ब्लाग से प्रथम सम्पर्क २००९ में हुआ। यद्यपि लेखन की ओर प्रवृत्ति १९८६ में ही जाग चुकी थी जब कुछ लघु कवितायें और नाटक लिखे थे। डायरी में लिखता रहा, संजोये रहा, सकुचाता रहा कि पता नहीं मन के भावों को इस प्रकार सबके सामने रखने पर प्रतिक्रिया क्या होगी? यद्यपि खेलों आदि में रुचि थी पर मन की प्रवृत्ति मुख्यतः अन्तर्मुखी थी। अपना लिखा पढ़ लेता था और प्रसन्न हो लेता था। सृजन का आनन्द अनूठा होता है, कैसा होता है उस पर व्याख्या नहीं करूँगा पर लिखकर तब भी प्रसन्नता होती थी और आज भी होती है। सबको होती है, यह नहीं ज्ञात पर मुझे होती है और विशेष होती है, एक तृप्ति सी मिलती है।
विद्यालय की पत्रिकाओं में वर्ष में एक बार कृतियाँ लिखकर भेजता था और वह स्वीकार हो जाती थीं, अच्छा लगता था। उस समय तो आचार्यगण निश्चय ही उत्साहवर्धन के लिये ही कृतियों को अवसर देते थे क्योंकि मेरी तुलना में और कृतियाँ कहीं अच्छी और गढ़ी होती थीं। मेरी कृति अति सामान्य होने के बाद भी मेरे लिये विशिष्ट थी। पत्रिका के एक पृष्ठ का आंशिक भाग मेरे सृजन को धरे है, यह भावना बड़ा अभिमान देती थी। स्वप्न उतने बड़े नहीं थे, अधिकार का अर्थ समझ नहीं आता था तो वह छोटा सा भाव ही प्रसन्न बनाये रखता था। मैं और मेरी कृतियाँ एक दूसरे के प्रति कृतज्ञता का भाव बनाये हुयी थीं, कृतियाँ अपने सृजन के लिये, मैं अपने आनन्द के लिये।
जीवनक्रम चलता रहा, अनुभव जुड़ते रहे। बोर्ड में स्थान, आईआईटी, सिविल सेवा, रेलवे, विवाह, पुत्र, पुत्री, कार्यक्षेत्र के नये नये स्थान, सब जीता रहा और यथासंभव लिखता भी रहा। २००९ आते आते लगभग ३०० कवितायें और १० लेख मेरी डायरी का अंग बन गये। जब उन्हें पढ़ता था तो लिखने का उत्साह बढ़ता था। इसी बीच डायरी से कृतियाँ कम्प्यूटर पर आ गयीं। वह लाल डायरी अभी भी रखी है, एक सम्बन्धी की तरह जिसने अपनी ओर से सारे कर्तव्य निभाये और सम्बन्ध बनाये रखा। एक कागज पर लिखना, कोई शब्द ठीक न लगे तो उसे काट कर समुचित शब्द लिखना, कोई विचार विशेष लिखकर उस पर कविता लिखना, सब के सब उस लाल डायरी साक्ष्य के रूप में उपस्थित हैं। कण कण जोड़ कर सृजन प्रक्रिया का जो आनन्द डायरी में था, वह संभवतः इस कम्प्यूटर में कहाँ? इसमें तो कृतियों का संवर्धित और संश्लेषित रूप ही शेष रहता है।
२००९ का वर्ष विशेष था, कार्य से मोहभंग हुआ था। आप जिस पर अपना सारा समय ऊर्जा और मन दिये बैठे हों वहाँ से आपको अमर्यादित और सार्वजिनक रूप से च्युत कर दिया जाये और कहा जाये कि यहाँ अब आपकी आवश्यकता नहीं है तो सबकुछ भरभराने लगता है। जूझना तो तब तक ही होता है जब तक आप उस कार्यक्षेत्र में हों। इन सब अनुभवों के बारे में लिखना होगा पर सेवा में रहते हुये नहीं। वे सब कठिन और पीड़ामयी स्मृतियाँ सेवानिवृत्ति के बाद ही अपनी निष्पत्ति पायेंगीं।
उस विक्षुब्ध मनःस्थिति का एक स्वाभाविक निष्कर्ष यह था कि उन क्षेत्रों में मन लगाया जाये जो प्रिय हैं, उन अभिरुचियों के समय दिया जाये जो प्रसन्नता देती हैं। नये दायित्व में समय भरपूर था, कार्यालय के समय के अतिरिक्त कोई दायित्व नहीं थे, प्रातः और सायं का समय क्रमशः स्वयं और परिवार के लिये पूर्णता से था। सप्ताहान्त के पूरे दो दिन हाथ में थे। यदि आप व्यस्त रहें तो कितना समय आपके पास होता है, वह पता नहीं चलता है। जब व्यस्तता नहीं रहती तब समझ में आता है कि एक दिन में कितने घंटे होते हैं और एक सप्ताह में कितने दिन। योग, संगीत, भ्रमण के साथ साथ परिवार के साथ अधिक समय देने का क्रम बन गया। जीवन बड़ा ही रुचिर लगने लगा। जीवन की उस विमा में उतरने का अनुभव हुआ जो संभवतः अनन्वेषित ही रह गयी थी।
वैयक्तिक और पारिवारिक रूप से मन तुष्ट था। यद्यपि प्रारम्भ के मोहभंग से मन खिन्न था पर इस तरह के बदलाव जीवन में आवश्यक होते हैं। इसे अन्ततः ईश्वर का प्रसाद मानकर स्वीकार कर लिया और जीवन पुनः गतिमय हो चला। ऊर्जा अपने आधार ढूढ़ ही लेती है, प्रयास हो कि हर परिस्थिति के लिये एक योजना हो और व्यक्तित्व के विकास का सारा भार किसी एक ही क्षेत्र को न सौंप दिया जाये। क्योंकि जब वह एकमात्र आधार हटता है तो जीवन अस्तित्व के पाताललोक में जा पहुँचता है। अन्य आधार रहने पर सम्हलने का अवसर मिल जाता है, स्वयं को साधने का विकल्प मिल जाता है।
यह बदलाव स्वीकार होने के बाद भी मन में एक स्थान रिक्त था। कुछ नया पढ़ने की इच्छा मन में शान्त कहीं पल रही थी। पढ़ना सतत होता रहा था। हिन्दी की लगभग सभी चर्चित पुस्तकें पढ़ चुका था। अंग्रेजी में भी कहानियाँ और उपन्यास से मन उकता चुका था। अंग्रेजी में उपन्यास के इतर कई अच्छे विषयों में पुस्तकें पढ़ी थीं। दो कारण रहे कि उनसे मन नहीं जुड़ पाया। पहला कारण था, परिवेश की भिन्नता। जिस वातावरण में रहना हो रहा है, जिस समाज में जीना हो रहा है, उससे कहीं भिन्न वृत्तान्तों से भरे थे अंग्रेजी पुस्तकों के कथानक और विषय। दूसरा कारण था गहराई। जो विषय अच्छे लगे उनमें गहराई तो थी पर अन्ततः वे किसी भारतीय सिद्धान्त की ही व्याख्या में प्रयासरत दिखे। शास्त्रों में व्यक्त भारतीय मेधा को समझने के बाद शेष सब अभिव्यक्ति छिछली ही लगीं।
उसी समय ज्ञानदत्त पाण्डेय जी के ब्लाग से परिचय हुआ। ज्ञानदत्तजी रेलसेवा में मेरे वरिष्ठ थे और साहित्य में विशेष रुचि रखते थे। मानसिक हलचल के नाम से लिखे ब्लागों में आसपास की घटनाओं और विषयों का जो रोचक चित्रण मिलता था, वह पढ़ने में सहज और समझने में नयी दृष्टि देने वाला था। एक छोटे से विषय को किस प्रकार भिन्न दृष्टि देकर रोचक बनाया जा सकता है, यह सब पढ़ने में आनन्द आने लगा। ब्लाग की विधा उस समय नयी थी। एक विषय पर एक पृष्ठ में कुछ तथ्य उठाकर बताने में जो नयापन आता था वह आनन्दित करने लगा। कभी लघु व्यक्त करने से विषय चर्चा के लिये अधिक खुल जाता है। किसी निष्कर्ष में पहुँचने का प्रयास न हो तो चर्चा किस दिशा में जायेगी, कौन सा रूप ले लेगी, इन संभावनाओं से सारा प्रकरण और भी रोचक हो जाता है।
ब्लाग की विधा भाने लगी, पढ़ने की प्यास बढ़ने लगी।