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8.5.13

लहरें

तकते हैं,
लहरें आती और जाती हैं।

लखते हैं,
कुछ लाती, कुछ ले जाती हैं।

छकते हैं,
इठलाती, हमें खिलाती हैं।

इनके जैसे ही सतत रहें,
हर पल उद्भव का राग यहाँ,
नत हो जाना, फिर फिर आना,
आरोहण का अनुनाद यहाँ।

हो मत्त, व्यग्र, चंचल, चपला,
दौड़ी आती विरही कल कल,
जड़ रूप मूक सागर तट पर,
आलिंगन का आग्रह निश्छल।

यह प्रेम नहीं, मद आकुल है,
जीवट मन है, कब से ठहरा,
यह विष फेनों का नर्तन भी,
आक्रोश व्यक्त होता गहरा।

एक द्वन्द्व मूर्त, स्तब्ध विश्व,
आकाश चेत, सो जाता है,
सागर धरती नित लीलामय,
इतिहास रेत हो जाता है।

इनकी गतियों सा बने रहें,
यदि शेष समय जो मिला क्षणिक,
संग जीवन हम भी बह जायें,
जब समय शेष न रहे तनिक।

24.4.13

फन वेव, हिट वेव

सागर की लहरों में खेलना किसे नहीं भाता है, विशेषकर जब लहरें आपके आकार की आ रही हों। खेल का रोमांच भी वहीं पर होता है, जहाँ पर तनिक जूझना पड़े, जहाँ पर तनिक अनिश्चितता हो। एकतरफा खेल बड़े ही नीरस होते हैं, न देखने में सुहाते हैं और न ही खेलने में।

सागर में उठी किसी भी हलचल को अपना निष्कर्ष पाना होता है, यह हलचल लहरों के रूप में बढ़ती है, ये लहरें किनारे की ओर भागती हैं, यथाशीघ्र। भाग्यशाली लहरों को किनारा शीघ्र मिल जाता है, वे अपनी हलचल में संचित ऊर्जा किनारे पर लाकर पटक देती हैं। जो लहरें सागर के बीचों बीच होती हैं, उन्हें किनारा पाते पाते बरसों लग जाते हैं, वे लहरें अपनी हलचल अपने में समाये रखती हैं, निष्कर्ष को तरसती रहती हैं।

देखा जाये तो मन भी बहुत कुछ सागर की तरह ही होता है, गहरा भी, हलचल भरा भी। न जाने कैसे कोई हलचल उठती है और बनी रहती है, जब तक निष्कर्ष न पा जाये। किनारे व्यक्त जगत है और लहरों का किनारों पर पहुँच जाना अभिव्यक्ति जैसा। किनारे लहरों की अभिव्यक्ति के साक्षी होते हैं और जगत हमारे मन की अभिव्यक्ति का। सागर रत्नगर्भा है, मन में भी विचारों के रत्न छिपे हैं। दोनों के बीच इतना साम्य छिपा है कि नियन्ता की निर्माणशैली में दुहराव सा दिखने लगता है, लगता है कि ईश्वर अलसा गया होगा, जब मन बनाने की बारी आयी तो उसे सागर का रूप दे दिया।

सागर किनारे बैठा हूँ, एक लहर आती है, थोड़ी देर बाद दूसरी। अन्दर का सागर स्थिर सा लगता है पर हलचल बनी रहती है। जलराशि किनारे की ओर आती है, सहसा उसे धरती मिलती है। जहाँ घरती पर संपर्क होता है वह जलराशि वहाँ रुक धरती से बतियाने लगती है, उसके उपर की हलचल चढ़कर आगे निकलना चाहती है, वह आगे की घरती का आलिंगन करने की शीघ्रता में है। एक के बाद एक परत बनती है, उसे उछाल मिलता है, जब तक उठ सकती है, उठती है और जब अव्यवस्थित हो जाती है तो टूट जाती है, फेन बन स्वयं को अभिव्यक्त कर देती है, किनारे में आ समाहित हो जाती है।

कुछ लिखने बैठता हूँ तो विचार भी सागर की लहरों की तरह दौड़े चले आते हैं, कभी सधे सधाये और कभी अनियन्त्रित और अव्यवस्थित, अन्ततः समुचित शब्दों का आकार पा वापस चले जाते हैं, किसी आगामी लहर का साथ देने, आगामी विचार के साथ।

कभी मन के अन्दर जाकर उससे जूझने का प्रयास किया है? अवश्य ही किया होगा, बिना मन से जूझे भला कहाँ कुछ सार्थक निकलता है? जैसे खेल का आनन्द बराबरी वाले से खेलने में आता है, वैसे ही जीवन में अमृत बिना मन मथे आता ही नहीं, ठीक उसी तरह जिस तरह सागर मथा गया था। चाह तो सदा अमृत की ही रहती है, साथ में विष आदि भी आते ही रहते हैं।

बच्चों को देख रहा हूँ, कमर तक की ऊँचाई में खड़े हैं, और आगे जाने के लिये मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं। लहरें पीछे से आ रही हैं, कंधे तक ऊँची, उछलते हैं सर बाहर निकाले रहने के लिये, लहरों के जोर से थोड़ा किनारों तक बढ़ जाते हैं, लहरें वापस चली जाती हैं, पुनः खड़े हो जाते हैं, स्थापित से, आगामी लहर की प्रतीक्षा में। मेरी ओर पुनः निहारते हैं, उन्हें लगता है कि आगामी लहर और ऊँची होगी, और ऊर्जा से भरी होगी, सर के ऊपर से निकल जायेगी, हो सकता है कि किनारे पर भी पटक दे।

बच्चों की आतुरता देखी नहीं जाती है और मैं भी अन्दर चला जाता हूँ, बच्चों को थोड़ा और गहरे में ले जाता हूँ। एक बार निश्चिन्तता आ जाती है तब कहीं जाकर प्रारम्भ हो जाता है खेल का आनन्द। निश्चिन्तता इस बात की कि कोई न कोई है साथ में जो लहरों से ऊँचा और सशक्त है, निश्चिन्तता इस बात की भी कि लहर आयेगी और फिर वापस चली जायेगी, कुछ भी स्थायी नहीं रहेगा। हम तब खेल खेलने तैयार हो जाते हैं।

हर लहर ऊँची नहीं होती, पर हर दस लहरों में एक या दो ऊँची आती हैं, सर के ऊपर और अस्थिर करने की ऊर्जा समेटे। विज्ञान भी नहीं बता पाता कि कौन सी लहर भीषण होगी? हर ऊँची लहर घातक नहीं होती, जो लहर अपना स्वरूप बना कर रखती है, वह आपको ऊपर उछाल देती है, आपको उतराने का आनन्द आता है, आपका अहित नहीं करती है। ऐसी आनन्ददायक लहरों का नाम बच्चों ने 'फन वेव' दिया, आशय आनन्द देने वाली लहरें। जो लहरें आपके पास आने के पहले ही टूट जाती हैं, वे अपनी ऊँचाई और ऊर्जा संरक्षित नहीं रख पाती हैं और जल को श्वेत फेन सा कर के चली जाती हैं, वे थोड़ा विराम भर देती हैं। पर कठिन वे लहरें होती हैं जो ऊँची भी होती हैं और आपके पास आकर टूटती हैं, ये आपको न केवल एक थपेड़ा सा मारती हैं वरन बहुधा आपको पटकनी देकर गिरा भी जाती हैं, इन लहरों को बच्चों ने 'हिट वेव' का नाम दिया।

हम लोगों में यह बताने की प्रतियोगिता थी कि आने वाली लहर फन वेव होगी या हिट वेव। फन वेव में बच्चे मुक्त रहते थे, हिट वेव में आकर चिपट जाते थे या हाथ पकड़े रहते थे। थोड़ा आगे चले जायें तो यही हिट वेव फन वेव बन जाती हैं। बच्चों के साथ यह खेल खेलता रहा, लहरें भी खिलाती रहीं, तब तक, जब तक थक नहीं गये। बाहर निकल आये तब भी लहरों की ध्वनियाँ आकर्षित करती रहीं, पुनः वापस बुलाने के लिये।

सागर को भी ज्ञात है, मन को भी ज्ञात है कि लहरों का और विचारों का एकांगी स्वरूप किसी को नहीं भाता है, विविधता सोहती है, अनिश्चितता मोहती है। फन वेव भी रहेगी, हिट वेव भी रहेगी, सर के तनिक ऊपर और आपसे तनिक सशक्त, जूझना पड़ेगा ही, जीवन का आनन्द उसी से परिभाषित भी है। साथ यह भी समझना होगा, या तो लहर के इस पार रहें या उस पार, लहरों का टूटना संक्रमण है और जो भी संक्रमण झेलता है उसे सर्वाधिक कष्ट होता है।

मन के बारे में थोड़ा और समझना हो तो सागर की लहरों से खेल कर देखिये, बाहर निकलने के बाद आप अपने से और अधिक परिचित हो जायेंगे।

26.12.12

कोई हो

खड़ा मैं कब से समुन्दर के किनारे,
देखता हूँ अनवरत, सब सुध बिसारे ।
काश लहरों की अनूठी भीड़ में अब,
कोई पहचानी, पुरानी आ रही हो ।
कोई हो जो कह सके, मत जाओ प्यारे,
कोई हो जो मधुर, मन को भा रही हो ।।१।।

कोई कह दे, नहीं अब मैं जाऊँगी,
संग तेरे यहीं पर रह जाऊँगी ।
कोई हो, एकान्त की खुश्की मिटाने,
नीर अपने आश्रय का ला रही हो ।
कोई हो जो बह रहे इन आँसुओं के,
मर्म की पीड़ा समझती जा रही हो ।।२।।        

कोई कह दे, छोड़कर पथ विगत सारा,
तुझे पाया, पा लिया अपना किनारा ।
कोई कह दे, भूल जाओ स्वप्न भीषण,
कोई हो जो हृदय को थपका रही हो ।
कोई कह दे, देखता जो नहीं सपना,
कोई हो जो प्रेयसी बन आ रही हो ।।३।।

15.2.12

लहरों से खेलना

सागर से साक्षात्कार उसकी लहरों के माध्यम से ही होता है। किनारे पर खड़े हो विस्तृत जलसिन्धु में लुप्त हो जाती आपकी दृष्टि, कुछ कुछ कल्पनालोक में विचरने जैसा भाव उत्पन्न करती है, पर इस प्रक्रिया में आप सागर में खो जाते है। पानी की लहराती कृशकाय सिहरन आपके पैरों को नम कर जाती है, पर इस प्रक्रिया में सागर पृथ्वी में खो जाता है। एक स्थान, जहाँ सागर का साक्षात्कार विधिवत और बराबरी से होता है, वह है जहाँ लहरें बनना प्रारम्भ होती हैं।

वैज्ञानिक दृष्टि से लहरों का बनना समझाया जा सकता है। पृथ्वी के गतिमय रहने से सागर में कुछ तरंगें उत्पन्न होती है, तरंगें सदा किनारे की ओर भागती हैं, पृथ्वी से प्राप्त ऊर्जा को पुनः किनारे पटक आने के लिये। किनारे आने पर गहरी जलराशि को जब तल में चलने की जगह नहीं मिलती है, वह ऊपर आने के लिये होड़ मचाती है, एक के ऊपर एक, ऊपर वाली आगे, नीचे वाली पीछे। धीरे धीरे ऊँचाई बढ़ती जाती है, गति बढ़ती जाती है। जब और किनारा आता है, गति स्थिर नहीं रह पाती है, लहरें टूटने लगती हैं, पीछे से आने वाली जलराशि उस ऊँचाई से जलप्रपात की तरह गिरने लगती है, दृश्य गतिमय हो जाता है, लहरों से फेन निकलने लगता है, थपेड़ों की ध्वनि मुखर होने लगती है, लगता है मानो लहरें साँप जैसी फन फैलाये, फुँफकारती चली आ रही हैं।

सम्मोहनकारी दृश्य बन जाता है, लोग मुग्ध खड़े हो निहारते रहते हैं, घंटों। मुझे भी यह देखना भाता है, घंटों, बिना थके, लगातार। मेरी दार्शनिकता मुझसे बतियाने लगती है, दिखने लगता है कि जब धीर, गम्भीर व्यक्ति को छिछले परिवेश में स्वयं को व्यक्त करने की विवशता होती होगी, उसका भी निष्कर्ष किनारे पर सर पटकती लहरों जैसा ही होता होगा। लहरों का बनना और टूटना ऊर्जा को सही स्थान न मिल पाने की देश की अवस्था को भी चित्रित कर जाता है। मेरे मन में, जूझने की जीवटता, उन लहरों से कुछ सीख लेना चाहती है। पूर्णिमा का चाँद जब प्रेमवश सागर को अपनी ओर अधिक खींचने लगता होगा, सागर की वियोगी छटपटाहट इन लहरों के माध्यम से ही स्वयं को व्यक्त कर पाती होगी।

सायं का समय है, सूरज अपनी लालिमा बिखरा रहा है, सागर किनारे, दोनों ओर बच्चे बैठे बतिया रहे हैं। समुद्र से जुड़ा सारा ज्ञान धीरे धीरे उलीच रहे हैं दोनों, पिता की स्नेहिल उपस्थिति में। दोनों को ही ज्ञात है कि यदि अगले प्रश्न में अधिक समय लिया तो पिताजी कल्पनालोक में सरक जायेंगे। अपने समय में कल्पना की अनाधिकार चेष्टा से सचेत बच्चे बहुधा मेरी कल्पनाशीलता से उकताने लगते हैं। उन्हें दूर बनती लहरों का बनना, बहना, टूटना और किनारे आकर वापस लौट जाना, यह देखना तो अच्छा लगता है पर उससे भी अच्छा लगता है, लहरों से खेलना। लहरों से खेलने का हठ सायं को पूरा नहीं किया जा सकता था, अगले दिन सुबह का समय निश्चित किया गया।

जल का आनन्द, संग संग, देवला और पृथु
बच्चों को लहरें बहुत पसन्द हैं, बेटा अब ठोड़ी तक आ गया है, तैरना आता है अतः गले तक की ऊँचाई में निर्भय हो पानी में बना रहता है। ऊँची लहर आती है तो साथ में उछल कर तैरने लगता है, पूरा आनन्द उठाता है, बस स्वयं से आगे नहीं जाने देता हूँ उसे। बिटिया माँ के साथ किनारे बैठे बैठे उकताने लगती है, भैया की तरह लहरों से खेलना चाहती है। दोनों ही साथ साथ सागर के अन्दर तक आ जाते हैं, बेटा बगल में, बिटिया गोद में। बिटिया छोटी है, लहरों की ऊँचाई उससे डेढ़ गुना अधिक है। सारी लहरें ऊँची नहीं आती हैं, वह गिनने लगती है, संभवतः हर पाँचवी लहर ऊँची होती है। धीरे धीरे उसका भी भय छूटता है, चार लहरों तक वह अपने पैरों पर खड़ी रहती हैं, बस हाथ पकड़े रहती है। हर पाँचवी लहर पर गोद में आकर चिपट जाती है। गोद में चढ़ पिता से भी ऊँची हो जाती है, लहर को अपने नीचे से जाते हुये देखती है तो खिलखिला कर हँस पड़ती है, बालसुलभ।

लहरों के साथ खेलते खेलते दो घंटे निकल जाते हैं, आँखों में थोड़ा खारा पानी जाने लगता है, धूप शरीर को तपाने लगती है, थकान होने लगती है, बच्चे वापस चले जाते हैं, मुझे कुछ और देर लहरों से खेलने का मन होता है। मैं हर पाँचवी लहर की प्रतीक्षा में रहता हूँ, लहर आती है, मैं स्वयं को छोड़ देता हूँ, थोड़ा तैरता हूँ, लहर चली जाती है, पुनः अपने पैर पर खड़ा हो जाता हूँ।

वापस अपने कमरे जा रहा हूँ, दार्शनिकता पुनः घिर आती है, आसपास की हलचल ध्यान भंग नहीं करती है। मन में विचार घुमड़ने लगते हैं, लहरों से खेलना बिल्कुल जीवन जीने जैसा ही है, हर पाँचवी लहर ऊँची आती है, थोड़ा प्रयास कर लीजिये, लहर चली जायेगी, पैर पुनः जमीन पर।

'आप फिर सोचने लगे, न' बिटिया टोक देती है, देखता हूँ, मुस्कराता हूँ, सर पर हाथ रख कर बस इतना ही कहता हूँ, 'शाम को फिर लहरों से खेलने चलेंगे'।