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10.8.21

ब्लाग यात्रा - ३ (टिप्पणी)


जो लोग ब्लाग लिखते हैं और उसमें रुचि लेते हैं, वे टिप्पणियों के महत्व को भी समझते हैं। उत्साह बढ़ाने में, सृजनात्मकता बनाये रखने में टिप्पणियाँ अमृत सा कार्य करती हैं। यह इस विधा का ही वैशिष्ट्य है कि पाठकों को लेखक से संवाद का अवसर मिलता है।


जब लगभग एक पृष्ठ पर आपने कोई विषय, घटना या कविता रखी हो तो यह स्वाभाविक ही है कि उस पर कहने को बहुत कुछ होगा। कई पक्ष छूटे होंगे, कई पर असहमति होगी, कई पर दृष्टिकोण भिन्न होंगे, कई पर आत्मिक अनुभव भी होंगे। ब्लाग का प्रारूप इन सब पर प्रतिक्रियाओं का अवसर देता है। ब्लाग में संवाद का जो स्वरूप पल्लवित होता है वह बहुधा मूल से कहीं अधिक रोचक और पठनीय होता है।


एक सिंहावलोकन करता हूँ तो लगता है कि यदि पाठक अपना योगदान टिप्पणियों में न देते तो संभवतः ब्लाग का स्तर अतिसामान्य ही रह गया होता।


जब २००९ में ब्लाग से जुड़ा, उस समय पढ़ना और विषय से सम्बद्ध टिप्पणी करना अच्छा लगता था। यह क्रम कुछ माह चला होगा। यद्यपि हिन्दी में गतिमय टाइप कर पाना अपने आप में संघर्ष था पर ब्लाग जगत का एक सामूहिक महाप्रयत्न रहा कि सबने उस बाधा को पार किया। जिनको तनिक भी तकनीक की सहजता थी उन्होंने सबकी सहायता की। दो तीन वर्ष का वह काल टाइप करने की विधियों का संक्रमणकाल कहा जायेगा। अभी तो फिर भी एक स्थायित्व आ गया है। उसके तकनीकी और व्यवहारिक पक्ष पर विस्तृत चर्चा फिर कभी। 


उस समय ब्लाग बहुत अधिक नहीं थे और समय मिल जाता था कि सबको पढ़ सकें। सबको पढ़ना अपने आप में एक संतोष देता था और लगभग सभी पढ़े ब्लागों पर टिप्पणी हो ही जाती थी। लगभग सौ ब्लागों को पढ़ने के क्रम में एक दिन में तीस टिप्पणियाँ तक हो ही जाती थीं। लगभग सब यही करते थे, सब सबका उत्साह बढ़ाते थे। एक अद्भुत सी ऊर्जा व्यापी थी उस समय ब्लागजगत में। किसी ब्लाग पर की हुयी टिप्पणी को भी सहेज कर रखने के क्रम में असम्बद्ध रूप में विचारों के न जाने कितनी लड़ियाँ रखे बैठे हैं हम। कभी समय मिला तो उनको भी ब्लाग का आकार दिया जायेगा।


एक बार लय आने पर पाठक टिप्पणियों से अपने मन की कहने लगे और ब्लाग व्यापकता पाने लगे। अभी तो उतनी लम्बी टिप्पणी नहीं लिख पाता हूँ पर प्रारम्भिक काल में  टिप्पणी बहुधा पर्याप्त लम्बी हो जाती थीं, बड़ी विस्तृत हो जाती थीं। यह देख कर ज्ञानदत्तजी ने कहा कि इस तरह की तीन चार टिप्पणियाँ जोड़कर, संदर्भ, उपसंहार बताकर या एक प्रश्न उठाकर ब्लागपोस्ट बनायी जा सकती है। केवल उत्साहित ही नहीं, उन्होंने आमंत्रित भी किया अपने ब्लाग मानसिक हलचल पर सप्ताह में एक अतिथि पोस्ट लिखने के लिये।


सितम्बर २००९ को पहली पोस्ट लिखी ‘गाय’। पहली पोस्ट का आनन्द व्यक्त नहीं किया जा सकता था। पोस्ट का विषय गायों की मार्मिक स्थिति पर था कि किस प्रकार हम गायों का दूध महत्वपूर्ण तो मानते हैं पर गायों को नहीं। पता नहीं पर इस विषय की गम्भीरता में सृजन के आनन्द की रेख चमक जाती थी। एक विचित्र सी स्थिति थी मन की। यह एक शोध का विषय हो सकता है कि एक पीड़ाजनित विषय पर किये सृजन की संतुष्टि और प्रशंसा का आनन्द क्या विषयगत पीड़ा से अधिक हो सकता है? या तीनों ही साथ साथ रह सकते हैं? जब कविता या लेख पढ़ें तो मन दुखी हो, उसके बाद यह ध्यान आते ही कि यह आपके द्वारा रचित है तब एक संतुष्टि का भाव और जब उसी पर किसी पाठक की टिप्पणी के रूप में प्रशंसा मिले तो आत्मिक आनन्द। औरों की तो कह नहीं सकता पर मेरे लिये नीरवता के परिवेश में तीनों भाव एक साथ रह सकते हैं।


ज्ञानदत्तजी का ब्लाग अत्यन्त पठित और चर्चित था अतः मेरी पोस्ट भी उसी उत्साह से पढ़ी गयी। आशीर्वादात्मक टिप्पणियाँ आयीं जिन्होनें ब्लागजगत में मेरा स्वागत किया पर मुख्यतः टिप्पणियाँ गायों की उस दयनीय दशा पर आयीं जिसे विषय में वर्णित किया गया था। कुछ ने अपने अनुभव  लिखे, कुछ ने समाधान बताये, कुछ ने धर्म को अधिक उत्तरदायी ठहराया, कुछ ने समाज को कोसा। संवाद के जिस स्तर पर सामान्य से विषय को पहुँचना था, ब्लाग और टिप्पणियों के माध्यम से वह वहाँ पहुँच सका। यदि टिप्पणियों में ढूढ़ेगें तो आपको ब्लागजगत के सारे आधारभूत और चर्चित नाम मिल जायेंगें। न केवल वे स्वयं ही बहुत अच्छा लिखते थे अपितु औरों के लिखे को भी संवाद की स्थिति तक पहुँचाते थे।


ब्लाग की प्रारम्भिक स्थिति प्रतिस्पर्धात्मक नहीं थी। जब पाठक बहुत हों, विषय पर्याप्त हों, टिप्पणियों के माध्यम से संवाद सतत हो, तो प्रतिस्पर्धा कैसी? ब्लागजगत एक खुला विस्तृत नभ था जिसके नीचे सबको आश्रय मिला था। सबकी अपनी विशेषसिद्धता थी, सभी महारथी थे। एक नयी विधा के क्षेत्र में वही आया था जिसकी पठन पाठन में रुचि थी, अभिव्यक्ति के लिये जिसके शब्द उत्कण्ठित थे पर पारम्परिक विधाओं को वे इसके लिये अपर्याप्त मानते थे। 


यद्यपि टिप्पणियों का अपना महत्व था। उत्साह, विषय विस्तार और संवाद, तीनों ही इसके माध्यम से बल पाते थे। कुछ समय पश्चात टिप्पणियों की संख्या एक अनकही प्रतिस्पर्धा के प्रतीक रूप में स्थान पाने लगी। ब्लाग बढ़ने लगे और सब पढ़ पाना संभव नहीं हुआ तो टिप्पणियों का पारस्परिक आदान प्रदान प्रारम्भ हुआ। अधिक ब्लाग पढ़ने के प्रयास में और की गयी टिप्पणियों की अधिक संख्या होने से उनकी गुणवत्ता प्रभावित होने लगी। कालान्तर में कई स्थानों पर टिप्पणी उपस्थिति दर्शाने का माध्यम सा बन गयी। अपने इस अर्थोपकर्ष में भले ही टिप्पणी अपना व्यापक पूर्वप्रभाव न लिये हो पर संवाद का माध्यम अवश्य है। आशा है कि सोशल मीडिया के कई नवमाध्यमों के बीच भविष्य में ब्लाग अपना स्थान पुनः पायेगा और वह भी टिप्पणीतन्त्र के प्रभावी होने से।

19.12.12

टिप्पणियाँ भी साहित्य हैं

कुछ दिन पहले देखा कि देवेन्द्र पाण्डेय जी ने एक ब्लॉग बनाया है, टिप्पणियों का। इसमें वह किसी पोस्ट को चुनते हैं और पोस्ट पर की गयी टिप्पणियों के संवाद को समझाने का कार्य करते हैं। बड़ी ही रोचक और रसमय प्रक्रिया है यह। इसके पहले रविकरजी की काव्यात्मक टिप्पणियों का ब्लॉग भी पढ़ने को मिलता रहा है। काव्यात्मक टिप्पणियाँ न केवल पोस्ट के भाव को संक्षेप में व्यक्त करती हैं, वरन उस विषय पर अपना मत भी व्यक्त करती हैं।

उत्साहवर्धक और संवेदनात्मक टिप्पणियों की सार्थकता है, पर उससे भी अधिक बात करती हुयी वो टिप्पणियाँ होती हैं जो विषय के किसी पक्ष को उजागर करते हुये लिखी जाती है। कई बार कुछ पोस्ट पढ़ना प्रारम्भ करते हैं, उस पर की गयी टिप्पणियाँ पढ़ते हैं, तो विषय पर किया गया एक शोध सा सामने आ जाता है। अपने ब्लॉग पर ही देखता हूँ, कई बार टिप्पणियाँ इतनी पूर्ण होती हैं कि उन्हें चुरा कर अपनी पोस्ट में लगा लेने की इच्छा होती है। आभूषण की तरह सज जाती हैं वे पोस्ट के सौन्दर्य में। कभी कभी तो लगता है कि पोस्ट तो मात्र विषय की प्रस्तावना ही होती है, उस विषय का शेष विस्तार तो बाद में आता है, टिप्पणियों के माध्यम से। कई बार तो किसी पाठक विशेष की टिप्पणी क्या रहेगी, यह उत्सुकता रहती है पोस्ट लिखते समय। देखिये तो, हम पोस्ट लिखते समय टिप्पणियों का चिन्तन करते हैं, वहीं सुधीजन टिप्पणी लिखते समय पोस्ट का पूरा अर्थ शब्दों में मथ देते हैं।

यह बड़ा ही रोचक तथ्य कि इसमें लेखक और पाठक की चिन्तन प्रक्रिया को सहारा देती है टिप्पणियों की व्यवस्था। जब ब्लॉग प्रारम्भ हुये होंगे तो यह संबंध हमारी कल्पना में आये भी नहीं होंगे। अंग्रेज़ी के ब्लॉग, जो मैं पढ़ता हूँ, वे मुख्यतः तकनीक से जुड़े होते हैं और उनमें संवाद से अधिक तथ्य प्रमुख स्थान पाते हैं। अंग्रेज़ी के अन्य ब्लॉग भी जो चिन्तन प्रधान होते हैं, उन पर भी संवाद की उतनी अधिक मात्रा नहीं दिखी मुझे। हिन्दी के ब्लॉगों में जो चौपाल दिखती है, वैसी कहीं नहीं दिखी हमें। लोग बात करते हुये से लगते हैं, चर्चायें मुख्यतः सकारात्मक ही होती हैं, यदि कहीं पर मतभिन्नता दिखती भी है तो संवाद और उभर आता है, अस्त नहीं होता है। वातावरण जीवन्त सा दिखता है, यदि एक स्थान सूखा दिखता है तो वर्षा कहीं और प्रारम्भ हो जाती है, पर समग्रता में देखा जाये तो प्रवाह बना ही रहता है।

कारणों की चर्चा करें तो बहुत अधिक विचार नहीं करना पड़ेगा। हमारे समाज का प्रभाव हमारे ब्लॉगों के प्रारूप पर स्पष्ट दिखता है। पान की दुकानों पर, नाई से बाल कटाते समय, हलवाई के यहाँ चाय की चुस्कियाँ लेते समय, बनारस के घाटों पर और गाँव की चौपालों में, हम विश्व के न जाने कितने नेताओं के निर्णयों पर प्रश्नचिन्ह खड़े कर देते हैं। राजनीति के विषय के अतिरिक्त बात संस्कृति की बारीकियों की हो, इतिहास की भूलों की हो, व्यक्तित्वों की हो या उनसे जुड़ी चटपटी सूचनाओं की हो, शायद ही कोई पक्ष छूटता होगा इन संवादों से। राजनैतिक विषयों की प्रारम्भिक समझ में इन अनौपचारिक चौपालों का विशेष महत्व रहा है, मेरे लिये भी और मेरे जैसे न जाने कितने और लोगों के लिये भी।

जब पोस्ट और उन पर हुयी टिप्पणियों को देखता हूँ तो वही सब स्थान याद आने लगते हैं। जैसे उन चर्चाओं में याद नहीं रहता था कि चर्चा छेड़ी किसने थी, मोड़ी किसने थी और समाप्त किसने की। यदि कुछ याद रहता है तो उस पर पारित हुये सामूहिक निर्णय। कौन से विचार सबकी सहमति धरते हैं, कौन विचार अभी तक अनसुलझे हैं और भविष्य की चर्चा का आधार बन सकते हैं। धीरे धीरे हमारी समझ बढ़ती है, आगामी चर्चा का स्तर बढ़ता है और विषय अपने निष्कर्षों पर पहुँचने लगता है।

जब किसी विषय में संवाद का इतना महत्व है तो संवाद विषय का अभिन्न अंग भी हुआ। टिप्पणियाँ जब संवाद का स्वरूप ले लेती हों तो वह भी विषय का अंग हो जाती हैं। जब लिखी हुयी पोस्ट साहित्य हो जाये तो टिप्पणियाँ भी साहित्य हो गयीं। टिप्पणियों का महत्व निश्चय ही इस प्रकार सबके लिये ही है।

आप अपनी टिप्पणियों को कितना महत्व देते है? दानकर भूल जाते हैं या उसकी एक प्रति अपने पास भी रख लेते हैं। मैं टिप्पणियों को अपने सृजन का अंग मानता हूँ अतः उन्हें कहीं सुरक्षित रख लेता हूँ। यद्यपि औरों के द्वारा की हुयी टिप्पणियाँ आपकी पोस्ट में और ब्लॉगर खाते में सुरक्षित रहती हैं, आपके द्वारा औरों के ब्लॉग पर की हुयी टिप्पणियाँ सुरक्षित नहीं रहती हैं। कभी कभी ब्लॉग संकलक हारम् पर पिछली कई टिप्पणियों का संकलन देख कर हर्षमिश्रित प्रसन्नता होती है। ब्लॉगर तो देर सबेर हमारे द्वारा की हुयी टिप्पणियाँ भी संरक्षित और संकलित कर ही देगा पर वर्तमान में जितनी दमदार टिप्पणियाँ स्मृति से निकली जा रही हैं, उन्हें स्वयं ही सहेज के रखने की आवश्यकता है।

मैं तो अपनी टिप्पणियाँ सहेज कर रखता हूँ, कभी कभी उस स्मृति के रूप में जो किसी का उत्कृष्ट ब्लॉग पढ़कर मन में आयी। अच्छा पढ़ने के बाद मन में सुप्त विचारों को शब्द मिलने लगते हैं, शब्द अच्छे मिलते हैं, सृजन होता है। मेरे द्वारा की गयी अच्छी टिप्पणियाँ अच्छी पोस्टों की कृतज्ञ हैं, जितनी अच्छी पोस्ट होती हैं, टिप्पणियों का स्तर उतना ही बढ़ जाता है।

पिछली पोस्ट पर मुझे इस बात का संबल मिला कि अच्छा पढ़ना भी चाहिये और उसके आधार पर अच्छी पोस्ट लिखनी भी चाहिये। अच्छी पुस्तक पढ़ उसके बारे में लिखने की इच्छा होती है। यही तर्क औरों के द्वारा लिखित अच्छी पोस्टों को पढ़ने के बाद भी लागू होती है, उन्हें पढ़ने के बाद भी कुछ त्वरित लिखने का मन करता है, वह लेखन ही टिप्पणियाँ हैं। एक अच्छी पुस्तक हो या एक अच्छी पोस्ट हो, उसे पढ़ने के बाद आप एक पोस्ट लिखें या एक टिप्पणी, वह भी सृजन का अंग है, वह भी साहित्य का अंग है। जितना संभव हो पढ़ें, जितना संभव हो स्वयं को व्यक्त करें। टिप्पणियाँ व्यर्थ नहीं हैं, टिप्पणियाँ व्यापार नहीं है, टिप्पणियाँ साहित्य हैं।