कर वमन प्रसंचित विष कराल।
फण तान, तान फण, कुटिल व्याल।।
है दम्भ, नहीं इन ग्वालों ने,
सज्जन गोवंश सुपालों ने,
सब देखा पर, कुछ नहीं कहा,
उत्पात तुम्हारा शान्त सहा,
दूषित यमुना की धवल धार,
उस पर पोषित घन अहंकार,
अब दीर्घ प्रतीक्षा अन्तप्राय, आ पहुँचा तेरा न्याय काल।
फण तान, तान फण, कुटिल व्याल।।१।।
जीवन छीने, आश्रय वंचित,
आतंक विकटतम सर्वविदित,
रण त्यक्त दिशायें, लिपट लिपट,
फण फैल गये थे निष्कंटक,
स्तुतियाँ, सब स्वर रहे व्यर्थ,
क्षण चढ़कर अब आया समर्थ,
इन तड़ित तरंगित तालों पर, है निष्प्रभ तेरी चपल चाल।
फण तान, तान फण, कुटिल व्याल।।२।।
इस पंथ भटकना भूल नहीं,
था निश्चय मेरा मार्ग यहीं,
जन आशायें, क्रम रहे बँधा,
बस जान, समय उतना ही था
आन्दोलित श्वास सधी सी थी,
इस पल की प्यास मुझे भी थी,
क्यों अकुलाये अब विकल विकट, घट पापों का विस्तृत विशाल,
फण तान, तान फण, कुटिल व्याल।।३।।
गोपालों की इच्छा न थी,
कुख्याति बसी इतनी गहरी,
भयग्रस्त और सकुचाये सब,
कन्दुक पर दौड़ लगाये सब,
जो नियत कर रहा सबकी गति,
संभवतः विधि की यही नियति,
कन्दुक हो जाती जल निमग्न, हतप्रभ सब देखें ग्वाल बाल,
फण तान, तान फण, कुटिल व्याल।।४।।
बस कर्म सरल करते तुम भी,
वापस कर देते जिनकी थी,
जो वस्तु उसी को लौटाते,
इतना संयम तो दिखलाते,
जल, धरा, शान्ति, सम्मान गहा,
धमकाना एकल कार्य रहा,
बस वापस माँग रहे जन को, आतंकित करते फण अराल,
फण तान, तान फण, कुटिल व्याल।।५।।
कातरता पूर्ण दृष्टि सबकी,
बन प्रश्न चुभी मुझ पर ही थी,
आग्रह मेरा था आने का,
प्रस्तुत कर्तव्य निभाने का,
था कूदा अपने कार्य निहित,
झगड़े का भाव नहीं किंचित,
तब क्यों था डसने का प्रयास, क्यों फैलाया तब जकड़ जाल,
फण तान, तान फण, कुटिल व्याल।।६।।
जब ललकारा है अनायास,
बालक जाना है, प्रकट हास,
है खड़ा बड़ी बाधा बनकर,
अपने मद की नद में तनकर,
तो कार्य रहा बस यही शेष,
तेरे अन्तर में कर प्रवेश,
तेरे ही शोणित से निश्चय, सीचूँगा तेरा तपित भाल,
फण तान, तान फण, कुटिल व्याल।।७।।
अब नहीं लगे किंचित क्षण भर,
चढ़ गया देख तेरे फण पर,
मर्दन का नृत्य दिखाऊँगा,
वंशी से अलख जगाऊँगा,
विश्वास और अवलम्बन की,
आश्रय आकांक्षित जीवन की,
वंशी का स्वर संकेत सकल, है वृन्दावन का द्वारपाल,
फण तान, तान फण, कुटिल व्याल।।८।।
(ये पंक्तियाँ राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के गीत "तान तान फण व्याल, कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ" से प्रेरित है। जहाँ दिनकर ने बाँसुरी के स्वरों से कई कल्पों को साधा है, मेरा प्रयास कृष्ण से कालिया के हुये संवाद तक ही सीमित है)