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12.8.21

ब्लाग यात्रा - ४ (प्रवृति निवृत्ति)


बारह वर्ष की ब्लागयात्रा के कई अध्याय रहे। “गाय” से लेकर “मधुगिरि” तक लगभग ४० साप्ताहिक ब्लाग ज्ञानदत्तजी के अतिथि रूप में लिखने के बाद तनिक साहस आया कि स्वयं अपना ब्लाग प्रारम्भ कर सकूँ। यद्यपि अपना ब्लाग प्रारम्भ करने की इच्छा प्रारम्भ से ही थी पर अतिथि की सुविधाभोगिता मन में आलस्य उत्पन्न करने लगी थी। एक तो ज्ञानदत्तजी के पाठकों की संख्या बहुत अधिक थी, उसका लोभ बना रहा। दूसरी थी उनकी सदाशयता कि हर टेढ़ी मेढ़ी पोस्ट को ठीक से सजा कर और संपादन कर के वह परिमार्जित करते रहे। तीसरा था मेरे द्वारा लिखित विषय पर उनका दृष्टिकोण और विशेष संवादक्रम। इन तीन सुखों में भला कहाँ भविष्य की सुध संभव थी? अपने पैरों पर सुदृढ़ खड़ा हो सकूँ, इस हेतु उनके विशेष आग्रह ने ही “न दैन्यं न पलायनम्” के उद्घोष से ब्लाग प्रारम्भ करने के लिये प्रेरित किया।


“न दैन्यं न पलायनम्” के उद्घोष ने सदा ही प्रभावित किया है। यह उद्घोष अर्जुन ने भगवद्गीता के संवाद के बाद और युद्ध प्रारम्भ होने के पहले किया था। राजपुत्र होकर भी सदा ही छले जाने के बाद, वीर होकर भी जंगल जंगल फिरने के बाद, न्यायोचित न होने पर भी पाँच गाँव का विनम्रतम प्रस्ताव नकार दिये जाने के बाद और अन्ततः परिवार के मोह में युद्ध न कर सकने की स्थिति में कृष्ण से फटकार सुनने के बाद, अर्जुन का यह उद्घोष अत्यन्त अर्थमय हो जाता है। बहुधा अपना व्यक्तित्व अर्जुन की तरह ही लगता रहा। अर्जुन के समान ही, सामर्थ्य होने के बाद भी सामान्य सा जीवन व्यतीत करने के कई आक्षेप मैंने स्वयं पर लगाये हैं। लगा कि यह वाक्य मेरे जीवन में समय की स्पष्ट थाप बनेगा। पता नहीं कि इस प्रारम्भिक ध्येय को कितना चरित्रार्थ कर पाया मैं?


अपने ब्लाग पर पहली पोस्ट “स्वर्ग” लिखी, पारिवारिक विनोदमयी परिस्थितियों पर। आने वाले कई माह तक ज्ञानदत्त जी मेरी सारी पोस्टों को अपने ब्लाग से प्रचारित करते रहे और यह स्तुत्य कृत्य उन्होंने तब तक निभाया जब तक उन्हें लगा नहीं कि मैं अपने पैरों पर खड़ा हो गया हूँ। पता नहीं और ब्लागरों को इतना सुदृढ़ आधार मिला कि नहीं पर यदि मुझे नहीं मिलता तो न इतना लिख पाता और न इतने आत्मविश्वास से लिख पाता।


एक बार लिखने का क्रम चल पड़ा तो उन्मुक्त भाव से लिखा। परिवेश पर लिखा, परिवार पर लिखा, तकनीक पर लिखा, ब्लागिंग पर लिखा, कविता लिखी, विनोद लिखा, गाम्भीर्य लिखा। लगभग ५ वर्षों तक सप्ताह में दो बार लिखा। व्यस्तता आयी तो सहसा लिखना कम हो गया। लगभग दो वर्ष के लिये सप्ताह में बस एक बार ही लिख सका और बहुधा कविता ही लिख सका। लगभग ३ वर्ष ऐसे बीते जिसमें कुछ भी नहीं लिखा। उस समय कई बार ऐसा लगा कि संभवतः कभी लिख सकूँगा कि नहीं? एक वर्ष कुछ विषय विशेष ऐसे मिले कि औसतन दो सप्ताह में एक बार लिख सका। इस वर्ष के प्रारम्भ में भी शिथिलता और आलस्य घेरे था पर तलहटी स्पर्श होने के बाद जिस वेग से ऊपर आना चाहिये उस प्रवाह से लिख रहा हूँ, एक सप्ताह में लगभग ३ पोस्ट। यही नहीं, यथासंभव पाडकास्ट भी कर पा रहा हूँ।


प्रवृत्ति और निवृत्ति के कालखण्ड बहुधा प्रकृति के गुणों से मेल खाते हैं। सर्वाधिक ऊर्जा का कालखण्ड रजस का होता है। तमस में आलस्यजनित ऊर्जा कम होती है और सत्व में ऊर्जा व्यक्त होने के क्षेत्र ही सिमट जाते हैं। ऐसा ही कुछ लेखन में भी हुआ। जब सृजनात्मकता का उछाह आया तब बहुत से कारक थे और उनका वर्णन और विश्लेषण एक कठिन विषय हो जायेगा। किन्तु जब जीवन में लेखनीय निष्क्रियता पसरी रही तब के दो कारण स्पष्ट रहे।


पहला कारण कार्यक्षेत्र की अतिव्यस्तता रही। व्यस्तता उत्पादक होती है जब तन्त्र व्यवस्थित होता है। जब परिवेशीय अव्यवस्थित हो और सारी ऊर्जा तन्त्र को सुधारने में लगे तो उस प्रयत्न को जूझना कहते हैं। प्रकृति के गुणों के आधार पर देखा जाये तो यह तमस और रजस के बीच की स्थिति है। परिवेश तामसिक और उससे जूझना राजसिक। आप जब परवेशीय तमस में स्वयं ही तमस में जीते हैं तब एक साम्य आ जाता है, मन उतना खट्टा नहीं होता है। आपको भान ही नहीं होता है कि आप क्या कर रहे हैं, आप तो बहने लगते हैं सामाजिक प्रवाह में। किन्तु जब प्रवृत्तियाँ सात्विक हों तो तम से जूझने के लिये रजस में उतरना पड़ता है क्योंकि सीधे सत्व से तम को नहीं जीता जा सकता। बुद्धि के स्तर पर भले ही सत्व रहे पर व्यवहार और विस्तार में बिना रजस आये तम अपराजित ही रहता है। इस नितयु्द्ध सी स्थिति में सृजन असंभव होता है, मन अशान्त सा रहता है, नित नीति और कार्यवृत्त में रत रहना पड़ता है। ऐसे ही कुछ कालखण्ड रहे जिसमें लेखन नहीं हो सका, हाँ, अनुभव अपार जुड़ा।


दूसरा कारण अतिबौद्धिकता का रहा, शु्द्ध सात्विकता का रहा। अच्छे लेखन के लिये आवश्यक है कि आप उत्कृष्ट पढ़ते भी रहें। सामान्य अध्ययन और अवलोकन तो वैसे भी चलता रहता है और उसमें से ही न जाने कितने लेखनीय विषय निकल आते हैं। पिछले ७ वर्षों में पर कई ऐसे कालखण्ड आये जब बौद्धिक और आध्यात्मिक चेतना उछाह पर रही। संस्कृत, दर्शन, आयुर्वेद, मानस, गीता, रामायण और न जाने संस्कृति के कितने पक्ष आये जिनसे साक्षात्कार होता गया। सामर्थ्यानुसार जितना पढ़ सका, अभिभूत रहा। पूर्वजों का बौद्धिक विस्तार, तार्किक तीक्ष्णता, सूत्रबद्ध संक्षिप्तता और सर्वोपकार की भावना में उतराकर यह लगने लगा कि इनकी तुलना में मैं जो सृजन कर पा रहा हूँ वह महावट के सम्मुख तृणमात्र सा है। तुच्छता के उस सतत अनुभव ने भी सृजन के क्रम में बाधा पहुँचायी। पूर्वजों का मन जानना आवश्यक था। यदि नहीं जाना होता तो अपनी क्षुद्रता पर इतराये बैठा होता। इस कालखण्ड में लिख नहीं पाया पर सीखा बहुत।


यह निवृत्ति के कालखण्डों का प्रभाव था या कोई अन्य कारण, यह तो पता नहीं पर पहले की अपेक्षा विषय अब श्रृंखलाओं में अधिक व्यक्त होते हैं। पहले विविध विषयों पर लिखता था, हर एक विषय दूसरों से भिन्न रहता था और कार्यक्षेत्र या परिवेश से जुड़ा रहता था। समय के साथ अब श्रृंखलायें लिखने लगा हूँ। प्रश्न उठ सकता है कि यदि लम्बा ही लिखना है तो पुस्तक क्यों नहीं? अब अधिक सोचने को विवश नहीं करता है यह प्रश्न। उत्तर यही है कि जब ब्लाग में आनन्द आ रहा है तो पुस्तक क्यों? 


प्रवृत्ति और निवृत्ति की धूप छाँव में सृजन गतिमान है।

14.12.16

लेखन में इष्टतम विलम्ब

देखा जाये तो लेखन में भी इष्टतम विलंब का वृहद उपयोग है। उपरिलिखित वाक्य सोचना और उसे लिखना, वैसे तो बड़ा स्वाभाविक लगता है पर यदि उस पर विचार करें तो सोचने की प्रक्रिया समाप्त होने के बाद ही लिखने का निर्णय होता है। कभी कभी तो लिखते या टाइप करते समय भी चिन्तन चलता रहता है और लेखन परिवर्धित हो जाता है। समुचित वाक्य बनाने के पहले कितनी देर सोचना है, यह बड़ा प्रश्न है। लिखते समय सोचने में व्यवधान होता है और सोचते समय लिखा नहीं जा सकता है। अभ्यास होते होते दोनों मिश्रित से हो जाते है और दोनों की भिन्नता का पता नहीं चलता है। लिखते लिखते ही सोच लेने में लेखन अत्यन्त शीघ्र हो सकता है। संभव है कि सरल विषय पर लेखन करने में ऐसा हो या किसी ज्ञात विषय को शब्दबद्ध करने में विचार स्वतः निकल आयें। कठिन, अज्ञात या कल्पनामयी पर चिन्तन करना ही पड़ता है। बौद्धिक क्षमता के अनुपात में समय भी लगता है। यदि उससे कम समय देंगे तो अभिव्यक्ति में भूल होने की संभावना है। हो सकता है कि वह पूर्ण न हो या जो अभीप्सित था वह संप्रेषित न हो पाया हो। आवश्यकता से अधिक सोचने में संभव है कि समय व्यर्थ हो रहा हो या जो अभिव्यक्ति हो वह समझने की दृष्टि से कठिन हो। पढ़ने वाले की दृष्टि से इष्टतम विलंब इतना हो कि वह भूल रहित हो, अधिक कठिन न हो, सुगाह्य हो, इष्टतम हो।   

पुस्तक लिखने का निर्णय भी इष्टतम विलंब के आधार पर लिया जा सकता है। जिस विषय पर लिखना है, उस पर कितना शोध और अध्ययन पर्याप्त हो। यदि कम शोध करके लिखा तो संभव हो पुस्तक की गुणवत्ता कम हो। बहुत अधिक शोध करके लिखें तो संभव हो कि लिखने में अधिक देर हो जाये या यह भी संभव है कि पुस्तक अत्यन्त कठिन हो जाये। जैसे ही कोई नया विचार या नयी खोज आती है, व्यवसायी या उद्यमी इस बात पर लग जाता है कि किस प्रकार उसका उपयोग करके आर्थिक लाभ अर्जित किया जा सके। तुरन्त ही उस कार्य में लग जाने से आप औरों से आगे तो हो जाते हैे, पर संभव हो उस समय तक शोध का स्तर अच्छा न हो, इस कारण आपके उत्पाद में वह गुणवत्ता न आ पाये जो व्यवसाय में अग्रणी रहने के लिये आवश्यक है। बहुत अधिक विलंब करने से आपके प्रतियोगी स्पर्धा में आगे निकल जायेंगे और आपके लिये कुछ शेष नहीं छोड़ेगे।  थोड़ा रुककर आर्थिक निर्णय लेने से या कहें तो इष्टतम विलंब के बाद निर्णय लेने से, हो सकता है कि आपके उत्पाद का प्रभाव महत्तम हो।

इस विषय पर जब गूगल में भ्रमण कर रहा था तो एक बड़ा ही रोचक ब्लॉग मिला। यह ब्लॉग ‘ऑपरेशन रिसर्च’ के क्षेत्र में था। इष्टतम विलंब पर गणेश और व्यास का उदाहरण उसमें दिया गया था। गणितीय शब्दावली का उपयोग न करते हुये उसे सरल भाषा में समझाता हूँ।

यह कथा सबको विदित है कि महाभारत के बाद जब व्यासजी ने उस कथानक को लिपिबद्ध करने का निर्णय किया तो उन्होने स्वयं लिखने के स्थान पर लेखक से कराने का निर्णय लिया। व्यासजी महाभारत सर्वसाधारण के लिये लिखना चाहते थे और इस कारण ग्रन्थ का आकार बड़ा होना स्वाभाविक था, लगभग एक लाख श्लोकों का। सारा कथानक उनके मस्तिष्क में स्पष्ट था, बस उसे शब्दबद्ध करना था। कथा का प्रवाह न टूटे, इसके लिये आवश्यक था कि वह बोलते रहें और कोई और उसे लिखता रहे। अब विचार किया गया कि सबसे अधिक गति से कौन लिख सकता है, गणेशजी का नाम आया, बुद्धिमान और ज्ञानवान, सबका हित चाहने वाले। प्रस्ताव भेजा गया, गणेशजी सहमत हो गये।

गणेशजी ने एक बाध्यता रखी कि यदि व्यासजी की बोलने की गति गणेशजी की लिखने की गति से कम हो गयी तो वह लिखना बन्द कर देंगे। कारण स्पष्ट था, जब सबकुछ उनके मस्तिष्क में स्पष्ट था तो बोलने में विलंब नहीं होना चाहिये। व्यासजी के लिये यह कठिन नहीं था पर बोलने की गति अधिक रखने के लिये सोचने के लिये कम समय मिलता। अधिक गति में त्रुटियों की संभावना अधिक हो जाती है। इस पर व्यासजी ने भी एक प्रतिबाध्यता रखी। व्यासजी ने गणेशजी से कहा कि आप श्लोक सुनने के बाद जब तक उसे पूरा समझ नहीं जायेंगे तब तक उसे लिखेंगे नहीं। यहाँ पर एक इष्टतम बिलंब की स्थिति उत्पन्न हो गयी, जिससे सोचने के लिये व्यासजी को तनिक अधिक समय मिल गया। यह महाभारत के त्रुटिरहित और अक्लिष्ट लेखन के लिये वरदान था।

यहाँ पर गति और समझ के बीच एक संतुलन स्थापित हुआ, त्रुटि और क्लिष्टता के बीच संतुलन स्थापित हुआ। यदि व्यासजी कम सोच कर, बड़ा सरल सा श्लोक गढ़ते तो उसमें त्रुटि की संभावना रहती।  साथ ही साथ गणेशजी उसे तुरंत ही समझकर लिख भी देते। इससे व्यासजी को अगले श्लोक के लिये कम समय मिलता, जिससे त्रुटि की संभावना और भी बढ़ जाती। इस प्रकार त्रुटि की मात्रा ग्रन्थ में उत्तरोत्तर बढ़ती जाती। यदि व्यासजी बहुत अधिक सोचकर क्लिष्ट सा श्लोक गढ़ते तो गणेशजी को उसे समझने में अधिक समय लगता। इससे व्यास को अगले श्लोक के लिये और अधिक समय मिलता। इस प्रकार महाभारत के श्लोक उत्तरोत्तर और भी क्लिष्ट होते जाते। दोनों ही अवांछित निष्कर्ष महाभारत जैसे ग्रन्थ के लिये व्यासजी को स्वीकार्य नहीं थे अतः उन्होने इष्टतम विलंब का मार्ग अपनाया जिससे महाभारत त्रुटिरहित और अक्लिष्ट हो सका।

यदि व्यास से कम मेधा का कोई वाचक होता, यदि गणेश से कम श्रुतलेखन का कोई लेखक होता, इन दोनों ही परिस्थितियों में महाभारत का वर्तमान स्वरूप सामने न आ पाता। महाभारत का संयोजन अद्भुत है। गीता जैसी कालजयी रचना उसी में से उद्धृत है। सांख्य, कर्म और भक्ति आदि के तत्व जिस सरलता से समझाये गये हैं, वह उसकी सर्वग्राह्यता सिद्ध करते हैं। पतंजलि योग सूत्र पढ़ने के बाद जब पुनः गीता पढ़ी तो लगा कि प्रत्येक सूत्र की विशद व्याख्या कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं। जब कभी भी आप गीता पढ़ें तो कृष्ण-अर्जुन, संजय-धृतराष्ट्र के संवादों के साथ साथ व्यास-गणेश की इष्टतम बिलंब के संवाद को भी याद रखें।

7.12.16

सूत्र शैली

अनुबन्ध चतुष्ट्य को लेखन का आधार मान लेने से इस विषय पर एक सुस्पष्टता आ जाती है। लिखने के पहले इस पर विचार कर लेने से लेखन का स्तर स्वतः ही बढ़ जाता है। इसका अनुपालन पुस्तक लिखने के अतिरिक्त लेखन की अन्य विधाओं में भी किया जाना चाहिये। चलिये, अपने ब्लॉग में इसे प्रयुक्त करते हैं। मेरे ब्लॉग के विषय विविध हैं, जीवन से जुड़े, अध्ययन किये हुये, सामाजिक अवलोकन के, आत्मिक अनुभव के, और ऐसे ही जाने कितने विषय। प्रयोजन मात्र अभिव्यक्ति है, विशुद्ध स्वार्थ, क्योंकि किसी विषय को लिखने और पाठकों को समझाने के क्रम में वह और भी स्पष्ट हो जाता है। बचपन में भी लिखकर पढ़ते थे, सीखते थे, समझते थे। लिखने और उस पर आयी टिप्पणियों से विषय की समझ और भी विस्तारित हो जाती है। प्रयोजन हिन्दी का प्रचार प्रसार भी है, जिन विषयों में समान्यतः अंग्रेजी का प्राधान्य है, उन्हें हिन्दी पाठकों के लिये सुलभ बनाना है।  प्रयोजन उस विषय पर कोई विशिष्ट टीका या संदर्भ लिखना नहीं है। अधिकारी कोई भी है जो उस विषय में रुचि रखता हो, अधिकारी सर्वसाधारण हैं। सम्बन्ध बड़ा सरल है, ब्लॉग पढ़ने के बाद पाठक के जीवन में कोई विशेष परिवर्तन की आशा नहीं करता हूँ, बस पढ़ते समय पाठक उन्हीं भावनाओं से होकर निकले जिन भावनाओं से प्रेरित हो वह ब्लॉग लिखा गया था।

अपने ब्लॉग का अनुबन्ध चतुष्ट्य लिखने के बाद ऐसा लगा कि इन संदर्भों में कुछ विशेष और स्तरीय लेखन नहीं कर पा रहा हूँ, संभवतः इसीलिये आनन्द का भाव नहीं जग पा रहा है। सतही अनुभव और परिधि में घूमने में तो कोई आनन्द नहीं, जाना तो केन्द्र तक पड़ेगा तभी कुछ तत्व मिलेगा। उन विषयों पर लिखने में अत्यधिक संतुष्टि मिली जिन पर गहराई में उतर कर लिखा, विषय को सामान्य से अधिक समझा, विषय के सब पक्षों को समझ और समझा पाया। निश्चय ही संतुष्टि की उन स्मृतियों को अपने लेखकीय जीवन में पुनर्स्थापित करना पड़ेगा, तब कहीं आनन्द के कुछ छींटे मन पर पड़ेंगे।

सूत्र शैली भारत की ज्ञान परंपरा की अत्यन्त सशक्त विधा है। यह साक्षी है कि उस समय के संवाद, लेखन और अभिव्यक्ति का बौद्धिक स्तर कितना उत्कृष्ट था। योगसूत्र जैसा कठिन विषय पतंजलि ने मात्र १९५ सूत्रों में लिख दिया,  या कहें तो लगभग ६० श्लोकों में। पाणिनी ने पूरी संस्कृत व्याकरण मात्र ४००० सूत्रों में समाहित कर दी। सांख्य के प्रणेता कपिल मुनि ने मात्र २२ सूत्रों में अपने सिद्धान्त के प्रतिपादित किया। सूत्र में न्यूनतम शब्दों का प्रयोग उसे शाब्दिक कोलाहल से मुक्त कर और भी प्रभावी बना देता है। शब्दों का चयन सूत्र के अर्थ को असंदिग्ध रूप से व्यक्त करने में समर्थ होता है। सारवत कहना, यह सूत्रशैली के ही हस्ताक्षर हैं, विचारों की श्रंखला को कम वाक्यों में कह पाने की शक्ति। यदि एक से अधिक अर्थ बताना आशय है तो उस कला में भी सूत्रशैली सटीक बैठती है, उपयुक्त शब्दों को प्रयोग से यह सुनिश्चित होता है। सूत्र भी लम्बे नहीं, छोटे से, याद करने में सरल, विस्तार से समझाने में सरल। एक तो संस्कृत स्वयं में ही कोलाहल मुक्त भाषा है, न्यूनतम शब्दों में अधिकतम प्रेषित करने की सक्षमता समाये भाषा। धातु, प्रत्यय, विभक्ति, उपसर्ग, प्रत्याहार, संधि, समास आदि सबका एकल उद्देश्य अभिव्यक्ति की सुगठता और सघनता है। उस भाषा में व्यक्त सूत्रशैली में एक भी अक्षर अतिरिक्त नहीं है, एक भी अर्थ लुप्त नहीं है। इस तथ्य की उद्घोषणा प्रणेताओं ने अपनी रचनाओं के पहले ही किया है।

अभिव्यक्ति की इस पराकाष्ठा को देखता हूँ तो गर्व भी होता है और लाज भी आती है। गर्व इस बात का कि हमारे पूर्वज सतत चिन्तनशील थे, अद्भुत मेधा के स्वामी थे। लाज इस बात की आती है कि उन पुरोधाओं की संतति होने के बाद भी, उनके द्वारा निर्मित संस्कृति का पलने का लाभ होने के बाद भी हम उन मानकों के आसपास भी नहीं छिटकते हैं। जितना पढ़ता हूँ, जितना सोचता और समझता हूँ उतना ही अभिभूत हो जाता हूँ। अब आप ही कल्पना कीजिये कि जब मन की स्थिति नित उन उच्च मानकों पर जी रही हो, उस समय कुछ भी ऐसा कहना जिसमें गुणवत्ता न हो, एक निष्कर्षहीन श्रम लगता है। यही कारण रहता होगा कि लेखन का आनन्द अल्पतर होता गया।

ऐसा नहीं है कि सूत्रशैली कोई कृत्रिम तकनीक है। शब्दों की शक्ति अथाह है, एक एक शब्द जीवन बदलने में समर्थ है। इतिहास साक्षी है कि सत्य, अहिंसा, समानता, न्याय, अपरिग्रह, धर्म आदि कितने ही शब्दों ने समाज, देश और संस्कृतियों की दिशा बदल दी है। पहले उन शब्दों को परिभाषित करना, संस्कृति में उनके अर्थ को पोषित करना, उन्हें विचारपूर्ण, सिद्धान्तपूर्ण बनाना। कई कालों में और धीरे धीरे शब्द शक्ति ग्रहण करते हैं। उदाहरणस्वरूप योग कहने को तो एक शब्द है पर पूरा जीवन इस एक शब्द से साधा जा सकता है। सत्य और अहिंसा जैसे दो शब्दों से गांधीजी ने देश के जनमानस की सोच बदल दी। ऐसे ही शब्दों ने राजनैतिक परिवर्तन भी कराये हैं और समाज की चेतना में ऊर्जा संचारित की है। व्यक्तिगत जीवन में भी सूत्रशैली की उपयोगिता है। बचपन परीक्षा की तैयारी करते समय किसी विषय को पढ़ते समय हम संक्षिप्त रूप में लिख लेते हैं ताकि परीक्षा के पहले कम समय में उन्हें दोहराया जा सके। यही नहीं, विज्ञान के बड़े बड़े सिद्धान्त भी गणितीय सूत्रों के रूप में व्यक्त किये जाते हैं।

सूत्रशैली का अर्थ मात्र संक्षिप्तीकरण नहीं है। वृहद अर्थों में देखा जाये तो यह एक संतुलन है। अनुबन्ध चतुष्ट्य जहाँ एक ओर आवश्यक और अनावश्यक के बीच संतुलन करता है, सूत्रशैली अधिकारी का निर्धारण कर विस्तार और संप्रेषणीयता के बीच संतुलन करती है। किसी सिद्धान्त को विस्तार से लिख देना सरल है पर उसे याद रख पाना और उचित समय में प्रयोग में ला पाना कठिन है। अत्यन्त क्लिष्ट करने से संक्षिप्तीकरण तो हो सकता है, पर उसकी संप्रेषणीयता में ग्रहण लग जाता है। शब्दों को उस सीमा तक न्यून किया जाये जब तक अर्थ पूर्णता से संप्रेषित होता रहे। जिस समय लगे कि एक भी शब्द हटाने से संप्रेषण प्रभावित होगा, वही सूत्र की इष्टतम स्थिति है। एक और शब्द जब अधिक और व्यर्थ प्रतीत हो तो समझ लीजिये कि आपने सूत्र पा लिया। संतुलन का अर्थ ही यही होता है कि दो विपरीत लगने वाले गुणों को किस सीमा तक साधा जाये कि प्रभाव महत्तम हो।

संतुलन में ही बुद्ध का मध्यमार्ग छिपा है, कृष्ण की स्थितिप्रज्ञता छिपी है, प्रकृति और पुरुष का साम्य छिपा है, जीवन के सफलतापूर्वक निर्वाह की कुंजी छिपी है।


जीवन और लेखन में संतुलन के अन्य उदाहरण अगले ब्लॉग में।

4.12.16

लेखकीय संतुलन

जब कभी लगता है कि लेखन में आनन्द नहीं आ रहा है तो लेखन कम हो जाता है। 

लेखन अपने आप में एक स्वयंसिद्ध प्रक्रिया नहीं है। इसके कई कारक और प्रभाव होते हैं। क्यों लिखा जाये, कैसे लिखा जाये और क्या लिखा जाये, ये मूल प्रश्न आठ वर्ष के ब्लॉग लेखन के बाद आज भी निर्लज्ज प्रस्तुत हो जाते हैं। लेखन के प्रभाव बिन्दु पठन के कारक होते हैं। क्यों पढ़ा जाये, क्या पढ़ा जाये, इस पर निर्भर करता है कि क्या लिखा जाये। जीवन में बहुधा लगता है कि केवल शुष्क ज्ञान ही ग्रहण हो रहा है और उसका कोई अनुशीलन नहीं हो रहा है। तब जीना प्रारम्भ हो जाता है, ज्ञान का व्यवहार बढ़ जाता है, पढ़ना कम हो जाता है, लिखना कम हो जाता है। जब सारगर्भित ज्ञान के सूत्र मिलने लगते हैं तो विस्तार से मन हट जाता है, सूत्रों और शब्दों पर ही मनन करने में दिन निकल जाते हैं, पढ़ना कम हो जाता है, लिखना कम हो जाता है। जब कभी गहराई मिलती है, सिद्धान्तों के सुलझाव समझ में आने लगते हैं, तब मात्र पढ़ते रहने का मन करने लगता है, लिखना कम हो जाता है।

तीन वर्ष पहले मन में एक भाव उठा कि एक पुस्तक लिखी जाये। विषय बहुत थे जिन पर लिखा जा सकता था, हल्के और भारी, दोनों ही विषय थे। कई मित्रों से चर्चा की। उसी क्रम में एक कठोर सुझाव भी आया। जब तक लिखने की उत्कट इच्छा न हो, तब तक पुस्तक न लिखें। मन के विचार और उनमें समाहित विविधता व्यक्त करने के लिये ब्लॉग एक सशक्त माध्यम है। यदि कुछ लिखना ही हो तो ऐसा लिखा जाये जिसमें कुछ वैशिष्ट्य हो। वह वैशिष्ट्य लाने के लिये स्तरीय अध्ययन आवश्यक है। अनुभव को एक बार ही व्यक्त किया जा सकता है क्योंकि कल्पना हर बार नव कलेवर ओढ़ कर नहीं आ सकती है। इस तथ्य पर पर्याप्त सोचने के बाद पुस्तक लिखने का विचार स्थगित कर दिया गया। जो विषय पुस्तक के बारे में सोचे थे, उन्हें भी चिन्तन की प्रथम पंक्ति से उठा कर पीछे बैठा दिया गया। सहसा लगा कि सभी विषयों ने विद्रोह सा कर दिया हो। न कोई नवविचार, न कोई रोचक दृष्टिकोण, स्तब्ध सी मनःस्थिति, लिखना कम हो गया। अच्छी बात पर यह रही कि पढ़ना कम नहीं हुआ।

यह सत्य है कि व्यस्तता रही, पर व्यस्तता के कारण नियमित लिखने का समय नहीं मिला, यह तथ्य तर्कपूर्ण नहीं लगा। बहुधा अच्छा लेखन व्यस्तता के समय में ही लिखा है, एक प्रवाह में, बहुत कम समय में। जब बलात लिखने का प्रयास होता है तो उतना ही लिखने में बहुत समय लग जाता है। पता नहीं क्यों, पर प्रवाह कम हो गया। उतना ही लिखने के लिये अधिक मानसिक श्रम करना पड़ता था, आनन्द की मात्रा कम होती गयी, लिखना कम होता गया। प्रवाह क्यों कम होता है, यह समझ नहीं आता है, पर जब प्रवाह कम हो जाता है तो कुछ समझ नहीं आता है।

स्वाध्याय के क्रम में जब प्राचीन ज्ञान को समझना प्रारम्भ किया तो दो विशेष तथ्यों से साक्षात्कार हुआ। पहला अनुबन्ध चतुष्ट्य और दूसरा सूत्र शैली।

अनुबन्ध चतुष्ट्य वे चार बन्धन हैं जिनका लेखक को अनुसरण करना पड़ता है। अनुसरण करने के लिये आवश्यक है कि उन्हें पुस्तक के प्रारम्भ में ही घोषित कर दिया जाये। भारतीय ज्ञान परंपरा में यह बन्धन एक स्थायी स्तंभ रहा है। ये चार हैं - विषय, प्रयोजन, अधिकारी और सम्ब्न्ध। किस विषय पर पुस्तक है, यह प्रारम्भ में ही घोषित करना होता है। जब उस विषय पर कितना कुछ लिखा जा चुका है तो वर्तमान प्रयत्न का प्रयोजन क्या है। कौन व्यक्ति इसे पढ़ने के योग्य हैं या किसको समझ में यह पुस्तक आयेगी। इस पुस्तक के पढ़ने के बाद उस व्यक्ति में क्या परिवर्तन आयेगा। सीमायें वहुत ही स्पष्ट रूप से निर्धारित की गयी हैं। हम बहुधा केवल विषय पर ही सोच कर बैठ जाते हैं, किसी विषय में यदि थोड़ा अधिक जान जाते हैं तो लगता है कि उसे व्यक्त कर दिया जाये। शेष तीन पर तो विचार आता ही नहीं है। संभवतः अनुबन्ध चतुष्ट्य ही कारण रहा होगा कि प्राचीन समय में अनावश्यक साहित्य छन गया और बाहर नहीं आया। पुस्तक लिखना तब एक विशेष उपलब्धि रहा करती होगी। जो छनकर कालान्तर में बाहर आया, वह बार बार पढ़ने का मन करता है, वह संस्कृति की धरोहर बना।

अनुबन्ध चतुष्ट्य को यदि पुस्तक लिखने का आधार बनाया जाये तो बहुत से संशय दूर हो जाते हैं। न केवल लेखक के लिये वरन पाठक के लिये भी। जिन सिद्धान्तों पर लेखन होता है उन्हीं पर पाठन भी होता है। विषय का विस्तार असीमित है, सबकी अपनी एक कहानी है, सबकी अपनी समझ और परख है। सब अपनी कहने में आ जायें तो लिखने वाले अधिक हो जायेंगे, पढ़ने वाले कम। जैसे आजकल किसी भी चर्चा में कहने वाले अधिक रहते हैं और सुनने वाले कम मिलते हैं। केवल अपनी कह देना विषय नहीं हो सकता। उसमें कुछ मनोरंजन हो सकता है, कुछ भाव हो सकते हैं, कुछ खिचड़ी सा हो सकता है वह, पर स्वादिष्ट साहित्य नहीं हो सकता। आँकड़े देखें तो यही हो रहा है, २० लाख पुस्तकें हर वर्ष लिखी जाती हैं और औसत २५० प्रतियाँ प्रति पुस्तक बिकती हैं। अधिकांश के लिये तो पुस्तक का मूल्य और लगाया हुआ श्रम भी निकाल पाना कठिन होता है।

यदि बताने के लिये सारतत्व है, तो भी बिना प्रयोजन के लेखन का कोई औचित्य नहीं। जब विषय जीवन से जुड़ा होगा, कल्याण से जुड़ा होगा, ज्ञान से जुड़ा होगा, तो उसका प्रयोजन उतना ही अधिक होगा। अधिकारी प्रारम्भ में ही निर्धारित कर देने से लेखक के लिये अपना बौद्धिक स्तर नियत कर पाना सरल होता है। पुस्तक का आकार इस पर विशेष रूप से निर्भर करता है। यदि आप किसी विषय पर सर्वसाधारण के लिये लिख रहे हैं, तो हर पक्ष को समझा समझा कर लिखना होगा और पुस्तक का आकार बढ़ जायेगा। किसी भी जटिल पक्ष पर जाने के लिये आपको अत्यन्त कठिनाई होगी। आपको उदाहरणों औप कथाओं को विशेषरूप से सम्मिलित करना होगा। दूसरी और यदि प्रबुद्ध वर्ग के लिये कोई विषय व्याख्यायित किया जा रहा है तो कम शब्दों में अधिक बात कही जा सकती है। दोनों ही साधनों में विषय की गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया जाता है, बस पुस्तक का आकार अधिकारी के अनुसार घटता बढ़ता रहता है। जब कई शास्त्र सूत्र के प्रारूप में दिखायी पड़ते हैं तो लिखने वाले और उन्हें पढ़ने वालों का उत्कृष्ट बौद्धिक स्तर समझ में आता है।


लेखकीय संतुलन के और पक्ष अगले ब्लॉग में।

12.6.16

कविता का कालबन्ध

पिछले दो वर्षों में मुख्यतः कविता ही लिखीं, वह भी परस्पर असंबद्ध विषयों पर। कभी उत्साह की आस, कभी दर्शन की नीरवता, कभी तथ्यों की चोट, कभी बिखरे भावों को समेटने का प्रयास, कभी कुछ न कह सकने की टीस और कभी अभिव्यक्ति को ढूँढ़ लाने का उपक्रम। जब स्वयं से बात करने का समय घट जाता है तो ऐसे ही फुटकर बातें होती हैं। शब्द भी नहीं मिलते हैं, वाक्य पूरा करने के लिये। भाव अपना सत्य आधा व्यक्त करते हैं और आधा छिपा ले जाते हैं, संभवतः यह सोचकर कि पाठक उसे बीज रूप में समेट कर भाषा का समुचित विस्तार दे देगा और ठीक वैसा ही समझ लेगा जैसा भाव मन में प्रस्फुटित हुआ है।

किन्तु वैसा होता नहीं है, जैसा सोचा होता है। कवितायें अपनी ही कह जाती हैं, जो मन में आता है, वह लिखवा जाती हैं। पढ़ने वाले से संवाद होना या आंशिक होना या न होना, सब इस बात पर निर्भर करता है कि पाठक भी व्यक्त मनस्थिति से कितना परिचित है। यदि ऐसा नहीं है तो कविता असंप्रेषणीय शब्दों का एक समुच्चय बनी अपनी लघुता में भी ऐंठती रहती है।

जब कार्य कम शब्दों में होने लगता है तो मन भी आलस्य में उतरा जाता है। हमारे पूर्वजों और महान ऋषियों ने ज्ञान को संजोने के लिये सूत्र की विधा विकसित की थी। जब एक शब्द भी अतिरिक्त न हो और सारी बात कह भी दी जाये तो अभिव्यक्ति जिस रूप में निकलती है, उसे सूत्र कहते हैं। योगसूत्र, ब्रह्मसूत्र आदि इसी उत्कृष्टता के साक्षात प्रमाण हैं। उनके इस प्रयास में आलस्य नहीं वरन गहन विस्तार को संश्लेषित किये जाने में लगा परिश्रम था, चिन्तन का गहराव और विषय की पूर्ण समझ थी। यदि पतंजलि योगसूत्र के प्रथम चार सूत्रों में विषय को पूर्ण स्पष्ट करने की क्षमता रखते हैं तो वह उनकी अद्भुत मेधा का परिचायक है। मेरे द्वारा अभिव्यक्त कविता की चार पंक्तियाँ मेरे गहराये आलस्य और मन में उमड़ते समग्रभाव के शतांश से अधिक कुछ भी नहीं  है।

समय न मिल पाना, किसी एक विषय में चित्त को ध्यानस्थ न कर पाना और आलस्य की इसी स्थिति ने कविता को प्रधानता दे दी। पहले अध्ययन किये हुये विषयों पर लिखना अच्छा लगता था, मन को संतुष्टि मिलती थी। धीरे धीरे गद्य के स्थान पर कविता आती गयी, नयी कविताओं के सृजन के स्थान पर संचित कवितायें जाने लगीं, सप्ताह में दो ब्लाग के स्थान पर एक ही पर संतोष करना पड़ा और धीरे धीरे नियत समय में कुछ न लिख पाने के कारण उस पर भी २-३ दिन का विलम्ब होने लगा।

यदि सृजनशीलता शान्ति से लिखना जानती है तो वह अन्तःकरण को इस आलस्य के लिये झकझोरना भी जानती है। झकझोरना और भी तीव्रता से होता है जब समयाभाव का कारण भी समाप्त हो गया हो। अब तो मन अस्थिरता और आलस्य ही कारण बचे, समुचित न लिख पाने के। लिखने के लिये पढ़ना पड़ता था, तथ्यों और विचारों को समझना पड़ता है। न लिखने से आत्मोन्नति का प्रवाह रुद्ध सा हो गया, इस कालखण्ड में। 

मन से जूझने का कौन सा उपाय है जो मानव न अपनाता हो। कार्य को न कर सकने के ढेरों कारण लाकर रख देगा आपका मन आपके सामने। आपका मन आपको ही भ्रम में डालने के लिये तत्पर है।

अन्तः कुछ कहने को आतुर है। न जाने कितने ऐसे विषय हैं जिन पर विचारों ने परिश्रम किया है,  न जाने कितनी उलझने सुलझी हैं, सरलता के न जाने कितने समतल देखे हैं, जीवन में कितना कुछ घटा है पिछले दो वर्षों में। संवादहीनता निश्चय ही नहीं रही है पर मन के बादल जमकर नहीं बरसे हैं। दो वर्ष की प्रतीक्षा के पश्चात, इस वर्ष का मानसून भी आशा से अधिक आने की संभावना है। प्लावित मन निश्चय ही कविता के कालबन्ध से बाहर निकलेगा।

30.11.13

क्या बोलूँ मैं

मैं,
बैठकर आनन्द से,
वाद के विवाद से,
उमड़ते अनुनाद से,
ज्ञान को सुलझा रहा हूँ,

सीखता हूँ,
सीखने की लालसा है,
व्यस्तता है इसी की,
और कारण भी यही,
कुछ बोल नहीं पा रहा हूँ । 

3.8.13

संकटमोचक मंगलवार

यदि आप ईश्वर से पूर्ण मन से अपनी समस्याओं का समाधान चाहेंगे तो वह भेजेगा अवश्य। ऐसा ही कुछ हमारे साथ भी हो गया। कुछ दिन पहले सप्ताहान्त में कार्य की प्राथमिकताओं को लेकर तर्कों के पात्र उबाल पर थे, श्रीमतीजी के लिये गृहकार्य और हमारे लिये लेखकीय सत्कार्य महत्वपूर्ण थे। भौतिक और बौद्धिक कार्यों को एक समय में मेरे द्वारा कर पाना या श्रीमतीजी के द्वारा करवा पाना, दोनों ही संभव नहीं था। भौतिक और बौद्धिक कार्यों के बीच का यह संघर्ष पूर्णतया मानसिक हो चला था। एक महीने का राशन या एक महीने का लेखन, निर्णय असमंजस में था। मन ही मन पुकारा, हे प्रभु, कुछ तो संकेत या संदेश भेजो। लगता है कि सुन लिया गया है और घर का संवैधानिक संकट हल होने की प्रतीक्षा में है। जब पूर्णतया हल हो जायेगा और संभावित लाभ मिलने लगेगा, तब ही पता चलेगा कि किसको माध्यम बना कर कैसे समस्या सुलझायी प्रभुजी ने।

जब सप्ताहान्त के दो दिन, शनिवार और रविवार अत्यधिक दवाब में थे तो सप्ताह के किसी अन्य दिन को बचाव में आना ही था, सो मंगलवार मंगल करने आ पहुँचा। अब मंगलवार ही क्यों, यह समझने के लिये कुछ बाजार की महिमा समझनी होगी और कुछ मंगलवार की। आइये समझते हैं कि किसने किसको कैसे प्रभावित किया। मॉल के उदाहरण से स्थिति स्पष्ट करने में सरलता रहेगी।

सप्ताहान्त में मॉलों में अत्यधिक भीड़ रहती है, स्वाभाविक भी है, सबको वही समय मिलता है अपने कार्य निपटाने का, शेष दिन तो कार्यालय बाहर जाने का अवसर ही नहीं देता है। फिल्म देखना हो, मटरगस्ती करनी हो, मनोरंजन करना हो, कहीं बाहर खाना हो, खरीददारी करनी हो, सब के सब कार्य सप्ताहान्त को ही निकल पड़ते हैं। सड़कों में ट्रैफिक जाम को देखने के बाद बंगलोर की जनसंख्या का जो अनुमान लगता है, वह सप्ताहान्त में मॉलों में एकत्र हुये जनमानस को देखकर तुरन्त ही ढेर हो जाता है। मॉल के सबसे ऊपर वाले तल से नीचे देखने पर इतने नरमुण्ड दिखते हैं, मानो लगता हो कि गूगल मैप से काले वृक्षों के किसी वन को निहार रहे हों।

भीड़ का जहाँ अपना आनन्द है, वहाँ व्यवधान भी है। आनन्द उनको, जिनको अपने वहाँ होने की सामाजिक स्वीकृति चाहिये होती है। अच्छा किया यहाँ घूमने चले आये, देखो तो कितने लोग जुट आये हैं। आनन्द उनको भी, जिन्होने औरों को दिखाने के लिये अच्छे अच्छे कपड़े सिलवाये होते हैं। आनन्द उनको भी, जिन्हें अपने उत्पाद बेचने के लिये प्रचार कार्यक्रम करने होते हैं। आनन्द उनको भी, जिनके लिये अधिक भीड़ का होना उनकी प्रेमवार्ता के लिये किसी एकान्त कवच का कार्य करता है। किसी मेले में होने वाले आनन्दकारी भाव मॉल के सप्ताहन्त में आपको मिल जायेंगे। व्यवधान बस उनको रहता है, जो अपना कार्य कर परमहंसीय भाव से शीघ्र बाहर निकलना चाहते हैं। हम कभी आनन्द में तो कभी व्यवधान में जीते हैं, जिस दिन जैसा मनोभाव और परिवेश रहे।

इसके विपरीत सप्ताह के अन्य दिनों में एक शान्ति व्यापी रहती है, लगता है कोई प्रेमी प्रतीक्षा में है, अपने प्रियतम की, जो पाँच दिन बाद पुनः आने वाला है।

यही वे दिन होते हैं, जब मॉल की दुकानों में होने वाला व्यवसाय न्यून होता है। ऐसा नहीं है कि उन दिनों कोई नहीं आता है। लोग आते हैं, पर सायं और रात में और वह भी मुख्यतः दो कारणों से, फिल्म देखने और भोजन करने। अनुभव यह भी बताता है कि लोग जब भी आते हैं, बहुधा दोनों ही कार्य करते हैं और यदि समय मिल सके तो खरीददारी भी कर लेते हैं। अगले दिन कार्यालय जाने की शीघ्रता में तीनों कार्य सुपरमैन के जैसे लगते हैं। जब बंगलोर में यातायात के प्रकोप को देखते हुये मॉल तक आना जाना भी एक कार्य के जैसा ही है, तो यह मानकर चला जा सकता है कि लोगों को दो कार्यों से अधिक निपटाने का समय नहीं मिल पाता है।

उस पर भी मंगलवार का दिन और विशेष है। इस दिन लोगों की धार्मिकता जागृत अवस्था में रहती है और अधिकांश लोग मांसाहार नहीं करते हैं। दक्षिण में लोक व्यंजन मुख्यतः शाकाहारी होने पर भी सप्ताह मेंं एक दो बार स्वाद के लिये मांसाहार करने की जनसंख्या भी पर्याप्त लगती है। वे लोग भी अपने एक दो दिन के स्वाद के लिये मंगलवार को क्रुद्ध नहीं करना चाहते हैं, उसे पवित्र बनाये रखने के लिये हर संभव प्रयास करते हैं। यह जनसंख्या मंगलवार को मॉल में नहीं दिखायी पड़ती है। इसके अतिरिक्त धार्मिकता के प्रभावक्षेत्र में अग्रणी होने के कारण कई लोग मंगलवार का व्रत रखते हैं, ये लोग भी मंगलवार को मॉल में नहीं दिखायी पड़ते हैं।

सप्ताह के सात दिनों में संभवतः मंगलवार ही ऐसा होगा जब मॉल में आने वालों की संख्या न्यूनतम होती होगी। यह तथ्य मॉल वालों को भली भाँति ज्ञात होगा। किसी दिन विशेष में ही क्यों, किस समय मॉल के अन्दर कितने लोग थे, इसकी भी संख्या आधुनिक तकनीक के माध्यम से मॉल संचालकों को ज्ञात रहती होगी।

अब सप्ताह में एक दिन बिक्री शून्य हो जाये तो १५ प्रतिशत हानि तो पक्की है। यही कारण रहा होगा कि मॉल स्थित एक विशेष मल्टीप्लेक्स सिनेमाघर ने फिल्म की टिकटें केवल मंगलवार के लिये १०० रु की कर दी हैं। ये टिकटें सप्ताहन्त में ३०० और सप्ताह के अन्य दिनों में २५० रु तक की रहती हैं। हाँ, भीड देखकर ये फिल्म टिकट भी कुप्पा हो जाते हैं। अब जितने धन में सप्ताहन्त में एक व्यक्ति फिल्म देख सकता है, उतने में मंगलवार के दिन तीन लोग देख सकते हैं। यही तथ्य हमारे लिये वरदान बन कर आया।

एक कुशल गृहणी और धन बचाने के हर अवसर को न गँवाने वाली भारतीय नारी के रूप में हमारी श्रीमतीजी ने फिल्म देखने के लिये मंगलवार का दिन नियत कर दिया। हमें कोई आपत्ति नहीं। उस दिन कार्यालय के पश्चात और सोने के पहले चार पाँच घंटे का समय निकल ही आता है, जिसमें फिल्म देखी और बाहर भोजन किया जा सकता है। यही नहीं, भोजन के प्रतीक्षा समय में हम और पृथु जाकर थोड़ी बहुत खरीददारी भी कर आते हैं। यदि खरीददारी तनिक अधिक होती है तो श्रीमतीजी फिल्म प्रारम्भ होने के पहले जाकर खरीददारी कर लेती हैं, जिससे फिल्म और भोजन बिना किसी व्यवधान के बीते।

ऐसा नहीं है कि हर मंगलवार को ही जाना हो, पर अब हमारे सप्ताहान्त विशुद्ध लेखकीय सत्कार्य में लग रहे हैं। यदा कदा बाहर जाना भी होता है पर वह श्रम नहीं लगता, उसे लेखन के बीच में मध्यान्तर के रूप में भी देखा जा सकता है। जहाँ तक मंगलवार का प्रश्न है, वह वैसे भी कार्यालय से आने के बाद टीवी आदि के सामने बीतता था। कार्यालय से आने के बाद भला मन में इतनी शक्ति कहाँ रहती है कि कुछ नया सोचा जा सके। अब बाहर जाकर सारे कार्य निपटा आने से संतुष्टि की अनुभूति अलग होती है।

यह सुखद स्थिति बहुत भा रही है, बहुत काम आ रही है, पर लगता नहीं है कि यह टिकी रह पायेगी। बाजार के संतुलन में उसका भी स्थायित्व टिका हुआ है। यदि ऐसा हुआ कि हम जैसे परिवार पर्याप्त मात्रा में हो गये और मॉल में मंगलवार को भी चहल पहल रहने लगी तो संभवतः मल्टीप्लेक्स वाले अपना निर्णय बदल दें, तब संभवतः टिकट १०० रु का न रह जाये, तनिक मँहगा हो जाये। तब हमारी श्रीमतीजी संभवतः अपनी रणनीति बदल दें।

हम यह सब क्यों सोचें, जो हो गया है और जो होने वाला है, उसके बारे में विद्वान शोक नहीं करते हैं, हम नहीं कहते, गीता के द्वितीय अध्याय में लिखा है। हम वर्तमान से अत्यन्त प्रसन्न हैं, हमारी पारिवारिक उलझन सुलझाने में बाजार का और मंगलवार का बहुत बड़ा योगदान है। जय संकटमोचक मंगलवार।

29.6.13

महीने भर का ऱाशन या महीने भर का लेखन

सप्ताहान्त के दो दिन यदि न होते तो संभवतः सृष्टि अब तक विद्रोह कर चुकी होती, या सृष्टि तब तक ही चल पाती, जब तक चलने दी जाती। वे सारे कार्य जो आदेश रूप में आपको मिलते रहते हैं, अपना ठौर ढूढ़ने तब भला कहाँ जाते? अच्छा हुआ कि सप्ताहान्त का स्वरूप बनाया गया, और भी अच्छा हुआ कि उसे एक दिन से बढ़ा कर दो दिन कर दिया गया। अब न जाने कितने छोटे मोटे कार्य तो अपने आप ही हो जाते हैं, इसलिये कि कहीं दो दिनों में उनको ढंग से निचोड़ न डाले हम। बड़े बड़े कार्य, जैसे कहीं दूर देश घूमकर आना, ये सारे कार्य भी वरिष्ठों की कृपा की जुगत से हो ही जाते है। जहाँ तक उत्पादकता के प्रश्न हैं, तो देश हर दिन प्रगतिमान है। पहले ६ दिनों में जो निष्क्रिय काल होता था, उसे एक दिन के अवकाश में बदलने के बाद भी शेष पाँच दिनों में लोगों के पास इतना समय रहता है कि अपना कार्य करने के अतिरिक्त बहुत लोग विदेश के आर्थिक संस्थानों की रोजी रोटी चलाते रहते हैं। राज्य सरकारों में कार्यरत बान्धव इससे तनिक ईर्ष्यालु हो उठेंगे, उन्हें अभी भी ६ दिन खटना होता है, पर हर दिन एक डेढ़ घंटा कम।

जब दृष्टि फैलती है तब दृश्य विस्तारित हो जाता है, जब सृष्टि फैलती है तब व्यवस्था विस्तारित हो जाती है, पर जब से सप्ताहान्त फैला है तब से हमें मिलने वाला समय और कम हो चला है। कहते हैं कि जब धन कम रहता है तो व्यक्ति सोच समझ कर व्यय करता है, पर अधिक धन में व्यय भी अधिक होने लगता है और बहुधा व्यर्थ ही हो जाता है। अब घर में सबको कम से कम इतना तो ज्ञात है कि सप्ताहान्त के दो दिन हम सबकी सेवा में लगे रहेंगे। कभी कभी आवश्यक प्रशासनिक कार्य निकल आते हैं, पर प्रशासकों को भी घरेलू कार्य पकड़ाने वालों की कृपा से कनिष्ठगण बचे रहते हैं, कृतज्ञ बने रहते हैं।

मुख्यतः तीन कार्य रहते हैं, बच्चों को कहीं घुमाना, घर का राशन आदि लाना और लेखन कर्म करना। तीन कार्य होने से कई बार व्यस्तता बनी रहती है और विश्राम का समय नहीं मिल पाता है। कई बार सोचा कि इन्हें किस प्रकार सुव्यस्थित करें कि सबके लिये समुचित समय मिल जाये।

बच्चों का कार्य तो अत्यावश्यक है और किसी प्रकार भी टाला नहीं जा सकता है, उसको टालने का सोचते ही दो ओर से ऊष्मा आने लगती है, बच्चे और बच्चों की माँ एक ओर हो जाते हैं। एक सप्ताह में किसी एक स्थान पर ले जाने से ही कार्य चल जाता है, कभी कभी जब व्यस्तता अधिक होती है तो उनको भी हम पर दया आ जाती है और मॉल आदि घूमने से ही कार्य चल जाता है। इस कार्य से हमें सर्वाधिक विश्राम तब मिलता है जब उनके विद्यालयों में सप्ताहान्त के लिये ढेर सारा कार्य पकड़ा दिया जाता है, उस गृहकार्य के लिये विषय सामग्री जुटाने में ही उनका सारा समय निकल जाता है और कहीं घूमने जाने की सुध भी नहीं रहती है उन्हें। उन्हें कार्य के बोझ में डूबा देख अच्छा तो नहीं लगता है, पर क्या करें, समय मिल जाता है अपने लिये तो वह दुख कम भी हो जाता है। पिछले कुछ माह से लग रहा है कि उनके विद्यालय के शिक्षकगण दयालु प्रकृतिमना हो चले हैं अतः अधिक कार्य नहीं दे रहे हैं, फलस्वरूप हर सप्ताह कहीं न कहीं घूमना हुआ जा रहा है।

घर का राशन लाना भी प्रमुखतम कार्यों में एक है, यदि वह नहीं किया गया तो उपवास की स्थिति आ सकती है। न केवल वह कर्म प्राथमिकता से करना होता है, वरन मन लगा कर भी करना होता है। जल्दी जल्दी करने के प्रयास में जितना समय बचता है, उससे दस गुना अधिक समय घर में न जाने कितने ताने सुनने में चला जाता है, हर प्रकार के और हर प्रकार से। जो सूची हाथ में आती है उसका अनुपालन अनुशासनात्मक आदेश की तरह निर्वाह किया जाता है। हर बार बस यही प्रयास कि पिछली बार से अच्छा सामान लाकर अधिक अंक बटोर लिये जायें।

इन दो महाकर्मों के बाद रहा सहा जो समय शेष बचता है, वह सप्ताह में लिखे जाने वाली दो पोस्टों को सोचने और लिखने में निकल जाता है। अब उस समय लिखने का वातावरण हो न हो, मन में विचार श्रंखला निर्मित हो न हो, निर्बाध समय मिले न मिले, कई अन्य कारक रहते हैं जिन पर सीमित लेखन की आस टिकी रहती है। कई बार तो ऐसा भी होता है कि कोई पोस्ट आधी ही लिखी जा पाती है और अपने अधपके रूप में छपने के एक दिन पूर्व तक गले में अटकी रहती है। बहुधा व्यग्रता का स्तर ख़तरे के निशान के ऊपर बना रहता है।

सप्ताहान्त के आकारों और प्रारूपों पर ढेर सा चिन्तन मनन करने के पश्चात हम श्रीमती जी से बोले कि क्या ऐसा नहीं हो सकता कि आप महीने भर का राशन एक बार ही बता दें, एक बार में ही जाकर सारी आवश्यकतायें पूरी कर ली जायें। शेष सप्ताहान्तों का उपयोग हम लेखन के लिये करें। प्रस्ताव सशक्त था, यदि महीने भर में एक ही बार जाना हो तो शेष तीन सप्ताहान्तों का उपयोग निर्बाध लेखन के लिये किया जा सकता है। प्रस्ताव उन्होंने कुछ पल के लिये और हमारे सामने एक प्रति प्रस्ताव रख दिया। क्यों न हम ऐसा करें कि महीने भर का लेखन एक सप्ताहान्त में बैठकर कर लें और शेष समय घर के कार्यों में लगाया जाये?

कभी कभी जब चलाया हुआ तीर या कहा हुआ शब्द घूमकर वापस आ जाता है तो उत्तर देते नहीं बनता है। इसमें दो संकेत स्पष्ट थे। पहला हमारा लेखनकर्म घर के कार्यों में सम्मिलित नहीं था, वह प्रवासी के रूप में पिछले ४-५ वर्षों से इस घर में रह रहा था और घर के सामान्य कार्यों को बाधित कर रहा था दूसरा यह कि यह एक पूर्ण रूप से भौतिक व श्रममार्गी कार्य था। यदि एक लेख ३ घंटे में लिखा जा सकता है तो महीने भर में छपने वाले ८-९ लेखों के लिये २४-२५ घंटे पर्याप्त हैं। उन्हें एक के बाद एक, बिना मानसिक या शारीरिक विश्राम के लिखा जा सकता है।

हम कल्पना में डूब गये कि यदि सच में ऐसा होगा तो क्या होगा? कल्पना कठिन नहीं है, तीन चार लेख पूरे होते होते शब्द घूमने लगेंगे, विचार छिटकने लगेंगे, भ्रम गहराने लगेगा और अन्ततः कपाल निचुड़ने की स्थिति में पहुँच जायेगा। हमें लगा कि प्रति प्रस्ताव हमारे लेखन को पूर्णरूपेण धूलधूसरित करने के लिये रखा गया है। हमने समझाने का प्रयास किया कि माह भर का राशन तो एक साथ आ सकता है पर माह भर का लेखन एक साथ बाहर नहीं आ सकता। सृजन कर्म की गति मध्यम होती है, जबकि पाँच किलो की बोरी के स्थान पर दस किलो की बोरी आ सकती है।

अब हमारे चिन्तन के स्थान पर प्रति चिन्तन प्रारम्भ हो गया, उत्तर आया कि महीने भर क्या क्या बनाना है, यह एक बार में कैसे निर्धारित किया जा सकता है? मान लिया हम लोग अपने लिये कोई भोजनचर्या नियत भी कर लें, पर तब क्या होगा जब कोई अतिथि आयेगा, तब क्या होगा जब कोई बच्चा हठ करेगा, तब क्या होगा जब आपको सहसा कुछ विशेष खाने का मन करने लगेगा? जीवन इस प्रकार से एकरूपा चलाने से उसमें घोर नीरसता आ जायेगी।

हम दोनों अपने तर्कों पर अड़े हैं और जहाँ पर खड़े थे, बस वहीं पर ही खड़े हैं। क्या माह में एक बार के स्थान पर माह में दो बार का प्रस्ताव धरा जाये? माह में तीन बार के स्थान पर दो बार लेखन करने से लेखन की गुणवत्ता तो प्रभावित होगी पर घर के खान पान आदि में विविधता बढ़ जायेगी। सुधीजनों का और अनुभव के पुरोधाओं का क्या मत है?

29.5.13

मानसिक विलास

एक मित्र महोदय से कहा कि इस नगर में कोई ऐसा स्थान बतायें जहाँ चार पाँच घंटे शान्तिपूर्वक मिल सकें, पूर्ण निश्चिन्तता में। मित्र महोदय संशय से देखने लगते हैं, आँखों में एक विनोदपूर्ण मुस्कान छा जाती है उनके। इस नगर में एकान्त की खोज के अर्थ बहुत अच्छे नहीं माने जाते हैं, कई युगल बाग़ों, बगीचों, मॉलों और त्यक्त राहों में एकान्त की खोज करने में प्रयत्नशील दिख जाते हैं। भविष्य के रोमांचित और प्रेमपूर्ण स्वप्नों का सृजन भीड़भाड़ वाले स्थानों पर हो भी नहीं सकता है, उसके लिये एक दूसरे पर एकांगी ध्यान देना होता है, हावों भावों को पढ़ना पड़ता है, कुछ न कुछ बनाते हुये बताना पड़ता है।

उनका अर्थ समझ कर कुछ बता पाता, उसके पहले उन्होंने मेरे बारे में पूरी फ़िल्म तैयार कर डाली। जैसा हमारी फ़िल्मों में होता है कि सोच कर कुछ और जाओ, निकलता कुछ और है, वही उनके साथ भी हुआ। हमने कहा कि यह समय लिखने के लिये चाहिये, एक सप्ताह में चार पाँच घंटे ऐसे मिल जायें तो न केवल साहित्यिक प्रतिबद्धताएँ पूरी होती रहेंगी वरन भविष्य के मार्ग भी दिखने लगेंगे। एकान्त में चिन्तनशीलता गहरे निष्कर्ष लेकर आती है, विषय स्पष्ट हो जाते हैं। व्यवधान से न केवल समय का आभाव हो जाता है वरन लेखन का तारतम्य भी टूट जाता है।

अब मित्र महोदय के मुख पर चिन्ता की रेखायें थीं, उन्हें लगा कि क्या घर में लेखन को लेकर कोई विरोध है, लेखन में वांछित सहयोग मिल पा रहा है या नहीं? बताया कि लिखने से श्रीमतीजी कभी नहीं रोकती हैं, न कभी कोई कटाक्ष भी करती हैं, प्रार्थना करने से चाय आदि बना कर मेज़ पर ही दे जाती हैं। बच्चे भी लेखन निमग्न पिता को छोटी छोटी बात के लिये नहीं टोकते हैं, समस्या गम्भीर होने तक की प्रतीक्षा कर लेते हैं। पड़ोसी भी अच्छे हैं, कभी ऊँचे स्वर में संगीत आदि नहीं बजाते हैं। हाँ, घर से थोड़ी दूर पर एक व्यस्त नगरमार्ग अवश्य है, जिसमें वाहनों के चलने की ध्वनियाँ घर में घुस आती हैं, पर वे ध्वनियाँ भी पंखे आदि उपकरणों के पार्श्व में छिप जाती हैं।

तब क्या समस्या है श्रीमानजी, आप तो बड़े सौभाग्यशाली हैं। इतिहास साक्षी है कि लेखकों ने सारे विरोधों के होते हुये भी इतना उत्कृष्ट लेखन किया है, पारिवारिक और सामाजिक अपेक्षाएँ को निभाते हुये भी रत्न प्रस्तुत किये हैं। क्या कारण है कि आप लेखन को लेकर इतने सुविधाभोगी हुये जा रहे हैं? कल कहेंगे कि एकान्त भी आपकी लेखकीय क्षमता नहीं उभार पा रहा है, आपको पहाड़ चाहिये, नदी चाहिये, सागर चाहिये। बंगलोर में झील और बाग़ तो मिल जायेंगे, पहाड़, नदी, सागर आदि कहाँ से लायेंगे? लेखकीय एकान्त में कल्पनालोक की बातें तो बतिया लेंगे, पर जीवन के सच अपना आधार खोने लगेंगे वहाँ। व्यस्त समाज में रह कर स्वस्थ लेखन कीजिये। क्या साहित्यिक रोगी की तरह एकान्त में स्वास्थ्य लाभ करने जाना चाहते हैं?

कितने निर्मल भावों से एकान्त की अभिलाषा जतलाई थी, अपने लेखकीय उद्यम के लिये, पर न जाने हमारे ऊपर कितनी विकृतियों का दोषारोपण कर दिया गया। कहीं कोई ऐसी अनूठी बात तो हमने की नहीं, सारे गम्भीर लेखक विषय पर स्वयं को केन्द्रित करने में एकान्त का सहारा लेते हैं, प्रकृति के विस्तारित सौन्दर्य का सहारा लेते हैं। एक बड़े लेखक के बारे में कहीं पढ़ रहा था कि उनके सुबह के तीन चार घंटे विशुद्ध चिन्तन और लेखन में बीतते हैं, मन का ध्यान और घनीभूत हो, इसलिये वे तीरंदाज़ी का भी अभ्यास करते हैं। हमने भी अपने खेल सचिव को तीरंदाज़ी की किट लेने के लिये कहा है, आशा है उससे लेखकीय उद्यम तनिक और गुणवत्ता भरा हो जायेगा।

उत्तम विचार बड़ा मानमनौव्वल करवाते हैं, उन्हें एकांगी ध्यान देकर मनाना पड़ता है, भीड़ भाड़ देखकर तो वे आते ही नहीं हैं। उन्हें अवतरित होने के लिये उपयुक्त वातावरण चाहिये। यद्यपि स्रोत ज्ञात नहीं होता है विचारों का, पर यह अनुभव अवश्य है कि जब मन की स्थिति अच्छी होती है तो भावों को शब्द मिलने लगते हैं। प्राचीन काल में ऋषि मुनि भी प्रणायाम और ध्यान से सशक्त हुये मन में विचारों को आमन्त्रित करते थे और सूक्तों की रचना करते थे। उनके विचारों की उत्कृष्टता भले ही न हमें लब्ध हो पर एकान्त में बैठ कर विचारों के आवागमन को समझने का प्रयास तो कर ही सकते हैं।

सूत्रबीज कई स्थान से प्राप्त हो जाते हैं, सर्वाधिक उपयुक्त स्थान चर्चायें हैं, सुधीजनों के संग। बात कोई स्वरूप लिये प्रारम्भ नहीं होती है, किसी छोटी से बात से गहरे विचारों में उतर जाती है। उनमें से कुछ बीज सूत्र बन चिन्तन में बस जाते हैं और एकान्त पा धीरे से निकलते हैं, विस्तारित होते हैं, कई शाखायें, कई संबंध, कई निष्कर्ष और कई उद्घाटन, न जाने किन किन रूपों में वे सूत्रबीज बिखर जाते हैं। सूत्रबीज फिर भी नष्ट नहीं होते हैं, भविष्य के लिये सुरक्षित हो जाते हैं, आगामी सूत्रबीजों के साथ इन्द्रधनुष सा फैल जाते हैं, विचारों के विस्तृत वितानों में।

सूत्रबीज अनुभव से मिलते हैं, बच्चों के निर्मल व्यवहार से मिलते हैं, प्रकृति के विस्तार से मिलते हैं, और भी न जाने कितने स्रोत हैं उनके। उस समय हम बस ग्रहण करते हैं, कुछ भी अभिव्यक्त नहीं कर पाते हैं। उन सबको समाहित करने और संश्लेषित कर व्यक्त करने के लिये एकान्त चाहिये। विचारों को मथना पड़ता है, संभावनायें पाने तक थकना पड़ता है।

थोड़ी और बात करने पर मित्र महोदय ने बताया कि उनका पर्याप्त लेखन एक होटल की खुली छत पर हुआ है। सायं समय मिलने पर वहाँ चले जाते थे, अधिक लोग वहाँ नहीं आते थे, आसपास गमले में लगे पेड़ पौधे, शीतल मंद पवन, वाहनों का स्वर ६ तल नीचे छूटता हुआ और ऊपर खुला विस्तृत आकाश। एक पूरा वातावरण मिलता था वहाँ, एकान्त और प्रवाह प्रधान। एक चाय, वेटर भी आपको समय और स्वतन्त्रता देते हुये, तब दो घंटे के बाद सृजित साहित्य के सहस्र शब्द। मुझे कल्पना भर कर लेने से ही एक प्रतियोगितात्मक ईर्ष्या हो आयी, काश मुझे भी कोई ऐसा स्थान मिल गया होता। एक दो बार कॉफ़ी डे में ध्यानस्थ होने का निष्फल प्रयास कर चुका हूँ, युगलों की व्यस्तताओं और व्यग्रताओं ने हर बार ध्यान भंग कर दिया।

आप अपने मानसिक विलास के लिये कौन सा स्थान ढूंढ़ते हैं, अपने घर में क्या उतना फैल कर लेखन कर पाते हैं? यदि हाँ, तो ज्ञान की कुछ फुहारें हम पर भी बरसा दीजिये।

11.5.13

ब्लॉग व्यवस्था, तृप्त अवस्था

गूगल रीडर में बढ़ते बढ़ते ब्लॉगों की संख्या ६५० के पार पहुँच गयी। तकनीक और न्यूनतम जीवन शैली विषयक लगभग ५० ब्लॉग निकाल दें, तब भी हिन्दी से जुड़े लगभग ६०० ब्लॉगों की बड़ी सूची का होना यदि कुछ इंगित करता है, तो वह अन्तर जिसे हर दिन पूरा करने के लिये कुछ न कुछ नया पढ़ते रहना आवश्यक हो जाता है। पढ़ने वाले ब्लॉगों की संख्या चाह कर भी कम नहीं कर पा रहा हूँ, यह भी इंगित करता है कि अच्छे बुरे ब्लॉगों में अन्तर की समझ भी विकसित होना शेष है, मेरे साहित्यिक पथ में। पिछले ४ वर्षों में जो भी रोचक लगता गया, सूची में स्थान पाता गया। कई और श्रेष्ठ ब्लॉगों को सूची में होना था, पर दुर्भाग्य ही कहा जायेगा मेरा कि उनसे परिचय न हो सका अब तक। संचित और अपेक्षित के बीच का अन्तर इस क्रम में तीसरा है, जो इतने ब्लॉग होने के बाद भी सूची को अपूर्ण ही रखे हुये है।

कई नवागंतुक बहुत अच्छा लिखते हैं। कई उदाहरण देखे हैं जिसमें प्रारम्भिक किरणों की झिलमिलाहट एक आशा के सूर्य का आभास देती है। उनको पढ़ना इसलिये अच्छा लगता है कि उनके लेखन की चमक में कभी अपना अँधेरा भी दिख जाता है। उनका लेखन पथ निश्चय ही हिन्दी साहित्य का राजमार्ग बनने की क्षमता रखता है और बनेगा भी, पर यदि थकान, निराशा और उपेक्षा उन्हें उनके पथ से डिगने न दे। उनके लेखन पर उत्साह के दो शब्द कहने वाला सदा कोई न कोई रहे अवश्य, विशेषकर तब, जब रात हो, एकान्त हो और विचारों का अँधेरा घुप्प हो। इसके अतिरिक्त बहुत से ऐसे लेखक और कवि हैं, जिन्हें परिचय के चौराहे मिले ही नहीं, जिन्हें कोई स्थापित ठिकाना दिखा नहीं। उन्होंने लिखा, पर समुचित मान न पाकर उनका उत्साह हिन्दी साहित्य में स्थिर न रह पाया और उन्होने अपनी ऊर्जा के लिये कोई और अभिरुचि खोज ली। अपनी आलोचनात्मक तीक्ष्णता के बाद भी हमारी उन तक न पहुँच पाने की असमर्थता एक और अन्तर प्रस्थापित कर देती है, जिसके उस पार हमारा उत्थान सुनिश्चित है।

किसी मित्र को अंग्रेजी में लिखते हुये पाता हूँ तो उन्हें हिन्दी में लिखने का आग्रह करने से नहीं चूकता हूँ। लगता है कि यही विचार, यही चिन्तनशीलता यदि हिन्दी को अपना माध्यम बना लेगी ,तो मेरे जैसे न जाने कितने हिन्दीभाषी जो अच्छे लेखन की राह तकते हैं, तृप्त हो जायेंगे। उन्हें भी लगता होगा कि हिन्दी का विस्तार क्षेत्र उतना वृहद नहीं, आर्थिक संभावनायें उतनी सुदृढ़ नहीं, जो उत्साह बनाये रखने में समर्थ हों, क्षमतायें दोहित करने में समर्थ हों। उल्टा जब मुझे वे लोग अंग्रेजी में लिखने को प्रेरित करते हैं तो बस मुस्करा कर रह जाता हूँ। दासता की खनक और ममता का आग्रह, यह अन्तर उन्हें समझा पाने में लगने वाले प्रयास को एक मुस्कराहट से ही व्यक्त कर देता हूँ।

निश्चय ही अभी जो स्थिति है उसमें जितने लोग इण्टरनेट पर पढ़ते हैं, उसमें अंग्रेजी जानने वालों की संख्या बहुत अधिक है। यही कारण हो सकता है कि अंग्रेजी में लिखना अधिक आकर्षक लगे, अधिक प्रभावित करे। जिस गति से इण्टरनेट का विस्तार हो रहा है, आने वाले दिनों में हिन्दी पाठकों की इतनी संख्या तैयार हो जायेगी कि लेखकों को पर्याप्त रूप से पढ़े जाने का बोध होने लगेगा। हर एक नये लेखक के रूप में एक नया पाठक मिल रहा है ब्लॉग जगत को, अतः नये लेखकों का स्वागत उन्मुक्त रूप से किया जाना चाहिये।

गूगल रीडर बन्द होने की सूचना के बाद से ही मन में भय बैठ गया है कि एक अच्छे मेले के आभाव में लेखकों और पाठकों का संपर्क और कम हो जायेगा। १ जुलाई के बाद क्या सारी फीड वैसे ही सुरक्षित रह पायेगी जैसी अभी तक है। कई अन्य सेवाप्रदाताओं ने यह आश्वासन तो दिया है कि सब कुछ पहले जैसा ही रहेगा, पर तकनीक से अपरिचित न जाने कितने लेखक और पाठक अपना संपर्क खो देंगे, यह भय अभी भी है। मन में विचार आया कि कम से कम उन श्रेष्ठ ब्लॉगों को चिन्हित तो कर लूँ जिन्हें नियमित पढ़ते रहना हुआ है और यदि आवश्यकता पड़ी तो उन्हें पुनः एक एक करके अपनी नयी सूची में डाल लूँगा। इस कार्य को करने में तीन चार दिन अवश्य लग गये पर उस अनुभव में जो तथ्य सामने आये, उन्होंने मुझे एक पाठक के रूप में अन्दर तक हिला कर रख दिया है।

६०० की सूची में लगभग १२५ ब्लॉग ऐसे मिले जिसमें पिछले एक वर्ष से कुछ भी नहीं लिखा गया है। उनमें लगभग २५ ऐसे थे जो नये डोमेन में चले गये और लेखन की सततता बनाये हुये हैं। १०० ब्लॉग या कहें कि लगभग २० प्रतिशत ब्लॉग ऐसे थे जो निष्क्रिय हो चले। उनमें कई नाम ऐसे थे जो यदि बने रहते तो निश्चय ही साहित्य को लाभान्वित करते। उन्होने क्यों लिखना बन्द किया, उसके क्या विस्तृत कारण थे, इसके मूल में जाना कई चर्चाओं को जन्म दे देगा, पर यह तथ्य गहरे भेदता है कि ३ वर्ष में यदि स्थापित २० प्रतिशत ब्लॉग निष्क्रिय हो जायेंगे तो इस क्षेत्र में स्थापित लेखन का क्षरण लगभग ७ प्रतिशत प्रतिवर्ष हो जायेगा। मैं उन ब्लॉगों की बात ही नहीं कर रहा हूँ जो प्रारम्भिक वर्ष में ही अस्त हो जाते हैं, उनका प्रतिशत तो कहीं अधिक होगा। संभव है कि आधे से अधिक लोग प्रथम वर्ष में ही ब्लॉग छोड़कर चल देते हों।

फिर भी पिछले दो माह में न जाने कितने ब्लॉगों को उनके तीन-चार वर्ष पूरे होने की बधाई दे चुका हूँ, वे सारे ब्लॉग के प्रकाशित स्तम्भ हैं। जो उससे भी अधिक समय से लिख रहे हैं और अब तक नीरसता और एंकातता को प्राप्त नहीं हुये हैं, उनके हाथ में ही साहित्य का भविष्य सुरक्षित है, वही लोग हैं जो ब्लॉग को साहित्य से जोड़ देंगे। तब संभवतः साहित्यकार का बनना ब्लॉग जैसे व्यापक और सूक्ष्म स्तर से भी हो सकेगा। जहाँ इतने प्रवाह किसी धारा के लिये सुरक्षित रहेंगे, वह प्रवाहमयी धार दर्शनीय होगी।

इस प्रवाहमयी तन्त्र में जो ब्लॉग अपने आप को बचाये रहना चाहते हैं, उन्हें धैर्यपूर्वक लिखते रहना पड़ेगा, पहले तीन वर्ष, फिर पाँच वर्ष, फिर न जाने कितना और। हर सप्ताह दो पोस्ट, यदि दो संभव न हो तो कम से कम एक तो निश्चय ही। तब सूची से जो १२५ ब्लॉग अपना लेखन खो चुके हैं, वैसा पुनः नहीं होगा। संभव है कि तीन वर्षों बाद जब मैं पुनः समीक्षा करने बैठूँ तो सभी अच्छे ब्लॉग नियमित मिलें।

मुझे न जाने कितने अन्तर पाटने हैं, पर यदि अन्तर पाटने के पहले से दूसरा किनारा साथ छोड़कर चला जायेगा तो वह अन्तर कभी नहीं पट पायेगा, प्यास बढ़ती ही जायेगी। नये लेखक एक ओर से किनारा भरेंगे, पुराने लेखक दूसरे छोर को स्थापित रखेंगे, उसके बाद जो समतल तैयार होगा, उसमें सबके लिये स्थान होगा। मैं सारे निष्क्रिय ब्लॉगों को एक फोल्डर में एकत्र करके रख रहा हूँ, आशा है कि उसमें से कुछ दिनों के बाद नयी पोस्टें आनी प्रारम्भ हो जायेगीं। इन १२५ ब्लॉगों की कमी नये लेखक पूरी करेंगे अतः आने वाले दिनों में कई ब्लॉग संकलकों को मथ कर पढ़ने का प्रयास करूँगा।

पता नहीं यह क्रम कब तक चलेगा? ब्लॉग से मन भरने का प्रश्न ही नहीं, यह एक तृप्त व्यवस्था है, बस चलते रहें प्रवाह के साथ, जहाँ तक संभव हो सके।

15.12.12

पढ़ते पढ़ते लिखना सीखो

पिछले कई दिनों से पढ़ रहा हूँ, बहुत पढ़ रहा हूँ, कई पुस्तकें पूरी पढ़ी, कई आधी अधूरी चल रही हैं। रात में बच्चों के सोने के बाद पढ़ना प्रारम्भ करता हूँ तो कब घड़ी को दोनों सुईयाँ तारों की दिशा दिखाने लगती हैं, पता ही नहीं चलता है। सुबह शीघ्र उठने में कठिन परिश्रम करना पड़ता है, दिनचर्या अलसायी सी प्रारम्भ होती है तब।

माताजी पिताजी घर आये हैं, पिताजी आज भी सुबह ५ बजे उठ जाते हैं और योग भी करते हैं। पृथु अपने बाबा के प्रिय हैं, सुबह उठने से लेकर रात कहानी सुनने तक साथ लगे रहते हैं। तो स्वाभाविक है कि पृथु भी सुबह योग करते हैं और उसके बाद पढ़ने भी बैठ जाते हैं। एक पीढ़ी ऊपर और एक पीढ़ी नीचे, दोनों ही हमें अधिक सोने वाला और आलसी समझते हैं और उसी दृष्टि से देखते भी हैं। 'उठने का समय मिल गया पापा को', कौन भला यह कटाक्ष झेल पायेगा। सारांश यह है कि हम नित ही अंक खोते जा रहे हैं, पता नहीं कि बाद में पृथु को अनुशासित रख पाने का अधिकार भी रख पायेंगे या नहीं।

बाजी हाथ से फिसल रही है, तेजी से, पर उसका अधिक हानिबोध नहीं है। असली समस्या यह है कि अधिक पढ़ने के क्रम में लिखना भी कम हुआ जा रहा है, सप्ताह में दो पोस्ट भी लिखने में इतना जूझना पड़ रहा है कि लिखा हुआ एक एक शब्द लाखों का लगता है। चेहरे से बच्चों को पता लग जाता है कि बुधवार या शनिवार आने वाला है और पापा ने अपनी पोस्ट लिखी नहीं है। ऐसा दिखने पर हमें बहुधा उस उल्लास और कार्यक्रम में सम्मिलित नहीं किया जाता है जो घर के शेष लोगों ने बनाया होता है। लिखना भी नहीं हो पाता है, मन ललचाता भी रहता है, एक विशिष्ट रूप लेता जा रहा है हमारा जीवनक्रम।

ऐसा पहली बार नहीं हैं कि लिखने और पढ़ने को साथ साथ चलने में समस्या न आयी हो। जब लिखना अधिक होता है तो पढ़ना पूरी तरह रुक सा जाता है, महीनों कोई पुस्तक उठाने का मन नहीं करता है। अब जब पुस्तकों को महीनों का शेष चुकाने बैठे हैं तो लिखने का मन नहीं हो रहा है। समय की कमी एक कारण अवश्य होगा, होना भी चाहिये, आप कितने भी विशिष्ट समझ लें स्वयं को, घंटे तो २४ ही मिलेंगे एक दिन में। चाह कर भी एक मिनट अधिक नहीं मिलेगा। यदि अधिक कर सकने के लिये अपनी कार्य क्षमता बढ़ाने का उपाय करना चाहूँ तो वह भी नहीं हो पा रहा है, क्योंकि मन की माने तो सुबह उठकर योग करने के लिये भी समय चाहिये। अब समस्या इतनी गहरा गयी है कि बिना गोता मारे उपाय निकलेगा भी नहीं।

धीरे धीरे मन को मनाने से दिनचर्या की समस्या तो हल हो भी जायेगी, पर एक और बौद्धिक समस्या सामने दिखती है जो लिखने में रोड़ा अटका रही है। सतही देखा जाये तो समस्या है, गहरे देखा जाये तो संभावना है। यदि आप कोई अच्छी पुस्तक पढ़ते हैं तो उस लेखक से संवाद करते हैं। पुस्तक जितनी रोचक होती है, संवाद उतना गहरा होता है, उतना ही अन्दर आप उतर जाते हैं। पुस्तक पढ़ने के बीच जो समय मिलता है, उसमें आप उसी संवाद पर मनन करते हैं। पहले तो पठन औऱ फिर उसी पर मनन, इसी में सारा समय निकल जाता है, कुछ समय ही नहीं बचता कुछ संघनित करके बरसाने के लिये। इतना समेट लेने की व्यग्रता रहती है कि कुछ निकालने का समय ही नहीं रहता है। हाँ, यह बात तो है कि जो भी संवाद होता है, वह कभी न कभी तो बाहर आयेगा, कई बार गुनने के बाद, बस यही संभावना है, बस यही सान्त्वना है।

न लिख पाने का एक और कारण भी समझ में आता है, पढ़ने और लिखने का स्तर एक सा न होना। अच्छे लेखक को पढ़ने में बौद्धिक स्तर इतना ऊँचा उठ जाता है कि तब नीचे उतर कर लिखने का साहस नहीं हो पाता है, अपनी लेखकीय योग्यता पर संशय होने लगता है। जब पकवानों की उपस्थिति आप के घर में हो तो आपकी अधकच्ची, अधपकी और चौकोर रोटी कौन सुस्वादु खा पायेगा? यही संशय तब धड़कन में धक धक करता रहता है और आप उसकी थाप को अपने ध्यान से हटा नहीं पाते हैं। जब साहित्य और सृजनता मंद मंद बयार के रूप में बह रही हो, तब अपने मन के अंधकार को टटोलने का मन किसका करेगा, विस्तार के आनन्द से सहसा संकुचित हो जाना किसको भायेगा भला?

यह समस्या मेरी ही नहीं है, कई मित्र हैं मेरे, जब वे अच्छा पढ़ने बैठते हैं तो लिखना बन्द कर देते हैं। बहुत से ब्लॉगर ऐसे हैं जिन्होंने लिखना कम कर दिया है। उनका लिखा पढ़ने को कम मिल रहा है, उसका दुख तो है, पर इस बात की प्रसन्नता है कि वे निश्चय ही बहुत ही अच्छा पढ़ रहे होंगे और भविष्य में और धमाके के साथ लिखना पुनः प्रारम्भ करेंगे। डर पर इस बात का है कि कहीं अच्छा पढ़ने की लत में वे लिखना न भूल जायें। सारा ज्ञान स्वयं समा लें, सारा आनन्द स्वयं ही गटक जायें और हम वंचितों के आस भरे नेत्रों को प्यासे रहने के लिये छोड़ दें।

तो प्रश्न बड़ा मौलिक उठता है, कि यदि इतना स्तरीय और गुणवत्तापूर्ण लिखा जा चुका है तो उसी को पढ़कर उसका आनन्द उठाया जाये, क्यों समय व्यर्थ कर लिखा जाये और औरों का समय व्यर्थ कर पढ़ाया जाये। कई लोग इस बौद्धिक गुणवत्ता और पवित्रता को बनाये रखना चाहते हैं और पुरातन और शास्त्रीय साहित्य पढ़ते रहने में ही अपना समय बिताते हैं। अपने एक वरिष्ठ अधिकारी को जानता हूँ, उनका अध्ययन गहन और व्यापक है। उन्हें जब कुछ ब्लॉग आदि लिखने के लिये उकसाया तो बड़ा ही स्पष्ट उत्तर दिया। कहा, प्रवीण, जो भी जानने योग्य है, वह सब इन पुस्तकों में है, यदि कुछ लिखा जायेगा तो वह इसी ज्ञान के आधार पर ही लिखा जायेगा। हम तो इसी के आनन्द में डूबे रहते हैं।

वहीं दूसरी ओर हम हैं कि अपनी समझ को भाँति भाँति प्रकार से समझाने के प्रयास में लगे रहते हैं। जिस प्रकार समझते हैं, अधकचरा या अपरिपक्व, उसी प्रकार व्यक्त करने बैठ जाते हैं। दोष हमारा भी नहीं है, अभिव्यक्ति में व्यक्ति छिपा हुआ है, यह स्वभाव भी है। अभिव्यक्ति कभी कभी इतनी तरल और सरल हो जाती है कि मर्म तक उतर जाती है। मुझे बहुधा यह भी लगता है कि किसी विषय को व्यक्त करने के क्रम में वह हमारे मन में और भी स्पष्ट हो जाता है।

यह दोनों पक्ष इतने सशक्त हैं कि निर्दलीय बने रहना कठिन हो जाता है, पढ़ना आवश्यक है और पढ़ते पढ़ते लिखना भी। यह समस्या हमारी भी है और आपकी भी, उत्तर आप भी ढूढ़ रहे होंगे और हम भी। पर पढ़ते रहने के क्रम में अनुशासन का बाजा नहीं बजने देना है, कल उठना है समय से और पिता और पुत्र दोनों के ही साथ योग भी करना है और ध्यान भी, यह जानने के लिये कि पढ़ते पढ़ते लिखना कैसे सीखा जाये।

26.5.12

बहें, नदी सा

बहने को तो हवा भी बहती है पर दिखती नहीं, जल का बहना दिखता है। न जाने कितने विचार मन में बहते हैं पर दिखते नहीं, शब्दों का बहना दिखता है। कल्पना हवा की तरह बहती है, इधर उधर उन्मुक्त। लेखन का प्रवाह नदी सा होता है, लिखने में, पढ़ने में, सहेजने में, छोड़ देने में।

चिन्तन की पृष्ठभूमि में एक प्रश्न कई दिनों से घुमड़ रहा है, बहुत दिनों से। कभी वह प्रश्न व्यस्तता की दिनचर्या में छिप जाता है, पर जैसे ही ब्लॉग के भविष्य से संबंधित कोई पोस्ट पढ़ता हूँ, वह प्रश्न पुनः उठ खड़ा होता है। प्रश्न यह, कि ब्लॉग जिस विधा के रूप में उभरा है, उसे प्रवाहमय बनाये रखने के लिये किस प्रकार का वातावरण और प्रयत्न आवश्यक है। प्रश्न की अग्नि जलती रही, संभावित उत्तरों की आहुति पड़ती रही, शमन दूर बना रहा, ज्वाला रह रह भड़कती रही।

ऐसा नहीं है कि ब्लॉग के प्रारूप को समझने में कोई मौलिक कमी रह गयी हो, या उसमें निहित आकर्षण या विकर्षण का नृत्य न देखा हो, या स्वयं को व्यक्त करने और औरों को समझने के मनोविज्ञान के प्रभाव को न जाना हो। बड़ी पुस्तकों को न लिख पाने का अधैर्य, उन्हें न पढ़ पाने की भूख, समय व श्रम का नितान्त आभाव और अनुभवों के विस्तृत वितान ने सहसा हजारों लेखक और पाठक उत्पन्न कर दिये, और माध्यम रहा ब्लॉग। सब अपनी कहने लगे, सब सबकी सुनने लगे, संवाद बढ़ा और प्रवाह स्थापित हो गया। एक पोस्ट में एक या दो विचार न ही समझने में कठिन लगते हैं और न ही लिखने में, उससे अधिक का कौर ब्लॉगीय मनोविज्ञान के अनुसार पचाने योग्य नहीं होता है।

यह सब ज्ञात होने पर वह निष्कर्ष सत्य अनुपस्थित था, जिसे जान सब स्पष्ट दिख जाता। कुछ प्रश्न उत्तर की प्रतीक्षा तो अधिक कराते हैं पर उत्तर सहसा एक थाली में परोस कर दे देते हैं। कल ही जब यह पोस्ट पढ़ रहा था, मन में उत्तरों की घंटी बजने लगी।

लेखन नदी सा होता है और हमारा योगदान एक धारा। नदी बहती है, समुद्र में मिल जाती है, पानी वाष्पित होता है, बादल बन छा जाता है, बरसता है झमाझम, नदी प्रवाहमयी हो जाती है, वही जल न जाने कितनी बार बरसता है, बहता है, एकत्र होता है, वाष्पित होता है, उमड़ता है और फिर से बरसता है। नदी को प्रवाहमय बने रहने के लिये जल सतत चाहिये। जल के स्रोत ज्ञान के ही स्रोत हैं, कहीं तो सकल जगत सागर से वाष्पित अनुभव, कभी पुस्तकों के रूप में जमे हिमाच्छादित पर्वत।

महान पुस्तकें एक भरी पूरी नदी की तरह होती हैं, गति, लय, गहराई, और प्रवाह बनाये रखने के लिये ज्ञान के अक्षय हिमखण्ड। रामचरितमानस, गीता जैसी, सदियों से प्रवाहमयी, विचारों की न जाने कितनी धारायें उसमें समाहित। हम अपनी पोस्टें में एक या दो विचारों के जल की अंजलि ही तो बना पाते हैं, अपने सीमित अनुभव से उतना ही एकत्र कर पाते हैं, वही बहा देते हैं ब्लॉग की नदी में। बहते जल में अपनी अंजलि को बहते देख उसे बहाव का कारण समझ लेना हमारे बालसुलभ उत्साह का कारण अवश्य हो सकता है, हमारी समझ का निष्कर्ष नहीं। धारा का उपकार मानना होगा कि आपका जल औरों तक पहुँच पा रहा है, आपको उपकार मानना होगा कि आप उस धारा के अंग हैं।

एक अंजलि, एक धारा का कोई मोल नहीं, थोड़ी दूर बहेगी थक जायेगी। यह तो औरों का साथ ही है जो आपको प्रवाह होने का अभिमान देता है। मतभेद हों, उछलकूद मचे, पर ठहराव न हो, बहना बना रहे, प्रवाह बना रहे। जैसे वही पानी बार बार आता है, हर वर्ष और अपना योगदान देता है, उसी प्रकार ज्ञान और अनुभव की अभिव्यक्ति का प्रवाह भी एक निश्चय अंतराल में बार बार आयेगा, हम निमित्त बन जायें और कृतज्ञ बने रहें।

पढ़ने और लिखने में भी वही सम्बन्ध है, यदि आप अधिक पढ़ेंगे तो ही अधिक लिख पायेंगे, अच्छा पढ़ेंगे तो अच्छा लिख पायेंगे, स्तरीय पढ़ेंगे तो स्तरीय लिख पायेंगे, प्रवाह का सिद्धान्त यही कहता है। संग्रहण या नियन्त्रण का मोह छोड़ दें, आँख बन्द कर बस प्रवाह में उतराने का आनन्द लें।

जिस प्रवाह में हैं, आनन्द उठायें, बहते जल का। बहें, नदी सा।

28.4.12

उन्होनें साथ निभाया

दस दिन की यात्रा थी, पैतृक घर की। बहुत दिन बाद छुट्टी पर गया था अतः अधीनस्थों को भी संकोच था कि जब तक अति आवश्यक न हो, मेरे व्यक्तिगत समय में व्यवधान न डाला जाये। घर में रहने के अतिरिक्त कोई और कार्य नहीं रखा था अतः समय अधिकता में उपलब्ध था। दस में तीन दिन ट्रेन में बीते। वे तीन दिन भी बचाये जा सकते थे यदि श्रीमतीजी की मँहगी सलाह मान हवाई यात्रा की जाती। डॉ विजय माल्या की एयरलाइन सिकुड़ने के कारण अन्य एयरलाइनें सीना चौड़ा कर पैसा कमा रही थीं। उनको और अधिक पैसा दे फार्च्यून कम्पनियों की दौड़ में और तेज दौड़ाया जा सकता था, उससे देश का ही भला होता, हम भले ही गरीबी रेखा के अधिक निकट पहुँच जाते। पर मेरे लिये रेल के प्रति व्यक्तिगत निष्ठा से अधिक महत्वपूर्ण वह अनुभव था जो अपने परिवार के साथ लम्बी ट्रेन यात्राओं में मुझे मिलता है। साथ ही साथ रेल के डब्बे में साथ चलते देश की विविधता और सांस्कृतिक सम्पन्नता का स्वरूप हर बार साधिकार आकर्षित करता है।

हमारी धरती से जुड़े रहने की इच्छा के आगे श्रीमतीजी की हवाई उड़ानें नतमस्तक हुयीं, ३ दिन की रेलयात्रा का अनुभव जीवन में और जुड़ गया। सबने यात्रा का भरपूर आनन्द उठाया, जी भर कर साथ खेले, फिल्में देखी, बातें की। इसके बाद भी पर्याप्त समय था जो कि रेल यात्रा में उपलब्ध था।

जब रेल यात्रा और घर में समय पर्याप्त हो तो लेखन और ब्लॉगजगत में अधिक गतिशीलता स्वाभाविक ही है। बहुत दिनों से समयाभाव में एकत्र होते गये वीडियो आदि के लिंक भी मुँह बाये खड़े हुये थे। ट्रेन में चार्जिंग की ठीक व्यवस्था थी पर नेटवर्क का व्यवधान था, घर में नेटवर्क की क्षीण उपस्थिति थी पर बिजली की अनिश्चितता थी। पिछली यात्राओं में डाटाकार्ड आदि साथ में थे पर अधिक काम में नहीं आये अतः इस बार मोबाइल फोन की जीपीआरएस सेवाओं पर ही निर्भर रहने का मन बनाया गया।

मैकबुकएयर और आईफोन साथ में थे, आईफोन में उपलब्ध इण्टरनेट को हॉटस्पॉट नामक सुविधा से मैकबुकएयर के लिये भी उपयोग में लाया जा सकता था। आईफोन का भारतीय नेटवर्क पकड़ना, उससे इण्टरनेटीय संचार निचोड़ना और उसे हॉटस्पॉट के माध्यम से मैकबुकएयर में पहुँचाना, यह सब प्रक्रियायें देखना शेष थीं। पिछली यात्राओं में जिस तन्त्र का उपयोग किया था उसके परिणाम उत्साहजनक नहीं रहे थे। दोनों ही यन्त्र पहली बार साथ में लम्बी यात्रा में जा रहे थे।

यह तो निश्चय है कि शहरों के पास नेटवर्क अच्छा रहता है और बड़े शहरों के पास गति भी अच्छी मिलती है। अब इसका पता कैसे चले, इसके लिये आईफोन का गूगल मैप सहायक सिद्ध हुआ। यदि सैटलाइट दृश्य न देख कर केवल मैप ही देखा जाये तो नेटवर्क की क्षीण उपलब्धता में भी आईफोन का गूगल मैप आपकी वर्तमान स्थिति और आसपास के शहरों की भौगोलिक स्थिति दे सकता है। उससे पूरी यात्रा में यह निश्चित होता रहा कि किस क्षेत्र में इन्टरनेट का उपयोग करना है और किस क्षेत्र में अन्य लेखन करना है।

जैसे ही इन्टरनेट उपलब्ध होता, गूगल रीडर में अनपढ़े सूत्र खोलते रहते, जब तक इण्टरनेट पुनः लुप्त न हो जाये। नेटवर्क की अनुपलब्धता के क्षेत्र में उन पर टिप्पणी लिखी जाती थी। जिन ब्लॉगों में टिप्पणी के लिये अलग पेज खुलता है, उन्हें भी पहले से खोल कर ही रखा जाता। एक बार सारी टिप्पणियाँ लिख जायें तब पुनः नेटवर्क की प्रतीक्षा रहती, उन्हें एक एक कर पब्लिश करने के लिये। यदि नेटवर्क में और भी देर रही तो समय लेखन में बिताया और भविष्य की रूपरेखा तय की। ३ दिन की यात्रा में कभी ऐसा लगा नहीं कि ब्लॉगजगत से संबंध टूट गया, अपितु इस विधि से यात्रा के समय न केवल अधिक ब्लॉग पढ़ सका और उन पर टिप्पणी भी करता रहा।

घर में नेटवर्क की लुकाछिपी बनी रही, दिन के कुछ समय तो नेटवर्क अनुत्तरित ही बना रहता, फिर भी ट्रेन की तुलना में उसकी उपलब्धता दुगुनी थी। सौभाग्य से बोर्ड की परीक्षा के समय में रात्रि की ३ घंटे की बिजली आपूर्ति राज्य सरकार ने सुनिश्चित की। इसके अतिरिक्त दिन में भी इधर उधर मिलाकर लगभग ४ घंटे बिजली बनी रहती। इतना समय पर्याप्त था दोनों यन्त्रों की पूरा चार्ज रखने का, उनके दिन भर चलते रहने के लिये। मैकबुकएयर की ६ घंटे की व नेटवर्किंग में निरत आईफोन की १६ घंटे की बैटरी पहली बार अपनी पूरी क्षमता प्रदर्शित कर पायीं। लिखने, पढ़ने, ब्लॉगजगत व अन्य क्रम बिना किसी व्यवधान के बने रहे।

बंगलोर में बिजली और हाईस्पीड इण्टरनेट की सतत उपलब्धता ने कभी यह अवसर ही नहीं दिया था कि अपने आईफोन व मैकबुकएयर की सही क्षमताओं को आँक पाता। वाईफाई में आईक्लॉउड के माध्यम से कब दोनों में समन्वय हो जाता था, पता ही नहीं चलता था। दोनों यन्त्रों और आईक्लॉउड के माध्यम से उनके आन्तरिक सुदृढ़ संबंध की परीक्षा ट्रेन यात्राओं में व ऐसे क्षेत्रों में जाने के बाद ही होनी थी जहाँ बिजली, इण्टरनेट और उसकी गति बाधित हो।

थोड़ा स्वयं को अवश्य ढालना पड़ा पर मैकबुकएयर, आईफोन, उनके आन्तरिक समन्वय, देश के नेटवर्क, उसमें उपस्थित इण्टरनेटीय तत्व, बिजली की उपलब्धता, बैटरी की क्षमता, इन सबने मिलकर वह गति बनाये रखी जिससे यात्रा में भी साहित्य कर्म कभी बाधित नहीं रहा। आधारभूत सुविधाओं के गर्त में भी समय निर्बाध बिताकर आये हैं, बस सबका धन्यवाद ही दे सकते हैं कि उन्होंने साथ निभाया।

7.12.11

ब्लॉग लेखन की बाध्यतायें

स्वयं पर प्रश्न करने वाला ही अपना जीवन सुलझा सकता है। जिसे इस प्रक्रिया से परहेज है उसे अपने बोझ सहित रसातल में डूब जाने के अतिरिक्त कोई राह नहीं है। प्रश्न करना ही पर्याप्त नहीं है, निष्कर्षों को स्वीकार कर जीवन की धूल धूसरित अवस्था से पुनः खड़े हो जीवन स्थापित करना पुरुषार्थ है। इस गतिशीलता को आप चाहें बुद्ध के चार सत्यों से ऊर्जस्वित माने या अज्ञेय की ‘आँधी सा और उमड़ता हूँ’ वाली उद्घोषणा से प्रभावित, पर स्वयं से प्रश्न पूछने वाले समाज ही अन्तर्द्वन्द्व की भँवर से बाहर निकल पाते हैं।

ब्लॉग लेखन भी कई प्रश्नों के घेरों में है, स्वाभाविक ही है, बचपन में प्रश्न अधिक होते हैं। इन प्रश्नों को उठाने वाली पोस्टें विचलित कर जाती हैं, पर ये पोस्टें आवश्यक भी हैं, सकारात्मक मनःस्थिति ही तो पनप रहे संशयों का निराकरण करने में सक्षम नहीं। और प्रश्न जब वह व्यक्ति उठाता है जो अनुभवों के न जाने कितने मोड़ों से गुजरा हो, तो प्रश्न अनसुने नहीं किये जा सकते हैं। अन्य वरिष्ठ ब्लॉगरों की तरह ज्ञानदत्तजी ने हिन्दी ब्लॉगिंग के उतार चढ़ाव देखे हैं, सृजनात्मकता को संख्याओं से जूझते देखा है, खुलेपन को बद्ध नियमों में घुटते देखा है, आधुनिकता को परम्पराओं से लड़ते देखा है, प्रयोगों के आरोह देखे हैं, निष्क्रियता का सन्नाटा और प्रतिक्रिया का उमड़ता गुबार देखा है।

प्रतिभा को सही मान न मिले तो वह पलायन कर जाना चाहती है, अमेरिका भागते युवाओं का यही सारांश है। स्थापित तन्त्रों में मान के मानक भी होते हैं, बड़ा पद रहता है, सत्ता का मद रहता है, और कुछ नहीं तो वाहनों और भवनों की लम्बाई चौड़ाई ही मानक का कार्य करते हुये दीखते हैं। समाज में बुजुर्गों का मान उनकी कही बातों को मानने से होता है। भौतिक हो या मानसिक, स्थापित तन्त्रों में मान के मानक दिख ही जाते हैं। ब्लॉग जगत में मान के मानक न भौतिक हैं और न ही मानसिक, ये तो टिप्पणी के रूप में संख्यात्मक हैं और स्वान्तः सुखाय के रूप में आध्यात्मिक। ज्ञानदत्तजी यहाँ पर अनुपात के अनुसार प्रतिफल न मिलने की बात उठाते हैं जो कि एक सत्य भी है और एक संकेत भी। ब्लॉग से मन हटाकर फेसबुक पर और हिन्दी ब्लॉगिंग से अंग्रेजी ब्लॉगिंग में अपनी साहित्यिक गतिविधियाँ प्रारम्भ करने वाले कई ब्लॉगरों के मन में यही कारण सर्वोपरि रहा होगा।

ब्लॉग पर बिताये समय को तीन भागों में बाँटा जा सकता है, लेखन, पठन और प्रतिक्रिया। प्रतिक्रिया का प्रकटीकरण टिप्पणियों के रूप में होता है। प्रशंसा, प्रोत्साहन, उपस्थिति, आलोचना, कटाक्ष, विवाद, संवाद और प्रमाद जैसे कितने भावों को समेटे रहती हैं टिप्पणियाँ। ज्ञानदत्तजी के प्रश्नों ने इस विषय पर चिंतन को कुरेदा है, मैं जिस प्रकार इन तीनों को समझ पाता हूँ और स्वीकार करता हूँ, उसे आपके समक्ष रख सकता हूँ। संभव है कि आपका दृष्टिकोण सर्वथा भिन्न हो, प्रश्नों के कई सही उत्तर संभव जो हैं इस जगत में।

लेखन, पठन और प्रतिक्रिया पर बिताया गया कुल समय नियत है, एक पर बढ़ाने से दूसरे पर कम होने लगता है। अपनी टिप्पणियों को संरक्षित करने की आदत है क्योंकि उन्हें भी मैं सृजन और साहित्य की श्रेणी में लाता हूँ, कई बार टिप्पणियों को आधार बना कई अच्छे लेख लिखे हैं। इस प्रकार मेरे लिये उपरिलिखित तीनों अवयव अन्तर्सम्बद्ध हैं। केवल की गयी टिप्पणियों को ही पोस्ट बनाऊँ तो अगले एक वर्ष नया लेखन नहीं करना पड़ेगा। मुझे यह स्वीकार करना चाहिये कि मेरी टिप्पणियों की संख्या बहुत बढ़ गयी है, आकार कम हो गया है, गुणवत्ता भगवान जाने।

टिप्पणी देने की प्रक्रिया की यदि किसी ज्ञात से तुलना करनी हो तो इस प्रकार करूँगा। जब परीक्षा के पहले किसी विषय का पाठ्यक्रम अधिक होता था तो बड़े बड़े भागों को संक्षिप्त कर छोटे नोट्स बना लेता था, जो परीक्षा के एक दिन पहले दुहराने के काम आते थे। किसी का ब्लॉग पढ़ते समय उसका सारांश मन में तैयार करने लगता हूँ, वही लिख देता हूँ टिप्पणी के रूप में और संरक्षित भी कर लेता हूँ भविष्य के लिये भी। कभी उस विषय पर पोस्ट लिखी तो उस विषय पर की सारी टिप्पणियाँ खोज कर उनका आधार बनाता हूँ। अच्छी और सार्थक पोस्टें अधिक समय और चिन्तन चाहती हैं, लिखने में भी और पढ़ने में भी।

मुझपर आदर्शवाद का दोष भले ही लगाया जाये पर हर पोस्ट को कुछ न कुछ सीखने की आशा से पढ़ता हूँ। यदि कोरी तुकबन्दी ही हो किसी कविता में पर वह भी मुझे मेरी कोई न कोई पुरानी कविता याद दिला देती है, जब मैं स्वयं भी तुकबन्दी ही कर पाता था।

प्रकृति का नियम बड़ा विचित्र होता है, श्रम और फल के बीच समय का लम्बा अन्तराल, कम श्रम में अधिक फल या अधिक श्रम में कम फल, कोई स्केलेबिलटी नहीं। पोस्ट भी उसी श्रेणी में आती हैं, गुणवत्ता, उत्पादकता व टिप्पणियों में कोई तारतम्यता नहीं। इस क्रूर से दिखने वाले नियम से बिना व्यथित हुये तुलसीबाबा का स्वान्तःसुखाय लिये चलते रहते हैं। किसी को अच्छी लगे न लगे, पर स्वयं की अच्छी लगनी चाहिये, लिखते समय भी और भविष्य में पुनः पढ़ते समय भी।

भले ही लोग सुख के संख्यात्मक मानक चाहें पर यह निर्विवाद है कि सुख और गुणवत्ता मापी नहीं जा सकती है। प्रोत्साहन की एक टिप्पणी मुझे उत्साह के आकाश में दिन भर उड़ाती रहती है। सुख को अपनी शर्तों पर जीना ही फन्नेखाँ बनायेगा, ब्लॉगिंग में भी। बहुतों को जानता हूँ जो अपने हृदय से लिखते हैं, उनके लिये भी बाध्यतायें बनी रहेंगी ब्लॉगिंग में, साथ साथ चलती भी रहेंगी कई दिनों तक, पर उनका लेखन रुकने वाला नहीं।

प्रश्न निश्चय ही बिखरे हैं राह में, आगे राह में ही कहीं उत्तर भी मिलेंगे, प्रश्न भी स्वीकार हैं, उत्तर भी स्वीकार होंगे।

19.11.11

लेखकीय मनःस्थिति

कहते हैं कि किसी लेखक की पुस्तक उसके व्यक्तित्व के बारे में सब स्पष्ट कर के रख देती है। सही भी है, जब लेखक किसी पुस्तक में अपना हृदय निकाल के रख दे तो उसके बारे में जानना कौन सा कठिन कार्य रह जाता है? वर्षों का अनुभव जब पुस्तक में आता हो, तो उन वर्षों में लेखक किन राहों से चलकर आया है, पूर्णतया स्पष्ट हो जाता है। पुस्तकों को पढ़ना लेखक से बतियाने जैसा ही है और बात करने से कितना कुछ पता चल जाता है किसी के बारे में।

यह संभव है कि किसी पुस्तक में लेखक के व्यक्तित्व के सारे पक्ष व्यक्त न हो सकें। किसी विषय विशेष पर लिखी पुस्तक के बारे में यह संभव भी है। यदि ध्यान से देखा जाये तो कोई भी विषय अपने से संबद्ध विचारों के एकांत में नहीं जीता है, कहीं न कहीं उस पर लेखक के पूरे व्यक्तित्व का प्रक्षेप अवश्य पड़ता है। विषय को दूर से छूकर निकलती उन विचार तरंगों को समझने में संशय बना रहता है। यदि लेखक जीवित है तो वह संशय दूर कर देता है पर जो हमारे बीच में नहीं हैं वे सच में क्या कहना चाह रहे थे, इस पर सदा ही विवाद की स्थिति बनी रहती है। सर्वाधिक विवाद के बिन्दु मूल विषय से बहुत दूर इन्ही तटीय भँवरों में छिपे रहते हैं।

लेखक से कालखंडीय-निकटता अधिक होने से पाठक उन संदर्भों को समझ लेता है जिन पर वह विषय अवस्थित रहा होगा। तत्कालीन परिवेश और परिस्थिति विषय पर हर ओर से प्रकाश डालते हैं। कालखंड में लेखक जितना हमसे दूर होता है, उसे समझने में अनुमान की मात्रा उतनी ही बढ़ जाती है। इतिहास में गहरे छिपे पन्ने, जो हमें दिग्भ्रमित करते हैं, अपना मंतव्य अपने उर में छिपाये रहते हैं, उनका मूल कहीं न कहीं लेखक के व्यक्तित्व में छिपा होता है।

यदि आपको लेखक के जीवन के बारे में ज्ञात है तो उनका लेखन समझने में जो स्पष्ट दृष्टि आपके पास रहती है, उसमें उनका लेखन और उभरकर सामने आता है। निराला की फक्कड़ जीवन शैली जानने के बाद जब आप सरोज-स्मृति पुनः पढ़ेंगे तो आपके आँसुओं की संख्या और गति, दोनों ही दुगने हो जायेंगे। मीरा के भजन साहित्य की शैली न होकर, अध्यात्म की रुपहली छाया बनकर आयेंगे। सूर, तुलसी, कबीर का व्यक्तिगत जीवन उनके कृतित्व के मर्म को गहराता जाता है।

अब किसी के लेखन से संबंधित विवादित विषयों का निर्णय कैसे हो? किसी महापुरुष व उनके लेखन को स्वार्थवश अपने अनुसार प्रचारित करना तो उन्हें प्रयोग की वस्तु बनाने जैसा हुआ। ग्रन्थों का निष्कर्ष अपने आग्रहों पर आधारित करना भला कहाँ का न्याय हुआ? गीता के ७०० श्लोकों पर हजार से ऊपर टीकायें, प्रत्येक में एक नया ही अर्थ निकलता हुआ, सत्य हजारमुखी कब से हो गया? यह सत्य है कि सत्य के कई पक्ष हो सकते हैं, पर दो सर्वथा विलोम पक्ष एक सत्य को कैसे परिभाषित कर सकते हैं? तर्कशास्त्र के अनुसार यदि किसी तंत्र में दो विरोधाभासी पक्ष एक साथ उपस्थित हैं तो वहाँ कुछ भी सत्य सिद्ध किया जा सकता है, कुछ भी।

किसी के लेखन पर अन्तिम निर्णय केवल लेखक ही दे सकता है, विवाद के विषयों पर अपना कोई आग्रह थोपने से पहले, हमें लेखक की मनःस्थिति समझनी होगी, स्थापित करनी होगी, तार्किक आधार पर, यही एकमात्र विधि है जिससे शब्द का मर्म समझा जा सकता है। आधुनिक शिक्षा पद्धति के प्रभाव में शास्त्रों को दर्शनीय पिटारा मान चुके आधुनिकमना व्यक्तियों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि ग्रंथों की प्रस्तावना में विषयवस्तु, लेखक की योग्यता, पाठक की योग्यता, विषयवस्तु का पाठक से संबंध, लेखन का अभिप्राय, लेखकीय कारणों का वर्णन और अपेक्षित प्रभावों जैसे बिन्दुओं को स्थान मिलता था। यह लेखकीय मनःस्थिति की प्रथम अभिव्यक्ति होती है।

कहते हैं, पुस्तक का प्राकट्य मन में पहले ही हो जाता है, एक समूह के रूप में, एक संकेत के रूप मे, लेखन प्रक्रिया बस उसे शब्दों में क्रमबद्ध उतारने जैसा है, ठीक वैसे ही जैसे हम एक दूसरे से बातचीत करते हैं, ठीक वैसे ही जो पाठकों को समझ में आ सके। पॉलो कोहेलो तो कहते हैं कि पुस्तक लिखना तो किसी से प्यार करने जैसा होता है, आप पहले थोड़ा तटस्थ से रहते हैं, थोड़ा असमंजस सा होता है, थोड़ी शंकायें होती हैं, पर एक बार लेखकीय कर्म में पूर्णतया उतर जाने के पश्चात आपको लगता है कि किस तरह अपना श्रेष्ठ पक्ष रखना है, कैसे इस प्रक्रिया में आनन्द उड़ेलना है, कैसे आनन्द उठाना है? 

इस प्रक्रिया में जो तत्व प्रारम्भ से लेखन के साथ जुड़ा रहता है और जिसके आधार पर लेखन समझना श्रेयस्कर है, न्यायोचित है, तो वह है लेखकीय मनःस्थिति।

15.6.11

लिखें या टाइप करें

इस विषय में कोई संशय नहीं कि लिखित साहित्य ने पूरे विश्व की मानसिक चेतना का स्तर ऊपर उठाने में एक महत योगदान दिया है। सुनकर याद रखने के क्रम की परिणति कालान्तर में भ्रामक हो जाती है और बहुत कुछ परम्परा के वाहक पर भी निर्भर करती है। व्यासजी ने भी यह तथ्य समझा और स्मृति-ज्ञान को लिखित साहित्य बनाने के लिये गणेशजी को आमन्त्रित किया। व्यासजी के विचारों की गति गणेशजी के द्रुतलेखन की गति से कहीं अधिक थी अतः प्रथम लेखन का यह कार्य बिना व्यवधान सम्पन्न हुआ।

व्यासजी और गणेशजी का सम्मिलित प्रयत्न हम सब नित्य करते हैं, विचार करते हैं और लिखते हैं। जब तक टाइप मशीनों व छापाखानों का निर्माण नहीं हुआ था, हस्तलिखित प्रतियाँ ही बटती थीं। कुछ वर्ष पहले तक न्यायालयों में निर्णयों की लिखित-प्रति देने का गणेशीय कर्म नकलबाबू ही करते रहे। अब हाथ का लिखा, प्रशासनिक आदेशों, परीक्षा पुस्तिकाओं, प्रेमपत्रों और शिक्षा माध्यमों तक ही रह गया है, कम्प्यूटर और आई टी हस्तलेखन लीलने को तत्पर बैठे हैं।

ज्ञान-क्रांति ने पुस्तकों का बड़ा अम्बार खड़ा कर दिया है, जिसको जैसा विषय मिला, पुस्तक लिख डाली गयी। इस महायज्ञ में पेड़ों की आहुतियाँ डालते रहने से पर्यावरण पर भय के बादल उमड़ने लगे हैं। अब समय आ गया है कि हमें अपनी व्यवस्थायें बदलनी होंगी, कागज के स्थान पर कम्प्यूटर का प्रयोग करना होगा।

भ्रष्टाचार के दलदल में आकण्ठ डूबी सरकारी फाइलों का कम्प्यूटरीकरण करने में निहित स्वार्थों का विरोध तो झेलना ही पड़ेगा, साथ ही साथ एक और समस्या आयेगी, लिखें या टाइप करें। यही समस्या विद्यालयों में भी आयेगी जब हम बच्चों को एक लैपटॉप देने का प्रयास करेंगे, लिखें या टाइप करें। बहुधा कई संवादों को तुरन्त ही लिखना होगा, तब भी समस्या आयेगी, लिखें या टाइप करें। यदि हमें भविष्य की ओर बढ़ने का सार्थक प्रयास करना है तो इस प्रश्न को सुलझाना होगा, लिखें या टाइप करें।

हस्तलेखन प्राकृतिक है, टाइप करने के लिये बड़े उपक्रम जुटाने होते हैं। एक कलम हाथ में हो तो आप लिखना प्रारम्भ कर सकते हैं कभी भी, टाइपिंग के लिये एक कीबोर्ड हो उस भाषा का, उस पर अभ्यास हो जिससे गति बन सके। सबकी शिक्षा हाथ में कलम लेकर प्रारम्भ हुयी है और इतना कुछ कम्प्यूटर पर टाइप कर लेने के बाद भी सुविधा लेखन में ही होती है। हर दृष्टि से लेखन टाइपिंग से अधिक सरल और सहज है। तब क्या हम सब पुराने युग में लौट चलें? नहीं, अपितु भविष्य को अपने अनुकूल बनायें। हस्तलेखन और आधुनिक तकनीक का संमिश्रण करें तो ही आगत भविष्य की राह सहज हो पायेगी।

टैबलेट कम्प्यूटरों का पदार्पण एक संकेत है। धीरे धीरे भौतिक कीबोर्ड और माउस का स्थान आभासी कीबोर्ड ले रहा है। ऊँगलियों और डिजिटल पेन के माध्यम से आप स्क्रीन पर ही अपना कार्य कर सकते हैं। इसमें लगायी जाने वाली गोरिल्ला स्क्रीन अन्य स्क्रीनों से अधिक सुदृढ़ होती है और बार बार उपयोग में लाये जाने पर भी अपनी कार्य-क्षमता नहीं खोती है। कम्प्यूटर पर अपने हाथ से लिखा पढ़ने का आनन्द ही कुछ और है। कुछ दिन पहले ही एक टचपैड के माध्यम से कुछ चित्र बनायें है और हाथ से लिखा भी है।

ऐसा नहीं है कि आपका हस्तलेखन कम्प्यूटर पहचान नहीं सकता है। अंग्रेजी सहित कई भाषाओं में यह तकनीक विकसित कर ली गयी है और आशा है कि हिन्दी के लिये भी यह तकनीक शीघ्र ही आ जायेगी। ऐसा होने पर आप जो भी लिखेंगे, जिस भाषा में लिखेंगे, वह यूनीकोड में परिवर्तित हो जायेगा। अब आप जब चाहें उसे उपयोग में ला सकते हैं, ब्लॉग के लिये, ईमेल के लिये, छापने के लिये, संग्रह के लिये।

जब स्लेट की आकार की टैबलेट हर हाथों में होंगे और साथ में होंगे लिखने के लिये डिजिटल पेन, जब इन माध्यमों से हम अपने व्यक्तिगत और व्यावसायिक कार्य निष्पादित कर सकेंगे, तब कहीं आधुनिकतम तकनीक और प्राचीनतम विधा का मेल हो पायेगा, तब कहीं हमें प्राकृतिक वातावरण मिल पायेगा, अपने ज्ञान के विस्तार का। बचपन में जिस तरह लिखना सीखा था, वही अभिव्यक्ति का माध्यम बना रहेगा, जीवनपर्यन्त।

9.3.11

देवेन्द्र दत्त मिश्र

पहली बार मिला प्रशासनिक कार्य से, अभिरुचियों की चर्चा हुयी, पता चला साहित्य में रुचि है तो दोनों साथ हो लिये मेरे वाहन में, दो घंटे की यात्रा, संवाद की गूढ़ता में डूबे हम लोगों को ड्राइवर महोदय ने ही बताया कि सर, घर आ गया है। जीवनयात्रा में यात्राओं ने बहुत कुछ दिया है, मिला एक और उपहार, मुझे भी, साहित्य को भी और संभवतः ब्लॉग जगत को भी।

बहुधा ऐसा होता है कि हम अपनी योग्यताओं को अकारण किसी पर थोपते नहीं हैं, एक कारण बहुत ही सौम्य होता है, हमारी विनम्रता, पर उसमें हमें अपनी योग्यताओं का भान सतत रहता है, व्यक्तित्व में गुरुता बनी रहती है। दूसरा कारण प्राकृतिक होता है, फक्कड़ी जैसा, योग्यता गुरुता नहीं लाती व्यक्तित्व में, व्यवहार की सहजता में मात्र प्रसन्नता ही बिखरती है चहुँ ओर, लहरों के उछाल में पता ही नहीं चलता कि सागर कितना गहरा है।

दो घंटों की बातचीत, न जाने कितने पक्ष खोलती गयी, एक के बाद एक, बीज से प्रारम्भ हुआ ज्ञान का वटवृक्ष बन फैलता गया, न जाने कितना क्षेत्रफल समेटे मुठ्ठीभर मस्तिष्क में। मेरा सौभाग्य ही कहेंगे इसे कि मेरे सम्मुख वह खुलते गये।

अनुभव की व्यापकता मशीनी मानव से भिन्न व्यक्तित्व निर्मित करती है, एक विशेष, विशद, समग्र दृष्टिकोण लिये। न जाने कौन सा अनुभव कब काम आ जाये, किस नये क्षेत्र में उसका उपयोग एक क्रान्ति का प्रादुर्भाव कर बैठे, इतिहास भरा पड़ा है ऐसे उदाहरणों से। सामाजिक व व्यवहारिक रूपों में उन अनुभवों का समन्वय जो निष्कर्ष लेकर आता है, उसकी प्रतीक्षा में ही सकल विश्व बाट जोहता बैठा रहता है, हर प्रभात के साथ। मैं मैराथन में अनुभव किये सत्य जब परिवार में लगाता हूँ तो धैर्य जैसे गुणों को सम्मानित स्थान मिल जाता है। लेन्ज का नियम पुत्र के तेवर बताने लगता है। गणित का सवाल हल कर लेने का उत्साह छोटी छोटी बातों में प्रसन्न हो जाना सिखा देता है। अंतरिक्ष की विशालता में स्वयं का स्थान जीवन से गुरुता निकाल फेंकती है। विभिन्न क्षेत्रों के अनुभवजन्य सत्य जीवन का अस्तित्व सुखद करने में लगे हुये हैं।

एक इलेक्ट्रिकल इन्जीनियर, आई आई एम बंगलोर से प्रबन्धन के परास्नातक, मेट्रो प्रोजेक्ट के 6 वर्ष के अग्रिम अनुभव में पके, विदेश में कार्यसंस्कृति के प्रशिक्षण में पगे, अध्यात्म के संदर्भों के जानकार, साहित्य में प्रबल हस्तक्षेप रखने वाले, कवि हृदय, सहजता के सुरवेत्ता और अपने सब गुणों को अपनी फक्कड़ी के भीतर छिपाये देवेन्द्र दत्त मिश्र से जब आप मिलेंगे तो उनकी मुस्कराहटपूर्ण आत्मीयता आपको उनके साथ और संवाद करने को विवश कर देगी।

मेरा स्वार्थ बड़ा साधारण सा था, उन्हे कुछ लिखने के लिये प्रेरित करना। पर मेरा विश्वास उतना साधारण नहीं है, जो यह माने बैठा है कि उनके अनुभव के छन्नों से छनकर जो सृजन उतरेगा, वह साहित्य व ब्लॉग जगत के लिये संग्रहणीय होगा। मेरे कई बार उलाहना देने पर उन्होने अपना ब्लॉग प्रारम्भ कर दिया है और सम्प्रति प्रबन्धन जैसे गूढ़ विषय को हिन्दी में लाने का महत प्रयास भी कर रहे हैं। उन्होने इन्फोसिस के प्रबन्धन पर लिखी पुस्तक को आधारस्वरूप लिया है, इस कार्य के लिये। दर्शन का संपुट, कविता का संप्रेषण, प्रबन्धन की गूढ़ता, सब एक में समाहित।

एक और विमा, साहित्य के घेरे में, संवर्धन की प्रक्रिया कई विषयों के लिये। स्वागत कर लें उनका, उत्साह बढ़ा दें उनका और आशा करें कि क्षमतानुसार और समयानुसार जितना भी लिख पायें वे, लिखते रहें।

इतना ही स्वार्थ हो हम सबका भी।