विकास जब अँगड़ाई लेता है तो जम्हाई के कई स्वर उसमें समाहित हो जाते हैं, जितनी बार अँगड़ाई लेता है उतने ही नये स्वर आ जाते हैं। दूसरी प्रकार से कहें तो जब कोई नया खिलौना बच्चे के हाथ लगता है तो उससे सम्बन्धित नये खेल ढूढ़ लेता है, रचना कर डालता है। जब पहली बार गेंद बनी होगी तो जमीन पर लुढ़का कर खेलने वाला कोई खेल बना होगा, कुछ बॉउलिंग जैसा। धीरे धीरे पिठ्ठू जैसे खेल की अवधारणा बनी होगी। हॉकी, फुटबाल, बॉस्केटबॉल, हैण्डबॉल, टेबलटेनिस, कंचे और न जाने क्या क्या खेल, हाँ हाँ, क्रिकेट भी, बिना उसके खेलों की परिभाषा कहाँ पूरी होगी भला? बॉल के आकार प्रकार के आधार पर खेल बने होंगे, उनके नियम बने होंगे। जब तक बॉल का स्वरूप उस प्रकार का बना रहता है, वह खेल होता रहता है, आनन्द आता रहता है।
अब यदि गेंद की तुलना समाचार से करें, तो गेंद के आकार प्रकार से कुछ विशेष तरह के ही खेल खेले जा सकते हैं। उदाहरण स्वरूप, बॉस्केटबॉल से आप लॉनटेनिस नहीं खेल सकते हैं। इसी प्रकार समाचार की प्रकृति के आधार पर आप उसे कुछ विशेष प्रकार से ही व्यक्त कर सकते हैं। यदि आप भिन्न प्रकार की गेंद से भिन्न खेल खेलें तो बॉल का जो हाल होता है, वही हाल चैनल समाचारों का कर रहे हैं। यही नहीं, एक समाचार को इतना अधिक दिखा डालते हैं कि यह पता ही नहीं चलता है कि उसका प्रारम्भिक या मूल स्वरूप क्या था? ठीक उसी प्रकार जैसे किसी एक बॉल को इतना पीटा जाये कि वह चीथड़े चीथड़े हो जाये।
समाचारों की तुलना गेंद से करने का उद्देश्य, किसी समाचार को नीचा दिखाना नहीं। अब कोई घटना हो गयी तो वह पिसेगी ही चैनलों की चक्की में, पिस कर क्या निकलेगी, क्या मालूम? दोष तो घटना का ही है कि वह क्यों हो गयी? मेरी समस्या उन सभी लोगों की समस्या है जिनके पास इतना समय नहीं रहता कि किसी एक समाचार को दो तीन दिनों तक देखें। यदि प्रारम्भ छूट जाता है तो वह समाचार बहुत आगे तक निकल जाता है, बीच में देखने में कुछ समझ भी नहीं आता है। यदि समझने के लिये दूसरा चैनल खोलें तो वही समाचार किसी दूसरी दिशा में भागा जाता हुआ दिखता है। तीसरे चैनल पर वही समाचार तब तक इतना धुन दिया जाता है कि उसकी विषयवस्तु को संयोजित करने में घंटों लग जाते हैं। यदि संशय दूर करने के लिये आप किसी से कुछ पूछ बैठे तो वह भी हँसने लगता है कि घंटे भर बैठने के बाद भी श्रीमानजी को समझ नहीं आ रहा है। उसे भी कहाँ फुर्सत, उसे तो उस समाचार के आगत व्याख्या भी देखनी है, कहीं ध्यान भंग हुआ तो उसे सारे सूत्र पुनः जोड़ने पड़ेंगे।
जहाँ एक समाचार का सागर व्याप्त है, उसके भिन्न स्तरों पर प्रस्तुत पक्ष उपस्थित हैं, इतना अधिक मंथन हो जाने के बाद के विष अमृत जैसे फल उपस्थित हैं, और हम हताश से कुछ न समझ पायें, यह समाचार का कम, हमारी समझ का अधिक अपमान है। यही कारण रहा होगा कि अपनी कमी छिपाने के लिये हम लोगों ने एक नयी विद्या विकसित कर ली है, समाचार संश्लेषण की। निश्चय ही पुराने जन्मों का प्रताप है कि पाँच मिनट में आठ चैनल देखते ही हमें समाचार पूरा समझ में आ जाता है। कहीं थोड़ा कम आता है, कहीं थोड़ा अधिक।
संश्लेषण अच्छा कर सकने के लिये आप को कुछ मूलभूत तथ्य जानने आवश्यक हैं। पहला तो सारे चैनलों की गति जानना आवश्यक है, उस चैनल पर एक समाचार कितना फैल चुका है, यह देखकर ही आप बता देंगे कि घटना कब हुयी थी? दूसरा, इन चैनलों की निष्ठायें समझना आवश्यक है, ऐसा करने से आप उन समाचारों को किस ओर कितना मोड़ कर स्वीकार करना है, यह पता चल जाता है। तीसरा है चैनलों की नये तथ्य खोजने और पुराने तथ्यों को खोदने की सामर्थ्य, इससे आपको विषय की गहराई विधिवत पता चल जायेगी।
इतना विशेष ज्ञान होने के बाद ही आप में वह सक्षमता विकसित हो पायेगी जिससे आप किसी समाचार का संश्लेषण कर पायेंगे। इन गुणों के अभाव में कितना ज्ञान आपके हाथ से रेत जैसा निकल जायेगा, उसका अनुमान लगाना ही कठिन है। एक समाचार पर हर चैनल का पुराना शोध उपस्थित है और नया शोध प्रतिपल उत्पन्न हो रहा है, विवेकानन्दजी की तरह पन्ने पलटकर सब समझ लेने की क्षमता विकसित करनी होगी अन्यथा समाचार के युग में असमाचारी ही रह जायेंगे।
आश्चर्य होता है कि संश्लेषण की इतनी विशिष्ट और ज्ञानपरक विधियाँ विद्यालयों में नहीं पढ़ायी जाती, नागरिकों को उनकी मेधा के अनुसार अस्तव्यस्त सीखने को विवश किया जाता है। आचार विचार से नयी पीढ़ी भले ही वंचित रह जाये, समाचार से जुड़े रहने का मानवाधिकार उससे नहीं छीना जा सकता है। आश्चर्य है, देश महाक्षति की ओर भागा जा रहा है और रास्ते में कोई मोमबत्ती भी नहीं जल रही है?