकि समाचार के साथ संश्लेषण शब्द प्रयुक्त ही नहीं होता है। संश्लेषण का अर्थ है, भिन्न से प्रतीत होने वाले कई विचारों, तथ्यों या वस्तुओं को एकरूपता से प्रस्तुत करना। समाचार तो एक तथ्य है, एक तथ्य में भिन्नता कहाँ से और यदि भिन्नता नहीं तो उसका संश्लेषण कैसा? यदि समाचार के साथ कुछ किया जा सकता है तो वह है उसका विश्लेषण, समाचार विश्लेषण एक सुना हुआ शब्द भी है। समाचार को कई पहलुओं में विभक्त कर उसके कारणों और निष्कर्षों की विवेचना ही उसका विश्लेषण हुआ। विश्लेषण में मत भिन्न हो सकते हैं पर समाचार का तथ्य अभिन्न रहता है।

विकास जब अँगड़ाई लेता है तो जम्हाई के कई स्वर उसमें समाहित हो जाते हैं, जितनी बार अँगड़ाई लेता है उतने ही नये स्वर आ जाते हैं। दूसरी प्रकार से कहें तो जब कोई नया खिलौना बच्चे के हाथ लगता है तो उससे सम्बन्धित नये खेल ढूढ़ लेता है, रचना कर डालता है। जब पहली बार गेंद बनी होगी तो जमीन पर लुढ़का कर खेलने वाला कोई खेल बना होगा, कुछ बॉउलिंग जैसा। धीरे धीरे पिठ्ठू जैसे खेल की अवधारणा बनी होगी। हॉकी, फुटबाल, बॉस्केटबॉल, हैण्डबॉल, टेबलटेनिस, कंचे और न जाने क्या क्या खेल, हाँ हाँ, क्रिकेट भी, बिना उसके खेलों की परिभाषा कहाँ पूरी होगी भला? बॉल के आकार प्रकार के आधार पर खेल बने होंगे, उनके नियम बने होंगे। जब तक बॉल का स्वरूप उस प्रकार का बना रहता है, वह खेल होता रहता है, आनन्द आता रहता है।

यही विकासक्रम समाचारों पर भी लागू होता है, पहले दूतों के माध्यम से एक आध समाचार आते थे पड़ोसी देशों के, उससे अधिक खेल और छेड़छाड़ नहीं हो पाती थी। स्थानीय समाचार शाम के जमने वाली पंचायतों या बैठकों में चर्चा में लिये जाते होंगे, पर अधिक तो वे भी नहीं होते होंगे। स्थानीय समाचारों में सम्बन्धित व्यक्ति या घटना की जानकारी पहले से ही रहती होगी अतः उसमें भी अधिक छेड़छाड़ की संभावना नहीं रहती होगी। सीमित संवादों से बढ़कर स्थिति समाचारपत्रों और चैनलों तक आ पहुँची है। देश भर के समाचार देखने के लिये पूरा देश ही बैठा है। समाचार भी वही उठाये जाने लगे हैं जो मन में तरंग संचारित कर दें। हर कोई ऐसे ही समाचारों को प्राथमिकता देने लगा, एक होड़ लगी है कि किस तरह प्रतियोगिता जीती जाये, अधिक दर्शक जुटा लेने की।

अब यदि गेंद की तुलना समाचार से करें, तो गेंद के आकार प्रकार से कुछ विशेष तरह के ही खेल खेले जा सकते हैं। उदाहरण स्वरूप, बॉस्केटबॉल से आप लॉनटेनिस नहीं खेल सकते हैं। इसी प्रकार समाचार की प्रकृति के आधार पर आप उसे कुछ विशेष प्रकार से ही व्यक्त कर सकते हैं। यदि आप भिन्न प्रकार की गेंद से भिन्न खेल खेलें तो बॉल का जो हाल होता है, वही हाल चैनल समाचारों का कर रहे हैं। यही नहीं, एक समाचार को इतना अधिक दिखा डालते हैं कि यह पता ही नहीं चलता है कि उसका प्रारम्भिक या मूल स्वरूप क्या था? ठीक उसी प्रकार जैसे किसी एक बॉल को इतना पीटा जाये कि वह चीथड़े चीथड़े हो जाये।

समाचारों की तुलना गेंद से करने का उद्देश्य, किसी समाचार को नीचा दिखाना नहीं। अब कोई घटना हो गयी तो वह पिसेगी ही चैनलों की चक्की में, पिस कर क्या निकलेगी, क्या मालूम? दोष तो घटना का ही है कि वह क्यों हो गयी? मेरी समस्या उन सभी लोगों की समस्या है जिनके पास इतना समय नहीं रहता कि किसी एक समाचार को दो तीन दिनों तक देखें। यदि प्रारम्भ छूट जाता है तो वह समाचार बहुत आगे तक निकल जाता है, बीच में देखने में कुछ समझ भी नहीं आता है। यदि समझने के लिये दूसरा चैनल खोलें तो वही समाचार किसी दूसरी दिशा में भागा जाता हुआ दिखता है। तीसरे चैनल पर वही समाचार तब तक इतना धुन दिया जाता है कि उसकी विषयवस्तु को संयोजित करने में घंटों लग जाते हैं। यदि संशय दूर करने के लिये आप किसी से कुछ पूछ बैठे तो वह भी हँसने लगता है कि घंटे भर बैठने के बाद भी श्रीमानजी को समझ नहीं आ रहा है। उसे भी कहाँ फुर्सत, उसे तो उस समाचार के आगत व्याख्या भी देखनी है, कहीं ध्यान भंग हुआ तो उसे सारे सूत्र पुनः जोड़ने पड़ेंगे।

जहाँ एक समाचार का सागर व्याप्त है, उसके भिन्न स्तरों पर प्रस्तुत पक्ष उपस्थित हैं, इतना अधिक मंथन हो जाने के बाद के विष अमृत जैसे फल उपस्थित हैं, और हम हताश से कुछ न समझ पायें, यह समाचार का कम, हमारी समझ का अधिक अपमान है। यही कारण रहा होगा कि अपनी कमी छिपाने के लिये हम लोगों ने एक नयी विद्या विकसित कर ली है, समाचार संश्लेषण की। निश्चय ही पुराने जन्मों का प्रताप है कि पाँच मिनट में आठ चैनल देखते ही हमें समाचार पूरा समझ में आ जाता है। कहीं थोड़ा कम आता है, कहीं थोड़ा अधिक।

संश्लेषण अच्छा कर सकने के लिये आप को कुछ मूलभूत तथ्य जानने आवश्यक हैं। पहला तो सारे चैनलों की गति जानना आवश्यक है, उस चैनल पर एक समाचार कितना फैल चुका है, यह देखकर ही आप बता देंगे कि घटना कब हुयी थी? दूसरा, इन चैनलों की निष्ठायें समझना आवश्यक है, ऐसा करने से आप उन समाचारों को किस ओर कितना मोड़ कर स्वीकार करना है, यह पता चल जाता है। तीसरा है चैनलों की नये तथ्य खोजने और पुराने तथ्यों को खोदने की सामर्थ्य, इससे आपको विषय की गहराई विधिवत पता चल जायेगी।

इतना विशेष ज्ञान होने के बाद ही आप में वह सक्षमता विकसित हो पायेगी जिससे आप किसी समाचार का संश्लेषण कर पायेंगे। इन गुणों के अभाव में कितना ज्ञान आपके हाथ से रेत जैसा निकल जायेगा, उसका अनुमान लगाना ही कठिन है। एक समाचार पर हर चैनल का पुराना शोध उपस्थित है और नया शोध प्रतिपल उत्पन्न हो रहा है, विवेकानन्दजी की तरह पन्ने पलटकर सब समझ लेने की क्षमता विकसित करनी होगी अन्यथा समाचार के युग में असमाचारी ही रह जायेंगे।

आश्चर्य होता है कि संश्लेषण की इतनी विशिष्ट और ज्ञानपरक विधियाँ विद्यालयों में नहीं पढ़ायी जाती, नागरिकों को उनकी मेधा के अनुसार अस्तव्यस्त सीखने को विवश किया जाता है। आचार विचार से नयी पीढ़ी भले ही वंचित रह जाये, समाचार से जुड़े रहने का मानवाधिकार उससे नहीं छीना जा सकता है। आश्चर्य है, देश महाक्षति की ओर भागा जा रहा है और रास्ते में कोई मोमबत्ती भी नहीं जल रही है?

16.1.13

जाने व आने के बीच की शान्ति

रेलवे स्टेशन पर हुयी एक चित्रकला प्रदर्शनी के चित्रों को निहार रहा था, एक चित्र ने सहसा ध्यान आकर्षित कर लिया। चित्र में दो क़ुली बैठकर सुस्ता रहे हैं और शीर्षक है, द साइलेन्स बेटवीन डिपार्चर एण्ड एराइवल, जाने व आने के बीच की शान्ति। चित्रकार हैं श्री पी सम्पत कुमार।

जब चित्र देखा तो रेलवे स्टेशन पर घटने वाली सामान्य घटना का चित्रण लगा वह, एक ट्रेन जा चुकी है, दूसरी आने वाली है, कुलियों के लिये यह विश्राम का समय है। सामान्य यात्रियों को यह दृश्य नहीं दिखते हैं, ट्रेन के आते और जाते समय कुलीगण व्यस्त ही रहते हैं। हाँ, कभी ट्रेन के समय के बहुत पहले पहुँचना हो, किसी कारणवश स्टेशन पर अधिक रुकना पड़ जाये या विश्रामालय में कभी रुके हों और भोजनोपरान्त प्लेटफ़ार्म पर टहलना हो, तभी इस तरह के दृश्य दिखते हैं। हम रेलसेवकों के लिये यह दृश्य नियमित दिनचर्या का अंग है।

हम सबके लिये यह दृश्य भले ही सामान्य हो, पर चित्र को ध्यान से देखें, चेहरे के भाव पढ़ें और शीर्षक पर विचार करें तो यह दृश्य सामान्य नहीं रह जाता है। जीवन के संदर्भों में इस चित्र का दार्शनिक पक्ष बड़ा ही सशक्त है। कुलियों के शरीर तनिक शिथिल हैं, विगत श्रम का परिणाम हो सकता है, कुछ संवाद चल रहा है, संभवतः कार्य से संबंधित वार्तालाप हो या हो सकता है घर परिवार या गाँव का विषय हो। ठेले पर बैठना, श्रम और विश्राम का साधन एक होने की ओर संकेत कर रहे हैं। चित्र मानसिक स्तर पर जो कुछ भी संप्रेषित कर सकने में सक्षम है, वह व्यक्त सा दिख रहा है। रेलवे के बारे में जितना ज्ञान मनस पटल पर होगा, उतने संबद्ध अर्थ दे जायेगा यह चित्र।

दार्शनिक स्तर पर इस चित्र का शीर्षक बहुत कुछ कह जाता है। किसी युवा के लिये सप्ताह के कार्यदिवस सप्ताहान्तों के आनन्द के बीच की शान्ति है, उसका सारा मन इसी बात के लिये लगा रहता है कि कब पुनः सप्ताहान्त आये और वह आनन्दमय हो जाये। किसी कर्मशील के लिये सप्ताहान्त एक शान्ति के रूप में आता है। किसी विरहणा के लिये प्रियतम के जाने और आने की बीच की प्रतीक्षामयी शान्ति, किसान के लिये वर्षा के जाने और आने की बीच की शान्ति, विद्यार्थी के लिये परीक्षाओं के बीच की शान्ति, श्रमिक के लिये रात का विश्राम दो संघर्षरत दिवसों के बीच की शान्ति है, अनुशासित पति के लिये पत्नी के मायके जाने और वापस आने के बीच की शान्ति, राजनेता के लिये एक समस्या के जाने और दूसरी के आने के बीच की शान्ति। हर एक के कर्मक्षेत्र में इस तरह के शान्तितत्वों की उपस्थिति रहती है, जो एक कार्य और दूसरे कार्य के बीच होती है।

लोग प्रकृति को गतिमय मानते हैं, जब गति नहीं रहती है तो उसे शान्ति समझते हैं। थोड़ा गहरे सोचा जाये तो शान्ति ही मूल है, कोई विक्षेप या हलचल उत्पन्न होती है, बढ़ती है और ढल जाती है। शरीर को ही देखें, रात भर पूरा का पूरा तन्त्र लगा रहता है, थकान स्वरूप टूटे और बिखरे तन्तुओं को जोड़ने के लिये ताकि सुबह पुनः ऊर्जस्वित हो जाये, ऊर्जा वह भी स्थिर, बहने को तैयार। एक परमाणु के अन्दर परमाणु बम की ऊर्जा विद्यमान होती है पर वह भी शान्तिप्रियता में रमा रहता है, क्रियाशीलता आने पर ही विस्फोट करता है। समाज के सारे तन्त्र देखें तो वे भी शान्ति में बने रहना चाहते हैं, बिना हिलाये हिलते ही नहीं, उपयोगी हो, अनुपयोगी हों। हमारी क्रियाशीलता प्रकृति की शान्तिप्रिय मन्थर गति से कहीं अधिक होती है, हम विश्व को गतिमय करते हैं और मूल रूप से उपस्थित शान्ति को गतिमयता से उत्पन्न अन्तराल मान लेते हैं।

ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) के द्वितीय नियम को देखें तो वह भी वही इंगित करती है। उथल पुथल का एक मानक होता है, एन्ट्रॉपी, किसी भी तन्त्र के अन्दर उपस्थित ऊर्जा के प्रवाह का मानक। यदि किसी भी तन्त्र को प्रकृति के भरोसे छोड़ दिया जाये, उससे छेड़ छाड़ न किया जाये तो उसकी एन्ट्रॉपी स्वतः कम होती रहती है और अपने न्यूनतम स्तर पर पहुँच जाती है। न्यूनतम स्तर की एन्ट्रॉपी शान्ति का परिचायक है, शान्ति मूल है, प्रकृति शान्तिप्रिय है, हम सृष्टि चलाने के क्रम में उसे गतिमय कर देते हैं, उसे उस स्थिति में छोड़ देने से वह स्वतः ही अपने मूलतत्व में समा जाती है।

बचपन में एक शान्तिपाठ पढ़ते थे, जिसमें प्रकृति के सब तत्वों को शान्ति की ओर जाने का उद्बोधन होता था, हर कार्य के पश्चात, हर यज्ञ के पश्चात। तब तनिक आश्चर्य होता था कि कार्य कर रहे हैं तो शान्ति की प्रार्थना क्यों, प्रकृति तत्वों से शान्ति का उद्बोधन क्यों? तब यह तथ्य समझ नहीं आता था कि प्रकृति का मूल तत्व शान्ति है, हमारा कोई भी उद्योग उसमें विध्न डाल रहा है, पर क्या करें, करना आवश्यक है। शान्तिपाठ प्रकृतिअंगों से उस मूलतत्व में पुनः बसने का आग्रह मात्र है। तो क्या हमारे पूर्वजों के उपक्रम न्यूनतम उथल पुथल पर केन्द्रित थे, यम नियम, जीवनशैली अधिक श्रमसाध्य न हो प्रकृति से ताल मिलाकर चलने वाली थी। ध्यान, समाधि, आत्मचिन्तन, शाकाहार, अपरिग्रह, सब के सब प्रकृति के नियमों से प्रेरित थे, ऊष्मागतिकी के द्वितीय नियम की दिशा में थे। प्रश्न कई हैं, दर्शन गहन है, उत्तर एक दिन में मिलने वाले नहीं, उत्तर बिना अनुभव मिलने वाले नहीं। स्थिर हो जाने की अदम्य चाह कहीं सार्वभौमिक तो नहीं, हम जीवों में।

गतिमयता को सफलता स्वीकार करने वाले, शान्ति के इस अन्तराल को अधिक महत्व नहीं देंगे, उनके मन में तो पुनः आने वाले कार्य के लिये उथल पुथल मची है, उनके लिये तो यह समय भी कार्यतुल्य है। अधिक कर जाने की चाह सफलता का मानक हो जाये तो वह सुख कहाँ से आयेगा जो कुछ न होने की शान्ति से आता है, जो मुक्तिपथ से आता है। बहुतों को लगता है कि उनका जीवन निष्प्रयोजन में ही निकला जा रहा है, उन्हें जाने और आने के बीच की शान्ति की आवश्यकता ही नहीं है। ऐसे कर्मशीलों ने जहाँ एक ओर मानवता को कई उपहार दिये हैं, वहीं दूसरी ओर उन्होने प्रतियोगिता को उन्मादित कर अन्य के लिये विश्व को एक कठिन स्थान बना दिया है। वहीं दूसरी ओर कुछ लोग प्रकृति के सहज उपासना के भ्रम में न्यूनतम से भी कम कर आलस्यविहार में बैठे रहते हैं। कर्महीन नर पावत नाहीं, पर कर्मशील भी सुख को न जान पाये, इस द्वन्द्व में विश्व सदा ही गतिमान बना रहता है।

आप इस अन्तराल को किस प्रकार लेते हैं, यह एक बड़ा प्रश्न है। यह सभ्यताओं के उत्थान और पतन का प्रश्न है, यह प्रश्न संस्कृतियों के वैशिष्ट्य का प्रश्न है, यह प्रश्न संसाधनों के संदोहन का प्रश्न है और यही तन्त्रों के सरलीकरण का प्रश्न भी है। कभी कभी कुछ न होता हुआ दिखना, बहुत कुछ हो चुके होने का प्रतीक होता है, मानवविहीन संयन्त्रों को बनाने के पीछे कितनी मेधाओं का श्रम छिपा है, यह प्रत्यक्ष से कहाँ पता चलता है? सुव्यवस्थित नगर को चलाने के उपक्रम में नेपथ्य में कितना कार्य हुआ होगा, क्या पता? कई क्षेत्रों और देशों में मची उथल पुथल, अव्यवस्था और अशांति, कर्मशीलता के मानक तो नहीं हो सकते। हमारा श्रम व्यवस्था का प्रेरक हो, व्यवस्था शान्ति लाये, यही है मेरे लिये जाने और आने के बीच की शान्ति।

12.1.13

रोष-नद

हृदय भरता रोष हम किसको सुनायें,
ढूढ़ती हैं छाँह, मन की भावनायें ।।

स्वप्न भर टिकते, पुनः से उड़ चले जाते हैं सारे,
आस के बादल हृदय में, वृष्टि वाञ्छित, सुख कहाँ है ।।

लहर भीषण, विष उफनती, क्रोध में डसने किनारे,
सोचकर क्या हो गयी नत, पुनः बह आयी जलधि में ।।

क्यों नहीं मन शान्त जैसे लहर है स्थित गहन में,
क्यों नहीं मिलता हृदय को एक ऐसा ही किनारा ।।

विकलता अवरोध की बन रोष बढ़ती जा रही है,
काल का निर्णय, नदी को किस दिशा में पंथ प्रस्तुत ।।

जानता, होगा समय का चक्र भी मेरी परिधि में,
नहीं यदि, सुख की असीमित आग फिर किसने जलायी ।।

कोई तो है थपथपाता, व्यग्र हो थकते मनस को,
कोई मन में जीवनी का मार्ग बन कर प्रस्फुरित है ।।

वही बनकर छाँह मन की, रोष नद को पंथ देगा,
बिन सुने ही वेदना को पूर्णतः पहचान लेगा ।।

9.1.13

दिल छीछालेदर

जब गैंग्स ऑफ वासेपुर देखी थी तो बहुत ही नये तरह के गाने सुनने मिले थे, अन्य फिल्मों से सर्वथा भिन्न। मैं कोई फिल्म समीक्षक नहीं पर तीन विशेषतायें उसके संगीत में दिखी थीं। पहला, संगीत की धुनें स्थानीय थीं। दूसरा, उसमें बोलचाल की भाषा हिन्दी अंग्रेजी की खिचड़ी के रूप में थी। तीसरा, उसका अर्थ फिल्म में व आज के समाज में व्याप्त भावों को बहुत स्पष्ट रूप से चित्रित करता हुआ था। दिल छीछालेदर उसी फिल्म का एक गाना है।

सभ्य समाज की दृष्टि से देखा जाये तो गैंग्स ऑफ वासेपुर अव्यवस्था और असभ्य आचरण की पराकाष्ठा था, उसमें रहने वालों के मन को टटोले तो वह जीवन के संघर्ष का अनियन्त्रित पथ। जब अव्यवस्था हो तो हर वस्तु और हर विचार के लिये संघर्ष होता है। बिना व्यवस्था विकास नहीं, बिना विकास पुनः संघर्ष, वह भी अनियन्त्रित। गैंग ऑफ वासेपुर में, हो सकता है कि घटनाओं को अतिरंजित और महिमामंडित कर के चित्रित किया गया हो, पर किसी भी स्थान के यथार्थ में स्थिति बहुत अधिक दूर नहीं होगी, कालचक्र देर सबेर वहाँ पहुँचा ही देगा।

जो लोग यथार्थ के इस पक्ष से साक्षात्कार करने से वंचित रह गये हों, उन्हें इस फिल्म का भावार्थ बताया जा सकता है। लूट-खसोट की पर्याप्त संभावनाओं में बाहुबलियों का उदय, हत्या आदि से उत्पन्न किये भय के माध्यम से वर्चस्व की होड़, क्षेत्रों के अतिक्रमणों में संघर्ष और अन्त में सर्वनाश। ये चक्र पुनः उदय होते हैं, कभी छोटे, कभी बड़े, भिन्न भिन्न नामों से, भिन्न भिन्न रूपों से। ये छोटे छोटे उन ब्लैक होलों जैसे होते हैं जो आस पास की सभी चीजों को उदरस्थ कर जाते हैं, विकास को, शिक्षा को, नैतिकता को, संस्कृति को, सहजीवन को। यही नहीं, इनके अन्दर जाकर समय भी अपना अस्तित्व खो देता है, अंघायुग भला और क्या होता होगा, जब काल भी अंधकार में डूब जाये।

अभी कुछ दिन पहले सब टीवी में एक धारावाहिक चिड़ियाघर देख रहा था, एक वाक्य बड़ा प्रासंगिक लगा। 'जब विनाश होता है तो बहुत शोर होता है, निर्माण चुपचाप होता रहता है'। सच ही है, पेड़ एक बीज के आकार से महाकाय हो जाता है, बिना हल्ला किये, धीरे धीरे अपने अवयव धरा से और आसमान से ग्रहण करते हुये बढ़ता रहता है। पर जब वही वृक्ष गिरता है तो तुमुल नाद सुनायी पड़ता है, चारों ओर। संस्कार धीरे धीरे व्यक्तित्व बनाते हैं, कई वर्षों तक, पर जब वह चरित्र टूटता है, मन चीत्कार कर उठता है। अब शोर चाहे गैंग्स ऑफ वासेपुर की हिंसा का हो या वर्तमान की घटनाओं से उपजे जनमानस के आक्रोश का, कुछ न कुछ विनाश की ओर अग्रसर है। जो भी टूटेगा, वह कोई एक दिन में तैयार नहीं हुआ होगा, वह कई दिनों से बन रहा होगा, कई दिनों से धीरे धीरे मन में घर कर रहा होगा।

समाज की गति बहुधा दिखती नहीं है, उसकी गति का अनुमान हम लक्षणों से ही लगाते हैं। लक्षण जब घातक होते हैं, हम उपचार का सोचते हैं, हर तरह के संबद्ध और असंबद्ध कारणों पर दोष मढ़ना प्रारम्भ कर देते हैं, हल्ला मचने लगता है। अभी देखें तो हल्ला नहीं, वरन छीछालेदर मची हुयी। मनीषजी के ब्लॉग पर 'दिल छीछीलेदर' गाने को देखा तो सारा घटनाक्रम इस फिल्म से अनुनादित होता हुआ सा लगने लगा।

यह छीछालेदर कहाँ से प्रारम्भ हुयी होगी? बचपन में एक कहानी सुनी थी। एक लड़का कहीं से कुछ चोरी करके लाया, उसकी माँ ने रोका नहीं। धीरे धीरे उसकी हिम्मत और बढ़ गयी, बड़ी बड़ी चोरियाँ करने लग गया, कालान्तर में पूर्ण विकसित डकैत बन गया। पकड़ा गया, फाँसी के पहले अन्तिम इच्छा पूछी गयी तो माँ के कान में कुछ कहना चाहा। कहने के बहाने माँ का कान काट खाया, पूछने पर बताया कि यदि बचपन में माँ ने पहली चोरी पर ही रोक दिया होता तो यह स्थिति न आती। कहीं न कहीं तो आँख मूँदी गयी होंगी, कई बार जानकर भी कुछ नहीं बोला गया होगा, कई बार किसी कठिनाई में पड़ने पर बचाया भी गया होगा। नकारात्मकता एक दिन में तो विकसित नहीं होती है, कई लोगों का हाथ रहा होगा, कई घटनाओं का हाथ रहा होगा।

समाज में परिवर्तन की गति बहुत धीमी होती है, यही कारण है कि छीछालेदर दिखायी नहीं पड़ती है, वीभत्स नहीं लगती है, पर अन्दर ही अन्दर होती रहती है। विरोध तभी होता है जब असहनीय हो जाता है। यदि छोटी छोटी बातों को गम्भीरता से लिया जायेगा तभी यह सम्भव हो सकेगा कि कोई बड़ी छीछालेदर न फैले। निश्चय ही कानून व्यवस्था अपना कार्य करती है, अपवादों को चिन्हित करती है और उन्हे दण्डित करा के एक उदाहरण स्थापित करती है कि भविष्य में यह न फैले। पर अव्यवस्था का परिमाण इतना अधिक हो चुका है कि उसके लिये छीछालेदर से अधिक उपयुक्त कोई शब्द नहीं। कानून और न्याय व्यवस्था निश्चय ही इतना सब समेटने में सक्षम नहीं, उसकी भी अपनी सीमायें हैं, उसमें भी वही लोग हैं जो समाज का ही अंग हैं, उनके अन्दर भी वही गुण दोष हैं जो समाज में व्याप्त हैं, उनके अन्दर भी वही मूल्य हैं जो समाज के सम्मिलित मूल्य हैं।

छीछालेदर पर बहुत तेजी से फैलती है, संक्रमित होती है। इस अवस्था में सर्वाधिक हानि उनकी होती है जो सज्जन होते हैं, उनके अन्दर वह प्रतिरोधक क्षमता नहीं विकसित हो पाती है जिससे वे स्वयं को बचा सकें। अपवाद बनने से अच्छा है कि समाज की धार में बह चलें, एक आध दोष स्वीकार्य होने लगते हैं, एक आध दोष इंगित करने से छोड़ दिये जाते हैं, अपनत्व दोषों से अधिक महत्व पा जाता है, दोष शक्ति का पर्याय बनने लगते हैं, शक्ति दूषित होने लगती है।

संस्कृतियों पर कटाक्ष समाधान नहीं है, समाज एक प्रक्रिया से होकर निकला है, छीछालेदर एक दिन में नहीं फैली है, दशकों ने इसे सहारा दिया है। जब प्रक्रिया से दोष उपजे हैं तो प्रक्रिया से दूर भी होंगे, प्रक्रिया लम्बी होगी, प्रक्रिया पीड़ायुक्त होगी, प्रक्रिया प्रतीक्षा करवायेगी। तीस दिन में अंग्रेजी सिखाने वालों की तरह समाधान देने वालों के वक्तव्य बड़े सीमित दृष्टिकोण के दोष से ग्रसित हैं। तीस दिन सब ठीक हो जाने की आस रखने वाले अतिआशावादी हैं। दिल छीछालेदर है तो आनन्द छीछालेदरी में ही आयेगा। छीछालेदर समेटने में बहुत श्रम लगेगा, साथ ही साथ यह भी तो निश्चित करना होगा कि कोई और कहीं पर भविष्य के लिये छीछालेदर फैला तो नहीं रहा है? समाज का छीछालेदर आज से ही समेटना प्रारम्भ कर दीजिये। हो सकता है कि आज सड़क पर छीछालेदर पड़ा हो, कल हवा चलेगी तो आपके यहाँ भी उड़कर आ जायेगा यह छीछालेदर।

छोड़िये वह सब, आप गैंग्स ऑफ वासेपुर की ही छीछालेदर सुन लीजिये।
चित्र साभार - http://www.ilovephilosophy.com

5.1.13

कांजी हाउस - गाड़ियों का भी

बंगलौर में कई बार सड़क से जाते समय देखता हूँ कि एक क्रेनयुक्त वाहन खड़ा रहता है जो ठीक से पार्क न किये हुये दुपहिया वाहनों को लादता है और कहीं जाकर छोड़ आता है। संभवतः गाड़ियों का भी कोई कांजी हाउस होता होगा, जो आवारा गाड़ियों को रखने के काम आता होगा।

अब बंगलौर में इतने वाहन हैं कि घरों में उन्हें खड़े करने का स्थान ही नहीं है, हर पाँच घर में एक चौपहिया। यदि सारी गाड़ियों का क्षेत्रफल निकाला जाये और उसे सड़कों के क्षेत्रफल से घटा दिया जाये तो चलने के लिये बहुत कम स्थान ही बचेगा। प्रतिदिन 7000 वाहनों के पंजीकरण के बाद वह दिन शीघ्र ही आयेगा जब सारी सड़कों का उपयोग केवल वाहनों की पार्किंग के लिये किया जायेगा, तब किसी एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिये समय पहले से ही आवंटित कराना पड़़ेगा, लम्बी लम्बी प्रतीक्षा सूचियाँ बनेगी। अपने वाहन में एक बार यात्रा कर लेना लॉटरी लगने जैसा हुआ करेगा, मंत्रीगण संस्तुतियाँ किया करेंगे।

ऐसा नहीं है कि यहाँ पर लोगों को भान नहीं है, पर क्या करें हर किसी के पास वाहन है और हर किसी को उसको उपयोग करने का मन भी होता है, कभी दिखावे के लिये, कभी आवश्यकता के लिये। किसी भी बाज़ार जाने पर गाड़ी की पार्किंग कर पाना एक विशेष उपलब्धि होती है। बाज़ार के चहल पहल के क्षेत्र में परिचालन बाधित न हो, इसके लिये पुलिस ने उन क्षेत्रों में पार्किंग प्रतिबंधित कर रखी है। लोगों का मन फिर भी नहीं मानता है, उन्हें लगता है कि जब बड़े बड़े अपराधों में पुलिस उलझी हुयी है, अधिक गम्भीर आर्थिक संभावनाओं में पुलिस उलझी हुयी है, तो छोटा सा और कुछ समय के लिये किया गया नियम उल्लंघन भला कहाँ से पुलिस की दृष्टि में आ पायेगा?

परंपरागत कारणों से भले ही पुलिस विशिष्टजनों को छोड़ दे पर आमजनों से उसकी पैनी दृष्टि कभी नहीं हटती है। आप छोटा सा नियम उल्लंघन कर के तो देखिये, गिद्ध जितनी दूरी से देखकर कोई न कोई आपको बताने आ जायेगा कि आपने क्या अपराध किया है और किन रूपों में वह विस्फोटित होता हुआ गम्भीर अपराध बन सकता है। आप तब समर्पण के सिवाय कुछ और सोच भी नहीं सकते हैं। पुलिस जनों की सामान्य प्रवृत्तियों को छोड़ भी दिया जाये तब भी आपका बचना असंभव है। आप किसी एक सुनसान पड़े चौराहे पर समय बचाने के लिये लाल बत्ती पर निकल जाते हैं, घर में ५ मिनट पहले पहुँच कर दो तीन दिनों में इस घटना के बारे में भूल भी जाते हैं, पर सहसा आपके घर में दण्ड भरने का नोटिस आ जाता है, नियम उल्लंघन के चित्र के सहित। आपकी चतुराई धरी की धरी रह जाती है, आप आगे से ऐसा न करने का वचन कर डालते हैं, अगले अवसर तक।

कई लोग यातायात पुलिस की अन्तर्यामी दृष्टि से सुधर चुके हैं पर सबको इसका स्वाद कहाँ मिला है अभी तक। सो नियम उल्लंघन होते रहते हैं और आँखमिचौनी का खेल चलता रहता है। एक मित्र ने जब इस भेद की व्याख्या की तब कहीं जाकर सब समझ में आया। जैसे संजय की दृष्टि पाकर ही धृतराष्ट्र सब जान पाये थे, उसी प्रकार तकनीक के सहारे बंगलौर की यातायात पुलिस नगर पर अपना नियन्त्रण गाँठे हुये है। सारे नगर में सीसीटीवी कैमरे लगे हैं, लगभग हर चौराहों पर, देखने में बिजली के लैम्पों की तरह ही दिखते हैं। नियन्त्रणकक्ष में बैठे सतर्क निरीक्षक चित्र को ज़ूम करके गाड़ी का नम्बर नोट कर लेते हैं, डाटाबेस से गाड़ी से सम्बन्धित तथ्य और मालिक का पता एकत्र कर चालान बन जाता है और दोषी चालक को भेज दिया जाता है, चित्र, स्थान और समय के सहित। आप विवश और हतप्रभ हो कहीं दुबारा वह न करने का प्रण कर लेते हैं।

इस तरह जहाँ एक ओर वाहनों पर दृष्टि बनी रहती है, वहीं दूसरी ओर कार्य न करने वाले पुलिसवालों पर भी नियन्त्रण रहता है। सतर्क और पर्याप्त मात्रा में उपस्थित यातायात पुलिसबल की संख्या इसी दिव्य दृष्टि का परिणाम है।

संभवतः यही तकनीकी और प्रशासनिक कारण रहा होगा कि क्रेनयुक्त एक वाहन सदा ही आवारा वाहनों को उनके कांजीहाउस में पहुँचाने के लिये सदा कार्यरत सा दिख जाता है। ये कार्य ठेके पर दिया गया है, एक निश्चित पारिश्रमिक के अतिरिक्त एकत्र किये हुये वाहनों की संख्या पर भी कोई न कोई आर्थिक प्रलोभन रखा गया होगा। सर्वप्रथम तो अधिक धन कमा लेने की सहज प्रवृत्ति उन्हें अतिसजग और अतिउत्साही बनाये रखती है। यदि किसी स्थान पर अनाधिकृत वाहन खड़ा है और वहीं खड़ी क्रेनयुक्त अपना कार्य नहीं कर रही है तो नियन्त्रण कक्ष से क्रोध के उद्गार फूटने लगते हैं। यही नहीं, जहाँ पर क्रेनयुक्त वाहन नहीं भी है, निकटस्थ वाहन को वहाँ पहुँचने के निर्देश मिल जाते हैं। यदि इन सबसे दोषी वाहन बच भी गया तो भी लिये गये चित्र के आधार पर आपके घर में चालान पहुँचना निश्चित है।

आवारा वाहन सशंकित हैं, पता नहीं कब वे भी कांजी हाउस पहुँच जायें और उनके मालिक को छुड़ाने आना पड़े। सुविधा छूटे, समय व्यर्थ हो और धन व्यय हो, सो अलग। नागरिकों की समस्या बड़ी विचित्र हो चली है, जहाँ एक ओर नये नये वाहनों का संख्या यहाँ के यातायात और पार्किंग स्थलों का दम घोटे हुये है, वहीं दूसरी ओर यातायात पुलिस की अन्तर्यामी दृष्टि नियमों को मानने को बाध्य किये हुये है। अब या तो वाहन का उपयोग न कर बस का उपयोग करे या वाहन कहीं दूर खड़ाकर पैदल चलकर उस स्थान जाये या अपनी समस्याओं का स्थानीय निदान ढूँढ़ें।

पता नहीं किसकी गति अधिक है, साधनों की या सुविधाओं की या व्यवस्थाओं की। बंगलौर में वाहन के साधन हैं, यथानुरूप पार्किंग की सुविधा नहीं है और व्यवस्था इतनी सुदृढ़ है कि आप नियमों का उल्लंघन नहीं कर सकते हैं। वाहन आवारा घोषित हुये जा रहे हैं, कांजीहाउस भी तैयार हो रहे हैं उन आवारा वाहनों के लिये। पता नहीं किसका अपमूल्यन है, मानवीय प्रकृति का या वैश्विक प्रकृति का। कांजीहाउस, क्या सोचने को विवश नहीं करते आपको।

2.1.13

दोष नहीं दे सकता कल को

क्षुब्ध मनस का भार सहन है, दोष नहीं दे सकता कल को,
गहरे जल के तल में बैठा, देख रहा हूँ बहते जल को।

क्या आशायें, क्या इच्छायें, क्या जीवन की अभिलाषायें,
अनुचित, उचित विचार निरन्तर, रच क्यों डाली परिभाषायें,
सबने जकड़ जकड़ कर बाँधा, नहीं जिलाया व्यक्ति विकल को,
दोष नहीं दे सकता कल को।

यह सच है, जिसने जीवन को देखा, परखा, समझा है,
आहुति बनकर स्वयं जलाया, यज्ञ उद्गमित रचना है,
कैसे नहीं निर्णयों में वह लायेगा व्यक्तित्व सकल को,
दोष नहीं दे सकता कल को।

मैने जीवन की गति को अब स्थिर मन से देखा है,
महाचित्र पर खिंचती जाती, कर्मक्षेत्र की रेखा है,
ये रेखायें सतत बनातीं, योगदान फिर क्यों निष्फल हो,
दोष नहीं दे सकता कल को।

मानक है जीवन जीने के, लगी यन्त्रवत सकल व्यवस्था,
सुख, साधन की होड़ लगी है, कहाँ पता है किसे समय का,
बाँध बनाते जीवन बीता, भूल गया था लाना जल को,
दोष नहीं दे सकता कल को।

है विवेचना व्यर्थ, तर्क सब, कल की कल पर छोड़ बिसारी,
चलो सजायें वर्तमान में, एक भविष्य की सूरत न्यारी,
बीज लगाओ, सींचो बगिया, आने दो आशान्वित फल को,
दोष नहीं दे सकता कल को।

29.12.12

यार्ड में लेखन

वरिष्ठ अधिकारी का निरीक्षण है, यार्ड में नयी पिट लाइनों का निर्माण कार्य चल रहा है, पिट लाइनों का उपयोग यात्री ट्रेनों के नियमित रख रखाव के लिये किया जाता है। बंगलौर के लिये बहुत अधिक यात्री गाड़ियों की माँग है, देश के हर कोने से। दबाव भी है और सहायता भी है, अधिकतम माँग को स्वीकार करने के लिये। इसी क्रम में नये प्लेटफ़ार्म, नयी पिट लाइन, नये कोच, नये इंजिन आदि की आवश्यकता बनी रहती है। योजना और क्रियान्वयन पर नियमित दृष्टि बनाये रखने के लिये, कार्य की प्रगति बीच बीच में देखनी होती है। यह निरीक्षण उस वृहद प्रक्रिया का अंग है जो अंततः नयी यात्री गाड़ी चलाने के लिये वर्षों पहले से चल रही है।

वरिष्ठ अधिकारी दूसरे मार्ग से आ रहे हैं, हमें वहाँ पहले पहुँचना था। बंगलौर की यातायात की अनिश्चितता को देखकर हम आधे घंटे पहले निकले, भाग्य ने साथ दिया और बिना व्यवधान के लगभग ४० मिनट पहले पहुँच गये। वरिष्ठ अधिकारी पर यातायात उतना प्रसन्न न रहा और अभी सूचना मिली है कि उन्हें नियत समय से लगभग ४० मिनट की देर हो जायेगी। हमारे हाथ में ८० मिनट का समय है, यार्ड का विस्तृत क्षेत्र है, २० मिनट का प्राथमिक निरीक्षण कर लेने के बाद पूरा एक घंटा हाथ में है। पेड़ के नीचे वाहन खड़ा कर, गाड़ी की अगली सीट पर बैठे हुये, लेखन चल रहा है। ऊपर देखने से हरियाली दिख रही है, नीचे सूर्य के प्रकाश में साँप सी लहराती पटरियाँ, दूर से आती इंजन की आवाज़ और लगभग २०० मीटर दूर निर्माण कार्य की चहल पहल। दृश्य का विस्तार और समय का साथ होना, दोनों ही लिखने को विवश कर रहे हैं।

रेल यार्ड का नाम सुनते ही एक चित्र उभर आता है, लम्बी लम्बी रेल लाइनें, बड़ी बड़ी रेलगाड़ियाँ, छुक छुक धँुआ छोड़ते इंजन, डिब्बों को एक ट्रेन से काटकर दूसरे में लगाते हुये रेल कर्मचारी। मुझे लगभग १६ वर्ष हो गये है रेल सेवा में पर आज भी यार्ड उतना ही अभिभूत करते हैं जितना बचपन में करते थे। आज भी यार्ड में जाकर घंटों बीत जाते हैं और लौटकर थकान जैसी कोई चीज़ नहीं लगती है, ऐसा लगता है कि किसी मित्र के घर से होकर आ रहे हैं। यार्ड को यदि सरल भाषा में समझा जाये तो, यह रेलगाड़ियों का घर है, जहाँ पर वे विश्राम करती हैं, उनका रख रखाव होता है और जहाँ उन्हें आगे की लम्बी यात्राओं के लिये निकलना होता है। यहाँ गाड़ी की सुरक्षा, संरक्षा आदि से जुड़े हर पक्ष पर ध्यान दिया जाता है।

यार्ड बड़े होते हैं, सामान्यतः एक किमी से लेकर पाँच किमी तक। परिचालन में कार्य करते हुये ऐसे न जाने कितने यार्डों में कार्य करने का अवसर मिला है। जिस प्रकार घरों में कई कमरे होते हैं, उसी तरह यार्डों में कार्यानुसार कई उपयार्ड। बड़े यार्ड का हर उपयार्ड एक किमी लम्बा होता है। एक में गाड़ियों का स्वागत होता है, दूसरे में उन्हें विभक्त किया जाता है, तीसरे में उनका रख रखाव होता है, चौथे से उन्हें गन्तव्य के लिये भेजा जाता है। वह अनुभव अब बहुत काम आता है, किसी भी यार्ड का चित्र देखकर ही यह पता लग जाता है कि इस यार्ड में क्या समस्या आती होगी, यहाँ पर किन कार्यों की संभावनायें हैं। भविष्य में विस्तार की योजनाओं में इनका विशेष स्थान है। हर ट्रेन का, चाहे वह यात्रीगाड़ी हो या मालगाड़ी, सबका एक नियत यार्ड होता है, उसका एक घर है।

कार्यक्षेत्र से संबंधित जो भी योगदान रहा हो यार्डों का, व्यक्तिगत जीवन में यार्डों के तीन स्पष्ट लाभ रहे हैं। पहला तो इन्हीं बड़े यार्डों की सड़कों पर वाहन चलाना सीख पाया। यार्ड के एक ओर से दूसरे ओर जाने में चार पाँच किमी की यात्रा हो जाती है। सड़कें सपाट, बिना किसी यातायात के, उन पर वाहन चलाना स्वयं में अनुभव होता था। प्रारम्भ में तो यार्ड आते ही चालक महोदय को अपनी सीट पर बिठाकर वाहन चलाना सीखा, बाद में जब आत्मविश्वास बढ़ गया तो कई बार रात्रि में दुर्घटना होने पर स्वयं ही वाहन लेकर निकल गया। यद्यपि वाहन चलाना अच्छे से आता है पर बंगलौर में यातायात की अल्पगति और भीड़ को देखकर कभी इच्छा ही नहीं होती है। आज एक दूसरे यार्ड में बैठा लिख रहा हूँ पर सामने फैली लम्बी सड़क देखकर वो दिन याद आ रहे हैं जब इन पर निर्बाध वाहन दौड़ाया करते थे।

दूसरा लाभ स्वास्थ्य से संबंधित है। सेवा के प्रारम्भिक वर्षों में ही एक आत्मीय वरिष्ठ ने सलाह दी थी कि जब भी किसी यार्ड में जाओ तो एक छोर से दूसरे छोर तक पैदल चल कर ही निरीक्षण करो, उससे जो लाभ मिलता है वह दूर से समझने या इंजन में चलकर जाने में नहीं है। काग़ज़ पर यार्ड समझने का कार्य भी पूरे यार्ड की पैदल यात्रा करने के बाद ही करना चाहिये। पहले तो यह सलाह बड़ी श्रमसाध्य लगी, पर धीरे धीरे लाभ स्पष्ट होने लगे। कहीं कोई समस्या आने पर घटनास्थल पर पहुँचने के पहले ही फ़ोन से समुचित निर्देश दे सकने की क्षमता विकसित होने लगी। धीरे धीरे हर स्थान पर यही क्रम बन गया और योजना संबंधी कोई भी निर्णय लेने के लिये यार्डभ्रमण एक आवश्यक अंग बन गया। इतना पैदल चलने से स्वास्थ्य अच्छा रहना स्वाभाविक ही है। आज भी वरिष्ठ अधिकारी के आने के बाद दो किमी का भ्रमण तो निश्चित है। घर जाकर तब मिठाई आदि खाने में कोई अपराधबोध नहीं होगा। हर बार निरीक्षण में जाने के बाद एक अच्छा और भरपेट भोजन सुनिश्चित हो जाता है, स्वास्थ्य बना रहता है, सो अलग।

तीसरा लाभ है, लेखन। यार्ड का क्षेत्रफल बहुत अधिक होता है, जितना विस्तृत उतना ही शान्त। बीच बीच में ढेरों पेड़ और हरियाली। जब भी कार्य से कुछ समय मिलता है, थकान से कुछ समय निकलता है, ऐसा वातावरण बहुत कुछ सोचने और लिखने को प्रेरित करता है। विषय बहुत सामने आ जाते हैं, शान्ति और समय विचारों के संवाहक बन जाते हैं, शब्द उतरने लगते हैं। उड़ीसा में एक स्थान याद आता है, संभवतः गुआ नाम था। वहाँ के जो यार्ड मास्टर थे, वह उड़िया के बड़े लेखक थे। जंगल और लौह अयस्क की खदानों के बीच उन्हें निश्चय ही एक उपयुक्त वातावरण मिलता होगा, उस समय, जब एक ट्रेन जा चुकी हो, दूसरे की प्रतीक्षा हो, विचार रुक न रहे हों, वातावरण के अंग आपको विवश कर रहे हों, कुछ कह जाने को, कुछ बह जाने को।

सूचना आयी है कि लगभग १५ मिनट में वरिष्ठ अधिकारी पहुँच जायेंगे। बहते विचारों को अब सिमटना होगा, आगे बढ़ने की तैयारी करनी होगी। थोड़ी दूर से इंजन की बहुत भारी आवाज़ आती है, गम्भीर आवाज़ आती है। एक अधिक शक्ति का इंजन आया है, लौह अयस्क की एक भारी ट्रेन सेलम स्टील प्लांट जाने के लिये तैयार खड़ी है। लगभग आधे घंटे में वह ट्रेन अपने गन्तव्य की ओर बढ़ जायेगी, लौह पिघलेगा, कुछ सार्थक आकार निकलेगा, विकास का एक सहारा और बनेगा। हमारा लेखन भी शब्दों के रूप में बह कर पोस्ट का आकार ले रहा है, सृजन का एक और सोपान लग जायेगा। पिट लाइन के निरीक्षण के बाद कुछ सप्ताह में यहाँ किसी नई ट्रेन का रख रखाव प्रारम्भ हो जायेगा। न जाने कहाँ के लिये, जबलपुर, जयपुर, गोवा, गुवाहाटी, दिल्ली, कोच्चिवल्ली या कोयम्बटूर के लिये। ज्ञात नहीं, पर एक और स्थान बंगलौर से जुड़ जायेगा। संभवतः आप में से किसी को बंगलौर तक बैठा कर लाने के लिये। कौन जाने किससे मिलने के बीज आज के निरीक्षण में छिपे हों?

दूर से सायरन की क्षीण आवाज़ सुनायी पड़ती है, सुरक्षाबल अपनी व्यवस्था में लग जाते हैं। निरीक्षण से संबंधित संभावित विषय मस्तिष्क में अपना स्थान ढूँढ़ने लगते हैं। एक साथी अधिकारी का फ़ोन आता है, हाँ आपकी ही प्रतीक्षा में हैं, बस अभी आये हैं। अब लेखन समाप्त, निरीक्षण प्रारम्भ।

26.12.12

कोई हो

खड़ा मैं कब से समुन्दर के किनारे,
देखता हूँ अनवरत, सब सुध बिसारे ।
काश लहरों की अनूठी भीड़ में अब,
कोई पहचानी, पुरानी आ रही हो ।
कोई हो जो कह सके, मत जाओ प्यारे,
कोई हो जो मधुर, मन को भा रही हो ।।१।।

कोई कह दे, नहीं अब मैं जाऊँगी,
संग तेरे यहीं पर रह जाऊँगी ।
कोई हो, एकान्त की खुश्की मिटाने,
नीर अपने आश्रय का ला रही हो ।
कोई हो जो बह रहे इन आँसुओं के,
मर्म की पीड़ा समझती जा रही हो ।।२।।        

कोई कह दे, छोड़कर पथ विगत सारा,
तुझे पाया, पा लिया अपना किनारा ।
कोई कह दे, भूल जाओ स्वप्न भीषण,
कोई हो जो हृदय को थपका रही हो ।
कोई कह दे, देखता जो नहीं सपना,
कोई हो जो प्रेयसी बन आ रही हो ।।३।।

22.12.12

और बाल कट गये

पिछले शनिवार को बाल कटाने गये, एक नियत दुकान है, वहीं पर ही जाकर कटाते हैं। प्रारम्भ में एक दो बार जाने से परिचय हो गया, कैसे बाल कटाने से चेहरा अच्छा दिखेगा, दोनों को समझ आ गया, तब से वहीं जाने का क्रम बन गया। अब महीने में एक बार जाना हो ही जाता है, कभी कभी देर हो जाने पर दर्पण डरा देता है, बालों को लहराकर काढ़ने में कभी सौन्दर्य दिखता ही नहीं है, बिखरा बिखरा सा व्यक्तित्व लगता है। छोटे छोटे बाल ही सुहाते हैं, तब चेहरा बालों से अधिक संवाद करता हुआ लगता है।

सर के बालों को लेकर सबका अपना सौन्दर्यबोध है, सबका अपना दर्शनशास्त्र है। श्रंगार रस के कवियों ने न जाने कितना कुछ लिखा है, नारियों के खुले और लम्बे बालों पर, कई तरह से बाँधी हुयी चोटियों पर, चोटियों पर सजे हुये पुष्पों के अलंकरण पर और उन पुष्पों के सौन्दर्य पर डोलते पुरुषों के हृदयों पर। कविगण तनिक परम्पराओं से हिलमिल कर चलते हैं, परन्तु आधुनिकाओं को छोटे छोटे बाल ही सुहाते हैं, उनके रखरखाव पर उन्हें समय व्यर्थ करने का मन ही नहीं होता है, हो सकता है उन्हें भी मेरी तरह ही बालों से अधिक चेहरे से संवाद करने का दर्शन भाता हो। ईश्वर ने बाल दिये हैं, कोई उसे कैसे रखता है और उसका प्रयोग किन किन लौकिक और अलौकिक अनुसंधानों में करता, वह सर्वथा उसी का विषय है, अपना मत व्यक्त होने के पहले ही वापस आ जाने का भय रहता है, ऐसे विषयों में।

अब योगियों को ही ले लीजिये, उन्हें भी सर, मूछों और दाढ़ी के बालों पर समय व्यर्थ करना नहीं भाता है। कुछ तो उन्हें सदा बढ़ाते रहते हैं, जो बहुधा एक दूसरे से उलझ उलझ कर गर्म वस्त्रों का स्वरूप ले लेते हैं। कुछ योगी बाल रखते ही नहीं हैं, उनका मानना है कि बाल न या छोटे रहने पर उसके रख रखाव पर कम समय व्यर्थ होगा और तब भगवत्भजन के लिये अधिक समय मिल जायेगा। ईश्वर ने निश्चय ही अपने भक्तों को एक कार्य तो दे ही दिया है, भक्तों ने अपने दर्शन के अनुसार हल भी निकाल लिया है।

हमारे पृथु को भी बाल कटाना अच्छा नहीं लगता है, उन्हें तो सर पर तेल लगाना और बाल काढ़ना भी नहीं अच्छा लगता है, देशी भाषा में कहें तो उन्हें मोगली बने रहना अच्छा लगता है। बहुत कुरेदने पर बताया कि यह 'आउट ऑफ फैशन' है, सर पर तेल लगाकर काढ़ने से सब उन्हें चीकू और अच्छा बच्चा समझने लगते हैं और चिढ़ाते हैं। हे भगवान, हम तो ३६५ दिन सर पर तेल लगाते हैं पर हमें तो कभी किसी ने नहीं चिढ़ाया, अच्छा दिखना भला कब से आउट ऑफ फैशन होने लगा। पृथु के अध्यापकगण पृथु के नये फैशनबोध पर पूरी तरह सहमत नहीं हैं, उनके कारण पृथु को बाल तो छोटे रखने पड़ते हैं पर तेल लगा कर काढ़ने को अभी तक अनुशासन की परिधि में नहीं लाया गया है। नयी पीढ़ी की नयी मान्यतायें विकसित हो रही है, उनसे छेड़ छाड़ करना बाल-अधिकारों के हनन के रूप में आरोपित हो जायेगा।

बाल काटने के व्यवसाय पर काल, स्थान और व्यवस्था का प्रभाव सहज ही दृष्टिगोचर होता रहा है। बचपन में एक छोटे स्थान पर रहते थे और बहुधा नाई महोदय घर पर ही आ जाते थे, लगे हाथों शरीर की मालिश भी हो जाती थी। धीरे धीरे उनका कार्य बढ़ गया, उन्होंने अपनी दुकान खोल ली, आत्मीयता होने के कारण हम लोग वहीं जाकर बाल कटाने लगे। आगे पढ़ने कानपुर में आये तो भी नियत दुकानों में जाकर बाल कटाते रहे पर पहले जैसी आत्मीयता कहीं नहीं रही। रेलवे की सेवा में व्यस्तता का प्रभाव कहें या अंग्रेजों की विरासत का, हर स्थान पर नाई महोदय बाल काटने घर ही आते रहे। बाल कटवाने के बाद चम्पी करवाना सदा ही आकर्षण का विषय रहता था, बड़ा ही आनन्द आता रहा उसमें। रेलवे की अन्य पोस्टों पर बाजार कभी हावी नहीं रहा, व्यक्तिगत स्तर पर सेवायें मिलती रहीं, विशिष्ट स्तर बना रहा, उन छोटे नगरों में रेलवे ही नगर का प्रमुख अंग हुआ करता था।

बंगलोर बड़ा नगर है, यहाँ पर आप उतने विशिष्ट नहीं होते हैं, यहाँ पर रेलवे के अतिरिक्त विकास के अन्य प्रतिमान उपस्थित हैं। घर पर आकर बाल काटने के लिये कोई तैयार नहीं है, ग्राहक अधिक हैं, समय कम हैं। हम भी अन्य की तरह महीने में एक बार बाल कटवाने चले जाते है। वहाँ जाने का लाभ यह होता है कि अपना चेहरा देखने के अतिरिक्त बहुत कुछ सुनने और जानने को मिल जाता है। आस पास की बातें, राजनीति की बातें, फ़िल्मों की बातें, गानों की बातें, बहुत ज्ञान बढ़ जाता है।

चार लोग हैं उस दुकान में जो बाल काटते हैं, एक मैनेजर है जो व्यवस्था करता है। हमें तो पहले लगता था कि एक बाल काटने वाला ही अपनी सारी व्यवस्था कर लेता है पर थोड़ी बातें सुनने के बाद स्थिति और स्पष्ट हो गयी। दुकान का मालिक कोई और है और मालिक की अन्य कई दुकानें और व्यवसाय हैं। उसके लिये यह संभव नहीं है कि अपनी सब दुकानों में समय दे पाये, अतः उसके लिये हर स्थान पर एक मैनेजर नियुक्त कर रखा है। सारे आर्थिक अधिकार मैनेजर के पास हैं, चार कर्मचारी अपना कार्य करते हैं और अपना पारिश्रमिक ले कर चले जाते हैं। कर्मचारी उत्तर भारत के हैं, मैनेजर स्थानीय है।

पिछले तीन वर्षों में एक बड़ी मज़ेदार बात देखने को मिली है। दो कर्मचारी पिछले तीन वर्षों से हैं और उनमें से एक ही मेरे बाल काटता है। जब भी मैं वहाँ पहुँचता हूँ, यदि वह थोड़ा व्यस्त होता है, मैं तनिक प्रतीक्षा कर लेता हूँ। दूसरा भी उसी के गाँव का है। दो अन्य कर्मचारी इस बीच जा चुके हैं और उनके स्थान पर जो नये कर्मचारी आये हैं, वे भी उसी गाँव के हैं और पहले से उपस्थित कर्मचारी के संबंधी भी हैं। इस समय चारों कर्मचारी एक ही गाँव के हैं, बाहर एक साथ रहते हैं और दुकान में एक साथ कार्य करते हैं। अनौपचारिक चर्चा से पता लगा कि दोनों नये कर्मचारी गाँव में कुछ कार्य नहीं करते थे पर यहाँ पर संभावना होने पर नाई का कार्य सीख कर यहाँ आ गये। दो तीन और लोग हैं उसी गाँव में जो अपने अवसर की प्रतीक्षा कर रहे हैं, आने को तैयार बैठे हैं।

जहाँ कर्मचारियों का स्थायीकरण और एकत्रीकरण होता जा रहा है, मैनेजर की स्थिति दयनीय है। इस बार जब मैं गया, पाँचवा चेहरा मुझे मैनेजर के स्थान पर दिखा। नये मैनेजर का दूसरा या तीसरा दिन रहा होगा, क्योंकि आधे घंटे में ही अनुशासन की जितनी मात्रा उसने अपने जमे जमाये कर्मचारियों पर झोंक दी, उसे देख कर तो लग रहा था कि वह स्वयं को स्थापित करने को बहुत व्यग्र है। या तो पिछले मैनेजरों को अधिक पारिश्रमिक नहीं मिलता होगा या वे आर्थिक हिसाब किताब या प्रबन्धन में कोई अव्यवस्था किये होंगे। इतनी जल्दी जल्दी मैनेजर बदलने का कोई अन्य कारण समझ ही नहीं आया मुझे।

मोबाइल पर बात मत करो, बीच में चाय मत पियो, आपस में बात मत करो, यह फ़ोटो इधर से हटाकर उधर पर लगाओ, अख़बार और मैगज़ीन व्यवस्थित रखो, रेडियो की आवाज़ कम रखो, ऐसे न जाने कितने आदेश मेरे ही सामने झोंक दिये नये मैनेजर ने। चारों कर्मचारी दूसरी ओर मुँह करके बीच बीच में मुस्कुरा रहे थे, मुझे देखने में बड़ा आनन्द आ रहा था। 'साहब बाल कट गये' सहसा ध्यान भंग हुआ, रुक कर थोड़ा और देखने का मन तो था पर कोई बहाना नहीं था। अब तो एक महीने बाद ही पुनः आनन्द लेने का अवसर मिलेगा, तब तक आप भी प्रतीक्षा कीजिये।

19.12.12

टिप्पणियाँ भी साहित्य हैं

कुछ दिन पहले देखा कि देवेन्द्र पाण्डेय जी ने एक ब्लॉग बनाया है, टिप्पणियों का। इसमें वह किसी पोस्ट को चुनते हैं और पोस्ट पर की गयी टिप्पणियों के संवाद को समझाने का कार्य करते हैं। बड़ी ही रोचक और रसमय प्रक्रिया है यह। इसके पहले रविकरजी की काव्यात्मक टिप्पणियों का ब्लॉग भी पढ़ने को मिलता रहा है। काव्यात्मक टिप्पणियाँ न केवल पोस्ट के भाव को संक्षेप में व्यक्त करती हैं, वरन उस विषय पर अपना मत भी व्यक्त करती हैं।

उत्साहवर्धक और संवेदनात्मक टिप्पणियों की सार्थकता है, पर उससे भी अधिक बात करती हुयी वो टिप्पणियाँ होती हैं जो विषय के किसी पक्ष को उजागर करते हुये लिखी जाती है। कई बार कुछ पोस्ट पढ़ना प्रारम्भ करते हैं, उस पर की गयी टिप्पणियाँ पढ़ते हैं, तो विषय पर किया गया एक शोध सा सामने आ जाता है। अपने ब्लॉग पर ही देखता हूँ, कई बार टिप्पणियाँ इतनी पूर्ण होती हैं कि उन्हें चुरा कर अपनी पोस्ट में लगा लेने की इच्छा होती है। आभूषण की तरह सज जाती हैं वे पोस्ट के सौन्दर्य में। कभी कभी तो लगता है कि पोस्ट तो मात्र विषय की प्रस्तावना ही होती है, उस विषय का शेष विस्तार तो बाद में आता है, टिप्पणियों के माध्यम से। कई बार तो किसी पाठक विशेष की टिप्पणी क्या रहेगी, यह उत्सुकता रहती है पोस्ट लिखते समय। देखिये तो, हम पोस्ट लिखते समय टिप्पणियों का चिन्तन करते हैं, वहीं सुधीजन टिप्पणी लिखते समय पोस्ट का पूरा अर्थ शब्दों में मथ देते हैं।

यह बड़ा ही रोचक तथ्य कि इसमें लेखक और पाठक की चिन्तन प्रक्रिया को सहारा देती है टिप्पणियों की व्यवस्था। जब ब्लॉग प्रारम्भ हुये होंगे तो यह संबंध हमारी कल्पना में आये भी नहीं होंगे। अंग्रेज़ी के ब्लॉग, जो मैं पढ़ता हूँ, वे मुख्यतः तकनीक से जुड़े होते हैं और उनमें संवाद से अधिक तथ्य प्रमुख स्थान पाते हैं। अंग्रेज़ी के अन्य ब्लॉग भी जो चिन्तन प्रधान होते हैं, उन पर भी संवाद की उतनी अधिक मात्रा नहीं दिखी मुझे। हिन्दी के ब्लॉगों में जो चौपाल दिखती है, वैसी कहीं नहीं दिखी हमें। लोग बात करते हुये से लगते हैं, चर्चायें मुख्यतः सकारात्मक ही होती हैं, यदि कहीं पर मतभिन्नता दिखती भी है तो संवाद और उभर आता है, अस्त नहीं होता है। वातावरण जीवन्त सा दिखता है, यदि एक स्थान सूखा दिखता है तो वर्षा कहीं और प्रारम्भ हो जाती है, पर समग्रता में देखा जाये तो प्रवाह बना ही रहता है।

कारणों की चर्चा करें तो बहुत अधिक विचार नहीं करना पड़ेगा। हमारे समाज का प्रभाव हमारे ब्लॉगों के प्रारूप पर स्पष्ट दिखता है। पान की दुकानों पर, नाई से बाल कटाते समय, हलवाई के यहाँ चाय की चुस्कियाँ लेते समय, बनारस के घाटों पर और गाँव की चौपालों में, हम विश्व के न जाने कितने नेताओं के निर्णयों पर प्रश्नचिन्ह खड़े कर देते हैं। राजनीति के विषय के अतिरिक्त बात संस्कृति की बारीकियों की हो, इतिहास की भूलों की हो, व्यक्तित्वों की हो या उनसे जुड़ी चटपटी सूचनाओं की हो, शायद ही कोई पक्ष छूटता होगा इन संवादों से। राजनैतिक विषयों की प्रारम्भिक समझ में इन अनौपचारिक चौपालों का विशेष महत्व रहा है, मेरे लिये भी और मेरे जैसे न जाने कितने और लोगों के लिये भी।

जब पोस्ट और उन पर हुयी टिप्पणियों को देखता हूँ तो वही सब स्थान याद आने लगते हैं। जैसे उन चर्चाओं में याद नहीं रहता था कि चर्चा छेड़ी किसने थी, मोड़ी किसने थी और समाप्त किसने की। यदि कुछ याद रहता है तो उस पर पारित हुये सामूहिक निर्णय। कौन से विचार सबकी सहमति धरते हैं, कौन विचार अभी तक अनसुलझे हैं और भविष्य की चर्चा का आधार बन सकते हैं। धीरे धीरे हमारी समझ बढ़ती है, आगामी चर्चा का स्तर बढ़ता है और विषय अपने निष्कर्षों पर पहुँचने लगता है।

जब किसी विषय में संवाद का इतना महत्व है तो संवाद विषय का अभिन्न अंग भी हुआ। टिप्पणियाँ जब संवाद का स्वरूप ले लेती हों तो वह भी विषय का अंग हो जाती हैं। जब लिखी हुयी पोस्ट साहित्य हो जाये तो टिप्पणियाँ भी साहित्य हो गयीं। टिप्पणियों का महत्व निश्चय ही इस प्रकार सबके लिये ही है।

आप अपनी टिप्पणियों को कितना महत्व देते है? दानकर भूल जाते हैं या उसकी एक प्रति अपने पास भी रख लेते हैं। मैं टिप्पणियों को अपने सृजन का अंग मानता हूँ अतः उन्हें कहीं सुरक्षित रख लेता हूँ। यद्यपि औरों के द्वारा की हुयी टिप्पणियाँ आपकी पोस्ट में और ब्लॉगर खाते में सुरक्षित रहती हैं, आपके द्वारा औरों के ब्लॉग पर की हुयी टिप्पणियाँ सुरक्षित नहीं रहती हैं। कभी कभी ब्लॉग संकलक हारम् पर पिछली कई टिप्पणियों का संकलन देख कर हर्षमिश्रित प्रसन्नता होती है। ब्लॉगर तो देर सबेर हमारे द्वारा की हुयी टिप्पणियाँ भी संरक्षित और संकलित कर ही देगा पर वर्तमान में जितनी दमदार टिप्पणियाँ स्मृति से निकली जा रही हैं, उन्हें स्वयं ही सहेज के रखने की आवश्यकता है।

मैं तो अपनी टिप्पणियाँ सहेज कर रखता हूँ, कभी कभी उस स्मृति के रूप में जो किसी का उत्कृष्ट ब्लॉग पढ़कर मन में आयी। अच्छा पढ़ने के बाद मन में सुप्त विचारों को शब्द मिलने लगते हैं, शब्द अच्छे मिलते हैं, सृजन होता है। मेरे द्वारा की गयी अच्छी टिप्पणियाँ अच्छी पोस्टों की कृतज्ञ हैं, जितनी अच्छी पोस्ट होती हैं, टिप्पणियों का स्तर उतना ही बढ़ जाता है।

पिछली पोस्ट पर मुझे इस बात का संबल मिला कि अच्छा पढ़ना भी चाहिये और उसके आधार पर अच्छी पोस्ट लिखनी भी चाहिये। अच्छी पुस्तक पढ़ उसके बारे में लिखने की इच्छा होती है। यही तर्क औरों के द्वारा लिखित अच्छी पोस्टों को पढ़ने के बाद भी लागू होती है, उन्हें पढ़ने के बाद भी कुछ त्वरित लिखने का मन करता है, वह लेखन ही टिप्पणियाँ हैं। एक अच्छी पुस्तक हो या एक अच्छी पोस्ट हो, उसे पढ़ने के बाद आप एक पोस्ट लिखें या एक टिप्पणी, वह भी सृजन का अंग है, वह भी साहित्य का अंग है। जितना संभव हो पढ़ें, जितना संभव हो स्वयं को व्यक्त करें। टिप्पणियाँ व्यर्थ नहीं हैं, टिप्पणियाँ व्यापार नहीं है, टिप्पणियाँ साहित्य हैं।

15.12.12

पढ़ते पढ़ते लिखना सीखो

पिछले कई दिनों से पढ़ रहा हूँ, बहुत पढ़ रहा हूँ, कई पुस्तकें पूरी पढ़ी, कई आधी अधूरी चल रही हैं। रात में बच्चों के सोने के बाद पढ़ना प्रारम्भ करता हूँ तो कब घड़ी को दोनों सुईयाँ तारों की दिशा दिखाने लगती हैं, पता ही नहीं चलता है। सुबह शीघ्र उठने में कठिन परिश्रम करना पड़ता है, दिनचर्या अलसायी सी प्रारम्भ होती है तब।

माताजी पिताजी घर आये हैं, पिताजी आज भी सुबह ५ बजे उठ जाते हैं और योग भी करते हैं। पृथु अपने बाबा के प्रिय हैं, सुबह उठने से लेकर रात कहानी सुनने तक साथ लगे रहते हैं। तो स्वाभाविक है कि पृथु भी सुबह योग करते हैं और उसके बाद पढ़ने भी बैठ जाते हैं। एक पीढ़ी ऊपर और एक पीढ़ी नीचे, दोनों ही हमें अधिक सोने वाला और आलसी समझते हैं और उसी दृष्टि से देखते भी हैं। 'उठने का समय मिल गया पापा को', कौन भला यह कटाक्ष झेल पायेगा। सारांश यह है कि हम नित ही अंक खोते जा रहे हैं, पता नहीं कि बाद में पृथु को अनुशासित रख पाने का अधिकार भी रख पायेंगे या नहीं।

बाजी हाथ से फिसल रही है, तेजी से, पर उसका अधिक हानिबोध नहीं है। असली समस्या यह है कि अधिक पढ़ने के क्रम में लिखना भी कम हुआ जा रहा है, सप्ताह में दो पोस्ट भी लिखने में इतना जूझना पड़ रहा है कि लिखा हुआ एक एक शब्द लाखों का लगता है। चेहरे से बच्चों को पता लग जाता है कि बुधवार या शनिवार आने वाला है और पापा ने अपनी पोस्ट लिखी नहीं है। ऐसा दिखने पर हमें बहुधा उस उल्लास और कार्यक्रम में सम्मिलित नहीं किया जाता है जो घर के शेष लोगों ने बनाया होता है। लिखना भी नहीं हो पाता है, मन ललचाता भी रहता है, एक विशिष्ट रूप लेता जा रहा है हमारा जीवनक्रम।

ऐसा पहली बार नहीं हैं कि लिखने और पढ़ने को साथ साथ चलने में समस्या न आयी हो। जब लिखना अधिक होता है तो पढ़ना पूरी तरह रुक सा जाता है, महीनों कोई पुस्तक उठाने का मन नहीं करता है। अब जब पुस्तकों को महीनों का शेष चुकाने बैठे हैं तो लिखने का मन नहीं हो रहा है। समय की कमी एक कारण अवश्य होगा, होना भी चाहिये, आप कितने भी विशिष्ट समझ लें स्वयं को, घंटे तो २४ ही मिलेंगे एक दिन में। चाह कर भी एक मिनट अधिक नहीं मिलेगा। यदि अधिक कर सकने के लिये अपनी कार्य क्षमता बढ़ाने का उपाय करना चाहूँ तो वह भी नहीं हो पा रहा है, क्योंकि मन की माने तो सुबह उठकर योग करने के लिये भी समय चाहिये। अब समस्या इतनी गहरा गयी है कि बिना गोता मारे उपाय निकलेगा भी नहीं।

धीरे धीरे मन को मनाने से दिनचर्या की समस्या तो हल हो भी जायेगी, पर एक और बौद्धिक समस्या सामने दिखती है जो लिखने में रोड़ा अटका रही है। सतही देखा जाये तो समस्या है, गहरे देखा जाये तो संभावना है। यदि आप कोई अच्छी पुस्तक पढ़ते हैं तो उस लेखक से संवाद करते हैं। पुस्तक जितनी रोचक होती है, संवाद उतना गहरा होता है, उतना ही अन्दर आप उतर जाते हैं। पुस्तक पढ़ने के बीच जो समय मिलता है, उसमें आप उसी संवाद पर मनन करते हैं। पहले तो पठन औऱ फिर उसी पर मनन, इसी में सारा समय निकल जाता है, कुछ समय ही नहीं बचता कुछ संघनित करके बरसाने के लिये। इतना समेट लेने की व्यग्रता रहती है कि कुछ निकालने का समय ही नहीं रहता है। हाँ, यह बात तो है कि जो भी संवाद होता है, वह कभी न कभी तो बाहर आयेगा, कई बार गुनने के बाद, बस यही संभावना है, बस यही सान्त्वना है।

न लिख पाने का एक और कारण भी समझ में आता है, पढ़ने और लिखने का स्तर एक सा न होना। अच्छे लेखक को पढ़ने में बौद्धिक स्तर इतना ऊँचा उठ जाता है कि तब नीचे उतर कर लिखने का साहस नहीं हो पाता है, अपनी लेखकीय योग्यता पर संशय होने लगता है। जब पकवानों की उपस्थिति आप के घर में हो तो आपकी अधकच्ची, अधपकी और चौकोर रोटी कौन सुस्वादु खा पायेगा? यही संशय तब धड़कन में धक धक करता रहता है और आप उसकी थाप को अपने ध्यान से हटा नहीं पाते हैं। जब साहित्य और सृजनता मंद मंद बयार के रूप में बह रही हो, तब अपने मन के अंधकार को टटोलने का मन किसका करेगा, विस्तार के आनन्द से सहसा संकुचित हो जाना किसको भायेगा भला?

यह समस्या मेरी ही नहीं है, कई मित्र हैं मेरे, जब वे अच्छा पढ़ने बैठते हैं तो लिखना बन्द कर देते हैं। बहुत से ब्लॉगर ऐसे हैं जिन्होंने लिखना कम कर दिया है। उनका लिखा पढ़ने को कम मिल रहा है, उसका दुख तो है, पर इस बात की प्रसन्नता है कि वे निश्चय ही बहुत ही अच्छा पढ़ रहे होंगे और भविष्य में और धमाके के साथ लिखना पुनः प्रारम्भ करेंगे। डर पर इस बात का है कि कहीं अच्छा पढ़ने की लत में वे लिखना न भूल जायें। सारा ज्ञान स्वयं समा लें, सारा आनन्द स्वयं ही गटक जायें और हम वंचितों के आस भरे नेत्रों को प्यासे रहने के लिये छोड़ दें।

तो प्रश्न बड़ा मौलिक उठता है, कि यदि इतना स्तरीय और गुणवत्तापूर्ण लिखा जा चुका है तो उसी को पढ़कर उसका आनन्द उठाया जाये, क्यों समय व्यर्थ कर लिखा जाये और औरों का समय व्यर्थ कर पढ़ाया जाये। कई लोग इस बौद्धिक गुणवत्ता और पवित्रता को बनाये रखना चाहते हैं और पुरातन और शास्त्रीय साहित्य पढ़ते रहने में ही अपना समय बिताते हैं। अपने एक वरिष्ठ अधिकारी को जानता हूँ, उनका अध्ययन गहन और व्यापक है। उन्हें जब कुछ ब्लॉग आदि लिखने के लिये उकसाया तो बड़ा ही स्पष्ट उत्तर दिया। कहा, प्रवीण, जो भी जानने योग्य है, वह सब इन पुस्तकों में है, यदि कुछ लिखा जायेगा तो वह इसी ज्ञान के आधार पर ही लिखा जायेगा। हम तो इसी के आनन्द में डूबे रहते हैं।

वहीं दूसरी ओर हम हैं कि अपनी समझ को भाँति भाँति प्रकार से समझाने के प्रयास में लगे रहते हैं। जिस प्रकार समझते हैं, अधकचरा या अपरिपक्व, उसी प्रकार व्यक्त करने बैठ जाते हैं। दोष हमारा भी नहीं है, अभिव्यक्ति में व्यक्ति छिपा हुआ है, यह स्वभाव भी है। अभिव्यक्ति कभी कभी इतनी तरल और सरल हो जाती है कि मर्म तक उतर जाती है। मुझे बहुधा यह भी लगता है कि किसी विषय को व्यक्त करने के क्रम में वह हमारे मन में और भी स्पष्ट हो जाता है।

यह दोनों पक्ष इतने सशक्त हैं कि निर्दलीय बने रहना कठिन हो जाता है, पढ़ना आवश्यक है और पढ़ते पढ़ते लिखना भी। यह समस्या हमारी भी है और आपकी भी, उत्तर आप भी ढूढ़ रहे होंगे और हम भी। पर पढ़ते रहने के क्रम में अनुशासन का बाजा नहीं बजने देना है, कल उठना है समय से और पिता और पुत्र दोनों के ही साथ योग भी करना है और ध्यान भी, यह जानने के लिये कि पढ़ते पढ़ते लिखना कैसे सीखा जाये।

12.12.12

हृदय हमारा

निर्मलतम था हृदय हमारा,

निर्दयता का वृहद ताण्डव,
स्वार्थपरक  जीवन का मूल्यन ।
और घृणा के कई बाणों से,
छिला सदा ही हृदय हमारा ।।

लोलुपता का घृणित आवरण,
अहंकार की निर्मम चोटें ।
और वासना के दलदल में,
देखो सत्व लुटा बैठा है ।।

कोई हमको फिर लौटा दे,
निर्मलतम जो हृदय हमारा ।

8.12.12

मन है, तनिक ठहर लूँ

मन फिर है, जीवन के संग, कुछ गुपचुप बातें कर लूँ ।
बैठ मिटाऊँ क्लेश, रहा जो शेष, सहजता भर लूँ ।।

देखो तो दिनभर, दिनकर संग दौड़ रही,
यश प्रचण्ड बन, छा जाने की होड़ रही,
स्वयं धधक, अनवरत ऊष्मा बिखरा कर,
प्रगति-प्रशस्था, प्रायोजन में जोड़ रही ।
अस्ताचल में सूर्य अस्त, अब निशा समान पसर लूँ ।
मन फिर है, जीवन के संग, कुछ गुपचुप बातें कर लूँ ।।१।।

निशा बताये, दीपक कितना जल पाया है,
स्मृतियों में डूब, निरन्तर अकुलाया है,
इस आँगन में एक जगह तो छूटी फिर भी,
दिया तले जो तम है, अपनी ही छाया है ।
वाह्य-प्रतिष्ठा पूर्ण, हृदयगत निष्ठा मधुरिम भर लूँ ।
मन फिर है, जीवन के संग, कुछ गुपचुप बातें कर लूँ ।।२।।

प्रश्न साधते मौन, नहीं प्रिय कोई उपस्थित,
प्रगति-दम्भ मद, मत्सरवश जन, सभी अपरिचित,
आपाधापी इस प्रयत्न की व्यर्थ दिख रही,
आश्रय, प्रेम-प्रणेतों का ही भूल गया हित,
प्रगति-नगर तज गाँव चलूँ, मैं अपनी ठाँव ठहर लूँ ।
मन फिर है, जीवन के संग, कुछ गुपचुप बातें कर लूँ ।।३।।

मद-नद-प्लावित, बच्चों की किलकारी भूला,
चकाचौंधवश, मैं आँगन की क्यारी भूला,
माँ का बेटा, कनक-पंथ पर बढ़ते बढ़ते,
माँ का आँचल, प्रिय की आँखें प्यारी भूला,
प्रगति-जनित सम्मोहन घातक, रहूँ सचेत, उबर लूँ ।
मन फिर है, जीवन के संग, कुछ गुपचुप बातें कर लूँ ।।४।।

मन-आँगन में एक पूरा संसार बसा है,
भाव, विचार, दिशाओं का विस्तार बसा है,
कठिन पंथ कर सहज दिखाती, मूर्त सृजनता,
साम्य, संतुलित एक भविष्य आकार बसा है ।
शान्ति कुटी में बैठ, हृदयगत पीड़ायें सब हर लूँ ।
मन फिर है, जीवन के संग, कुछ गुपचुप बातें कर लूँ ।।५।।

जितनी गहरी जड़ें, पेड़ भी उतना ऊँचा,
पोषित जिनपर, टिका हुआ अस्तित्व समूचा,
निश्चय ही मैं, कर्म क्षितिज पर पहुँच गया पर,
किस आँगन की महक, हवा ने रुककर पूँछा ।
घर, समाज की प्रेम-समाहित, सोंधी माटी भर लूँ ।
मन फिर है, जीवन के संग, कुछ गुपचुप बातें कर लूँ ।।६।।

स्पर्धा की दौड़, हृदय में स्वप्न समाया,
सार्थक करता आशाओं को, बढ़ता आया,
मिली चेतना, हर प्रकार से पालित, पोषित,
जिन गलियों में खेला, उनको क्या दे पाया ।
लाखों आँखें बाट जोहतीं, आओ तनिक ठहर लूँ ।
मन फिर है, जीवन के संग, कुछ गुपचुप बातें कर लूँ ।।७।।