मेरे लिये तो आईआईटी किसी भी छात्र के विकास के लिये विश्व के सर्वश्रेष्ठ संस्थानों में एक है, विशेषकर उस छात्र के लिये जो अपने जीवन के महत्वपूर्ण पड़ाव में पाँव धरने जा रहा है। मैं कभी सोचता हूँ कि मैं क्यों गया वहाँ, और लोग भी क्यों जाते हैं वहाँ? मैंने वहाँ चार वर्षों में तीन तरह के लोग देखे। पहले वे जो यह सोच कर आये कि यहाँ आने से नौकरी पक्की हो गयी, लगभग ७५ प्रतिशत, ये लोग किसी तरह चार साल तक ग्रेडों और एसाइनमेन्ट से जूझ कर निकल जाते हैं, नौकरी मिलती है और उनकी आईआईटी यात्रा का ध्येय पूरा हो जाता है। हो सकता है मैं भी कई दिनों तक इसी मानसिकता में रहा हूँ पर वहाँ उपस्थित संभावनाओं ने मुझे शीघ्र ही दूसरी श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया। ये श्रेणी अपनी बौद्धिक क्षमता को पैना करने और उसे सबके सामने सिद्ध करने यहाँ आती है। संभवतः उसे ज्ञात रहता है कि नौकरी तो मिल ही जानी है, आईआईटी की संभावनायें एक नौकरी से कहीं अधिक हैं। सघन बौद्धिक वातावरण फिर कहाँ मिलेगा भला, उसका उपयोग करना अधिक आवश्यक है, किसी क्षेत्र में अनुसंधान कर पैनापन प्राप्त करना यहाँ आने की सार्थकता होगी। इस श्रेणी में लगभग २४ प्रतिशत लोग आगे हैं।
मेरे आशाओं की धारा उन १ प्रतिशत पर आकर बाँध बनाने लगती है, जिन्हें न नौकरी की चाह होती है, न किसी विषय विशेष में अपनी बौद्धिक श्रेष्ठता सिद्ध करने की चाह। जो यहाँ आते हैं, अद्भुत बौद्धिक स्थिति में, अल्पप्रयास में ही विषय की बाधायें पार कर लेते हैं, जो अच्छा लगता है वही पढ़ते हैं और संस्थान को छोड़ देते हैं। वे यहाँ आर्थिक और बौद्धिक यात्रा में सहायता लेने नहीं आते, वे आते हैं बस अपना आत्मविश्वास व्यक्त करने, अपने आप में। सर्वश्रेष्ठ संस्थान, सर्वश्रेष्ठ शिक्षा, सबका थोड़ा सा अंश लेकर कुछ अपने ही स्वप्न साकार करने चल देते हैं, चार सालों बाद। उसे मानसिक उन्मुक्तता बोलें या आध्यात्मिक आवारगी, अजब श्रेणी में आते हैं ये लोग, बहुत कम ही पैसे या अपने विषय में स्थिर रहते हैं। इस श्रेणी की असीम संभावनाओं की चर्चा आगे करेंगे, क्योंकि ये ही बदलाव के सूत्रधार बनने की क्षमता रखते हैं।
जैसे जैसे जीविका के साधनों की कमी हुयी है, नौकरी की निश्चितता प्रदान करने वाले संस्थान की माँग इतनी बढ़ चुकी है कि प्रतियोगी छात्र येन केन प्रकारेण इसमें आना चाहते हैं। कई वर्ष पहले से तैयारी, यान्त्रिक तैयारी, प्रश्नों और उनके उत्तरों के अस्त्र शस्त्रों से सज्जित, युद्ध सा व्यवहार। एक बार अन्दर आने के बाद वही प्रतियोगी मानसिकता, वहाँ भी आने निकलने की होड़, चार साल इसी उठापटक में निकल जाते हैं। आईआईटी एक फैक्टरी बन कर रह जाता है, कमाऊ पूत वहाँ की गयी प्रतियोगिता को अपना वैशिष्ट्य समझते हैं, जगत रण में जूझने को तैयार। हतभागा आईआईटी अपना माथा पीटकर रह जाता है, एक प्रश्न हर वर्ष पूछता है, क्या यही उसकी संभावनायें थीं। निश्चय ही ये उसके ७५ प्रतिशत उत्पाद अवश्य हैं, पर ये उसके श्रेष्ठ उत्पाद तो कदापि नहीं हैं।
अंकों की प्रतियोगिता एक आवश्यकता है यहाँ, पर वही सब कुछ नहीं। निश्चय ही अच्छे ग्रेड की चाह सबको रहती है, पर उसी में सर्वस्व समय न्योछावर कर दिया तो रीते हाथ ही बाहर आयेंगे। सीखने के लिये कितना कुछ है, आँखों से रथ में हाँके घोड़े के पट्टे हटाकर देखें तो। वहाँ के पुस्तकालय में विज्ञान विषय के अतिरिक्त कितना ज्ञान छिपा है। वहाँ के गहन बौद्धिक परिवेश में ज्ञान की कितनी और शाखायें अपना स्वरूप ले रही हैं। खेल, रुचियाँ, चर्चायें, संस्कृति और न जाने कितने अध्याय लिखे जाते हैं वहाँ, हम तनिक प्रतियोगिता से बाहर आकर उन पर दृष्टि तो डालें। जो सबसे अधिक महत्वपूर्ण योगदान इस संस्थान का मानता हूँ, वह है देश के श्रेष्ठ मस्तिष्कों को एक साथ आने का सुयोग और मुझे उनके बीच रहने का मिला सौभाग्य। यहाँ आकर पहली बार आश्चर्य होना प्रारम्भ हुआ कि जिन समस्याओं का समाधान हम एकमार्गी माने बैठे रहते हैं, उनके मार्ग हर चर्चा के साथ चौराहे में बदलते जाते हैं। विज्ञान और तकनीक में उलझ जाने से हम उन मस्तिष्कों और उनकी क्षमताओं को भूल बैठते हैं जिनसे हमारी वर्तमान समस्याओं के सभी हल मिलना नियत हैं।
व्यक्तित्व विकास की असीम संभावना से भरे इस संस्थान में दबावमुक्त वातावरण की वकालत नहीं कर रहा हूँ मैं, दबाव आवश्यक है अपने आलस्य को तज कुछ नया ढूढ़ने के लिये, दबाव आवश्यक है अपनी क्षमताओं को उभारने के लिये, दबाव आवश्यक है सतत सोचने के लिये और नये मार्ग निकालने के लिये और दबाव निश्चय ही आवश्यक है हमें उस कठोर सत्य के प्रति तैयार करने के लिये जिसका सामना यहाँ से तुरन्त बाहर निकलने के बाद होने वाला है। असंभव जैसे शब्द पर विजय पाने के लिये हमें उन छोटे छोटे कठिन कार्यों को सिद्ध करना होता है, जिससे एक बड़े असंभव का निर्माण होता है। वहीं पर यह आत्मविश्वास हमें मिला, जिसने किसी भी कार्य के लिये हमें न कहना सिखाया ही नहीं।
वेतन के आगे लगे शून्य गिने जायें और उसके आधार पर संस्थान की श्रेष्ठता निर्धारित की जाये तो, यहाँ से निकलने वाले स्नातकों के वेतन में शून्य की संख्या निसंदेह सर्वाधिक होगी। पर क्या वही सब कुछ है? वेतन को एकमात्र मानक और कर्मफल मान बैठे स्नातकों की संख्या क्या कभी ७५ प्रतिशत से घटकर २५ प्रतिशत तक आ पायेगी? आईआईटी को यदि अपनी पूरी क्षमता में जीना है, विश्वस्तरीय मानक तय करने हैं, तक्षशिला और नालन्दा से अपना स्तरीय साम्य स्थापित करना है तो यह प्रतिशत हर वर्ष गिरना होगा, वह भी ५ प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से। अगले १० वर्षों में जब यह २५ प्रतिशत तक ही रह जायेगा तब कहीं जाकर आईआईटी अपनी ७५ प्रतिशत सार्थकता सिद्ध कर पायेगा। वेतन के आगे शून्य तब भी रहेंगे, उतने ही रहेंगे, तब भविष्य तनिक अलग होगा, तब भविष्य केवल कल्पना में नहीं जियेगा, साक्षात अनुभव किया जा सकेगा।
श्रेष्ठ संस्थानों से श्रेष्ठ की अपेक्षा यदि देश नहीं करेगा तो अपनी मुक्ति का मार्ग ढूढ़ने किसके द्वारे जाकर भिक्षापात्र फैलायेगा? श्रेष्ठ मस्तिष्क यदि अतिशय आत्मसंशय में पड़े रहे, भविष्य की पीढ़ियों के लिये धन जुटाते रहे तो वर्तमान पीढ़ियों को लुप्त होने की कगार से कौन बचायेगा? अपेक्षायें अधिक नहीं हैं पर स्पष्ट हैं। मस्तिष्कों का श्रेष्ठ समूह केवल धन कमाने की मशीन बनकर नहीं रह सकता, उसे ऊँचे ध्येय रचने और साधने होंगे। समाज के प्रति योगदान की दृष्टि किसी व्यक्तिगत त्याग के पथ से होकर नहीं जाती है, बस तनिक ऊँचा सोचने की आवश्यकता है, और अधिक भयरहित होने की आवश्यकता है। व्यक्तिगत धन कमाने से अधिक हमारा ध्यान उन तन्त्रों और व्यवस्थाओं को स्थापित करने में हो जो न केवल हजारों को जीविका दे सकें, वरन दस गुना धन कमा कर सम्मिलित सुख स्थापित कर सके। इस प्रयास में व्यक्तिगत रूप से भी हम वर्तमान से कहीं अधिक धन कमा पायेंगें, पर स्वयं को पुरुषार्थ के पथ पर स्थापित करने के बाद। मेरे कई मित्र हैं जो इसका महत्व समझते हैं और जिनके अन्दर यह क्षमता भी है, कई इस कार्य में लग चुके हैं और कई अपना मन बना रहे हैं।
बौद्धिक नेतृत्व के साथ आध्यात्मिक संतुष्टि का भावना दौड़ी चली आती है। समाज से एक बार जुड़ कर देखने की परिणिति उसके प्रति सतत कुछ करते रहने में होती है। एक बार लत लगने की देर है, तब जो आनन्द सम्मिलित विकास में आता है, सम्मिलित सुख में आता है, उसके समक्ष शेष व्यक्तिगत सुख बौना पड़ने लगता है।
आईआईटी में प्रवेश आपको एक राजमार्ग की संभावना देता है, यदि आप स्वार्थ की पगडंडी में त्यक्त से चले जायेंगे और अपनी जीविका में संतुष्ट हो जायेंगे तो संभवतः न आपको अपनी क्षमता पर तनिक विश्वास है और न ही संस्थान के वातावरण पर। जहाँ पर देश के श्रेष्ठ मस्तिष्क साथ बैठकर चार वर्ष निकाल देते हैं, वहाँ यदि एक वर्ष में चार टाटा-बिड़ला, चार नोबल विजेता, चार राजनेता और चार समाज सुधारक न निकलें तो श्रेष्ठ समूह का क्या प्रायोजन? जो समाज, देश, विज्ञान, राजनीति, अर्थव्यवस्था को दिशा दिखाने के लिये बने हैं, उन्हें चार वर्ष प्रतियोगिता के परिवेश में हाँक दिया जाये और जिनमें सागर लाँघ जाने की क्षमता है, वे भी हनुमान की तरह अपनी क्षमताओं को भुला बैठें, तो किसके सहारे देश अपने उत्कर्ष की आस लगायेगा? जामवन्त भला कब तक याद दिलाते रहेंगे, संस्थानों को अपनी श्रेष्ठता और सामाजिक अपेक्षायें की स्मृति कब आयेगी? कब मेरा आईआईटी एक आनन्द यात्रा में चल पड़ेगा?
(आईआईटी कानपुर में विनीत सिंह के साथ एक कमरे में तीन वर्ष बिताये हैं, आईआईटी के बारे में उनके ये विचार मेरे चिन्तन पथ पर बेधड़क अपनी छाप छोड़ गये, बस अनुवाद और कुछ शब्द मेरे हैं। विनीत अभी टाटा स्टील में महत्वपूर्ण पद पर हैं।)