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1.7.21

सात जन्म - क्रम


ऊर्जा, साम्य, विकास और एकता की विमाओं में भूत, भविष्य और वर्तमान को कैसे साधा जाये, यह जीवन का मूल प्रश्न हो जाता है। साथ ही ढेर सारे और भी अनुप्रश्न उठते हैं, जिनका निवारण आवश्यक हो जाता है। जो प्रश्न हमारे हैं वही प्रश्न हमारे पूर्वजों के भी थे। जब जीवन की आपाधापी से कुछ समय निकाल कर अपने पूर्वजों के साथ बैठता हूँ तो दो भाव उमड़ते हैं। एक भाव होता है अगाध आदर का। अद्भुत मेधा, अद्भुत चिन्तन, अद्भुत उहा और विचारों का एक व्यवस्थित क्रम। दूसरा भाव होता है, आनन्द के अतिरेक में उनसे लिपट जाने का। गर्व होता है, मन करता है कि साँस रोके रहूँ और उस गर्वानुभूति को जाने ही न दूँ। प्रश्न घुमड़ते हैं, जब तक उत्तर नहीं पा जाता मन, अतृप्ति बनी रहती है। उत्तर पाते ही आनन्द की रेख पूरे अस्तित्व में तड़ित तरंगा सी समा जाती है।


उनके लिखे हुये में और हमारे समझे हुये में बस प्रत्यक्ष का अन्तर होता है। उन्होंने समस्त ज्ञान का प्रत्यक्ष किया होता है, एक प्रक्रिया में उतर कर। योग के सम्यक अनुपालन से और ध्यान, धारणा और समाधि से होते हुये जब तथ्य उद्भाषित होते हैं तब व्यक्त शब्द आप्त द्वारा प्रत्यक्ष किये गये ज्ञान की सामर्थ्य पा जाते हैं। हमें वही ज्ञान अनुमान से प्राप्त होता है और शब्द रूप में सहज उपलब्ध है। यही कारण है कि शाब्दिक ज्ञान जानने के बाद भी उसका मर्म समझने में हमें वर्षों लग जाते हैं। अनुभव बहुत कुछ सिखाता है, शब्दों में पड़ा ज्ञान, श्लोकों में निहित शिक्षा, सूत्रों में क्रमबद्ध पिरोया ज्ञान अपने आप को धीरे धीरे व्यक्त करने लगता है।


जीवन को जानने और समुचित निभाने के लिये ऊर्जा, साम्य, विकास और एकता की विमाओं को समझना आवश्यक है। किस प्राथमिकता और क्रम में ऊर्जा लगायी जाये, किस प्रकार विपरीतता में साम्य स्थापित किया जाये, किस प्रकार आवश्यक विकास लब्ध हो और अन्ततः किस प्रकार समग्रता से आन्तरिक और वाह्य विश्व में एकत्व संस्थापित किया जाये? पिछले ब्लाग में देखा कि भूत, भविष्य और वर्तमान में भटकता मन ऊर्जा खींचता है, पहले क्या कर्म निष्पादित हों? क्या धरें और क्या तजें? धरना भविष्य का द्योतक है, तजना भूत का, यथास्थिति वर्तमान की। किसको कितना महत्व दिया जाये कि सब संतुलित चले? तब संतुलन की स्थिति में किस प्रकार गति हो? तब किस प्रकार गतिमय जीवन के सम्बन्धों में तदात्म्य स्थापित हो, अन्य जीवों के साथ, प्रकृति के साथ, स्वयं की इन्द्रिय, मन, बुद्धि और आत्मा के साथ।


जब क्रिया का एक मात्र अवसर वर्तमान ही है, जो भी करना होगा वर्तमान में ही करना होगा। स्मृति भी वर्तमान के क्षण में आयेगी, कल्पना भी वर्तमान के क्षण ही आयेगी, ज्ञान भी वर्तमान में प्राप्त होगा और कर्म भी वर्तमान में ही सम्पादित होंगे। स्मृति और कल्पना के साथ न्याय करने के लिये ज्ञान आवश्यक है, आगे बढ़ने के लिये कर्म आवश्यक है। वर्तमान को सही प्रकार से निभाना जिसे आ गया, उसे जीवन जीने की कला का मर्म भी आ गया।


विकास क्रमिक है। समग्र में क्रमशः शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास। हर अंग का अपना क्रमिक विकास। स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ें, नीचे से ऊपर बढ़ें, वाह्य से अन्दर बढ़ें तो शारीरिक स्तर पर ही, सुरक्षा, प्रजनन, पाचन, संचालन, संप्रेषण, संतुलन से होते हुये स्थैर्य आता है। मानसिक स्तर पर इन्द्रिय सुख, प्रसन्नता, व्यापकता, समर्पित प्रेम, स्वतन्त्रता, शुद्धता होते हुये अस्तित्व की अनुभूति होती है। बौद्धिक स्तर पर स्थायित्व, रचनात्मकता, मौलिकता, सहृदयता, उन्मुक्त विचार, दृश्य चेतना से होते हुये एकता स्थापित होती है। इसी प्रकार आध्यात्मिक स्तर पर अस्मिता, उत्सुकता, विकास, समर्पण, विशिष्टता, प्रज्ञा के मार्ग से ऋतम्भरा प्रतिष्ठित होती है।


आपको यह तथ्य निश्चय ही रोचक लगेगा कि प्रत्येक अंगों के विकासक्रम में सात ही चरण दिये गये हैं। सात की यह अवधारणा जिसे मैंने सात जन्मों के प्रश्न से ढूढ़ने का प्रयास किया था और क्रमशः काल और मन की गति से सम्बद्ध करने का प्रयास किया था, वह अवधारणा सात ऊर्जा चक्रों में अपनी निष्पत्ति पा जाती है।


शरीर में सात ऊर्जा चक्र माने गये हैं। मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा और सहस्रार। नाड़ियों की संरचना में तन्त्रिका तन्तुओं के संगमस्थल ऊर्जा के केन्द्र माने गये हैं। समग्रता और निर्बाध रूप से जीने के लिये आवश्यक है कि इनमें ऊर्जा प्रवाहित होनी चाहिये। जहाँ पर यह प्रवाह बाधित हो जाता है, हम अस्तित्व के उसी बिन्दु पर अटक जाते हैं, ऊपर नहीं बढ़ पाते हैं। न केवल ये चक्र हमारी मानसिक गति से सम्बद्ध हैं वरन काल से भी जुड़े हैं। किस समय किसको प्राथमिकता देनी है, साम्य का स्तर क्या हो, ऊपर कैसे बढ़े और अन्ततः एकत्व कैसे आये, इसका एक अद्भुत विवरण इस प्रकरण में मिलता है।


ऊर्जा, साम्य, विकास और एकता की यात्रा है, इन चक्रों में क्रमशः ऊपर बढ़ना। जानेंगे इसके विश्लेषित रहस्य अगले ब्लाग में।

29.6.21

सात जन्म - मन

 

मन है तो गति करेगा, स्वाभाविक है। कहाँ तक गति करेगा? जहाँ तक उसकी सामर्थ्य है। कब किस काल में रहेगा, क्या पता? क्यों नहीं हमें सारी स्मृतियाँ एक साथ याद आती हैं? क्यों नहीं हमारा सारा जीवनकृत्य स्मृतियों में परिणित हो जाता है? क्या वह कारण है जो स्मृति विशेष को आकर्षित करता है? क्या कुछ होता है उन घटनाओं में जो वे स्मृति बन इतने गहरे चिपक जाती हैं? और क्या होता है उन घटनाओं में जो होती तो विशेष हैं पर स्मृति में नहीं आती हैं या कहें कि काल में कवलित हो जाती हैं।


मन की गति विशिष्ट है। वह एक पल स्मृतियों में जीता है, दूसरे पल कल्पना में, तीसरे पल वर्तमान को समझता है और चौथे पल कर्म में ध्यानस्थ हो जाता है। विश्लेषण करें कि कितने समय किस काल में रहा मन? और जिस काल में भी रहा, अन्य कालों से कितना प्रभावित रहा मन? जब सुख और दुख उसी मन की अनुकूलता और प्रतिकूलता से व्यक्त हों, जब मन की गति जीवन के दिशा और दशा बदलने में सक्षम हो, जब भविष्य अनिश्चित हो और निर्णय अंधकूप के निष्कर्षसम हों, तो मन की गति के आधारभूत नियम जानना आवश्यक हो जाता है। यदि हम दृष्टा हैं तो कौन मन की यह गति नियन्त्रित कर रहा है? यदि कोई और नियन्त्रण में है तो सुख और दुख हमारे भाग में क्यों?


बड़ा असहाय सा लगता है जब दृष्टा मन के आन्दोलनों को झेल रहा होता है। तब मन न जाने कौन सी स्मृति सामने लाकर रख दे और आपको पुनः भयग्रस्त कर दे। सफलता की निर्मल आस को पुरानी असफलता की निर्मम स्मृतियों से ध्वस्त कर दे। एक पुरानी चोट की स्मृति आपके वर्तमान को अतिसावधान कर जाये। स्मृति में पड़ा एक छल का प्रकरण स्वस्थ परिवेश के प्रति भी अविश्वास उत्पन्न कर दे।


यदि हम अपनी स्मृतियों से इतने बद्ध हैं, या इतने प्रभावित हैं, या इतने प्रताड़ित हैं, तो हम क्या वह हो पा रहे हैं जो हमें उस परिस्थिति में होना चाहिये? वर्तमान की स्मृतियों पर अतिनिर्भरता निश्चय ही भविष्य के लिये भी उचित नहीं है। यदि ऐसा है तो निश्चय ही हम एक पूर्वनिर्धारित जीवन जी रहे हैं। तब वह कल्पनाशीलता कहाँ से आयेगी। सृजन के साथ यह अन्याय होगा कि कल्पनाशीलता सुप्तप्राय हो जाये। तब क्या हम पशुवत नहीं हो जायेंगे?


कल्पनाशीलता के लिये आवश्यक है कि स्मृतियाँ बाधक न हों, अपितु साधक हों। स्मृतियों की अधिकता और प्रबलता दोनों ही बाधक होने की संभावना रखती हैं। साधक स्मृतियाँ प्रबल हों और बाधक निर्बल, तभी कल्पना प्रखर हो सकेगी। कल्पनाशीलता ही क्यों, वर्तमान में सामान्य रूप से कार्य करने के लिये भी स्मृतियों के उछाह का समुचित निस्तारण आवश्यक है।


तब एक सहज सा प्रश्न उठ सकता है कि अच्छा जीवन तो वह होता है जिसमें ढेर सी स्मृतियाँ हों। इसी मानसिकता में हम स्मृतियाँ बनाते रहते हैं, समेटते रहते हैं, इस तथ्य से सर्वथा अनभिज्ञ कि यही एक दिन बोझ बन जायेंगी, एक पग भी आगे नहीं बढ़ने देंगी, बद्ध कर लेंगी।


कभी कभी स्मृतियों की इस आधिपत्य से हम विद्रोह कर बैठते हैं। कष्टमय भूत को भुलाकर, मार्ग के विरुद्ध एक नये मार्ग पर हठ करके बढ़ जाते हैं। भूत से यह बलात विलगता आपको स्वतन्त्र करने के स्थान पर और भी क्षीण कर देती है। पहली इसलिये कि आप अपनी गति और मति के विरुद्ध जाते हैं जिससे आपको सामान्य से कहीं अधिक ऊर्जा लगती है, साथ ही आपका निर्मित आधार आपके काम नहीं आता है। दूसरी इसलिये कि भूत से बलात विलगता आपको अपने भूत से और भी बद्ध कर देती है।


जहाँ स्मृति का तांडव भय उत्पन्न करता है, आपको आवश्यकता से अधिक सावधान, संचय और उपक्रम एकत्र करने में लगा देता है, कल्पना का भी विषादपूर्ण योगदान कम नहीं है। कल्पना के द्वारा निर्मित आगत की आकृति और उसे पूर्ण करने की चिंता। भविष्य की चिंता में डूबा अस्तित्व व्यर्थ ही ऊर्जाहीन हो जाता है। आश्चर्य है कि यह दुख भूत के भय की तुलना में कई गुना होता है। जहाँ भूत में घटित घटना एक ही होती हैं, कल्पनाजनित संभावित भविष्य कई प्रकार के हो सकते हैं। हर संभावित भविष्य में जाकर उसे पूर्ण करने या न कर पाने की चिंता में हमारे द्वारा प्राप्त मानसिक दुख कई गुना बढ़ जाता है, शारीरिक पीड़ा के तुलना में तो सैकड़ों गुना। क्योंकि बहुत कुछ संभव है कि असफलता की संभावित परिस्थितियाँ आयें ही नहीं। 


भूत के भय और भविष्य की चिंता, दोनों ही मिलकर वर्तमान को अस्तव्यस्त करने की क्षमता रखते हैं। बहुधा हम जीवन इसी उठापटक में निकाल देते हैं और वर्तमान पर तनिक भी ध्यान नहीं देते हैं। वर्तमान पर क्षिप्त विक्षिप्त सी प्रतिक्रिया परिस्थितियों को और भी प्रतिकूल कर देती है और तब लगता है कि जीवन में सब कुछ हमारे नियन्त्रण से बाहर चला गया।


वर्तमान हमारे लिये अत्यन्त महत्वपूर्ण है। स्मृति में कोई घटना जायेगी कि नहीं इसका निर्धारण वर्तमान से ही होगा। भविष्य पीड़ासित होगा कि नहीं, इसका भी निर्धारण वर्तमान से होगा। इस तथ्य के विपरीत हम वर्तमान को दोनों ही ओर से खो देते हैं। संभवतः यही हमारे जीवन की सबसे बड़ी विडम्बना है।


भूत, भविष्य और वर्तमान को साधने का क्रम अत्यन्त रोचक है। ऊर्जा, साम्य और एकता के पथ पर सध कर जाना पड़ता है। जानेंगे अगले ब्लाग में। 

10.8.19

कुछ नया कर

कल किया था, आज भी वो,
वही मति, अनुमति वही हो,
नित्य चलना उसी पथ पर,
आस फिर भी, कुछ बदलकर,
जीवनी आकृति गढ़ेगी,
कदाचित आगे बढ़ेगी,
किन्तु ठहरी और बहरी,
अनमनी अटकी दुपहरी,
उदय हो सो गया दिनकर,
एक अर्जित अंक गिनकर,
व्यर्थ किंकर्तव्य बीता,
शेष है मन क्षुब्ध रीता,
अब तो अपने पर दया कर,
कुछ नया कर।

गर्व की चर्चा कभी हो,
क्यों विगत की दुंदभी को,
बजाकर मनमुग्ध ऐंठे,
कर्म अपने छोड़ बैठे,
कुछ करें समकक्ष बढ़कर,
कुछ नहीं एक पथ पकड़कर,
तनिक स्थिरता तो लायें,
काल में हम ढह न जायें,
बिसारी छोड़ी विरासत,
नहीं कोई ध्येय अनुरत,
दिशा भ्रमवत, अधो गतिमय,
राह भटकी, विपथ-मतिमय,
पितर तर्पित हों, दया कर,
कुछ नया कर।

सृष्टि में स्थान अपना,
और सबके साथ चलना,
प्राप्ति का उद्योग वांछित,
सामने उत्थान लक्षित,
हो कठिन उलझी परिस्थिति,
रुद्ध है आरोह में गति,
प्रश्न क्षमता पर नहीं हो,
काल संग बढ़ते नहीं जो,
लक्ष्य कैसे भूल जायें,
तनिक ठहरें फिर जगायें,
पुनः स्वर विश्वास के हम,
डटे रहने से हटे तम,
सुप्त स्वप्नों पर दया कर,
कुछ नया कर।

स्वस्थ तन में स्वस्थ मन हो,
और श्रेयस पर मनन हो,
बढ़ें स्नेही सकल जन,
खुलें मन परिवार आँगन,
देश और परिवेश सुखमय,
रहे जो भी शेष, सुखमय,
उदय अपना, ध्यान जग का,
अभीप्सित उत्थान सबका,
प्रयत्नों की आस महती,
किन्तु चेष्टा नहीं दिखती,
दिन कहीं कल सा न बीते,
चाह आगत विगत जीते,
हे प्रखरमय, अब दया कर,
कुछ नया कर।

13.3.16

जीवन - अब तक

(विचारों का प्रवाह न काव्यरूप में होता है और न ही गद्यरूप में। वह तो अपनी लय में बहता है, उसे उसकी लय में समझ पाना और लिख पाना कठिन है, फिर भी निर्मम आत्मचिन्तन के शब्दों को आकार देने का प्रयास किया है।)

जीवन का दुख परिभाषाआें के परे चला गया ।
सुख का शून्य दुख के कोहरे में बदल गया ।
व्यक्ति की पिपासा स्वयं व्यक्ति को ही पी जायेगी,
ऐसा नहीं सोचा था ।
विचारों का तारतम्य शान्त जल की तरह व्यवस्थित था,
उसमें वेदना की तरंग जीवन का क्रम बिगाड़ देगी,
ऐसा नहीं सोचा था ।

लेकिन जल कब तक शान्त रहेगा ?
कभी न कभी कोई वाह्य या आन्तरिक तत्व,
उसमें अस्थिरता उत्पन्न करेगा ।
व्यथाआें के घेरे में मनुष्य कब तक खुशियों की आशा करेगा ?
मन का अह्लाद टिक नहीं सकता,
कभी न कभी वह आँसू बनकर निकल ही जायेगा ।

कितना समेटा जीवन के क्रियाकलापों को पंक्तिबद्ध करने के लिये,
लेकिन ।
जीवन को बहने के लिये छोड़ दिया समाज की निष्ठुर धार में,
लेकिन ।
तथाकथित सुखी मनुष्यों के पदचिन्हों पर चलने का प्रयत्न किया,
लेकिन ।

लेकिन क्या मिल पाया, जो मुझे चाहिये था ?
क्या मिल पायी वह शान्ति, जो अभिलाषित थी ?
क्या मिल पाया उन रागों को सुर,
जो जा रहे हैं जीवन से,
और आँखों में क्यों का प्रश्न लिये हैं ।

मुझे लगता है, मैं रो पड़ूँगा,
और रोता ही रहूँगा ।

क्या सोचता हूँ मैं और क्यों सोचता हूँ मैं ?
जहाँ भी सोचा है, पता नहीं क्या सोचा है ?
जो भी किया है, पता नहीं क्या किया है ?
या कहूँ कि अभी तक कुछ सोचा ही नहीं ।
या कहूँ कि अभी तक कुछ किया ही नहीं ।

भविष्य की चौखट पर पैर रखने से घबरा रहा हूँ ।
कहीं काल पूछ न दे कि किया क्या अब तक ?

23.8.15

जीवन को जब कहा, ठहर जा

जीवन को जब कहा, ठहर जा, नहीं उसे रुकना भाता है,
और हृदय जब भरे उलाछें, सन्नाटा पसरा जाता है ।

आलस में बीते कितने दिन, कितने अवसर व्यर्थ हुये,
शब्दों से उलझे उलझे हम, कितने वाक्य निरर्थ हुये ।

मैने कब माँगी थी गति सोपान त्वरित चढ़ जाने की,
नहीं कभी भी आकांक्षा थी उत्कर्षों को पाने की ।

जीवन को देव प्रदत्त एक उपहार मान कुछ बीते दिन,
और कभी एक ध्येय अग्नि पर अर्पित करने चाहे ऋण ।

माना प्रश्न पूछ्ने का अधिकार नहीं है अब हमको,
पर क्या उत्तर दे पायें जब समय सालता है हृद को ।

9.11.13

किस तरह गणना करें

कभी लगता, आज बढ़कर सिद्ध कर दूँ योग्यता,
कभी लगता, व्यग्र क्यों मन, है ठहर जाना उचित,
कभी लगता, व्यर्थ क्षमता, क्यों रहे यह विवशता,
कभी लगता, करूँ संचित, और ऊर्जा, कुछ समय,

यूँ तो यह विश्राम का क्षण, किन्तु मन छिटका पृथक,
तन रहा स्थिर जहाँ भी, मन सतत, भटका अथक,
ढूढ़ता है, समय सीमित, कहीं कुछ अवसर मिले,
लक्ष्य हो, संधान का सुख, रिक्त कर को शर मिले,

पर न जानूँ, क्या अपेक्षित, क्या जगत की योजना,
नहीं दिखता, काल क्रम क्या, क्या भविष्यत भोगना,
एक संरचना व्यवस्थित, व्यर्थ क्यों विकृत करूँ,
रिक्तता आकाश का गुण या क्षितिज विस्तृत भरूँ,

सोचता हूँ, क्या है जीवन, जीव का उद्योग क्या,
है यहाँ किस हेतु आना, विश्व रत, उपयोग क्या,
बूँद से हम, विश्व सागर, दे सकें क्या ले सकें,
खेलने का समय पाकर ठेलते रहते थकें,

या प्रकृति को मूल्य देना, जन्म जो पाया यहाँ,
अर्ध्य अर्पित ऊर्जा का, कर्म गहराया यहाँ,
मौन धारण, जड़ प्रकृति यह, बोलती कुछ क्यों नहीं,
चाहती क्या, मर्म अपने, खोलती कुछ क्यों नहीं,

काश, थोड़े ही सही, संकेत कुछ जीवन गहे,
दौड़ना कब, कब ठहरना, एक समुचित क्रम रहे,
विश्व सबका व्यक्त एकल या सभी का मेल है,
यह अथक प्रतियोगिता है या परस्पर खेल है,

जब नहीं कुछ ज्ञात, पथ पर कौन से हम पग धरें,
चाल मध्यम, गतिमयी या शून्यवत ठहरे रहें,
कर्म क्या, किस पर नियन्त्रण या स्वयं की मुक्ति का,
किस तरह गणना करें, अनुमान इस आसक्ति का।

16.1.13

जाने व आने के बीच की शान्ति

रेलवे स्टेशन पर हुयी एक चित्रकला प्रदर्शनी के चित्रों को निहार रहा था, एक चित्र ने सहसा ध्यान आकर्षित कर लिया। चित्र में दो क़ुली बैठकर सुस्ता रहे हैं और शीर्षक है, द साइलेन्स बेटवीन डिपार्चर एण्ड एराइवल, जाने व आने के बीच की शान्ति। चित्रकार हैं श्री पी सम्पत कुमार।

जब चित्र देखा तो रेलवे स्टेशन पर घटने वाली सामान्य घटना का चित्रण लगा वह, एक ट्रेन जा चुकी है, दूसरी आने वाली है, कुलियों के लिये यह विश्राम का समय है। सामान्य यात्रियों को यह दृश्य नहीं दिखते हैं, ट्रेन के आते और जाते समय कुलीगण व्यस्त ही रहते हैं। हाँ, कभी ट्रेन के समय के बहुत पहले पहुँचना हो, किसी कारणवश स्टेशन पर अधिक रुकना पड़ जाये या विश्रामालय में कभी रुके हों और भोजनोपरान्त प्लेटफ़ार्म पर टहलना हो, तभी इस तरह के दृश्य दिखते हैं। हम रेलसेवकों के लिये यह दृश्य नियमित दिनचर्या का अंग है।

हम सबके लिये यह दृश्य भले ही सामान्य हो, पर चित्र को ध्यान से देखें, चेहरे के भाव पढ़ें और शीर्षक पर विचार करें तो यह दृश्य सामान्य नहीं रह जाता है। जीवन के संदर्भों में इस चित्र का दार्शनिक पक्ष बड़ा ही सशक्त है। कुलियों के शरीर तनिक शिथिल हैं, विगत श्रम का परिणाम हो सकता है, कुछ संवाद चल रहा है, संभवतः कार्य से संबंधित वार्तालाप हो या हो सकता है घर परिवार या गाँव का विषय हो। ठेले पर बैठना, श्रम और विश्राम का साधन एक होने की ओर संकेत कर रहे हैं। चित्र मानसिक स्तर पर जो कुछ भी संप्रेषित कर सकने में सक्षम है, वह व्यक्त सा दिख रहा है। रेलवे के बारे में जितना ज्ञान मनस पटल पर होगा, उतने संबद्ध अर्थ दे जायेगा यह चित्र।

दार्शनिक स्तर पर इस चित्र का शीर्षक बहुत कुछ कह जाता है। किसी युवा के लिये सप्ताह के कार्यदिवस सप्ताहान्तों के आनन्द के बीच की शान्ति है, उसका सारा मन इसी बात के लिये लगा रहता है कि कब पुनः सप्ताहान्त आये और वह आनन्दमय हो जाये। किसी कर्मशील के लिये सप्ताहान्त एक शान्ति के रूप में आता है। किसी विरहणा के लिये प्रियतम के जाने और आने की बीच की प्रतीक्षामयी शान्ति, किसान के लिये वर्षा के जाने और आने की बीच की शान्ति, विद्यार्थी के लिये परीक्षाओं के बीच की शान्ति, श्रमिक के लिये रात का विश्राम दो संघर्षरत दिवसों के बीच की शान्ति है, अनुशासित पति के लिये पत्नी के मायके जाने और वापस आने के बीच की शान्ति, राजनेता के लिये एक समस्या के जाने और दूसरी के आने के बीच की शान्ति। हर एक के कर्मक्षेत्र में इस तरह के शान्तितत्वों की उपस्थिति रहती है, जो एक कार्य और दूसरे कार्य के बीच होती है।

लोग प्रकृति को गतिमय मानते हैं, जब गति नहीं रहती है तो उसे शान्ति समझते हैं। थोड़ा गहरे सोचा जाये तो शान्ति ही मूल है, कोई विक्षेप या हलचल उत्पन्न होती है, बढ़ती है और ढल जाती है। शरीर को ही देखें, रात भर पूरा का पूरा तन्त्र लगा रहता है, थकान स्वरूप टूटे और बिखरे तन्तुओं को जोड़ने के लिये ताकि सुबह पुनः ऊर्जस्वित हो जाये, ऊर्जा वह भी स्थिर, बहने को तैयार। एक परमाणु के अन्दर परमाणु बम की ऊर्जा विद्यमान होती है पर वह भी शान्तिप्रियता में रमा रहता है, क्रियाशीलता आने पर ही विस्फोट करता है। समाज के सारे तन्त्र देखें तो वे भी शान्ति में बने रहना चाहते हैं, बिना हिलाये हिलते ही नहीं, उपयोगी हो, अनुपयोगी हों। हमारी क्रियाशीलता प्रकृति की शान्तिप्रिय मन्थर गति से कहीं अधिक होती है, हम विश्व को गतिमय करते हैं और मूल रूप से उपस्थित शान्ति को गतिमयता से उत्पन्न अन्तराल मान लेते हैं।

ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) के द्वितीय नियम को देखें तो वह भी वही इंगित करती है। उथल पुथल का एक मानक होता है, एन्ट्रॉपी, किसी भी तन्त्र के अन्दर उपस्थित ऊर्जा के प्रवाह का मानक। यदि किसी भी तन्त्र को प्रकृति के भरोसे छोड़ दिया जाये, उससे छेड़ छाड़ न किया जाये तो उसकी एन्ट्रॉपी स्वतः कम होती रहती है और अपने न्यूनतम स्तर पर पहुँच जाती है। न्यूनतम स्तर की एन्ट्रॉपी शान्ति का परिचायक है, शान्ति मूल है, प्रकृति शान्तिप्रिय है, हम सृष्टि चलाने के क्रम में उसे गतिमय कर देते हैं, उसे उस स्थिति में छोड़ देने से वह स्वतः ही अपने मूलतत्व में समा जाती है।

बचपन में एक शान्तिपाठ पढ़ते थे, जिसमें प्रकृति के सब तत्वों को शान्ति की ओर जाने का उद्बोधन होता था, हर कार्य के पश्चात, हर यज्ञ के पश्चात। तब तनिक आश्चर्य होता था कि कार्य कर रहे हैं तो शान्ति की प्रार्थना क्यों, प्रकृति तत्वों से शान्ति का उद्बोधन क्यों? तब यह तथ्य समझ नहीं आता था कि प्रकृति का मूल तत्व शान्ति है, हमारा कोई भी उद्योग उसमें विध्न डाल रहा है, पर क्या करें, करना आवश्यक है। शान्तिपाठ प्रकृतिअंगों से उस मूलतत्व में पुनः बसने का आग्रह मात्र है। तो क्या हमारे पूर्वजों के उपक्रम न्यूनतम उथल पुथल पर केन्द्रित थे, यम नियम, जीवनशैली अधिक श्रमसाध्य न हो प्रकृति से ताल मिलाकर चलने वाली थी। ध्यान, समाधि, आत्मचिन्तन, शाकाहार, अपरिग्रह, सब के सब प्रकृति के नियमों से प्रेरित थे, ऊष्मागतिकी के द्वितीय नियम की दिशा में थे। प्रश्न कई हैं, दर्शन गहन है, उत्तर एक दिन में मिलने वाले नहीं, उत्तर बिना अनुभव मिलने वाले नहीं। स्थिर हो जाने की अदम्य चाह कहीं सार्वभौमिक तो नहीं, हम जीवों में।

गतिमयता को सफलता स्वीकार करने वाले, शान्ति के इस अन्तराल को अधिक महत्व नहीं देंगे, उनके मन में तो पुनः आने वाले कार्य के लिये उथल पुथल मची है, उनके लिये तो यह समय भी कार्यतुल्य है। अधिक कर जाने की चाह सफलता का मानक हो जाये तो वह सुख कहाँ से आयेगा जो कुछ न होने की शान्ति से आता है, जो मुक्तिपथ से आता है। बहुतों को लगता है कि उनका जीवन निष्प्रयोजन में ही निकला जा रहा है, उन्हें जाने और आने के बीच की शान्ति की आवश्यकता ही नहीं है। ऐसे कर्मशीलों ने जहाँ एक ओर मानवता को कई उपहार दिये हैं, वहीं दूसरी ओर उन्होने प्रतियोगिता को उन्मादित कर अन्य के लिये विश्व को एक कठिन स्थान बना दिया है। वहीं दूसरी ओर कुछ लोग प्रकृति के सहज उपासना के भ्रम में न्यूनतम से भी कम कर आलस्यविहार में बैठे रहते हैं। कर्महीन नर पावत नाहीं, पर कर्मशील भी सुख को न जान पाये, इस द्वन्द्व में विश्व सदा ही गतिमान बना रहता है।

आप इस अन्तराल को किस प्रकार लेते हैं, यह एक बड़ा प्रश्न है। यह सभ्यताओं के उत्थान और पतन का प्रश्न है, यह प्रश्न संस्कृतियों के वैशिष्ट्य का प्रश्न है, यह प्रश्न संसाधनों के संदोहन का प्रश्न है और यही तन्त्रों के सरलीकरण का प्रश्न भी है। कभी कभी कुछ न होता हुआ दिखना, बहुत कुछ हो चुके होने का प्रतीक होता है, मानवविहीन संयन्त्रों को बनाने के पीछे कितनी मेधाओं का श्रम छिपा है, यह प्रत्यक्ष से कहाँ पता चलता है? सुव्यवस्थित नगर को चलाने के उपक्रम में नेपथ्य में कितना कार्य हुआ होगा, क्या पता? कई क्षेत्रों और देशों में मची उथल पुथल, अव्यवस्था और अशांति, कर्मशीलता के मानक तो नहीं हो सकते। हमारा श्रम व्यवस्था का प्रेरक हो, व्यवस्था शान्ति लाये, यही है मेरे लिये जाने और आने के बीच की शान्ति।