11.8.26

मैं भोग रहा या स्वयं भुक्त


न कर्मबन्ध, न संस्कार,

न चित्तवृत्ति, न क्लेश पार,

उस ओर अकेले बैठ गया,

मेरा परिचय ही निर्विकार।


न विषय रमण, न झंकृत मन,

न सुख साधन पर सतत मनन,

किस आगत के असमंजस में,

पथ सृजन शून्य, जग निर्जन वन।


न मति विरुद्ध, न भाव क्रुद्ध,

न बंध जटिल, न कंठ रुद्ध,

आलम्बन के एकाग्र क्षितिज, 

द्वन्द्व आलोड़न से विगत बुद्ध।


न शब्द पृथक, न पृथक ज्ञान,

न अर्थ पृथक, अनुभव प्रधान,

सब सम्मिलित होकर हुये एक,

संयम ने साधे समाधान।


न विलग पूर्ण, न पूर्ण विलय,

न बाधित क्रम, अवगुंठित लय,

जगती प्रवाह, पर स्थिर मन,

स्थिर गति, स्थिर हुआ समय।


न मुक्त रहा, न हुआ युक्त,

किस आकर्षण जीवन प्रयुक्त,

कारक, कर्ता, क्रम डोल रहे,

मैं भोग रहा या स्वयं भुक्त।