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22.5.16

विचारों में दावानल

कह दूँ यदि मन की अभिलाषा,
मन मेरा अब तक क्यों प्यासा,
अर्धनग्न कई सत्य छिपाये, हृद आक्रोशित रहता था ।
होठों पर थी हँसी, विचारों में दावानल बहता था । १।

कह दूँ क्यों अकुलाता था मैं,
शब्दों को पी जाता था मैं,
संयम के वश, मन के जलते भाव छिपाये रहता था ।
होठों पर थी हँसी, विचारों में दावानल बहता था । २।

देख रहा हूँ शान्त, अकेला,
व्यक्तित्वों का जड़वत मेला,
इसी काष्ठ से, जीवन भर की आस लगाये रहता था ।
होठों पर थी हँसी, विचारों में दावानल बहता था । ३।


14.6.14

बहुधा

अथक चिन्तन में नहाया,
सकल तर्कों में सुशोभित,
अनवरत ऊर्जित दिशा की प्रेरणा से,
बहुधा बना व्यक्तित्व मेरा ।

चला जब भी मैं खुशी में गुनगुनाता,
ध्येय की वे सुप्त रागें,
अनबँधे आवेश में आ,
मन तटों से उफनते आनन्द में,
क्षितिज तक लेती हिलोरें ।

7.5.14

झम झमाझम

ढाढ़सी मौसम,
बस रसद कम,
जी ले लल्ला,
बैठ निठल्ला,
पानी बरसे,
झम झमाझम। 

27.11.13

मेरे विचार

बहुधा विचार टकरा जाते हैं,
मनस पटल पर आ जाते हैं ।
नहीं जानता किन स्रोतों से,
किस प्रकार के अनुरोधों से,
आवश्यक वे हो जाते हैं,
अवलोकन का प्रश्न उठाते,
चिन्तन पथ पर बढ़ जाते हैं ।।१।।

कभी कभी उद्वेलित करते,
उत्साहों से प्रेरित करते ।
कुछ झिंझोड़ते, मन निचोड़ते,
और कभी मन बहलाते हैं ।
अपनी अपनी छाप छोड़ सब,
आते और चले जाते हैं ।।२।।

शायद मेरा सार छुपा था,
जीवन का आकार छुपा था ।
अभी कहीं वे जीवित होंगे,
अनुपस्थित जो हो जाते हैं ।
आने के अनुकूल समय में,
आयेंगे जो अति भाते हैं ।।३।।

दुख में घावों को सहलाने,
मन का सारा क्लेष मिटाने ।
लाकर अद्भुत शान्ति हृदय को,
चुपके से पहुँचा जाते हैं ।
सुन्दरता से तार छेड़ने,
बिन बुलाये ही आ जाते हैं ।।४।।

24.4.13

फन वेव, हिट वेव

सागर की लहरों में खेलना किसे नहीं भाता है, विशेषकर जब लहरें आपके आकार की आ रही हों। खेल का रोमांच भी वहीं पर होता है, जहाँ पर तनिक जूझना पड़े, जहाँ पर तनिक अनिश्चितता हो। एकतरफा खेल बड़े ही नीरस होते हैं, न देखने में सुहाते हैं और न ही खेलने में।

सागर में उठी किसी भी हलचल को अपना निष्कर्ष पाना होता है, यह हलचल लहरों के रूप में बढ़ती है, ये लहरें किनारे की ओर भागती हैं, यथाशीघ्र। भाग्यशाली लहरों को किनारा शीघ्र मिल जाता है, वे अपनी हलचल में संचित ऊर्जा किनारे पर लाकर पटक देती हैं। जो लहरें सागर के बीचों बीच होती हैं, उन्हें किनारा पाते पाते बरसों लग जाते हैं, वे लहरें अपनी हलचल अपने में समाये रखती हैं, निष्कर्ष को तरसती रहती हैं।

देखा जाये तो मन भी बहुत कुछ सागर की तरह ही होता है, गहरा भी, हलचल भरा भी। न जाने कैसे कोई हलचल उठती है और बनी रहती है, जब तक निष्कर्ष न पा जाये। किनारे व्यक्त जगत है और लहरों का किनारों पर पहुँच जाना अभिव्यक्ति जैसा। किनारे लहरों की अभिव्यक्ति के साक्षी होते हैं और जगत हमारे मन की अभिव्यक्ति का। सागर रत्नगर्भा है, मन में भी विचारों के रत्न छिपे हैं। दोनों के बीच इतना साम्य छिपा है कि नियन्ता की निर्माणशैली में दुहराव सा दिखने लगता है, लगता है कि ईश्वर अलसा गया होगा, जब मन बनाने की बारी आयी तो उसे सागर का रूप दे दिया।

सागर किनारे बैठा हूँ, एक लहर आती है, थोड़ी देर बाद दूसरी। अन्दर का सागर स्थिर सा लगता है पर हलचल बनी रहती है। जलराशि किनारे की ओर आती है, सहसा उसे धरती मिलती है। जहाँ घरती पर संपर्क होता है वह जलराशि वहाँ रुक धरती से बतियाने लगती है, उसके उपर की हलचल चढ़कर आगे निकलना चाहती है, वह आगे की घरती का आलिंगन करने की शीघ्रता में है। एक के बाद एक परत बनती है, उसे उछाल मिलता है, जब तक उठ सकती है, उठती है और जब अव्यवस्थित हो जाती है तो टूट जाती है, फेन बन स्वयं को अभिव्यक्त कर देती है, किनारे में आ समाहित हो जाती है।

कुछ लिखने बैठता हूँ तो विचार भी सागर की लहरों की तरह दौड़े चले आते हैं, कभी सधे सधाये और कभी अनियन्त्रित और अव्यवस्थित, अन्ततः समुचित शब्दों का आकार पा वापस चले जाते हैं, किसी आगामी लहर का साथ देने, आगामी विचार के साथ।

कभी मन के अन्दर जाकर उससे जूझने का प्रयास किया है? अवश्य ही किया होगा, बिना मन से जूझे भला कहाँ कुछ सार्थक निकलता है? जैसे खेल का आनन्द बराबरी वाले से खेलने में आता है, वैसे ही जीवन में अमृत बिना मन मथे आता ही नहीं, ठीक उसी तरह जिस तरह सागर मथा गया था। चाह तो सदा अमृत की ही रहती है, साथ में विष आदि भी आते ही रहते हैं।

बच्चों को देख रहा हूँ, कमर तक की ऊँचाई में खड़े हैं, और आगे जाने के लिये मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं। लहरें पीछे से आ रही हैं, कंधे तक ऊँची, उछलते हैं सर बाहर निकाले रहने के लिये, लहरों के जोर से थोड़ा किनारों तक बढ़ जाते हैं, लहरें वापस चली जाती हैं, पुनः खड़े हो जाते हैं, स्थापित से, आगामी लहर की प्रतीक्षा में। मेरी ओर पुनः निहारते हैं, उन्हें लगता है कि आगामी लहर और ऊँची होगी, और ऊर्जा से भरी होगी, सर के ऊपर से निकल जायेगी, हो सकता है कि किनारे पर भी पटक दे।

बच्चों की आतुरता देखी नहीं जाती है और मैं भी अन्दर चला जाता हूँ, बच्चों को थोड़ा और गहरे में ले जाता हूँ। एक बार निश्चिन्तता आ जाती है तब कहीं जाकर प्रारम्भ हो जाता है खेल का आनन्द। निश्चिन्तता इस बात की कि कोई न कोई है साथ में जो लहरों से ऊँचा और सशक्त है, निश्चिन्तता इस बात की भी कि लहर आयेगी और फिर वापस चली जायेगी, कुछ भी स्थायी नहीं रहेगा। हम तब खेल खेलने तैयार हो जाते हैं।

हर लहर ऊँची नहीं होती, पर हर दस लहरों में एक या दो ऊँची आती हैं, सर के ऊपर और अस्थिर करने की ऊर्जा समेटे। विज्ञान भी नहीं बता पाता कि कौन सी लहर भीषण होगी? हर ऊँची लहर घातक नहीं होती, जो लहर अपना स्वरूप बना कर रखती है, वह आपको ऊपर उछाल देती है, आपको उतराने का आनन्द आता है, आपका अहित नहीं करती है। ऐसी आनन्ददायक लहरों का नाम बच्चों ने 'फन वेव' दिया, आशय आनन्द देने वाली लहरें। जो लहरें आपके पास आने के पहले ही टूट जाती हैं, वे अपनी ऊँचाई और ऊर्जा संरक्षित नहीं रख पाती हैं और जल को श्वेत फेन सा कर के चली जाती हैं, वे थोड़ा विराम भर देती हैं। पर कठिन वे लहरें होती हैं जो ऊँची भी होती हैं और आपके पास आकर टूटती हैं, ये आपको न केवल एक थपेड़ा सा मारती हैं वरन बहुधा आपको पटकनी देकर गिरा भी जाती हैं, इन लहरों को बच्चों ने 'हिट वेव' का नाम दिया।

हम लोगों में यह बताने की प्रतियोगिता थी कि आने वाली लहर फन वेव होगी या हिट वेव। फन वेव में बच्चे मुक्त रहते थे, हिट वेव में आकर चिपट जाते थे या हाथ पकड़े रहते थे। थोड़ा आगे चले जायें तो यही हिट वेव फन वेव बन जाती हैं। बच्चों के साथ यह खेल खेलता रहा, लहरें भी खिलाती रहीं, तब तक, जब तक थक नहीं गये। बाहर निकल आये तब भी लहरों की ध्वनियाँ आकर्षित करती रहीं, पुनः वापस बुलाने के लिये।

सागर को भी ज्ञात है, मन को भी ज्ञात है कि लहरों का और विचारों का एकांगी स्वरूप किसी को नहीं भाता है, विविधता सोहती है, अनिश्चितता मोहती है। फन वेव भी रहेगी, हिट वेव भी रहेगी, सर के तनिक ऊपर और आपसे तनिक सशक्त, जूझना पड़ेगा ही, जीवन का आनन्द उसी से परिभाषित भी है। साथ यह भी समझना होगा, या तो लहर के इस पार रहें या उस पार, लहरों का टूटना संक्रमण है और जो भी संक्रमण झेलता है उसे सर्वाधिक कष्ट होता है।

मन के बारे में थोड़ा और समझना हो तो सागर की लहरों से खेल कर देखिये, बाहर निकलने के बाद आप अपने से और अधिक परिचित हो जायेंगे।

27.3.13

युक्तं मधुरं, मुक्तं मधुरं

होली की पदचाप सारी प्रकृति को मदमत कर देती है। टेसू के फूल अपने चटक रंगों से आगत का मन्तव्य स्पष्ट कर देते हैं। कृषिवर्ष का अन्तिम माह, धन धान्य से भरा समाज का मन, सबके पास समय, समय आनन्द में डूब जाने का, समय संबंधों को रंग में रंग देने का, समय समाज में शीत गयी ऊर्जा को पुनर्जीवित करने का। नव की पदचाप है होली, रव की पदचाप है होली, शान्तमना हो कौन रहना चाहता है।

मन के भावों को यदि कोई व्यक्त कर सकता है तो वे हैं रंग, मन को अनुशासन नहीं भाता, मन को कहीं बँधना नहीं भाता, मन शान्त नहीं बैठ पाता है। मन की विचार प्रक्रिया से हमारा संपर्क 'हाँ या नहीं' से ही रहता है, हमारे लिये मन का रंग श्वेत या श्याम होना चाहिये। पर ध्यान से देखा जाये तो वह रुक्षता हमारी है, हम ही कोई विचार आने पर हाँ या ना चुनते हैं। मन तो हमारे श्वेत-श्याम स्वभाव को भी जीवन्त रखता है, उसमें भावों के रंग भरता है। हमारे श्वेत-श्याम स्वभाव में उत्साह के रंग भरने का कार्य मन ही करता है। होली हमारे मन का उत्सव है।

मन में वर्ष भर सहेजे अनुशासित भाव यह अवसर पाकर भाग खड़े होना चाहते हैं, बिना किसी संकोच के स्वयं को व्यक्त कर देना चाहते हैं। कोई इसे कुंठा की अभिव्यक्ति का अवसर कह दे, कोई अन्तर्निहित उन्मुक्तता को प्रकट कर देने का अवसर कह दे या कोई इसे अधीरों का उत्सव कह दे, पर पूरे वर्ष में मन को उसकी तरंग में जीने का यही एक समय आता है। प्रत्येक होली याद है, दिन भर उत्साह और उमंग में होली का ऊधम और रात में निढाल होकर बुद्ध भाव में शयन, खुलकर जीने का एक दिन, कोई बन्धन नहीं, कोई रोकटोक नहीं, मन का निरुपण, ऊर्जा और रंग के संमिश्रण में। होली इसी रंग भरे और ऊर्जा भरे स्वातन्त्र्य का उत्सव है।

जीवन में अमृततत्व की अनुभूति तभी होती है, जब मन प्रसन्न होता है। सुख को खोज में भटकता और व्यथित होता जीवन जब अपनी खोज त्याग कर एक दिन सुस्ताना चाहता है, तो उसे वर्तमान में जीने का सुख मिलता है, भविष्य की आशंकाओं से परे। जिस क्षण उत्सव मनता है उस समय सुख के संधान को स्थगित कर दिया जाता है, वह सुख के संग्रह को लुटाने का समय होता है। जब सुख लुटता है तभी औरों को सुख मिलता है, आपका सुख संक्रमण फैलाता है। संक्रमण भी ऐसा कि उस दिन कोई कृपणता में नहीं जीना चाहता है। जब लुटाने की होड़ मची हो तो आनन्द अनन्त हो जाता है। होली सुख के संक्रमण का उत्सव है।

जब मन निर्बन्ध हो व्यक्त हो जाये और अनन्त में मुक्त हो विचरण करने लगे तो सुख के स्रोत याद आने लगते हैं हृदय को। वह स्रोत जहाँ आनन्द निर्बाध बहता हो, वह स्रोत जहाँ सब घट प्लावित हो जायें, कोई न छूटा वापस जाये। मुझे मेरा कान्हा याद आता है, वह कान्हा जो हर गोप गोपी को यह भाव देता हो कि उसका प्रेम केवल उसके ही लिये है और पूर्ण है। मुझे ब्रज के गाँव याद आने लगते हैं, जहाँ की गलियों में कान्हा हाथों में रंग भरे ऊधम मचा रहा है, सबके आनन्द का स्रोत। हर कोई कान्हा को छूकर ही आनन्द सागर में डुबकियाँ लगाने लगता हो। कान्हा का टोली के साथ गाँव गाँव जाना याद आता है, बरसाना की लाठी खाना याद आता है, वृन्दावनों के मंदिरों में की गई पुष्पवर्षा याद आती है, गुलाब से सुगंधित पानी की बौछार याद आती है। आनन्द के उद्गार में कान्हा की लीलायें याद आती हैं, ब्रजक्षेत्र में व्याप्त उन्माद की उन्मुक्त तरंगें याद आती हैं। होली कान्हा की स्मृति का उत्सव है।

कान्हा की स्मृति बलशाली है, बलपूर्वक मन को खींच ले जाती है, बचपन से लेकर युद्धक्षेत्र तक के सारे दृश्य सामने आने लगते हैं। कान्हा को कान्हा ही कहना भाता है, कृष्ण कह भर देने से उसमें उपस्थित कृष् धातु मन खींच ले जाती है, शिथिल पड़ जाता हूँ, दूर भाग जाने की बल समाप्त हो जाता है। जानता हूँ कि वह त्रिभंगी कहीं खड़ा मुस्करा रहा होगा, अपने नाम का प्रभाव देख रहा होगा। मन के ऊपर कृत्रिम आवरण हट जाता है, कृष्ण का श्याम रूप बादल सा चहुँ ओर छा जाता है, बाँसुरी धीरे धीरे बजने लगती है, राग यमनकल्याण, व्यासतीर्थ की स्तुति याद आने लगती है, कृष्णा नी बेगने बारो, कृष्ण को वहाँ उपस्थित हो जाने की प्रार्थना मन विह्वल कर देती है। होली मेरे लिये कान्हा के आकर्षण में विह्वल हो जाने का उत्सव है।

आनन्द अनन्त हो जाये तो जगत का कार्य समाप्त कर प्रकृति कहीं विश्राम करने चली जायेगी। तनिक सा स्वाद भर मिलता है, हर स्मृति में। मन जब भी विह्वल हो बाहर आता है, अपने होने की टोह लगती है, अहं स्वयं को स्थापित करने में लग जाता है। मन स्वयं को ब्रह्म मानने लगता है, मु्क्ति पा अपना स्वरूप खो जाना चाहता है, अनन्त में विलीन हो जाना चाहता है। न श्वेत, न श्याम, न कोई रंग, सब त्याग बस एक ज्योतिपुंज में समा जाओ। भय लगता है, मन बाहर भाग आता है। आनन्द की चाह थी, लघु ईश्वर बन प्रकृति को भोग रहे मन को न भक्ति रुचती है, न ही मुक्ति, दोनों में ही समर्पण दिखता है। मूढ़ सा अनुभव होने लगता है, मति भ्रमित हो जाती है। तभी सहसा शंकराचार्य का आदेश याद आता है, भज गोविन्दम् मूढ़मते। मन भजने लगता है, गोविन्द को, जो मन समेत सारी इन्द्रियों का रक्षक भी है। मन प्रसन्न होने लगता है, आकर्षण स्वीकार होने लगता है, विराग अनुराग बन जाता है। होली मेरे लिये अपने अनुराग में बस जाने का उत्सव है।

कृष्ण के विग्रह को देखता हूँ, मुख देखता हूँ, मोरपत्र देखता हूँ, पीत बसन देखता हूँ, बाँसुरी देखता हूँ, चरण देखता हूँ, आँख बन्द कर उसे मन में समेट लेने के लिये, बलशाली मन अपनी सामर्थ्य की सीमा बता देता है, आगे नहीं जा पाता। वल्लभाचार्य के मधुराष्टक का पाठ पार्श्व में गूँजने लगता है, अधरं मधुरं, वदनं मधुरं…मधुराधिपतेः अखिलं मधुरम्। एक एक आश्रय पर मन स्थिर होता जाता है, एक एक दृश्य मधुरता को परिभाषित कर देता है, हर साँस में आनन्द उमड़ने लगता है, सुख अपनी सीमायें तोड़ न जाने कहाँ उतर जाना चाहता है, पूर्णमिदं, मधुरं, हर पग मधुरं। मधुरता की यात्रा सहसा ठिठक जाती है, अर्थ समझ नहीं आता। युक्तं मधुरं, मुक्तं मधुरं, कृष्ण गोपियों के साथ भी मधुर है, उनसे अलग भी मधुर हैं। आश्चर्य होता है, कान्हा इतना निष्ठुर, गोपियों के बिना भी मधुर, प्रेम के सागर को प्रेम व्यापा ही नहीं! होली मेरे लिये असीम की उपासना का उत्सव है।

विचार ध्यानमग्न हो बाहर आते हैं, संकेत पाते हैं, स्वप्न से संकेत, सत्य का संकेत। युक्त भी मधुर, मुक्त भी मधुर, रंगों की तरह, स्वयं में सुन्दर और चढ़ जाये तो भी सुन्दर। हर रंग सक्षम, हर मात्रा सक्षम, हर आकार सक्षम, हर आधार सक्षम। रंगों के माध्यम से अपना प्रेमपूरित अस्तित्व और सार्थकता जीने का उत्सव है होली।

26.12.12

कोई हो

खड़ा मैं कब से समुन्दर के किनारे,
देखता हूँ अनवरत, सब सुध बिसारे ।
काश लहरों की अनूठी भीड़ में अब,
कोई पहचानी, पुरानी आ रही हो ।
कोई हो जो कह सके, मत जाओ प्यारे,
कोई हो जो मधुर, मन को भा रही हो ।।१।।

कोई कह दे, नहीं अब मैं जाऊँगी,
संग तेरे यहीं पर रह जाऊँगी ।
कोई हो, एकान्त की खुश्की मिटाने,
नीर अपने आश्रय का ला रही हो ।
कोई हो जो बह रहे इन आँसुओं के,
मर्म की पीड़ा समझती जा रही हो ।।२।।        

कोई कह दे, छोड़कर पथ विगत सारा,
तुझे पाया, पा लिया अपना किनारा ।
कोई कह दे, भूल जाओ स्वप्न भीषण,
कोई हो जो हृदय को थपका रही हो ।
कोई कह दे, देखता जो नहीं सपना,
कोई हो जो प्रेयसी बन आ रही हो ।।३।।

14.7.12

विचारों के बादल

विचारों का प्रवाह सदा अचम्भित करता है। कुछ लिखने बैठता हूँ, विषय भी स्पष्ट होता है, प्रस्तुति का क्रम भी, यह भी समझ आता है कि पाठकों को क्या संप्रेषित करना चाहता हूँ। एक आकार रहता है, पूरा का पूरा। एक लेखक के रूप में बस उसे शब्दों में ढालना होता है, शब्द तब नियत नहीं होते हैं, उनका भी एक आभास सा ही होता है विचारों में।

शब्द निकलना प्रारम्भ करते हैं, जैसे अभी निकल रहे हैं। प्रक्रिया प्रारम्भ होती है, विचार घुमड़ने लगते हैं, ऐसा लगता है कि मन के अन्दर एक प्रतियोगिता सी चल रही है, एक होड़ सी मची हैं, कई शब्द एक साथ प्रस्तुत हो जाते हैं, आपको चुनना होता है, कई विचार प्रस्तुत हो जाते हैं, आपको चुनना होता है। आपने जो पहले से सोच रखा था, उससे कहीं उन्नत होते हैं, ये विचार, ये शब्द। आप उन विचारों को, उन शब्दों को चुन लेते हैं। उन विचारों, उन शब्दों से संबद्ध विचार और शब्द और घुमड़ने लगते हैं। आप निर्णायक हो जाते हैं, कोई आपको थाली में सब प्रस्तुत करता जाता है, आप चुनते जाते हैं। कोई विचार या शब्द यदि आपको उतना अच्छा नहीं लगता है, या आपका मन और अच्छा करने के प्रयास में रहता है, तो और भी उन्नत विचार संग्रहित होने लगते हैं। प्रक्रिया चलती रहती है, सृजन होता रहता है।

पूरा लेख लिखने के बाद, जब मैं तुलना करने बैठता हूँ कि प्रारम्भ में क्या सोचा था और क्या लिख कर सामने आया है, तो अचम्भित होने के अतिरिक्त कोई और भाव नहीं रहता है। बहुधा सृजनशीलता योग्यता से कहीं अच्छा लिखवा लेती है। बहुत से ऐसे विचार जो कभी भी मन के विचरण में सक्रिय नहीं रहे, सहसा सामने आ जाते हैं, न जाने कहाँ से। एक के बाद एक सब बाहर आने लगते हैं, ऐसा लगता है कि सब बाहर आने की बाट जोह रहे थे, उन्हें बस अवसर की प्रतीक्षा थी। आपका लिखना उनकी मुक्ति का द्वार बन जाता है, आप माध्यम बन जाते हैं।

आपको थोड़ा अटपटा अवश्य लगेगा कि अपने लेखन का श्रेय स्वयं को न देकर प्रक्रिया को दे रहा हूँ, उस प्रक्रिया को दे रहा हूँ जिसके ऊपर कभी नियन्त्रण रहा ही नहीं हमारा। कभी कभी तो कोई विचार ऐसा आ जाता है इस प्रक्रिया में जो भूतकाल में कभी चिन्तन में आया ही नहीं, और अभी सहसा प्रस्तुत हो गया। जब कोई प्रशंसा कर देता है तो पुनः यही सोचने को विवश हो जाता हूँ, कि किसे श्रेय दूँ। श्रेय लेने के लिये यह जानना तो आवश्यक ही है कि श्रेय किस बात का लिया जा रहा है। मुझे तो समझ नहीं आता है, सृजन के चितेरों से सदा ही यह जानने का प्रयास करता रहता हूँ।

सृजन के तीन अंग है, साहित्य, संगीत और कला। साहित्य सर्वाधिक मूर्त और कला सर्वाधिक अमूर्त होता है। शब्द, स्वर और रंग, अभिव्यक्ति गूढ़तम होती जाती है। अभिव्यक्ति के विशेषज्ञ भले ही कुछ और क्रम दें, पर मेरे लिये क्रम सदा ही यही रहा है। बहुत कम लोगों में देखा है कि आसक्ति तीनों के प्रति हो, विरले ही होते हैं ऐसे लोग जो तीनों को साध लेते हैं। बहुत होता है तो लोग दो माध्यमों में सृजनशीलता व्यक्त कर पाते हैं। समझने की समर्थ और व्यक्त करने की क्षमता, दोनों ही विशेष साधना माँगती हैं, कई वर्षों की। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर को ही देखें, तीनों में सिद्धहस्त, पर सबसे पहले साहित्य लिखा, फिर संगीत साधा और जीवन के अन्तिम वर्षों में रंग उकेरे।

कोई संगीतकार तो नहीं मिला अब तक, पर अपने चित्रकार मित्र से जब यह प्रश्न पूछा कि विचार कैसे उमड़ते हैं, सृजन के पहले की मनस्थिति क्या होती है, सृजन के समय क्या होता है और सृजन होने के बाद कैसा लगता है, क्या सोचा होता है और क्या बन जाता है? सबके लिये इस प्रक्रिया को व्यक्त कर पाना अलग स्वरूप ले सकता है, पर सबका सार लगभग यही रहता है।

किसी विषय के बारे में हमारी समझ विचारों के बादल के रूप मे रहती है। जब भी कुछ पढ़ते हैं, संगीत सुनते हैं, चित्र देखते हैं, तो मन के अन्दर अमूर्त स्वरूप सा बन जाता है, कुछ कुछ बादल सा। यही बादल बनता रहता है, घना होता रहता है, तरह तरह के आकार लेता रहता है। जब यह बादल बूँद बन बरसना चाहते हैं तो आकार ढूढ़ते हैं, किस रूप में बरसें? कुछ लोग शब्द का आधार लेते हैं, शब्द का सहारा सरल होता है, शब्द भौतिक जगत के अधिक निकट हैं, हर वस्तु को शब्द से व्यक्त किया जा सकता है, हमारा भी सहारा शब्द ही है। मन के भाव जैसे जैसे अमूर्त होते हैं, शब्द कम पड़ने लगते हैं, भाव शब्दातीत हो जाते हैं। तब संगीत रिक्तता भर देता है, शब्द से अधिक अमूर्त और रंग से अधिक मूर्त होते हैं स्वर। मन के गहरे भाव शब्द से अधिक संगीत समझता है। कला एक स्तर और ऊपर उठ जाती है, रंगों की छिटकन विचारों के बादल के सर्वाधिक निकटस्थ है। कुशल चित्रकार विचारों के बादल को यथारूप उतार देने में सक्षम होते हैं।

विचारों का बादल सा होता है मन में, हम उसे एक स्थूल रूप दे देते हैं, शब्दों के माध्यम से, संगीत के माध्यम से, कला के माध्यम से। होना तो यही चाहिये था कि उस स्थूल रूप को पुनः ग्रहण करने पर वही भाव मन में आने चाहिये जो उसके सृजन के समय आये थे, होता भी है यदि सृजनकर्ता पुनः अपनी कृति देखता, सुनता या पढ़ता है। मैं तो जितनी बार अपनी कवितायें या लेख पढ़ता हूँ, उसी सुलझन व भावावेश में पहुँच जाता हूँ जिसके निष्कर्ष स्वरूप वह शब्द लिखे गये थे। ऐसे में स्वयं के लिये औषधि का कार्य करती है आपकी कृति, आपके उसी भाव को हर बार घनीभूत कर जाती है आपकी कृति।

सृजन का औषधीय पक्ष तो समझ आता है, पर सृजन कैसे होता है, यह समझ नहीं आता है। बादल कैसे बनते हैं, कैसे आकार लेते हैं, कहाँ से उड़कर आते हैं, कहाँ पर बरस जाते हैं और बरसकर क्या प्रभाव डालते हैं, यह समझ नहीं आता है। आपके विचारों के बादल कैसे बनते और बरसते हैं?

12.11.11

सोने के पहले

बच्चों की नींद अधिक होती है, दोनों बच्चे मेरे सोने के पहले सो जाते हैं और मेरे उठने के बाद उठते हैं। जब बिटिया पूछती है कि आप सोते क्यों नहीं और इतनी मेहनत क्यों करते रहते हो? बस यही कहता हूँ कि बड़े होने पर नींद कम हो जाती है, इतनी सोने की आवश्यकता नहीं पड़ती है, आप लोगों को बढ़ना है, हम लोगों को जितना बढ़ना था, हम लोग बढ़ चुके हैं। बच्चों को तो नियत समय पर सुला देते हैं, कुछ ही मिनटों में नींद आ जाती है उनकी आँखों में, मुक्त भाव से सोते रहते हैं, सपनों में लहराते, मुस्कराते, विचारों से कोई बैर नहीं, विचारों से जूझना नहीं पड़ता हैं उन्हें।

पर मेरे लिये परिस्थितियाँ भिन्न हैं। घड़ी देखकर सोने की आदत धीरे धीरे जा रही है। नियत समय आते ही नींद स्वतः आ जाये, अब शरीर की वह स्थिति नहीं रह गयी है। बिना थकान यदि लेट जाता हूँ तो विचार लखेदने लगते हैं, शेष बची ऊर्जा जब इस प्रकार विचारों में बहने लगती है तो शरीर निढाल होकर निद्रा में समा जाता है। आयु अपने रंग दिखा रही है, नींद की मात्रा घटती जा रही है। जैसे नदी में जल कम होने से नदी का पाट सिकुड़ने लगने लगता है, नींद का कम होना जीवन प्रवाह के क्षीण होने का संकेत है। अब विचारों की अनचाही उठापटक से बचने के लिये कितनी देर से सोने जाया जाये, किस गति से नींद कम होती जा रही है, न स्वयं को ज्ञात है, न समय बताने वाली घड़ी को।

जब समय की जगह थकान ही नींद का निर्धारण करना चाहती है तो वही सही। अपनी आदतें बदल रहा हूँ, अब बैठा बैठा कार्य करता रहता हूँ, जब थकान आँखों में चढ़ने लगती है तो उसे संकेत मानकर सोने चला जाता हूँ। जाते समय बस एक बार घड़ी अवश्य देखता हूँ, पुरानी आदत जो पड़ी है। पहले घड़ी से आज्ञा जैसी लेता था, अब उसे सूचित करता हूँ। हर रात घड़ी मुँह बना लेती है, तरह तरह का, रूठ जाती है, पर शरीर ने थकने का समय बदल दिया, मैं क्या करूँ?

क्या अब सोने के पहले विचारों ने आना बन्द कर दिया है? जब बिना थकान ही सोने का यत्न करता था, तब यह समस्या बनी रहती थी, कभी एक विचार पर नींद आती थी तो कभी दूसरे विचार पर। जब से थकान पर आधारित सोने का समय निश्चित किया है, सोने के पहले आने वाले विचार और गहरे होते जा रहे हैं। कुछ नियत विचारसूत्र आते हैं, बार बार। सारे अंगों के निष्क्रियता में उतरने के बाद लगता है कि आप कुछ हैं, इन सबसे अलग। कभी लगता है इतने बड़े विश्व में आपका होना न होना कोई महत्व नहीं रखता है, आप नींद में जा रहे हैं पर विश्व फिर भी क्रियारत है।

हर रात सोने के पहले लगता है कि शरीर का इस प्रकार निढाल होकर लुढ़क जाना, एक अन्तिम निष्कर्ष का संकेत भी है, पर उसके पहले पूर्णतया थक जाना आवश्यक है, जीवन को पूरा जीने के पश्चात ही। हमें पता ही नहीं चल पाता है और हम उतर जाते हैं नींद के अंध जगत में, जगती हुयी दुनिया से बहुत दूर। एक दिन यह नींद स्थायी हो जानी है, नियत समय पर सोने की आदत तो वैसे ही छोड़ चुके है। एक दिन जब शरीर थक जायेगा, सब छोड़कर चुपचाप सो जायेंगे, बस जाते जाते घड़ी को सूचित कर जायेंगे।

14.9.11

पूर्वपक्ष, प्रतिपक्ष और संश्लेषण

पढ़ा था, यदि घर्षण नहीं होता तो आगे बढ़ना असंभव होता, पुस्तक में उदाहरण बर्फ में चलने का दिया गया था, बर्फीले स्थानों पर नहीं गया अतः घर में ही साबुन के घोल को जमीन पर फैला कर प्रयोग कर लिया। स्थूल वस्तुओं पर किया प्रयोग तो एक बार में सिद्ध हो गया था, पर वही सिद्धान्त बौद्धिकता के विकास में भी समुचित लागू होता है, यह समझने में दो दशक और लग गये।

विचारों के क्षेत्र में प्रयोग करने की सबसे बड़ी बाधा है, दृष्टा और दृश्य का एक हो जाना। जब विचार स्वयं ही प्रयोग में उलझे हों तो यह कौन देखेगा कि बौद्धिकता बढ़ रही है, कि नहीं। इस विलम्ब के लिये दोषी वर्तमान शिक्षापद्धति भी है, जहाँ पर तथ्यों का प्रवाह एक ही दिशा में होता, आप याद करते जाईये, कोई प्रश्न नहीं, कोई घर्षण नहीं। यह सत्य तभी उद्घाटित होगा जब आप स्वतन्त्र चिन्तन प्रारम्भ करेंगे, तथ्यों को मौलिक सत्यों से तौलना प्रारम्भ करेंगे, मौलिक सत्यों को अनुभव से जीना प्रारम्भ करेंगे। बहुधा परम्पराओं में भी कोई न कोई ज्ञान तत्व छिपा होता है, उसका ज्ञान आपके जीवन में उन परम्पराओं को स्थायी कर देता है, पर उसके लिये प्रश्न आवश्यक है।

स्वस्थ लोकतन्त्र में विचारों का प्रवाह स्वतन्त्र होता है और वह समाज की समग्र बौद्धिकता के विकास में सहायक भी होता है। ठीक उसी प्रकार किसी भी सभ्यता में लोकतन्त्र की मात्रा कितनी रही, इसका ज्ञान वहाँ की बौद्धिक सम्पदा से पता चल जाता है। जीवन तो निरंकुश साम्राज्यों में भी रहा है पर इतिहास ने सदा उन्हें अंधयुगों की संज्ञा दी है।

बौद्धिकता के क्षेत्र में घर्षण का अर्थ है कि जो विचार प्रचलन में है, उसमें असंगतता का उद्भव। प्रचलित विचार पूर्वपक्ष कहलाता है, असंगति प्रतिपक्ष कहलाती है, विवेचना तब आवश्यक हो जाती है और जो निष्कर्ष निकलता है वह संश्लेषण कहलाता है। संश्लेषित विचार कालान्तर में प्रचलित हो जाता है और आगामी घर्षण के लिये पूर्वपक्ष बन जाता है। यह प्रक्रिया चलती रहती है, ज्ञान आगे बढ़ता रहता है, ठीक वैसे ही जैसे आप पैदल आगे बढ़ते हैं जहाँ घर्षण आपके पैरों और जमीन के बीच होता है।

समाज में जड़ता तब आ जाती है जब पूर्वपक्ष और प्रतिपक्ष को स्थायी मानने का हठ होने लगता है, लोग इसे अपनी अपनी परम्पराओं पर आक्षेप के रूप में लेने लगते हैं। जब तक पूर्वपक्ष और प्रतिपक्ष का संश्लेषण नहीं होगा, अंधयुग बना रहेगा, लोग प्रतीकों पर लड़ते रहेंगे, सत्य अपनी प्यास लिये तड़पता रहेगा। साम्य स्थायी नहीं है, साम्य को जड़ न माना जाये, चरैवेति का उद्घोष शास्त्रों ने पैदल चलने या जीवन जीने के लिये तो नहीं ही किया होगा, संभवतः वह ज्ञान के बढ़ने का उद्घोष हो।

उपनिषद पहले पढ़े नहीं थे, सामर्थ्य के परे लगते थे, थोड़ा साहस हुआ तो देखा, सुखद आश्चर्य हुआ। उपनिषदों का प्रारूप ज्ञान के उद्भव का प्रारूप है, पूर्वपक्ष, प्रतिपक्ष और संश्लेषण।

शंकालु दृष्टि प्रश्न उठाने तक ही सीमित है, ज्ञान का प्रकाश संश्लेषण में है।

3.8.11

चंचलम् हि मनः कृष्णः

मैं मन नहीं हूँ, क्योंकि मन मुझे उकसाता रहता है। मैं मन नहीं हूँ, क्योंकि मन मुझे भरमाता रहता है। मैं स्थायित्व चाहता हूँ तो मन मुझ पर कटाक्ष करता है। मैं वर्तमान में रह जीवन को अनुभव करना चाहता हूँ तो मन मुझे आलसी जैसे विशेषणों से छेड़ता है, मुझ पर महत्वाकांक्षी न होने के आरोप लगाता है, मैं सह लेता हूँ क्योंकि मैं मन नहीं हूँ। किसी कार्य के प्रति दृढ़ निश्चय होकर पीछे पड़ता हूँ तो संशयात्मक तरंगें उत्पन्न करने लगता है मन, बाधा बन सहसा सामने आता है, निश्चय की हुंकार भरता हूँ तो सुन कर सहम सा जाता है मन, छिप जाता है कहीं कुछ समय के लिये। दिन भर यह लुकाछिपी चलती रहती है, रात भर यह लुकाछिपी स्वप्नों में परिलक्षित होती रहती है, कभी सुखद, कभी दुखद, कभी सम, कभी विषम, संवाद बना रहता है। संवाद के एक छोर पर मैं हूँ और दूसरी ओर है मन। मन से मेरा सतत सम्बन्ध है पर मैं मन नहीं हूँ।

आश्चर्य होता है कि इतनी ऊर्जा कहाँ से आ जाती है मन में, विचारों का सतत प्रवाह, एक के बाद एक। आश्चर्य ही है कि न जाने कितने विचार ऐसे हैं जिनकी उत्पत्ति प्रायिकता के सिद्धान्त से भी सिद्ध नहीं की जा सकती, विज्ञान के घुप्प अँधेरों के पीछे से निकल आते हैं वे विचार। सच में यह एक रहस्यमयी तथ्य है कि जिन विचारों के आधार पर विज्ञान ने अपना आकार पाया है, वही विचार अपने उद्गम की वैज्ञानिकता को जानने को व्यग्र हैं। विज्ञान के जनक वे विचार अनाथ हैं, क्योंकि वे अपना स्रोत नहीं जानते हैं, यद्यपि सारा श्रेय हम मानव लिये बैठे हैं, पर हम मन नहीं हैं।

हम कृतघ्न हो जाते हैं और सृजन का श्रेय ले लेते हैं, हम साहित्य के पुरोधा बन ज्ञान उड़ेल देते हैं, पर जब एकान्त में बैठ विचारों का आमन्त्रण-मन्त्र जपते हैं तो मन ही उन लड़ियों को एक के बाद एक धीरे धीरे आपकी चेतना में पिरोता जाता है। श्रेय कहीं और अवस्थित है क्योंकि आप मन नहीं हैं।

सम्प्रति गूगल की इस बात के लिये आलोचना हो रही है कि वह आपके विषय से सम्बन्धित विज्ञापन आपको दिखाने लगता है, गूगल आपके लेखन व पठन के अनुसार वह सब प्रस्तुत करता रहता है, आपको पता ही नहीं चलता है, सब स्वाभाविक लगता है। यह बात अलग है कि इसके लिये गूगल लाखों सर्वर और करोड़ों टन ऊर्जा सतत झोंकता रहता है इण्टरनेटीय प्रवाह में। आपका मन वही कार्य करता है, सूक्ष्म रूप से, विषय से सम्बन्धित विचार और स्मृतियाँ मनस-पटल पर एक के बाद एक आती रहती हैं, आप चाहें न चाहें। विज्ञान की आधुनिकतम क्षमतायें रखता है आपका मन, हमें स्वाभाविक लगता रहता है, पर हम तो मन नहीं हैं।

अपेक्षायें जब धूल-धूसरित होने लगती हैं तो संभवत: मन ही प्रथम आघात सहता है। अस्थिर हो जाता है, भय और आशंका में गहराता जाता है, भय आगत का और आशंका अनपेक्षितों की। अस्थिर मन दृढ़ अस्तित्वों को भी झिंझोड़ कर रख देता है, चट्टान को भी चीर कर पानी बहा देता है। हमारे निहित भय के तन्तुओं से ही बँधा है मन का तार्किक तन्त्र। इतना संवेदनशील है कि हमारे ही भयों की प्रतिच्छाया हमें चिन्ताओं के रूप में बताने लगता है हमारा मन।

मन चंचल है, ऊर्जा से परिपूर्ण है, वैज्ञानिक है, सृजनशील है, संवेदनशील है, तो निश्चय ही कभी न कभी बहकेगा भी।

सदियों से मन को आध्यात्मिक उन्नति में बाधा माना जाता रहा है, अध्यात्म स्वयं की स्थिरता को ढूढ़ने का प्रयास है। मन अपनी प्रकृति नहीं छोड़ता है, क्या करे, उसका काम ही वही है, जगत को गतिमान रखना।

मन से बड़ा मित्र नहीं है और मन से बड़ा शत्रु भी नहीं। चलिये, अर्जुन की तरह ही कृष्ण से पूछते हैं,

चंचलम् हि मनः कृष्णः .......

22.1.11

बकर बकर

कई दिन पहले मोबाइल से अपना पसंदीदा टीवी कार्यक्रम रिकार्ड करने का एयरटेल का विज्ञापन देखा। करीना कपूर बकर बकर करना प्रारम्भ करती है और बात में पता लगता है कि प्रेरणा टीवी के कार्यक्रम से प्राप्त हो रही है।

जितनी बार भी यह बकर बकर जैसा एकालाप देखता हूँ, अच्छा लगता है और हँसी आती है। पता नहीं क्यों? कुछ जाना पहचाना सा लगता है यह प्रलाप।

हम लोग दिन भर जो कुछ भी बोलते रहते हैं यदि उसे बिना किसी अन्तराल के पुनः सुने तो यही लगेगा कि करीना कपूर की बकर बकर तो फिर भी सहनीय है। पर हम स्वयं ऐसा करते हुये भी विज्ञापन देखकर हँसते हैं। केवल गति का ही तो अन्तर है!

विचार-श्रंखला बह रही है। मन ने जो विचार चुन लिये, उन्हें वाणी मिल गयी। कई अन्य विचार मन से मान न पा सरक जाते हैं अवचेतन के अँधेरों में।

शब्द आते हैं विचारों से। विचारों के प्रवाह की गति होती है और उन विचारों की गुणवत्ता होती है।

कौन है जो विचारों का भाड़ झोंके जा रहा है और मन मस्ती में स्वीकार-अस्वीकार का खेल आनन्दपूर्वक खेल रहा है। कोई जोर है आपका अपने विचारों पर, उनकी गति पर या अपने मन पर?

जब कभी भी इतना साहस व चेतना हुयी कि स्वयं को कटघरे में खड़ा कर प्रश्न कर सकूँ उन विचारों पर जो मन को उलझाये रहे, तो मुख्यतः तीन तरह के उद्गम दिखायी पड़े इन विचारों के।

पहले उन कार्यों से सम्बन्धित जिन्हें आप वर्तमान में ढो रहे हैं।

दूसरे आपके जीवन के किसी कालक्षण से सम्बन्धित रहे हैं और सहसा फुदक कर सामने आ जाते हैं।

तीसरे वे जो आपसे पूर्णतया असम्बद्ध हैं पर सामने आकर आपको भी आश्चर्यचकित कर देते हैं।

पहले दो तो समझ में आते हैं पर तीसरा स्रोत कभी गणित का कठिन प्रश्न हल करने की विधि बता देता है, कभी आपसे एक सुन्दर कविता लिखवा देता है या कभी आपकी किसी गम्भीर समस्या का सरल उत्तर आपके हाथ पर लाकर रख देता है। सहसा, यूरेका।

मन बहका है। यदि आप 'चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम् ...... अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते', समझते हैं और उस पर अभ्यासरत हैं तो आपके विचारों की गुणवत्ता बनी रहेगी। अच्छों को सहेज कर रखिये और बुरों के बारे में निर्णय ले लीजिये, भले ही मन आपसे कितनी वकालत करे, तभी गुणवत्ता बनी रहेगी।

विचारों के प्रवाह की गति हमारे ज्ञान व सरलता से कम होती है। जीवन आपको ऐसे मोड़ों पर खड़ा कर देगा जहाँ आपको या तो कुछ सीखने को मिलेगा या आपको सरल कर देगा। प्रौढ़ता या परिपक्वता सम्भवतः इसी को कहते हों।

उन मनीषियों को क्या कहेंगे जिनकी चेतना इतनी विकसित है कि हर विचार अन्दर आने से पहले उनसे अनुमति माँगता हो। मेरे विचार तो सुबह शाम मुझे लखेदे रहते हैं।

4.12.10

7 लेखक, 36 पुस्तकें, एक सूत्र

एक लेखक की कई पुस्तकें एक सूत्रीय विचारधारा व्यक्त करती हुयी लग सकती हैं। दो लेखकों की पुस्तकों में भी कुछ न कुछ साम्य निकल ही आता है, तीन लेखकों में यही समानता उत्तरोत्तर कम होती जाती है, पर जब लगातार 7 लेखकों की लगभग 36 पुस्तकों में एक ही सिद्धान्त रह रह कर उभरे तब सन्देह होने लगता है, ईश्वर की योजना पर। वही प्रारूप, वही योजना, वही सन्देश, कहाँ ले जाने का षड़यन्त्र रच रहे हो, हे प्रभु। मान लिया कि पढ़ने में रुचि है, पर उसका यह अर्थ तो नहीं कि अब पुस्तकों के माध्यम से वही बात बार बार संप्रेषित करते रहोगे !

मेरे जीवन की जिज्ञासा आपकी भी बनकर न रह जाये अतः पहले ही आगाह कर देना चाहता हूँ इस पोस्ट के माध्यम से। पहला तो यह कि कितनी भी रोचक हों, इनमें से किसी भी लेखक की सारी पुस्तकें न पढ़ें, यह लेखक के विचारों को आपके मन में सान्ध्र नहीं होने देगा। दूसरा यह कि इन 7 लेखकों में से किन्ही दो या तीन लेखकों को न पढ़ें, यह उस विचार को आपके मन में धधकने से बचा लेगा। पिछले तीन वर्षों में 36 पुस्तकें पढ़, हम यह दोनों भूल कर बैठे हैं, आप न करें अतः शीघ्रातिशीघ्र आगाह कर अपनी आत्मीयता प्रदर्शित कर रहे हैं।

सर्वप्रथम तो सन्दर्भार्थ उन पुस्तकों का विवरण यहाँ पर दे रहा हूँ।
लेखक
पुस्तकें
रॉबिन शर्मा
'द मोन्क व्हू सोल्ड हिज़ फेरारी' से 'द ग्रेटनेस गाइड' तक 9 पुस्तकें
मार्शल गोल्ड स्मिथ
मोज़ो
रहोन्डा बर्न
सीक्रेट
पॉलो कोल्हो
'द एलकेमिस्ट' से 'विनर स्टैंड एलोन' तक 14 पुस्तकें
जेम्स रेडफील्ड
'द सेलेस्टाइन प्रोफेसी' से 'द सीक्रेट ऑफ सम्भाला' तक 4 पुस्तकें
ब्रायन वीज़
'मैनी लाइफ, मैनी मास्टर्स' से 'मेडीटेशन' तक 6 पुस्तकें
वेद व्यास
श्रीमद भगवतगीता

भगवतगीता को छोड़कर सारी पुस्तकें अंग्रेजी में पढ़ीं, अंग्रेजी सीखने में हुये कष्ट का मूल्य अधिभार सहित वसूल जो करना है। साथ ही सारी पुस्तकें मेरे शुभचिन्तकों द्वारा भिन्न भिन्न कालखण्डों में सुझायी गयीं। पढ़ना जिस क्रम में हुआ, उस क्रम में लेखकों को न रख विचार सूत्र के क्रम में व्यवस्थित किया है। सभी पुस्तकें अपने प्रस्तुत पक्ष में पूर्ण हैं और चिन्तन की जो भावी राहें खोल जाती हैं, उसे आगे ले जाने का कार्य अन्य पुस्तकें करती हैं। सभी पुस्तकों का विवरण एक साथ देने का उद्देश्य उस विचार सूत्र को उद्घाटित करना है जो उसे तार्किकता के निष्कर्ष तक ले जाने में सक्षम है। सार यह है।

वैचारिक विश्व भौतिक विश्व से अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि आपकी वैचारिक प्रक्रिया भौतिक जगत बदल देने की क्षमता रखती है। वैचारिक दृढ़निश्चय से आप कुछ भी कर सकने में सक्षम हैं। अतः आपकी मनःस्थिति का उपयोग परिवेश में उत्साह और प्रसन्नता भरने के लिये किया जाना चाहिये, इसके निष्कर्ष आश्चर्यजनक होते हैं। विचारों का एक अपना जगत है, आप जो सोचते हैं वह विचारजगत से अपने जैसे अन्य विचारों को आकर्षित कर लेता है जिससे उस विषय में आपके विचार प्रवाह को बल मिलता है। नकारात्मक विचार अपने जैसा प्रभाव आकर्षित करते हैं। आप यदि भयग्रस्त हैं तो आपके विरोधी को उस विचार से मानसिक बल मिलेगा आपको और सताने का, आपकी आशंकायें इसी कारण से सच होने लगती हैं। नकारात्मक विचारों को सकारात्मकता से पाट दें। आपका दृढ़निश्चय जितना घनीभूत होता जाता है, परिस्थितियाँ उतनी ही अनुकूल होती जाती हैं, कई बार तो आपको विश्वास ही नहीं होता कि सारा विश्व आपके विचारानुसार कार्यप्रवृत्त है। आपका जीवन, आपका विश्व आपके विचारों से ही निर्धारित है, सृजनात्मक शक्तियाँ प्रचुर मात्रा में अपना आशीर्वाद लुटाने को व्यग्र हैं। मृत्यु के समय की यह विचार स्थिति आपका अगला जीवन, आपका परिवेश और यहाँ तक कि आपके सम्बन्धियों का भी निर्धारण करती है। आप माने न माने, आप जिनसे अत्यधिक प्रेम करते हैं या अत्यधिक घृणा करते हैं, वह आपके अगले जीवन में आपके संग उपस्थित रहने वाले हैं। आपके जीवन की अनुत्तरित विशेष घटनायें आपके आगामी जीवन में कुछ न कुछ प्रभाव लिये उपस्थित रहती हैं। अतः विचारों को महत्तम मानें और पूरा ध्यान रखें उनकी गुणवत्ता पर।

इतनी पुस्तकों को कुछ शब्दों में व्यक्त करना कठिन है, पर भारतीय दर्शन के वेत्ताओं को यह विचार सूत्र बहुत ही जाना पहचाना लगता है। भगवतगीता को घर की मुर्गी दाल बराबर समझने की मानसिकता उस समय वाष्पित हो जायेगी जब शेष 35 पुस्तकों के निष्कर्ष आपको भगवतगीता पुनः समझने को उत्प्रेरित करेंगे। इन पुस्तकों को पढ़ने का श्रेष्ठतम लाभ भगवतगीता में मेरी आस्था का पुनः दृढ़ होना है।

आपको पुनः चेतावनी दे रहा हूँ, एक तो इतना व्यस्त रहें कि पुस्तकों की दुकान जाने का समय न मिले। यदि मिले भी तो आप याद कर के इन पुस्तकों को न खरीदे। यदि लोभ संवरण न कर पायें तो घर में लाकर बस सजाने के लिये रख दीजिये। अन्ततः इतने भौतिक प्रपंच पल्लवित कर लीजिये कि पढ़ने का समय न मिले। फिर भी यदि आप नहीं माने और पढ़ ही लिया तो आपके अन्दर आये परिवर्तन का दोष मुझे मत दीजियेगा क्योंकि वह विचार भौतिक जगत से अधिक ठोस होगा।

(निशान्त के द्वारा अंग्रेजी के कई श्रेष्ठ विचारों को हिन्दी में अनुवाद कर प्रस्तुत करने का एक महत कार्य हो रहा है, उन जैसे अन्य प्रयासों को समर्पित है यह पोस्ट।)