मुझे साइकिल के आविष्कार ने विशेष प्रभावित किया है। सरल सा यन्त्र, आपके प्रयास का पूरा मोल देता है आपको, आपकी ऊर्जा पूरी तरह से गति में बदलता हुआ, बिना कुछ भी व्यर्थ किये। दक्षता की दृष्टि से देखा जाये तो यह सर्वोत्तम यन्त्र है। घर्षण में थोड़ी बहुत ऊर्जा जाती है, पर वह भी न के बराबर। कुल मिला कर चार स्थान ऐसे होते हैं जहाँ घर्षण हो सकता है, दो पहिये के संपर्क बिन्दु और दो चेन के धुरे। दक्षता प्रतिशत में नापी जाती है, जितना निष्कर्ष निकला, उसे लगे हुये प्रयास से भाग देकर सौ से गुणा कर दीजिये। जब व्यर्थ हुयी ऊर्जा न्यूनतम होती है तो दक्षता अधिकतम होती है। साइकिल के लिये यह लगभग ९८% तक होती है। एक नियत दूरी तय करने में, यातायात के अन्य साधनों में भी लगी ऊर्जा साइकिल की तुलना में कहीं अधिक होती है। यहाँ तक कि पैदल चलने में भी साइकिल से अधिक ऊर्जा लगती है।
पिछले सौ वर्षों में साइकिल की मौलिक डिज़ाइन में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। जो भी विकास हुआ है, वह नयी और हल्की धातुओं से उसका ढाँचा बनाने में और गियर बॉक्स परिवर्धित करने में हुआ है। मैं कल ही बंगलौर में देख रहा था, पहाड़ों पर चलाने वाली २४ गियर की साइकिल का भार मात्र १२ किलो था। पहाड़ो पर चलने वाली सबसे हल्की साइकिल ६.४ किलो की है। सामान्य श्रेणी में सबसे हल्साइकिल २.७ किलो की है जो आपका छोटा सा बच्चा भी उठा लेगा।
पर्यटन की दृष्टि से देखा जाये तो इस प्रकार की हल्की साइकिलें साथ में ले जाने में असुविधाजनक है, कारण उनका बड़ा आकार है। यदि ऐसी साइकिलों को ट्रेन के सामान डब्बे में रखने और उतारने की सुविधा रहे तो ही लम्बी यात्राओं में इनका उपयोग किया जा सकता है। यदि ऐसी व्यवस्था नहीं हो पाती है तो उस स्थिति में ऐसी साइकिल हो जो सहजता से मोड़ कर सीट के नीचे रखा जा सके। इस दृष्टि से बिना उपयोगिता प्रभावित किये हुये, साइकिलों का ढाँचा बदल कर, उनका भार १० किलो तक लाया जा चुका है। घुमक्कड़ों के लिये ऐसी मोड़ कर रखी जा सकने वाली साइकिलें भविष्य में बहुत उपयोगी सिद्ध होने वाली हैं।
इण्टरनेट देखें तो साइकिल के गुणगान से अध्याय भरे पड़े हैं, हर दृष्टि में साइकिल धुँये उगलते राक्षसों से श्रेष्ठ है। यदि आस पास दृष्टि उठाकर देखें तो परिस्थितियाँ सर्वथा पलट हैं, सड़कों पर एक साइकिल नहीं दिखती है। हाँ, कॉलोनी या मुहल्लों में साइकिल दिखती है पर वह विशुद्ध मनोरंजन और खेलकूद के प्रायोजन से। बंगलोर को पिछले ४ वर्षों से देख रहा हूँ, दो समस्यायें नित ही दिखायी पड़ती हैं। एक तो सड़कें वाहनों से भरी पड़ी हैं और उसमें बैठे लोग अति बेडौल होते जा रहे हैं। यह विडम्बना ही कही जायेगी कि यहाँ पर वाहनों की औसत चाल १०-१५ किमी प्रतिघंटे से अधिक नहीं है। यातायात का बोझ यहाँ की सड़कें उठाने में अक्षम हैं और अपना बोझ उठाने में यहाँ के सुविधाभोगी नागरिक। काश ऐसा होता कि १० किमी के तक के कार्य स्थलों के लिये साइकिल अनिवार्य हो जाती, उसके अनुसार सुरक्षित मार्ग बन जाते, तो यहाँ का पर्यावरण, सड़कें और नागरिक सौन्दर्य, व्यवस्था और स्वास्थ्य से लहलहा उठते।
आइये देखते हैं कि किस तरह से साइकिल अन्य माध्यमों से अधिक उन्नत है। यहाँ के यातायात की स्थिति लें तो एक साइकिल की तुलना में कार से जाने में ८० गुना अधिक ऊर्जा लगती है, जबकि इसमें ट्रैफिक सिग्नल में व्यर्थ किया गया तेल जोड़ा नहीं गया है। साइकिल की औसत गति १५ किमी प्रतिघंटा तक होती है, जबकि यातायात वाहनों को १५ किमी प्रतिघंटों से अधिक चलने नहीं देता है। यदि सड़कों पर वाहनों से चलने वाला यातायात साइकिल पर स्थानान्तरित कर दिया जाये तो सड़कें एक दो तिहाई स्थान रिक्त हो जायेगा। ८० गुना अधिक ऊर्जा व्यर्थ करने का दुख तो फिर भी सहा जा सकता है, पर उससे उत्पन्न प्रदूषण का क्या करें जो हमें कहीं अधिक हानि पहुँचा जाता है।
नगर अपने यातायात का चरित्र और स्वरूप जब बदलें, तब बदलें, पर पर्यटन की दृष्टि से हल्की और मोड़ कर रख सकी जाने वाली साइकिलों का महत्व अभी भी है। यह आपको दूरियों नापने में आत्मनिर्भर बनाती है। हो सकता है कि नगर के बाहर के क्षेत्रों में अन्य वाहनों की औसत गति साइकिल से अधिक हो, पर उस साधन की प्रतीक्षा करने में लगा समय यदि बचा लिया जाये तो संभव है कि साइकिल की उपयोगिता नगर के बाहर भी उतनी ही होगी जितनी किसी नगर के अन्दर।
साइकिल की उपयोगिता ऊर्जा, गति, भार, धन और समय की दृष्टि से यातायात के अन्य साधनों की तुलना में कहीं अधिक है। साइकिल के लिये भारी आधारभूत ढाँचे की आवश्यकता नहीं, एक पतली सी पगडंडी में भी साइकिल बिना किसी समस्या के चलायी जा सकती है। भारी वाहनों के लिये बनायी गयी सड़कों में लगे धन का एक चौथाई भी लगाया जाये तो साइकिल के लिये एक अलग गलियारा तैयार किया जा सकता है। यही नहीं भूमि का अधिग्रहण भी उसी अनुपात में कम किया जा सकता है, खेती योग्य भूमि बचायी जा सकती है।
इन सब गुणों के अतिरिक्त साइकिल की बनावट और परिवर्धन में विशेष रुचि भी रही है। आईआईटी में तृतीय वर्ष के ग्रीष्मावकाश में वहीं पर रह गया था। एक प्रोफ़ेसर उस समय साइकिल की नयी बनावटों पर कुछ शोध कर रहे थे। उनके सान्निध्य में रहकर साइकिल की यान्त्रिकी कार्यपद्धति के बारे में बहुत कुछ जाना। यही नहीं, किस तरह से नयी धातुओं या कार्बन फ़ाइबर का उपयोग कर भार कम किया जा सकता है, किस तरह उसके बल संचरण को बनावट में परिवर्तन कर साधा जा सकता है, किस तरह चेन के स्थान पर सीधे ही पहियों में ही पैडल लगाया जा सकता। इसी तरह के भिन्न प्रश्नों ने पहली बार साइकिल जैसी साधारण लगने वाले यन्त्रों में संभावनाओं की खिड़की खोली थी। सच मानिये ग्रीष्म की गर्मी और तीन माह के समय का पता ही नहीं चला था उस रोचकता में।
मोड़े जाने योग्य साइकिलों की बनावट अपने आप में एक पूर्ण विधा है। आप इण्टरनेट पर खोजना प्रारम्भ कीजिये, न जाने कितने प्रकार की तकनीक आपको दिख जायेंगी, सब की सब एक दूसरे से भिन्न और कई पक्षों में श्रेष्ठ। मुझे फिर भी एक बनावट की खोज है जिसमें एक साइकिल को न केवल मोड़ कर रखा जा सके, खोल कर चलाया जा सके, वरन आवश्यकता पड़ने पर व्हील चेयर के आकार में परिवर्तित कर हाथों से भी चलाया जा सके। इसके पीछे कारण बड़ा ही सरल है, कई बार ऐसा होता है कि लगातार एक दो घंटे तक साइकिल चलाते चलाते आपके पैर थक जायें तब आप बिना यात्रा बाधित करे बैठकर हाथों से साइकिल चलायें और पैरों को विश्राम दें। किसी न किसी साइकिल कम्पनी को यह विचार अवश्य ही भायेगा, तब निष्कर्ष निश्चय ही साइकिल के लिये अधिक उपयोगिता लेकर आयेंगे।
सम्पत्ति में हो रहे शोधों ने यदि किसी ने बहुत प्रभावित किया है तो वह है, याइक बाइक। यद्यपि यह परम्परागत पैडल वाली साइकिल नहीं है और इसमें एक छोटी सी मोटर भी लगी है, पर बनावट के दृष्टि से आधुनिक शोधों के लिये एक दिशा है। एक पहिये में मोटर लगी है जो बिजली से चार्ज हो जाती है और एक चार्ज में १४ किमी की दूरी तय कर लेती है। यही नहीं, ब्रेक लगाने से साइकिल की ऊर्जा वापस बैटरी में चली जाती है। १२ किलो की यह साइकिल बड़ी सुगमता से मोड़ी जा सकती है और नियमित कार्यालय जाने वालों के लिये यह एक वरदान सिद्ध हो सकती है। यद्यपि इसे मानवीय रूप ये चार्ज करने का प्रावधान नहीं है और बैटरी समाप्त होने की स्थिति में पैडल मारने की भी व्यवस्था नहीं है। यदि इन बिन्दुओं पर ध्यान दिया जाये तो यह जनसाधारण और जनपदों के लिये एक वरदान हो सकती है।
साइकिल एक शताब्दी देख चुकी है पर अब भी संघर्षरत है। उसका संघर्ष तेल से है, तेल भरे और धुँआ उगलते राक्षसों से है, उसे निम्न समझने वालों की मानसिकता से है और साथ ही साथ उन सड़कों से भी है जहाँ पर उनको अपनी संरक्षा का भय है। पर्यटन और नगर यातायात में साइकिल के इस संघर्ष को हमें अपनाना होगा और उसे समुचित स्थान दिलाना होगा। यदि ऐसा हम नहीं करते हैं तो संभव है कि कल डॉलर और तेल मिल कर हमारा कॉलर पकड़ें और तेल निकाल दें।
चित्र साभार - singletrackworld.com, Yike Bike
पिछले सौ वर्षों में साइकिल की मौलिक डिज़ाइन में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। जो भी विकास हुआ है, वह नयी और हल्की धातुओं से उसका ढाँचा बनाने में और गियर बॉक्स परिवर्धित करने में हुआ है। मैं कल ही बंगलौर में देख रहा था, पहाड़ों पर चलाने वाली २४ गियर की साइकिल का भार मात्र १२ किलो था। पहाड़ो पर चलने वाली सबसे हल्की साइकिल ६.४ किलो की है। सामान्य श्रेणी में सबसे हल्साइकिल २.७ किलो की है जो आपका छोटा सा बच्चा भी उठा लेगा।
पर्यटन की दृष्टि से देखा जाये तो इस प्रकार की हल्की साइकिलें साथ में ले जाने में असुविधाजनक है, कारण उनका बड़ा आकार है। यदि ऐसी साइकिलों को ट्रेन के सामान डब्बे में रखने और उतारने की सुविधा रहे तो ही लम्बी यात्राओं में इनका उपयोग किया जा सकता है। यदि ऐसी व्यवस्था नहीं हो पाती है तो उस स्थिति में ऐसी साइकिल हो जो सहजता से मोड़ कर सीट के नीचे रखा जा सके। इस दृष्टि से बिना उपयोगिता प्रभावित किये हुये, साइकिलों का ढाँचा बदल कर, उनका भार १० किलो तक लाया जा चुका है। घुमक्कड़ों के लिये ऐसी मोड़ कर रखी जा सकने वाली साइकिलें भविष्य में बहुत उपयोगी सिद्ध होने वाली हैं।
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हल्की साइकिलें, सहयोगी |
आइये देखते हैं कि किस तरह से साइकिल अन्य माध्यमों से अधिक उन्नत है। यहाँ के यातायात की स्थिति लें तो एक साइकिल की तुलना में कार से जाने में ८० गुना अधिक ऊर्जा लगती है, जबकि इसमें ट्रैफिक सिग्नल में व्यर्थ किया गया तेल जोड़ा नहीं गया है। साइकिल की औसत गति १५ किमी प्रतिघंटा तक होती है, जबकि यातायात वाहनों को १५ किमी प्रतिघंटों से अधिक चलने नहीं देता है। यदि सड़कों पर वाहनों से चलने वाला यातायात साइकिल पर स्थानान्तरित कर दिया जाये तो सड़कें एक दो तिहाई स्थान रिक्त हो जायेगा। ८० गुना अधिक ऊर्जा व्यर्थ करने का दुख तो फिर भी सहा जा सकता है, पर उससे उत्पन्न प्रदूषण का क्या करें जो हमें कहीं अधिक हानि पहुँचा जाता है।
नगर अपने यातायात का चरित्र और स्वरूप जब बदलें, तब बदलें, पर पर्यटन की दृष्टि से हल्की और मोड़ कर रख सकी जाने वाली साइकिलों का महत्व अभी भी है। यह आपको दूरियों नापने में आत्मनिर्भर बनाती है। हो सकता है कि नगर के बाहर के क्षेत्रों में अन्य वाहनों की औसत गति साइकिल से अधिक हो, पर उस साधन की प्रतीक्षा करने में लगा समय यदि बचा लिया जाये तो संभव है कि साइकिल की उपयोगिता नगर के बाहर भी उतनी ही होगी जितनी किसी नगर के अन्दर।
साइकिल की उपयोगिता ऊर्जा, गति, भार, धन और समय की दृष्टि से यातायात के अन्य साधनों की तुलना में कहीं अधिक है। साइकिल के लिये भारी आधारभूत ढाँचे की आवश्यकता नहीं, एक पतली सी पगडंडी में भी साइकिल बिना किसी समस्या के चलायी जा सकती है। भारी वाहनों के लिये बनायी गयी सड़कों में लगे धन का एक चौथाई भी लगाया जाये तो साइकिल के लिये एक अलग गलियारा तैयार किया जा सकता है। यही नहीं भूमि का अधिग्रहण भी उसी अनुपात में कम किया जा सकता है, खेती योग्य भूमि बचायी जा सकती है।
इन सब गुणों के अतिरिक्त साइकिल की बनावट और परिवर्धन में विशेष रुचि भी रही है। आईआईटी में तृतीय वर्ष के ग्रीष्मावकाश में वहीं पर रह गया था। एक प्रोफ़ेसर उस समय साइकिल की नयी बनावटों पर कुछ शोध कर रहे थे। उनके सान्निध्य में रहकर साइकिल की यान्त्रिकी कार्यपद्धति के बारे में बहुत कुछ जाना। यही नहीं, किस तरह से नयी धातुओं या कार्बन फ़ाइबर का उपयोग कर भार कम किया जा सकता है, किस तरह उसके बल संचरण को बनावट में परिवर्तन कर साधा जा सकता है, किस तरह चेन के स्थान पर सीधे ही पहियों में ही पैडल लगाया जा सकता। इसी तरह के भिन्न प्रश्नों ने पहली बार साइकिल जैसी साधारण लगने वाले यन्त्रों में संभावनाओं की खिड़की खोली थी। सच मानिये ग्रीष्म की गर्मी और तीन माह के समय का पता ही नहीं चला था उस रोचकता में।
मोड़े जाने योग्य साइकिलों की बनावट अपने आप में एक पूर्ण विधा है। आप इण्टरनेट पर खोजना प्रारम्भ कीजिये, न जाने कितने प्रकार की तकनीक आपको दिख जायेंगी, सब की सब एक दूसरे से भिन्न और कई पक्षों में श्रेष्ठ। मुझे फिर भी एक बनावट की खोज है जिसमें एक साइकिल को न केवल मोड़ कर रखा जा सके, खोल कर चलाया जा सके, वरन आवश्यकता पड़ने पर व्हील चेयर के आकार में परिवर्तित कर हाथों से भी चलाया जा सके। इसके पीछे कारण बड़ा ही सरल है, कई बार ऐसा होता है कि लगातार एक दो घंटे तक साइकिल चलाते चलाते आपके पैर थक जायें तब आप बिना यात्रा बाधित करे बैठकर हाथों से साइकिल चलायें और पैरों को विश्राम दें। किसी न किसी साइकिल कम्पनी को यह विचार अवश्य ही भायेगा, तब निष्कर्ष निश्चय ही साइकिल के लिये अधिक उपयोगिता लेकर आयेंगे।
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हल्की, उन्नत याइक बाइक |
साइकिल एक शताब्दी देख चुकी है पर अब भी संघर्षरत है। उसका संघर्ष तेल से है, तेल भरे और धुँआ उगलते राक्षसों से है, उसे निम्न समझने वालों की मानसिकता से है और साथ ही साथ उन सड़कों से भी है जहाँ पर उनको अपनी संरक्षा का भय है। पर्यटन और नगर यातायात में साइकिल के इस संघर्ष को हमें अपनाना होगा और उसे समुचित स्थान दिलाना होगा। यदि ऐसा हम नहीं करते हैं तो संभव है कि कल डॉलर और तेल मिल कर हमारा कॉलर पकड़ें और तेल निकाल दें।
चित्र साभार - singletrackworld.com, Yike Bike