क्षुब्ध मनस का भार सहन है, दोष नहीं दे सकता कल को,
गहरे जल के तल में बैठा, देख रहा हूँ बहते जल को।
क्या आशायें, क्या इच्छायें, क्या जीवन की अभिलाषायें,
अनुचित, उचित विचार निरन्तर, रच क्यों डाली परिभाषायें,
सबने जकड़ जकड़ कर बाँधा, नहीं जिलाया व्यक्ति विकल को,
दोष नहीं दे सकता कल को।
यह सच है, जिसने जीवन को देखा, परखा, समझा है,
आहुति बनकर स्वयं जलाया, यज्ञ उद्गमित रचना है,
कैसे नहीं निर्णयों में वह लायेगा व्यक्तित्व सकल को,
दोष नहीं दे सकता कल को।
मैने जीवन की गति को अब स्थिर मन से देखा है,
महाचित्र पर खिंचती जाती, कर्मक्षेत्र की रेखा है,
ये रेखायें सतत बनातीं, योगदान फिर क्यों निष्फल हो,
दोष नहीं दे सकता कल को।
मानक है जीवन जीने के, लगी यन्त्रवत सकल व्यवस्था,
सुख, साधन की होड़ लगी है, कहाँ पता है किसे समय का,
बाँध बनाते जीवन बीता, भूल गया था लाना जल को,
दोष नहीं दे सकता कल को।
है विवेचना व्यर्थ, तर्क सब, कल की कल पर छोड़ बिसारी,
चलो सजायें वर्तमान में, एक भविष्य की सूरत न्यारी,
बीज लगाओ, सींचो बगिया, आने दो आशान्वित फल को,
दोष नहीं दे सकता कल को।