Showing posts with label मनन. Show all posts
Showing posts with label मनन. Show all posts

22.5.13

स्वयं से भागते, हम लोग

कभी सोचा है कि व्यक्ति को सबसे अधिक भड़भड़ाहट कब होती है, सर्वाधिक मन कब ऊबता है, कौन सा समय वह शीघ्रातिशीघ्र बिता देना चाहता है? उत्तर अधिक कठिन नहीं होगा, यदि जीवन के भारी कष्टों को सूची से हटा दिया जाये तो सबसे अधिक कष्ट में व्यक्ति तब होता है जब वह एकान्त में होता है, शारीरिक रूप से, मानसिक रूप से।

कभी सोचा है कि व्यक्ति स्वयं से इतना क्यों भागता है? एकान्त काटने को दौड़ता है। कुछ तो कारण होगा कि हम स्वयं को ही नहीं झेल पाते हैं।

कहीं पढ़ भी रहा था कि जेल में यदि किसी व्यक्ति को कठिनतम दण्ड दिया जाता है तो उसे एकान्त में रख देते हैं, तनहाई कही जाती है वह। वह एकान्त ऐसा होता है जहाँ बन्दी का मानसिक संतुलन तक बिगड़ जाता है। क्या एकान्त में रहना हमारी प्रकृति के विरुद्ध है? व्यक्ति को स्वयं से भय क्यों?

ये सारे प्रश्न ऐसे हैं जो उठते तो हर एक के मन में हैं, पर उनका उत्तर पाना उतना ही कष्टकर होता है जितना एकान्त में समय बिताना। कोई इसे मन का खेल मानता है, कोई सामाजिकता को दोष देता है, कोई इस पर कुछ कहना ही नहीं चाहता है। एकान्त सदा ही दोषपूर्ण माना जाता है, जो लोग किसी और से घुलते मिलते नहीं, उन्हें संशय और विस्मय की दृष्टि से देखा जाता है, विचित्र प्राणी की तरह।

माना कि एकान्त भयावह है, माना कि एकान्त असामाजिक है, पर अपने से पूर्णतया विमुख हो जाता कहाँ से आ गया हमारे अन्दर? अपने से भागने का गुण कहाँ से आ गया हमारे अन्दर? आश्रयों के हटते ही भरभरा कर ढहने लगता है हमारा जीवन। माना कि सहजीवन ही हमारी राह है, पर स्वयं को समझने और समझाने से क्यों विमुख हो जाते हैं हम? एकान्त को भयानक मानने वाली यह मानसिकता इतने गहरे धँसी है हम सबके अन्दर कि हम स्वयं से ही भागने लगे हैं।

यही प्रश्न संस्कृतियों के बीच की दीवार भी है, यही प्रश्न संस्कृतियों के बीच की सुलझन का प्रारम्भ भी है। पूर्व की संस्कृति में यह प्रश्न सदा से ही पूछा जाता रहा है, पश्चिम में यह प्रश्न सदा ही प्यासा रहा है। हमारा जीवनक्रम स्वयं को समझने से प्रारम्भ होता है और सहजीवन तक जाता है, पाश्चात्य सहजीवन को प्रमुखता से रख इस प्रश्न पर ठंडी राख उड़ेल देता है। जीवन दोनों संस्कृतियों में पल रहे हैं, एक पद्धति में अन्त तक स्पष्ट दिशा दिखती है, दूसरी पद्धति पगडंडियों के समाप्त होते ही भ्रमित हो जाती है। मैं जितना एकान्त में डूबता हूँ, उतना ही प्राच्य हो जाता हूँ, जितना सबके संग जीने लगता हूँ उतना ही पाश्चात्य का रंग धारण कर लेता हूँ। मैं बहुधा मुहाने पर खड़ा रहता हूँ, इस प्रश्न के कुछ इस पार, इस प्रश्न से कुछ उस पार।

स्वयं को जानना है तो स्वयं से जूझना भी पड़ेगा। कोई इसे भले ही अध्यात्म मान कर बुढ़ापे के लिये छोड़ दे, पर यह प्रश्न मुँह बाये एक न एक दिन खड़ा अवश्य हो जायेगा। कह देने भर से कि इन सबके बिना भी काम चल जायेगा, ये प्रश्न टलने वाले नहीं, उत्तर तो पाना ही पड़ेगा।

एक दूसरे को देखकर तो सब ही जीवन पार कर लेते हैं, पर क्या दूसरे का जीवन ही हमारा भी मानक हो जाये? क्या वे पद्धतियाँ जो किसी एक के लिये सुन्दर ढंग से चलती हैं, क्या दूसरे के ऊपर भी उतना ही प्रभावी हो सकती हैं? ऐसा नहीं है कि सारे लोग भेड़चाल में ही चलते हैं, कुछ अपनी राह स्थापित करते हैं, अपने मानक स्वयं स्थापित करते हैं। भौतिक सफलतायें अपना स्थान बनाती हैं, विकास होता रहता है, पर स्वयं को समझने का प्रश्न कार्य और उद्देश्यों की भीड़ में खोया ही सा रहता है।

अपने हृदय पर हाथ रखिये और पूछिये कि स्वयं से पहली बार वार्तालाप कब किया था, तब पता चलेगा कि तीन या चार दशक तो इस प्रश्न को पहली बार आने में ही निकल जाते हैं। जब तक प्रश्नोत्तरी तनिक रोचक होती है, आधा जीवन बीता हुआ सा लगता है। लगता है कि हम सदा ही स्वयं से भागते रहे, स्वयं का सामना करने से कतराते रहे।

एक परम स्नेही मित्र ने दर्शननिमग्न वार्तालाप के बीच एक दिन बड़े ही दुर्लभ वाक्य कहे, उनका कहना था कि जीवन में यदि किसी एक चीज को जानना आवश्यक है, तो वह स्वयं को। स्वयं को जानने के लिये मन को जानना आवश्यक है, आत्म मन से ही व्यक्त होता है।

बात सच भी है, हम सुख को ढूढ़ते रहते हैं। कहते हैं जो मन के अनुकूल है, वही सुख है। यदि हम मन को नहीं समझ पाये तब सुख को क्या समझ पायेंगे? बिना मन को जाने सुख की परिभाषायें बनाते रहते हैं, उस पर प्रयोग करते रहते हैं। मन को नयापन चाहिये तो उसे नयापन ला लाकर देते रहते हैं, पर बात तो मन के माध्यम से स्वयं को समझने की थी।

जो भी कारण हो, जो भी निदान हो, हम स्वयं से भागे लोग हैं, सदा ही बाहर अपना ठिकाना ढूढ़ते रहते हैं, व्यग्र हो। स्वयं में स्थिर होना सीख लें, तो जहाँ ठहर जायें, गाँव वहीं बन जाये हमारा, जहाँ रम जायें, वहीं राम हो जायें। यदि कहीं टिकना सीखना हो मुझे, तो स्वयं में ही, वर्तमान में ही, तात्कालिक परिवेश में ही।

15.12.12

पढ़ते पढ़ते लिखना सीखो

पिछले कई दिनों से पढ़ रहा हूँ, बहुत पढ़ रहा हूँ, कई पुस्तकें पूरी पढ़ी, कई आधी अधूरी चल रही हैं। रात में बच्चों के सोने के बाद पढ़ना प्रारम्भ करता हूँ तो कब घड़ी को दोनों सुईयाँ तारों की दिशा दिखाने लगती हैं, पता ही नहीं चलता है। सुबह शीघ्र उठने में कठिन परिश्रम करना पड़ता है, दिनचर्या अलसायी सी प्रारम्भ होती है तब।

माताजी पिताजी घर आये हैं, पिताजी आज भी सुबह ५ बजे उठ जाते हैं और योग भी करते हैं। पृथु अपने बाबा के प्रिय हैं, सुबह उठने से लेकर रात कहानी सुनने तक साथ लगे रहते हैं। तो स्वाभाविक है कि पृथु भी सुबह योग करते हैं और उसके बाद पढ़ने भी बैठ जाते हैं। एक पीढ़ी ऊपर और एक पीढ़ी नीचे, दोनों ही हमें अधिक सोने वाला और आलसी समझते हैं और उसी दृष्टि से देखते भी हैं। 'उठने का समय मिल गया पापा को', कौन भला यह कटाक्ष झेल पायेगा। सारांश यह है कि हम नित ही अंक खोते जा रहे हैं, पता नहीं कि बाद में पृथु को अनुशासित रख पाने का अधिकार भी रख पायेंगे या नहीं।

बाजी हाथ से फिसल रही है, तेजी से, पर उसका अधिक हानिबोध नहीं है। असली समस्या यह है कि अधिक पढ़ने के क्रम में लिखना भी कम हुआ जा रहा है, सप्ताह में दो पोस्ट भी लिखने में इतना जूझना पड़ रहा है कि लिखा हुआ एक एक शब्द लाखों का लगता है। चेहरे से बच्चों को पता लग जाता है कि बुधवार या शनिवार आने वाला है और पापा ने अपनी पोस्ट लिखी नहीं है। ऐसा दिखने पर हमें बहुधा उस उल्लास और कार्यक्रम में सम्मिलित नहीं किया जाता है जो घर के शेष लोगों ने बनाया होता है। लिखना भी नहीं हो पाता है, मन ललचाता भी रहता है, एक विशिष्ट रूप लेता जा रहा है हमारा जीवनक्रम।

ऐसा पहली बार नहीं हैं कि लिखने और पढ़ने को साथ साथ चलने में समस्या न आयी हो। जब लिखना अधिक होता है तो पढ़ना पूरी तरह रुक सा जाता है, महीनों कोई पुस्तक उठाने का मन नहीं करता है। अब जब पुस्तकों को महीनों का शेष चुकाने बैठे हैं तो लिखने का मन नहीं हो रहा है। समय की कमी एक कारण अवश्य होगा, होना भी चाहिये, आप कितने भी विशिष्ट समझ लें स्वयं को, घंटे तो २४ ही मिलेंगे एक दिन में। चाह कर भी एक मिनट अधिक नहीं मिलेगा। यदि अधिक कर सकने के लिये अपनी कार्य क्षमता बढ़ाने का उपाय करना चाहूँ तो वह भी नहीं हो पा रहा है, क्योंकि मन की माने तो सुबह उठकर योग करने के लिये भी समय चाहिये। अब समस्या इतनी गहरा गयी है कि बिना गोता मारे उपाय निकलेगा भी नहीं।

धीरे धीरे मन को मनाने से दिनचर्या की समस्या तो हल हो भी जायेगी, पर एक और बौद्धिक समस्या सामने दिखती है जो लिखने में रोड़ा अटका रही है। सतही देखा जाये तो समस्या है, गहरे देखा जाये तो संभावना है। यदि आप कोई अच्छी पुस्तक पढ़ते हैं तो उस लेखक से संवाद करते हैं। पुस्तक जितनी रोचक होती है, संवाद उतना गहरा होता है, उतना ही अन्दर आप उतर जाते हैं। पुस्तक पढ़ने के बीच जो समय मिलता है, उसमें आप उसी संवाद पर मनन करते हैं। पहले तो पठन औऱ फिर उसी पर मनन, इसी में सारा समय निकल जाता है, कुछ समय ही नहीं बचता कुछ संघनित करके बरसाने के लिये। इतना समेट लेने की व्यग्रता रहती है कि कुछ निकालने का समय ही नहीं रहता है। हाँ, यह बात तो है कि जो भी संवाद होता है, वह कभी न कभी तो बाहर आयेगा, कई बार गुनने के बाद, बस यही संभावना है, बस यही सान्त्वना है।

न लिख पाने का एक और कारण भी समझ में आता है, पढ़ने और लिखने का स्तर एक सा न होना। अच्छे लेखक को पढ़ने में बौद्धिक स्तर इतना ऊँचा उठ जाता है कि तब नीचे उतर कर लिखने का साहस नहीं हो पाता है, अपनी लेखकीय योग्यता पर संशय होने लगता है। जब पकवानों की उपस्थिति आप के घर में हो तो आपकी अधकच्ची, अधपकी और चौकोर रोटी कौन सुस्वादु खा पायेगा? यही संशय तब धड़कन में धक धक करता रहता है और आप उसकी थाप को अपने ध्यान से हटा नहीं पाते हैं। जब साहित्य और सृजनता मंद मंद बयार के रूप में बह रही हो, तब अपने मन के अंधकार को टटोलने का मन किसका करेगा, विस्तार के आनन्द से सहसा संकुचित हो जाना किसको भायेगा भला?

यह समस्या मेरी ही नहीं है, कई मित्र हैं मेरे, जब वे अच्छा पढ़ने बैठते हैं तो लिखना बन्द कर देते हैं। बहुत से ब्लॉगर ऐसे हैं जिन्होंने लिखना कम कर दिया है। उनका लिखा पढ़ने को कम मिल रहा है, उसका दुख तो है, पर इस बात की प्रसन्नता है कि वे निश्चय ही बहुत ही अच्छा पढ़ रहे होंगे और भविष्य में और धमाके के साथ लिखना पुनः प्रारम्भ करेंगे। डर पर इस बात का है कि कहीं अच्छा पढ़ने की लत में वे लिखना न भूल जायें। सारा ज्ञान स्वयं समा लें, सारा आनन्द स्वयं ही गटक जायें और हम वंचितों के आस भरे नेत्रों को प्यासे रहने के लिये छोड़ दें।

तो प्रश्न बड़ा मौलिक उठता है, कि यदि इतना स्तरीय और गुणवत्तापूर्ण लिखा जा चुका है तो उसी को पढ़कर उसका आनन्द उठाया जाये, क्यों समय व्यर्थ कर लिखा जाये और औरों का समय व्यर्थ कर पढ़ाया जाये। कई लोग इस बौद्धिक गुणवत्ता और पवित्रता को बनाये रखना चाहते हैं और पुरातन और शास्त्रीय साहित्य पढ़ते रहने में ही अपना समय बिताते हैं। अपने एक वरिष्ठ अधिकारी को जानता हूँ, उनका अध्ययन गहन और व्यापक है। उन्हें जब कुछ ब्लॉग आदि लिखने के लिये उकसाया तो बड़ा ही स्पष्ट उत्तर दिया। कहा, प्रवीण, जो भी जानने योग्य है, वह सब इन पुस्तकों में है, यदि कुछ लिखा जायेगा तो वह इसी ज्ञान के आधार पर ही लिखा जायेगा। हम तो इसी के आनन्द में डूबे रहते हैं।

वहीं दूसरी ओर हम हैं कि अपनी समझ को भाँति भाँति प्रकार से समझाने के प्रयास में लगे रहते हैं। जिस प्रकार समझते हैं, अधकचरा या अपरिपक्व, उसी प्रकार व्यक्त करने बैठ जाते हैं। दोष हमारा भी नहीं है, अभिव्यक्ति में व्यक्ति छिपा हुआ है, यह स्वभाव भी है। अभिव्यक्ति कभी कभी इतनी तरल और सरल हो जाती है कि मर्म तक उतर जाती है। मुझे बहुधा यह भी लगता है कि किसी विषय को व्यक्त करने के क्रम में वह हमारे मन में और भी स्पष्ट हो जाता है।

यह दोनों पक्ष इतने सशक्त हैं कि निर्दलीय बने रहना कठिन हो जाता है, पढ़ना आवश्यक है और पढ़ते पढ़ते लिखना भी। यह समस्या हमारी भी है और आपकी भी, उत्तर आप भी ढूढ़ रहे होंगे और हम भी। पर पढ़ते रहने के क्रम में अनुशासन का बाजा नहीं बजने देना है, कल उठना है समय से और पिता और पुत्र दोनों के ही साथ योग भी करना है और ध्यान भी, यह जानने के लिये कि पढ़ते पढ़ते लिखना कैसे सीखा जाये।