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19.6.16

रेलवे का ऑलराइट तन्त्र

कभी आपने ध्यान दिया है कि जब भी कोई ट्रेन किसी स्टेशन, गेट आदि से निकलती है तो ड्राइवर, गार्ड, स्टेशन मास्टर व गेटमैन आदि हरे रंग की झण्डी लहराते हैं। इसे ऑलराइट संकेत कहते हैं और इसका अर्थ है कि सब ठीक है। देखने में तो यह अत्यन्त साधारण सा कार्य लगता है, परन्तु इस पर रेलवे की सुरक्षा का पूरा आधार अवस्थित है। 

रेलवे अपनी विशालता के लिये जाना जाता है, डेढ़ किलोमीटर तक लम्बी ट्रेनें, तीन हजार किलोमीटर तक की यात्रायें, प्रतिदिन चलने वाली २० हजार ट्रेनें, उस व्यवस्था में लगे लाखों कर्मचारी। यदि व्यवस्थायें सुदृढ़ और सुव्यवस्थित न हों तो इतने विशाल तन्त्र को सम्हाल पाना असम्भव हो जायेगा। ऑलराइट की व्यवस्था रेलवे की आधारभूत व्यवस्थाओं में से एक है। यह समझना होगा कि यह कैसे कार्य करती है,  इसका महत्व क्या है और किसी बड़े तन्त्र को सम्हालने में यह कैसे सहायक हो सकती है?

रेलवे तन्त्र के प्रत्येक भाग को प्रतिदिन मानवीय स्तर पर गहनता से देखा जाता है, एक दो नहीं वरन सैकड़ों आँखों द्वारा, दसियों स्तर पर। पटरियाँ, ट्रेन, इन्जन, गेट, पुल, स्टेशन, बिजली के खम्भे आदि सभी स्थान। यहीं नहीं, प्रत्येक कर्मचारी अपना कार्य कैसे निष्पादित कर रहा है, इस पर भी अन्य की सतत और सजग दृष्टि रहती है। ऐसा नहीं है कि रेलवे में मशीनों और तकनीक द्वारा सुरक्षा नहीं देखी जाती है, पर मशीनों की अनुपस्थिति में डेढ़ सौ वर्षों से जो कार्यप्रणाली चली आ रही है उसे छोड़ पाना या ढीला करना, इसका साहस अभी हमें नहीं हो पाया है। मशीनें कभी नहीं बिगड़ेंगी और अर्थ का अनर्थ नहीं करेंगी, इसका विश्वास पूर्णतया नहीं आ पाया है। मशीनें सुरक्षा के अतिरिक्त स्तर के रूप में ही अपने आपको प्रतिस्थापित कर पायी हैं। 

जब भी ट्रेन चलती है, उसमें चलने वाले ड्राइवर, सहायक और गार्ड अपने दृश्य में आने वाले सभी स्थानों और सभी कर्मचारियों पर दृष्टि रखते हैं। पटरियों में किसी प्रकार की टूट, रेल फाटक का खुला होना, ट्रेन का डब्बा बीच में छूट जाना, नियत स्थान से किसी कर्मचारी की अनुपस्थिति, पैट्रोलमैन का न दिखना, स्टेशन पर कोई संदिग्ध गतिविधि, किसी तार का टूटना, पेड़ का गिरना आदि न जाने कितनी स्थितियों पर उनकी दृष्टि रहती है। और जब वे अपने रास्ते में मिलने वाले किसी भी कर्मचारी को हरी झण्डी हिलाकर ऑलराइट करते हैं तो इसका अर्थ होता है कि पिछले खण्ड में उपरिलिखित कोई समस्या नहीं है। इसी प्रकार जो कर्मचारी स्टेशन, गेट आदि स्थानों पर होते हैं, वे सब चलती हुयी ट्रेन के हर पहिये पर दृष्टि रखते हैं। कहीं कोई पहिया असामान्य ध्वनि तो नहीं कर रहा है, उसका कोई भाग असामान्य रूप से गर्म तो नहीं हो गया, ट्रेन का कोई पुर्जा झूल तो नहीं रहा है। ऐसी न जाने कितनी बातों के बारे में सुनिश्चित होने के बाद ही वे ड्राइवर व गार्ड को अपना ऑलराइट संकेत देते हैं। इसी प्रकार स्टेशनों पर भी गार्ड जब यह सुनिश्चित कर लेता है कि सारे यात्री चढ़ गये हैं तभी वह ड्राइवर को गाड़ी चलाने के लिये ऑलराइट संकेत देता है।

हर १० किमी पर एक स्टेशन, हर तीन किमी पर एक गेट, बीच में पटरियों और पुलों की सुरक्षा में लगे हुये न जाने कितने पैट्रोलमैन। आप यह मानकर चलें कि हर २ मिनट में कोई न कोई आपकी ट्रेन को अपनी सतर्क दृष्टि से देख रहा है, आपको पता चले न चले पर वह आपकी ट्रेन की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुये ऑलराइट संकेत संप्रेषित कर रहा है। इसी प्रकार पटरी, स्टेशन और पुलों के ऊपर से हर पाँच मिनट में एक गाड़ी निकल रही है, उसमें तैनात कर्मचारी अपनी पटरी के साथ बगल वाली पटरी पर भी दृष्टि रखते हैं। साथ ही पैट्रोलमैन पटरियों पर लगी एक एक चाभी का निरीक्षण और उनकी सुनिश्चितता दिन में एक से अधिक बार कर लेते हैं। इस प्रकार रेलवे  हर चालायमान या स्थायी तन्त्रों को दो से तीन मिनट में देखकर ऑलराइट सुनिश्चित करता रहता है। सुरक्षा का वृहद आधार ही इतने बड़े तन्त्र को चला पाने में समर्थ हो सकता है।  

जब तन्त्र बड़ा हो तो ऑलराइट संकेतों की व्यवस्थायें उसको सुचारु रूप से चलाने के लिये अनिवार्य अंग हैं। विशाल मध्य को साधने और छाँटने के लिये सिरों का आपस में संवाद बना रहना एक महती आवश्यकता है।  ट्रेन का मध्य हो या पटरियों का मध्य, उसे कोई देखे व सिरों को उसके बारे में बताये, यह व्यवस्था ऑलराइट तन्त्र में विद्यमान है। ठहराव व छटपटाहट मध्य में होती ही है, संचार व संवाद सुचारु न हो तो मध्य आवश्यकता से अधिक फूलने और फैलने लगता है।

रेलवे की भाँति ही अपना भी देश बड़ा है, उसे चलाने के लिये स्थापित तन्त्र भी बड़े हैं। अवलोकन करें कि उनमें कोई ऑलराइट संकेतों जैसी व्यवस्था है कि नहीं, और यदि नहीं है तो उसका क्या कुप्रभाव देश पर पड़ रहा है। रेलवे जैसे गतिमान तन्त्र में बीच में यदि कोई डब्बा छूट जाये तो तुरन्त पता लग जाता है। अन्य तन्त्रों की गति बहुत कम होने के कारण किसी के छूट जाने का पता तुरन्त नहीं लग पाता है और जब तक पता चलता है, बहुत देर हो जाती है। देश के विकास की ट्रेन गति पकड़ रही है, एक समुचित ऑलराइट तन्त्र के अभाव में संभवतः हमें पता ही न चल पाये कि कौन उस ट्रेन में चढ़ पाया है कि नहीं। गरीबों के लिये न जाने कितनी योजनायें बनी हैं, कितना लाभ दूसरे सिरे तक पहुँच पाता है, मध्य कितना फूल रहा है, यह सब तब पता चलेगा जब एक ऑलराइट तन्त्र सुचारु रूप से अवस्थित होगा।

जिनका अपना स्वार्थ सधता है, वे कभी नहीं चाहेंगे कि इस तरह के तन्त्र विकसित हों। अव्यवस्था बनी रहने से उनका लाभ है, फिर भी बड़े देश की व्यवस्थायें सुचारू रूप से चलाते रहने के लिये ऑलराइट तन्त्रों का पुनरुत्थान आवश्यक है। अपने जीवन काल में ही मैनें न जाने कितनी सरकारी संस्थाओं को टूटते देखा है, जीआईसी स्कूल, सरकारी अस्पताल, राशन तन्त्र, सरकारी योजनायें, बीएसएनएल, सब की सब ढेर होती हुयी देखी हैं। काश नीतिनिर्माताओं और लाभन्वितों के सिरे किसी ऑलराइट तन्त्र से जुड़े होते तो ये बड़ी व्यवस्थायें न ढहतीं। आगे सिरे में बैठे नियन्ताओं को तो सदैव ही लगता है कि उन्होंने अभूतपूर्व योजना क्रियान्वित की है, उन्हें क्या ज्ञात कि कितने डब्बे बीच पटरियों में पड़े रह गये। दुष्यन्त कुमार के शब्दों में सूखी जाती नदियों का कारण मार्ग में कहीं ठहरा पानी होगा। काश गंगासागर गंगोत्री को बता पाता कि कितना गंगाजल उस तक पहुँच पाया है।

वर्तमान में बहुत कार्य हुआ है। आईटी, सोशल माडिया, आधार, मोबाइल, जनधन बैंक आदि न जाने कितने ऑलराइट तन्त्र और उनके अंग अपने अस्तित्व का पूर्ण लाभ व्यवस्था को दे रहे हैं। जन जन का संवाद, अपने सिरे के बारे में सब ठीक होने या न होने की सूचना दूसरे सिरे तक पहुँचा रहे हैं। इन सूचनाओं की आवृत्ति और पहुँच अभी उतनी नहीं है जितनी वांछित है। सरकार के द्वारा इस तरह की व्यवस्थाये और स्थापित हों और दूसरे छोर पर स्थित प्रत्येक सिरा ऑलराइट संकेत भेजे तब अपने देश के बड़े तन्त्र पूर्णतया सध पायेंगे।

12.10.13

कानपुर से बंगलोर

आनन्द के अतिरेक में थकान का पता नहीं चलता है। थकान तब आती है, जब आनन्द अवस्था से आप जीवन के सामान्य पर उतर आते हैं। दिनभर सहपाठियों के साथ भेंट में समय का पता ही नहीं चला। मन तो प्रसन्न ही बना रहा, पर शरीर अपनी सीमाओं से कितना परे जा चुका था, उसका प्रमाण मिलना शेष था। मन अपने सामने किसी की सुनता नहीं है, सबसे मनमाना कार्य लेता है। शेष सबको अपनी सीमाओं से आगे निकलने का पता तब चलता है जब मन तनिक शान्त होता है। मन मित्र बना रहे, सच्चा साथ देता रहे, भरमाये नहीं, उद्विग्न न करें, और भला क्या चाहिये इस चंचल जीव से।

स्टेशन जाते समय थोड़ी देर के लिये अपने मामाजी के यहाँ जाना हुआ। मन का उछाह और तन की थकान मेरे ममेरे भाई को स्पष्ट दिख गयी थी, उसने स्नान करने की भली सलाह दी। स्नान के पश्चात मन स्थिर हुआ, शरीर में शीतलता भी आयी, पर लगा कि थोड़ा विश्राम फिर भी आवश्यक है। अब थोड़ी ही देर में वापसी की यात्रा प्रारम्भ करनी है, सोचा तभी जीभर कर विश्राम हो जायेगा, अभी तन्त्रिका तन्तुओं को सचेत रखते हैं।

नाम में दम
वहाँ से स्टेशन जाते समय एक चाट वाला ठेला दिखायी पड़ा, लिखा था, हाहाकार बतासे, ललकार टिकिया। वाह, सच में महारोचक नाम है यह, बतासे ऐसे कि आप हाहाकार कर उठें और टिकिया आपको खाने के लिये ललकारे, विपणन की भला इससे अधिक प्रभावी तकनीक और क्या हो सकती है? कानपुर में ही एक और प्रसिद्ध दुकान है, ठग्गू के लड्डू और बदनाम क़ुल्फ़ी। आनन्द की बात यह है कि इतने दमदार और दामदार नाम होने के बाद भी यह नगर मँहगा नहीं है। बंगलोर जैसे मँहगे नगर में रहने के बाद कानपुर के बारे में एक बात तो सविश्वास कहीं जा सकती है, नामों में दम पर दामों में कम। पिछली पोस्ट में कानपुर की न सुधरने वाली टिप्पणी कहीं हमारे ससुराल, विद्यालय और आईआईटी का हृदय न तोड़ बैठे, इसलिये कानपुर के कुछ अच्छे पक्ष उजागर करने का नैतिक दायित्व भी हमारा ही बनता है।

इदमपि कानपुरम्
झाँसी इण्टरसिटी प्लेटफ़ार्म नम्बर एक से जानी थी। वहाँ पर पहुँच कर एक दूसरे प्रकार के आनन्द की अनुभूति हुयी। पिछले कई वर्षों से एक नम्बर प्लेटफ़ार्म को देखता आ रहा हूँ, सदा ही ऐसा लगा था कि वहाँ पर स्थान कम है और भीड़ अधिक। इस बार स्थान अधिक लगा और भीड़ कम। पिछले एक दो वर्षों से हुये बदलाव में ट्रेन से २० मीटर तक की दूरी से सारी दुकानें, बेंच और अन्य अवरोध हटा लिये गये हैं। इतना सपाट कि वहाँ पर चार सौ मीटर की दौड़ आयोजित की जा सके। ऐसा करने से यात्रियों के आवागमन में कोई कठिनाई नहीं आती है और सब कुछ बड़ा खुला खुला सा लगता है। यदि प्लेटफ़ार्म बनाये जायें तो ऐसे ही बनाये जायें, परिवर्धन भी इन्हीं सिद्धान्तों पर ही हो। दुकान, बेंच आदि बनाने से हम थोड़ी बहुत सुविधा तो देते हैं पर प्लेटफ़ार्म को उसके प्राथमिक कार्यों से वंचित कर देते हैं। प्लेटफ़ार्म का प्राथमिक कार्य अधिकतम भीड़ को निर्बाध रूप से सम्हालना है। भोजन, विश्राम आदि की व्यवस्था प्लेटफ़ार्म क्षेत्र के बाहर हो, प्लेटफ़ार्म पर केवल यात्री ही जाये, सामान ले जाने के लिये ट्रॉली हों, आने और जाने के लिये भिन्न भिन्न द्वार हों, तभी कहीं जाकर स्टेशनों पर स्वच्छता और व्यवस्था रह पायेगी। अभी तो प्लेटफ़ार्म पूरा मेलाक्षेत्र लगता है, १५-२० मीटर चौड़े और ६०० मीटर लम्बे प्लेटफ़ार्म सदा ही पूरी तरह खचाखच भरे दिखते हैं। ट्रेनों में यात्रियों की पूरी संख्या की दृष्टि से भी यह क्षेत्रफल ४ गुना है, फिर भी पैर रखने का स्थान नहीं मिलता है प्लेटफ़ार्मों पर। बताते चलें कि चीन में केवल यात्री ही प्लेटफ़ार्म पर जा सकते हैं और वह भी ट्रेन आने के मात्र ३० मिनट पहले ही। वहाँ के प्लेटफ़ार्म इतने स्वच्छ और खाली दिखते हैं कि वहाँ फ़ुटबॉल खेली जा सके।

इण्टरसिटी समय से आयी, इस बार पिछले दरवाज़े के पास की सीट मिली थी, सीट पर बैठने के बाद अत्यधिक सफल और सुचारु रूप से संचालित कार्यक्रम के लिये कई मित्रों को धन्यवाद प्रेषित किया और आँख बन्द कर कुछ सोचने लगे। थकान तो पहले से ही थी अतः बैठते ही निढाल हो सीट पर ही लुढ़क गये, कब नींद आ गयी पता ही नहीं चला। अधिक विश्राम हो नहीं पाया और शीघ्र ही नींद उचट गयी। वातानुकूलन होने के बाद भी गर्मी लग रही थी, अर्धचेतना में संशय हुआ कि या तो बुखार आ गया है या वातानुकूलन कार्य नहीं कर रहा है। पूर्णचेतना में आने पर कारण तीसरा ही निकला।

कोच के बाहर खड़ा एक व्यक्ति धीरे से दरवाज़ा धकिया कर वातानुकूलन की शीतल हवा बाहर लिये ले रहा था। उसके ऐसा करने से बार बार गर्म हवा का झोंका लग रहा था और विश्राम में विघ्न पड़ रहा था। उलझन तो हुयी पर मुझे उन महाशय की जुगाड़ प्रवृत्ति पर आश्चर्य भी हुआ और हर्ष भी। तभी विद्युत विभाग के अपने एक सहयोगी अधिकारी की बात याद आयी कि यदि दरवाज़ा खुला रह जाये तो वातानुकूलित संयन्त्र पर बहुत अधिक बोझ पड़ जाता है और संभावना रहती है कि वह शीघ्र ही ढेर न हो जाये। कहीं संयन्त्र बिगड़ न जाये, इस संभावना को न आने देने की कटिबद्धता में मैंने टीटी महोदय को बुला कर वातानुकूलन का यह पक्ष समझाया और उन व्यक्ति को ऐसा न करने की सलाह देने को कहा। मेरे याचना में संभवतः उतना बल न होता जितना टीटी महोदय के एक वाक्य में दिखा। उस व्यक्ति ने मेरी ओर ऐसे देखा, मानो मैंने लोकतन्त्र या धर्मनिरपेक्षता की नयी परिभाषा प्रस्तुत कर दी है। फिर बाहर जाकर टीटी महोदय ने उन महाशय को पता नहीं किन शब्दों में क्या समझाया कि वे नत होकर दृष्टि से ओझल हो लिये।

बाहर से गर्म हवा आनी भले ही बन्द हो गयी हो पर लोगों की बातचीत का उच्च स्वर सुनायी पड़ रहा था। कान लगा कर सुना तो विषय था कि अगला प्रधानमंत्री कौन? चर्चा भले ही चलती ट्रेन में हो रही थी, भले ही वातानुकूलन के बाहर हो रही थी, भले ही खड़े खड़े हो रही थी, पर चर्चा टीवी पर होनी वाली चर्चाओं से कहीं ऊँचे स्तर की और कहीं अधिक विश्लेषणात्मक थी। मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के राजनैतिक प्रभाव, दशकों से वोटर की बदलती मानसिकता, राजनैतिक पार्टियों की सूचना संग्रहण प्रक्रिया और निर्णयों को किस समय लेना है, इन जैसे कई विषयों पर जो सुनने को मिला, वैसा आज तक न किसी चैनल में सुना और न किसी समाचार विश्लेषण में पढ़ा। कानपुर के आस पास के जनों की इतनी उच्च राजनैतिक चेतना देख कर मन किया कि अपनी सीट उन्हें देकर उनका त्वरित सम्मान कर दें, पर अपनी थकान का स्वार्थ सर चढ़ कर बोलने लगा और यह सुविचार उतनी ही त्वरित गति से त्याग दिया गया। हाँ यदि टीवी चैनल वालों को अपनी टीआरपी स्तरीय विश्लेषणों से बढ़ाने की इच्छा हो तो उन्हें कानपुर-झाँसी के बीच चलने वाली ट्रेनों में अपना स्थायी प्रतिनिधि नियुक्त कर देना चाहिये।

झाँसी उतर कर ३ घंटे का विश्राम था, पर पूर्व परिचितों के आ जाने और उनके साथ बतियाने में वह समय भी निकल गया। नींद का ब्याज बढ़ता जा रहा था, पर राजधानी ट्रेन का आश्रय था कि उसमें सोकर सारी थकान उतारी जायेगी।

बंगलोर राजधानी झाँसी के प्लेटफ़ार्म नम्बर एक पर ही आयी। कोच पीछे था, वहाँ पहुँचने के क्रम में सारे प्लेटफ़ार्म पर एक विहंगम दृष्टि डाली। कानपुर की तुलना में झाँसी का प्लेटफ़ार्म पूरी तरह से भरा और अव्यवस्थित लग रहा था। अव्यवस्था से अधिक, झाँसी का प्लेटफ़ार्म वहाँ पर व्याप्त घोर निर्धनता को भी अभिव्यक्त कर रहा था। रात को कई ट्रेनें झाँसी से होकर निकलती हैं, कई ट्रेनें सुबह जाती है, लोग सायं से ही आकर स्टेशन पर डेरा डाल लेते हैं। प्लेटफ़ार्म पर ग्रेनाइट या अच्छा पत्थर लगने से लोगों को वहाँ पर सो लेने में कष्ट नहीं होता है। बहुतों के पास चद्दर नहीं थी, कई गत्ते बिछाकर सोये थे, कई नीचे अखबार बिछाये लेटे थे। छोटी छोटी गठरियाँ, मैले कुचैले कपड़े, सोये समाज में श्रमिक वर्ग प्रमुख था। पाँच छह के समूह में एक व्यक्ति आधी आँख खोले सामान की सुरक्षा कर रहा था। जो एकल थे, वे अपना सामान या तो हाथों में बाँधे थे या पैरों से दबाये सो रहे थे। बीस मीटर चौड़े प्लेटफ़ार्म पर दो फ़ुट चौड़ा रास्ता नहीं मिल रहा था चलने को। ऐसा नहीं है कि आवश्यकता पड़ने पर प्लेटफ़ार्म पर सोया नहीं जा सकता, पर यह दृश्य देख कर विवशता शब्द अधिक मुखरित होता है।

राजधानी के अन्दर पहुँच कर लगा कि सहसा विश्व परिवर्तन हो गया। रात्रि का डेढ़ बजा था, झाँसी के प्लेटफ़ार्म नम्बर एक का दृश्य मन को व्यथित अवश्य कर रहा था पर इस बार मन पर शरीर ने सहज अधिकार जमा लिया। थकान और शीतल वायु ने कुछ ही मिनटों में सोने को विवश कर दिया। स्वप्नहीन निशा थी, निश्चिन्त निशा थी, पिछले न जाने कितने दिनों की शारीरिक व मानसिक व्यस्तता के बाद घर वापसी की पूर्वनिशा थी। पता ही नहीं चला कि कब रात निकली, कब दिन चढ़ा, कब नागपुर आया और वर्धा पीछे छूट गया। जब नींद खुली तब अच्छा लग रहा था, थकान जा चुकी थी, परिचारक कई बार अल्पाहार व चाय के बारे में पूछ चुके थे। भोजन में क्या लेना है क्या नहीं, कब लेना है, आदि कई प्रश्नों से अपने ही देश में राजा होने का क्षणिक सुख अवश्य देती है राजधानी ट्रेन।

एक युगल था ऊपर की दो सीटों पर, नया विवाह था और प्रेम विवाह था, अनौपचारिकता और व्यवहारिकता अधिक थी, कोई झिझक व संकोच नहीं। हमारे घर में तो कई दिन इस बात पर चर्चा चली कि हमारी श्रीमतीजी हमें क्या संबोधन करें। हमारी माताजी और पिता जी एक दूसरे को पापा और मम्मी ही कहते हैं। कई लोग माँ और पिता के सम्बोधन को वैश्विक न बना कर बच्चों के नाम भी विशेषण के रूप में जोड़ देते हैं। अन्ततः बात पाण्डेजी पर आकर नियत हुयी, साथ में हमसे श्रद्धा कहने का अधिकार भी नहीं छीना गया, यह बात अलग है कि भरी भीड़ में हम भी सुनोजी जैसे सम्बोधनों पर उतर आते हैं। यह युगल था कि धाँय धाँय एक दूसरे का नाम लिये जा रहा था। कितने ही आधुनिकता में आ गये हों पर सार्वजनिक नाम लेना अब भी अटपटा लगता है। अच्छा ही है, माँ बाप ने इतने प्यार से नाम रखा है, लेने देने में क्या जाता है।

सायं से अगली सुबह तक ट्रेन तेलंगाना और सीमान्ध्र क्षेत्र में थी, पूरे आन्ध्र में आन्दोलन की स्थिति थी, भय इस बात का था कि कहीं रास्ते में रोक न लिया जाये। कहीं कुछ भी व्यवधान नहीं आया और हम ११० घंटे के पश्चात अपने परिवार के साथ सकुशल और प्रसन्न थे।

इति यात्रा।

21.9.13

साइकिल, टेण्ट और सूखे मेवे

नीरज की वर्तमान में की गयी साइकिल यात्रा के दो अन्य साथी भी थे, उनका अपना टेण्ट और बैग में पड़े सूखे मेवे। इन दोनों के सहारे उन्होने तो बहुत साहसी यात्रा सम्पादित कर ली, पर कम जीवट लोगों में इनका क्या प्रभाव पड़ता है, यह एक मननीय प्रश्न है।

जब यातायात के साधन अधिक नहीं थे, यात्रायें पैदल होती थीं। यात्रायें सीमित थी, व्यापार आधारित थीं, धर्म आधारित थीं, ज्ञान आधारित थीं। लोग पढ़ने जाते थे, बनारस, तक्षशिला, नालन्दा। चार धाम की तीर्थ यात्रा पर जाते थे। यही नहीं, जितने भी इतिहास पुरुष हुये हैं, सबने ही यात्रायें की, बड़ी बड़ी। राम की पैदल यात्रा ४००० किमी से कम नहीं थी, कृष्ण भी १५०० किमी चले, शंकराचार्य तो ७००० किमी के ऊपर चले। मार्ग, साधन और भोजन आदि की व्यापक व्यवस्था थी, हर समय उपलब्धता थी। जब कभी भी नियत मार्ग से भिन्न गाँवों तक की यात्रा होती थी, अतिथि देवो भव का भाव प्रधान रहता होगा। लोग थोड़ा बहुत भोजन लेकर चलना अवश्य चलते थे पर शेष की अनिश्चितता तो फिर भी नहीं रहती थी।

कितना अच्छा वातावरण था तब पर्यटन या देश भ्रमण के लिये। लोग घूमते भी थे, कहीं भी पहुँचे तो रहने के लिये आश्रय और खाने के लिये भोजन। अतिथि को कभी ऐसा लगता ही नहीं था कि वह कहीं और आ गया है। तब घुमक्कड़ी का महत्व था, लोग मिलते रहते थे, ज्ञान फैलता रहता था। तीर्थ स्थान आधारित पर्यटन था, धर्मशाला, छायादार वृक्ष और आतिथ्य।

अब हमें न वैसा समय मिलेगा और न ही वैसा विश्वास। अब तो साथ में टेण्ट लेकर चलना पड़ेगा, यदि कहीं सोने की व्यवस्था न मिले। अब साथ में साइकिल भी रखनी पड़ेगी, यदि नगर के बाहर कहीं सुरक्षित स्थान पर रहना पड़े। अब साथ में थोड़ा बहुत खाना, सूखे मेवे, बिस्कुट आदि भी लेकर चलना होगा, यदि कहीं कोई आतिथ्य भी न मिले।

रेलवे के माध्यम से मुख्य दूरी तय करने के बाद स्थानीय दूरियाँ साइकिल से निपटायी जा सकती हैं। यदि पर्यटन स्थल के में ही साइकिल किराये पर मिल जाये तो १०० किमी की परिधि में सारे क्षेत्र घूमे जा सकते हैं, ५० किमी प्रतिदिन के औसत से। रेलवे के मानचित्र में रेलवे लाइन के दोनों ओर १०० किमी पट्टी में पर्यटन योग्य अधिकतम भूभाग मिल जायेगा, जो एक रात टेण्ट में और शेष ट्रेन में बिता कर पूरा घूमा जा सकता है।

कहीं भी मंगल हो जायेगा
अपने एक रेलवे के मित्र से बात कर रहा था, विषय था रेलवे की पटरियों के किनारों के क्षेत्रों में बिखरा प्राकृतिक सौन्दर्य। हम दोनों साथ में किसी कार्यवश बंगलोर से ७० किमी उत्तर में गये थे। एक ओर पहाड़ी, दूसरी ओर मैदान, मैदान में झील। अपना कार्य समाप्त करने के बाद हम दोनों अपनी शारीरिक क्षमता परखने के लिये पहाड़ी पर बहुत ऊपर चढ़ते चले गये। ऊपर से जो दृश्य दिखा, जो शीतल हवा का आनन्द मिला, वह अतुलनीय था। बहुत देर तक बस ऐसे ही बैठे रहे और प्रकृति के सौन्दर्य को आँकते और फाँकते रहे। बात चली कि हम कितने दूर तक घूमने जाते हैं, पैसा व्यय करते हैं, अच्छा लगता है, संतुष्टि भी मिलती है, पर रेलवे के पटरियों के किनारे सौन्दर्य के सागर बिखरे पड़े हैं, उन्हें कैसे उलीचा जाये। जिस खंड में भी आप निकल जायें, नगर की सीमायें समाप्त होते ही आनन्द की सीमायें प्रारम्भ हो जाती हैं।

तब क्यों न पटरियों के किनारे किनारे चल कर ही सारे देश को देखा जाये? हमारे मित्र उत्साह में बोल उठे। विचार अभिभूत कर देने वाला था, कोई कठिनता नहीं थी, दिन भर २५-३० किमी की पैदल यात्रा, सुन्दर और मनोहारी स्थानों का दर्शन, स्टेशन पहुँच कर भोजन आदि, पैसेन्जर ट्रेन द्वारा सुविधाजनक स्टेशन पर पहुँच कर रात्रि का विश्राम, अगले दिन पुनः वही क्रम। यदि टेण्ट और साइकिल आदि ले लिया तो और भी सुविधा। रेलवे स्टेशन के मार्ग में सहजता इसलिये भी लगी कि यह एक परिचित तन्त्र है और किसी भी पटरी से ७-८ किमी की परिधि में कोई पहचान का है।

क्या इस तरह ही पर्यटन गाँवों का पूरा संजाल हम नहीं बना सकते हैं, जिनका आधार बना कर सारे देश को इस तरह के पैदल और साइकिल के माध्यमों से जोड़ा जा सकता है। यदि बड़े नगर और उनके साधन हमारी आर्थिक पहुँच के बाहर हों तो उसकी परिधि में बसे गाँवों में पर्यटन गाँवों की संभावनायें खोजी जा सकती हैं। यदि स्थानीय यातायात के साधन मँहगे हों तो साइकिल जैसे सुलभ और स्वास्थ्यवर्धक साधनों से पर्यटन किया जा सकता है। तनिक कल्पना कीजिये कि कितना आनन्द आयेगा, जब पटरियों के किनारे, जंगलों के बीच, झरनों के नीचे, पहाड़ियों के बीच से, सागर के सामने होते हुये सारे देश का अनुभव करेंगे हमारे युवा। पर्यटन तब न केवल मनोरंजन के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य प्रदान करेगा वरन हमारे बौद्धिक और सांस्कृतिक एकता के आधार भी निर्माण करेगा।

पर्यटन के ऊपर मेरी सोच भले ही अभी व्यावहारिक न लगे पर इस प्रकार ही इसे विकसित करने से पर्यटन न केवल सर्वसुलभ हो जायेगा वरन अपने परिवेश में सारे देश को जोड़ लेगा। अभी पर्यटन में लगे व्यय को देखता हूँ तो लगता है कि पर्यटन भी सबकी पहुँच के बाहर होता जा रहा है, एक सुविधा होता जा रहा है। जिनके पास धन है, वे पर्यटन का आनन्द उठा पाते हैं, वे ही प्रारम्भ से अन्त तक सारे साधन व्यवस्थित रूप से साध पाते हैं। आज भले ही सुझाव व्यावहारिक न लगें, पर यदि पर्यटन को जनमानस के व्यवहार में उतारना है तो उसे सबकी पहुँच में लाना होगा।

ट्रेन की यात्रा, एक फोल्डेबल साइकिल, एक टेण्ट और सूखे मेवे। साथ में कुछ मित्र, थोड़ी जीवटता, माटी से जुड़ी मानसिकता, गले तक भरा उत्साह और पूरा देश नाप लेने का समय। बस इतना कुछ तो ही चाहिये हमें। यदि फिर भी स्वयं पर विश्वास न आये तो बार बार नीरज का ब्लॉग पढ़ते रहिये।

चित्र साभार - thereandbackagain-hendrikcyclessouth.blogspot.com

14.9.13

पर्यटन - स्थानीय पक्ष

एक बार आपकी यात्रा पूरी होती है तो अगली चिन्ता होती है, रुकने की। किसी स्थान में ठहरने का उद्देश्य तीन बातों के लिये होता है, पहला स्नानादि के लिये, दूसरा विश्रामादि के लिये और तीसरा अपना सामान रखने के लिये। नीरज बहुधा अपनी यात्राओं में ये पहले दो कार्य टाल जाते हैं और यदि सामान अधिक हो तो तीसरे के लिये क्लॉक रूम का सहारा लेते हैं। सही भी है, जब दिन भर पर्यटन में ही व्यतीत करना हो तो होटल आदि में व्यय क्यों? जब दो घंटे से अधिक भी उस स्थान पर नहीं बिताना है, तो दिन भर के लिये उसे क्यों आरक्षित करना और दिन भर का किराया क्यों देना? एक दिन में घूमे जा सकने वाले स्थानों में सुबह की ट्रेन से आकर सायं की ट्रेन से जाया जा सकता है। अब प्रश्न दो हैं, कहाँ तैयार हों और थोड़ा थक जाने की स्थिति में कहाँ िवश्राम करें?

अपने १७ वर्षों के रेलवे कार्यकाल में मैंने कई जीवटों को देखा है। सुबह नित्यक्रिया ट्रेन में ही, गंतव्य में उतर कर ट्रेन में पानी भरने वाले पाइपों में स्नान, रेलवे प्लेटफार्मों में विश्राम, क्लॉक रूम में सामान, लीजिये बच गया होटल का अपव्यय। तनिक और सकुचाये लोग प्रतीक्षालयों में स्नानादि करते हैं और वहीं पर विश्राम भी। झाँसी या राउरकेला के स्टेशनों पर सुबह के तीन बजे आप चले जाइये, आपको स्टेशनों में पाँव धरने का स्थान नहीं मिलेगा, सुबह की ट्रेनों से कहीं जाने वाला सारा जनमानस रेलवे के प्लेटफ़ार्मों पर ही रात से आकर सो जाता है। इसमें बहुधा लोग अपनी जीविका के लिये जाने वाले निर्धनजन होते हैं, पर बहुत से घुमक्कड़ों के लिये इस प्रकार की घुमक्कड़ी कोई आश्चर्य की बात नहीं है?

आप में बहुतों को ज्ञात होगा कि रेलवे में वातानुकूलित प्रथम श्रेणी के कोच के चार बॉथरूमों में एक में स्नान की व्यवस्था भी रहती है। मैंने कई बार उसका उपयोग किया भी है, अत्यधिक सुविधाजनक है वह। हाँ, उतने आनन्द से तो नहीं नहा सकते हैं जितने घर में या नदी में नहाते हैं पर शुचिता की दृष्टि से बहुत उपयोगी सुविधा है। यदि पूरी तरह से तैयार होकर ही निकला जाये तो गंतव्य में न जाने कितना समय बचाया जा सकता है। कई बार ऐसे ही समय बचाया है। अभी कुछ दिन पहले एक सलाह मिली थी कि यदि रेलवे अन्य कोचों में इसी तरह स्नान की व्यवस्था कर दे तो न जाने कितना समय बचाया जा सकता है, चाहे तो इसके लिये पैसा भी लिया जा सकता है। यदि यह व्यवस्था की जा सके तो प्रातः शीघ्र ट्रेन पहुँचाने की आवश्यकता कम हो जायेगी, किसी स्थान पर पहुँचने वाली ट्रेनों के लिये सुबह ५ बजे से ११ बजे तक का सुविधाजनक कालखण्ड मिल जायेगा। यदि यह भी संभव न हो सके तो स्टेशन में ही बस तैयार होने के लिये सुविधा की व्यवस्था कर दी जाये, बस १ घंटे के लिये, शुल्क सहित। वह एक होटल के व्यय से बहुत कम पड़ेगा। घुमक्कड़ों और घुमक्कड़ी के लिये इससे अधिक बचत का कोई साधन तब हो ही नहीं सकता।

इस तरह का मितव्ययी साधन होने के बाद भी बहुतों को भागादौड़ी में आनन्द नहीं आता है। किसी स्थान पर पहुँचने के बाद थोड़ा सुस्ताना अनिवार्य हो जाता है। उन पर्यटकों के लिये भी रेलवे स्टेशन से कहीं दूर पर होटल में जाकर ठहरना तनिक कष्टकर हो जाता है। कई लोगों को यदि रेलवे स्टेशनों के रिटायरिंग रूम में रहने को मिल जाये, तो वे दूर जाकर रहना नहीं चाहते। स्टेशन पर स्थानीय यातायात के सारे साधन रहते हैं, भोजन की व्यवस्था रहती है, इस दृष्टि से देखा जाये तो किसी भी होटल की तुलना में रेलवे के रिटायरिंग रूम अधिक सुविधाजनक हैं। लोगों ने दो और सुविधायें मुझे बतायीं, जिन पर सामान्यतः रेलवे में कार्य करने वालों का ध्यान नहीं जाता है। पहली यह कि रात में कभी भी ट्रेन पहुँच जाये, उतर कर सीधे विश्राम किया जा सकता है, रात में नींद में अधिक व्यवधान नहीं पड़ता है। दूसरा यह कि किसी ट्रेन को पकड़ने के लिये प्लेटफार्म पर बहुत पहले से नहीं आना पड़ता है, समय की बचत होती है और किसी भी समय ट्रेन हो, पर्यटन की सततता बनी रहती है।

होटल में जाने से यात्रा के स्तरों की संख्या बढ़ जाती है। किन्हीं भी दो स्तरों के बीच में समय व्यर्थ होता है, धन व्यय होता है और अनिश्चितता भी बनी रहती है। बैंगलोर का ही उदाहरण लें। रात्रि में ८ बजे के बाद ऑटो का किराया दुगना हो जाता है, इस कारण से रात्रि में जाने वाली ट्रेनों के यात्री सायं से ही स्टेशन पर आकर जम जाते हैं, इसमें बहुत समय व्यर्थ हो जाता है। वैसे मैनें कई युवाओं को अपना लैपटॉप खोल कर कार्य करते हुये देखा है, पर जिस निश्चिन्तता से वह रिटायरिंग रूम में कार्य कर सकते हैं, भरी भीड़ में कर पाना संभव नहीं है। यद्यपि रेलवे में इस प्रकार के यात्रियों के लिये एयरपोर्ट जैसे आधुनिक सुविधाओं से युक्त प्रतीक्षालय बहुत उपयोगी सिद्ध हो रहे हैं, पर फिर भी रिटायरिंग रूम से अधिक सुविधाजनक कुछ और नहीं पाया है। जहाँ कहीं भी सरकारी विश्रामगृह की सुविधा नहीं रहती है, मैं भी रिटायरिंग रूम में ही रुकता हूँ।

जब भी हम यात्रा की योजना बनाते हैं, सदा ही ऐसी ट्रेनें ढूँढते हैं जो सायं ६ से ९ के बीच चले और सुबह ५ से ८ बजे के बीच पहुँच जाये। उस समय हम उन ट्रेनों को छोड़ देते हैं जो या तो रात में चलती हैं या रात में पहुँचती हैं। कारण बस यही रहता है कि इतनी रात में स्टेशन से उतर कर कहाँ जायेंगे? यदि थोड़ा ध्यान दिया जाये और स्टेशन पर अल्पकालिक या दिन भर रहने की व्यवस्था मिल रही हो तो उन ट्रेनों में भी यात्रा असुविधाजनक नहीं रहेगी। तब सुविधाजनक दिखने वाली ट्रेनों की भीड़ ऐसी ट्रेनों में भी आरक्षण ढूँढने का प्रयास करेगी। स्टेशनों पर गतिविधि का कालखण्ड बढ़ेगा, व्यस्त समय की भीड़ नियन्त्रित होगी, उतने ही रेलवे संसाधनों में अधिक लोग यात्रा कर सकेंगे।

जो यात्रियों की सुविधाजनक मानसिकता होती है, उसी के अनुसार रेलवे अपनी समय सारिणी भी बनाती है। प्रथम दृष्ट्या, उन ट्रेनों के प्रस्ताव पर विचार तक नहीं होता है जो देर रात को चलें या देर रात को पहुँचें। ऐसा होने से सारा का सारा दबाव सुबह और सायं की ट्रेनों में पड़ने लगता है और बहुधा ही संसाधनों के अभाव में नयी ट्रेन का प्रारम्भ हो ही नहीं पाता है। यदि स्टेशन स्थिति रिटायरिंग रूमों को यात्रा का एक अभिन्न अंग मान कर योजना बनायी जायेगी तो रात्रि में न केवल ट्रेनों का संचालन किया जा सकेगा वरन व्यस्त समय के अतिरिक्त और लोगों को ट्रेन सुविधा का लाभ दिया जा सकेगा। ट्रेनें वैसे तो २४ घंटों दौड़ती हैं पर वाह्य परिवेश से असमयीय संपर्क के कारण रात के समय का उपयोग बड़े स्टेशनों पर नहीं कर पाती हैं। रिटायरिंग रूम की व्यवस्थायें व्यर्थ जा रहे समय के संसाधन का सदुपयोग कर सकती है और न केवल पर्यटकों को सुविधा वरन रेलवे की आय में भी वृद्धि कर सकती है।

कुछ छोटी सुविधायें स्टेशनों की व्यस्तता को विस्तारित कर अधिक ट्रेनों और यात्रियों को रेलवे तन्त्र में समाहित करती है और ही साथ यात्रियों और पर्यटकों को कहीं अधिक सुविधाजनक अनुभव भी प्रदान करती हैं। बंगलोर का अनुभव पुनः लेता हूँ, यहाँ पर रात्रि के ५ घंटे पूरा सन्नाटा रहता है,वहीं दूसरी ओर सुबह और सायं के समय ट्रेनों और यात्रियों के लिये प्लेटफार्मों का अभाव हो जाता है। जिस प्रकार से बंगलोर के लिये ट्रेनें चलाने के लिये माँग है, उसकी दृष्टि से देर सबेर रेलवे इन छोटी छोटी सुविधाओं को बड़े स्तर पर जुटाने का प्रयत्न करने वाला है, अधिक को समाहित करने हेतु, अधिक सुविधा हेतु और अधिक आय हेतु। इस प्रक्रिया में पर्यटन भी लाभान्वित पक्षों में उभरेगा।

आइये अब स्थानीय साधनों के बारे में चर्चा करते हैं। एक उदाहरण मैं अपने मित्रों को बहुधा देता हूँ। किसी साधारण श्रेणी से दिल्ली जाने वाले कि लिये, जिसके पास थोड़ा सामान भी है, पूरी यात्रा में उसका धन किस तरह से व्यय होता है? लगभग १० किमी की दूरी से ऑटो से आने में २०० रुपये, क़ुली को २०० रुपये और दिल्ली तक का टिकट भी २०० रुपये। एक आश्चर्य का भाव आता है सुनने वालों में, पर यह शब्दों सत्य है। हमारे पर्यटनीय बजट का बड़ा भाग स्थानीय साधनों पर न्योछावर हो जाता है। नीरज जैसी घुमक्कड़ी के लिये इतना धन स्थानीय साधनों में व्यर्थ कर पाना सबके लिये संभव नहीं। कोई न कोई साधन तो ढूँढना ही पड़ेगा जिससे देश के विस्तार का पूरक भाग मापा जा सके। मेरी दृष्टि में वह साइकिल है।

पिछली पोस्टों में मैंने अपने एक वरिष्ठ अधिकारी के बारे में बताया था जो ट्रेन में भी अपनी मोटरसाइकिल लेकर चलते थे। मैं उन वरिष्ठ अधिकारी की तरह मोटर साइकिल से तो नहीं चल पाऊँगा, किन्तु साइकिल साथ में ले जाने का विचार सदा ही मन में रहा है। साइकिल भी बहुत बड़ी नहीं। यदि साइकिलों के बारे में तनिक शोध करें इण्टरनेट पर तो १२ किलो तक की साइकिलें आती हैं जो अपनी सीट के नीचे मोड़ कर रखी जा सकती है। किसी भी स्थान पर पहुँच कर उसे सरलता से खोला जा सकता है और स्थानीय स्थल ही नहीं वरन ६०-७० किमी के पर्यटन बिन्दु नापे जा सकते हैं।

मुझे यूरोप के वे नगर बहुत अच्छे लगते हैं, जहाँ पर साइकिल का उपयोग प्रमुखता से किया जाता है और उसे समुचित प्रोत्साहन भी मिलता है। गूगल बाबा आपको ऐसे नगरों की सूची पकड़ा देंगे। जिस प्रकार से प्रदूषण और यातायात से कण्ठ और पंथ अवरूद्ध होता है, भविष्य साइकिलों का आने वाला है। जितना संसाधन और प्रदूषण इस क़दम से बढ़ सकता है, उसे देखते हुये वहाँ के प्रशासन ने निशुल्क साइकिलों की व्यवस्था कर रखी है। भारतीय नगरों में तो निशुल्क साइकिलें बहुत दूर की सोच हैं, पर घुमक्कड़ी के लिये हल्की व उन्नत साइकिलें वरदान हैं।

जब हम रेलवे स्टेशनों से निकल कर पर्यटकीय अन्तस्थल में बढ़ चुके हैं, साइकिल, टेण्ट और आतिथ्य की विमायें प्रमुख हो जाती हैं। अगली पोस्ट पर इन तीनों पर चर्चा।

11.9.13

पर्यटन - रेल अपेक्षायें

रेलवे और पर्यटन पर कहीं भी विचार विमर्श होता है तो कई बाते हैं जो सदा ही सुनने को मिलती हैं। बहुधा बहुत अधिक सुनना पड़ता है, कभी सुझाव के रूप में, कभी उलाहना के रूप में, कभी शिकायत के रूप में, कभी उग्र तर्क के रूप में। सुनना कभी भी हानि नहीं करता है, यदि आप उसे हृदय तक न ले जायें। सुनना आपको भले ही व्यक्तिगत रूप से कचोटे पर एक संस्था को सुनने से लाभ ही होता है। जब भी मैं सुनता हूँ, एक संस्था के सदस्य के रूप में सुनता हूँ, ग्रहणीय सुझाव मस्तिष्क में वहन करता हूँ, क्रोध मन से सहन करता हूँ।

उन बातों में जो सार निकलता है, वह इस प्रकार का ही रहता है। सबसे पहली समस्या तो आरक्षण की, उसके बाद टिकट मिलने में व्यर्थ हुआ समय, सुविधाओं का अभाव, व्यवस्थाओं की कमी और संवेदनाओं का अभाव। अपेक्षाओं और प्रयासों में दूरी है, किसी तरह आवश्यकताओं तक ही प्रयास पहुँच पा रहे हैं, वह भी न्यूनतम आवश्यकताओं तक। प्रस्तुत पोस्ट में अन्य विषयों पर विस्तृत चर्चा न कर पर्यटन से संबंधित पक्ष ही उठाऊँगा। जितना संभव हो सके, चर्चा को आदर्शवादी स्थितियों से न जोड़कर व्यवहारिक ही रखूँगा।

इस बार की मुक्तकण्ठ से और त्वरित प्रशंसा होती है कि रेलवे में यात्रा करने से कभी भी जेब पर अधिक भार नहीं पड़ता है औऱ कम पैसों में एक जनसुलभ साधन दे पा रही है, भारतीय रेल। पर आरक्षित सीटों की उपलब्धता की कमी ही एकमात्र ऐसा कारक है जो बहुधा कृत्रिम माँग बढ़ाकर दलालों को अधिक धन उगाहने का अवसर दे देता है। बात सच है और अनुभव पक्ष कठिनाइयों से भरा रहता है।

वर्ष में तीन या चार ऐसे अवसर आते हैं, जब यात्रा सर्वाधिक होती है। उस समय सबको अवकाश मिलता है, बच्चों के विद्यालयों में भी तभी छुट्टी मिलती है, उसी समय सबको घर जाने की और घूमने जाने की सूझती है। यद्यपि उस समय रेलवे के सारे कोच सेवा में लगे होते हैं, फिर भी माँग बनी रहती है, बढ़ी रहती है। स्वाभाविक भी है, जब सारा देश घूमने पर उतर आयेगा तो संसाधन भी कम पड़ जायेंगे। किसी भी तन्त्र की योजना उसके अधिकतम भार के लिये नहीं बनाई जा सकती, यदि ऐसा होगा तो शेष समय संसाधन व्यर्थ पड़े रहेंगे।

इन तीन या चार अवसरों को छोड़ दिया जाये तो अधिकांश मार्गों में आरक्षण की उपलब्धता कोई समस्या नहीं है। यदि पर्यटन को वर्ष में अन्य समय के लिये भी किया जाये तो न केवल पर्यटकों को सुविधा रहेगी वरन रेलवे वर्ष में अधिक लोगों को सेवा दे पायेगी, अपनी व्यर्थ जा रही क्षमता का समुचित उपयोग कर पायेगी। जो सिद्धान्त रेलवे के लिये सच है, वही पर्यटन के अन्य अंगो के लिये भी सटीक बैठेगा। होटल हो, स्थानीय साधन हो, मनोरंजन के अंग हों, सबको ही पर्यटन का काल खंड बढ़ने से लाभ होगा।

यद्यपि जब किसी पर्यटन स्थल पर भीड़ होती है तो मन को वहाँ आने की और अपने निर्णय को सही ठहराने की संतुष्टि होती है, पर अधिक भीड़ में पर्यटन स्थल अपना आनन्द छिपा लेता है, पूर्ण प्रकट नहीं कर पाता है। यदि समुद्र तट में अधिक लोग हैं तो जहाँ प्रारम्भ में अच्छा लगेगा, वहीं बाद में एकान्त में समुद्र की लहरों को न देख पाने का दुख भी रह जायेगा। कई व्यवसायी परिवारों को जानता हूँ, जो अपने पर्यटन की योजना ऐसे समय में ही बनाते हैं जब भीड़ न हो। रेलवे में आरक्षण मिलता है, होटल सस्ते में मिल जाते हैं, खेल खिलाने वाले राह तकते रहते हैं और पूरे परिवार को पर्यटन का पूर्ण आनन्द भी आता है। नीरज भी ऐसे ही समय में पर्यटन पर निकलते है, अभी वह अकेले हैं, पर मुझे पूरा विश्वास है कि परिवार के साथ होने पर भी वह इस सिद्धान्त को नहीं छोड़ेंगे।

अधिक नहीं, बस विद्यालय और कार्यालयों की ओर से पर्यटन के महत्व और इस सिद्धान्त को समझा जाये। ५ दिन की छुट्टी और दो सप्ताहान्त मिला कर ९ दिन का पर्यटन अवकाश का अवसर मिलना चाहिये, जिससे लोग सपरिवार पर्यटन पर जा सकें, बिना किसी समस्या के, वर्ष में किसी भी समय। विद्यालयों की ओर से सामूहिक यात्रा भी वर्ष के कम व्यस्त माहों में करनी चाहिये, हो सके तो हर कक्षा के लिये अलग माह में। देश जानने के लिये और ज्ञान बढ़ाने की दृष्टि से हर विद्यालय के लिये ९ दिवसीय पर्यटन अनिवार्य हो, और न केवल अनिवार्य हो, वरन उसका शैक्षणिक विभाग व मन्त्रालय उसमें अपना अनुदान दें, कम से कम ८० प्रतिशत। इससे विद्यार्थियों को एक वर्ष में पर्यटन के दो अवसर मिलेंगे, एक बार मित्रों के साथ, एक बार परिवार के साथ। उस पर्यटनीय अनुभव में उन्हें आनन्द भी आयेगा और साथ ही साथ रेलवे की आय में वृद्धि भी होगी।

तनिक सोचिये, यदि हम व्यस्त समय की विवशताओं को मात देकर किसी अन्य समय में घूमने की योजना बना सकें तो रेलवे के पास एक सीट क्या, पूरे के पूरे कोच की उपलब्धता रहेगी। तनिक सोचिये, तब कितना आनन्द आयेगा, जब सारे मित्र एक पूरे कोच में आनन्द मनाते, गीत गाते, साथ में खेल खेलते पर्यटन का प्रारम्भ और अन्त करेंगे। यह अनुभव पर्यटन को एक अविस्मरणीय स्थिति पर ले जायेगा। व्यस्त समय की समस्यायें, अन्य समय का आनन्द भी बन सकती हैं।

रेलवे यात्रा के समय अच्छा व स्वास्थ्यकारी भोजन एक बड़ा प्रश्न रहता है और बहुधा रुष्ट चर्चाओं का केन्द्र भी। लम्बी यात्राओं में यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि चार या पाँच बार भोजन आदि करना होता है। कुछ के लिये भोजन अधिक चटपटा, कुछ के लिये अधिक फीका, कुछ के लिये स्वाद रहित, कुछ के लिये अपौष्टिक, कुछ के लिये शुचिता और स्वच्छता से न बना। मुझे कम मसाले का सादा भोजन अच्छा लगता है, मिर्च तो जैसे भय उत्पन्न कर देती हो। लगभग हर बार ही भोजन की पूरी थाली में चावल और दही में संतोष करना पड़ जाता है क्योंकि पैन्ट्रीकारों के रसोइयों को बिना चटपटा खाना बनाये अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने का मार्ग नहीं मिलता है। अपने सहयात्रियों को भी देखता हूँ, यद्यपि छुट्टी के भाव में सभी रहते हैं पर उल्टा सीधा खाकर कोई भी अपना स्वास्थ्य बिगाड़ना नहीं चाहता है। यात्रा में एक ही स्थान पर तैयार हुआ खाना सबको अच्छा लगेगा, इस बात की प्रायिकता बहुत ही कम है। स्वाद और स्वास्थ्य के मानक में हर एक की भोजनीय अभिरुचि भिन्न है।

जिस भोजन में आप स्वाद या स्वास्थ्य ढूंढ़ते हैं, उसी भोजन में व्यवसायी अपना आर्थिक लाभ भी ढूँढता है। यद्यपि भोजन की मात्रा आदि सब निर्धारित होता है, पर अधिक आर्थिक लाभ निचोड़ लेने की मानसिकता गुणवत्ता से समझौता करवा देती है। वहाँ भोजन बाँटने का अधिकार एक ठेकेदार के ही पास है, विवशता का यथा संभव आर्थिक लाभ लेने की प्रवृत्ति इतनी सरलता से जाने वाली नहीं। शिकायतों के निस्तारण में भोजन के स्वाद, स्वास्थ्य और गुणवत्ता संबंधी मानक असिद्ध ही रह जाते हैं।

अधिकांश यात्री कम से कम एक समय का भोजन और एक समय का नाश्ता अपने साथ लेकर चलते हैं। घर का खाना ट्रेन यात्रा में अच्छा लगता है। मैँ भी यही करता हूँ। रेलयात्रा में ही क्यों वरन हवाईयात्रा में लोग अपने घर से लाये पराँठे और अचार खाते हैं। देश के हर क्षेत्र में यात्रा करने वालों के पास अपने अपने व्यंजन हैं जो दो तीन दिन से अधिक संरक्षित किये जा सकते हैं। बिहार में लिट्टी चोखा, उत्तर भारत में सत्तू, राजस्थान और गुजरात में तो दसियों ऐसे व्यंजन हैं, जो स्वादिष्ट हैं, पौष्टिक हैं और संरक्षित भी किये जा सकते हैं। उन्हें यात्रा में ले जाने से बाहर के खाने पर निर्भरता बहुत कम रहेगी। इसके अतिरिक्त रेलवे को भी यह चाहिये कि ट्रेनों में प्रस्तावित भोजन की सूची में उन ही व्यंजनों को ही रखा जाये, जो न केवल बनाने में सरल हों वरन स्वाद और स्वास्थ्य की दृष्टि से उत्तम हों। यही नहीं, मोबाइल या इण्टरनेट आधारित साधन भी विकसित किये जा सकते हैं, जिससे बाहर के भी भोजन बनाने वालों को किसी ट्रेन में भोजन आपूर्ति की सुविधा मिल सके। इन उपायों से पर्यटन का अनुभव पक्ष और भी सुखद व रुचिकर होगा।

नीरज अपने साथ कुछ बिस्कुट आदि सदा लेकर चलते हैं, यदि कहीं भोजन न मिले तो उस पर आश्रित रह लिया जाये। व्यवसायियों के लिये भी पर्यटन-व्यंजन एक संभावनाओं का क्षेत्र है। एक पूरी की पूरी फ़ूड चेन बनायी जा सकती है, इसके ऊपर। आप चिन्तन में जुटिये, अगली पोस्ट में स्टेशनों पर उन सुविधाओं की चर्चा जो पर्यटन के स्थानीय पक्षों को सुदृढ़ करने में सक्षम हैं।

31.8.13

पर्यटन - एक शैली

जब गांधीजी दक्षिण अफ्रीका में अपना प्रयोग सफल करने के बाद भारत आये, उनके राजनैतिक गुरु गोपालकृष्ण गोखले ने उन्हें पूरे देश का भ्रमण करने की सलाह दी। गाँधीजी ने सारे देश में भ्रमण किया, भारतीय जनमानस को समझा और उनका नेतृत्व किया। यद्यपि इस भ्रमण को विशुद्ध पर्यटन की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, फिर भी अनुभव के आधार पर गाँधीजी का भ्रमण पर्यटन की तुलना में कहीं गाढ़ा रहा होगा। आधिकारिक आँकड़े तो उपलब्ध नहीं हैं पर अधिकाधिक यात्रा रेलवे के तृतीय श्रेणी के डब्बे में की होगी गांधीजी ने। ठहरने की व्यवस्था और स्थानीय यातायात के साधन क्या रहे होंगे, ठीक ठीक ज्ञात नहीं, पर अंग्रेज़ों का भव्य आतिथ्य तो निश्चय ही उन्हें नहीं मिला होगा।

अब हम तनिक अपना पिछला पर्यटन अनुभव याद करें, ठहरने के लिये एक अच्छा होटल, घूमने के लिये कोई कार, मोबाइल पर उतारे गये ढेरों चित्र, बताये हुये हर स्थान को छू आने की व्यग्रता और अन्त में अपने परिवार को घुमा लाने की उपलब्धि का बोध। प्रारम्भ में तो सबकी अवस्था यही रहती है, पर जब पर्यटन का अनुभव सतही होने लगता है तब लगता है कि पर्यटक स्थल में थोड़ा और गहरे उतरा जाये। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य, स्थानीय सामाजिक तन्त्र, लोक संस्कृति, परिपाटियाँ, खेती, पशुधन आदि विशिष्ट पक्ष भी जानने का मन करने लगता है। पर्यटन की यही विमा गाँधीजी के भारत भ्रमण का प्रमुख पक्ष रही होगी। पर्यटन स्थल के दृश्यों के सौन्दर्य से तो प्रकृति का श्रृंगार पक्ष ही व्यक्त होता है, प्रकृति का व्यवहार पक्ष जानने के लिये अधिक अन्दर तक जाना होता है।

निश्चय ही युवाओं को अपना देश देखने का पूरा अवसर मिलना चाहिये। जिस देश में कार्य करना है, जिस देश के लिये कार्य करना है, उसके जनमानस और संवेदना को समझना भी आवश्यक है। गाँधीजी की तरह भले ही तत्कालीन राजनैतिक ध्येय न हों, पर सामाजिक और मानसिक संवेदनाओं का माध्यम तो बन ही सकता है, पर्यटन प्रेरित भारत भ्रमण।

बहुतों को यह भ्रम हो सकता है कि देश में घूमने के लिये है ही क्या, यदि पर्यटन का आनन्द उठाना हो तो विदेश घूम कर आना चाहिये। निश्चय ही विदेशों में पर्यटन को प्रोत्साहन मिलता है, आधारभूत व्यवस्थायें अच्छी हैं, दृश्य भारत से भिन्न हैं और मनोहारी लगते हैं, पर भौगोलिक विविधता, ऐतिहासिक उत्कर्ष और प्राकृतिक सौन्दर्य के जो रत्न भारत में छिपे हैं, उनका समुचित मूल्यांकन अभी तक हुआ ही नहीं। यदि उसकी एक झलक पानी हो तो नीरज के ब्लॉग पर जाकर उनकी यात्राओं में उतारे गये चित्रों को देखिये, मेरा विश्वास है कि विदेश में घूमने जाने के पहले आप अपने देश के उन सारे स्थानों को देखना चाहेंगे जो समुचित प्रचार प्रसार से वंचित हैं अब तक।

ज्ञानार्जन और भावार्जन के अतिरिक्त पर्यटन मनोरंजन का सशक्त माध्यम है। मन नयापन चाहता है, एक ही दिनचर्या, एक ही जीवनचर्या, वही घर, वही भोजन, कालान्तर में मन इन सबसे ऊबने लगता है। लगता है कुछ दिन बाहर घूम आने से एकरसता बाधित होगी और मन को आनन्द आयेगा। नौकरी और व्यवसाय में रहने वालों को तो कार्य में व्यस्त रहने के तब भी कई साधन मिल जाते हैं, उन गृहणियों की कल्पना कीजिये जो बिना स्थान बदले चक्रवत कार्यनिरत रहती हैं। मुझे पहले बड़ा आश्चर्य होता था कि एक स्थान घूम कर आते ही श्रीमतीजी दूसरे स्थान की योजना बनाने लगती हैं, उन्हें बच्चों की छुट्टियाँ और सारे वे सोमवार या शुक्रवार की जानकारी रहती है जो सप्ताहान्त को ३-४ दिन का बनाने में समर्थ हैं। इसके अतिरिक्त जो भी स्थान एक दिन में निपटाये जा सकते हैं, उसकी सूची अलग से तैयार है उनके पास। अब भले ही मैं उनको उनकी आशानुरूप न घुमा पाऊँ, पर निश्चय ही वह पर्यटनीय सलाहकार के रूप में अपना भविष्य बना सकती हैं, औरों के यात्रा कार्यक्रम बना सकती हैं।

इसी तरह की एकत्र ढेरों सूचनायें नीरज के प्रति मेरी उत्सुकता का तीसरा कारण है। न केवल यात्रा वरन उसके सभी पक्षों का विस्तृत विवरण अनुभव से प्राप्त जानकारी का उपयोगी स्रोत हो सकता है। यह घुमक्कड़ी के आगामी उत्सुकजनों के लिये अत्यन्त लाभ का पक्ष हो सकता है। जब से ब्लॉग में घुमक्कड़ी संबंधित विषय बढ़े हैं, पर्यटन स्थलों के बारे में पर्याप्त सूचनायें मिल रही हैं। यद्यपि पर्यटन पर लिखी गयी पुस्तकें बहुत समय से एक स्रोत रही हैं, पर उनमें प्राप्त एक अनुभव विशेष सबके लिये सहायक नहीं हो सकता है। कई स्रोतों से प्राप्त जानकारी के आधार पर पर्यटन के पहले ही एक ढाँचा तैयार किया दा सकता है। पिछले ४-५ पर्यटन स्थानों पर जाने के पहले, उससे संबंधित ब्लॉगों ने निर्णय लेने में बहुत सहायता की है।

नीरज जाट के अनुभव और उनका वृत्तान्त घुमक्कड़ी से जुड़े हुये ब्लॉगों में एक विशिष्ट स्थान रखते हैं। पहला तो उनके लिखने की शैली भी ठीक वैसी ही है, जैसी उनके घूमने की शैली, सरल, सहज, न्यूनतम और पूर्ण। सरल इसलिये कि कार्यक्रमों में जटिलता नहीं रहती और वे बड़ी सरलता से परिवर्धित किये जा सकते हैं। सहज इसलिये कि उनमें तड़क भड़क नहीं रहती और पर्यटन के परिवेश में घुल जाने की प्रक्रिया में कोई रुकावट नहीं आती है। न्यूनतम इसलिये क्योंकि उनकी घुमक्कड़ी शैली साधनों पर कम वरन अनुभवों पर अधिक आश्रित है। पूर्ण इसलिये क्योंकि इसी शैली में घूमकर पर्यटन के मर्म को छुआ जा सकता है।

पूछने पर कि कितना सामान लेकर चलते हैं, एक छोटा सा बैगपैक जो पीछे टँगा था। पहने हुये के अतिरिक्त दो जोड़ी कपड़े। यदि नित्य नहाने की बाध्यता न रखी जाये तो ट्रेन में ही तैयार हुआ जा सकता है। दो या तीन दिन में जब भी रात्रि विश्राम के लिये रिटायरिंग रूम का अवसर मिले, तो नहाकर और अपने कपड़े धोकर आगे बढ़ा जा सकता है। वैसे देखा जाये तो, ट्रेनयात्रा में यदि सोने को मिल जाये तो विश्राम वैसे ही पूरा हो जाता है। रेलवे की सुविधा का उपयोग कर घुमक्कड़ी को यथासम्भव सरल और प्रभावशाली बनाया जा सकता है। नीरज के यात्रा वृत्तान्तों में इस क्रियाविधि की प्रचुरता में उपस्थिति दिखायी पड़ती है।

अब बात रह जाती है, उन स्थानों को देखने की, जिनके लिये यातायात के स्थानीय साधनों का उपयोग करना होता है। निकट के दर्शनीय स्थल स्थानीय साधनों से देखे जा सकते हैं, पर रेलवे स्टेशन से अधिक दूरी पर स्थित पर्यटन स्थलों के लिये बस आदि का उपयोग आवश्यक हो जाता है। मुझे एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया था कि प्रशिक्षण के समय वह अपनी मोटरसाइकिल सदा ही साथ लेकर चलते थे। जिस स्टेशन से ट्रेन में चढ़े वहाँ चढ़ा ली और गञ्तव्य में उतार ली। इस प्रकार प्रशिक्षण के समय उनका सारा पर्यटन अपनी मोटरसाइकिल में हुआ, स्थानीय साधनों पर आश्रित हुये बिना। यहाँ तक कि उन्हें ५०-६० किमी की परिधि में स्थित पर्यटन स्थलों को घूमने के लिये भी किसी का मुँह नहीं ताकना पड़ा। उनके अनुसार, पर्यटन का यह अनुभव अविस्मरणीय था और इस प्रकार उन्होंने बिना किसी विवशता में बँधे पर्यटन का आनन्द उठाया।

हमारे वरिष्ठ अधिकारी रेलवे से ही थे अतः मोटरसाइकिल लादने और उतारने में उन्हें कभी कोई कठिनाई या देरी नहीं हुयी। साधारण पर्यटक के लिये यह संभव नहीं है। यदि किसी तरह एक साइकिल को इस तरह खोलकर बाँधा जा सके जिससे वह सीट के नीचे आ जाये और प्लेटफॉर्म पर रोलर की तरह खींची जा सके तो स्थानीय साधनों की आश्रयता कम की जी सकती है। बाहर के देशों में कई बार लोगों को अपनी साइकिल मोड़कर ट्रेनों में ले जाते हुये देखा है, पर अपने देश में उस तरह की शैली विकसित नहीं हुयी है। नीरज ने लेह यात्रा के समय एक साइकिल उपयोग की है। अब यह देखना है कि अन्य स्थानों पर भी स्थानीय साधनों पर परवशता कम करने के लिये, वह साइकिल का उपयोग कैसे करेंगे?

रेलवे में होने के कारण पर्यटन के विभिन्न पक्षों को और पर्यटकों को निकट से देखा है। देश के पूर्व, उत्तर और दक्षिण में १७ वर्षों तक पदस्थ रहने के कारण देश की पर्यटन सम्पदा का अनुमान भी है। नीरज जाट के पर्यटनीय अनुभव ने पुनः एक बार विचार करने को बाध्य किया कि किस प्रकार रेलवे, पर्यटन और ब्लॉग का पारस्परिक परिवर्धन में समुचित उपयोग किया जा सकता है। रेलवे की अधिकाधिक आय, पर्यटन के मितव्ययी अनुभवों और साहित्य सृजन को किस प्रकार समन्वयित किया जा सकता है, यह एक विचारणीय और करणीय विषय बन सकता है।

आशा है पर्यटन की नयी और उन्मुक्त शैली विकसित करने नीरज जाट के अनुभव अत्यन्त सहायक होंगे। इस शैली की अन्य शैलियों से तुलना और अन्य संबद्ध पक्षों की चर्चा आगामी पोस्टों में।

28.8.13

पर्यटन, रेल और नीरज जाट

नीरज जाट का नाम लेते ही, उनके द्वारा लिखे गये न जाने कितने यात्रा वृत्तान्त मन में कौंध जाते हैं। एक छवि जो किसी साइकिल में लेह की ऊँचाइयों में सड़कों की लम्बाई नाप रहा है। एक छवि जो ग्लेशियरों को उस समय देखने में अधिक उत्सुक है, जब वे जम कर कड़क हो चुके हैं। एक छवि जो रेलवे स्टेशनों और ट्रेनों में अपने घर से अधिक समय बिताता है। एक छवि जो छुट्टी मिलते ही घूमने की योजना में जुट जाता है। एक छवि जो जीवट है, जो जीवन्त है, जो जीना जानती है।

मेरे मन में नीरज के प्रति उत्सुकता चार स्तरों पर है। रेलवे, पर्यटन, ब्लॉगिंग और जीवन शैली। यदि इन चारों स्तरों को संक्षिप्त में कहूँ तो वह इस प्रकार होगा। देश के अन्दर पर्यटन के लिये रेलवे से अधिक मितव्ययी और द्रुतगामी साधन नहीं है। किन्तु रेलवे में एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँच जाना ही पर्यटन नहीं है। वहाँ पर रहने की व्यवस्था, पर्यटन स्थलों पर पहुँचने के स्थानीय साधन, भोजन आदि की व्यवस्था, दर्शन योग्य बातें, प्राथमिकतायें और एक पूर्ण पर्यटन अनुभव, इन समस्त बातों को मिला कर एक पर्यटक और एक पर्यटन स्थल का निर्माण होता है।

बहुधा ये सारे सूत्र पूर्व निर्धारित नहीं हो पाते हैं, अनिश्चिततायें अधिक रहती हैं, अधिकाधिक सुनिश्चित करने में अधिक धन व्यय होने संभावना रहती है, बहुधा तथ्यों का अभाव रहता है। पर्यटन एक व्यवसाय है, संभव है कि सामने वाला आपसे ही सारा लाभ लेने की मानसिकता में हो। रेलवे में, होटल में स्थान की उपलब्धता, स्थानीय साधनों की जानकारी, अधिक स्थानों को देखने का क्रम, ऐसी न जाने कितनी अनिश्चितताओं से भरा होता है हमारा पर्यटन।

एक पर्यटक के रूप में किस तरह नीरज उन अनिश्चितताओं को जीते हैं और किस तरह एक ब्लॉगर के रूप में उन्हें व्यक्त करते हैं, यह एक रोचक विषय है। साथ ही, अपनी व्यस्त घुमक्कड़ी का अपनी जीवन शैली से कैसे सामञ्जस्य बिठा पाते हैं, यह भी उतना ही रोचक विषय है।

आखिर मिल ही गये
उत्सुकता यद्यपि पिछले २ वर्षों से थी और पिछले वर्ष मिलने का निश्चय भी किया था, सेलम में, पर मेरी व्यस्तता उस भेंट को निगल गयी। इस वर्ष नीरज के कर्नाटक भ्रमण में निकटतम बिन्दु और अवकाश आदि की स्थिति देखने के बाद शिमोगा स्थित जोग फॉल में मिलने का योग बन गया। हम सुबह १० बजे ही सपरिवार जोग फ़ॉल में पहुँच गये, सोचा था बैठ कर बातें करेंगे, भोजन करेंगे। फ़ोन करने पर पता चला कि नीरजजी की एक ट्रेन छूट गयी है अतः दोपहर बाद ही आना होगा। हम लोग अपने कार्यक्रम में बढ़ गये और सायं ५ मिनट के लिये ही शिमोगा में मिल पाये।

हम लोग जब भी किसी यात्रा के लिये निकलते हैं तो उसी समय निकलते हैं जब घर में सबकी छुट्टियाँ चल रही हों। यही कारण रहता है कि जब लोग घूमने जाते हैं तो उस समय हर स्थान पर भीड़ बहुत रहती है, हर किसी साधन और संसाधन के लिये। ऐसे समय में व्यवस्थायें जुटा पाना किसी प्रतियोगी परीक्षा में विजयी होने जैसा होता है। एक एक व्यवस्था के लिये अत्यधिक श्रम करना पड़ता है और बहुधा बहुत धन व्यय हो जाता है। इतने बँधे हुये कार्यक्रम में घूमना कम, स्थानों को छूकर और उपस्थिति लगा आने जैसी स्थिति हो जाती है।

अतिव्यवस्था में पर्यटन का स्वभाव घुटने लगता है, पर्यटन एक उत्पाद सा हो जाता है और स्थान देख आना उस उत्पाद का मूल्य। इसमें पर्यटन का आनन्द कहीं खिसक लेता है। यही नहीं हम जो सोच कर जाते हैं़ पर्यटन स्थल उससे कहीं भिन्न मिलता है। तब हम धन द्वारा साधे अपने सधे कार्यक्रम में बँधे अधिक हिल डुल नहीं पाते है और औसत से नीचे का अनुभव लेकर चले आते हैं। मेरा व्यक्तिगत अनुभव यह कहता है कि जब भी पर्यटन को बाँधने का प्रयास किया है, स्वतन्त्र हो पर्यटन का आनन्द नहीं उठा पाये।

नीरज की पर्यटन तकनीक इन सब बन्धनों को तोड़ती सी दिखती है। उनकी घुमक्कड़ी में एक सहजता है, एक जीवटता है, एक खुलापन है, एक आनन्द है। अभी कुछ दिन पहले ही वह एक लाख किलोमीटर की यात्रा पूरी कर चुके हैं। वर्तमान की कुछ यात्रा योजनाओं को देख रहा था, साधारण श्रेणी में यात्रा की बहुलता थी। उसके अतिरिक्त स्लीपर क्लास की यात्रायें भी थीं। मैं गणना कर रहा था कि यदि एक लाख किलोमीटर तीन चौथाई साधारण श्रेणी व एक चौथाई स्लीपर क्लास में की जाये तो लगभग १२ हज़ार रुपये लगेंगे। एसी ३ में वही व्यय ६० हजार रुपये हो जायेगा। यदि यही दूरी अपने वाहन से तय की जाये तो ५ लाख रुपये लगेंगे। इस प्रकार देखा जाये तो यदि रेलवे में प्रमुखता से चला जाये, साधारण श्रेणी में देश देखने का उत्साह हो, तनिक सहनशीलता और तनिक जीवटता विकसित कर ली जाये और नीरज की विधि अपनायी जाये तो पर्यटन में होने वाला व्यय न्यूनतम हो सकता है।

नीरज से यह पूछने पर कि दिन में तो साधारण श्रेणी में काम चल जाता है पर रात्रि में यदि साधारण श्रेणी में चले और नींद नहीं हो पायी तो पर्यटन का आनन्द धुल जायेगा? नीरज ने बताया कि दिन के समय ही साधारण श्रेणी में चलते हैं। रात्रि के समय यदि आरक्षित स्थान मिल जाये तो नींद पूरी कर लेते हैं, नहीं तो किसी रिटायरिंग रूम में रुक कर नींद पूरी कर लेते हैं। नींद पूरी करना सर्वाधिक महत्व का कार्य है, अच्छे मन के लिये, ऊर्जा पूर्ण तन के लिये। यही नहीं, यदि एक रात्रि यात्रा में बीते तो एक दिन का होटल का खर्च भी बच जाता है। एक लाख किलोमीटर की यात्रा में लगभग ७० यात्रायें रात्रि में की होंगी, लगभग ३५ हज़ार रुपये होटल का व्यय बचाया होगा। यद्यपि नीरज अपने खर्चे की एक एक पाई का हिसाब रखते हैं, पर मेरे अनुमान यथार्थ के निकट ही होंगे।

विशुद्ध आर्थिक दृष्टिकोण से देखें तो रेल़वे के माध्यम से पर्यटन को कोई प्रतिद्वन्द्वी नहीं है। जितनी बार भी नीरज का ब्लॉग पढ़ता हूँ, उनके अनुभव जानता हूँ, उतनी बार मेरा यह विश्वास और भी दृढ़ होता जाता है। पर्यटन के और भी कई पक्ष हैं और उनके बारे में मेरी कई अवधारणायें भी हैं। रेलवे, पर्यटन और स्वयं के अनुभवों के आधार पर नीरज की घुमक्कड़ी तकनीक पर विमर्श चलता रहेगा, अगली पोस्ट में भी।

29.12.12

यार्ड में लेखन

वरिष्ठ अधिकारी का निरीक्षण है, यार्ड में नयी पिट लाइनों का निर्माण कार्य चल रहा है, पिट लाइनों का उपयोग यात्री ट्रेनों के नियमित रख रखाव के लिये किया जाता है। बंगलौर के लिये बहुत अधिक यात्री गाड़ियों की माँग है, देश के हर कोने से। दबाव भी है और सहायता भी है, अधिकतम माँग को स्वीकार करने के लिये। इसी क्रम में नये प्लेटफ़ार्म, नयी पिट लाइन, नये कोच, नये इंजिन आदि की आवश्यकता बनी रहती है। योजना और क्रियान्वयन पर नियमित दृष्टि बनाये रखने के लिये, कार्य की प्रगति बीच बीच में देखनी होती है। यह निरीक्षण उस वृहद प्रक्रिया का अंग है जो अंततः नयी यात्री गाड़ी चलाने के लिये वर्षों पहले से चल रही है।

वरिष्ठ अधिकारी दूसरे मार्ग से आ रहे हैं, हमें वहाँ पहले पहुँचना था। बंगलौर की यातायात की अनिश्चितता को देखकर हम आधे घंटे पहले निकले, भाग्य ने साथ दिया और बिना व्यवधान के लगभग ४० मिनट पहले पहुँच गये। वरिष्ठ अधिकारी पर यातायात उतना प्रसन्न न रहा और अभी सूचना मिली है कि उन्हें नियत समय से लगभग ४० मिनट की देर हो जायेगी। हमारे हाथ में ८० मिनट का समय है, यार्ड का विस्तृत क्षेत्र है, २० मिनट का प्राथमिक निरीक्षण कर लेने के बाद पूरा एक घंटा हाथ में है। पेड़ के नीचे वाहन खड़ा कर, गाड़ी की अगली सीट पर बैठे हुये, लेखन चल रहा है। ऊपर देखने से हरियाली दिख रही है, नीचे सूर्य के प्रकाश में साँप सी लहराती पटरियाँ, दूर से आती इंजन की आवाज़ और लगभग २०० मीटर दूर निर्माण कार्य की चहल पहल। दृश्य का विस्तार और समय का साथ होना, दोनों ही लिखने को विवश कर रहे हैं।

रेल यार्ड का नाम सुनते ही एक चित्र उभर आता है, लम्बी लम्बी रेल लाइनें, बड़ी बड़ी रेलगाड़ियाँ, छुक छुक धँुआ छोड़ते इंजन, डिब्बों को एक ट्रेन से काटकर दूसरे में लगाते हुये रेल कर्मचारी। मुझे लगभग १६ वर्ष हो गये है रेल सेवा में पर आज भी यार्ड उतना ही अभिभूत करते हैं जितना बचपन में करते थे। आज भी यार्ड में जाकर घंटों बीत जाते हैं और लौटकर थकान जैसी कोई चीज़ नहीं लगती है, ऐसा लगता है कि किसी मित्र के घर से होकर आ रहे हैं। यार्ड को यदि सरल भाषा में समझा जाये तो, यह रेलगाड़ियों का घर है, जहाँ पर वे विश्राम करती हैं, उनका रख रखाव होता है और जहाँ उन्हें आगे की लम्बी यात्राओं के लिये निकलना होता है। यहाँ गाड़ी की सुरक्षा, संरक्षा आदि से जुड़े हर पक्ष पर ध्यान दिया जाता है।

यार्ड बड़े होते हैं, सामान्यतः एक किमी से लेकर पाँच किमी तक। परिचालन में कार्य करते हुये ऐसे न जाने कितने यार्डों में कार्य करने का अवसर मिला है। जिस प्रकार घरों में कई कमरे होते हैं, उसी तरह यार्डों में कार्यानुसार कई उपयार्ड। बड़े यार्ड का हर उपयार्ड एक किमी लम्बा होता है। एक में गाड़ियों का स्वागत होता है, दूसरे में उन्हें विभक्त किया जाता है, तीसरे में उनका रख रखाव होता है, चौथे से उन्हें गन्तव्य के लिये भेजा जाता है। वह अनुभव अब बहुत काम आता है, किसी भी यार्ड का चित्र देखकर ही यह पता लग जाता है कि इस यार्ड में क्या समस्या आती होगी, यहाँ पर किन कार्यों की संभावनायें हैं। भविष्य में विस्तार की योजनाओं में इनका विशेष स्थान है। हर ट्रेन का, चाहे वह यात्रीगाड़ी हो या मालगाड़ी, सबका एक नियत यार्ड होता है, उसका एक घर है।

कार्यक्षेत्र से संबंधित जो भी योगदान रहा हो यार्डों का, व्यक्तिगत जीवन में यार्डों के तीन स्पष्ट लाभ रहे हैं। पहला तो इन्हीं बड़े यार्डों की सड़कों पर वाहन चलाना सीख पाया। यार्ड के एक ओर से दूसरे ओर जाने में चार पाँच किमी की यात्रा हो जाती है। सड़कें सपाट, बिना किसी यातायात के, उन पर वाहन चलाना स्वयं में अनुभव होता था। प्रारम्भ में तो यार्ड आते ही चालक महोदय को अपनी सीट पर बिठाकर वाहन चलाना सीखा, बाद में जब आत्मविश्वास बढ़ गया तो कई बार रात्रि में दुर्घटना होने पर स्वयं ही वाहन लेकर निकल गया। यद्यपि वाहन चलाना अच्छे से आता है पर बंगलौर में यातायात की अल्पगति और भीड़ को देखकर कभी इच्छा ही नहीं होती है। आज एक दूसरे यार्ड में बैठा लिख रहा हूँ पर सामने फैली लम्बी सड़क देखकर वो दिन याद आ रहे हैं जब इन पर निर्बाध वाहन दौड़ाया करते थे।

दूसरा लाभ स्वास्थ्य से संबंधित है। सेवा के प्रारम्भिक वर्षों में ही एक आत्मीय वरिष्ठ ने सलाह दी थी कि जब भी किसी यार्ड में जाओ तो एक छोर से दूसरे छोर तक पैदल चल कर ही निरीक्षण करो, उससे जो लाभ मिलता है वह दूर से समझने या इंजन में चलकर जाने में नहीं है। काग़ज़ पर यार्ड समझने का कार्य भी पूरे यार्ड की पैदल यात्रा करने के बाद ही करना चाहिये। पहले तो यह सलाह बड़ी श्रमसाध्य लगी, पर धीरे धीरे लाभ स्पष्ट होने लगे। कहीं कोई समस्या आने पर घटनास्थल पर पहुँचने के पहले ही फ़ोन से समुचित निर्देश दे सकने की क्षमता विकसित होने लगी। धीरे धीरे हर स्थान पर यही क्रम बन गया और योजना संबंधी कोई भी निर्णय लेने के लिये यार्डभ्रमण एक आवश्यक अंग बन गया। इतना पैदल चलने से स्वास्थ्य अच्छा रहना स्वाभाविक ही है। आज भी वरिष्ठ अधिकारी के आने के बाद दो किमी का भ्रमण तो निश्चित है। घर जाकर तब मिठाई आदि खाने में कोई अपराधबोध नहीं होगा। हर बार निरीक्षण में जाने के बाद एक अच्छा और भरपेट भोजन सुनिश्चित हो जाता है, स्वास्थ्य बना रहता है, सो अलग।

तीसरा लाभ है, लेखन। यार्ड का क्षेत्रफल बहुत अधिक होता है, जितना विस्तृत उतना ही शान्त। बीच बीच में ढेरों पेड़ और हरियाली। जब भी कार्य से कुछ समय मिलता है, थकान से कुछ समय निकलता है, ऐसा वातावरण बहुत कुछ सोचने और लिखने को प्रेरित करता है। विषय बहुत सामने आ जाते हैं, शान्ति और समय विचारों के संवाहक बन जाते हैं, शब्द उतरने लगते हैं। उड़ीसा में एक स्थान याद आता है, संभवतः गुआ नाम था। वहाँ के जो यार्ड मास्टर थे, वह उड़िया के बड़े लेखक थे। जंगल और लौह अयस्क की खदानों के बीच उन्हें निश्चय ही एक उपयुक्त वातावरण मिलता होगा, उस समय, जब एक ट्रेन जा चुकी हो, दूसरे की प्रतीक्षा हो, विचार रुक न रहे हों, वातावरण के अंग आपको विवश कर रहे हों, कुछ कह जाने को, कुछ बह जाने को।

सूचना आयी है कि लगभग १५ मिनट में वरिष्ठ अधिकारी पहुँच जायेंगे। बहते विचारों को अब सिमटना होगा, आगे बढ़ने की तैयारी करनी होगी। थोड़ी दूर से इंजन की बहुत भारी आवाज़ आती है, गम्भीर आवाज़ आती है। एक अधिक शक्ति का इंजन आया है, लौह अयस्क की एक भारी ट्रेन सेलम स्टील प्लांट जाने के लिये तैयार खड़ी है। लगभग आधे घंटे में वह ट्रेन अपने गन्तव्य की ओर बढ़ जायेगी, लौह पिघलेगा, कुछ सार्थक आकार निकलेगा, विकास का एक सहारा और बनेगा। हमारा लेखन भी शब्दों के रूप में बह कर पोस्ट का आकार ले रहा है, सृजन का एक और सोपान लग जायेगा। पिट लाइन के निरीक्षण के बाद कुछ सप्ताह में यहाँ किसी नई ट्रेन का रख रखाव प्रारम्भ हो जायेगा। न जाने कहाँ के लिये, जबलपुर, जयपुर, गोवा, गुवाहाटी, दिल्ली, कोच्चिवल्ली या कोयम्बटूर के लिये। ज्ञात नहीं, पर एक और स्थान बंगलौर से जुड़ जायेगा। संभवतः आप में से किसी को बंगलौर तक बैठा कर लाने के लिये। कौन जाने किससे मिलने के बीज आज के निरीक्षण में छिपे हों?

दूर से सायरन की क्षीण आवाज़ सुनायी पड़ती है, सुरक्षाबल अपनी व्यवस्था में लग जाते हैं। निरीक्षण से संबंधित संभावित विषय मस्तिष्क में अपना स्थान ढूँढ़ने लगते हैं। एक साथी अधिकारी का फ़ोन आता है, हाँ आपकी ही प्रतीक्षा में हैं, बस अभी आये हैं। अब लेखन समाप्त, निरीक्षण प्रारम्भ।

16.5.12

मेरे फैन भी मुझसे कोई नहीं छीन सकता है

लगभग ४ वर्ष पहले का समय, ग्वालियर स्टेशन परिसर में, नयी ट्रेन के उद्घाटन के अवसर पर जनप्रतिनिधियों के अभिभाषण चल रहे थे, एक मालगाड़ी १०० किमी प्रति घंटे की गति से पास की लाइन से धड़धड़ाती हुयी निकली, लोहे की गड़गड़ाहट के स्वर ने ३० सेकेण्ड के लिये सबको निशब्द कर दिया। बहुतों के लिये तो यह ३० सेकेण्ड का व्यवधान ही था और जब वातावरण उत्सवीय हो तो कोई भी व्यवधान अखरता भी है। तभी परिचालन के एक वरिष्ठ अधिकारी कनखियों से हमारी ओर देखते हैं, हल्के से मुस्कराते हैं। संवाद स्पष्ट था, उनके लिये यह ३० सेकेण्ड आनन्द से भरे थे, हमें भी वही रस मिला था। जो सुख ३००० टन की मालगाड़ी को गतिमान दौड़ते देखने में था, भरे डब्बों और पटरियों के खनक सुनने में था, उस ३० सेकेण्ड के सुख के आगे शब्दों के नीरस निर्झर का कोई मोल नहीं था।

आवश्यक नहीं कि रेलवे के जिस रूप से हम अभिभूत हों, वही औरों को भी अभिभूत करे। हम रेलकर्मचारियों के लिये यह आनन्द कर्तव्य का एक अंग है और आवश्यकता भी। हमारा कर्तव्य है कि गाड़ियाँ अपनी अधिकतम गति से ही चलें। संभवतः कर्तव्य से आच्छादित अभिरुचि के आनन्द की विशालता को नहीं समझ नहीं पाता यदि रेलवे के और दीवानों से नहीं मिलता। यात्राओं में या कहीं अन्य स्थानों पर हुयी भेटों में रेलवे के कई और पहलुओं के बारे में भी पता लगा, लोग जिससे प्रेम किये बैठे हैं, एक सीमा से भी अधिक दीवाने हैं।

किसी को गति भाती है, किसी को उनकी लम्बाई, किसी को यात्रा का सुख, किसी को रेल का इतिहास। कोई हिन्दी साहित्य में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से लेकर अब तक वर्णित रेलवे के संदर्भों से अभिभूत है तो कोई रेलवे के माध्यम से पूरा देश नापने का उत्सुक है। कभी रेल की पटरियों के किनारे के दृश्य अपने कैमरे में उतारने के लिये रेलवे के दीवाने पैसेन्जर ट्रेनों में घंटों बिता देते हैं, कभी हवाओं के थपेड़ों को अपने चेहरे पर अनुभव करने के लिये दरवाजों से लटके न जाने क्या सोचते रहते हैं। किसी को रेलवे किसी रहस्य से कम नहीं लगता है, किसी को रेलवे के बारे में बतियाने का और अधिकतम तथ्य जानने का नशा है।

बचपन में रेल पटरियों पर दस पैसे का चपटा हो जाना आर्थिक हानि कम, शक्ति का प्रदर्शन अधिक लगता था। गाँवों में जाती हुयी ट्रेन के यात्रियों को हाथ हिला कर बच्चों का उछलना, रेलवे के प्रति उनके प्रेम का प्रथम लक्षण सा दिखता है, यही धीरे धीरे उपरिलिखित अभिरुचियों और गतिविधियों में आकार लेने लगता है।

कई लोगों में उपस्थित इस उन्माद के बारे में तब पता लगा, जब यहाँ पर कई उद्धाटनों में एक समूह को बार बार देखा। नये तरह के कोच आयें या इंजन, किसी ट्रेन की गति के ट्रायल हों या किसी रेललाइन का विद्युतीकरण, रेल से संबन्धित कोई कला प्रदर्शनी हो या रेल परिसर में कोई अन्य आयोजन, उस समूह की उपस्थिति सदा ही बनी रही, उत्साह से परिपूर्ण लोगों का समूह। थोड़ी बातचीत हुयी तो उसमें कोई इन्जीनियर, कोई सॉफ्टवेयर में, कोई विद्यार्थी, बहुतों का रेलवे से कोई पारिवारिक जुड़ाव नहीं। जहाँ तक उनकी अभिरुचि की गहनता का प्रश्न है तो तकनीक, वाणिज्य से लेकर परिचालन और इतिहास के बारे में पूरी सिद्धहस्तता। लगा कि उनके जीवन के हर तीसरे विचार में रेलवे बसी है।

उत्साह संक्रमक होता है। निश्चय ही आप जिस संगठन के माध्यम से अपनी जीविका चला रहे हैं, उसके प्रति आपकी निष्ठा अधिक होती है और समय के साथ बढ़ती भी रहती है, यह स्वाभाविक भी है, पर रेलवे से पूर्णता असंबद्ध समूह का रेलवे से अप्रतिम जुड़ाव देखकर मन आनन्द और गर्व से प्लावित हो गया।

इंडियन रेलवे फैन क्लब नामक यह समूह अपनी गतिविधियों को इण्टरनेट पर सहेज कर अपने उत्साह को सतत बनाये रहता है। कई और भेटों के पश्चात जब इस साइट पर जाना हुआ तो वहाँ पर उपस्थित सामग्री देखकर आँखे खुली की खुली रह गयीं। सैकड़ों चित्र, यात्रा वृत्तान्त, तकनीकी तथ्य और इतिहास के जो क्षण वहाँ दिखे, वो बिना विशेष अध्ययन के संभव भी नहीं थे। यही नहीं, ये दीवाने हर वर्ष इण्टरनेट के बाहर भौतिक रूप से भी मिलते हैं, विषय विशेष पर चर्चा करते हैं, रेलवे के प्रति अपनी अगाध निष्ठा को अभिव्यक्त करते हैं।

हम सबको कभी न कभी रेलवे ने चमत्कृत किया है, न जाने कितने युगलों को जानता हूँ, जिनके वैवाहिक जीवन की नींव रेलयात्राओं में ही पड़ीं। छुक छुक करते हुये खिलौनों से खेलना हो या रेलगाड़ी में बैठ अपने दादा-दादी या नाना-नानी से मिलने जाना हो, सबके मन में रेल कहीं न कहीं घर बनाये हुये है। आपके मन में वह विस्मृत विचार पुनः अँगड़ाई लेना चाहे तो आप इन दीवानों से जुड़ भी सकते हैं। जहाँ एक ओर आपकी अपेक्षाओं के ताल को भरने में रेल कर्मचारी अपने श्रम से योगदान दे ही रहे हैं, वहीं दूसरी ओर आपका हृदयस्थ जुड़ाव ही रेलवे की ऊर्जा को स्रोत भी है।

यह देख रेलवे भी निश्चय ही यही कह उठेगी कि मेरे फैन भी मुझसे कोई नहीं छीन सकता है।

27.7.11

सफ़र ज़ारी आहे

मेरी बिटिया 8 साल की है, सप्ताह में दो दिन चित्रकला सीखने जाती है, रंगों के अद्भुत संसार में बहुत रमता है उसका मन, पढ़ाई से भले ही कभी जी चुरा ले पर चित्रकला के प्रति उसकी उत्सुकता देखते ही बनती है। पहले तो लगता था कि मौलिक रंगों के परे नहीं होगी उसकी समझ पर जब चित्रों की गूढ़ता में उसे उतरते देखा तो अपना विचार बदलना पड़ा।

अवसर था सफर के दूसरे पड़ाव का, एकत्रित थे अपनी शैलियों में सिद्धहस्त कर्नाटक के 6 ख्यातिप्राप्त वरिष्ठ चित्रकार, दिन 16 जुलाई, बंगलोर स्टेशन का प्लेटफार्म 5, कलाप्रेमियों के जमावड़े के बीच नगर के कई गणमान्य नागरिक, आयोजन महिला समिति का, उत्प्रेरक पूर्व की भाँति मंडल रेल प्रबन्धक श्री सुधांशु मणि।

यदि आप बंगलोर सिटी स्टेशन के निकास द्वार को ध्यान से देखें तो उसमें गांधीजी का ट्रेन में चढ़ते हुये का दृश्य है, यह चित्र सफर के पहले पड़ाव की देन है। आपका यदि मंडल कार्यालय आना हो तो सीढ़ी से चढ़ते समय आपको 6 उत्कृष्ट चित्र दिखायी पड़ेंगे, वे भी सफर के पहले पड़ाव की देन हैं। कला का प्रचार-प्रसार उसे लोगों के मनस-पटल पर एक स्थायी स्वरूप देता है। आगन्तुकों से प्राप्त सराहनाओं ने जब यह पूर्ण रूप से स्पष्ट कर दिया कि आमजनों में कला की भूख प्रचुर मात्रा में है, सफर के दूसरे पड़ाव की तैयारियाँ प्रारम्भ हो गयीं।

पता नहीं चित्रों में ऐसा क्या होता है कि सबको अपने अपने मन के रंगों का समरूप मिल जाता है। हर व्यक्ति उस चित्र में कुछ न कुछ अलग देखता है, एक ही आकृति न जाने कितने विचार प्रवाहों को जन्म देती हो। निःशब्द चित्र न जाने कितना अनुनाद करता होगा मन में, क्या पता? बिटिया जब वह चित्र देखती होगी तो सोचती होगी कि कैसे बनाया जाये इतना सुन्दर चित्र, किसी वयस्क को रंगों का चटखपन भाता होगा, एक जानकार को ब्रशों का प्रयोग सुन्दर लगता होगा, विशेषज्ञ को रंगों का संयोजन सराहनीय लगता होगा।

मैं कोई चित्र देखता हूँ तो उसमें उपस्थित पात्रों के मनोभावों को रंगों में निहित भावों से जोड़ने लगता हूँ। मन मुदित हो तो पीला रंग, क्रोध में लाल रंग, संतुष्टि में छिपे हरे रंग के रेशे, दुःख में स्याह घुप्प आवरण। हो सकता है आपके लिये इन रंगों का सम्बन्ध अलग भावों से हो।

कई चित्रकारों से अनौपचारिक बातचीत हुयी, सबकी अपनी विशिष्ट शैली। सबने सीखना प्रारम्भ एक सा किया होगा, परिवेश, विचार, संस्कार, घटनायें, समाज, संवेदनशीलता और न जाने क्या क्या मिलता गया होगा, उनको सृजन पथ में। हर अनुभव एक नये रंग का, हर व्यक्तित्व एक नया गहरापन लिये, सुख-दुःख का गाढ़ापन हर बार अलग मात्रा में, न जाने कितना कुछ संचित। जब वह चित्रकार सामने पाता है एक सपाट कैनवास, हाथों में ब्रश और छिटकाने के लिये रंग, पहला भाव क्या आता होगा, स्फूर्त तरंग सा होता होगा या होता होगा सतत चिन्तन का एक स्थूल निष्कर्ष। हम शब्द उतारते हैं तो जानते हैं कि क्या कह रहे हैं, चित्रकार तो आकृतियों और रंगों से अपना संवाद स्थापित कर लेता है।

जब बिटिया को चित्र समझते देख रहा था तो उन दोनों को देखकर मन में नये भाव आकार ले रहे थे, अब मेरे द्वारा व्यक्त भावों को पढ़ आप भी कुछ नया सोच रहे होंगे। चित्रों की संवाद-लहर यूँ ही बढ़ती जाती है।

रंग, आकृति, अभिनय, न जाने कितने माध्यम उपस्थित हैं हमारे बीच, संवाद की स्थिति शब्दों से कहीं ऊपर स्थित है, भाषा से कहीं ऊपर स्थित है। हमारे जीवन का सफर न जाने कितनी ऐसी मनःस्थितियाँ जान पायेगा। सफर का तीसरा पड़ाव कहीं बैठा हमारी प्रतीक्षा कर रहा होगा।

सफर जारी आहे।



30.4.11

कुलियों का भार

वर्षों पुराना दृश्य है, एक कुली अपने सर पर दो सूटकेस रखे हुये है, एक हाथ से उन्हे सहारा भी दे रहा है, दूसरे हाथ में एक और बैग, शरीर तना हुआ और चाल संतुलित, चला जा रहा है तेजी से पग बढ़ाते हुये, मुख की मांसपेशियाँ शारीरिक पीड़ा को सयत्न ढकने में प्रयासरत, आप साथ में चल रहे हैं और बहुधा आपकी साँस फूलने लगती है साथ चलने भर में। दृश्य आज भी वही रहता है, बस स्थान बदल जाते हैं, यात्री बदल जाते हैं।

कुली आपका सामान यथास्थान रखते हैं, माथे से अपना पसीना पोछते हैं और साधिकार कहते हैं कि जो बनता है, दे दीजिये। आपने जितना पहले से निर्धारित किया होता है, आप उससे भी अधिक दे देते हैं। पसीने की बूंदों में बहुधा वह अधिकार आ जाता है जो आपके कृपण-मन को पराजित कर जाता है। आपको अधिक पैसा देने में कष्ट नहीं होता है।

मैं न तो कुलियों द्वारा निर्धारित से अधिक धन लेने को सही ठहरा रहा हूँ और न ही उन यात्रियों को कोई आदर्श सिखाने का प्रयास कर रहा हूँ जो निर्धारित से अधिक धन देने के लिये पहले से ही मान जाते हैं। यह एक स्वस्थ बहस हो सकती है कि कुली के द्वारा सामान ढोने का क्या मूल्य हो? बाजारवाद के समर्थक और वामपंथी पुरोधा पूरा शोधपत्र तैयार कर देंगे इस विषय पर। यदि जैसे तैसे कोई एक सूत्र निश्चय भी हो तो उसका अनुपालन कैसे होगा? एक व्यस्त स्टेशन में लाखों यात्री एक दिन में चढ़ते उतरते हैं, अधिकतर तो पहिये वाले सूटकेस लेकर चलते हैं, शेष बचे हजारों यात्रियों और कुलियों के बीच हुये लेन देन पर प्रशासनिक दृष्टि रखना संभव ही नहीं है। इन परिस्थितियों में स्टेशन के बाजार में मोल-भाव का पारा चढ़ता है, यात्रियों का बाजारवाद, कुलियों का साम्यवाद और रेलवे का सुधारवाद, जैसे जैसे जो जो प्रभावी होता जाता है, देश उसी पथ पर बढ़ता जाता है।

जहाँ पर विकल्प होता है, बाजार स्वतन्त्र रूप से मूल्य निर्धारित कर लेता है। पर यदि सारे विकल्प यह निश्चित कर लें कि उन्हें विकल्प की तरह प्रस्तुत ही नहीं होना है तो बाजार पर कोई भी नियन्त्रण नहीं रहता है। आप यदि यह निश्चय कर लें कि आप निर्धारित मूल्य ही देंगे तो बहुत स्टेशनों पर यह भी हो सकता है कि कोई आपका सामान ही न ले जाये। आपसी सहमति के बाद निश्चित मूल्य प्रशासन द्वारा निर्धारित मूल्य से अधिक ही रहता है। कहीं कुछ होते हुये नहीं दिखता है, पर यही प्रयासों का अन्त नहीं है।

अपने दृष्टिकोण को यदि नया आयाम दें और विषय को पूर्वाग्रहों से मुक्त कर एक सार्थक रूप दें तो प्रश्न उठेगा कि इतने आधुनिक परिवेश में कुली अपने सर पर बोझ क्यों ढोये? बहुत से यात्री पहियों वाला सूटकेस लेकर चलते हैं पर उसके पहिये छोटे और स्टेशनों में मार्ग अनियमित होने के कारण बहुत असुविधाजनक होते हैं। क्यों न तब कुलियों को एयरपोर्ट जैसी हैण्डट्रॉली दी जाये जिससे सर पर बोझा ढोने के स्थान पर उस ट्रॉली के माध्यम से श्रम को कम किया जा सके। जब श्रम कम होगा, तब यात्रियों से निर्धारित पैसों से अधिक लेने की प्रवृत्ति भी कम होगी। स्टेशनों पर कुलियों का माध्यम आवश्यक सा हो गया है क्योंकि यात्रियों को सीधे ट्रॉली देने से अव्यवस्था और कुलियों द्वारा विरोध की आशंका रहती है।

प्रायोगिक तौर पर ऐसी 30 हैण्डट्रॉलियाँ, बंगलोर स्टेशन पर लगायी गयी हैं। आरम्भिक आशंकाओं के बाद सभ्यता के सशक्त आविष्कार पहियों ने हैण्डट्रॉली के माध्यम से स्टेशन पर अपना स्थान बनाना प्रारम्भ कर दिया है। निकट भविष्य में सभी कुलियों को हैण्डट्रॉली देने की योजना है।

कुलियों का भार कम होने लगा है, आप आशा करें कि उसका सुप्रभाव आपकी जेब के लिये भी हितकर हो। बाजारवाद, साम्यवाद व सुधारवाद में उपजे घर्षण को कोई पहिया कम कर दे।

13.4.11

सफ़र का सफ़र

रेलवे का समाज से सीधा सम्बन्ध है, समाज का कला से, पर जब भारतीय रेल और कला का संगम होता है तो कलाकारों को उन दृश्यों के छोर मिलने प्रारम्भ हो जाते हैं जिनमें एक पूरा का पूरा संसार बसा होता है, प्रतीक्षा का, सहयोग का, निश्चिन्त बिताये समय का, प्लेटफार्मों में घटते विस्तारों का, व्यापार बनते आकारों का और न जाने कितने विचारों का।

जब कभी भी प्लेटफार्म को देखता हूँ, यात्री बनकर नहीं, अधिकारी बनकर नहीं, तटस्थ हो देखता हूँ तो न जाने कितनी पर्तें खुलती जाती हैं। लोगों का भागते हुये आना, एक हाथ में बच्चे, दूसरे में सामान, आँखें रास्ता ढूढ़तीं, पैर स्वतः बढ़ते, कानों में पड़ते निर्देशों और सूचनाओं के सतत स्वर, अपने कोच को पहचान कर सीट में बैठ जाने की निश्चिन्तता, खिड़की से बाहर झांकती बाहर की दुनिया की सुधि और न जाने कितना कुछ। सब देखता हूँ, प्लेटफार्म के कोने में पड़ी एकांत बेंच में बैठकर, गतिविधियों के सागर में अलग थलग पड़ गयी एकांत बेंच में बैठकर। सब एक फिल्म सा, न जाने कितनी फिल्मों से अधिक रोचकता लिये, हर दृश्य नया, प्राचीन से अर्वाचीन तक, संस्कृति से उपसंस्कृति तक, फैशन के रंगों में पुते परिदृश्य, पार्श्व में बजता इंजन की गुनगुनाहट का संगीत, पटरियों की पहियों से दबी दबी घरघराहट, बहु प्रतीक्षित ट्रेन का आगमन, उतरने और चढ़ने वालों में आगे निकलने की होड़, फिर सहसा मध्यम सी शान्ति।

यह चित्रावलि चित्रकारों को न केवल उत्साहित करती है वरन उनकी अभिव्यक्ति का विषय भी बनती है। इन्हीं सुसुप्त भावनाओं को उभारने का प्रयास किया गया रेलवे के एक प्लेटफार्म में, बंगलोर में, 28 मार्च, सुबह से सायं तक। प्रारम्भिक कार्यक्रम के बाद 15 प्रतिष्ठित चित्रकार अपने कैनवास और ब्रश के साथ नितान्त अकेले थे अपनी कल्पना के धरातल पर, दिन भर यात्रियों और कलाप्रेमियों से घिरे वातावरण में चित्र और चित्रकार के बीच चलता हुआ सतत संवाद, ब्रश और कैनवास का संस्पर्श रंगों के माध्यम से, अन्ततः निष्कर्ष आश्चर्यचकित कर देने वाले थे।

मुझे भी चित्रकला का विशेष ज्ञान नहीं है पर शब्दों की चित्रकारी करते करते अब चित्रकला के लिये शब्द मिलने लगे हैं। मेरी चित्रकला की समझ चार मौलिक रंगों और दैनिक जीवन की आकृतियों के परे नहीं जा पाती है। बहुधा हम चित्रों को बना बनाया देखते हैं और उसमें रंगों और आकृतियों के अर्थ ढूढ़ते का प्रयास करते हैं, पर उन रंगों और आकृतियों का धीरे धीरे कैनवास पर उभरते हुये देखना एक अनुभव था मेरे लिये। चित्रकारों की ध्यानस्थ अवस्था में बीता समय कल्पना के समुन्दर में लगायी डुबकी के समान था जिसमें खोजे गये रत्न कैनवास में उतरने को प्रतीक्षित थे। वाक्यों में शब्द सजाने के उपक्रम से अधिक कठिन है कैनवास पर रंगों की रेखायें खींचना।

कला के प्रशंसक चाहते हैं कि चित्रकार और उत्कृष्ट और संवादमय चित्र बनायें, चित्रकार भी चाहते हैं उन आकांक्षाओं को पूरा करना जिनका निरूपण उनकी सृजनात्मकता के लिये एक ललकार है। इन दो आशाओं के बीच धन का समुचित सेतु न हो पाने के कारण चित्रकला का उतना अधिक विस्तार नहीं हो पा रहा है जितना अपेक्षित है। धनाड्यजन ख्यातिप्राप्त चित्रकारों के बने बनाये चित्रों को अपने ड्राइंगरूम में सजा कर अपने कलाप्रेम को व्यक्त कर देते हैं पर संवेदनशील कलाविज्ञ कला को संवर्धित करने का उपाय ढूढ़ते हैं।

यह कलाशिविर उस प्रक्रिया को समझने का सूत्र हो सकता है जिसके द्वारा कला को संवर्धित किया जाना चाहिये। एक कलासंस्था स्थापित और उदीयमान चित्रकारों को प्रोत्साहित करती है और उन्हे ऐसे आयोजनों में आमन्त्रित करती है। चित्रकारों और आयोजकों का पारिश्रमिक एक कम्पनी वहन करती है जिसे रेलवे से सम्बन्धित अच्छे चित्रों की आवश्यकता है। रेलवे इन दोनों संस्थाओं को कलाशिविर के माध्यम से साथ लाती है और माध्यम रहता है, सफर। सफर का प्रासंगिक अर्थ है, Support and appreciation for art and Railways(SAFAR)

इन चित्रों के साथ ही अन्य उदीयमान चित्रकारों ने भित्ति-चित्रों के माध्यम से रेलवे प्लेटफार्म पर अपनी कला के स्थायी हस्ताक्षर अंकित किये। एक बड़ी सी दीवाल पर कला महाविद्यालय के छात्रों ने दिन रात कार्य कर रेलवे प्लेटफार्म को एक और मनोरम दृश्य दिया। इस पूरी कलात्मक क्रियाशीलता में बंगलोर के मंडल प्रबन्धक श्री एस मणि ने एक महती भूमिका निभायी। कला को निसन्देह ऐसे ही संवेदनशील प्रशंसकों की आवश्यकता है।

आप चित्रों का आनन्द उठायें, चित्रों व चित्रकारों के नाम सहित। 


11.9.10

खबर पक्की है, दुर्दशा जारी है

रेलवे का कलेवर आपको बाहर से सरकारी दिख सकता है पर किसी मल्टीनेशनल की भाँति हमारे अन्दर भी लाभ हानि का भाव कुलबुलाता रहता है। जहाँ पिछले वर्षों की तुलना में उच्च प्रदर्शन प्रसन्नता देता है वहीं निम्न प्रदर्शन उन कारणों का पता लगाने को प्रेरित करता है जो प्रगति में बाधक रहे। वैसे तो हर विभाग के मानक आँकड़े भिन्न हैं पर अन्ततः निष्कर्ष आर्थिक आकड़ों से आँके जाते हैं।

बात झाँसी मण्डल की है, आज से दो वर्ष पहले की। वाणिज्य विभाग का मुखिया होने के कारण एक बैठक में पर्यवेक्षकों के साथ विभिन्न खण्डों की आय पर परिचर्चा कर रहा था। पिछले वर्ष की तुलना में कम आय दिखाने वाले एक दो पर्यवेक्षकों की खिचाई हुयी। उसके बाद प्रफुल्लित मन से लाभ देने वाले खण्डों पर दृष्टि गयी तो झाँसी-महोबा-बाँदा-मानिकपुर खण्ड की आय में लगभग 30 प्रतिशत की वृद्धि थी। सड़कों की बुरी स्थिति व बसों का तीन-चार गुना किराया कारण तो थे पर ऐसी स्थिति तो कई वर्षों से थी। कुछ अवश्य ही अलग कारण था इस वर्ष। पर्यवेक्षक से पूछने पर आशा थी कि वह अपने प्रयासों के विशेष योगदान की स्तुतियाँ गायेगा पर जब उस संवेदनशील ने बोलना प्रारम्भ किया तो उसके नयन आर्द्र थे और गला रुद्ध। वार्ता का सार यह था।

इस वर्ष गाँव के गाँव दिल्ली और पंजाब की ओर पलायन कर रहे हैं। केवल वृद्ध रह गये हैं घरों की रखवाली के लिये। पशुओं को छोड़ दिया गया है अपना चारा ढूढ़ने को, इस आशा में कि वे स्वयं को जीवित रख सकेंगे पालकों के वापस आने तक। दिल्ली में नये निर्माण में व पंजाब में खेतों में काम मिलने का आसरा है इनको। खेत धूप की तीव्रता सह सह चटक चुके हैं। न कोई गुड़ाई करने वाला, न उन पर बनी मड़ैया से उन्हें ममतामयी दृष्टि से निहारने वाला, न बैलों के गले बँधे घुँघुरुओं की छन-छन, न पेड़ के नीचे कोई सूखी रोटी प्याज-नमक के साथ खाने वाला। जमीन के लिये जान लेने और देने की बातें करने वाले, अपनी अपनी जमीन को त्यक्तमना छोड़ पलायन कर गये हैं। पिछले दो वर्षों से आँखें आसमान पर टिकाये रहने से थक गये निवासी अपने लिये नयी छत ढूढ़ने समृद्धदेश चले गये हैं। जल स्तर भी मुँह मोड़ पाताल में समा गया। तालाब कीचड़ का संग्रहालय बन गये हैं।

उल्लिखित खण्ड उत्तरप्रदेश व मध्यप्रदेश को दसियों बार काटता है। मानचित्र पर लकीर खीचते समय तो कई बारीकियों के कारण खिचपिच मचा चुके लोग, यहाँ के निवासियों की दुर्दशा को मानसूनी कारण का कफन उढ़ा चुके हैं। आल्हा ऊदल की नगरी और तालों का नगर कहे जाने वाले महोबा में जब पानी के टैंकरों से पानी लूटने में हत्यायें होते देखता हूँ तो सारा अस्तित्व ही सिहर उठता है। यही स्थिति रही तो गाँव के साथ साथ नगर भी त्यक्त हो जायेंगे। जब तक दुर्दशा रहेगी, आय में वृद्धि रहेगी। जब दुर्दशा पूर्ण होगी तब न कोई जाने वाला रहेगा और न ही कुछ आय होगी।

बढ़ी हुयी आय के पीछे एक समग्र दुर्दशा देखकर मन चीत्कार कर उठा। कुछ बोल नहीं सका, आँख बन्द कर बैठा रहा। मेरे स्वभाव से परिचित सभी पर्यवेक्षक भी बिना कुछ बोले कक्ष से चले गये। घर आकर बिना कुछ खाये ही भारी पलकें नींद ले आयीं।

कल कई ब्लॉगरों की संस्तुति पर "पीप्ली लाइव" देखने गया तो दो वर्ष पुराना घाव पुनः हरा हो गया। अपने बुन्देलखण्ड में वीरों के रक्तयुक्त इतिहास को अश्रुयुक्त भविष्य में परिवर्तित होते देख मन पुनः खट्टा हो गया।

कल झाँसी बात की, उस खण्ड की आय पूछी, आय अब भी बढ़ रही है।

आप भी दो आँसू टपका लें। खबर पक्की है, दुर्दशा जारी है।