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15.11.14

प्रियतम

खोजता दो नेत्र, जिनमें स्वयं को पहचान लूँ मैं,
आप आये, पंथ को विश्राम मिल गया है ।

प्रेम की दो बूँद चाही, किन्तु सागर में उतरता,
आपके सामीप्य का अनुदान मिल गया है ।

हृदय में प्रतिमा बनी थी, और मन से पूजता था,
कहूँ कैसे देवता अन्जान मिल गया है ।

1.11.14

स्वप्न सुनहला

स्वप्न सुनहला देखा मैंने,
सुन्दर चेहरा देखा मैंने ।
मन में संचित चित्रण को,
बन सत्य पिघलते देखा मैंने ।।१।।

आनन्दित जागृत आँखों में,
सुन्दर तेरा रूप सलोना ।
मन की गहरी पर्तों में,
निर्द्वन्द उभरते देखा मैंने ।।२।।

शब्द कभी भी नहीं मिलेंगे,
उपमाओं में नहीं समाना ।
आज कल्पना को फिर से,
हो विकल विचरते देखा मैंने ।।३।।

11.10.14

स्वप्न-सुन्दरी

खड़ी कहीं पर दूर, कल्पना के अनन्त विस्तारों में,
सुख मदिरा में चूर, नियन्त्रित नहीं मनस उद्गारों में,
यौवन से भरपूर , सिमटती नहीं शब्द आकारों में,
स्वप्नकक्ष की अनघ सुन्दरी, जाने कब से बुला रही है ।

पर हूँ मैं असमर्थ मधुरते,
स्वप्नों के सेवक हैं हम सब,
स्वप्नों के महलों में जाकर,
साधिकार नहीं रह सकते ।

हाँ जब वह दिन आयेगा,
स्वप्न रहेंगे शेष नहीं तब,
स्वप्न-भार से मुक्त व्यक्ति,
तब तेरे ही द्वारे आयेगा ।

13.8.14

चित्र तुम्हारे

कभी सजाये बड़े यत्न से,
रंग कल्पना के चित्रों में,
चित्र तुम्हारे आज स्वयं हीफीके क्यों पड़ते जाते हैं ?
और मुझे क्यों रेखाआें के उलझे चित्रण ही भाते हैं ?

नहीं क्यों श्रृंगार जीवित,
आज शब्दों के चयन में,
ना जाने क्यों आदर्शों के कोरे प्रकरण ही भाते हैं 
चित्र तुम्हारे आज स्वयं हीफीके क्यों पड़ते जाते हैं ।।१।।

नहीं रीझता हृदय आज क्यों,
मधुर सहजता के गुञ्जन में,
क्यों कानों में आज कृत्रिमता के दानव चिल्लाते हैं 
चित्र तुम्हारे आज स्वयं हीफीके क्यों पड़ते जाते हैं ।।२।।

नहीं आज क्यों वर्षित होता,
प्रेमप्रणय मेरे उपवन में,
ना जाने क्यों मेघ प्रेम के बिन बरसे ही उड़ जाते हैं 
चित्र तुम्हारे आज स्वयं हीफीके क्यों पड़ते जाते हैं ।।३।।

जीवन के सूखे से वन में,
सूने से इस पीड़ित मन में,
अनवरत बढ़ती व्यथा और प्रश्न यही पूछे जाते हैं 
आकर्षक जो चित्र तुम्हारेफीके क्यों पड़ते जाते हैं ।।४।।

2.7.14

कल्पना


उत्कर्षों को छूती इच्छा,
मात्र कल्पना का आच्छादन 
निष्कर्षों से शून्य धरातल,
जाने तुमसे क्या पाना है ?

बन्द नयन में मेरे तेरी,
छिपी हुयी है रूप-धरोहर 
मन में तेरा पूरा चित्रण,
सच में लेकिन क्या जाना है ?

कभी बैठ एकान्त जगह,
तू हँसती हैमैं सुनता हूँ 
इन स्वप्नों के अर्धसत्य को,
कब तक यूँ ही झुठलाना है ?

अथक कल्पनाअतुल समन्वय,
मन भावों की कोमल रचना 
इस प्रतिमा में लेकिन जाने,
कैसा रंग चढ़ाना है ?

26.12.12

कोई हो

खड़ा मैं कब से समुन्दर के किनारे,
देखता हूँ अनवरत, सब सुध बिसारे ।
काश लहरों की अनूठी भीड़ में अब,
कोई पहचानी, पुरानी आ रही हो ।
कोई हो जो कह सके, मत जाओ प्यारे,
कोई हो जो मधुर, मन को भा रही हो ।।१।।

कोई कह दे, नहीं अब मैं जाऊँगी,
संग तेरे यहीं पर रह जाऊँगी ।
कोई हो, एकान्त की खुश्की मिटाने,
नीर अपने आश्रय का ला रही हो ।
कोई हो जो बह रहे इन आँसुओं के,
मर्म की पीड़ा समझती जा रही हो ।।२।।        

कोई कह दे, छोड़कर पथ विगत सारा,
तुझे पाया, पा लिया अपना किनारा ।
कोई कह दे, भूल जाओ स्वप्न भीषण,
कोई हो जो हृदय को थपका रही हो ।
कोई कह दे, देखता जो नहीं सपना,
कोई हो जो प्रेयसी बन आ रही हो ।।३।।

11.1.12

ऐसी सजनी हो

आँखों ही आँखों में मन के, भाव समझकर पढ़ जाती हो,
हृद की अन्तरतम सीमा में, सहज उतरकर बढ़ जाती हो ।
भावों में सागर लहरों सी, सतत बहे, मधुमय रमणी हो,
हो संजीवनि, नवजीवन सी, संग रहे, ऐसी सजनी हो ।।१।।

अरुण किरण सी, नभ-नगरी में, बन जाये स्फूर्ति चपलता,
डुला रही अपने आँचल से, बन पवनों का शीतल झोंका ।
धीरे धीरे नयन समाये, अलसायी, मादक रजनी हो,
हो संजीवनि, नवजीवन सी, संग रहे, ऐसी सजनी हो ।।२।।

मन के अध्यायों में सब था, किन्तु तुम्हारा नाम नहीं था,
तत्पर, आतुर, प्रेमपूर्ण वह, मदमाता अभिराम नहीं था ।
आ जाये, ऐश्वर्य दिखाये, सकल ओर मन मोह रमी हो,
हो संजीवनि, नवजीवन सी, संग रहे, ऐसी सजनी हो ।।३।।

(बस इतना जान लीजिये कि विवाह के बहुत पहले लिखी थी, यह आसभरी कविता)

20.4.11

पर साथ छोड़ क्यों चली गयी

विवाह-पूर्व के प्रेमोद्गारों में एक अनकही सी कड़ी सेंसरशिप लगी रहती है। आप कितना भी उन्हें समझा लें कि यह रचना विशुद्ध कल्पनाशीलता का सुन्दरतम निष्कर्ष है पर आपका आश्वासन धरा का धरा रहता है और उस रचना के हर शब्दों में वह आकार ढूढ़ा जाता है जिसको हृदय में रखकर यह कविता लिखी गयी होगी।

इस संशयात्मक दृष्टिभरी प्रक्रिया में साहित्य की विशेष हानि होती है। जिन रचनाओं को उत्सुक प्रेमियों का हृदयगीत बन अनुनादित होना था, वे अपने अस्तित्व के घेरों और अंधेरों में विवादित हो पड़ी रहती हैं।

आज निर्भयात्मक उच्छ्वास ले उसे आपके सामने रख दे रहा हूँ। आपसे भी यही अनुरोध है कि प्रेम की सुन्दर अल्पना पर अपनी कल्पना के घोड़े दौड़ा कर उसे कोई और रूप न दें, बस पूर्ण साहित्यिकता से बांचें।


मैने अपने जीवन के, सुन्दरतम स्वप्नों के रंग को,
तेरे कोरे कागज जैसे, आमन्त्रण में भरने को,
सरसायी उन आशाओं में, मैं उत्सुक था, उत्साहित था,
तू आयी भी, इठलायी भी, पर साथ छोड़ क्यों चली गयी ।।१।।

क्यों मुक्त-पिपासा शब्दों का आकार नहीं ले पाती है,
ना जाने किस आशंका में, आकांक्षा कुढ़ती जाती है,
थी व्यक्त सदा मन-अभिलाषा, हर्षाये नेत्र-निवेदन से,
तू समझी भी, मुस्कायी भी, पर साथ छोड़ क्यों चली गयी ।।२।।

है नहीं वाक्‌ प्रतिभा मुझमें, ना ही शब्दों का चतुर चयन,
है नहीं सूझता, किस प्रकार से कह दूँ, हृद के स्पन्दन,
आँखों में था लिये हुये, आन्दोलित मन के आग्रह को,
आँखों से आँख मिलायी भी, पर साथ छोड़ क्यों चली गयी ।।३।।