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11.1.14

मध्य में सब ठीक हो

बड़े तन्त्रों में एक बड़ी समस्या होती है। उन्हें साधने के प्रयास में सारा का सारा ध्यान उनके अन्तिम छोरों में ही रहता है, अन्तिम छोर साध कर लगता है कि सारा तन्त्र सध गया। किन्तु ऐसा होता नहीं है। मध्य का भाग जितना बड़ा होता है, उतना ही असाध्य हो जाता है। बड़े साम्राज्यों का सारा ध्यान या तो केन्द्र पर होता है या तो उनकी सीमाओं पर लगा रहता है, दोनों की ही सुरक्षा में लगा रहता है, मध्य की सुध किसी को भी नहीं रहती है। बड़े राज्यों की अवधारणा विकास के मानकों पर औंधे मुँह गिर पड़ी और छोटे राज्यों की माँग ज़ोर पकड़ती गयी। छोर सम्हाल कर तो रखे गये पर मध्य में ढील छोड़ दी गयी। अपना अपना छोर साधा गया पर शेष सब भुला दिया गया।
 
बहुत पहले एक पुस्तक पढ़ी थी, द स्माल इज ब्यूटीफ़ुल, छोटा सुन्दर है। उसके तर्क भी उतने ही सुन्दर थे। छोटे और स्थानीय तन्त्र प्रकृति से साम्य रखते हैं, प्रकृति के अधिक निकट होते है, नियन्त्रण में रखे जा सकते हैं, संभवतः इसीलिये सुन्दर भी होते हैं।

छोटों से बनता बड़ा तन्त्र
मेरा जीवन अनुभव लघुत्तम के इस सौन्दर्यबोध से सदा ही अन्यथा रहा है। देश बड़ा, जनसंख्या अधिक, परिवार बड़ा, प्रतियोगिता बड़ी, अध्ययन अधिक, स्वप्न बड़े। कितना भी सोच लें पर कुछ भी छोटा मिला ही नहीं। यहाँ तक कि जिस नौकरी में भी अवतरित हुये, वह भी रेलवे की। लम्बी पटरियाँ, विस्तृत तन्त्र, लम्बी ट्रेनें, कर्मचारियों की संख्या लाखों में।

बड़े तन्त्रों को चलाने के लिये बने नियम, प्रयुक्त मानक और प्रशासन शैली, सभी के सभी इतने विस्तृत होने लगते हैं कि उन्हें साधना नियमित कार्य से उठकर कला की श्रेणी में आ जाता है, प्रबन्धक कम, कलाकार अधिक। कारण बड़े ही स्पष्ट हैं, एक नियम से ही बड़े तन्त्र के सारे पक्षों को साधने के प्रयास में नियम फैलते जाते हैं। जब नियम अधिक फैलते हैं, तब नियमों को सम्हालने के लिये नियम बनते हैं, उनको समझने के लिये महारथी विकसित होते हैं। नियम-महारथी विशेष हो जाते हैं, उन पर ही किसी कार्य को होने की या न होने की संभावनायें निर्भर होती हैं, क्योंकि वही जानते हैं कि क्या किया जा सकता है, कैसे किया जा सकता है?

धीरे धीरे नियम प्रमुख हो जाते हैं, नियम-महारथी प्रमुख हो जाते हैं, नियमों का अपना अलग तन्त्र बन जाता है, नियमों का तन्त्र चला कर नियन्त्रक स्वयं को संतुष्ट करने लगता है। वास्तविक तन्त्र जड़ हो जाते हैं, सारी ऊर्जा नियम ही सोख लेते हैं।

बड़े तन्त्रों में सब कुछ स्थूल ही हो, ऐसा भी नहीं रहता है। जब आवश्यकता होती है तो बहुत कम समय में संसाधन जुटाये जा सकते हैं। बड़े तन्त्रों में एकरूपता रहती है, कार्य निष्पादन की सततता रहती है, एक दिशा रहती है, तन्त्रगत समग्रता रहती है। बड़े तन्त्रों के सकारात्मक पक्ष छोटे तन्त्रों में अनुपस्थित रहते है, वहीं बड़े तन्त्रों की अक्षमतायें छोटे तन्त्रों की शक्ति हो जाती हैं।

तो क्या ऐसे तन्त्र विकसित हो सकते हैं जिसमें दोनों ही पक्षों की सकारात्मकता समाहित की जा सके और साथ ही साथ दोनों की नकारात्मकता दूर की जा सके? निश्चय ही हो सकते हैं, पर उसके पहले वर्तमान तन्त्रों के बारे एक बात समझनी होगी। किसी का तन्त्र का निर्माण उद्देश्यों को ध्यान में रखकर किया जाता है। तन्त्र की कार्यशैली पर जितना ध्यान दिया जाता है, यदि उतना ही ध्यान उसकी उत्पादकता या उपयोगिता पर भी दिया जाये तो तन्त्र की कार्यशैली स्वतः परिमार्जित होती रहती है। हम बड़ी बड़ी योजनायें बना कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं, कभी इस बात पर ध्यान ही नहीं देते की तन्त्र को उसकी क्षमताओं के संदर्भ में निरन्तर ही और सुधारा जा सकता है। आख़िरी छोर पर क्या हो रहा है और क्यों हो रहा है, बीच में प्रवाह कैसा है, यदि इन उत्तरों पर ध्यान देने के लिये भी तन्त्रगत व्यवस्थायें रहें तो कोई कारण नहीं है कि तन्त्र प्रभावी न हो।

कभी किसी बड़े चुम्बक को देखा है, उसे छोटे छोटे ढेरों चुम्बकों में तोड़ दीजिये पर उनके गुण वही रहते हैं। जब वही छोटे चुम्बक एक बड़े रूप में थे तो सशक्त थे, यद्यपि गुण वही हैं पर शक्ति बहुत कम हो गयी है। छोटे तन्त्रों को बड़े में कैसे विकसित करना है, चुम्बक के उदाहरण से सीखा जा सकता है। यदि बहुत बड़े तन्त्र बनाने हैं जो अपने भार से न ढह जायें तो उन्हें बनाने का आधार छोटे और गुणवत्ता भरे तन्त्र ही होंगे, ऐसे तन्त्र जो अपने आप में पूर्ण होंगे। ऐसे ही छोटे तन्त्रों को एक दिशा में संयोजित कर उन्हें बड़े तन्त्रों का स्वरूप देना एक विशेष कार्य है, जिसमें प्रत्येक भाग की दिशा और दशा ऐसी हो कि वे पूर्ण के सकारात्मक सहयोगी हों, न कि विरोधाभासी। साथ ही साथ तन्त्र के बड़े होने पर वे दृष्टि में बने रहें, उनके भागों में संवाद का प्रवाह रहे, यही उन्हें साधने की नियन्त्रक कलात्मकता है। उनके भागों को जोड़े रहने का उपक्रम उस तन्त्र को चलाने का श्रम है।

तन्त्र के सभी अवयवों की दिशा एक ही ओर रहे, एक लक्ष्य की ओर प्रेरित रहे। तन्त्र के अवयवों के बीच जुड़ाव व बद्धता हो। यह दो बातें साधने के साथ ही सारा तन्त्र साधा जा सकता है। तन्त्र कैसे कार्य कर रहा है, इसका पता उसकी पूरी उत्पादकता से पता चल जाता है। यदि उत्पादकता वांछित से कम आ रही है तो उन्हीं दो बातों में ही कहीं कोई गड़बड़ है, मध्य में कहीं कुछ छूटा है।हम यही भूल कर बैठते हैं, जब देखते हैं कि तन्त्र ठीक से नहीं चल रहा है, तो किनारों की सुध लेने लगते हैं, बाहर से सहायता देने लगते हैं, मध्य के बारे में भूल जाते हैं। बाहर से जितना प्रयास लगाते हैं, उतने ही अनुपात में गड़बड़ी भी बढ़ जाती है। मध्य में यदि ठीक करेंगे तो बाहर से अधिक प्रयास नहीं करना पड़ेगा।

बड़े तन्त्रों के विश्लेषक समस्या के निदान का प्रथम चरण किसी भी तन्त्र के स्तरों की संख्या कम करना मानते हैं। इसे तन्त्रों का सरलीकरण कहा जाता है। स्तर कम करने से मध्य की परतें कम हो जायेंगी, परतों में आयी समस्या कम हो जायेगी। बड़े तन्त्रों से छोटे तन्त्र की ओर जाने में बहुधा बड़े तन्त्रों की सकारात्मकता खो देते हैं और छोटे तन्त्रों की नकारात्मकता अपना लेते हैं। सही समाधान तो मध्य को व्यवस्थित रखने में है। आप अपने चारों ओर देखिये और सोचिये, बड़े तन्त्रों की गड़बड़ी का स्रोत कहीं उसके मध्य में तो नहीं?

मध्य को तनिक और टटोलेंगे, हर स्तर पर।

चित्र साभार - www.worth1000.com

5.1.13

कांजी हाउस - गाड़ियों का भी

बंगलौर में कई बार सड़क से जाते समय देखता हूँ कि एक क्रेनयुक्त वाहन खड़ा रहता है जो ठीक से पार्क न किये हुये दुपहिया वाहनों को लादता है और कहीं जाकर छोड़ आता है। संभवतः गाड़ियों का भी कोई कांजी हाउस होता होगा, जो आवारा गाड़ियों को रखने के काम आता होगा।

अब बंगलौर में इतने वाहन हैं कि घरों में उन्हें खड़े करने का स्थान ही नहीं है, हर पाँच घर में एक चौपहिया। यदि सारी गाड़ियों का क्षेत्रफल निकाला जाये और उसे सड़कों के क्षेत्रफल से घटा दिया जाये तो चलने के लिये बहुत कम स्थान ही बचेगा। प्रतिदिन 7000 वाहनों के पंजीकरण के बाद वह दिन शीघ्र ही आयेगा जब सारी सड़कों का उपयोग केवल वाहनों की पार्किंग के लिये किया जायेगा, तब किसी एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिये समय पहले से ही आवंटित कराना पड़़ेगा, लम्बी लम्बी प्रतीक्षा सूचियाँ बनेगी। अपने वाहन में एक बार यात्रा कर लेना लॉटरी लगने जैसा हुआ करेगा, मंत्रीगण संस्तुतियाँ किया करेंगे।

ऐसा नहीं है कि यहाँ पर लोगों को भान नहीं है, पर क्या करें हर किसी के पास वाहन है और हर किसी को उसको उपयोग करने का मन भी होता है, कभी दिखावे के लिये, कभी आवश्यकता के लिये। किसी भी बाज़ार जाने पर गाड़ी की पार्किंग कर पाना एक विशेष उपलब्धि होती है। बाज़ार के चहल पहल के क्षेत्र में परिचालन बाधित न हो, इसके लिये पुलिस ने उन क्षेत्रों में पार्किंग प्रतिबंधित कर रखी है। लोगों का मन फिर भी नहीं मानता है, उन्हें लगता है कि जब बड़े बड़े अपराधों में पुलिस उलझी हुयी है, अधिक गम्भीर आर्थिक संभावनाओं में पुलिस उलझी हुयी है, तो छोटा सा और कुछ समय के लिये किया गया नियम उल्लंघन भला कहाँ से पुलिस की दृष्टि में आ पायेगा?

परंपरागत कारणों से भले ही पुलिस विशिष्टजनों को छोड़ दे पर आमजनों से उसकी पैनी दृष्टि कभी नहीं हटती है। आप छोटा सा नियम उल्लंघन कर के तो देखिये, गिद्ध जितनी दूरी से देखकर कोई न कोई आपको बताने आ जायेगा कि आपने क्या अपराध किया है और किन रूपों में वह विस्फोटित होता हुआ गम्भीर अपराध बन सकता है। आप तब समर्पण के सिवाय कुछ और सोच भी नहीं सकते हैं। पुलिस जनों की सामान्य प्रवृत्तियों को छोड़ भी दिया जाये तब भी आपका बचना असंभव है। आप किसी एक सुनसान पड़े चौराहे पर समय बचाने के लिये लाल बत्ती पर निकल जाते हैं, घर में ५ मिनट पहले पहुँच कर दो तीन दिनों में इस घटना के बारे में भूल भी जाते हैं, पर सहसा आपके घर में दण्ड भरने का नोटिस आ जाता है, नियम उल्लंघन के चित्र के सहित। आपकी चतुराई धरी की धरी रह जाती है, आप आगे से ऐसा न करने का वचन कर डालते हैं, अगले अवसर तक।

कई लोग यातायात पुलिस की अन्तर्यामी दृष्टि से सुधर चुके हैं पर सबको इसका स्वाद कहाँ मिला है अभी तक। सो नियम उल्लंघन होते रहते हैं और आँखमिचौनी का खेल चलता रहता है। एक मित्र ने जब इस भेद की व्याख्या की तब कहीं जाकर सब समझ में आया। जैसे संजय की दृष्टि पाकर ही धृतराष्ट्र सब जान पाये थे, उसी प्रकार तकनीक के सहारे बंगलौर की यातायात पुलिस नगर पर अपना नियन्त्रण गाँठे हुये है। सारे नगर में सीसीटीवी कैमरे लगे हैं, लगभग हर चौराहों पर, देखने में बिजली के लैम्पों की तरह ही दिखते हैं। नियन्त्रणकक्ष में बैठे सतर्क निरीक्षक चित्र को ज़ूम करके गाड़ी का नम्बर नोट कर लेते हैं, डाटाबेस से गाड़ी से सम्बन्धित तथ्य और मालिक का पता एकत्र कर चालान बन जाता है और दोषी चालक को भेज दिया जाता है, चित्र, स्थान और समय के सहित। आप विवश और हतप्रभ हो कहीं दुबारा वह न करने का प्रण कर लेते हैं।

इस तरह जहाँ एक ओर वाहनों पर दृष्टि बनी रहती है, वहीं दूसरी ओर कार्य न करने वाले पुलिसवालों पर भी नियन्त्रण रहता है। सतर्क और पर्याप्त मात्रा में उपस्थित यातायात पुलिसबल की संख्या इसी दिव्य दृष्टि का परिणाम है।

संभवतः यही तकनीकी और प्रशासनिक कारण रहा होगा कि क्रेनयुक्त एक वाहन सदा ही आवारा वाहनों को उनके कांजीहाउस में पहुँचाने के लिये सदा कार्यरत सा दिख जाता है। ये कार्य ठेके पर दिया गया है, एक निश्चित पारिश्रमिक के अतिरिक्त एकत्र किये हुये वाहनों की संख्या पर भी कोई न कोई आर्थिक प्रलोभन रखा गया होगा। सर्वप्रथम तो अधिक धन कमा लेने की सहज प्रवृत्ति उन्हें अतिसजग और अतिउत्साही बनाये रखती है। यदि किसी स्थान पर अनाधिकृत वाहन खड़ा है और वहीं खड़ी क्रेनयुक्त अपना कार्य नहीं कर रही है तो नियन्त्रण कक्ष से क्रोध के उद्गार फूटने लगते हैं। यही नहीं, जहाँ पर क्रेनयुक्त वाहन नहीं भी है, निकटस्थ वाहन को वहाँ पहुँचने के निर्देश मिल जाते हैं। यदि इन सबसे दोषी वाहन बच भी गया तो भी लिये गये चित्र के आधार पर आपके घर में चालान पहुँचना निश्चित है।

आवारा वाहन सशंकित हैं, पता नहीं कब वे भी कांजी हाउस पहुँच जायें और उनके मालिक को छुड़ाने आना पड़े। सुविधा छूटे, समय व्यर्थ हो और धन व्यय हो, सो अलग। नागरिकों की समस्या बड़ी विचित्र हो चली है, जहाँ एक ओर नये नये वाहनों का संख्या यहाँ के यातायात और पार्किंग स्थलों का दम घोटे हुये है, वहीं दूसरी ओर यातायात पुलिस की अन्तर्यामी दृष्टि नियमों को मानने को बाध्य किये हुये है। अब या तो वाहन का उपयोग न कर बस का उपयोग करे या वाहन कहीं दूर खड़ाकर पैदल चलकर उस स्थान जाये या अपनी समस्याओं का स्थानीय निदान ढूँढ़ें।

पता नहीं किसकी गति अधिक है, साधनों की या सुविधाओं की या व्यवस्थाओं की। बंगलौर में वाहन के साधन हैं, यथानुरूप पार्किंग की सुविधा नहीं है और व्यवस्था इतनी सुदृढ़ है कि आप नियमों का उल्लंघन नहीं कर सकते हैं। वाहन आवारा घोषित हुये जा रहे हैं, कांजीहाउस भी तैयार हो रहे हैं उन आवारा वाहनों के लिये। पता नहीं किसका अपमूल्यन है, मानवीय प्रकृति का या वैश्विक प्रकृति का। कांजीहाउस, क्या सोचने को विवश नहीं करते आपको।

12.5.12

आधारभूत गर्त

जुआ खेलने वाले जानते हैं कि दाँव इतना लगाना चाहिये कि एक बार हारने पर अधिक कष्ट न हो, और दाँव इतनी बार ही लगाना चाहिये कि अन्त में जीने के लिये कुछ बचा रहे। वैसे तो लोग कहते हैं कि जुआ खेलना ही नहीं चाहिये, सहमत हूँ और खेलता भी नहीं हूँ, पर जीवन में इससे बचना संभव नहीं होता है। वृहद परिप्रेक्ष्य में देखा जाये तो ऐसे निर्णय जिनका निष्कर्ष नहीं ज्ञात होता है, एक प्रकार से जुये की श्रेणी में ही आते हैं। ताश आदि के खेलों में अनिश्चितता अधिक होती है, इसीलिये जुआ अधिक बदनाम है, इसे खेलना टाला भी जा सकता है। जीवन के निर्णयों में अनिश्चितता कम होती है, ये आवश्यक होते हैं, लम्बित तो किये जा सकते हैं पर पूरी तरह से टाले नहीं जा सकते हैं।

शेयर खरीदने वाले जानते हैं कि उन कम्पनी के शेयरों पर पैसा लगाना अच्छा है जिनका नाम है, जिनके भविष्य में कुछ निश्चितता है, जिनका प्रबन्धतन्त्र सुदृढ़ हाथों में है। यह विकास का अंग अवश्य है पर उसमें उपस्थित अनिश्चितता इसे भी जुये की श्रेणी में ले आती है। मैं शेयर भी नहीं खरीदता हूँ यद्यपि कई लोग उकसाते रहते हैं, उनके अनुसार हम अपनी बुद्धि और ज्ञान का सही उपयोग नहीं कर रहे हैं क्योंकि बुद्धि और बल का उपयोग धनार्जन में नहीं किया गया तो जीवन व्यर्थ हो गया। यथासंभव इन सबसे बचने के प्रयास के कारण कई बार भीरु और मूढ़ होने के सम्बोधन भी झेल चुका हूँ।

कई लोग हैं मेरे जैसे ही, जो इस अनावश्यक और अनिश्चित के दुहरे पाश से यथासंभव बचे रहना चाहते हैं। बचा भी रहा जा सकता है यदि तन्त्र ठीक चलें, अपने नियत प्रारूप में, व्यवस्थित। बहुत से ऐसे तन्त्र हैं जो अच्छे से चल भी रहे हैं और उन क्षेत्रों में हमारा जीवन स्थिर भी है, यदि स्पष्ट न दिखते हों तो पड़ोसी देशों को निहारा जा सकता है। कई क्षेत्र पर ऐसे हैं जिन्होंने एक पीढ़ी में ही इतना पतन देख लिया है, जो हमारे विश्वास को हिलाने के लिये पर्याप्त है, निश्चित से अनिश्चित तक की पूरी यात्रा। अनिश्चित और अनावश्यक अन्तर्बद्ध हैं, बहुत अन्दर तक, एक दूसरे को सहारा देते रहते हैं और निर्माण करते रहते हैं, एक आधारभूत गर्त।

बहुत क्षेत्र हैं जिसमें बहुत कुछ कहा जा सकता है, पर विषय की एक निश्चयात्मक समझ के लिये बिजली और पानी की स्थिति ले लेते हैं, सबसे जुड़ा और सबका भोगा विषय, हर बार घर की यात्रा में ताजा हो जाता विषय, अपने बचपन से तुलना किया जा सकने वाला विषय, एक पीढ़ी के अन्तर पर खड़ा विषय।

बचपन की स्थिति स्पष्ट याद है। दिन में तीन बार पानी आता था, कुल मिलाकर ६ घंटे, कहते थे उसी समय पंपहाउस का पंप चलता था। साथ ही साथ बिजली भी रहती थी, लगभग १८ घंटे, बिजली कटने के घंटे नियत, कहते थे कि बचे हुये ६ घंटे उद्योगों और खेतों को बिजली दी जाती थी। सुविधा तब जितनी भी थी, निश्चितता थी। यदा कदा यदि किसी कारण से बिजली और पानी नहीं आता था, तो उसका कारण ज्ञात रहता था, साथ ही साथ कब तक स्थिति सामान्य हो जायेगी, यह भी ज्ञात रहता था। पानी नहीं आने पर नदी में नहाने जाते थे और बिजली नहीं आने पर हाथ से पंखा झल लेते थे।

स्थितियाँ बिगड़ी, अनिश्चितता बढ़ी। सबसे पहले वोल्टेज कम होना प्रारम्भ हुआ, अब सब क्या करें? जो सक्षम थे उन्होंने अपने घर में स्टेबलाइज़र लगाना प्रारम्भ किया, जो कभी अनावश्यक समझा जाता था, आवश्यक हो गया। धीरे धीरे बिजली अधिक समय के लिये गायब रहने लगी, उस अन्तराल को भरने के लिये लोगों ने इन्वर्टर ले लिये, धीरे धीरे वह हर घरों में जम गया। जब इन्वर्टर को भी पूरी चार्जिंग का समय नहीं मिला, तो छोटे जेनसेट हर घरों में आ गये। घनाड्य तो बड़े जेनेरेटर लगा कर एसी में रहने का आनन्द उठाते रहे।

पानी जहाँ बिजली पैदा करता है वहीं बिजली से पंप भी किया जाता है। बिजली की अनिश्चितता ने पानी को भी पानी पानी कर दिया। जब लोगों का विश्वास सार्वजनिक सेवाओं से हट गया तो घरों में बोरिंग हुयी, पंप लगे और बड़ी बड़ी टंकियाँ बनायी गयीं।

जहाँ एक ओर तन्त्र अनिश्चित हो रहा था, अनावश्यक यन्त्र आवश्यक हो रहे थे, हमारी सुविधाभोगी जीवनशैली और साधन जुटाने में लगी थी। फ्रिज, वाशिंग मशीन, कूलर, ओवेन, एसी आदि हमारे जीवन में छोटे छोटे स्वप्नों के रूप में जम रहे थे। विश्वास ही नहीं होता है कि तीस वर्ष पहले तक बिना इन यन्त्रों के भी घर का बिजली पानी चल रहा था। सीमित बिजली पानी बड़े नगर सोख ले रहे हैं, इस आधारभूत गर्त में छोटे नगरों का जीवन कठिन हुआ जा रहा है, सारा समय इन्हीं आधारभूत समस्याओं से लड़ने में निकल जाता है।

हम सबने सुविधाओं के नाम पर विकास के जुये में इतना बड़ा दाँव लगा दिया कि हार का कष्ट असहनीय हुआ जा रहा है, इतनी बार दाँव लगाया है कि जीने के लिये कुछ बचा भी नहीं। पुरानी स्थिति में भी नहीं लौटा जा सकता है क्योंकि सुविधाओं ने उस लायक नहीं छोड़ा है कि पुरानी जीवनशैली को पुनः अपनाया जा सके। इस आधारभूत गर्त में एक हारे हुये मूर्ख जुआरी का जीवन जी रहे हैं हम सब।