Showing posts with label बंगलोर. Show all posts
Showing posts with label बंगलोर. Show all posts

6.7.13

दृष्टिक्षेत्रे

सायं का समय था, वाहन की अगली सीट से सामने का दृश्य स्पष्ट दिख रहा था। आस पास कई और वाहन थे, लम्बे और मँहगे भी, सामने सिग्नल लाल था। निरीक्षण हेतु घर से बाहर निकले पर्याप्त समय हो गया था, कार्य होने के बाद वापसी की ओर दिशा थी, सारे मैसेज, मेल आदि मोबाइल पर देख चुका था, निरीक्षण रपट के बिन्दु लिख चुका था, ड्राइवरजी को कोई एफएम चैनल लगाने की अनुमति दे दी, संभवतः उन्हें अच्छे से ज्ञात रहता है कि किस समय किस चैनल पर कर्णप्रिय गीत आते हैं। एक नया गाना चल रहा है, तुम ही हो, आशिकी २ फिल्म का, अरिजीत सिंह के मधुर कण्ठ में, हर साँस में नाम तेरा। किसी का गाना इतना प्रभाव उत्पन्न कर रहा है, निश्चय ही मन से गाया होगा।

थोड़ी देर पहले बारिश हुयी थी, पूरा वातावरण नम था, फुटपाथ का रंग पानी में धुलकर और भी गाढ़ा हो चला था। दृश्य अन्य दिनों की तुलना में अधिक स्पष्ट थे। बंगलोर में आसमान कम ही दिखता है, जब सामने भवन घेरे खड़े हों, तो उनसे बचकर दृष्टि भला ऊपर कहाँ जा सकती है? आसमान तो वैसे भी नहीं दिख रहा है, स्याह दिख रहा है फुटपाथ की तरह ही गीला होकर गाढ़ा हो गया है उसका रंग, या कहें कि पानी से बचने के लिये बादलों को ही ओढ़ लिया है उसने, कि कहीं गीले न हो जायें। जब भी इधर पानी फिर बरसेगा, आसमान सूखकर फिर से नीला हो जायेगा, खुला खुला, सूखा सूखा।

सामने एक कार खड़ी है, यह तो कर्नाटक एक्सप्रेस है, नहीं उसकी नम्बर प्लेट पर जो अंक है, वह कर्नाटक एक्सप्रेस का ट्रेन नम्बर है, २६२७। नहीं, नहीं अब तो ट्रेनों के नम्बर पाँच अंकों के हो गये हैं, इसके आगे भी १ लग कर १२६२७ हो गया है। एक साथी के पास वाहन है, उसका नम्बर मुजफ्फरपुर इण्टरसिटी का है, उसके वाहन को देखकर अभी भी हाजीपुर के दिन याद आ जाते हैं। पता नहीं, पर परिचालन के पदों में रहते हुये और ट्रेनों का पीछा करते करते, अब ट्रेनों के नम्बर हमारा पीछा करने लगे हैं। जो भी वाहन दिखता उसकी नम्बर प्लेट में कोई न कोई ट्रेन नम्बर दिख जाता है। पता नहीं कब छूटेगा यह खेल मन से।

पानी बरसने से सारा धुआँ पानी में घुलकर बह गया, वातावरण स्वच्छ सा दिखने लगा, वाहन की खिड़की खोली, थोड़ी शीतल हवा अन्दर आयी, सर्र से, चेहरे पर सलोना सा झोंका पडा, मन आनन्द से भर गया। पानी वायु प्रदूषण तो बहा कर ले गया पर इस ध्वनि प्रदूषण का क्या करें, क्या करें वाहनों के उस कोलाहल का जो गीत सुनने में व्यवधान डाल रहा है। शीतल बयार के साथ कर्कश कोलाहल निशुल्क ले जाइये। खिड़की बन्द करते ही शान्ति सी घिर आयी। अब लगता है कि कार के अन्दर वातानुकूलता के तीन प्रमुख लाभ हैं, तापमान स्थिर रहता है, धूल और धुआँ नहीं आता है और सड़क का कोलाहल कानों को नहीं भेदता है। पता नहीं एसी बनाने वाली कम्पनियाँ कब इन तीनों लाभों को अपने प्रचार मे समाहित कर पायेंगी।

सामने के ट्रैफिक सिग्नल पर उल्टी गिनती चल रही है, १२० से शून्य तक, यहाँ पर दो मिनट का टाइमर नियत है। आप कहीं प्रतीक्षा करते करते ऊब न जायें अतः ट्रैफिक सिग्नलों पर उल्टी गिनती का प्रावधान कर रखा है। कहते हैं किसी भी चीजों को अंकों में बदल लेने से उस पर नियन्त्रण सरल लगता है, समय बिना गिनती के सम्हलता ही नहीं है, कभी सिकुड़ जाता है, कभी फैल जाता है। यहाँ पर १२० तक की गिनती में लगता है कि समय अपनी गति से ही चल रहा है।

पर पता नहीं क्यों, ये लोग उल्टी गिनती गिनते हैं, सीधी भी गिन सकते थे। पर उसमें एक समस्या है, पता नहीं चलता कि कहाँ रुकना है, क्योंकि कई स्थानों पर ६० सेकण्ड की प्रतीक्षा है तो कई स्थानों पर १८० सेकेण्ड की। यदि ऐसा होता और सीधी गिनती गिनते, तो पता चलता कि सहसा सिग्नल हरा हो गया, सब गाड़ी एक साथ चल पड़ीं, एक अनोखा खेल बन जाता, मनोरंजक सा। तब संभवतः प्रतीक्षा रोचक हो जाती, कि पता नहीं कब रास्ता मिल जायेगा। होना तो यह चाहिये कि इस पर शर्त लगाने के लिये इसे अनिश्चित कर देना चाहिये, लोग प्रतीक्षा के समय शर्त लगाया करेंगे, उनका समय भी कट जायेगा और मनोरंजन भी पूर्ण होगा। अभी तो हमें उल्टी गिनती पूरी याद हो गयी है, बचपन में मास्टर साहब ने बहुत पूछा था, उल्टी गिनती, अब पूछते तो सुनाकर प्रथम आ जाते। मैं ही क्यों, पूरा बंगलोर ही प्रथम आ जाता, पूरा समय उल्टी गिनती ही तो गिनने में बीतता है, यहाँ के लोगों का।

सिग्नल महोदय सहसा हरे हो जाते हैं, उनके हरे होने से जितनी प्रसन्नता बरसती है, उतनी संभवतः पेड़ों के हरे होने पर भी नहीं बरसती होगी। हमारा वाहन भी इठलाता हुआ चल देता है, अगले सिग्नल तक तो निश्चिन्त।

जून का माह समाप्त होने को आया है, अब तक तो सबकी ग्रीष्मकालीन छुट्टियाँ समाप्त हो गयी होंगी। यहाँ पर फिर भी कुछ पर्यटक दिख रहे हैं, संभवतः आज या कल तक वापस चले भी जायें। बाजार के आसपास निश्चिन्त टहलते हुआ कोई यहाँ रहने वाला गृहस्थ तो नहीं हो सकता। यहाँ के युवा भी नहीं होंगे, क्योंकि वे बहुधा इतने खुले स्थानों पर नहीं पाये जाते हैं। बाहर से आने वाले ही होंगे, क्योंकि इतने आत्मविश्वास और मंथर गति से चलने वाले, छुट्टियाँ का आनन्द उठाने वालों के अतिरिक्त कोई और हो भी नहीं सकते हैं। बंगलोर आज अपने पूरे सौन्दर्य में हैं, पर्यटकों का पैसा वसूल है आज तो।

घर आ जाता है, अब दृष्टि में परिवार है। आज आने में देर हो गयी। नहीं, थोड़ा ट्रैफिक जाम था, धीरे स्वर में ऐसे बोले कि जैसे दृष्टि भी जाम थी। अब जिनको ट्रैफिक जाम में कष्ट हो, तो हो, हमें तो जीभर कर देखने को मिलता है, जीभर कर समझने को मिलता है। अगली बार कुछ और देखा जायेगा, जितनी अधिक प्रतीक्षा, उतना बड़ा दृष्टिक्षेत्र।

5.1.13

कांजी हाउस - गाड़ियों का भी

बंगलौर में कई बार सड़क से जाते समय देखता हूँ कि एक क्रेनयुक्त वाहन खड़ा रहता है जो ठीक से पार्क न किये हुये दुपहिया वाहनों को लादता है और कहीं जाकर छोड़ आता है। संभवतः गाड़ियों का भी कोई कांजी हाउस होता होगा, जो आवारा गाड़ियों को रखने के काम आता होगा।

अब बंगलौर में इतने वाहन हैं कि घरों में उन्हें खड़े करने का स्थान ही नहीं है, हर पाँच घर में एक चौपहिया। यदि सारी गाड़ियों का क्षेत्रफल निकाला जाये और उसे सड़कों के क्षेत्रफल से घटा दिया जाये तो चलने के लिये बहुत कम स्थान ही बचेगा। प्रतिदिन 7000 वाहनों के पंजीकरण के बाद वह दिन शीघ्र ही आयेगा जब सारी सड़कों का उपयोग केवल वाहनों की पार्किंग के लिये किया जायेगा, तब किसी एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिये समय पहले से ही आवंटित कराना पड़़ेगा, लम्बी लम्बी प्रतीक्षा सूचियाँ बनेगी। अपने वाहन में एक बार यात्रा कर लेना लॉटरी लगने जैसा हुआ करेगा, मंत्रीगण संस्तुतियाँ किया करेंगे।

ऐसा नहीं है कि यहाँ पर लोगों को भान नहीं है, पर क्या करें हर किसी के पास वाहन है और हर किसी को उसको उपयोग करने का मन भी होता है, कभी दिखावे के लिये, कभी आवश्यकता के लिये। किसी भी बाज़ार जाने पर गाड़ी की पार्किंग कर पाना एक विशेष उपलब्धि होती है। बाज़ार के चहल पहल के क्षेत्र में परिचालन बाधित न हो, इसके लिये पुलिस ने उन क्षेत्रों में पार्किंग प्रतिबंधित कर रखी है। लोगों का मन फिर भी नहीं मानता है, उन्हें लगता है कि जब बड़े बड़े अपराधों में पुलिस उलझी हुयी है, अधिक गम्भीर आर्थिक संभावनाओं में पुलिस उलझी हुयी है, तो छोटा सा और कुछ समय के लिये किया गया नियम उल्लंघन भला कहाँ से पुलिस की दृष्टि में आ पायेगा?

परंपरागत कारणों से भले ही पुलिस विशिष्टजनों को छोड़ दे पर आमजनों से उसकी पैनी दृष्टि कभी नहीं हटती है। आप छोटा सा नियम उल्लंघन कर के तो देखिये, गिद्ध जितनी दूरी से देखकर कोई न कोई आपको बताने आ जायेगा कि आपने क्या अपराध किया है और किन रूपों में वह विस्फोटित होता हुआ गम्भीर अपराध बन सकता है। आप तब समर्पण के सिवाय कुछ और सोच भी नहीं सकते हैं। पुलिस जनों की सामान्य प्रवृत्तियों को छोड़ भी दिया जाये तब भी आपका बचना असंभव है। आप किसी एक सुनसान पड़े चौराहे पर समय बचाने के लिये लाल बत्ती पर निकल जाते हैं, घर में ५ मिनट पहले पहुँच कर दो तीन दिनों में इस घटना के बारे में भूल भी जाते हैं, पर सहसा आपके घर में दण्ड भरने का नोटिस आ जाता है, नियम उल्लंघन के चित्र के सहित। आपकी चतुराई धरी की धरी रह जाती है, आप आगे से ऐसा न करने का वचन कर डालते हैं, अगले अवसर तक।

कई लोग यातायात पुलिस की अन्तर्यामी दृष्टि से सुधर चुके हैं पर सबको इसका स्वाद कहाँ मिला है अभी तक। सो नियम उल्लंघन होते रहते हैं और आँखमिचौनी का खेल चलता रहता है। एक मित्र ने जब इस भेद की व्याख्या की तब कहीं जाकर सब समझ में आया। जैसे संजय की दृष्टि पाकर ही धृतराष्ट्र सब जान पाये थे, उसी प्रकार तकनीक के सहारे बंगलौर की यातायात पुलिस नगर पर अपना नियन्त्रण गाँठे हुये है। सारे नगर में सीसीटीवी कैमरे लगे हैं, लगभग हर चौराहों पर, देखने में बिजली के लैम्पों की तरह ही दिखते हैं। नियन्त्रणकक्ष में बैठे सतर्क निरीक्षक चित्र को ज़ूम करके गाड़ी का नम्बर नोट कर लेते हैं, डाटाबेस से गाड़ी से सम्बन्धित तथ्य और मालिक का पता एकत्र कर चालान बन जाता है और दोषी चालक को भेज दिया जाता है, चित्र, स्थान और समय के सहित। आप विवश और हतप्रभ हो कहीं दुबारा वह न करने का प्रण कर लेते हैं।

इस तरह जहाँ एक ओर वाहनों पर दृष्टि बनी रहती है, वहीं दूसरी ओर कार्य न करने वाले पुलिसवालों पर भी नियन्त्रण रहता है। सतर्क और पर्याप्त मात्रा में उपस्थित यातायात पुलिसबल की संख्या इसी दिव्य दृष्टि का परिणाम है।

संभवतः यही तकनीकी और प्रशासनिक कारण रहा होगा कि क्रेनयुक्त एक वाहन सदा ही आवारा वाहनों को उनके कांजीहाउस में पहुँचाने के लिये सदा कार्यरत सा दिख जाता है। ये कार्य ठेके पर दिया गया है, एक निश्चित पारिश्रमिक के अतिरिक्त एकत्र किये हुये वाहनों की संख्या पर भी कोई न कोई आर्थिक प्रलोभन रखा गया होगा। सर्वप्रथम तो अधिक धन कमा लेने की सहज प्रवृत्ति उन्हें अतिसजग और अतिउत्साही बनाये रखती है। यदि किसी स्थान पर अनाधिकृत वाहन खड़ा है और वहीं खड़ी क्रेनयुक्त अपना कार्य नहीं कर रही है तो नियन्त्रण कक्ष से क्रोध के उद्गार फूटने लगते हैं। यही नहीं, जहाँ पर क्रेनयुक्त वाहन नहीं भी है, निकटस्थ वाहन को वहाँ पहुँचने के निर्देश मिल जाते हैं। यदि इन सबसे दोषी वाहन बच भी गया तो भी लिये गये चित्र के आधार पर आपके घर में चालान पहुँचना निश्चित है।

आवारा वाहन सशंकित हैं, पता नहीं कब वे भी कांजी हाउस पहुँच जायें और उनके मालिक को छुड़ाने आना पड़े। सुविधा छूटे, समय व्यर्थ हो और धन व्यय हो, सो अलग। नागरिकों की समस्या बड़ी विचित्र हो चली है, जहाँ एक ओर नये नये वाहनों का संख्या यहाँ के यातायात और पार्किंग स्थलों का दम घोटे हुये है, वहीं दूसरी ओर यातायात पुलिस की अन्तर्यामी दृष्टि नियमों को मानने को बाध्य किये हुये है। अब या तो वाहन का उपयोग न कर बस का उपयोग करे या वाहन कहीं दूर खड़ाकर पैदल चलकर उस स्थान जाये या अपनी समस्याओं का स्थानीय निदान ढूँढ़ें।

पता नहीं किसकी गति अधिक है, साधनों की या सुविधाओं की या व्यवस्थाओं की। बंगलौर में वाहन के साधन हैं, यथानुरूप पार्किंग की सुविधा नहीं है और व्यवस्था इतनी सुदृढ़ है कि आप नियमों का उल्लंघन नहीं कर सकते हैं। वाहन आवारा घोषित हुये जा रहे हैं, कांजीहाउस भी तैयार हो रहे हैं उन आवारा वाहनों के लिये। पता नहीं किसका अपमूल्यन है, मानवीय प्रकृति का या वैश्विक प्रकृति का। कांजीहाउस, क्या सोचने को विवश नहीं करते आपको।

7.11.12

बंगलोर, मेट्रो और साइकिल

अभी कुछ दिन पहले एक समाचार पढ़ा कि बंगलोर मेट्रो अपने प्रमुख स्टेशनों पर साइकिलें रखेगी। इन साइकिलों का उपयोग मेट्रो में यात्रा करने वाले लोग अपने स्थान से मेट्रो स्टेशन आने जाने में कर सकेंगे। इनका रख रखाव व उपयोग पूरी तरह से इलेक्ट्रॉनिक माध्यम पर आधारित होगा। यह सेवा सशुल्क होगी और उपयोगकर्ता प्रति घंटे से लेकर वार्षिक मूल्य तक एक बार में चुका सकते है। यह सेवा मेट्रो के लिये लाभदायक होगी, बंगलोर नगर के लिये लाभदायक होगी और यदि सब कुछ ठीक चलता रहता तो यह सेवा बंगलोर की सड़कों से बड़े वाहनों और यातायात के अवरोध को कम कर देगी। इस सेवा को लागू करने के ठेके दिये जा चुके हैं और इससे होने वाली आय में मेट्रो का भी भाग होगा।

पढ़कर बहुत अच्छा लगा। जो कार्य विकसित देशों के बड़े नगरों में हुआ हो और सकुशल चल रहा हो, वह यदि बंगलोर में भी चलने लगे तो प्रसन्नता स्वाभाविक ही है। न केवल चलने लगे, वरन अपने उद्देश्यों को पा भी ले, पर्यावरण की मार्मिक स्थिति को सुधार दे, धुँयें से भरी सड़कों पर शीतल स्वच्छ बयार बहा दे और यातायात अवरोध में घंटों व्यर्थ हुये समय को यथासंभव कम कर दे। मुझे इस प्रयास में जितनी अधिक रुचि है, इसकी सफलता में उतना ही अधिक संशय। मैं इसलिये प्रश्न नहीं खड़े करने जा रहा हूँ कि यह एक दोषपूर्ण अवधारणा है। मैं इसका विश्लेषण इसलिये करना चाहता हूँ क्योंकि समुचित और समग्र योजना के अभाव में इतने क्रान्तिकारी विचार को निष्फल होते नहीं देखना चाहता हूँ।

निश्चय ही दिल्ली मेट्रो ने यह सिद्ध किया है कि न केवल मेट्रो महत्वपूर्ण है वरन उस मेट्रो की फीडर सेवायें भी उतनी ही आवश्यक हैं। यातायात एक समग्र उत्पाद है और इसके कई अंग हैं। नगरीय सेवाओं का स्वरूप देखें तो दैनिक यात्री कुछ पैदल चलते हैं, कुछ फीडर सेवाओं से और शेष नगरीय बसों या मेट्रो से। यदि सेवायें इस दिशा में हों तो दैनिक यात्री को थोड़ा बहुत पैदल चलना अखरता नहीं है। फीडर सेवायें मेट्रो का प्राकृतिक विस्तार है, जनसंख्या या नगर में जितना गहरे तक जायेंगी, मेट्रो उतना ही सफल होगी, लोग अपने वाहन की सुविधा उतना ही तजकर और कुछ सौ मीटर पैदल चल कर मेट्रो का उपयोग करने लगेंगे।

नगर के अन्दर साइकिलों का उपयोग एक भिन्न प्रयोग है। साइकिल बहुत अधिक दूरी के लिये उपयोग में नहीं लाई जा सकती हैं, पर ६-७ किमी की दूरी के लिये सर्वोत्तम साधन है। २० मिनट में दूरी तय हो जाती है, हल्का व्यायाम हो जाता है और थकान भी नहीं होती है। हमारे गाँवों और छोटे नगरों में स्कूटर आदि आने के पहले तक साइकिल ही प्रमुख माध्यम होता था, छोटी दूरियाँ तय करने के लिये। नगरीय परिवेश में हर स्थान पर बस सेवायें नहीं जा सकतीं। नगर के प्रमुख केन्द्र से आसपास के व्यावसायिक और शैक्षणिक स्थानों पर जाने के लिये ऑटो या रिक्शा सबके लिये आर्थिक रूप से साध्य नहीं है। इस अन्तर को भरने का कार्य साइकिल से अच्छा कोई नहीं कर सकता है। पर्यटन स्थलों में जहाँ कई स्थान कुछ किलोमीटर की दूरी पर ही होते हैं, साइकिल के द्वारा सरलता से पहुँचे जा सकते हैं।

पेरिस, मॉन्ट्रियल, कोपेनहेगन, ब्रिसबेन आदि नगरों में साइकिलों को बढ़ावा दिया गया है, बिना किसी व्यावसायिक उद्देश्य के, विशुद्ध पर्यावरणीय कारणों से, दैनिक यात्रियों और पर्यटकों की सुविधा के लिये। यदि एक यात्री भी अपना वाहन छोड़कर साइकिल की सुविधा अपना लेता है तो, साइकिल का मूल्य तो निकल ही आयेगा, उसके अतिरिक्त भी कितने लाभ होंगे, उसकी गणना विकास की अवरुद्ध राहें खोलने में सक्षम होगी। यदि इन सेवाओं को लागू करना हो तो उसमें उपयोगकर्ताओं से धन उगाहने का आग्रह तो बिल्कुल ही न हो, वरन उपयोगकर्ताओं को प्रोत्साहित करने के प्रयास हों।

जब यह सुविधा सर्वहितकारी है तो ऐसे क्या कारण हैं जो इसे लागू करने में कठिनाई उत्पन्न कर सकते हैं? दो प्रमुख आवश्यकतायें हैं और दोनों का ही निदान नगरीय प्रशासन के हाथों में है।

पहला तो साइकिल अन्य वाहनों के साथ नहीं चल सकती हैं। लहराते और मदमाते वाहनों से भरी सड़कों पर कोई भी इतना साहस नहीं कर पायेगा कि निशंक हो चल सके। वैसे अभी भी कई साहसी युवकों को देखता हूँ जो सर पर हेलमेट बाँधे तेज भागती गाड़ियों के बीच जूझते रहते हैं। पर रोमांच के लिये साइकिल चलाने और दैनिक जीवन में अपनाने में अन्तर है। यदि नगर में इसे लागू करना है तो पतला सा ही सही पर एक आरक्षित मार्ग सुनिश्चित करना होगा और वह भी हर स्थान पर पहुँचने के लिये। समस्या यहीं पर आ जाती है, जिस नगर में सारा यातायात रेंग रेंग कर चलता हो, वहाँ की सड़कें और पतली कर उसमें साइकिल मार्ग निकालने का प्रयास करेंगे तो समस्या सुलझने के पहले ही उलझ जायेगी। इसका समाधान निकालना ही होगा, आंशिक नहीं, वरन पूरा। एक कार के स्थान पर ४-६ साइकिलें आराम से चल सकती हैं, इस दृष्टि से अन्ततः समस्या सुलझनी ही है, पर इसे समुचित रूप से प्रारम्भ करने की कार्ययोजना बड़ी कठिन होगी और साथ ही साथ कई कड़े निर्णयों से भरी पूरी भी।

दूसरी कठिनाई होगी, स्थापित यातायात के साधनों का विरोध। वर्तमान में छोटी दूरी की आवश्यकताओं के फलस्वरूप करोड़ों की अर्थव्यवस्था चल रही है। बंगलोर में ही ७० हज़ार से अधिक ऑटो अधिकांशतः इसी आवश्यकता से पोषित होते हैं, साथ ही साथ टैक्सी सेवायें आदि भी इसी आवश्यकता से अपना व्यवसाय चला रही हैं। इनके विरोध और कार्य-विकल्प का समुचित प्रबन्ध करना पड़ेगा।

ऐसा नहीं है कि नगर का यातायात नहीं चल रहा है। आप एक से दूसरे स्थान पर पहुँच ही जाते हैं। बस समय अधिक लगता है, धन अधिक लगता है, असुविधा अधिक होती है और प्रदूषण अधिक होता है। मेट्रो, बस और साइकिल आदि इस दिशा में ही हैं जिससे सारे व्यर्थ हो रहे संसाधनों की बचत हो सके। तन्त्र में असीमित सुधार की संभावना़यें भी हैं, उपाय भी। प्रशासन में बैठे लोग संवेदनशील हैं और नागरिक जागरूक, समस्याओं को निदान मिलना ही है और निदान को दिशा भी। एक भविष्य का स्पष्ट खाका खींचिये और वहाँ तक पहुँचने के साधन और योजना जुटाइये, इसी में सर्वहित छिपा है।

बंगलोर मेट्रो का यह प्रयास निश्चय ही सराहनीय है कि उन्होंने दो प्रयोगों को एक में ही समाहित करके एक नया तन्त्र बनाने का यत्न किया है। दोनों प्रयोग भिन्न हैं, दोनों की ही उपयोगिता है नगर के यातायात को सुधारने के लिये, पर इस तरह का बिन विचार किये हुये घालमेल करने से उसकी सफलता संशयपूर्ण लगती है। जिन दो तीन स्थानों पर मेट्रो स्टेशन देखना हुआ है, वहाँ की सड़कों पर साइकिलों को कैसे स्थान मिलेगा, यह एक यक्ष प्रश्न है।

22.9.12

एक आवश्यक निर्णय

बंगलोर की नगरीय व्यवस्थायें सुदृढ़ हैं, तन्त्र कार्यरत रहता है। पहले यही लगता था कि जहाँ पर इतने अधिक लोग रहते हों, वहाँ पर कोई अव्यवस्था न फैले, यह कैसे संभव है? ट्रैफिक की अधिकता के कारण बहुधा जाम लग जाते हैं, लेकिन धीरे ही सही पर गति बनी रहती है, अनुशासन भी रहता है और ट्रैफिक पुलिस की उपस्थिति भी। पानी और बिजली व्यवस्था उस गति से नहीं फैल पा रही है जिस गति से नगर बढ़ रहा है, पर जहाँ भी है, सुचारु रूप से चल रही है। भविष्य का चिन्तन थोड़ा उद्वेलित कर सकता है क्योंकि बंगलोर अभी भी हर प्रकार से जनसंख्या के आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। अच्छा मौसम, नौकरियों की प्रचुरता, अच्छे लोग, सुदृढ़ विधि व्यवस्था, उन्नत शिक्षा, ये सब कारक हैं जो भविष्य में भी आने वाली जनसंख्या का प्रवाह बनाये रखेंगे।

एक और पक्ष जिस पर नगर में रहने वालों का अधिक ध्यान नहीं जा पाता है, वह है यहाँ की सफाई व्यवस्था। सामने से इतना अधिक कार्य होता नहीं दिखता है पर नगर स्वच्छ रहता है, नियत स्थान पर ही कूड़ा मिलता है, सड़कें और गलियाँ स्वच्छ मिलती हैं। सफाई कर्मचारी, जिन्हें यहाँ पर पौरकर्मिका भी कहा जाता है, बहुत सुबह से ही सफाई में लग जाते हैं। कई बार रात्रि निरीक्षण से वापस आते समय ब्रह्ममुहूर्त में उन्हें बंगलोर की सड़कों पर कार्य करते हुये देखा तो न केवल सुखद आश्चर्य हुआ वरन यह भी पता लगा कि कैसे बंगलोर इतना स्वच्छ रह पाता है। सुबह की व्यस्तता के बाद, जब घरों का कूड़ा बाहर आ जाता है और सड़कों से कार्यालय और विद्यालय आदि जाने वाले वाहनों की संख्या कम हो जाती है, तो महापालिका के ट्रक कूड़ा समेटते हुये दिखते हैं। कुछ स्थानों से दैनिक कूड़ा समेटा जाता है, कुछ स्थानों से साप्ताहिक, पर एक सततता बनी रहती है जिससे बंगलोर यथासंभव स्वच्छ रहता है।

नगर को स्वच्छ रखने में नागरिकों के अनुशासन का योगदान भी कम नहीं है। यदि कूड़ा नियत स्थान पर न डाला जाये तो सफाई तन्त्र कुछ ही दिनों में ढह जायेगा। यही नहीं सार्वजनिक स्थानों में भी नागरिक थोड़ा श्रम और समय देते हैं पर कूड़ा कूड़ेदान में ही जाकर फेंकते हैं। बिना किसी दण्ड प्रावधान के इतना आत्मानुशासन निश्चय ही प्रशंसनीय है। नगर को स्वच्छ रखने और उसे संक्रामक बीमारियों से मुक्त रखने का कार्य बड़ा है पर आवश्यक भी है। कुछ भी हो, प्राथमिकता देकर इसका निष्पादन करना ही होता है।

लगभग एक माह पहले, कुछ प्रशासनिक कारणों से नगर के पौरकर्मिका हड़ताल पर चले गये। कारण स्वाभाविक था। नगर का एकत्र कूड़ा आस पास के गाँवों की निचली भूमि को भरने के लिये डाला जाता था, कालान्तर में कूड़ा दब जायेगा और ऊपर का स्थान नगर विस्तार में काम आयेगा। अब जिस स्थान पर नगर भर का कूड़ा फेंका जाता था, वहाँ के स्थानीय निवासियों ने उसका विरोध करना प्रारम्भ कर दिया, कारण उस कूड़े से फैलने वाली दुर्गन्ध और बीमारियाँ ही होगा। विवाद हुआ और हड़ताल हो गयी। यहाँ नगर में हर स्थान पर अव्यवस्था फैल गयी, कूड़े का अम्बार और उसकी सड़न से उठने वाली दुर्गन्ध ने नगर को भी व्याप्त कर लिया। दुर्गन्ध तक ही सीमित होता तो बच कर निकला जा सकता था पर स्वास्थ्य पर भी प्रभाव पड़ने की संभावना बनी हुयी थी। डेंगू से ग्रसित लोगों की संख्या से व्याप्त गंदगी को मापा जा सकता है। कई स्थानों पर डेंगू के मरीज भर्ती भी हुये। सरकार समय रहते चेत गयी, गाज प्रशासनिक अधिकारी पर गिरी, नये अधिकारी नियुक्त हुये। अब समय व्याप्त अव्यवस्था को समेटने का था, इस घटना की पुनरावृत्ति न हो उसके उपाय करने का था, साथ ही साथ ऐसा पुनः होने की स्थिति में सड़न और दुर्गन्ध की मात्रा सीमित की जा सके, उससे सम्बन्धित निर्णय लेने का था।

निर्णय आवश्यक थे, आलोचना हुयी थी, साख पर बाट लगी थी। सारे लंबित प्रस्ताव पारित हो गये, लगा मानो इसी समस्या में उनका उद्धार निहित था। जो भी निष्कर्ष आये, वे बंगलोर के हित में ही थे, इस स्तर पर उतर कर सोचना आवश्यक था। इस बार के निर्णयों को कानून के रूप में लागू करने का प्रयास किया जा रहा है। समय भागा जा रहा था, यदि निर्णय अभी न लिये जाते तो आने वाले समय में यह समस्या विकराल रूप धर लेती। यही नहीं, यहाँ का उदाहरण देश भर की सभी नगरपालिकाओं को भी अपनाना चाहिये।

कूड़ा प्रमुखतः ६ तरह का होता है। घर की सब्जियों आदि से निकला गीला कूड़ा, कागज और ग्लास आदि की तरह पुनः उपयोग में लाये जाना वाला सूखा कूड़ा, पत्ती पौधों आदि से निकला कार्बनिक कूड़ा, धूल और निर्माण कार्य से निकला कूड़ा, अस्पतालों से निकला चिकित्सीय कूड़ा और अन्त में इलेक्ट्रॉनिक हानिकारक कूड़ा। हर तरह के कूड़े का निष्पादन अलग तरह से होता है। घर से हर तरह का कूड़ा निकलता भी नहीं है, मुख्यतः पहले तीन तरह का कूड़ा ही अधिक मात्रा में होता है। इन सब तरह के कूड़े को हमें अब अपने घर में ही अलग करना होगा, महापालिका के कर्मचारी उन्हें उसी रूप में एकत्र करेंगे, आपके द्वारा ऐसा नहीं करने में आपका कूड़ा स्वीकार नहीं किया जायेगा। निश्चय ही यह बड़ा प्रभावी निर्णय है, नागरिकों को कार्य अधिक करना पड़ेगा, महापालिका को कार्य अधिक करना होगा, पर नगर स्वच्छ रहेगा। उपरोक्त नियम अक्टूबर माह से लागू हो जायेंगे, इससे संबंधित सुझावों को भेजने के लिये एक संपर्क भी दिया है।

एक महत्वपूर्ण दिशा तो मिल गयी है, बंगलोर को स्वच्छ रखने के प्रयासों को, पर उसे कहीं और आगे ले जाने की आवश्यकता है।

प्रतिदिन बंगलोर में लगभग ५००० टन कूड़ा निकलता है, लगभग ५०० ट्रक के बराबर या दो मालगाड़ियों के बराबर। इसमें ७० प्रतिशत कूड़ा ऐसा होता है जो जैविक होता है। यह खाद्य पदार्थों से आता है और विघटनशील होता है, यही सड़न उत्पन्न करता है। इस जैविक कूड़े में लगभग ६० प्रतिशत तक पानी होता है। सम्प्रति सारे कूड़े को हम एकत्र करते हैं और नगर के बाहर ले जाते हैं। यदि इस जैविक कूड़े को हम स्थानीय रूप से कम्पोस्टिंग करें तो उसमें शेष ४० प्रतिशत खाद मिलेगी हमें, वह खाद जो अत्यन्त उच्चस्तरीय होती है और स्थानीय रूप से खप भी जाती है। जिन घरों में पशुपालन होता है, वहाँ तो जैविक खाद्यशेष पशुओं को दे दिये जाते हैं और तब हमें गोबर के रूप में खाद मिलती है। मध्य नगर में पशुपालन तो संभव नहीं है पर कम्पोस्टिंग करके खाद तो बनायी ही जा सकती है। लाभ दुगुना है, प्रतिदिन ५०० के स्थान पर १५० ट्रक ही आवश्यक होंगे कूड़ा ढोने के लिये और साथ ही साथ प्रतिदिन १४०० टन की जैविक खाद भी मिलेगी। अभी तो सारी ऊर्जा और प्रयास कूड़े को ढोने में ही व्यर्थ हो रहे हैं।

वैसे तो श्रीमतीजी की बहुत सी अभिरुचियाँ हमारे लिये मँहगी पड़ती हैं पर कम्पोस्टिंग के प्रति उनकी लगातार बढ़ती हुयी ललक अब न केवल रंग लाने लगी है, वरन हमें भी भाने लगी हैं। जब उन्होंने बंगलोर जैसे बड़े नगर में उपस्थित सम्भावनायें गणनाओं के समेत समझायीं तब से यही लग रहा है कि स्थानीय स्तर पर कम्पोस्टिंग को बढ़ावा देना चाहिये। गावों और छोटे कस्बों में लोग पशुपालन करके जैविक कूड़े को गोबर के माध्यम से जैविक खाद में बदल सकते हैं और नगरों में जहाँ पशुपालन संभव नहीं है, वहाँ सबके लिये कम्पोस्टिंग महापालिकाओं की ओर से प्रोत्साहित की जानी चाहिये। यह एक और आवश्यक निर्णय हो, हर नागरिक के लिये।

1.9.12

बंगलोर का सौन्दर्य

जब कार्य के घंटे बहुत अधिक हो जाते हैं और आपके साथ लगे कर्मचारियों और सहयोगियों के चेहरे पर थकान झलकने लगती है, तो मुखिया के रूप में आपका एक कार्य और बढ़ जाता है, कार्य का प्रवाह बनाये रखने का कार्य। यद्यपि उत्साह बढ़ाने से कार्य की गति बढ़ती है और बनी भी रहती है, पर बार बार उत्साह बढ़ाते रहने से उत्साह भी थकने लगता है, ऊर्जा भी समझने लगती है कि अब क्षमतायें खींची जा रही हैं।

वरिष्ठों से सीखा है कि अधिक समय तक जुटे रहना है तो वातावरण को हल्का बनाये रखिये। कार्य के समय निर्णयों का निर्मम क्रियान्वयन, पर उसके बाद सबके प्रयासों का सही अवमूल्यन और सबकी समुचित सराहना। भीड़ का बढ़ना दोपहर से प्रारम्भ होता था और मध्य रात्रि के दो घंटे बाद तक ही कार्य समाप्त होता था, उस दिन के अन्तिम यात्री को विशेष गाड़ी में बैठा कर भेजने तक। चौदह घंटों तक स्टेशन पर बने रहने, वहीं पर भोजन करने और अनुभव को बाटने का क्रम तीन दिन तक चला। थकान आपके शरीर में अपना स्थान खोजने लगती है, मन को संकेत भेजती है कि अब बहुत हुआ, विश्राम का समय है। उस समय थका तो जा सकता था पर रुकना संभव नहीं था। हर थोड़े समय में परिस्थितियाँ बदल रही थीं, मन और मस्तिष्क चैतन्य बनाये रखना आवश्यक था।

पलायन के नीरव वातावरण में कोई ऐसा विषय नहीं था जो मन को थोड़ी स्फूर्ति देता। मीडिया के बन्धुओं को दूर से देख रहा था, सब के सब कैमरे में घूरते हुये भारी भारी शब्दों और भावों में डूबे पलायन के विषय को स्पष्ट कर रहे थे, सबको वर्तमान स्थिति सर्वप्रथम पहुँचाने की शीघ्रता थी, अधैर्य भी था। यात्रियों के चेहरों पर प्रतीक्षा और अनिश्चितता के भाव थे, रेलवे के बारम्बार बजाये जा रहे आश्वासन भी उन्हें सहज नहीं कर पा रहे थे। सुरक्षाकर्मी सजग थे और यात्रियों को उनके गंतव्य तक सकुशल पहुँचाने के भरसक प्रयास में लगे हुये थे, उनके लिये आपस का समन्वय ही किसी अप्रिय घटना न होने देने की प्राथमिक आवश्यकता थी। विशिष्ट कक्ष में उपस्थित मंत्रीगण व उच्च अधिकारीगण या तो परामर्श में व्यस्त थे या मोबाइल से अद्यतन सूचनायें भेजने में लगे थे। किसी को किसी से बात तक करने का समय नहीं मिल रहा था।

एक तो शारीरिक थकान, ऊपर से वातावरण में व्याप्त व्यस्तता और नीरवता, एक स्थान पर खड़ा रहना कठिन होने लगा। साथ ही साथ यह भी लगने लगा कि अन्य कर्मचारियों की भी यही स्थिति होगी। दूसरा दिन था, चार नियत गाड़ियों में से दो विशेष गाड़ी जा चुकी थीं, तीसरी जाने में दो घंटे का समय था, रात्रि का भोजन सम्मिलित स्टेशन पर ही हुआ था। प्लेटफार्म पर सभी लोग शान्त बैठे प्रतीक्षा कर रहे थे, स्थिति नियन्त्रण में लग रही थी। एक साथी अधिकारी साथ में थे, मन बनाया गया कि स्टेशन पर ही अन्य कार्यस्थलों तक घूम कर आते है और कार्यरत कर्मचारियों का उत्साह बढ़ाते हैं। किसी भी बड़े स्टेशन के दो छोरों के बीच की दूरी एक किलोमीटर से कम नहीं होती है, दोनों छोर जाकर वापस आने में दो किलोमीटर का टहलना हो जाता है।

साथी अधिकारी स्थानीय थे, यहाँ कई वर्षों से भी थे, उन्हें बंगलोर के बारे में अधिक पता था। चलते चलते बात प्रारम्भ हुयी, मेरा मत था कि यह पलायन होने के बाद बंगलोर अब पहले सा नहीं रह पायेगा, बहुत कुछ बदल जायेगा। पता नहीं जो लोग गये हैं, उनमें से कितने वापस आयेंगे? बंगलोर की जो छवि सबको समाहित करने की है, उसकी कितनी क्षति हुयी है? यदि पूर्वोत्तर से कुछ लोग वापस आ भी जायेंगे तो वो पहले जैसे उन्मुक्त नहीं रह पायेंगे। जीविकोपार्जन के लिये बंगलोर आने का उत्साह अब पूर्वोत्तर के लोगों में उतना नहीं रह पायेगा जितना अभी तक बना हुआ था? इसी तरह के ढेरों प्रश्न मन में घुमड़ रहे थे, जो अपना उत्तर चाहते थे। समय था और साथी अधिकारी के पास अनुभव भी, उन्होंने विषय को यथासंभव और बिन्दुवार समझाने का प्रयास किया और अपने प्रयास में सफल भी रहे।

उनके ही माध्यम से पता लगा था कि पूर्वोत्तर के लोग यहाँ पर किन व्यवसायों से जुड़े हैं। अन्य व्यवसायों में ब्यूटी पार्लर का ही व्यवसाय ऐसा था जिसमें उनका प्रतिशत बहुत अधिक है। उनके चले जाने से इस पर गहरा प्रभाव पड़ेगा और संभव है कि बंगलोर की सौन्दर्यप्रियता में ग्रहण लग जाये। न चाहते हुये भी विषय बड़ा ही रोचक हो चुका था क्योंकि यह हम सबको को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित करने वाला था। प्रत्यक्ष रूप से इसलिये क्योंकि यहाँ की आधी जनसंख्या यदि अपनी सौन्दर्य आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पायेगी तो यहाँ के फूलों से प्रतियोगिता कौन करेगा भला? यदि ब्यूटी पार्लर नहीं खुले तो विवाह आदि उत्सवों में महिलाओं की उपस्थिति बहुत कम हो जायेगी। मॉल इत्यादि में उतनी चहल पहल और रौनक नहीं रहेगी जो बहुधा अपेक्षित रहती है।

शेष आधी जनसंख्या पर इसका परोक्ष प्रभाव यह पड़ने वाला था। यदि सौन्दर्य समुचित अभिव्यक्त नहीं हो पाता है तो उसका कुप्रभाव घर वालों को झेलना पड़ता है। आधी जनसंख्या सुन्दर नहीं लगेगी तो उनका मन नहीं लगेगा, मन नहीं लगा तो घर के काम और भोजन आदि बनाने से ध्यान बटेगा। पारिवारिक अव्यवस्था के निष्कर्ष बड़ा दुख देते हैं। पारिवारिक सत्यं और शिवं बिना सुन्दरं के असंभव हैं। विडम्बना ही थी कि यहाँ के सौन्दर्य के पोषक और रक्षक यहाँ से पलायन कर रहे थे और यहाँ की जनसंख्या को आने वाली पीड़ा का भान नहीं था।

जब तक इस विषय पर चर्चा समाप्त हुयी हम सबसे मिलते हुये वापस अपने स्थान पर आ चुके थे। अगली ट्रेन स्टेशन पर आने ही वाली थी। ज्ञानचक्षु खुलने के बाद लगने लगा कि यह केवल पूर्वोत्तर के लोगों की पीड़ा ही नहीं है, वरन सारे बंगलोरवासियों की पीड़ा है। ब्यूटीपार्लर के व्यवसाय से जुड़े लोगों से हमारी यही करबद्ध प्रार्थना है कि भले ही शेष लोग थोड़ा समय लेकर आये, आप लोग शीघ्र ही वापस आ जाईयेगा, पूरी संख्या में। आपके नहीं आने तक यहाँ का सामाजिक शास्त्र बड़ा ही असंतुलित रहने वाला है, बड़ा जटिल रहने वाला है।

बंगलोर का सौन्दर्य छिना जा रहा है और बिना पूर्वोत्तर के लोगों के वापस आये उसे पुनर्स्थापित करना असंभव है।

(कल ही पता चला है कि लोग वापस आने लगे हैं, आस बँधी है, बंगलोर का सौन्दर्य बना रहेगा।)

29.8.12

देख रहा था व्यग्र प्रवाह

पता नहीं था कि यह कितने दिन चलेगा? पूर्वोत्तर के लगभग दो लाख लोग बंगलोर में हैं, मुख्यतः विद्यार्थी है, सेक्योरिटी सेवाओं में है, होटलों में हैं, ब्यूटी पार्लर में हैं और पर्याप्त मात्रा में आईटी में भी हैं। पहले दिन के बाद लगा कि यदि यही क्रम चलता रहा तो २०-२५ दिन तक लगे रहना पड़ेगा। अगले दिन के समाचार पत्र और न्यूज चैनल बस इसी समाचार से भरे हुये थे, हर ओर बस यही आग्रह था कि देश सबका है, कोई पलायन न करे, किसी को कोई भय नहीं है, सबको सुरक्षा दी जायेगी।

आशा थी कि इन आग्रहों का प्रभाव शीघ्र ही देखने को मिलेगा, लोग आश्वस्त हो पूर्वोत्तर जाने का विचार त्याग देंगे। व्यक्तिगत आशा और रेलवेगत कर्तव्यों में अन्तर बना हुआ था, तैयारी फिर भी रखनी थी। अगले दो दिन प्रवाह और बढ़ा, लगभग ११००० और १४००० के आस पास लोग गये। रेलवे स्थितियों से निपटने के लिये तैयार थी, पहले दिन की गुहार काम आयी, पहले दिन का अनुभव काम आया, कुल तीन दिनों में और ४८ घंटों के अन्तराल में ११ ट्रेनें लगभग ३३००० यात्रियों के लेकर पूर्वोत्तर गयीं। उसके बाद भी प्रवाह कुछ दिन रहा पर संख्या घट कर प्रतिदिन ५०० के आसपास ही रही। रेलवे का तन्त्र कार्यरत था, हमारी उपस्थिति कर्मचारियों का उत्साह बढ़ाये रखने के दृष्टिकोण से अधिक उपयोगी थी। अगले दो दिन प्रवाह के अवलोकन में निकले, यह समझने में निकले कि भय का प्रभाव कितना व्यापक होता है, यह कल्पना करने में निकले कि देश के विभाजन के समय जनमानस के मन की क्या स्थिति रही होगी?

भीड़ में व्यग्रता थी, चेहरे पर भयमिश्रित दुख था, एक आशा भी थी कि अपने घर वापस जा रहे हैं। कुछ के पास केवल हैण्डबैग ही थे जिनसे यह लग रहा था कि वे शीघ्र ही लौटेंगे। कई लोग सपरिवार जा रहे थे, उनके पास सामान अधिक था। हर ट्रेन को विदा करते समय खिड़कियों से झाँकते यात्रियों की आँखों में उन भावों को पढ़ रहा था, जिन्हें लेकर वे बंगलोर से प्रस्थान कर रहे थे। कुछ चेहरों पर धन्यवाद के भाव थे, कुछ के चेहरे अभी तक शून्य में थे, कुछ युवा हाथ हिलाकर आभार प्रकट कर रहे थे।

इसके पहले जब कभी भी पूर्वोत्तर के युवाओं का समूह देखता था, उनके भीतर की जीवन्तता प्रभावित करती थी। प्रसन्नचित्त रहने वाले लोग हैं पूर्वोत्तर के, सीधे, शर्मीले और मिलनसार। कृत्रिमता का कभी लेशमात्र स्पर्श नहीं देखा था उनके व्यवहार में, सदा ही सहज। पहाड़ों की कठिनता में गठा स्वस्थ शरीर और प्रकृति के सोंधेपन से प्राप्त सरल मन। जीवन के प्रति कोई विशेष दार्शनिक आग्रह नहीं, हर दिन को पूर्ण देने और पूर्ण जीने का उत्साह। ट्रेन से जाते हुये लोगों में उस छवि को ढूढ़ने का प्रयास कर रहा था पर वह मिली नहीं। दूसरे दिन भय कम था, तीसरे दिन चेहरों पर भय नहीं था पर वे भाव भी नहीं थे जिसके लिये पूर्वोत्तर के लोग पहचाने जाते हैं।

यह समझना बहुत ही कठिन था कि उनके मन में क्या चल रहा है। स्टेशन पर मीडियाकर्मियों का जमावड़ा बना रहा इन तीन दिनों, उन्होंने जानने का प्रयास किया पर पलायन कर रहे लोगों ने कुछ बोलने की अपेक्षा शान्त रहना उचित समझा। राज्य के मंत्रीगण अपने वरिष्ठतम पुलिस अधिकारियों के साथ वहाँ उपस्थित थे, प्रयासरत थे कि पलायन रोका जा सके, पर उन तीन दिनों तक पलायन रुका नहीं। कई गैर सरकारी संगठनों के लोग वहाँ उपस्थित थे, उन्हें मनाने के लिये, पर मन में घाव गहरा था, संवेदनीय सान्त्वनाओं से भरने वाला नहीं था। भय जब व्याप्त होता है तो आशाओं को भी क्षीण कर देता है, गहरे तक, शक्ति को भी संदेह से देखने लगता है, अविश्वास करने लगता है सारी व्यवस्थाओं पर। यही कारण रहा होगा कि सुरक्षा के सारे आश्वासन होने के बाद भी उनका मन यह मानने को तैयार नहीं था कि वे यहाँ सुरक्षित हैं।

क्या पलायन ही विकल्प था? कई बार तो लगा कि ट्रेनों की उपलब्धता ने उन्हें एक सरल विकल्प दे दिया है, पलायन कर जाने का। यदि इतनी अधिक मात्रा में ट्रेनें नहीं रहती तो संभव था कि लोग अपने स्थानों पर बने रहते और अधीर न होते, कोई और विकल्प ढूढ़ते। परिस्थितियों से भाग जाना तो उपाय नहीं है, समस्यायें तो हर जगह खड़ी मिलेंगी, कहीं छोटी मिलेंगी, कहीं बड़ी मिलेंगी। पर भावनाओं के उफान में तार्किक चिन्तन संभव नहीं होता है, व्यक्ति सरलतम विकल्प की ओर भागता है। हमें भी उस समय तो अपने सामने दसियों हजार लोगों को सकुशल पूर्वोत्तर पहुँचाने का कर्म दिख रहा था। क्या उचित है, क्या नहीं, इस पर विचार करने की न तो शक्ति थी, न समय था और न अधिकार ही था।

उन्हें जब लगेगा कि परिस्थितियाँ ठीक हो गयी हैं, तो लोग वापस लौटना प्रारम्भ करेंगे। जब बिना किसी विशेष घटना के इतना बड़ा पलायन हो गया तो किन प्रयासों से विश्वास वापस लौटेगा, यह समझना कठिन है। यह संभव है कि कुछ दिनों के बाद उनके मन का उद्वेग शान्त हो जायेगा, उनको अपने आप पर विश्वास स्थापित हो जायेगा, हवा में व्याप्त अविश्वास छट जायेगा, तब वे वापस लौट आयेंगे।

हम अपनी सांस्कृतिक एकता के लिये पहचाने जाते हैं, विविधतायें हमारी संस्कृति के शरीर में विभिन्न आभूषणों की तरह हैं, हर कोई अपनी तरह से संस्कृति को सुशोभित करने में लगा हुआ है। विविधता को विषमता से जोड़कर उपाधियों और आकारों में अपने आप से भिन्न लोगों के प्रति विद्वेष की भावना संस्कृति को आहत कर रही है, लोकतन्त्र के प्रतीकों पर निर्मम प्रहार कर रही है। यह प्रवृत्ति कोई सामान्य अपराध नहीं, इसे किसी भी स्वरूप में देशद्रोह से कम जघन्य नहीं समझा जा सकता है, यह देश के स्वरूप पर एक आत्मघाती प्रहार है। भविष्य में कभी पलायन न हो, यह सुनिश्चित करने के लिये हमारे निर्णय कठोर हों अन्यथा हमें अपना हृदय कठोर करने का अभ्यास डालना चाहिये क्योंकि पलायन कर रहे लोगों की पीड़ा को देखने की शक्ति तभी विकसित हो पायेगी।

इसके पहले अपना जीवन बचाने हेतु अकाल से प्रभावित क्षेत्रों से जीविका की खोज में पलायन होते देखा था, उस समय भी मन द्रवित हुआ था। पर यह पहला अनुभव था जब लोगों को अपना जीवन बचाने के लिये अपनी जीविका छोड़कर भागते देखा है। तीन दिन तक कार्य की थकान शरीर को उतना कष्ट नहीं दे पायी जितना कष्ट पलायन करते लोगों के चेहरों के भाव दे गये। प्रलय के पश्चात मनु के मन में सब कुछ खो जाने के भाव थे, वैसे ही कुछ भाव आँखों में तैर रहे थे, दोनों की ही आँखें नम थीं। अन्तर बस इतना था कि मनु पहाड़ पर बैठे थे, मैं स्टेशन पर, मनु जल का प्रलय प्रवाह देख रहे थे, मैं जन का व्यग्र प्रवाह।

यदि यह अलगाववाद का नृशंस नृत्य न रुका तो आगामी इतिहास के अध्याय इसी पंक्ति से प्रारम्भ होंगे…

एक पुरुष भीगे नयनों से देख रहा था व्यग्र प्रवाह…..

19.5.12

सीट बेल्ट और इंच इंच सरकना

बंगलोर में अभी कुछ दिन पहले सीट बेल्ट बाँधना अनिवार्य कर दिया गया है। इस निर्णय ने मुझे कई कोणों से और बहुत गहरे तक प्रभावित किया है।

संरक्षा को प्राथमिकता मिलनी चाहिये, पर आमजन संरक्षा के प्रति जागरूक नहीं होता है, उसे लगता है कि सीट बेल्ट बाँधने और उतारने में इतना समय लग जाता है कि उतनी देर में वह न जाने कितना शहर नाप आयेगा। समय बचा लेने की इस जुगत में वह तब तक सीट बेल्ट नहीं बाँधता, जब तक यह अनिवार्य न कर दिया जाये। अनिवार्य भी तब तक अनिवार्य नहीं समझा जाता, जब तक उस पर कोई आर्थिक दण्ड न हो। यद्यपि आर्थिक दण्ड लगने के बाद ही धनपुत्रों को नियम तोड़ने का विशेष सुख मिलता है क्योंकि तब अन्य लोग नियम नहीं तोड़ पाते हैं और तब धनपुत्र अपने धन के कारण विशेष हो जाते हैं। भले ही कुछ लोग अपने धन से यह सुख खरीदते रहें पर आमजन संरक्षा के प्रति सचेत से प्रतीत होने लगते हैं। धन और शेष को पृथक रखने के नीरक्षीर विवेक से युक्त दूरगामी निर्णय से किस तरह अनुशासित समाज का निर्माण हो सकता है, यह प्रभावित होने का विषय है।

ऐसे निर्णय हर समय नहीं लिये जा सकते हैं क्योंकि हर निर्णय को लागू करने में बहुत श्रम लगता है। बंगलोर में इतनी गाड़ियाँ हैं कि सबके आगे की सवारियों को देखने में ही सारी ऊर्जा लगा दी तो अन्य नियमों का उल्लंघन देखने का समय ही नहीं मिलेगा। जितना अधिक कार्य यहाँ के ट्रैफिक वाले करते हैं, उतनी लगन मैने अभी तक कहीं और नहीं देखी। यहाँ पर इसे मानवीय कार्यों की श्रेणी में रखकर यथासंभव निभाया जाता है, अन्य नगरों में इसे ईश्वरीय प्रकोप या कृपा मानकर छोड़ दिया जाता है। ऐसी श्रमशील फोर्स को और काम करने के लिये मना लेना सच में सुयोग्य प्रशासन के ही संकेत हो सकते हैं और उससे प्रभावित होना स्वाभाविक भी है।

कार्य केवल उल्लंघन करने वालों का नम्बर नोट कर चालान करने तक सीमित होता तब भी समझा जा सकता था। अधिक दण्ड होने पर कार्यालय में दण्ड भरने वालों की संख्या बहुत बढ़ जाती है। उन्हें सम्हाल पाना एक कठिन कार्य है। कुछ ट्रैफिक वाले कार्यालय में बैठे अपने सहकर्मियों की पीड़ा समझते भी हैं और यथासंभव रसीद या बिना रसीद के दण्ड सड़क पर ही भरवा लेते हैं। एक छोटे निर्णय से सबका काम बहुत बढ़ जायेगा, यह तथ्य ज्ञात होते हुये भी यह निर्णय लागू करा लेना मुझ जैसों को प्रभावित कर लेने के लिये पर्याप्त है।

देश का एक विशेष गुण है, जो भी कोई नयी या खरी बात बोलता है, लोग उन्ही शब्दों से बोलने वाले का जीवन तौल डालते हैं। बहुतों के साथ ऐसा हुआ है और यह तथ्य वर्तमान के कई उदाहरणों के माध्यम से सर्वविदित भी है। हुआ वही, जिसका डर था, आदेश लागू होने के दूसरे दिन ही अखबारों में एक चित्र आ गया कि मुख्यमंत्रीजी की गाड़ी में इस नियम का पालन नहीं हो रहा है। यह सब होने पर भी नियम का पालन यथावत चलता रहा, इस बात ने मुझे पर्याप्त प्रभावित किया।

मुझे गाड़ी में आगे ही बैठना अच्छा लगता है, वहाँ से परिवेश पर पूरी दृष्टि बनी रहती है। पीछे की सीट पर बैठकर केवल अपनी ओर के दृश्य दिखते हैं, केवल एक तिहाई। छोटे से जीवन में दो तिहाई दृश्य छूट जायें, इससे बड़ी हानि संभव भी नहीं है। जब यही सोच कर कार निर्माताओं ने आगे की सीट बनायी तो उसका लाभ उठाने में संकोच कर निर्माताओं की आकांक्षाओं को धूलधूसरित क्यों किया जाये। पीछे बैठकर एक ही ओर देखते रहने से और उत्सुकतावश सहसा अधिक मुड़ जाने से गर्दन में पुनः मोच आ जाने का डर भी है। हाँ, जब अधिक दूर जाना हो या रात्रि निरीक्षण में निकलना हो, तो पीछे की सीट लम्बी करके सो जाता हूँ। आगे बैठने से सीट बेल्ट बाँधना आवश्यक हो गया। कुछ बार तो याद रहा, कुछ बार भूलना भी चाहा पर हमारे ड्राइवर साहब ने भूलने नहीं दिया। एक बार जब उकता गये तो पूछा कि क्या बाँधना हर बार आवश्यक है, ड्राइवर साहब ने कहा कि आवश्यक तो नहीं है बशर्ते जेब में १०० रु का नोट सदा रखा जाये, दण्ड भरने के लिये। ड्राइवर साहब के 'न' नहीं कहने के तरीके ने प्रभावित किया मुझे।

जब कोई उपाय नहीं रहा तो नियमित सीट बेल्ट बाँधना प्रारम्भ कर दिया। सीट बेल्ट के लाभ सुरक्षा के अतिरिक्त और भी पता चले। जब सीट बेल्ट नहीं बँधी होती है तो आपका कोई एक हाथ सदा ही सचेत अवस्था में बना रहता है और झटका लगने की स्थिति में सीट या हैंडल पकड़ लेता है। साथ ही साथ आपकी आँखें भी खुली रहती हैं और कार की गति के प्रति सचेत बनी रहती हैं। सीट बेल्ट बाँधने के बाद हमारे हाथ और आँखें, दोनों ही मुक्त हो लिये, आँख बन्द कर चिन्तन करने के लिये और दोनों हाथों से मोबाइल पर टाइपिंग करने के लिये। पहले जो शरीर पहले एक ही अवस्था में बना रहने से थक जाता था, अब ढीला छोड़ देने से थकता नहीं था। यात्राओं में चिन्तन कर सकना, अधिक टाइपिंग होना और कम थकना, यह तीनों कारण मुझे बहुत गहरे प्रभावित कर गये।

सीट बेल्ट का सिद्धान्त उसके उपयोग के अनुसार ही है। आप उसे धीरे धीरे खींचेगे तो वह कितना भी खिंच आयेगा पर झटके से खींचेगे तो तुरन्त अटक जाता है। सीट बेल्ट के उपयोग करने के पहले तक यह सिद्धान्त ज्ञात नहीं था। पहले विश्वास नहीं था पर जब हाथों से खींच कर प्रयोग किया तब विश्वास आया। एक बार जब कार झटके से रोकनी पड़ी तब सीट बेल्ट ने सहसा अपनी जकड़ में भींच लिया। यही सिद्धान्त जीवन में भी लगता है। ध्यान से देखें तो जो सुरक्षा के संकेत होते हैं, वह आपके अधिक गतिमय होने पर ही प्रकट होते हैं, अन्यथा जीवन अपनी मन्थर गति से चलता रहता है। इस सिद्धान्त ने मुझे अन्दर तक प्रभावित किया।

इतना अधिक मात्रा में प्रभावित होकर हम भारी होकर सो गये होते यदि हमारे ड्राइवर महोदय खिन्न से न लग रहे होते। उन्हे सीट बेल्ट बाँधना झंझट सा लग रहा था। पूछने पर बताया कि जब बंगलोर के ट्रैफिक की औसत चाल पैदल से थोड़ी सी ही अधिक है तब सीट बेल्ट बाँधने का क्या लाभ? ट्रैफिक जाम से बचने के लिये कौन सा नियम बनेगा? सीट बेल्ट के साथ इंच इंच सरकने की व्यथा ने प्रभावित करने की हद ही कर डाली।

25.4.12

डोलू कुनिता

स्थान बंगलोर सिटी रेलवे स्टेशन, प्लेटफार्म 8, समय सायं 7:30 बजे, बंगलोर राजधानी के यात्री स्टेशन आने लगे हैं, यद्यपि ट्रेन छूटने में अभी 50 मिनट का समय है। सड़क यातायात में बहुधा जाम लग जाने के कारण यात्री अपने घर से एक घंटे का अतिरिक्त समय लेकर चलते हैं, ट्रेन छूट जाने से श्रेयस्कर है स्टेशन में एक घंटा प्रतीक्षा करना। सायं होते होते बंगलोर की हवाओं में एक अजब सी शीतलता उमड़ आती है, यात्री प्रतीक्षाकक्ष में न बैठकर पेड़ के नीचे लम्बी बनी सीढियों में बैठकर कॉफी पीते हुये बतियाना पसन्द करते हैं। व्यस्तमना युवा अपने लैपटॉप व मोबाइल के माध्यम से समय के सदुपयोग की व्यग्रता व्यक्त करने लगते हैं। बैटरीचलित गोल्फ की गाड़ियों में सजे अल्पाहार के स्टॉल अपनी जगह पर ही खड़े हो ग्राहकों की प्रतीक्षा और सेवा में निरत हैं, मानो अन्य स्टेशनों की तरह चिल्ला चिल्लाकर ग्राहकों का ध्यान आकर्षित करना कभी उन्होंने सीखा ही नहीं। शान्त परिवेश में बहती शीतल बयार का स्वर स्पष्ट सुनायी पड़ता है।

तभी 8-10 ढोलों का समवेत एक स्वर सुनायी पड़ता है, नियमित वातावरण से अलग एक स्वर सुनायी पड़ता है, यात्रियों का ध्यान थोड़ा सा बटता है पर पुनः वे सब अपने पूर्ववत कार्यों में लग जाते हैं। ढोलों की थाप ढलने की जगह धीरे धीरे बढ़ने लगती है और तेज हो जाती है। यात्रियों की उत्सुकता उनके स्वर की दिशा में बढ़ते कदमों से व्यक्त होने लगती है। प्लेटफार्म पर ही एक घिरे हुये स्थान पर 9 नर्तक ढोल और बड़ी झांझ लिये कलात्मकता और ऊर्जा से नृत्य कर रहे थे, 7 के पास ढोल, एक के पास झांझ और एक के पास बड़ा सा झुनझुना था। झांझ की गति ही ढोल और नृत्य की गति निर्धारित कर रही थी। ढोल नर्तकों के शरीर से किसी अंग की तरह चिपके थे क्योंकि नृत्य में जो उछाल थे, वे ढीले बँधे ढोलों से संभव भी न थे।

इसके पहले कि लोगों को इस उत्सवीय नृत्य का कारण समझ में आता, प्लेटफार्म में नयी नवेली की तरह सजी बंगलोर राजधानी ट्रेन लायी जा रही होती है। जो लोग पहले राजधानी में यात्रा कर चुके थे, उनके लिये राजधानी की नयी ट्रेन को देखना एक सुखद आश्चर्य था, मन का उछाह अब ढोल की थापों से अनुनादित होता सा लग रहा था। राजधानी की पुरानी ट्रेन अपनी क्षमता से अधिक बंगलोरवासियों की सेवा करके जा चुकी थी और उसका स्थान लेने आधुनिकतम ट्रेन आज से अपनी सेवायें देने जा रही थी। यह उत्सवीय थाप उस प्रसन्नता को व्यक्त कर रही थी जो हम सबके हृदय में थी और उस नृत्य में लगी ऊर्जा उस प्रयास का प्रतीक थी जो इस आधुनिकतम ट्रेन को बंगलोर लाने में किये गये।

नृत्य का नाम था डोलू कुनिता, शाब्दिक अर्थ ढोल के साथ उछलना। यह नृत्यशैली उत्तर कर्नाटक के चित्रदुर्गा, शिमोगा और बेल्लारी जिलों की कुरुबा नामक चरवाहा जातियों के द्वारा न केवल अस्तित्व में रखी गयी, वरन सदियों से पल्लवित भी की गयी। इस नृत्य और संगीत की लयात्मकता न केवल शारीरिक व्यायाम, मनोरंजन, धार्मिक अनुष्ठानों और सांस्कृतिक प्रयोजनों से सम्बद्ध है वरन उनके अध्यात्म की पवित्रतम अभिव्यक्ति भी है, जो इस नृत्यशैली के माध्यम से अपने आराध्य की ऊर्जस्वित उपासना के रूप में व्यक्त किया जाता है। आजकल तो इस नृत्य का प्रयोग सामाजिक कुरीतियों से लड़ने के लिये भी किया जा रहा है, संदेश को शब्द, संगीत और भावों में ढालते हुये।

इसकी पौराणिक उत्पत्ति जिस कथा से जुड़ी है, वह भी अत्यन्त रोचक है। एक असुर भगवान शिव को प्रसन्न कर लेता है और भगवान शिव से अपने शरीर में आकर रहने का वर माँग लेता है। शिव उसके शरीर में रहने लगते हैं। वह असुर पूरे हिमालय में उत्पात मचाने लगता है, त्रस्त देवता विष्णु के पास पहुँचते हैं और अनुनय विनय करते हैं। विष्णु असुर का सर काट कर शिव को मुक्त करते हैं, पर शिव कुपित हो जाते हैं। शिव को प्रसन्न करने के लिये असुर के धड़ को ढोल बनाकर विष्णु नृत्य करते हैं। वह प्रथम डोलू कुनिता था, तब से शिव उपासक अपने आराध्य को प्रसन्न करने के लिये इस नृत्य को करते आये हैं। संभवतः ढोल का चपटा और छोटा आकार धड़ का ही प्रतीक है। ढोल की बायीं ओर बकरी और दायीं ओर भेड़ की खाल का प्रयोग दोनों थापों की आवृत्तियों में अन्तर रखने के लिये किया जाता है।

जैसे जैसे ट्रेन के जाने का समय आता है, नृत्य और संगीत द्रुतगतिमय हो जाता है, क्रमशः थोड़ा धीमे, फिर थोड़ा तेज, फिर आनन्द की उन्मुक्त स्थिति में सराबोर, थापों के बीच शान्ति के कुछ पल और फिर वही क्रम। मैं खड़ा दर्शकों को देख रहा था, सबकी दृष्टि एकटक स्थिर और पैरों में एक आमन्त्रित सी थिरकन। ढोलों पर चढ़ते हुये तीन मंजिला पिरामिड बनाकर, गतिमय थापों का बजाना हम सबको रोमांचित कर गया।

नृत्य धीरे धीरे समाप्ति की ओर बढ़ रहा था और राजधानी की नयी ट्रेन अपनी नयी यात्रा प्रारम्भ करने को आतुर थी, इंजन की लम्बी सीटी ढोल की थापों को थमने का संदेश देती है, नृत्य में मगन यात्री दौड़कर अपने अपने कोचों में बैठ जाते हैं। महाकाय ट्रेन प्रसन्नमना अपने गंतव्य दिल्ली को ओर बढ़ जाती है, प्रयास रूपी डोलू कुनिता निष्कर्ष रूपी कुपित शिव को पुनः प्रसन्न कर देते हैं, यात्री सुविधा का एक नया अध्याय बंगलोर मंडल में जुड़ जाता है।


30.10.10

नगर भ्रमण

छोटे नगरों का चरित्र भी उस एक अकेली सड़क जैसा सम्यक होता है जिसके किनारे वह बसा होता है। छोटा नगर, सीमित आवश्यकताये, सरल जीवन शैली। एक सड़क पकड़ लीजिये, बायें या दायें मुड़ जाईये और पहुँच गये आप अपने गन्तव्य तक। बड़े नगर में सड़कों का जाल बिछा रहता है और उसी से मेल खाता जीवन और अनुभवों का उलझाव।

बंगलोर जैसे बड़े नगर में एक छोर से दूसरे छोर पहुँचने में दो घंटे  तक का समय लग जाता है। वैसे तो मुख्य सड़क से ही चलना श्रेयस्कर होता है, आप रास्ता नहीं भूल सकते हैं। जब मुख्य सड़कें रास्ता न भूलने वालों से भर जाती हैं और पूरा यातायात कछुये की गति पकड़ लेता है तब उन मुख्य सड़कों को जोड़ने वाली उपसड़कें बहुत काम आती हैं। सड़क-जाल के ज्ञाता ड्राइवर उस समय अपना प्रवाह उपसड़कों पर मोड़ लेते हैं और नगरीय चक्रव्यूह भेदते हुये गन्तव्य तक पहुँच जाते हैं। सभी मुख्य सड़कें एक-मार्गी हैं पर उपसड़कें द्विमार्गी हैं।

हमारे ड्राइवर महोदय जब वाहन चलाते हैं तो उनके मन में कितनी गणनायें चलती रहती हैं, इसका अनुमान नहीं होता है हमें। सामने का धीरे बढ़ता यातायात, अगला यातायात सिग्नल कहाँ आयेगा, पहली वह सड़क जहाँ से मुड़ा जा सकता है उपसड़कों पर, एक-मार्गी रास्तों का ज्ञान और मस्तिष्क में बसा पूरे बंगलोर का मानचित्र, इन सबके सुसंयोग ने कभी विलम्बित नहीं होने दिया हमें, अभी तक।

एक बार जब न रहा गया तो हम पूछ बैठे कि इतने रास्ते कैसे याद रह पाते हैं, इतने बड़े बंगलोर में। जो वाहन अधिक चलाते हैं, उनके उत्तर भिन्न हो सकते हैं पर यह उत्तर वैज्ञानिक लगा। मोड़ पर बने भवनों का एक चित्र सा बना रहता है मन में, उसी से दिशा मिलती रहती है। किन्ही और चिन्हों की आवश्यकता ही नहीं है। बहुत समय तक तो यह विधि सुचारु चली पर पिछले कुछ वर्षों से समस्या आ रही है। कारण उन कोनों के भवनों का पूर्ण कायाकल्प या उनके स्थान पर किसी और ऊँचे भवन का निर्माण हो जाना है। जिस गति से बंगलोर का विकास या निर्माण कार्य हो रहा है, यह भ्रम संभव है।

बहुत दिनों के बाद वाहन-कला का एक और गुण समझ में आया कि उस रास्ते से तीव्रतम पहुँचा जा सकता है जिस पर कम से कम यातायात सिग्नल मिलें। कैसे यातायात सिग्नलों को छकाते हुये, उपसड़कों में घूमा जा सकता है, यह बड़ा रुचिकर प्रकल्प हो सकता है।

कभी कभी जब यातायात धीरे धीरे बढ़ता है और उपसड़कों की सम्भावना भी नहीं रहती है तो किस प्रकार से विभिन्न लेन बदलकर बहुमूल्य एक घंटा बचाया जा सकता है, यह कर दिखाना भी एक कला है। इस कलाकारी से कई बार समय बचा कर सार्थक कार्यों में लगाया गया है।

गाने चलते रहते हैं, कभी किशोर, कभी मुकेश, कभी रफी या कभी नये। अवलोकन के क्रम को थोड़ा विश्राम मिल जाता है संगीत से।

छोटे नगर के भ्रमण में भला कहाँ से मिल पायेगा इतना अनुभव। नगर भ्रमण जब एक पोस्ट में नहीं सिमट पाया तो अन्य अनुभव तो अध्यायवत हो जायेंगे बड़े नगरों में।