जन-कुबेर-धन के रक्षक बन, जगह जगह बन्दर बैठे हैं ।
अनुशासन का पाठ पढ़ाते, उत्श्रंखल शासन करते हैं ।
बँटा हुआ निश्चित ही भारत, समुचित इन राजाओं में ।
धैर्य धरो, ऐसी आहुतियाँ, डालें जन-आशाओं में ।
पेट पाप से पूर्ण भरा है, मुँह से विद्या बाँच रहे हैं ।
लोभी रेवड़ी बाँट रहे हैं ।।१।।
कागज पर जितनी रेखायें, खिंचती जन-उत्थानों की ।
उतनी भूख स्वतः बढ़ जाती, मैकाले-सन्तानों की ।
निर्देशों की गंगा बहती, मरुथल सी धनहीन धरा ।
धन-धारा ने निश्चय कितने खेतों को परिपूर्ण भरा ।
लघु-कुबेर का आसन खाली, अर्थ-नियन्ता भाग रहे हैं ।
लोभी रेवड़ी बाँट रहे हैं ।।२।।
वही हमारे मार्ग-नियामक, जीवन-सृष्टा, पंथ-प्रकाशक ।
वही दया के उज्जवल तारा, गुणवत्ता के स्थिर मानक ।
वही समस्या जान सके हैं, समाधान भी वे देंगे ।
कलुष-पंक में डूबे मानव-जीवन को भी तर देंगे ।
पद की गरिमा सतत बढ़ाते, ईश्वर खुद को आँक रहे हैं ।
लोभी रेवड़ी बाँट रहे हैं ।।३।।
पीड़ा का कारण खोजा है, जब से अनुसन्धान किये ।
वर्णन कर डाला साधन का, बड़े-बड़े व्याख्यान दिये ।
भूख, गरीबी, रोजगार को पाँच साल में बाँध दिया ।
गुणा-भाग सारे कर डाले, नहीं किन्तु कुछ काम किया ।
पथ-भ्रष्टों की सेना सम्मुख, पथ दृष्टा बन हाँक रहे हैं ।
लोभी रेवड़ी बाँट रहे हैं ।।४।।
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