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19.1.13

समाचार संश्लेषण

शीर्षक पढ़कर थोड़ा सा अटपटा अवश्य लगा होगा। स्वाभाविक ही है क्योंकि समाचार के साथ संश्लेषण शब्द प्रयुक्त ही नहीं होता है। संश्लेषण का अर्थ है, भिन्न से प्रतीत होने वाले कई विचारों, तथ्यों या वस्तुओं को एकरूपता से प्रस्तुत करना। समाचार तो एक तथ्य है, एक तथ्य में भिन्नता कहाँ से और यदि भिन्नता नहीं तो उसका संश्लेषण कैसा? यदि समाचार के साथ कुछ किया जा सकता है तो वह है उसका विश्लेषण, समाचार विश्लेषण एक सुना हुआ शब्द भी है। समाचार को कई पहलुओं में विभक्त कर उसके कारणों और निष्कर्षों की विवेचना ही उसका विश्लेषण हुआ। विश्लेषण में मत भिन्न हो सकते हैं पर समाचार का तथ्य अभिन्न रहता है।

विकास जब अँगड़ाई लेता है तो जम्हाई के कई स्वर उसमें समाहित हो जाते हैं, जितनी बार अँगड़ाई लेता है उतने ही नये स्वर आ जाते हैं। दूसरी प्रकार से कहें तो जब कोई नया खिलौना बच्चे के हाथ लगता है तो उससे सम्बन्धित नये खेल ढूढ़ लेता है, रचना कर डालता है। जब पहली बार गेंद बनी होगी तो जमीन पर लुढ़का कर खेलने वाला कोई खेल बना होगा, कुछ बॉउलिंग जैसा। धीरे धीरे पिठ्ठू जैसे खेल की अवधारणा बनी होगी। हॉकी, फुटबाल, बॉस्केटबॉल, हैण्डबॉल, टेबलटेनिस, कंचे और न जाने क्या क्या खेल, हाँ हाँ, क्रिकेट भी, बिना उसके खेलों की परिभाषा कहाँ पूरी होगी भला? बॉल के आकार प्रकार के आधार पर खेल बने होंगे, उनके नियम बने होंगे। जब तक बॉल का स्वरूप उस प्रकार का बना रहता है, वह खेल होता रहता है, आनन्द आता रहता है।

यही विकासक्रम समाचारों पर भी लागू होता है, पहले दूतों के माध्यम से एक आध समाचार आते थे पड़ोसी देशों के, उससे अधिक खेल और छेड़छाड़ नहीं हो पाती थी। स्थानीय समाचार शाम के जमने वाली पंचायतों या बैठकों में चर्चा में लिये जाते होंगे, पर अधिक तो वे भी नहीं होते होंगे। स्थानीय समाचारों में सम्बन्धित व्यक्ति या घटना की जानकारी पहले से ही रहती होगी अतः उसमें भी अधिक छेड़छाड़ की संभावना नहीं रहती होगी। सीमित संवादों से बढ़कर स्थिति समाचारपत्रों और चैनलों तक आ पहुँची है। देश भर के समाचार देखने के लिये पूरा देश ही बैठा है। समाचार भी वही उठाये जाने लगे हैं जो मन में तरंग संचारित कर दें। हर कोई ऐसे ही समाचारों को प्राथमिकता देने लगा, एक होड़ लगी है कि किस तरह प्रतियोगिता जीती जाये, अधिक दर्शक जुटा लेने की।

अब यदि गेंद की तुलना समाचार से करें, तो गेंद के आकार प्रकार से कुछ विशेष तरह के ही खेल खेले जा सकते हैं। उदाहरण स्वरूप, बॉस्केटबॉल से आप लॉनटेनिस नहीं खेल सकते हैं। इसी प्रकार समाचार की प्रकृति के आधार पर आप उसे कुछ विशेष प्रकार से ही व्यक्त कर सकते हैं। यदि आप भिन्न प्रकार की गेंद से भिन्न खेल खेलें तो बॉल का जो हाल होता है, वही हाल चैनल समाचारों का कर रहे हैं। यही नहीं, एक समाचार को इतना अधिक दिखा डालते हैं कि यह पता ही नहीं चलता है कि उसका प्रारम्भिक या मूल स्वरूप क्या था? ठीक उसी प्रकार जैसे किसी एक बॉल को इतना पीटा जाये कि वह चीथड़े चीथड़े हो जाये।

समाचारों की तुलना गेंद से करने का उद्देश्य, किसी समाचार को नीचा दिखाना नहीं। अब कोई घटना हो गयी तो वह पिसेगी ही चैनलों की चक्की में, पिस कर क्या निकलेगी, क्या मालूम? दोष तो घटना का ही है कि वह क्यों हो गयी? मेरी समस्या उन सभी लोगों की समस्या है जिनके पास इतना समय नहीं रहता कि किसी एक समाचार को दो तीन दिनों तक देखें। यदि प्रारम्भ छूट जाता है तो वह समाचार बहुत आगे तक निकल जाता है, बीच में देखने में कुछ समझ भी नहीं आता है। यदि समझने के लिये दूसरा चैनल खोलें तो वही समाचार किसी दूसरी दिशा में भागा जाता हुआ दिखता है। तीसरे चैनल पर वही समाचार तब तक इतना धुन दिया जाता है कि उसकी विषयवस्तु को संयोजित करने में घंटों लग जाते हैं। यदि संशय दूर करने के लिये आप किसी से कुछ पूछ बैठे तो वह भी हँसने लगता है कि घंटे भर बैठने के बाद भी श्रीमानजी को समझ नहीं आ रहा है। उसे भी कहाँ फुर्सत, उसे तो उस समाचार के आगत व्याख्या भी देखनी है, कहीं ध्यान भंग हुआ तो उसे सारे सूत्र पुनः जोड़ने पड़ेंगे।

जहाँ एक समाचार का सागर व्याप्त है, उसके भिन्न स्तरों पर प्रस्तुत पक्ष उपस्थित हैं, इतना अधिक मंथन हो जाने के बाद के विष अमृत जैसे फल उपस्थित हैं, और हम हताश से कुछ न समझ पायें, यह समाचार का कम, हमारी समझ का अधिक अपमान है। यही कारण रहा होगा कि अपनी कमी छिपाने के लिये हम लोगों ने एक नयी विद्या विकसित कर ली है, समाचार संश्लेषण की। निश्चय ही पुराने जन्मों का प्रताप है कि पाँच मिनट में आठ चैनल देखते ही हमें समाचार पूरा समझ में आ जाता है। कहीं थोड़ा कम आता है, कहीं थोड़ा अधिक।

संश्लेषण अच्छा कर सकने के लिये आप को कुछ मूलभूत तथ्य जानने आवश्यक हैं। पहला तो सारे चैनलों की गति जानना आवश्यक है, उस चैनल पर एक समाचार कितना फैल चुका है, यह देखकर ही आप बता देंगे कि घटना कब हुयी थी? दूसरा, इन चैनलों की निष्ठायें समझना आवश्यक है, ऐसा करने से आप उन समाचारों को किस ओर कितना मोड़ कर स्वीकार करना है, यह पता चल जाता है। तीसरा है चैनलों की नये तथ्य खोजने और पुराने तथ्यों को खोदने की सामर्थ्य, इससे आपको विषय की गहराई विधिवत पता चल जायेगी।

इतना विशेष ज्ञान होने के बाद ही आप में वह सक्षमता विकसित हो पायेगी जिससे आप किसी समाचार का संश्लेषण कर पायेंगे। इन गुणों के अभाव में कितना ज्ञान आपके हाथ से रेत जैसा निकल जायेगा, उसका अनुमान लगाना ही कठिन है। एक समाचार पर हर चैनल का पुराना शोध उपस्थित है और नया शोध प्रतिपल उत्पन्न हो रहा है, विवेकानन्दजी की तरह पन्ने पलटकर सब समझ लेने की क्षमता विकसित करनी होगी अन्यथा समाचार के युग में असमाचारी ही रह जायेंगे।

आश्चर्य होता है कि संश्लेषण की इतनी विशिष्ट और ज्ञानपरक विधियाँ विद्यालयों में नहीं पढ़ायी जाती, नागरिकों को उनकी मेधा के अनुसार अस्तव्यस्त सीखने को विवश किया जाता है। आचार विचार से नयी पीढ़ी भले ही वंचित रह जाये, समाचार से जुड़े रहने का मानवाधिकार उससे नहीं छीना जा सकता है। आश्चर्य है, देश महाक्षति की ओर भागा जा रहा है और रास्ते में कोई मोमबत्ती भी नहीं जल रही है?

4.5.11

सूट नहीं करता सूट

इस समस्या से पिछले 37 वर्षों से जूझ रहा हूँ और अब तक मेरा स्कोर रहा है - 8 या 9। सारे के सारे दिन स्मृतिपटल पर स्पष्ट हैं। साक्षात्कार के समय, कन्वोकेशन के समय, प्रशिक्षण के समय, अपने विवाह पर, भाई के विवाह पर, पुरस्कार लेते समय और कुछ अन्य बार यूँ ही। पर हर बार ठेले जाने पर ही सूट पहना। अब तक कुल तीन सूट सिलवाने पड़े हैं। एक सूट चला लगभग तीन बार। हर बार पहने जाने का मूल्य लगभग 2000 रु। इतना मँहगा पहनावा हो तो भला कौन प्रभावित न हो, होना ही पड़ेगा। घर में हैंगरों में टंगे रहने से एक तो वार्डरोब की शोभा बढ़ती है और हर बार अपनी मूर्खता पर हँस लेने से थोड़ा खून भी बढ़ जाता है। इस दृष्टि से देखा जाये तो श्रीमती जी के आभूषणों से कहीं अधिक बहुमूल्य हैं मेरे सूट।

समस्या पर यही है कि ये सूट शरीर को सूट ही नहीं करते हैं। घुटन सी लगती है, बँधा हुआ सा लगता है अस्तित्व। हाथ ऊपर करने में लगता है कि पूरा पेट खुल गया है। भोजन का कौर मुँह तक पहुँचाने के लिये हाथ को सारे अंगों से युद्ध करना पड़ता है। हैंगर जैसा व्यक्तित्व हो जाता है। टँगे रहिये, जहाँ हैं आप क्योंकि सूट पहनने से आप विशेष हो जाते हैं और विशेष मानुष असभ्य सी लगने वाली सारी गतियाँ कैसे कर सकता है। टाई गर्दन पर लटकी रहने से यह डर रहता है कि कहीं कोई विनोद में ही पकड़कर झटक न दे, ऊपर की साँसे ऊपर और नीचे की नीचे, मस्तिष्क कार्य करना बन्द कर देता है।

मन का डर मन में छिपाये फिरते हैं। क्यों न हो, सब बड़े बड़े लोग पहनते हैं। पहन कर आवश्यकता पड़ने पर भाँगड़ा भी कर लेते हैं। हम तो जब पहनते हैं तो उछलते नहीं और जब उछलना आवश्यक हो तो पहनते नहीं। क्योंकि यदि यह भेद पता चला गया तो हम नीचे गिर जायेंगे सभ्यता के मानकों से, ब्लडी गँवार कह देगा कोई।

कैज़ुअल वस्त्र पहनता हूँ, चेहरा भी वैसा ही है। सौम्यता व गाम्भीर्य चेहरे में टिकने के पहले ही उकता जाते हैं। लोगों को दिखता भी है। कार्यालय में बहुत आगन्तुक बोल चुके हैं कि हम तो सोचे थे कि कोई बड़ी उम्र का (पढ़ें, अधिक सौम्य और गम्भीर) व्यक्ति होगा इस पोस्ट पर। अब पिछले 19 वर्षों से वोट डाल रहा हूँ, कितनी और उम्र चाहिये आपको समझने के लिये और कुर्सी पर बैठने के लिये?

मेरा बस चले तो सूट पहनने का आँकड़ा दहाई नहीं छू पायेगा पर श्रीमती जी बार बार याद दिला देती हैं कि इतने मँहगे सिलवाये हैं तो पहनने की आदत भी डालिये। किसी तरह तो टाल रहे हैं पर यदि असह्य हो गया तो या सूट की जेब में चूहा डाल कर वार्डरोब बन्द कर देंगे या अपने दूध वाले को पकड़ा देंगे। आपको कोई और उपाय समझ में आये तो बताईये।

(गर्मी आ रही है और सूट का प्रकरण चल रहा है, संभवतः इसी बहाने आपको मेरी उलझन गाढ़ी लगेगी। फिर भी विषय सामयिक है क्योंकि बंगलोर में यही माह सबसे ठण्डे होते हैं।)

1.1.11

मायके जाने का सुख

आप पढ़ना प्रारम्भ करें, उसके पहले ही मैं आपको पूर्वाग्रह से मुक्त कर देना चाहता हूँ। आप इसमें अपनी कथा ढूढ़ने का प्रयास न करें और मेरे सुखों की संवेदनाओं को पूर्ण रस लेकर पढ़ें। किसी भी प्रकार की परिस्थितिजन्य समानता संयोगमात्र ही है।

मायके जाना एक सामाजिक सत्य है और एक वर्ष में बार बार जाना उस सत्य की प्राण प्रतिष्ठा। पति महत्वपूर्ण है पर बिना मायके जाये सब अपूर्ण है। कहते हैं वियोगी श्रंगार रस, संयोगी श्रंगार रस से अधिक रसदायक होता है, बस इस सत्य को रह रह कर सिद्ध करने का प्रयास भर है, मायके जाना। कृष्ण के द्वारिका चले जाने का बदला सारी नारियाँ कलियुग में इस रूप में और इस मात्रा में लेंगी, यदि इसका जरा भी भान होता तो कृष्ण दयावश गोकुल में ही बस गये होते। अब जो बीत गयी, सो बीत गयी।

पुरुष हृदय कठोर होता है, नारी मन कोमल। यह सीधा सा तथ्य हमारे पूर्वज सोच लिये होते तो कभी भी उल्टे नियम नहीं बनाते और तब विवाह के पश्चात लड़के को लड़की के घर रहना पड़ता। तब मायके जाने की समस्या भी कम होती, वर्ष में बस एक बार जाने से काम चल जाता और बार बार नये बहाने बनाने में बुद्धि भी नहीं लगानी पड़ती। अपने घर में बिटिया को मान मिलता और दहेज की समस्या भी नहीं होती। लड़की को भी नये घर के सबके स्वादानुसार खाना बनाना न सीखना पड़ता। यदि खाना बनाना भी न आता तब भी कोई समस्या नहीं थी, माँ और बहनें तो होती ही सहयोग के लिये हैं। सास-बहू की खटपट के कितने ही दुखद अध्याय लिखे जाने से बच जाते। कोई बात नहीं, ऐतिहासिक भूलें कैसी भी हो, अब परम्परायें बन चुकी हैं, निर्वाह तो करना ही पड़ेगा।

विवाह करते समय यह आवश्यक है कि लड़की कोई न कोई पढ़ाई करती रहे, अपने मायके के विश्वविद्यालय में। इससे जब कभी भी मन हो, मायके आने की स्वतन्त्रता और अवसर मिलता रहेगा, पढ़ाई जैसा महत्वपूर्ण विषय जो है। विवाह के बाद मायके पक्ष के अन्य सम्बन्ध और प्रगाढ़ हो जाते हैं। चचेरे-ममेरे-मौसेरे रिश्तों की तीन-चार पर्तें जीवन्त हो जाती हैं, बिना उनके उत्सवों में जाये काम नहीं चलेगा, चाहे अन्नप्राशन ही क्यों न हो। विवाह आदि महत उत्सवों के चारों अवसरों पर जाना बनता है, कहीं बुरा मान गये तो।
  
बच्चे आदि होने के बाद, उनके पालन सम्बन्धी विषयों पर विशेष सलाह लेने का क्रम मायके जाने का योग बनाता रहता है। दो बच्चों में लगभग 7 वर्ष इस प्रकार निकल जाते हैं। अब इतनी बार आने जाने में बच्चों को भी नानी का घर सुहाने लगता है, मान लिया आपकी तो इच्छा नहीं है पर बच्चों का क्या करें, उनके लिये ही चले जाते हैं।

इस दौड़ धूप से थोड़ी बहुत स्थिरता यदि मिल पाती है तो उसमें विद्यालयों के अनुशासन का विशेष योगदान है। यदि उपस्थिति का इतना महत्व न दिया जाता तो मायके में एक ट्यूटर रख बच्चों की पढ़ाई की भरपाई तो की ही जा सकती थी। छुट्टियाँ होने के तीन दिन पहले से ही पैकिंग प्रारम्भ हो जाती है जिससे कि बिना समय व्यर्थ किये हुये प्रस्थान किया जा सके और अधिकतम समय ननिहाल में मिल सके बच्चों को।

मायके के संदर्भों में बुद्धि को कल्पना के विस्तृत आयाम मिल ही जाते हैं, जहाँ चाह, वहाँ राह। श्रीमतीजी की बुद्धि का विकास और पति की तपस्या, यह दो सुदृढ़ पहलू हैं, मायकेगमन के।

पहले दिन से ही भटकन, सब प्रकार की। क्या कहाँ रख कर चली गयी हैं? इसी बहाने मोबाइल पर कई बार बात होने से संवाद जैसी स्थिति बनी रहती है और यह संदेश भी जाता है कि बिना आपके जीवन कितना कठिन है। सतीश पंचम जी की खाना बनाने की व्यथा और होटलों में जाकर खाने का क्रम, तपस्या को चिन्तनप्रधान बना देते हैं। पहले तो टेलीविजन देखने को ही नहीं मिलता था, अब यह समझ में नहीं आता है कि क्या देखें, क्या न देखें? सास-बहूनुमा कथा-भँवरों से बाहर भी टेलीविजन की सार्थकता है, केवल इसी समय समझा और देखा जा सकता है।

समय की उपलब्धता और निरीक्षणों की अधिकता में प्रशासनिक कार्य गति पकड़ लेता है, आत्मसंतुष्टि का एक और अध्याय। लम्बी यात्राओं में नये विचार और लेखन, फलस्वरूप यह पोस्ट।

पोस्ट की पूर्वतरंगों से करुणामयी हो, श्रीमतीजी 20 दिन के स्थान पर 15 दिनों में ही वापस आ गयी हैं, कल, वर्ष के अन्तिम क्षणों में। मायके जाने के सुख को पुनः एक बार विश्राम और अगले एक वर्ष तक मायके न जाने के वचन जैसी कुछ उद्घोषणा। "कोई मैके को दे दो संदेश, पिया का घर प्यारा लगे।" 

अब यह पोस्ट डालने की इच्छा तो नहीं रही पर जब लिख ही ली है तो सुख बाँट लेते हैं। 

18.12.10

उफ, तेल का कुआँ न हुआ

कई बार घोर कर्मवादी मनुष्य भाग्य को किंचित भी श्रेय नहीं देते हैं, न किसी सुख के लिये और न किसी दुख के लिये भी। बहुत चाहा कि उनके पौरुषेय चिन्तन से प्रभावित होकर स्वयं को ही अपना स्वामी मान लें। दो तीन दिन तक तो कृत्रिम चिन्तन चढ़ा रहता हैं, पर असहायता की पहली ही बारिश में वह रंग उतर जाता है और तब स्वयं से अधिक भाग्य पर विश्वास होने लगता है।

कोई तो कारण रहा होगा कि हमारे पास तेल का कुआँ न हुआ, जन्म के समय एक तिकोनी चढ्ढी ही मिली पहनने को। जीवन के कितने मोड़ लाज छिपाते छिपाते पार किये। तेल का कुआँ होता तो, उफ, क्यों न हुआ तेल का कुआँ?

कुछ दिन पहले मॉल में घूमते हुये "सैमसंग गैलेक्सी टैब" पर दृष्टि गड़ी। 7 इंच स्क्रीन का टचपैड। मन बस वहीं पसर गया, पीछे खड़े व्यक्ति को लगभग आधे घंटे तक प्रतीक्षा करनी पड़ी, उस पर हाथ चलाने के लिये। मोबाइल और लैपटॉप का संकर अवतार लग रहा था वह। मूल्य 37000 रु मात्र। पूरे जोड़ घटाने कर डाले, कि कहीं से कोई तो राह निकले, पर हर राह में दिख रहे थे श्रीमतीजी के आग्नेय नेत्र। आग्नेय नेत्रों को केवल स्वर्ण-आभूषणों से ही द्रवित किया जा सकता था। इस दुगने खर्च के विचार मात्र से आशाओं ने सर झुका लिया और आह निकली, उफ, तेल का कुआँ न हुआ।

कारों में रुचि नहीं है, नहीं तो यही आह बड़ी लम्बी होती और कुओँ की आवश्यकता बहुवचन में पहुँच जाती।

भारत में जन्म के लिये लाइसेन्स काटने के पहले भगवान को ज्ञात तो अवश्य होगा कि यह तड़पेगा बहुत। मन और मस्तिष्क तो बहुत तेज चलेंगे पर साथ देने के लिये कुछ और न रहेगा। थोड़े दिन बाद स्वतः ही सबसे हार मान जायेगा और भाग्य पर विश्वास करने लगेगा। मरने के पहले लोक, परलोक, सन्तोष की बड़ी बड़ी बातें करेगा पर अगले जन्म के लिये भारत देश नहीं, अरब देश का टिकट माँगेगा।

अब देखिये यहाँ पर कुछ सार्थक पाने में जीवन का तेल निकल आता हैं और हमारे अरबी बान्धव थोड़ा तेल निकाल निकाल कर जीवन भर सब कुछ पाते रहते हैं। हम लोग बरेली के बाज़ार में झुमका ढूढ़ने में एक पूरा गाना बना देते हैं और किसी शेख ने खालिस चाँदी की कार बनवायी है अपने बरेली के बाज़ार जाने के लिये। वहाँ जन्म लेने वालों के बच्चों के मन में परीक्षा का भूत कभी नहीं मँडराता होगा। एक तेल के कुआँ न होने से न जाने हमारे विद्यार्थियों को मन्दिरों में कितनी प्रार्थनायें और बजरंग बली को कितनी हनुमान चालीसा चढ़ानी पड़ती हैं। किसी को अरब में पैदा किया, हमें अरबों के बीच छोड़ दिया।

हमारे भी जलवे होते, क्या होता जो अधिक न पढ़ पाते। अधिक पढ़ लेने से बुद्धिभ्रम हो जाते हैं। तब एकांगी चाह रहती, जिस किसी की भी चाह रहती।

क्या भगवन, किसी को कुयेँ में तेल दिया, किसी को गाल में तिल दिया और हमें भाग्य में ताला। यह तो अन्याय हुआ प्रभु, अब तो ताली बजाना छोड़ भाग्य की ताली फेंक दो, सब ब्लॉगर बन्धु हँस रहे हैं।

चलिये आप सहमत नहीं हो रहे हैं तो मान लेते हैं कि भाग्य नहीं होता है।

पर उसे जो भी कह लें, होता बड़ा विचित्र है, उफ, तेल का कुआँ न हुआ।

13.10.10

वक्तव्यों के देवता

शब्दों को जीकर दिखला देने से आपकी वाणी, पता नहीं, कितना कुछ बोलने से बच जाती है। चित्र शब्दों से कई गुना दिखा देते हैं, चरित्र शब्दों से कई गुना सिखा देते हैं। इतिहास साक्षी है कि महापुरुषों को यह तथ्य भलीभाँति ज्ञात था और यही कारण रहा होगा कि पूरे इतिहास में किसी भी प्रेस कांफ्रेंस के बारे में कोई भी प्रमाण नहीं मिलता है। आज तो अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिये आपको शब्दों का आधार लेना पड़ेगा, हो भी क्यों न, चित्र व चरित्र देखने का समय कहाँ है किसी के पास? श्रेष्ठता के मानक वक्तव्यों में ही छिपे हैं और उन मानकों को सर्व प्रचारित करते फिर रहे हैं, वक्तव्यों के देवता।

कोई समस्या हो, कोई विजय ध्वनि हो, कोई निन्दा प्रकरण हो या कोई तथ्य बाँटना हो, वक्तव्य देकर कार्य की इतिश्री हो जाती है। उस क्षेत्र से सम्बद्ध ख्यातिप्राप्त या सत्तासीन व्यक्ति का वक्तव्य उस विषय पर अन्तिम प्रमाण स्वीकार कर लिया जाता है। तर्कशास्त्र में शब्द प्रमाण की प्रभुता को सर्वत्र प्रतिपादित करते फिर रहे हैं स्वनामधन्य, वक्तव्यों के देवता। प्रत्यक्ष या अनुमान भी नतमस्तक हो खड़े हो जाते हैं जब ये देवता उस बारे में अपनी वाणी के स्वर खोल देते हैं। हमारी आस्था भी इतनी परिपक्व हो गयी है कि हमें भी गरीबों की गरीबी में 9 प्रतिशत की वृद्धि दर देख प्रसन्नता होने लगती है।

समाचार पत्रों की विवशता है या पाठकों की रसिकता, कोई भी समाचार बिना वक्तव्य पूरा ही नहीं लगता है। हर सामाचार के अन्त में एक पुछल्ला लगा रहता है वक्तव्यों का, अन्तिम अर्ध्य के रूप में, वक्तव्यों के देवताओं के द्वारा। बिना 'बाइट' किसी टेलीविज़नीय समाचार को सत्यता का प्रमाण पत्र नहीं मिलता। जब तक प्रसिद्धिप्राप्त देवगण अपना सौन्दर्यमुखीय व्यक्तित्व कैमरा के सामने प्रदर्शित नहीं कर लेते हैं, समाचार को नैसर्गिक निष्पत्ति नहीं मिल पाती है। तब जो भी शब्द उनके आभामण्डल से टपक जाये, सत्य की संज्ञा से पूर्ण हो जाता है।

भारत वैसे ही देवताओं की विविधता व अधिकता से ग्रस्त और त्रस्त है, उस पर नये दैवीय प्रतीकों का उदय। इस युग में हमारी बुद्धि को विकसित करने का और कोई उपाय मिले न मिले, पर इन वक्तव्यों को समझ सकने का प्रयास बुद्धि के विकास के लिये नितान्त प्रभावी हो सकता है। वक्तव्यों के प्रवाह से जल निकाल कर चर्चा में उड़ेलना और समय पड़ने पर प्रतिद्वन्दी के वक्तव्यों से उसी को भिगो देना बौद्धिक श्रेष्ठता के पर्याय हो गये हैं। देवता समुद्रमंथन में अमरत्व को प्राप्त हो चुके हैं पर ये आधुनिक कुलीन अपने विषवमन करने के गुण से सहस्त्र सर्पों को निष्प्रभ करने की क्षमता रखते हैं।

वक्तव्यों की अधिकता से उनका मूल्य कम होने लगा है। कोई अब उन पर विश्वास ही नहीं करता। चन्द्रकान्ता सन्तति के पात्रों से भी अधिक काल्पनिक हो गयी है उनकी छवि। क्या करें? किसको अवकाश पर भेजा जाये? वक्तव्यों को या उनके देवताओं को?

शब्दों को जीकर दिखलाने वालों के बारे में कब जानेगे हम?

"दुनिया को शास्त्र की भूख नहीं, आस्थापूर्वक की हुई कृति की आवश्यकता है।" - महात्मा गांधी

25.8.10

आपकी भी मूर्खता छटपटाती है?

बचपन में विद्वता का विलोम पढ़ा था, मूर्खता। ज्यों ज्यों अनुभव के घट भरता गया तो लगा कि शब्दकोष यदि अनुभव के आधार पर लिखा जाता तो संभवतः मूर्खता शब्द का इतना अवमूल्यन न होता। यह एक स्वनामधन्य शब्द है और एक गुण के रूप में आधुनिक समाज में विकसित हुआ है। मैं जानता हूँ, "शब्दों का सफर" मेरी खोज को महत्व नहीं देगा। मैं उद्गम और स्थान विशेष से सम्बन्ध ढूढ़ने से अधिक इस शब्द को जी लेने का पक्षधर हूँ। आशा ही नहीं वरन पूर्ण विश्वास है आप भी इस शब्द को हृदयांगम करने के पश्चात ही इसके उपकारी पक्ष को समझ पायेंगे।

अनेक परिस्थितियों में मूर्खता के अश्वमेघ यज्ञ होते देख मेरे अन्दर की मूर्खता ने विद्रोह कर दिया। कहने लगी कि लोकतन्त्र में सबको अपनी बात कहने का अधिकार है। आप हर बार विद्वता का सहारा लेकर अपने आप को सिद्ध करने में लगे रहते हैं और मुँह लटकाये घर चले आते हैं। संविधान के अनुच्छेद 14 का मान न रख पायें तो, मन बदलने के ही नाते मुझे भी एक अवसर प्रदान करें।

इतना आत्मविश्वास देख तो बहुत दिनों तक यह निश्चय नहीं कर पाया कि मूर्खता को विकलांगता की श्रेणी में रखा जाये या क्षमता की श्रेणी में। स्वार्थवश और सफलता की प्यास में डूबा मैं भी ढीला पड़ गया और मूर्खता को जीवनमंचन में स्थान प्रदान कर दिया। इतने दिनों के सयानेपन का हैंगओवर हटाने के लिये मूर्खता ने ही 6 सरल सूत्र सुझाये।

1. किसी के दुख को देखकर बुद्ध बने रहिये। मुख में विकार का अर्थ होगा कि आप विद्यता को भुला नहीं पा रहे हैं।

2. जब तक पूछा न जाये, स्वतःस्फूर्त प्रश्नों के उत्तर न दें। पूछने पर भी, समझने का समुचित प्रयास करते हुये से तब तक प्रतीत होते रहिये जब तक प्रश्नकर्ता स्वयं ही उत्तर न दे बैठे।

3. विश्व के ज्ञान का प्रवाह अपने ओर बहने दें। निर्लिप्त जो स्वतः ही धँस जाये, उसके अतिरिक्त कुछ भी लोभ न करें।

4. उत्साह सबका बढ़ायें, बिना ज्ञान दिये। ज्ञान देने में विद्वता और उत्साह न बढ़ाने में विरोध प्रकट होता है। विरोध भी विद्वता का दूसरा सिरा है।

5. न्यूनतम जितना करने से जब तक रोटी मिलती रहती है, खाते रहें।

6. जीवन के लक्ष्यों को अलक्ष कर दें। ये आपको शान्ति से बैठने नहीं देंगे।

अभ्यास से क्या संभव नहीं और जब मैंने स्वयं अनुभव कर जानने का निश्चय किया तो मूर्खता के अभ्यास का कष्ट भी सह लिया। वर्षों से अर्जित ज्ञान और अनुभव को एक काजल की डिबिया में बन्दकर सुरक्षित रख दिया था। आनन्द की अनुभूति इन सूत्रों के अनुपालन से बढ़ती गयी। मूर्खत्व की खोज में परमहंसीय जीवन हो गया आदि और अन्त से परे। कर्मठ प्राणी माया के पाश में छटपटाते दिखे।

ब्रम्हा की तरह ही एक प्रश्न मेरे मन में भी उठा कि हे भगवन मैं इस सुख में डूब गया तो सृष्टि कैसे चलेगी?

आकाशवाणी होती है,

बालक ! अपने मूर्खत्व की रक्षा कर।

और

बने रहो पगला,

काम करेगा अगला।

....

....

उठिये, उठिये, इण्टरसिटी से चलना है।

(हुँह, यह उमर है सपना देखने की। इतना मुस्कराते तो पहले कभी नहीं देखा। बच के रहना, सुबह का सपना सच हो जाता है। हो जाये तो?) चेहरा देख कर ऐसा लगा कि श्रीमती जी ने यही सोचा होगा।

मैं चला स्टेशन का निरीक्षण करने। आप एक डुबकी तो मारिये।

18.8.10

सर तो बिजी है

सरकार व नौकरशाही का प्रतीक है लाल बत्ती। कार्यालयों के बाहर लगी दिख जाती है। सामान्य व असामान्य मानसिकता के बीच की रेखा। इसके प्रमुखतः दो उपयोग हैं, पहला दूरी बनाने में और दूसरा स्वयं को व्यस्त बताने में। मेरे लिये इसका उपयोग तीसरा है। वाणिज्य विभाग में होने के कारण जनता व उनके प्रतिनिधियों से सीधा सम्पर्क रहता है। लगातार लोगों के आते रहने से फाईलें निपटाने का समय नहीं मिल पाता है। सप्ताह में एक दिन तीन घंटों के लिये इस ऐतिहासिक सुविधा का उपयोग फाईलों से दूरियाँ मिटाने के लिये होता है।

द्वारपाल महोदय आदेश पाकर सतर्क हो बैठ जाते हैं। उन तीन घंटों के लिये उनके हाथों में सारे अधिकार सिमट जाते हैं। आगन्तुक कोई भी हो, उत्तर एक ही मिलता है।

"सर तो बिजी है।"

यदि द्वारपाल महोदय को आप यह मनवा सके कि आप यदि अभी नहीं मिले तो बहुत बड़ा अनर्थ होने वाला है, तभी आपका नाम स्लिप में लिखकर अन्दर पहुँचाया जायेगा। नहीं तो आप कितनी भी अंग्रेजी बोल लें, उनको हिलाना असम्भव। बस एक ही उत्तर।

"सर तो बिजी है।"

एक दिन बाहर से कुछ बहस के स्वर सुनायी पड़े। एक लड़की जिद पकड़कर बैठी थी कि उसे अभी मिलना है। दस मिनट तक ध्यान बँटता रहा तो फाईल बन्द कर उन्हें अन्दर बुला लिया। लड़की उत्तर पूर्व से थी व बंगलोर में अध्ययनरत थी। घर में पिता का स्वास्थ्य ठीक नहीं था और उन्हें उसी दिन गुवाहटी जाना था। पहले उन्हें पानी पिलवाया और उसके बाद एक इन्स्पेक्टर महोदय को बुला त्वरित सहायता कर दी गयी।

तनावमुक्त और अभिभूत हो उन्होने धन्यवाद तो दिया ही पर यह भी कहा कि आपने इतनी शिष्टता से सहायता की पर आपका द्वारपाल तो आने ही नहीं दे रहा था। उसको हटा दीजिये, आपकी छवि खराब कर रहा है। मैंने द्वारपाल के व्यवहार के लिये क्षमा माँग ली और कहा गलती मेरी ही है क्योंकि आदेश मेरा ही था। लड़की ने बताया कि वह भी सिविल सेवा की तैयारी कर रही है और उसमें सफल होने के बारे में मेरे अनुभव भी जानने चाहे। कार्य का क्रम टूट ही चुका था तो मैं भी एक भावी अधिकारी का भविष्य बनाने में लग गया। समय का पता नहीं चला और लाल बत्ती जलती रही।

द्वारपाल बाहर तने बैठे रहे। कई और लोग आये पर अब उनका उत्तर थोड़ा बदल चुका था।

"सर तो अबी बहोत बिजी है। अन्दर एक मैडम भी है।"

पता नहीं द्वारपाल महोदय लड़की से झगड़े का बदला ले रहे थे या हमारी छवि में चार चाँद लगा रहे थे।

3.7.10

त्रासदियाँ

साल-2018...जगह-लखनऊ से 58 किलोमीटर दूर हसनपुर में अमेरिकन न्युक्लियर पावर प्लांट। एक तेज़ धमाका। फिर कुछ और धमाके। उसके बाद क्या, कहां, कैसे, क्यूं जैसे कुछ बेमानी से सवाल...अमेरिकन कंपनी पर 500 करोड़ का जुर्माना। और हां, 40 हज़ार इंसानी मौतें और खरबों की संपत्ति मिट्टी के हवाले। लेकिन, इस बारे में बात करने का कोई फ़ायदा नहीं क्यूंकि इस जान-माल के बदले मिल तो गया 500 करोड़। और क्या चाहते हैं। न्यूक्लियर लायबिलिटी बिल में यही तय हुआ था न।

प्रबुद्धजी व्यस्त पुरुष हैं अतः गोता लगा कर अगले 8 वर्ष आगे का समाचार ही ला पाये। सप्ताहान्त में पूरे समय मैं गोते में ही रहा और ढूढ़कर लाया इस हादसे पर चल रहे मुकदमे के निर्णय का क्षण। बस पढ़ लें आप एक प्रतिष्ठित समाचारपत्र में प्रकाशित यह समाचार।
अर्चना चावजी द्वारा
सन 2050, 32 साल की मुकदमेबाजी के बाद आज न्यायालय ने लखनऊ न्यूक्लियर त्रासदी का निर्णय सुना दिया है। सारे पक्षों के अनवरत तर्क सुनने के पश्चात इस त्रासदी का उत्तरदायी उस चौकीदार को माना है जिसने त्रासदी को पॉवर प्लांट से बिना गेट परमिट बनवाये ही निकल जाने दिया। अपने चौकीदारीय कर्तव्य का निर्वाह न करने के लिये उन्हे 2 महीने के सश्रम कारावास का दण्ड सुनाया गया है। सभी पक्षों ने इस निर्णय का स्वागत किया है और इसे देर से किन्तु सही दिशा में लिया गया कदम बताया है।

इतिहास से सीख लेने की परिपाटी को निभाने के लिये तत्कालीन सरकारों की भी भूरि भूरि प्रशंसा हुयी है। भोपाल गैस कांड के समय की गयी गलतियों को ठीक करके हमने अपना सुधारात्मक चरित्र पूरी दुनिया को समझा दिया है। आपको बताते चलें कि इस बार विदेशी दोषियों को भगाने में विशेष सावधानी बरती गयी। धारायें ऐसी लगायी गयीं जिस पर 32 साल बाद भी प्रतिपक्ष कोई विवाद का विषय न बना सके। एक विशेष विक्रम ऑटो से एयरपोर्ट तक भेजा गया और प्राइवेट एयरलाइन का उपयोग कर सीधे विदेश भेज दिया गया। उस समय सारे सरकारी वाहन उस रोड से हटा लिये गये थे। उनके भागने के रास्ते में कोई भी सरकारी चिन्ह सहायता करता हुआ नहीं दिखा। विदेश नीति के विशेषज्ञों ने इसे एक महत्वपूर्ण और सोचा समझा हुआ कदम बताया था। जहाँ एक ओर अमेरिकन सरकार ने भारत के इस प्रयास की भूरि भूरि प्रशंसा कर इसे लोकतन्त्र की परिपक्वता का एक प्रमाण बताया वहीं दूसरी ओर, भारत की विदेश नीति को आगे भी अवसर मिलता रहे, इसके लिये 5 नये न्यूक्लियर पॉवर प्लांट शून्य प्रतिशत ब्याज पर लगाने की घोषणा की है।
 
कुछ स्वयंसेवी संगठनों ने इस त्रासदी के निर्णय में पिछले निर्णयों से 6 वर्ष अधिक लेने पर सरकार की कार्य क्षमता पर प्रश्नचिन्ह लगाया है। सरकार के प्रवक्ता ने उन्हें सरकारी कामकाज के तरीकों को बिना सोचे समझे बयानबाजी न करने की सलाह दी और "लॉ विल टेक इट्स ओन कोर्स" पर हुये पिछले 50 वार्षिक सेमिनारों की रिपोर्टें भी अध्ययन करने को कहा। बताया जाता है कि 40000 मृतकों की पहचान व फाइलें बनाने में इतना समय लगा।

वहीं दूसरी ओर कुछ पीड़ितों ने यह दावा किया कि इसमें न्यूक्लियर प्लांट का कोई दोष नहीं, क्योंकि हवा के प्रदूषण से वैसे ही दो माह में उनकी मत्यु होने वाली थी। उन्हे तो इस त्रासदी से लाभ ही हुआ। वैज्ञानिक बताते हैं कि न्यूक्लियरीय विकिरण के कुछ विशेष गुणों से उनमें प्रदूषण प्रतिरोधी कोशिकाओं का विकास हुआ जिसके फलस्वरूप वे 32 वर्ष और जी सके। इस उपलब्धि के लिये जहाँ एक ओर उस कम्पनी को भौतिकी, रासायनिकी व शान्ति के नोबल पुरस्कारों से सम्मानित किया जा रहा है वहीं दूसरी ओर कई प्रदूषित शहरों में इस तरह के त्रासदीय न्यूक्लियर पॉवर प्लांट लगाने के लिये राज्य सरकारें उत्सुक दिख रही हैं। बढ़ती माँग देखकर कम्पनी ने प्लांट की डिजाइन व त्रासदी की विधि का पैटेन्ट करा लिया है।

अमेरिकन कम्पनी पर 500 करोड़ की जुर्माने की बात पर भी भारत ने अपऩी स्थिति आज स्पष्ट कर दी। मित्र राष्ट्र होने के नाते यह राशि भारत ने अपने खजाने से देकर मित्रता को और प्रगाढ़ कर लिया है और साथ ही साथ एक जुट खड़े हुये देशवासियों को टैक्स के माध्यम से दिवंगतों को श्रद्धान्जलि देने का अवसर भी प्रदान किया है।

यदि त्रासदियों से इतने लाभ हों, तो त्रासदियाँ तो अच्छी हुयी ना।

23.6.10

स्वर्ग

नहीं, यह यात्रा वृत्तान्त नहीं है और अभी स्वर्ग के वीज़ा के लिये आवेदन भी नहीं देना है। यह घर को ही स्वर्ग बनाने का एक प्रयास है जो भारत की संस्कृति में कूट कूट कर भरा है। इस स्वर्गतुल्य अनुभव को व्यक्त करने में आपको थोड़ी झिझक हो सकती है, मैं आपकी वेदना को हल्का किये देता हूँ।


विवाह के समय माँ अपनी बेटी को सीख देती है कि बेटी तू जिस घर में जा रही है, उसे स्वर्ग बना देना। विवाह की बेला तो वैसे ही सपनों में तैरने की बेला होती है, बेटी भी मना नहीं करती है। अब नये घर के काम काज भी ढेर सारे होते हैं, नये सम्बन्धी, नयी खरीददारी, ढेर सारी बातें मायके की, ससुराल की। कई तथ्य जो कुलबुला रहे होते हैं, उनको निष्पत्ति मिल जाने तक नवविवाहिता को कहाँ विश्राम। इस आपाधापी में बेटी को माँ की शिक्षा याद ही नहीं रहती है।


जिस प्रकार दुष्यन्त को अँगूठी देखकर शकुन्तला की याद आयी थी, विवाह के कई वर्षों बाद बेटी को अँगूठी के सन्दर्भ में ही माँ की दी शिक्षा याद आ जाती है, घर को स्वर्ग बनाने की।


"अमुक के उनने, अमुक अवसर पर एक हार दिया, आप अँगूठी भी नहीं दे सकते?" अब इसे पढ़ा जाये कि लोग अपनी पत्नियों को हार के (बराबर) प्यार करते हैं, आप अँगूठी के बराबर भी नहीं? ब्रम्हास्त्र छूट चुका था, घात करना ही था। आप आगे आगे, बात पीछे पीछे।


एक सुलझे कूटनीतिज्ञ की तरह दबाव बनाने के लिये बोलचाल भी बन्द।


अब यहाँ से प्रारम्भ होता है आप का स्वर्ग भ्रमण।


कहते हैं कि स्वर्ग में हर शब्द गीत है और हर पग नृत्य।


यहाँ भी कोई शब्द बोले नहीं जा रहे हैं, केवल गीत सुनाये जा रहे हैं। गीतों के माध्यम से संवाद चल रहे हैं। हर शब्द गीत हो गया। इन अवसरों के लिये हर अच्छे गायक ने ढेर सारे गीत गाये हैं, वही बजते रहते हैं। आप आप नहीं रहते हैं, खो जाते हैं गीत के अभिनेता के किरदार की संवेदना में। है न स्वर्ग की अनुभूति।


अब कोई सामने आते आते ठुमककर बगल से निकल जाये तो क्या वह किसी नृत्य से कम है? आपको ज्ञात नहीं कि क्या वस्तु कहाँ मिलेगी, आप पूरे घर में नृत्य करते रहते हैं। पार्श्व में गीत-संगीत और घर में दोनों का नृत्य। आपका अनियन्त्रित, उनका सुनियोजित। है न स्वर्ग की अनुभूति।


बिजली की तरह ही प्रेम को भी बाँधा नहीं जा सकता है। इस दशा में दोनों का ही प्रेम बहता और बढ़ता है बच्चों की ओर। अब इतना प्यार जिस घर में बच्चों को मिले तो वह घर स्वर्ग ही हो गया। जब सारा प्यार बच्चों पर प्रवाहित हो रहा है तो भोजन भी उनकी पसन्द का ही बन रहा है, निसन्देह अच्छा ही बन रहा है। है न स्वर्ग की अनुभूति।


संवाद मध्यस्थों के माध्यम से हो रहा है। केवल काम की बातें, जितनी न्यूनतम आवश्यक हों। जब कार्य अत्यधिक सचेत रह कर किया जाये तो गुणवत्ता अपने आप बढ़ जाती है। हम भी सजग कि कहीं करेले पर नीम न चढ़ जाये। उन्हे यह सिद्ध करने की उत्कट चाह कि वह अँगूठी के योग्य हैं। जापान ने हड़ताल के समय अधिक उत्पादन का मन्त्र संभवतः भारत की रुष्ट गृहणियों से सीखा हो। है न स्वर्ग की अनुभूति।


किसी को मत बताईयेगा, हमें ब्लॉग लिखने व पढ़ने का भरपूर समय भी मिल रहा है। है न स्वर्ग की अनुभूति।


दिन भर के स्वर्गीय सुखों से तृप्त जब सोने का प्रयास कर रहा हूँ तो रेडियो में जगजीत सिंह गा रहे हैं "तुमने बदले हमसे गिन गिन कर लिये, हमने क्या चाहा था इस दिन के लिये?" अब स्वर्ग में इस गज़ल का क्या मतलब?


आपके घर में इस यात्रा का अन्त कैसे होता है, बताईये? हम तो पकने लगे हैं। हमें पुनः पृथ्वीलोक जाना है। अब समझ में आया कि स्वर्ग में तथाकथित आनन्द से रहने वाले देवता पृथ्वीलोक में क्यों जन्म लेना चाहते हैं?