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11.8.26

मैं भोग रहा या स्वयं भुक्त


न कर्मबन्ध, न संस्कार,

न चित्तवृत्ति, न क्लेश पार,

उस ओर अकेले बैठ गया,

मेरा परिचय ही निर्विकार।


न विषय रमण, न झंकृत मन,

न सुख साधन पर सतत मनन,

किस आगत के असमंजस में,

पथ सृजन शून्य, जग निर्जन वन।


न मति विरुद्ध, न भाव क्रुद्ध,

न बंध जटिल, न कंठ रुद्ध,

आलम्बन के एकाग्र क्षितिज, 

द्वन्द्व आलोड़न से विगत बुद्ध।


न शब्द पृथक, न पृथक ज्ञान,

न अर्थ पृथक, अनुभव प्रधान,

सब सम्मिलित होकर हुये एक,

संयम ने साधे समाधान।


न विलग पूर्ण, न पूर्ण विलय,

न बाधित क्रम, अवगुंठित लय,

जगती प्रवाह, पर स्थिर मन,

स्थिर गति, स्थिर हुआ समय।


न मुक्त रहा, न हुआ युक्त,

किस आकर्षण जीवन प्रयुक्त,

कारक, कर्ता, क्रम डोल रहे,

मैं भोग रहा या स्वयं भुक्त। 

14.7.26

वह क्षण भर है, पर जीवन है


गत क्षण मन जिस पर, लब्ध वही, आगत क्षण का प्रारब्ध वही,

इस गत आगत के मध्य व्यक्त, वह क्षण भर है, पर जीवन है।


स्मृति में छिटके भाव शेष, कल्पित अघटित, सम्भाव्य शेष,

है सब स्वाहा, क्षमता मन की, वह क्षण भर है, पर जीवन है।


अनगिन आकर्षण क्षेत्र बने, आते अन्तर्गत, नेत्र घने, 

मन का विशेष से जुड़ जाना, वह क्षण भर है, पर जीवन है।


जब सुप्त रहे, सब रहा रिक्त, किस गत भ्रमवत, बह गया चित्त, 

यह शून्य-सकल सम्पर्क बिन्दु, वह क्षण भर है, पर जीवन है।


एक क्षण आया, जीवन गतिमय, दूजा, सब गतियाँ, पूर्ण विलय,

दो क्षण भीतर, है पृथक पृथक, क्षण क्षण भर है, पर जीवन है।

14.8.22

तेल और बाती

 

मेरा जीवन, एक दिये सा,

तेल तनिक पर बाती लम्बी,

जलने की उत्कट अभिलाषा,

स्रोत विरलतम, आस विहंगी।


आशा के अनुरूप जली वह,

अनुभव पाती प्रथम प्रशस्था,

करती अपना पंथ प्रकाशित,

रही व्यवस्थित साम्य अवस्था।


सतत संग में सहयात्री थे,

उनके हित भी कुछ कर पाती,

अत्यावश्यक, बल, मति, क्षमता,

शनै शनै ऊर्जित गति पाती।


मन, जीवन, जन, दिशा, दशा, पथ,

नहीं पृथक, मिलकर बाँधेंगे,

कार्य वृहद सब करने होंगे,

सब हाथों से सब साधेंगे।


सोचा साथ चलेंगे डटकर,

सोचा मिट्टी एक हमारी,

एक दिया बन जल सकते यदि,

बनी रहेगी प्रगति हमारी।


कुछ में कम, है अधिक किसी में,

तेल और बाती जीवन की,

संसाधन की कही प्रचुरता,

कहीं विकलता सकुचे मन की।


एक दिया ऐसा पाया जो,

तेल भरा पर बाती छोटी,

लगा सुयोग बना विधि भेजा,

कर लेंगे पूरित क्षति जो भी।


बीच पंथ में भान हुआ यह,

यद्यपि तेल मिला गति पायी,

किन्तु प्रखरता मन्द पड़ी क्यों,

किसने उद्धत दीप्त बुझायी।


बाती पर ही तेल गिर रहा,

ज्योति सिमटती जाती मध्यम,

यह केवल संयोग नहीं था,

जानबूझकर इंगित था क्रम।


ज्ञात नहीं थे ऐसे प्रकरण,

सहजीवन में दिखे नहीं थे,

संसाधन से क्षमता बाधित,

विधि ने कटु क्षण लिखे नहीं थे।


त्याग राग से कर सकता हूँ,

छिप जाना स्वीकार नहीं था,

बिना जिये अस्तित्व सिमटना,

छल से अंगीकार नहीं था।


धन्यवाद ईश्वर को शत शत,

अब एकाकी चल पाऊँगा,

किन्तु जलूँगा पूर्ण शक्ति भर,

जितना संभव जल पाऊँगा।


जीवन पढ़ना, बढ़ना जाना,

और समय से जान लिया सब,

अपनी धार, तरंगें अपनी,

अपनी बहती शान्त सुखद नद।

7.8.22

धर बल, अगले पल चल जीवन


शत पग, रत पग, हत पग जीवन,  

धर बल, अगले पल चल जीवन।


रथ रहे रुके, पथ रहे बद्ध, 

प्रारम्भ, अन्त से दूर मध्य,

सब जल स्वाहा, बस धूम्र लब्ध,

निश्चेष्ट सहे, क्या करे मनन,

धर बल, अगले पल चल जीवन।


बनकर पसरा वह बली स्वप्न,

चुप चर्म चढ़ा, बन गया मर्म,

सब सुख अवलम्बन गढ़े छद्म,

मन मुक्ति चहे, पोषित बंधन,

धर बल, अगले पल चल जीवन।


ऋण रहा पूर्ण, हर घट रीता,

श्रमसाध्य सकल, उपक्रम बीता,

मन सतत प्रश्न, तब क्या जीता,

भय भ्रमित अनन्तर उत्पीड़न,

धर बल, अगले पल चल जीवन।


जो है प्रवर्त, क्षण प्राप्त वही,

तन मन गतिमयता व्याप्त अभी,

गति ऊर्ध्व अधो अनुपात सधी,

आगत श्वासों का आलम्बन,

धर बल, अगले पल चल जीवन।