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16.9.26

फण तान, तान फण, कुटिल व्याल


कर वमन प्रसंचित विष कराल।

फण तान, तान फण, कुटिल व्याल।।


है दम्भ, नहीं इन ग्वालों ने,

सज्जन गोवंश सुपालों ने,

सब देखा पर, कुछ नहीं कहा,

उत्पात तुम्हारा शान्त सहा,

दूषित यमुना की धवल धार,

उस पर पोषित घन अहंकार,

अब दीर्घ प्रतीक्षा अन्तप्राय, आ पहुँचा तेरा न्याय काल।

फण तान, तान फण, कुटिल व्याल।।१।।


जीवन  छीने, आश्रय वंचित,

आतंक विकटतम सर्वविदित,

रण त्यक्त दिशायें, लिपट लिपट,

फण फैल गये थे निष्कंटक,

स्तुतियाँ, सब स्वर रहे व्यर्थ,

क्षण चढ़कर अब आया समर्थ,

इन तड़ित तरंगित तालों पर, है निष्प्रभ तेरी चपल चाल।

फण तान, तान फण, कुटिल व्याल।।२।।


इस पंथ भटकना भूल नहीं,

था निश्चय मेरा मार्ग यहीं, 

जन आशायें, क्रम रहे बँधा,

बस जान, समय उतना ही था

आन्दोलित श्वास सधी सी थी,

इस पल की प्यास मुझे भी थी,

क्यों अकुलाये अब विकल विकट, घट पापों का विस्तृत विशाल,

फण तान, तान फण, कुटिल व्याल।।३।।


गोपालों की इच्छा न थी,

कुख्याति बसी इतनी गहरी, 

भयग्रस्त और सकुचाये सब,

कन्दुक पर दौड़ लगाये सब,

जो नियत कर रहा सबकी गति,

संभवतः विधि की यही नियति,

कन्दुक हो जाती जल निमग्न, हतप्रभ सब देखें ग्वाल बाल,

फण तान, तान फण, कुटिल व्याल।।४।।


बस कर्म सरल करते तुम भी,

वापस कर देते जिनकी थी,

जो वस्तु उसी को लौटाते,

इतना संयम तो दिखलाते,

जल, धरा, शान्ति, सम्मान गहा,

धमकाना एकल कार्य रहा,

बस वापस माँग रहे जन को, आतंकित करते फण अराल,

फण तान, तान फण, कुटिल व्याल।।५।।


कातरता पूर्ण दृष्टि सबकी,

बन प्रश्न चुभी मुझ पर ही थी,

आग्रह मेरा था आने का,

प्रस्तुत कर्तव्य निभाने का,

था कूदा अपने कार्य निहित,

झगड़े का भाव नहीं किंचित,

तब क्यों था डसने का प्रयास, क्यों फैलाया तब जकड़ जाल,

फण तान, तान फण, कुटिल व्याल।।६।।


जब ललकारा है अनायास,

बालक जाना है, प्रकट हास,

है खड़ा बड़ी बाधा बनकर,

अपने मद की नद में तनकर,

तो कार्य रहा बस यही शेष,

तेरे अन्तर में कर प्रवेश,

तेरे ही शोणित से निश्चय, सीचूँगा तेरा तपित भाल,

फण तान, तान फण, कुटिल व्याल।।७।।


अब नहीं लगे किंचित क्षण भर, 

चढ़ गया देख तेरे फण पर,

मर्दन का नृत्य दिखाऊँगा,

वंशी से अलख जगाऊँगा,

विश्वास और अवलम्बन की,

आश्रय आकांक्षित जीवन की,

वंशी का स्वर संकेत सकल, है वृन्दावन का द्वारपाल,

फण तान, तान फण, कुटिल व्याल।।८।।


(ये पंक्तियाँ राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के गीत "तान तान फण व्याल, कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ" से प्रेरित है। जहाँ दिनकर ने बाँसुरी के स्वरों से कई कल्पों को साधा है, मेरा प्रयास कृष्ण से कालिया के हुये संवाद तक ही सीमित है)

21.8.22

सज्जन-मन


सब सहसा एकान्त लग रहा,

ठहरा रुद्ध नितान्त लग रहा,

बने हुये आकार ढह रहे,

सिमटा सब कुछ शान्त लग रहा।


मन का चिन्तन नहीं व्यग्रवत,

शुष्क हुआ सब, अग्नि तीक्ष्ण तप,

टूटन के बिखराव बिछे हैं,

स्थिर आत्म निहारे विक्षत।


सज्जन-मन निर्जन-वन भटके,

पूछे जग से, प्रश्न सहज थे,

कपटपूर्ण उत्तर पाये नित,

हर उत्तर, हर भाव पृथक थे।


सज्जन-मन बस निर्मल, निश्छल, 

नहीं समझता कोई अन्य बल,

सब कुछ अपने जैसा लगता,

नहीं ज्ञात जग, कितना मल, छल।

 

साधारण मन और जटिल जन,

सम्यक चिन्तन और विकट क्रम,

बाहर भीतर साम्य नहीं जब,

क्या कर लेगा, बन सज्जन-मन।

28.8.21

आशा के शत दीप जले

 

न जाने किस राह चला जग, कातरता व्यापी चहुँ ओर,

अब मानवता रहे संशकित, अब पशुता का चलता जोर ।


शील, धैर्य, सज्जनता, श्रम, सब आदर्शों की गाली हैं,

जिनके पेड़ों पर रुपया है, बस वही आज वनमाली हैं ।


मानवता सिमटी क्षुब्धमना, नित दानवता उत्पातों से,

जन थकता छिपता दीन हीन, नित निशाचरी आघातों से ।


जो हैं समाज के शीर्षबिन्दु, जो मानवता के त्राता हैं,

बिन पिये चढ़े गर्वित मद में, बन बैठे वंद्य विधाता हैं ।


आश्रित तुम पर दुखियारे जो, उनके घर में देखो जाकर,

जो बिता रहे पूरा जीवन, तन ढकने का कपड़ा पाकर ।


तुम उसी राजसी सूट-बूट में, मद-मतवाले फिरते हो,

मानवता का दायित्व लिये, कुत्सित कर्मों में गिरते हो ।


भोली जनता को बहलाते, बस अपना स्वार्थ निभाते हो,

कब आकर इनकी सुध लेते, कब आकर इन्हें बचाते हो?


ये तेरे है, तुम इनके हो, इनमें तुममें कोई भेद नहीं,

बस राह मिलेगी अन्तहीन, हो गया किन्तु विच्छेद कहीं ।


सब यही चाहते देश बढ़े, उन्नति के विकसित पंथ चले,

यदि निशा पसारे तम अपार, तब आशा के शत दीप जले।


31.7.21

लोभी रेवड़ी बाँट रहे हैं


जन-कुबेर-धन के रक्षक बन, जगह जगह बन्दर बैठे हैं ।

अनुशासन का पाठ पढ़ाते, उत्श्रंखल शासन करते हैं ।

बँटा हुआ निश्चित ही भारत, समुचित इन राजाओं में ।

धैर्य धरो, ऐसी आहुतियाँ, डालें जन-आशाओं में ।

पेट पाप से पूर्ण भरा है, मुँह से विद्या बाँच रहे हैं ।

लोभी रेवड़ी बाँट रहे हैं ।।१।।

 

कागज पर जितनी रेखायें, खिंचती जन-उत्थानों की ।

उतनी भूख स्वतः बढ़ जाती, मैकाले-सन्तानों की ।

निर्देशों की गंगा बहती, मरुथल सी धनहीन धरा ।

धन-धारा ने निश्चय कितने खेतों को परिपूर्ण भरा ।

लघु-कुबेर का आसन खाली, अर्थ-नियन्ता भाग रहे हैं ।

लोभी रेवड़ी बाँट रहे हैं ।।२।।

 

वही हमारे मार्ग-नियामक, जीवन-सृष्टा, पंथ-प्रकाशक ।

वही दया के उज्जवल तारा, गुणवत्ता के स्थिर मानक ।

वही समस्या जान सके हैं, समाधान भी वे देंगे ।

कलुष-पंक में डूबे मानव-जीवन को भी तर देंगे ।

पद की गरिमा सतत बढ़ाते, ईश्वर खुद को आँक रहे हैं ।

लोभी रेवड़ी बाँट रहे हैं ।।३।।

 

पीड़ा का कारण खोजा है, जब से अनुसन्धान किये ।

वर्णन कर डाला साधन का, बड़े-बड़े व्याख्यान दिये ।

भूख, गरीबी, रोजगार को पाँच साल में बाँध दिया ।

गुणा-भाग सारे कर डाले, नहीं किन्तु कुछ काम किया ।

पथ-भ्रष्टों की सेना सम्मुख, पथ दृष्टा बन हाँक रहे हैं ।

लोभी रेवड़ी बाँट रहे हैं ।।४।।

चित्र साभार - https://economictimes.indiatimes.com/



26.7.19

मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा

पतंजलि योग सूत्र के प्रथम पाद समाधिपाद के ३३ वें सूत्र में है यह उल्लेख। कुल १९६ सूत्रों में संकलित यह दर्शन, अन्य आधुनिक दर्शनों की भाँति बुद्धिविलास या शब्द-मृगालजाल नहीं अपितु एक करणीय और अनुभवजन्य प्रक्रिया है। योग के बारे में जितने लोगों से बात की, कुछ को छोड़कर शेष सभी की जानकारी या तो अपरिपूर्ण पायी या एकपक्षीय । वह तो भला हो कि विगत कुछ वर्षों से योग जैसे संस्कृति-रत्न को समुचित प्रचार व मान मिला है नहीं तो योग मात्र कुछ कठिन और जटिल शरीर-मुद्राओं के रूप में जनमानस में प्रचलित था। मेरे लिये और मेरे जैसे अनेकों भारतीयों के लिये कारण एक ही था कि कभी भी हमने मूल पाठ करने का प्रयत्न ही नहीं किया। और जब अन्ततः अर्धज्ञान से विक्षिप्त हो मूलपाठ करना पड़ा तब लगा कि हमें बचपन से संस्कृत क्यों नहीं पढ़ायी गयी, ऐसे रत्नों के बारे में क्यों नहीं बताया गया। केवल १९६ सूत्र, एक दिन से भी कम समय लगता, यदि संस्कृत आती होती या कोई बताने वाला रहता। न मिले अवसरों के बारे में, शिक्षा पद्धति के बारे में, संस्कृति और संस्कृत के बारे में फिर कभी चर्चा।

बीच से सूत्र प्रारम्भ करने से संदर्भरहित स्थिति उत्पन्न होने का भय है अतः प्रथम से ३२ वें सूत्र तक का सारांश रख देना उचित रहेगा। चित्त की वृत्तियों का निरोध योग है। तब दृष्टा अपने स्वरूप में आता है अन्यथा वह वृत्तियों के सारूप्य रहता है। वृत्तियाँ ५ हैं, प्रमाण, विपर्याय, विकल्प, निद्रा, स्मृति। अभ्यास और वैराग्य से वह निरोध आता है। अपनी स्थिति पर यत्नपूर्वक बने रहना अभ्यास है, इन्द्रिय विषयों से वितृष्णा वैराग्य है। प्रकृतिलय और विदेह अभ्यास व वैराग्य की परिपक्व स्थितियाँ है, इनके लिये समाधि सहज है। शेष सबको श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि और प्रज्ञापूर्वक योग सिद्ध करना होता है। या ईश्वर की शरणागति से यह शीघ्र सिद्ध हो जाती है। ईश्वर क्लेश, कर्म, विपाक व आशय से रहित और पुरुषविशेष है। वह सर्वज्ञ, सबका गुरू व काल से अवच्छेद है। ओंकार उसका नाम है। ओंकार जपने से ईश्वर का भाव आता है जिससे ९ चित्तविक्षेप सह ५ विघ्न नष्ट हो जाते हैं।

तत्पश्चात पतंजलि चित्तविक्षेप रोकने हेतु अन्य उपायों की चर्चा करते हैं। एकतत्व अभ्यास चित्त को सप्रयास एक तत्व पर बार बार लगाने को कहते हैं। दूसरा उपाय इस लेख का शीर्षक है। सुखी, दुखी, पुण्यात्मा व पापात्मा से क्रमशः मैत्री, करुणा, मुदिता व उपेक्षा का भाव रखने से चित्त शुद्ध होता है। चित्त को साधने के वर्णित उपाय मुख्यतः आध्यात्मिक, बौद्धिक या शारीरिक  स्तर पर हैं। यह उपाय सामाजिक स्तर पर कार्य करता है। योग को पूर्णतः व्यक्तिगत या आन्तरिक प्रक्रिया मान लेना एक संकुचित दृष्टि है। योग की व्याप्ति पूर्ण है। योगः कर्मषु कौशलम् । श्रीकृष्ण इस तथ्य को उच्चारित करते हैं कि कर्मों में कौशल योग से ही है।

समाज में रहने के कारण कई वाह्य कारक हमें जाने अनजाने प्रभावित करते रहते हैं। किससे किस प्रकार का व्यवहार करना है, यह प्रश्न सदा ही उठता रहता है। सबके प्रति सम व्यवहार न संभव है और न ही उचित। विवेक के अनुसार निर्णय लेना पड़ता है। निश्चय ही स्थितिप्रज्ञता में भौतिक विभेद चित्त को प्रभावित नहीं करते होंगे पर उस स्थिति तक पहुँचने के पहले हमें चित्त को स्थिर करना आना चाहिये, नीर-क्षीर विवेक होना चाहिये। उल्लिखित उपाय समाज से अधिक स्वयं के कलुष दूर करने में सहायक होते हैं।

राग, ईर्ष्या, परापकार, असूया, द्वेष और अमर्ष। ये ६ कालुष्य हैं जो सामाजिक संबंधों को प्रभावित करते हैं। सुख की अनुभूति को पुनः पाने की लालसा राग है। दुख की अनुभूति को पुनः न आने देने की भावना द्वेष है। किसी की प्राप्ति या उपलब्धि पर उसे स्वयं न पाने की वेदना ईर्ष्या है। परिस्थितियाँ मनोनकूल न होने से किसी का अहित करने का भाव परापकार है। किसी के गुण को अन्य दोष आरोपित कर छोटा दिखाने की प्रवृत्ति असूया है। किसी के अपजानजनक वचनों को सुन विचलित हो जाना या सहन न कर पाना अमर्ष है।

सुखी को देखकर मुख्यतः अपने राग या ईर्ष्या के भाव जागृत होते हैं। उसके प्रति मित्रता का भाव रखने से उसकी उपलब्धियों व प्रयासो के प्रति आदर का भाव आता है और आपके राग व ईर्ष्या क्रमशः प्रसन्नता व उत्साह में बदल जाते हैं। किसी दुखी को देखकर उसकी मूर्खताओं पर क्रोध आता है और स्वयं उससे भागने का विचार उत्पन्न होता है। करुणा की भावना क्रोध को सहयोग और सहायता में बदल देती है। पुण्यात्मा को देख कर प्रथमतः असूया होता है। उसकी महानता को छोटा करने का प्रयास हम करने लगते हैं। वह ज्ञानी है किन्तु अभिमानी है, वह तो अपनी प्रतिष्ठा के लिये ही दान करता है। इस प्रकार के निर्णय देकर से हम प्रकारान्तर से स्वयं को श्रेष्ठ दिखाने का प्रयत्न करते हैं। मुदिता का भाव, अच्छे कार्यों को देख कर प्रसन्नता का भाव हमारी तुच्छता को ढेर कर देता है और अच्छे कार्य करने वाले के उत्साह का कारण भी बनता है। इसी प्रकार पापात्मा को देखकर उसके प्रति द्वेष या अमर्ष के भाव न रखते हुये उपेक्षा से उसे महत्वहीन बना देना उचित है। इस बात पर सार्थक चर्चा हो सकती है कि पापात्मा को दण्ड या पीड़ा मिलनी चाहिये। जो सक्षम हैं और जो व्यवस्था के दायित्व में हैं, वे उसको देंगे भी। पर उसके पहले ही पापात्मा द्वारा मचाये उत्पात में शाब्दिक रूप से सम्मिलित हो जाने से उसकी मानसिकता और ध्येय, दोनों ही पुष्ट होते हैं। अतःउन्हें उपेक्षित करना ही उचित है।

शान्तचित्त न केवल समाधि जैसे आध्यात्मिक ध्येयों में सहायक है वरन सामान्य जीवन के कार्यों में अथाह ऊर्जा का स्रोत है। मुझे तो ये चार उपाय योग के व्यवहारिक और करणीय प्रक्रिया के अंगरूप में स्वीकार्य हैं। आपके चित्त की वृत्ति क्या है?

13.7.19

सहसा हृास नहीं होता है

दोष प्रचुर संरक्षण पाते,
आँखें मूंदी जाती होगी,
मति-क्षति-विकृति, ज्ञात नहीं पर,
नित अनगढ़ बढ़ जाती होगी,
धरने और सहन करने के,
आग्रहयुत संवाद उपेक्षित,
संरचना की स्मृति मन में, 
व्यक्तकर्म में रही प्रतीक्षित,
अर्ध-अंधमय क्षय-लय तब,
किञ्चित आभास नहीं होता है,
सहसा ह्रास नहीं होता है।

द्वार खड़ा चेतन प्रहरी है,
दोष कभी धीरे से आते,
आकर्षण तो रहता मन में,
अकुलाते फिर भी सकुचाते,
दोष पनपता, निर्णय अपना,
मन को प्रहरी पर वरीयता,
वर्षों के सत्कृत जीवन पर,
भारी पड़ जाती क्षण-प्रियता,
आहत हो व्याकुल हो जाता,
तब वह पास नहीं होता है
सहसा हृास नहीं होता है।

वैश्विक उत्थानों से गिरकर,
देखो हम अब कहाँ पड़े हैं,
जहाँ जगत संग दौड़ लगानी,
हम दलदल में क्षुब्ध खड़े हैं,
नहीं एक दिन यह कारण,
सदियाँ खोयी अलसायी सी,
वर्तमान हतमान तिरोहित,
दिवास्वप्न में बौरायी सी,
दिशाछलित अवक्षरित पतित पथ,
क्यों विश्वास नहीं होता है?
सहसा हृास नहीं होता है।

श्रेष्ठ और उत्कृष्ट, शब्द दो,
परिचय कर्मशीलता प्रेरित,
कालजयी यात्रा की संतति,
हस्ताक्षर स्पष्ट उकेरित,
प्राप्त बढ़त, आगत संसाधन,
सुविधाओं में मोड़े होंगे,
एक नहीं शत शत नित अवसर,
हमने रण में छोड़े होंगे,
स्थिति यथा टिके रहने का,
क्यों अभ्यास नहीं होता है?
सहसा हृास नहीं होता है।

है हतभाग, वृहद, विस्तृत यह,
मन उद्वेलित नहीं तनिक भी,
कल की भाँति आज संयोजित
उत्कण्ठा भी नहीं क्षणिक सी,
जो है, जैसा, जैसे भी हो,
जीवन जी कर पार कर रहे,
भाग्य सहारे, सर्व बिसारे,
यथारूप स्वीकार कर रहे,
क्षणवत कणवत अवगति पाते,
क्यों मन त्रास नहीं होता है ?
सहसा हृास नहीं होता है।

परत चढ़ाये हम वर्षों से,
विगति बनाये बैठे हैं,
मनस सहस्त्रों दोष छिपाये,
तमस चढ़ाये बैठे हैं,
लज्जा कैसी कह देने में,
मुक्ति नहीं है, अन्य कहीं,
जड़ें अभी गहरी जीवन की,
पुनः प्रखर हों जमें वहीं,
अपने अपनापन तज देते,
जब संवाद नहीं होता है,
सहसा हृास नहीं होता है।