कुम्भ में कई श्रद्धालुओं को स्नान करते हुये देख रहा हूँ, शरीर से भाप का उठना स्पष्ट देखा जा रहा है। उधर ज्ञानदत्तजी के फेसबुक पर कोहरे और ठंड की व्यापक आख्या भी प्रस्तुत है। परिचितों और संबंधियों से फोन पर बात करते समय स्वर में ठंड के कंपन गूँज रहे हैं, शरीर पर कपड़ों की कई परतें चढ़ी हुयी हैं, उत्तर भारत का सारा कपड़ा अल्मारियों और दुकानों से बाहर आ कँपकपाते शरीरों को आश्वासन दे रहा है। सूर्य के अतिरिक्त जो वस्तु जैसे भी ऊष्मा दे सकती है, अपने कार्य में लगी हुयी है। ऐसे में टीवी पर कुम्भ स्नान के चित्र देखने से श्रद्धालुओं की श्रद्धा की जीवटता का अनुमान लगाने में किसी को भी सन्देह नहीं हो सकता है। एक दो नहीं, करोड़ों शरीर प्रचण्ड ठंड में अपनी शरीर की ऊष्मा आहुति स्वरुप गंगा मैया को चढ़ा रहे हैं, ठंड में भला इससे अधिक क्या आहुति हो सकती है। अब ईश्वर को विवश होकर ही सही, प्रसन्न तो होना ही पड़ेगा।
हम चाह कर भी अपने शरीर की ऊष्मा तज ईश्वर को प्रसन्न नहीं कर पा रहे हैं। क्या करें, यहाँ पर ठंड पड़ती ही नहीं है, ठंड तो क्या यहाँ पर गर्मी भी नहीं पड़ती। ईश्ववर को प्रसन्न करने के दोनों ही मार्ग बन्द हैं। यहाँ बंगलोर में ठंड के नाम पर पूरी बाँह की शर्ट ही पर्याप्त होती है, ठंड का आनन्द चाह कर भी नहीं मिल पाता है। वैसे तो सादे पानी से ही नहा लेते हैं पर कभी कभी विलासिता सूझती है तो गीज़र के गुनगुने पानी से नहा कर थकान दूर कर लेते हैं।
देखा जाये तो स्नान का पवित्रता से नाता है और पवित्रता का ईश्वर से, यही कारण है कि जब भी हम पूजा करने बैठते हैं तो नहा धोकर बैठते हैं। कलियुग में पापों की कमी नहीं रहेगी, चाहेंगे, न चाहेंगे, पाप हो ही जायेगा। प्रत्यक्ष से न होगा तो विचारों से ही हो जायेगा। पाप धुलने का कोई उपाय नहीं, जो हो गया सब खाते में लिख गया। बस पूजा और प्रार्थना ही उपाय बचता है लिखे हुये को धोने का। एक दिन में ही इतने पाप हो जाते हैं कि नियमित पूजा करना आवश्यक है। कभी आप सोच भी लें कि दो दिन में एक बार ही पूजा कर के काम चला लिया जाये तो आपको पिछले दिन के पाप याद ही नहीं आयेंगे, कलियुग में स्मरण शक्ति भी कम कर रखी है ईश्वर ने। ले देकर आप पाप करने को बाध्य हैं, पाप धोने के लिये नित पूजा करने को बाध्य हैं, पूजा करने के लिये नित स्नान करने को बाध्य हैं। ऐसा लगता है कि सारा कालचक्र हमें नित नहाने के लिये ही रचा गया है।
अब आपको लग सकता है कि यदि किसी तरह से पाप करने से बच जायें तो नित नहाने की बाध्यता भी समाप्त हो जायेगी। न पाप करेंगे, न पूजा करनी पड़ेगी और न ही स्नान करना पड़ेगा। विचार सशक्त है, पर ईश्वर ने उसका भी तोड़ निकाल रखा है। आप पाप नहीं करेंगे तो अति सज्जन हो जायेंगे, अति सज्जन होने के कारण आपकी अपने आस पास के लोंगों से पटेगी नहीं। आपके साथ कार्य करने वाले आपको अपने मार्ग का काँटा समझेंगे, आपके पड़ोसी आप पर हँसेंगे। साथी आप पर कुटिल चालों से आघात करेंगे, आपको झूठा ही फँसा देंगे। पड़ोसी आप पर व्यंग बाण छोड़ेंगे। जब आहत और बिंधे हुये घर आयेंगे तो घरवालों से भी पर्याप्त झिड़की खायेंगे। इतना सब होने के बाद आपका तन मन अशान्त हो जायेगा, आप वाह्य विश्व का मैल उतार फेंकना चाहेंगे। मानसिक अशान्ति के लिये पुनः पूजा और पूजा के लिये पुनः स्नान। कुछ भी कर लीजिये स्नान तो ईश्वर आपसे नित करवा के ही रहेंगे। गर्मी हो तो आनन्द से कीजिये, ठंड हो तो कष्ट में कीजिये, बरसात में तो वह स्वयं स्नान की व्यवस्था सम्हाले रहते हैं।
सर्वाधिक पुण्य कमाना हो तो ठंड में ठंडे पानी से ही स्नान करना चाहिये। जानकार कहते हैं कि चाहे आप ठंडे पानी से स्नान करें या गर्म पानी से कष्ट उतना ही होता है और आनन्द भी उतना ही आता है। गर्म पानी से स्नान करने में स्नान करते समय आनन्द आता है पर स्नान के बाद ऐसी कँपकपी छूटती है कि आप कई घंटों तक संयत नहीं हो पाते हैं। वहीं दूसरी ओर यदि आप ठंडे पानी से स्नान करें तो पहले दस सेकेण्ड का ही कष्ट रहता है। पहले दस सेकेण्ड के पश्चात शरीर इतनी ऊष्मा उत्सर्जित करता रहता है कि दिन भर ठण्ड नहीं लगती है। भयंकर से भयंकर ठंड हो, ठंडे पानी में किया स्नान अन्ततः हानि नहीं पहुँचाता है। प्रशिक्षण के समय उदयपुर में और जनवरी के माह में पूरे ३१ दिन तक ठंडे पानी में सुबह सुबह स्नान करने के अनुभव के आधार पर आपको बता रहा हूँ कि ऐसा करने से दिन भर चेतना अपने उत्कर्ष पर रहती है।
वैसे भी गर्म पानी से नहाना आपके लिये पूर्ण आध्यात्मिक शुद्धि लेकर नहीं आयेगा, तब आपको पूजा अधिक करनी पड़ेगी। पानी गर्म करने के लिये या तो आप कहीं से लकड़ी काटेंगे, गैस जलायेंगे या बिजली का प्रयोग करेंगे। इन तीनों ही दशाओं में आप प्रकृति को क्षति पहुँचा रहे हैं। यमराज के यहाँ खुले नये कार्यालय में आपको कार्बन डेबिट मिल जायेगा और आपके पापों पर सरचार्ज भी जुड़ जायेगा। कितना पाप और जुड़ेगा कुछ नहीं कह सकते। जिन्हें रिलायन्स के टेलीफ़ोन बिल चुकाने का अनुभव है, वे ही बता सकते हैं कि दिन भर के पापों से भी अधिक सरचार्ज लग सकता है, स्नान के बाद की गयी पूजा से भी अधिक का। अत श्रेयस्कर है कि स्नान न करें, पूजा न करें पर गर्म पानी से नहाने की सोचे भी नहीं। ईश्वर के नियम ठंड में ठंडे पानी से नहाने की ओर इंगित करते हैं, उनका उल्लंघन निश्चय ही प्रकृतिविरुद्ध है।
जब ईश्वर के नियम आपसे जबरिया स्नान करवाने के लिये बने हों तो क्यों न स्नान में आनन्द उठाया जाये। बचपन का सारा समय स्नान में आनन्द उठाने की स्मृतियों से भरा हुआ है। गर्मियों में नदी नहाने में घंटों निकल जाते थे, जितनी देर पानी के अन्दर रहे उतनी देर सूरज के क्रोध को ठेंगा दिखाते रहे, प्रकृति के एक अंग से दूसरे का सामना। गर्मियों में नहाना कष्ट नहीं है, न नहाना कष्ट है, फिर भी नहाने का आनन्द तो उठाना ही होता है। ठंड का स्नान भी बहुधा छत पर होता था, धूप में, कड़वे तेल से मालिश करने के बाद, गिन चुन कर उतना ही जितना शरीर भिगो कर धोने और सुखाने के लिये पर्याप्त हो। ठंड में स्नान करने के लिये मन बनाने, सामग्री एकत्र करने, पहला पानी का डब्बा उड़ेलने में ही घंटों समय लग जाता है, पहला डब्बा डालते ही शेष के सारे कार्य यन्त्रवत कुछ मिनटों में ही सम्पन्न हो जाते हैं। आप अब पूछ सकते हैं कि इसमें आनन्द कहाँ? असली आनन्द तब आता है जब दूसरे को ठंड में स्नान करते हुये देखते हैं और अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं।
छात्रावास में भी स्नान करना अनिवार्य था, न नहाने वालों को विशेष संबोधनों से धोया जाता था। सुबह के समय ट्यूबवेल की धार बहती थी और हम बच्चे एक एक करके दस सेकेण्डों के लिये उस धार के नीचे खड़े हो जाते थे। धार से ही जितना मैल कट जाये उतना ही अच्छा, शेष हाथ से ही रगड़ कर साफ कर लेते थे। कुछ साहसी बच्चे ही साबुन लगा कर पुनः ट्यूबवेल के नीचे जाने की प्रतीक्षा का कष्ट उठा पाते थे। ट्यूबवेल का पानी तनिक गर्म होता है और उतना कष्टकारी नहीं लगता है स्नान। हाँ, स्नानागार से वापस कमरे तक जाने में लगभग ५० मी की दूरी तय करनी होती थी, किस गति से हम अपने कमरे पहुँच जाते थे पता ही नहीं चलता था। यदि वहीं दूरी १०० मी की कर दी जाती तो हमारे छात्रावास के कई कीर्तिमान हो जाते १०० मी फर्राटा दौड़ में।
भारतीय बच्चों को नित नहाने के लिये प्रेरित करने में हमारी माताओं का विशेष योगदान है। यदि मातायें खाना न देने की चेतावनी न दें तो संभव है बहुत से शीतभीरु बालक दो माह स्नान ही न करें। क्या करें, जाड़े में भूख भी तगड़ी लगती है, एक दो दिन उपवास में निकालना कठिन हो जाता है, अब ले देकर नहाना ही पड़ेगा। लीजिये, श्रीमतीजी भी पुकार रही हैं कि आप नहा लीजिये तो नाश्ता लगाया जाये। उठते हैं, नहा ही लेते हैं, कुंभ में इतने लोगों को नहाते देख कर अपनी ठंड तुच्छ ही लग रही है।
हर हर गंगे, सयत्न संचित शारीरिक ऊष्मा का तुच्छ भोग स्वीकार करो, माँ।