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9.7.14

तुम्हारा परिचय


व्यथा से मुक्ततेज से पूर्ण,
विजय से मुखमंडल उद्दीप्त 
नेत्र में अंधकार असहाय,
निश्चय ज्वाला जले प्रदीप्त ।।१।।

भुजायें महाबली उद्दात्त,
कार्य में सकल ओर विस्तीर्ण 
समय की तालों पर झंकार,
सफलता नाचे सुखद असीम ।।२।।

सदा ही अनुपेक्षित व्यक्तित्व,
विचारों में मेधा का शौर्य 
वाक्‌ में मधुरस के उद्गार,
तर्कों में अकाट्य सिरमौर्य ।।३।।        

तुम्हारी चाल गजों सी मस्त,
शिराओं में सिंहों का वेग 
क्रोध में मेघों का गर्जन,
सदा ही स्थिर रहे विवेक ।।४।।

सदा ही प्रेम सुधा से पूर्ण,
तुम्हारे हृदयों के आगार 
लुटाते रहते सुख की धार,
 जाने क्या होता व्यापार ।।५।।

प्रश्नों का विस्तृत उत्तर,
तुम्हारे जीवन का हर कार्य 
व्यथा के उन मोड़ों का तोड़,
जहाँ पर झुकना है अनिवार्य ।।६।।

24.6.14

अपेक्षा

दो खुशी के पल मिलें,
तो मुक्त हो बाँहें खिलें ।
सत्य है इन ही पलों के,
हेतु जीवन जी रहा है ।।१।।

अपेक्षित तो बहुत कुछ है,
दृष्टि में पर्याप्त सुख है ।
किन्तु यह निष्ठुर व्यवस्था,
भाग अपना माँगती है ।।२।।

क्यों नियम के शासनों में,
रूढ़ियों के तम घनों में ।
मुक्ति की उत्कट तृषा में,
घुट गयी स्वच्छन्दता है ।।३।।

शक्ति से है, दोष ऊर्जित,
अहम्‌ में सारल्य अर्पित ।
काल ही निर्णय करेगा,
लोक जिस पथ जा रहा है ।।४।।

व्यर्थ ही सब लड़ रहे हैं,
घट क्षुधा के भर रहे हैं ।
पर खुशी की पौध केवल,
प्रेम के जल की पिपासी ।।५।।

11.9.13

पर्यटन - रेल अपेक्षायें

रेलवे और पर्यटन पर कहीं भी विचार विमर्श होता है तो कई बाते हैं जो सदा ही सुनने को मिलती हैं। बहुधा बहुत अधिक सुनना पड़ता है, कभी सुझाव के रूप में, कभी उलाहना के रूप में, कभी शिकायत के रूप में, कभी उग्र तर्क के रूप में। सुनना कभी भी हानि नहीं करता है, यदि आप उसे हृदय तक न ले जायें। सुनना आपको भले ही व्यक्तिगत रूप से कचोटे पर एक संस्था को सुनने से लाभ ही होता है। जब भी मैं सुनता हूँ, एक संस्था के सदस्य के रूप में सुनता हूँ, ग्रहणीय सुझाव मस्तिष्क में वहन करता हूँ, क्रोध मन से सहन करता हूँ।

उन बातों में जो सार निकलता है, वह इस प्रकार का ही रहता है। सबसे पहली समस्या तो आरक्षण की, उसके बाद टिकट मिलने में व्यर्थ हुआ समय, सुविधाओं का अभाव, व्यवस्थाओं की कमी और संवेदनाओं का अभाव। अपेक्षाओं और प्रयासों में दूरी है, किसी तरह आवश्यकताओं तक ही प्रयास पहुँच पा रहे हैं, वह भी न्यूनतम आवश्यकताओं तक। प्रस्तुत पोस्ट में अन्य विषयों पर विस्तृत चर्चा न कर पर्यटन से संबंधित पक्ष ही उठाऊँगा। जितना संभव हो सके, चर्चा को आदर्शवादी स्थितियों से न जोड़कर व्यवहारिक ही रखूँगा।

इस बार की मुक्तकण्ठ से और त्वरित प्रशंसा होती है कि रेलवे में यात्रा करने से कभी भी जेब पर अधिक भार नहीं पड़ता है औऱ कम पैसों में एक जनसुलभ साधन दे पा रही है, भारतीय रेल। पर आरक्षित सीटों की उपलब्धता की कमी ही एकमात्र ऐसा कारक है जो बहुधा कृत्रिम माँग बढ़ाकर दलालों को अधिक धन उगाहने का अवसर दे देता है। बात सच है और अनुभव पक्ष कठिनाइयों से भरा रहता है।

वर्ष में तीन या चार ऐसे अवसर आते हैं, जब यात्रा सर्वाधिक होती है। उस समय सबको अवकाश मिलता है, बच्चों के विद्यालयों में भी तभी छुट्टी मिलती है, उसी समय सबको घर जाने की और घूमने जाने की सूझती है। यद्यपि उस समय रेलवे के सारे कोच सेवा में लगे होते हैं, फिर भी माँग बनी रहती है, बढ़ी रहती है। स्वाभाविक भी है, जब सारा देश घूमने पर उतर आयेगा तो संसाधन भी कम पड़ जायेंगे। किसी भी तन्त्र की योजना उसके अधिकतम भार के लिये नहीं बनाई जा सकती, यदि ऐसा होगा तो शेष समय संसाधन व्यर्थ पड़े रहेंगे।

इन तीन या चार अवसरों को छोड़ दिया जाये तो अधिकांश मार्गों में आरक्षण की उपलब्धता कोई समस्या नहीं है। यदि पर्यटन को वर्ष में अन्य समय के लिये भी किया जाये तो न केवल पर्यटकों को सुविधा रहेगी वरन रेलवे वर्ष में अधिक लोगों को सेवा दे पायेगी, अपनी व्यर्थ जा रही क्षमता का समुचित उपयोग कर पायेगी। जो सिद्धान्त रेलवे के लिये सच है, वही पर्यटन के अन्य अंगो के लिये भी सटीक बैठेगा। होटल हो, स्थानीय साधन हो, मनोरंजन के अंग हों, सबको ही पर्यटन का काल खंड बढ़ने से लाभ होगा।

यद्यपि जब किसी पर्यटन स्थल पर भीड़ होती है तो मन को वहाँ आने की और अपने निर्णय को सही ठहराने की संतुष्टि होती है, पर अधिक भीड़ में पर्यटन स्थल अपना आनन्द छिपा लेता है, पूर्ण प्रकट नहीं कर पाता है। यदि समुद्र तट में अधिक लोग हैं तो जहाँ प्रारम्भ में अच्छा लगेगा, वहीं बाद में एकान्त में समुद्र की लहरों को न देख पाने का दुख भी रह जायेगा। कई व्यवसायी परिवारों को जानता हूँ, जो अपने पर्यटन की योजना ऐसे समय में ही बनाते हैं जब भीड़ न हो। रेलवे में आरक्षण मिलता है, होटल सस्ते में मिल जाते हैं, खेल खिलाने वाले राह तकते रहते हैं और पूरे परिवार को पर्यटन का पूर्ण आनन्द भी आता है। नीरज भी ऐसे ही समय में पर्यटन पर निकलते है, अभी वह अकेले हैं, पर मुझे पूरा विश्वास है कि परिवार के साथ होने पर भी वह इस सिद्धान्त को नहीं छोड़ेंगे।

अधिक नहीं, बस विद्यालय और कार्यालयों की ओर से पर्यटन के महत्व और इस सिद्धान्त को समझा जाये। ५ दिन की छुट्टी और दो सप्ताहान्त मिला कर ९ दिन का पर्यटन अवकाश का अवसर मिलना चाहिये, जिससे लोग सपरिवार पर्यटन पर जा सकें, बिना किसी समस्या के, वर्ष में किसी भी समय। विद्यालयों की ओर से सामूहिक यात्रा भी वर्ष के कम व्यस्त माहों में करनी चाहिये, हो सके तो हर कक्षा के लिये अलग माह में। देश जानने के लिये और ज्ञान बढ़ाने की दृष्टि से हर विद्यालय के लिये ९ दिवसीय पर्यटन अनिवार्य हो, और न केवल अनिवार्य हो, वरन उसका शैक्षणिक विभाग व मन्त्रालय उसमें अपना अनुदान दें, कम से कम ८० प्रतिशत। इससे विद्यार्थियों को एक वर्ष में पर्यटन के दो अवसर मिलेंगे, एक बार मित्रों के साथ, एक बार परिवार के साथ। उस पर्यटनीय अनुभव में उन्हें आनन्द भी आयेगा और साथ ही साथ रेलवे की आय में वृद्धि भी होगी।

तनिक सोचिये, यदि हम व्यस्त समय की विवशताओं को मात देकर किसी अन्य समय में घूमने की योजना बना सकें तो रेलवे के पास एक सीट क्या, पूरे के पूरे कोच की उपलब्धता रहेगी। तनिक सोचिये, तब कितना आनन्द आयेगा, जब सारे मित्र एक पूरे कोच में आनन्द मनाते, गीत गाते, साथ में खेल खेलते पर्यटन का प्रारम्भ और अन्त करेंगे। यह अनुभव पर्यटन को एक अविस्मरणीय स्थिति पर ले जायेगा। व्यस्त समय की समस्यायें, अन्य समय का आनन्द भी बन सकती हैं।

रेलवे यात्रा के समय अच्छा व स्वास्थ्यकारी भोजन एक बड़ा प्रश्न रहता है और बहुधा रुष्ट चर्चाओं का केन्द्र भी। लम्बी यात्राओं में यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि चार या पाँच बार भोजन आदि करना होता है। कुछ के लिये भोजन अधिक चटपटा, कुछ के लिये अधिक फीका, कुछ के लिये स्वाद रहित, कुछ के लिये अपौष्टिक, कुछ के लिये शुचिता और स्वच्छता से न बना। मुझे कम मसाले का सादा भोजन अच्छा लगता है, मिर्च तो जैसे भय उत्पन्न कर देती हो। लगभग हर बार ही भोजन की पूरी थाली में चावल और दही में संतोष करना पड़ जाता है क्योंकि पैन्ट्रीकारों के रसोइयों को बिना चटपटा खाना बनाये अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने का मार्ग नहीं मिलता है। अपने सहयात्रियों को भी देखता हूँ, यद्यपि छुट्टी के भाव में सभी रहते हैं पर उल्टा सीधा खाकर कोई भी अपना स्वास्थ्य बिगाड़ना नहीं चाहता है। यात्रा में एक ही स्थान पर तैयार हुआ खाना सबको अच्छा लगेगा, इस बात की प्रायिकता बहुत ही कम है। स्वाद और स्वास्थ्य के मानक में हर एक की भोजनीय अभिरुचि भिन्न है।

जिस भोजन में आप स्वाद या स्वास्थ्य ढूंढ़ते हैं, उसी भोजन में व्यवसायी अपना आर्थिक लाभ भी ढूँढता है। यद्यपि भोजन की मात्रा आदि सब निर्धारित होता है, पर अधिक आर्थिक लाभ निचोड़ लेने की मानसिकता गुणवत्ता से समझौता करवा देती है। वहाँ भोजन बाँटने का अधिकार एक ठेकेदार के ही पास है, विवशता का यथा संभव आर्थिक लाभ लेने की प्रवृत्ति इतनी सरलता से जाने वाली नहीं। शिकायतों के निस्तारण में भोजन के स्वाद, स्वास्थ्य और गुणवत्ता संबंधी मानक असिद्ध ही रह जाते हैं।

अधिकांश यात्री कम से कम एक समय का भोजन और एक समय का नाश्ता अपने साथ लेकर चलते हैं। घर का खाना ट्रेन यात्रा में अच्छा लगता है। मैँ भी यही करता हूँ। रेलयात्रा में ही क्यों वरन हवाईयात्रा में लोग अपने घर से लाये पराँठे और अचार खाते हैं। देश के हर क्षेत्र में यात्रा करने वालों के पास अपने अपने व्यंजन हैं जो दो तीन दिन से अधिक संरक्षित किये जा सकते हैं। बिहार में लिट्टी चोखा, उत्तर भारत में सत्तू, राजस्थान और गुजरात में तो दसियों ऐसे व्यंजन हैं, जो स्वादिष्ट हैं, पौष्टिक हैं और संरक्षित भी किये जा सकते हैं। उन्हें यात्रा में ले जाने से बाहर के खाने पर निर्भरता बहुत कम रहेगी। इसके अतिरिक्त रेलवे को भी यह चाहिये कि ट्रेनों में प्रस्तावित भोजन की सूची में उन ही व्यंजनों को ही रखा जाये, जो न केवल बनाने में सरल हों वरन स्वाद और स्वास्थ्य की दृष्टि से उत्तम हों। यही नहीं, मोबाइल या इण्टरनेट आधारित साधन भी विकसित किये जा सकते हैं, जिससे बाहर के भी भोजन बनाने वालों को किसी ट्रेन में भोजन आपूर्ति की सुविधा मिल सके। इन उपायों से पर्यटन का अनुभव पक्ष और भी सुखद व रुचिकर होगा।

नीरज अपने साथ कुछ बिस्कुट आदि सदा लेकर चलते हैं, यदि कहीं भोजन न मिले तो उस पर आश्रित रह लिया जाये। व्यवसायियों के लिये भी पर्यटन-व्यंजन एक संभावनाओं का क्षेत्र है। एक पूरी की पूरी फ़ूड चेन बनायी जा सकती है, इसके ऊपर। आप चिन्तन में जुटिये, अगली पोस्ट में स्टेशनों पर उन सुविधाओं की चर्चा जो पर्यटन के स्थानीय पक्षों को सुदृढ़ करने में सक्षम हैं।

9.2.13

आईआईटी - एक आनन्द यात्रा

मेरे लिये तो आईआईटी किसी भी छात्र के विकास के लिये विश्व के सर्वश्रेष्ठ संस्थानों में एक है, विशेषकर उस छात्र के लिये जो अपने जीवन के महत्वपूर्ण पड़ाव में पाँव धरने जा रहा है। मैं कभी सोचता हूँ कि मैं क्यों गया वहाँ, और लोग भी क्यों जाते हैं वहाँ? मैंने वहाँ चार वर्षों में तीन तरह के लोग देखे। पहले वे जो यह सोच कर आये कि यहाँ आने से नौकरी पक्की हो गयी, लगभग ७५ प्रतिशत, ये लोग किसी तरह चार साल तक ग्रेडों और एसाइनमेन्ट से जूझ कर निकल जाते हैं, नौकरी मिलती है और उनकी आईआईटी यात्रा का ध्येय पूरा हो जाता है। हो सकता है मैं भी कई दिनों तक इसी मानसिकता में रहा हूँ पर वहाँ उपस्थित संभावनाओं ने मुझे शीघ्र ही दूसरी श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया। ये श्रेणी अपनी बौद्धिक क्षमता को पैना करने और उसे सबके सामने सिद्ध करने यहाँ आती है। संभवतः उसे ज्ञात रहता है कि नौकरी तो मिल ही जानी है, आईआईटी की संभावनायें एक नौकरी से कहीं अधिक हैं। सघन बौद्धिक वातावरण फिर कहाँ मिलेगा भला, उसका उपयोग करना अधिक आवश्यक है, किसी क्षेत्र में अनुसंधान कर पैनापन प्राप्त करना यहाँ आने की सार्थकता होगी। इस श्रेणी में लगभग २४ प्रतिशत लोग आगे हैं।

मेरे आशाओं की धारा उन १ प्रतिशत पर आकर बाँध बनाने लगती है, जिन्हें न नौकरी की चाह होती है, न किसी विषय विशेष में अपनी बौद्धिक श्रेष्ठता सिद्ध करने की चाह। जो यहाँ आते हैं, अद्भुत बौद्धिक स्थिति में, अल्पप्रयास में ही विषय की बाधायें पार कर लेते हैं, जो अच्छा लगता है वही पढ़ते हैं और संस्थान को छोड़ देते हैं। वे यहाँ आर्थिक और बौद्धिक यात्रा में सहायता लेने नहीं आते, वे आते हैं बस अपना आत्मविश्वास व्यक्त करने, अपने आप में। सर्वश्रेष्ठ संस्थान, सर्वश्रेष्ठ शिक्षा, सबका थोड़ा सा अंश लेकर कुछ अपने ही स्वप्न साकार करने चल देते हैं, चार सालों बाद। उसे मानसिक उन्मुक्तता बोलें या आध्यात्मिक आवारगी, अजब श्रेणी में आते हैं ये लोग, बहुत कम ही पैसे या अपने विषय में स्थिर रहते हैं। इस श्रेणी की असीम संभावनाओं की चर्चा आगे करेंगे, क्योंकि ये ही बदलाव के सूत्रधार बनने की क्षमता रखते हैं।

जैसे जैसे जीविका के साधनों की कमी हुयी है, नौकरी की निश्चितता प्रदान करने वाले संस्थान की माँग इतनी बढ़ चुकी है कि प्रतियोगी छात्र येन केन प्रकारेण इसमें आना चाहते हैं। कई वर्ष पहले से तैयारी, यान्त्रिक तैयारी, प्रश्नों और उनके उत्तरों के अस्त्र शस्त्रों से सज्जित, युद्ध सा व्यवहार। एक बार अन्दर आने के बाद वही प्रतियोगी मानसिकता, वहाँ भी आने निकलने की होड़, चार साल इसी उठापटक में निकल जाते हैं। आईआईटी एक फैक्टरी बन कर रह जाता है, कमाऊ पूत वहाँ की गयी प्रतियोगिता को अपना वैशिष्ट्य समझते हैं, जगत रण में जूझने को तैयार। हतभागा आईआईटी अपना माथा पीटकर रह जाता है, एक प्रश्न हर वर्ष पूछता है, क्या यही उसकी संभावनायें थीं। निश्चय ही ये उसके ७५ प्रतिशत उत्पाद अवश्य हैं, पर ये उसके श्रेष्ठ उत्पाद तो कदापि नहीं हैं।

अंकों की प्रतियोगिता एक आवश्यकता है यहाँ, पर वही सब कुछ नहीं। निश्चय ही अच्छे ग्रेड की चाह सबको रहती है, पर उसी में सर्वस्व समय न्योछावर कर दिया तो रीते हाथ ही बाहर आयेंगे। सीखने के लिये कितना कुछ है, आँखों से रथ में हाँके घोड़े के पट्टे हटाकर देखें तो। वहाँ के पुस्तकालय में विज्ञान विषय के अतिरिक्त कितना ज्ञान छिपा है। वहाँ के गहन बौद्धिक परिवेश में ज्ञान की कितनी और शाखायें अपना स्वरूप ले रही हैं। खेल, रुचियाँ, चर्चायें, संस्कृति और न जाने कितने अध्याय लिखे जाते हैं वहाँ, हम तनिक प्रतियोगिता से बाहर आकर उन पर दृष्टि तो डालें। जो सबसे अधिक महत्वपूर्ण योगदान इस संस्थान का मानता हूँ, वह है देश के श्रेष्ठ मस्तिष्कों को एक साथ आने का सुयोग और मुझे उनके बीच रहने का मिला सौभाग्य। यहाँ आकर पहली बार आश्चर्य होना प्रारम्भ हुआ कि जिन समस्याओं का समाधान हम एकमार्गी माने बैठे रहते हैं, उनके मार्ग हर चर्चा के साथ चौराहे में बदलते जाते हैं। विज्ञान और तकनीक में उलझ जाने से हम उन मस्तिष्कों और उनकी क्षमताओं को भूल बैठते हैं जिनसे हमारी वर्तमान समस्याओं के सभी हल मिलना नियत हैं।

व्यक्तित्व विकास की असीम संभावना से भरे इस संस्थान में दबावमुक्त वातावरण की वकालत नहीं कर रहा हूँ मैं, दबाव आवश्यक है अपने आलस्य को तज कुछ नया ढूढ़ने के लिये, दबाव आवश्यक है अपनी क्षमताओं को उभारने के लिये, दबाव आवश्यक है सतत सोचने के लिये और नये मार्ग निकालने के लिये और दबाव निश्चय ही आवश्यक है हमें उस कठोर सत्य के प्रति तैयार करने के लिये जिसका सामना यहाँ से तुरन्त बाहर निकलने के बाद होने वाला है। असंभव जैसे शब्द पर विजय पाने के लिये हमें उन छोटे छोटे कठिन कार्यों को सिद्ध करना होता है, जिससे एक बड़े असंभव का निर्माण होता है। वहीं पर यह आत्मविश्वास हमें मिला, जिसने किसी भी कार्य के लिये हमें न कहना सिखाया ही नहीं।

वेतन के आगे लगे शून्य गिने जायें और उसके आधार पर संस्थान की श्रेष्ठता निर्धारित की जाये तो, यहाँ से निकलने वाले स्नातकों के वेतन में शून्य की संख्या निसंदेह सर्वाधिक होगी। पर क्या वही सब कुछ है? वेतन को एकमात्र मानक और कर्मफल मान बैठे स्नातकों की संख्या क्या कभी ७५ प्रतिशत से घटकर २५ प्रतिशत तक आ पायेगी? आईआईटी को यदि अपनी पूरी क्षमता में जीना है, विश्वस्तरीय मानक तय करने हैं, तक्षशिला और नालन्दा से अपना स्तरीय साम्य स्थापित करना है तो यह प्रतिशत हर वर्ष गिरना होगा, वह भी ५ प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से। अगले १० वर्षों में जब यह २५ प्रतिशत तक ही रह जायेगा तब कहीं जाकर आईआईटी अपनी ७५ प्रतिशत सार्थकता सिद्ध कर पायेगा। वेतन के आगे शून्य तब भी रहेंगे, उतने ही रहेंगे, तब भविष्य तनिक अलग होगा, तब भविष्य केवल कल्पना में नहीं जियेगा, साक्षात अनुभव किया जा सकेगा।

श्रेष्ठ संस्थानों से श्रेष्ठ की अपेक्षा यदि देश नहीं करेगा तो अपनी मुक्ति का मार्ग ढूढ़ने किसके द्वारे जाकर भिक्षापात्र फैलायेगा? श्रेष्ठ मस्तिष्क यदि अतिशय आत्मसंशय में पड़े रहे, भविष्य की पीढ़ियों के लिये धन जुटाते रहे तो वर्तमान पीढ़ियों को लुप्त होने की कगार से कौन बचायेगा? अपेक्षायें अधिक नहीं हैं पर स्पष्ट हैं। मस्तिष्कों का श्रेष्ठ समूह केवल धन कमाने की मशीन बनकर नहीं रह सकता, उसे ऊँचे ध्येय रचने और साधने होंगे। समाज के प्रति योगदान की दृष्टि किसी व्यक्तिगत त्याग के पथ से होकर नहीं जाती है, बस तनिक ऊँचा सोचने की आवश्यकता है, और अधिक भयरहित होने की आवश्यकता है। व्यक्तिगत धन कमाने से अधिक हमारा ध्यान उन तन्त्रों और व्यवस्थाओं को स्थापित करने में हो जो न केवल हजारों को जीविका दे सकें, वरन दस गुना धन कमा कर सम्मिलित सुख स्थापित कर सके। इस प्रयास में व्यक्तिगत रूप से भी हम वर्तमान से कहीं अधिक धन कमा पायेंगें, पर स्वयं को पुरुषार्थ के पथ पर स्थापित करने के बाद। मेरे कई मित्र हैं जो इसका महत्व समझते हैं और जिनके अन्दर यह क्षमता भी है, कई इस कार्य में लग चुके हैं और कई अपना मन बना रहे हैं।

बौद्धिक नेतृत्व के साथ आध्यात्मिक संतुष्टि का भावना दौड़ी चली आती है। समाज से एक बार जुड़ कर देखने की परिणिति उसके प्रति सतत कुछ करते रहने में होती है। एक बार लत लगने की देर है, तब जो आनन्द सम्मिलित विकास में आता है, सम्मिलित सुख में आता है, उसके समक्ष शेष व्यक्तिगत सुख बौना पड़ने लगता है।

आईआईटी में प्रवेश आपको एक राजमार्ग की संभावना देता है, यदि आप स्वार्थ की पगडंडी में त्यक्त से चले जायेंगे और अपनी जीविका में संतुष्ट हो जायेंगे तो संभवतः न आपको अपनी क्षमता पर तनिक विश्वास है और न ही संस्थान के वातावरण पर। जहाँ पर देश के श्रेष्ठ मस्तिष्क साथ बैठकर चार वर्ष निकाल देते हैं, वहाँ यदि एक वर्ष में चार टाटा-बिड़ला, चार नोबल विजेता, चार राजनेता और चार समाज सुधारक न निकलें तो श्रेष्ठ समूह का क्या प्रायोजन? जो समाज, देश, विज्ञान, राजनीति, अर्थव्यवस्था को दिशा दिखाने के लिये बने हैं, उन्हें चार वर्ष प्रतियोगिता के परिवेश में हाँक दिया जाये और जिनमें सागर लाँघ जाने की क्षमता है, वे भी हनुमान की तरह अपनी क्षमताओं को भुला बैठें, तो किसके सहारे देश अपने उत्कर्ष की आस लगायेगा? जामवन्त भला कब तक याद दिलाते रहेंगे, संस्थानों को अपनी श्रेष्ठता और सामाजिक अपेक्षायें की स्मृति कब आयेगी? कब मेरा आईआईटी एक आनन्द यात्रा में चल पड़ेगा?


(आईआईटी कानपुर में विनीत सिंह के साथ एक कमरे में तीन वर्ष बिताये हैं, आईआईटी के बारे में उनके ये विचार मेरे चिन्तन पथ पर बेधड़क अपनी छाप छोड़ गये, बस अनुवाद और कुछ शब्द मेरे हैं। विनीत अभी टाटा स्टील में महत्वपूर्ण पद पर हैं।)

12.12.12

हृदय हमारा

निर्मलतम था हृदय हमारा,

निर्दयता का वृहद ताण्डव,
स्वार्थपरक  जीवन का मूल्यन ।
और घृणा के कई बाणों से,
छिला सदा ही हृदय हमारा ।।

लोलुपता का घृणित आवरण,
अहंकार की निर्मम चोटें ।
और वासना के दलदल में,
देखो सत्व लुटा बैठा है ।।

कोई हमको फिर लौटा दे,
निर्मलतम जो हृदय हमारा ।

28.5.11

काश तुम्हें होता यह ज्ञात

मौन बहा शब्दों के पार,
हृदय समेटे यह उपकार ।
समय-शून्य हो जगत बसाया,
सपनों का विस्तार सजाया ।

चंचलता का झोंका, मुझको भूल गयी तुम,
पेंग बढ़ा कर समय डाल पर झूल गयी तुम,

सहसा जीवन में फिर से घिर आयी रात,
काश तुम्हें होता यह ज्ञात ।1

सभी बिसारे जाते सार,
आकृति क्या पायेगा प्यार।
आँखों का आश्रय अकुलाया,
ढेरों खारा नीर बहाया।

तुमको किसने रोका, क्यों स्थूल हुयी तुम,
तेज हवायें ही थीं, क्यों प्रतिकूल हुयी तुम,

मन रोया है, तुमको जब घेरें संताप,
काश तुम्हें होता यह ज्ञात ।2

है संवाद नहीं रुक पाता,
कह देने को उपजा जाता,
जाने कितनी सारी बातें,
शान्त बितायी अनगिन रातें,

संसाधन थे, उनमें डूबी, तृप्त रही तुम,
अत्म मुग्ध हो अपने में अनुरक्त रही तुम,

शब्द नहीं पर नित ही तुमसे होती बात,
काश तुम्हें होता यह ज्ञात ।3

रिक्त कक्ष क्यों, मन लड़ता है,
हृदय धैर्य-भाषा गढ़ता है।
अभिलाषा, सुधि आ जायेगी,
तुम्हें प्रतीक्षा पा जायेगी।

कितना बदले रंग, किन्तु हो अभी वही तुम,
देखूँ कितनी बार, हृदय में वही रही तुम

पीड़ा बनकर बरस रही रिमझिम बरसात,
काश तुम्हें होता यह ज्ञात ।4