31.10.12

एक बड़ा था पेड़ नीम का

बचपन की सुन्दर सुबहों का भीना झोंका,
आँख खुली, झिलमिल किरणों को छत से देखा,
छन छन कर जब पवन बहे, तन मन को छूती,
शुद्ध, स्वच्छ, मधुरिम बन थिरके प्रकृति समूची,

आज सबेरा झटके से उग आया पूरा,
नही सलोनी सुबह, लगे कुछ दृश्य अधूरा,
आज नहीं वह पेड़, कभी जो वहाँ बड़ा था,
तना नहीं, ईटों का राक्षस तना खड़ा था,

पत्तों की हरियाली हत, अब नील गगन है,
नीम बिना भी पवन मगन है, सूर्य मगन है,
वही सुबह है, विश्व वही, है जीवन बहता,
आज नहीं पर, हृदय बसा जो तरुवर रहता,

खटक रहा अस्तित्व सुबह का, निष्प्रभ सूरज,
आज नहीं है नीम, बड़ा था, चला गया तज,
किस विकास को भेंट, ढह गया किस कारणवश,
किस लालच ने छीना मेरा प्रात-सुखद-रस,

सबने मिल कर काटा उसको,
बढ़ा लिया टुकड़ा जमीन का,
एक बड़ा था पेड़ नीम का।

27.10.12

डिजिटल जीवनशैली

उपकरण का शाब्दिक अर्थ है, जिसके माध्यम से आपको कार्यों में सहायता मिले। जितनी अधिक सहायता करे, उतना अधिक उपयोगी है उपकरण। आपके डिजिटल जीवन ने आपके लिये एक नया विश्व निर्मित कर दिया है, उस जीवन से जुड़ने के लिये आपको डिजिटल उपकरणों की आवश्यकता होती है। यह एक अलग विषय है कि जीवन का कितना भाग डिजिटल जीवन हो, कई लोग इसे अपनी वर्तमान जीवनशैली और निजता पर एक अनावश्यक हस्तक्षेप मानते हैं, कई लोग इससे एक पल के लिये भी अलग नहीं होना चाहते हैं। यह हो सकता है कि घर आकर मोबाइल बन्द कर देना आपके पारिवारिक जीवन के लिये एक ऊर्जा देने वाला कार्य हो और यह भी संभव है आपके घर से बाहर होने पर वही मोबाइल आपके परिवार के सम्पर्क में सहायक हो, आप निश्चिन्तता से कार्य कर सकें।

जितना भी हो, जिस रूप में भी हो, डिजिटल जीवन का एक निश्चित स्वरूप होता है हर एक के लिये। जब यह प्रारम्भ होता है तब एक दौड़ सी होती है, अधिकाधिक अपना लेने की। धीरे धीरे यह परिवर्धित होता है, परिमार्जित होता, गुणवत्ता पाता है, सीमायें निर्धारित करता है और अन्ततः जीवन का एक अभिन्न अंग बन जाता है। डिजिटल जीवन के जो आधारभूत निर्णय लेने थे, वह ले चुका हूँ, उसे जिस स्वरूप में पहुँचाना था, वहाँ पहुँचा चुका हूँ। अब कोई क्रान्तिकारी आविष्कार जिसकी कल्पना नहीं की है, बस वही कोई परिवर्तन लेकर आयेगा, मेरे डिजिटल जीवन में। इस लेख का आधार मुख्यतः व्यक्तिगत अनुभव है और साथ में वे चर्चायें हैं जो इस विषय में मित्रों और जानकारों के साथ हुयी हैं।

पहले तो यह निश्चित करिये कि जीवन के कौन से पक्ष डिजिटल जीवन को सौंपने हैं, किस मात्रा में और किस गति से। तब यह निश्चित कीजिये कि कम से कम किन उपकरणों से वह संभव है। यदि आपका गाना सुनने की इच्छा है तो देखिये घर में कितने विकल्प उपस्थित हैं। जितने अधिक विकल्प आपने सजा कर रख लिये हैं, डिजिटल जीवन के बारे में आपकी समझ उतनी ही कम है या व्यर्थ करने के लिये उतना ही पैसा अधिक है। हो सकता है कि कई उपकरणों में गाने सुनने की सुविधा हों। यदि ऐसा है तो वह आपकी प्राथमिक आवश्यकता नहीं। इस तरह प्राथमिक उपयोग के उपकरणों के निर्धारण के बाद जो सुविधायें आपको मिलती जायें, उन्हें भी अपनी सूची से हटाते जायें। यह प्रक्रिया कई बार करने से आपके पास कम से कम उपकरण होंगे, सब के सब अधिक महत्वपूर्ण और आपके डिजिटल जीवन को अधिक गुणवत्ता देने में सक्षम।

हिचकिचाहट इस बात की भी हो सकती है कि कौन सा पक्ष डिजिटल जीवन को सौपें, कौन सा नहीं? लगता है कि सहसा सब सौंप दें तो कहीं अव्यवस्था न हो जाये, वहीं दूसरी ओर सावधानी से चलने में मितव्ययता करने में पूरी सुविधायें न मिल पायें और अन्ततः उसी कार्य के लिये एक और उपकरण लेना पड़े। यही वह दुविधा है जहाँ डिजिटल जीवन की समझ बहुत काम आती है, यही वह बिन्दु है जिसे समझने के लिये हमें डिजिटल क्षेत्र में हो रहे बदलाव जानना आवश्यक है। अपनी आवश्यकता और उपकरण की क्षमता का साम्य बिठाना डिजिटल जीवन का आधारभूत नियम है।

कुछ दिन पहले एप्पल के शोरूम में एक जानकार युवा से बात कर रहा था। मेरा प्रश्न बड़ा ही साधारण था। मैं एक ऐसा उपकरण ढूढ़ रहा था, जिसमें लगभग १-२ टेराबाइट की हार्डडिस्क हो, वाईफाई हो, लैन व ब्रॉडबैण्ड से अबाधित सम्पर्क रख सके, टीवी सहित सारे उपकरणों में एक साथ फाइल व मीडिया स्ट्रीमिंग कर सके, लोकल वॉयस मेल रिकॉर्ड करे, टीवी के नियत कार्यक्रम रिकार्ड कर सके और मेरे सारे उपकरणों का बैकअप भी करे। अब बताइये, क्या अधिक मांग कर रहा था, सारी की सारी क्षमतायें तकनीक के पास हैं। हर उपकरण में कुछ न कुछ विशेषता है पर सब का सब बिखरा है और अव्यवस्थित है। हर घर को इस तरह के सर्वर की आवश्यकता है। अभी कोई एक गाना सुनना होता है तो एक अलग रखी हार्डडिस्क की खोज करने लगते हैं, पता लगता है कि पृथु उसमें कोई फिल्म देख रहे हैं। ऐसा सर्वर होने पर जो भी उपकरण आपके हाथ में होगा, उसके माध्यम से आप सारे कार्य कर सकते हैं। जब कभी बाहर जाना हो तो संबंधित फाइलें आदि अपने उपकरण में स्थानान्तरित कर सकते हैं।

इस विषय में मेरी समझ स्पष्ट है, एप्पल ने भी इस तरह का कोई सर्वर विकसित नहीं किया है, पर उस दिन की चर्चा के बाद संभवतः उन्हें उपभोक्ताओं की स्पष्ट समझ के बारे में पता चलेगा। मैं कोई निम्नतर सर्वर खरीद कर अपना धन बर्बाद नहीं करूँगा, प्रतीक्षा करूँगा कि इस तरह का कोई सर्वर बाजार में आये। घर के अन्दर के सारे उपकरण एक विश्व में जियें, आपस में बातचीत करें, एक ही स्रोत से इण्टरनेट लें और एक ही स्थान पर अपने संग्रह रखें। हर व्यक्ति के लिये कम से कम दो उपकरण और चार पाँच सामूहिक उपयोग के उपकरण, लगभग १०-१२ उपकरण अलग अलग दिशाओं में नहीं हाँके जा सकते, उन्हें एक विश्व के अन्दर लाकर व्यवस्थित करना डिजिटल जीवन की आवश्यकता है। ऐसा करने से न केवल उपकरणों की संख्या कम हो जायेगी, वरन उपकरण सरल और सस्ते भी हो जायेंगे।

अपना उदाहरण देने का मन्तव्य आपको भ्रमित करने का नहीं, वरन आपको आपकी आवश्यकतायें इस प्रारूप में सोचने के लिये विवश करने का था। तकनीक आपके वर्तमान कार्यों को किस प्रकार सरल करने में सक्षम है और उसे पाने के लिये कौन सा उपकरण आपके लिये सर्वोत्तम है, यह प्रश्न कठिन नहीं है। फोटो, वीडियो, संगीत, फिल्में, टीवी कार्यक्रम, ये सब मीडिया के अन्तर्गत आते हैं, ये बहुत मेमोरी लेते हैं और मुख्यतः घर पर ही उपयोग में लाये जाते हैं। इन सबको हर जगह ले जाने की आवश्यकता भी नहीं, इनमें से कुछ ही ऐसे होते हैं जो हमें अत्यन्त प्रिय होते हैं और जिन्हे हम खाली समय होने पर सुनना या देखना चाहते हैं। ऐसे मीडिया को हम अपने उपकरणों में रख सकते हैं और समय समय पर उसे बदल भी सकते हैं। उन्हें इण्टरनेट पर रखने का कोई औचित्य नहीं है, क्योंकि समय आने पर यदि डाउनलोड करना पड़ा तो समय बहुत अधिक लगेगा।

मीडिया फाइलों के अतिरिक्त आपके पास जितना भी डिजिटल संग्रह है, वह सब मिलाकर ८-१० जीबी से अधिक नहीं होगा। सारे प्रपत्र, आलेख, टेबल्स, प्रस्तुतियाँ, लेख, कार्यसूची, संपर्क, तिथियाँ, कार्यवृत्त, सब का सब किसी भी उपकरण में आ जायेगा, साथ ही साथ इण्टरनेट पर भी रहेगा, किसी क्लाउड सेवा के माध्यम से। पर ये सब जितने भी उपकरणों में हो, परस्पर सामञ्जस्य बनाये रखें। ऐसा नहीं होने पर अधिक उपकरण आपका बोझ ही बढ़ायेंगे, कम करने की बात तो बहुत दूर की होगी। इन दो प्रकार के पक्षों में डिजिटल जीवन को विभक्त कर उनमें किस प्रकार के उपकरणों को लाना है और उनसे किस प्रकार पूरा कार्य लेना है, यह आपके डिजिटल जीवन की सफलता है।

उपकरण का पूरा उपयोग ही उसका मूल्य है, यदि वह नहीं हो पाया तो आपका डिजिटल जीवन या तो तरंग में जी नहीं पा रहा है या बहुत अधिक खर्च करके पछता रहा है। आपकी डिजिटल जीवनशैली क्या कहती है?

24.10.12

लैपटॉप या टैबलेट - तकनीकी पक्ष

जीवन में लैपटॉप की आवश्यकता सबसे पहले तब लगी थी, जब कार्यालय और घर के डेस्कटॉपों पर पेनड्राइव के माध्यम से डाटा स्थानान्तरित करते करते पक गया था। लैपटॉप आने से दोनों डेस्कटॉप मेरे लिये अतिरिक्त हो गये। लैपटॉप की और छोटे होने की चाह बनती ही रही, कारण रहा, उस १५.६ इंच के लैपटॉप को ट्रेन यात्रा और कार यात्रा के समय अधिकतम उपयोग न कर पाने की विवशता। १२ सेल की बैटरी के साथ लगभग ४ किलो का उपकरण सहजता से यात्रा में उपयोगी नहीं हो सकता था। बैठकों में भी १५.६ इंच का लैपटॉप अपने सामने रखना अटपटा सा लगता था, लगता था कि कोई और व्यक्ति सामने आकर बैठ गया हो। अन्ततः वह लैपटॉप दो डेस्कटॉपों के स्थानापन्न के रूप में बना रहा।

मेरी यह चाह संभवतः तकनीक की भी राह रही, बहुतों को यही समस्या रही होगी, बहुत लोग लैपटॉप का उपयोग और अधिक स्थानों पर करना चाहते होंगे। १० इंच की छोटी स्क्रीन की ढेरों नेटबुक बाजार में आयीं, पर बाधित और सीमित क्षमता के कारण अपना समुचित स्थान नहीं बना पायीं। लैपटॉप की क्षमता एक मानक बन चुकी थी और कोई उससे कम पर सहमत भी नहीं था। १३ इंच के कई लैपट़ॉप बड़ी संभावना लेकर आये, पर उसमें भी भार अधिक कम नहीं हुआ, हाँ छोटी स्क्रीन पर अधिक न समेट पाने के कारण कार्य करने पर आँखों को बड़ा कष्ट सा होता रहा। जूम करना, विण्डो बदलना आदि ढेर सारे कार्य करने के लिये माउस से हैण्डल ढूढ़ना बड़ा कष्टकर कार्य हो जाता था।

तकनीक अपने रास्ते ढूढ़ ही लेती है। हार्डड्राइव, बैटरी, चिप, स्क्रीन आदि क्षेत्रों में गजब का विकास हुआ और जो उत्पाद सामने आया, उनका नामकरण अल्ट्राबुक्स हुआ। मैकबुक एयर की डिजायन एक मानक बन गयी, जिस पर अन्य मॉडल आधारित होने लगे। ११.६ और १३ इंच की स्क्रीन, वजन १.० और १.३ किलो। इससे हल्के लैपटॉप पहले कभी नहीं बने थे। उन्हे तो चलते चलते भी उपयोग में लाया जा सकता है, एक हाथ से उठा कर दूसरे हाथ से टाइप किया जा सकता है।

लैपटॉप में टचपैड ने माउस का प्रयोग लगभग समाप्त ही कर दिया था, पर उपयोग की दृष्टि से टचपैड का स्क्रीन पर पूर्ण नियन्त्रण उसके बड़े होने और बहुआयामी कार्य करने से आया। पिंच जूम, सरकाना, पलटना, पिछले पृष्ठ पर जाना, नयी विण्डो खोलना आदि टचपैड से होने लगा, स्क्रीन का सारा नियन्त्रण विधिवत रूप से ऊँगलियों से ही होने लगा। इसका सीधा प्रभाव यह पड़ा कि ११.६ इंच की छोटी स्क्रीन भी गतिशील और बड़ी लगने लगी।

स्क्रीन को छोटा और भार को कम करने में भौतिक कीबोर्ड एक बाधा था, जगह घेरता था और भारी होता था। उन्हे हटा कर स्क्रीन में ही छूकर कार्य करने की तकनीक ने टैबलेट को जन्म दिया। १० इंच का टैबलेट पर्याप्त लगा, सारे कार्य निपटाने में। इस प्रयास में भार और आकार तो कम हो गया पर दो विकार अनचाहे ही आ गये। एक तो ओएस अपनी पूर्ण क्षमता से रहित हो गया और दूसरा स्क्रीन का आकार कीपैड के कारण और सीमित हो गया। १० इंच का टैबलेट ६०० ग्राम के आसपास सिमट आया, कहीं भी ले जाने के लिये सुविधाजनक।

श्रीमतीजी के आईपैड में कई बार प्रयास किया कि कम से कम एक पोस्ट के बराबर लेखन करें। कीपैड के माध्यम से टाइप करने से न तो वह गति आयी और न ही वह सहजता जो मेकबुक एयर के चिकलेट कीबोर्ड से मिलती है। संभवतः ऊँगलियाँ इस तरह टाइप करने की अभ्यस्त ही नहीं हैं। एक अलग भौतिक कीबोर्ड लेने से और टैबलेट की स्क्रीन को बचाने का कवर लेने से, टैबलेट का भार और आकार लगभग मैकबुक एयर के बराबर ही हो जाता है, सम्हालने में मैकबुक एयर से कहीं अधिक कठिनाई के साथ। मैकबुक एयर बन्द करते ही पूरी तरह सुरक्षित हो जाती है।

यही कारण रहे कि हमने मैकबुक एयर को आईपैड के ऊपर चुना, पूरी क्षमता और सबसे हल्का। चर्चा में है कि बाजार में विण्डोज ८ पर आधारित टैबलेट आने वाला है, उसमें लैपटॉप की क्षमता रहेगी। ऐसे टैबलेट का भार और आकार निश्चय ही उत्सुकता का विषय रहेगा। बहुत लोग जो अधिक लेखन आदि नहीं करते हैं, उनके लिये हल्के टैबलेट बड़े लाभदायक हो सकते हैं, पर मेरे लिये लैपटॉप से अधिक उपयोगी कुछ भी नहीं है। मैकबुक एयर के रूप में सर्वश्रेष्ठ लैपटॉप का अनुभव अत्यन्त संतुष्टिपूर्ण रहा है। श्रीमतीजी अपने आईपैड से अत्यन्त प्रसन्न हैं, उनकी आवश्यकता के लिये टैबलेट ही सर्वोत्तम है।

यदि टैबलेट के विषय में कोई एक पक्ष है जो सर्वाधिक सशक्त लगता है, तो वह है इसकी बैटरी। लगभग दुगना समय टैबलेट चलता है। अधिक क्षमता के यन्त्र अधिक ऊर्जा लेते हैं, यही कारण है कि हमें अधिक ऊर्जा खपानी पड़ती है। लैपटॉप आधारित उपकरणों पर जीवन बीतने से टैबलेट थोड़ा सकुचाया सा दिखता है, पर कुछ एक कार्यों को छोड़ दें तो टैबलेट लैपटॉप के सारे कार्य कर सकता है। घर में यदि एक लैपटॉप है तो अन्य लोग टैबलेट से काम चला सकते हैं। टैबलेट लैपटॉप की तुलना में अधिक सस्ता भी होता है। यदि एक घर के सारे उपकरणों को एक पारितन्त्र के रूप में कार्य करते हुये समझें तो, एक लैपटॉप का पहले से होना टैबलेट के लिये मार्ग प्रशस्त करता है।

मोबाइल के दृष्टिकोण से भी देखा जाये तो अधिक शक्तिशाली मोबाइल टैबलेट के ढेरों कार्य कर सकता है, पर आकार छोटा होने के कारण वही कार्य करने में उतनी सहजता नहीं आ पाती है। कार में जाते समय या रसहीन बैठकों में बैठे हुये मोबाइल से न जाने कितने कार्य हो जाते हैं। यह मानकर चलता हूँ कि कोई याद आयी पंक्ति या विचार छूट न जाये और एक भी पल व्यर्थ न जाये, मोबाइल इन दोनों स्थितियों में उत्पादकता बनाये रखता है। आईक्लाउड के माध्यम से प्रयासों में सततता भी बनी रहती है।

अनुभव और तकनीक के आधार पर मैकबुक एयर और आईफोन की जोड़ी मेरे लिये पर्याप्त है और उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रही है। अब इन दो उपकरणों के आधार पर कार्यशैली और जीवनशैली किस प्रकार विकसित हो रही, यह अगली पोस्ट का विषय रहेगा। 

20.10.12

लैपटॉप या टैबलेट - अनुभव पक्ष

पता नहीं जो लोग ढेरों पैसा कमा लेते होंगे, वे अपनी वसीयत कैसे लिखते होंगे, बड़ा ही कठिन कार्य है यह, पहले संग्रहण करो फिर बाँट दो। हम तो एक एक संग्रह में पसीना बहा देते हैं, खरीदने के पहले ही उसके निस्तारण का निर्णय लेना पड़ता है। ऐसा ही कुछ हमारे घर में भी हुआ, बड़ी रोचकता से भरा, संभवतः सबके साथ कुछ ऐसा ही होता होगा।

हम मैकबुक एयर और आईफोन खरीद चुके थे और अपने घर में ही विकसित देशों के नागरिक की तरह रह रहे थे। घर के शेष तीन लोग पुराने उपकरणों के साथ थे और स्वयं को विकासशील देश के नागरिक की तरह समझ रहे थे। वितरण इस प्रकार था, डेस्कटॉप व पुराना आईपॉड बच्चों के हिस्से में, हमारे द्वारा मुक्त किया गया तोशीबा का लैपटॉप व ब्लैकबेरी का मोबाइल श्रीमतीजी के हिस्से में और एप्पल के दो नवीनतम उत्पाद हमारे हिस्से में। वितरण आवश्यक था, नहीं तो सबको एक साथ ही एक उपकरण में कार्य करने की सूझती है।

लगा था कि वितरण बड़े ही न्यायप्रिय दृष्टि से हुआ है, न केवल शान्ति बनी रहेगी वरन प्रसन्नता भी बिखरेगी। ऐसा नहीं हुआ, हमारे घर में ही हमारे विरुद्ध विरोध के स्वर उठने लगे। अपने लिये तो इतना अच्छा ले लिया, हम लोगों के लिये पुराना, यह डेस्कटॉप कितनी आवाज करता है, हमारा सिस्टम कितने धीरे चलता है, आप तो घर में कभी भी बैठ कर काम कर लेते हैं, आदि आदि। हमें लगने लगा कि एक स्थिति बन रही है जिसमें घर का मुखिया अपने लिये सारी सुविधायें रख कर औरों को उनसे वंचित रखता है। हमारा ग्लानि भाव धीरे धीरे बढ़ने लगा, उससे बाहर निकलना आवश्यक था।

विकल्प अधिक नहीं थे। निर्णय लिये जाने आवश्यक थे, पर इस बार ऐसा कोई निर्णय नहीं लेना चाहता था, जिससे असंतुष्टि बनी रहे, निर्णय में सबको सहभागी बनाना आवश्यक था। बहुत सोच विचार कर एक प्रस्ताव हमने परिवार-परिषद में रखा। बहुत कम होता है कि लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सब प्रसन्न रहें, किसी एक का हित साधा जाता है तो दूसरा रूठ जाता है। बहुत कम ही ऐसे समाधान होते हैं, जो सबको अपना सा लगे। सीमित संसाधन होते हैं और सबको बांटे भी नहीं जा सकते हैं।

निश्चय किया गया कि एक आईपैड ले लेते हैं और डेस्कटॉप को विदा कर देते हैं। डेस्कटॉप बहुत ऊर्जा खा रहा था, तुलना की जाये तो उसी कार्य के लिये लगभग २० गुना। हम मैकबुक एयर और आईफोन रखे रहेंगे, श्रीमतीजी को आईपैड और ब्लैकबेरी और बच्चों को तोशीबा का लैपटॉप व आईपॉड। यही नहीं, इस बात का भी निर्णय लिया गया कि चार वर्ष बाद जब हमारा मैकबुक एयर और आईफोन पृथु को मिलेंगे, श्रीमतीजी के उपकरण देवला को मिलेंगे, हम लोग तब तकनीक के नये प्रयोग पुनः प्रारम्भ करने के लिये स्वच्छन्द रहेंगे। अगले चार वर्षों में तोशीबा का लैपटॉप ९ वर्ष का जीवन जी लेगा और आईपॉड भी लगभग ७ वर्ष की उपयोगिता निभा जायेगा, उसके बाद दोनों सेवानिवृत्त हो जायेंगे। उत्तराधिकार नियत करने से बच्चों को हमारे उपकरणों से लगाव हो चला है, विरोध के स्वर भी शमित हो गये हैं और भविष्य में और आधुनिक उपकरण लेने के लिये निश्चयात्मकता भी हो गयी है।

मूल प्रश्न अभी भी वहीं टँगा है कि लैपटॉप या टैबलेट। यद्यपि जिस समय मैंने मैकबुक एयर लिया था, उस समय पर्याप्त समय दिया था और विश्लेषण किया था, यह निर्धारित करने के लिये कि लैपटॉप लें या टैबलेट, और वह भी किस कम्पनी का। उस समय शोरूम में ही जाकर दोनों का अनुभव लिया था, तब भार की दृष्टि से, धन की दृष्टि से, सम्हालने की दृष्टि से, कार्य विशेष की दृष्टि से, हर प्रकार से यही निर्णय लिया कि मैकबुक एयर ही लेना है। तब समय भी कम था और विश्लेषण बौद्धिक अधिक था, व्यवहारिक कम। अब जब घोर पारिवारिक कारणों से आईपैड भी घर में आ गया है और लगभग ७ माह का अनुभव दे चुका है, दोनों की तुलना अपना रंग बदल चुकी है, कुछ तथ्य नये आये हैं और कुछ पुराने तथ्य गलत सिद्ध हुये हैं। साथ ही साथ मोबाइल की उपस्थिति ने विश्लेषण को एक नयी गहराई दी है।

लैपट़ॉप, टैबलेट और स्मार्टफोन, तीनों रखने का कोई औचित्य नहीं है, पर केवल दो से भी पूरा कार्य नहीं चल सकता है। यह वाक्य भ्रमित करने वाला लग सकता है, पर इसके पीछे कारण है, एक द्वन्द्व छिपा है, एक दर्शन छिपा है। यदि आप गतिमय रहेंगे तो सारी क्षमतायें ढोकर नहीं चल सकते। मोबाइल फोन गतिमयता का प्रतीक है, लैपटॉप क्षमताओं का। टैबलेट दोनों के बीच का है, इसमें गतिमयता भी है और क्षमता भी, पर समय पड़ने पर दोनों के कई कार्य नहीं कर पाता है।

यदि आपके पास तीनों है तो कुछ न कुछ अतिरिक्त है, लगभग २० प्रतिशत। यदि आपके पास केवल लैपटॉप और मोबाइल है तो आपका कुछ न कुछ छूट रहा है, लगभग २० प्रतिशत। तीनों उपकरण लेकर न केवल आप अधिक धन खर्च करेंगे वरन तीनों के सामञ्जस्य के लिये ढेरों समय भी व्यर्थ करेंगे, भ्रम बना रहेगा और सततता बाधित होगी, वह भी अलग से। लेकिन दो उपकरण होने पर भी आपको २० प्रतिशत उपयोगिता की रिक्तता अपनी ओर से भरनी पड़ती है। यह रिक्तता भी तीन तरह से भरी जा सकती है या तीसरे उपकरण का आंशिक उपयोग करके, या अपनी आदतों में बदलाव लाकर या उन्नत तकनीक अपना कर। तीनों को उदाहरणों से स्पष्ट करना आवश्यक है।

श्रीमतीजी के पास टैबलेट और मोबाइल है, उनका लगभग सारा कार्य गतिमयता से हो जाता है। लगभग २० प्रतिशत कार्य छूटता है, बड़ी फिल्में नहीं देख पाती हैं, फोटो आदि नहीं सहेज पाती है, गाने इत्यादि डाउनलोड नहीं कर पाती हैं, १६ जीबी से अतिरिक्त कुछ सहेजने के लिये उन्हें सोचना पड़ता है, हम पर या बच्चों पर निर्भर रहना पड़ता है। उन्हें संकोच नहीं होता है, हम सब भी उन्हें तकनीक सिखाने को तत्पर रहते हैं, वह तीसरे उपकरण का आंशिक उपयोग करके अपना कार्य चला लेती हैं।

दूसरी श्रेणी में हमारे एक मित्र हैं, घर में एक बड़ा सा लैपटॉप है और हाथ में औसत से अधिक क्षमता का मोबाइल। गतिमयता का पर्याप्त कार्य मोबाइल से कर लेते हैं, ईमेल देख लेते हैं, फेसबुक स्टेटस चेक कर लेते हैं, छोटे मोटे नोट्स भी लिख लेते हैं। घर पहुँचकर ही वे अपने शेष कार्य कर पाते हैं, ब्लॉग पर टिप्पणी करना, लेख लिखना, शोध करना। उन्होंने अपनी आदतों में यह बसा लिया है कि कब क्या करना है? जो २० प्रतिशत की यह रिक्तता है, वह उससे संतुष्ट हैं।

तीसरी श्रेणी में हम जैसे लोग आते हैं। हम न तो किसी पर निर्भर रहना चाहते हैं और न ही अपनी आदतों में ही कोई बदलाव लाना चाहते हैं। हम २० प्रतिशत की रिक्तता तकनीक से भरना चाहते हैं। एक ऐसा लैपटॉप ढूढ़ते हैं जो पूरी क्षमता का हो, हल्का हो और कहीं भी ले जाया जा सके। साथ ही साथ एक ऐसा मोबाइल जो सारे कार्य करने में सक्षम हो, क्षमताओं से भरा हो। हर कम्पनी के नये मॉडल इसी दिशा में आ रहे हैं और अधिक मँहगे भी हैं। धन व्यय करना तभी करना चाहिये जब हम में उन उपकरणों की पूरी क्षमता निचोड़ने की इच्छाशक्ति हो।

तीसरी श्रेणी के समक्ष उपस्थित विकल्पों और तकनीक से जुड़े पहलुओं पर चर्चा अगली पोस्ट में।

17.10.12

लैपटॉप या टैबलेट - निर्णय प्रक्रिया

इस प्रश्न से होकर निकला हूँ और निर्णय के बाद एक वर्ष का समय मिला है यह समझने के लिये कि जो निर्णय लिया, वह अपनी अपेक्षाओं पर खरा उतरा कि नहीं? प्रश्न बस यही था कि लैपटॉप लें या टैबलेट या दोनों? अनुभव के आधार पर इसका उत्तर समझने के लिये इसमें एक विमा और जोड़ देते हैं, मोबाइल की, क्योंकि बिना उसको परिधि में लिये उत्तर पूरा नहीं होगा। पर उस निर्णय के पहले अनुभव और समझ के क्या आधार निर्मित हुये हैं, यह समझना और उसे व्यक्त करना मेरे लिये आवश्यक हो चला है।

बड़ी लम्बी डिजिटल यात्रा रही है, अब तक की, १९८५ में कम्प्यूटर, १९९५ में डेस्कटॉप, २००३ में मोबाइल, २००७ में लैपटॉप। यदि किसी विषय में मन स्थायी लगा रहा तो यही एक डिजिटल व्यसन रहा है। जी भर के प्रयोग किये हैं, जी भर के धन खर्च किया, जी भर कर समय न्योछावर किया और यदि माताजी के शब्दों में कहूँ तो, 'वैसे तो लड़का शान्त रहता है पर इलेक्ट्रॉनिक सामान देख कर पगला जाता है।' व्यसन होते ही ऐसे हैं जो न तो समझे जा सकते हैं और न ही समझाये जा सकते हैं, पर तकनीक के अग्रतम द्वार पर बैठकर विश्व को देखना सदा ही मन को लुभाता रहा है। संग्रह जुटाते समय बस यही दर्शन रहा है कि जीवन में वस्तुयें कम से कम हों पर जो भी हों, अपनी श्रेणी में श्रेष्ठतम हों।

सलाह भी सदा यही देता हूँ। आवश्यकता के अनुसार यदि कोई निम्नतर वस्तु लेंगे तो तकनीक का अधिकतम लाभ नहीं ले पायेंगे। तकनीक न केवल आपके वर्तमान कार्यों को सरल करने के लिये है, वरन उन कार्यों को नये ढंग से करने के लिये भी है। यदि आवश्यकता के अनुसार मोबाइल का उपयोग करते तो उससे अभी तक फोन ही कर रहे होते। किसी भी उपकरण का उपयोग उसकी क्षमतानुसार करना चाहिये। देशी भाषा में कहा जाये तो अभी तक जितने भी उपकरण लिये हैं, उनसे पूरा पैसा वसूल लिया है, पूरा रगड़ कर उपयोग किया है। उपकरणों का आग्रह मेरे लिये न केवल रोचकता का आश्रय रहा है, वरन उपयोगिता के दर्शन का जीवन में प्रक्षेपण भी।

बिना इन उपकरणों के जीवन चल ही रहा था, न उतना गतिमय, न उतना विस्तारित, पर फिर भी चल ही रहा था। लोगों से बात होती थी, फिल्में देखने सिनेमाहॉल जाते थे, रामलीला देखने को मिलती थी, गाने भी सुनने को मिलते थे, पुस्तकें अल्मारियों में थीं, मोहल्ले भर में संवाद होता था, गर्मी की छुट्टियों में संबंधियों के घर आना जाना होता था। तकनीक ने सहसा हमें सुझाया कि अपने भौतिक परिवेश के परे भी सतत संवाद संभव है। हमने स्वीकार कर लिया और गढ़ने लगे एक ऐसा विश्व जिसमें सब कुछ तरंगों पर चलता था, सब कुछ कहीं भी रखा जा सकता था, कोई सीमा नहीं, कोई बंधन नहीं।

उत्साह संक्रामक होता है, सब कुछ इस नवनिर्मित विश्व में समेट लेने का उत्साह सर चढ़ बोला, धीरे धीरे माध्यम बदलने लगे, हर संभव वस्तु नये विश्व पहुँचने लगी। पत्र, पुस्तक, ज्ञान, संगीत, फिल्म आदि अपना रूप बदलने लगे, सिकुड़कर नये विश्व पहुँच गये। माध्यम बदलने से व्यवसायों का स्वरूप बदलने लगा। सब अधिक गतिमय हो गया। गतिमयता अधिकता का आधार लायी, हर क्षेत्र में अधिक लोगों की उपस्थिति ने गतिमयता को और ऊर्जामय कर दिया। अब स्थिति यह है कि सीमायें नगण्य हैं, संभावनायें असीमित हैं, नियन्त्रण सिमट कर आपके सामने रखी स्क्रीन तक आ गया है।

इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो आधुनिक मनुष्य अपनी बाध्यताओं से परे जीना चाहता है, कोई बंधन नहीं। हम भी कुछ ऐसा ही स्वप्न देखना चाहते हैं। मेरे लिये इस नये विश्व के दो ही आधारभूत बिन्दु हैं। पहला, प्रयासों की सततता बनी रहे। अर्थ यह कि हाथ में जो भी उपकरण रहे उसके माध्यम से मैं अपना कोई भी कार्य कर सकूँ और यदि कहीं पहुँच कर उपकरण बदले तो थोड़ी देर पहले किये प्रयास व्यर्थ न जायें या उन प्रयासों को उपकरणों के बीच स्थानान्तरित करने में समय व्यर्थ न हो। दूसरा, किसी भी स्थान विशेष का बन्धन न हो, हर स्थान से कार्य करने की सहजता हो। एक लेखक के रूप में देखूँ तो कहीं भी लिख सकूँ, किसी पुराने लेख को संपादित कर सकूँ, कहीं भी कुछ पढ़ सकूँ और किसी भी उपकरण में ये उपरोक्त काम कर सकूँ। एक प्रशासक के रूप में तन्त्र की स्थिति पर दृष्टि, उससे संबंधित विषयों को पढ़ सकने या पुराने संदर्भों को टटोल सकने की सुविधा और अन्ततः निर्णय लेने और उसे प्रेषित करने की सुविधा। उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है कि एक लेखक से प्रशासक और प्रशासक से लेखक के बीच अपने को त्वरित स्थापित कर लेने की सुविधा, कहीं पर भी, कभी भी।

ऐसा लग सकता है कि कुछ अधिक ही माँग रहा हूँ तकनीक से। तकनीक यदि सक्षम नहीं होती तो संभवतः यह अपेक्षायें रखता ही नहीं। हमारी अपेक्षायें ही तकनीक की दिशा निर्धारित करती हैं, नये उत्पाद को बनाने वालों के मन में यही आधार रहता होगा कि किस तरह चाँद लाकर धरती पर रख दिया जाये। इसीलिये सबको सलाह भी देता हूँ कि उपकरण की क्षमता पहचान कर अपने काम करने की विधि में बदलाव लाओ, प्रयोग करो, सफल न हो तो प्रयोग परिमार्जित करो, फिर भी असफलता लगे तो उससे कुछ सीख कर नये प्रयोगों में लग जाओ।

जब इस समग्रता से उपकरणों को देखा जायेगा, तब ही उनकी उपयोगिता आपके जीवन को सार्थकता से प्रभावित करेगी। तकनीक को जीवन के कई पक्षों में समाहित करने का ही उत्साह है जिसे माताजी हमारे पगलाने का कारण मान लेती हैं। तकनीक का समावेश जीवन में अधिकतम हो, इसके लिये अपने लिये कई कठिन नियम नियत कर लिये थे और उनका अब तक यथासंभव अनुपालन भी कर रहा हूँ।

कागज में कुछ भी नहीं लिखता हूँ, सुबह परिचालन संबंधी तथ्य लिखने हों, बैठक के समय निर्देश लिखने हों, कार्यों की समीक्षा करनी हो, लेखन करना हो, कोई पंक्ति लिखनी हो, कोई कार्य याद रखना हो, सब का सब सीधा मोबाइल या लेपटॉप पर। २००३ के पहले का समय कागज से भरा पूरा था, कोई कार्य न जाने कितने कागजों में झलकता था, संपादित करने में न जाने कितने कागज शहीद हो जाते थे। धीरे धीरे यह लगा कि तकनीक कागज को पूर्णतया बचाने में सक्षम है, विधियाँ विकसित होती गयीं और अब सब सहज हो गया है। निरीक्षण रिपोर्ट मोबाइल पर ही टाइप हो जाती है और ईमेल से प्रेषित भी। दूसरा छोर भी विकसित होने पर अनुपालन रिपोर्ट भी डिजिटल माध्यम से आने लगेगी। मुझे यह भी याद नहीं आता है कि तीन वर्ष की ब्लॉग यात्रा में कभी कागज में कुछ लिखा हो, सब का सब मोबाइल पर या लैपटॉप पर।

बहुत प्रयोग हो चुके हैं, बहुत होने शेष हैं, पर ध्येय पूर्णतया स्पष्ट है। तकनीक के श्रेष्ठतम पक्षों का उपयोग करना है, न केवल वर्तमान कार्यों को सरलता से करने के लिये, वरन नयी विधियों से करने के लिये भी। दिशा उलझाने वाली नहीं, सुलझाने वाली होगी। उपकरण एक भार नहीं, हल्कापन लाने के लिये होंगे। जीवन में जटिलता नहीं, सरलता स्थापित करनी है।

लैपटॉप या टैबलेट के निर्णय में यह सारे पक्ष अपना अपना महत्व रखेंगे, वह अगली पोस्ट में।

(इस विषय के उत्प्रेरक ईपंडित श्रीश बेंजवाल शर्माजी रहे हैं। तकनीक संबंधी विषयों को स्पष्ट कर, सबको समझाने में उनके अथक प्रयास ब्लॉग के इतिहास में अपना स्थायी स्थान बनायेंगे।)

13.10.12

पुस्तकें बुलाती हैं

पुस्तकों से एक स्वाभाविक लगाव है। किसी की संस्तुति की हुयी पुस्तक घर तो आ जाती है, पर पढ़े जाने के अवसर की प्रतीक्षा करती है। मन में कभी कोई विचार उमड़ता है, प्यास बन बढ़ता है, स्पष्ट नहीं हो पाता है। आधी लगी दौड़ जैसी, जब अभिव्यक्ति ठिठकने लगती है और लिखने के लिये कुछ सूझता नहीं है, तब लगता है कि अन्दर सब खाली हो चुका है, फिर से भर लेने की आवश्यकता है। एक पुस्तक उठा लेता हूँ, पढने के लिये, या कहें कि लेखक से बतियाने लगते हैं। पहले बैक कवर पढ़ते है, फिर प्रस्तावना, फिर विषय सूची, उत्सुकता बनी रही तो कुछ अध्याय भी। धीरे धीरे यही क्रम बन गया है, बहुत कम ही ऐसा हुआ है कि प्रारम्भ में रुचिकर लगी पुस्तक अन्त में बेकार निकली हो।

संस्तुति की गयी सीमित पुस्तकों में यह संभव है। उन पुस्तकों के नाम मोबाइल में रहते हैं, कभी पुस्तकों की दुकान जाना हुआ तो, वहाँ ढूढ़कर पढ़ लेते हैं। बंगलोर में यह बात बहुत ही अच्छी है कि तीन बड़े बुकस्टोर, रिलायंस टाइमआउट, क्रॉसवर्ड और लैण्डमार्क, तीनों में ही बैठकर पढ़ने की सुविधा है, शान्ति भी रहती है और कॉफी भी रहती है, आप अधिक समय तक बैठकर पढ़ सकते हैं, कोई भी आपको जाने को नहीं कहेगा, विशेषकर जब आप बहुधा वहाँ जाते हों। साप्ताहिक खरीददारी करने के क्रम में डिजिटल स्टोर और बुक स्टोर नियमित पड़ाव रहते हैं। समय कम रहा तो संस्तुति की गयी तीन चार पुस्तकें ही पढ़ पाता हूँ, अधिक समय मिलता है तो आठ दस पुस्तकें और पलट लेता हूँ। हाँ, टटोलने का क्रम वही रहता है, बैक कवर से। यह अनुभव बड़ा ही अच्छा लगता है, उन दुकानों की तुलना में, जहाँ एक एक पुस्तक माँगने पर दुकानदार आपको भारस्वरूप देखते हैं और पुस्तकें अनमने भाव से आपके सामने फेंक दी जाती हो। दो तीन से अधिक पुस्तकों के बारे में पूछने लगिये तो आपसे यह प्रश्न पूछ ही लिया जाता है कि खरीदने के लिये पैसे भी हैं जेब में?

जहाँ यह सुविधा होती है, वहाँ उसका पूरा लाभ उठाने वाले कई लोगों को यह लग सकता है, कि जब यहीं आकर पढ़ा जा सकता है, तो पुस्तक खरीदने की क्या आवश्यकता है? विचार आने से रोका नहीं जा सकता है। जब अभी तक पुस्तकों को किसी रत्न या हीरे की तरह किसी पुस्तकालय या दुकान में सजा देखा हो, तो यह विचार आने की संभावना और भी बढ़ जाती है। हमारे साथ भी ऐसा हुआ, जब पहले पहले यह सुविधा मिली तो कुछ पुस्तकों के बीस तीस पन्ने वहीं पर बैठकर पढ़ डाले। लगा कि ढेरों पैसे बचा लिये, दुकान को लूट लिया। अब तीन साल बाद देखता हूँ कि पुस्तकों के संग में रहने का नशा बहुत मादक होता है, एक बार लगता है तो छूटता नहीं है। यदि उन दुकानों में बैठकर पढ़ने का अवसर नहीं पाया होता, तो इतनी पुस्तकें खरीदकर घर में नहीं लाता। लगभग हर बार यही हुआ कि कोई न कोई पुस्तक लेकर घर आ गया। अब लगता है कि इन लोगों ने चखा चखा के हमें ही लूट लिया।

बचपन में विद्यालय से जब घर आता था तो घर में बहुधा कोई नहीं मिलता था, बस समय बहुत मिलता था। भरी दुपहरियाँ, बाहर जाकर खेलना कठिन, बस पुस्तकें ही सहारा बन कर रहती थीं। पुस्तकें पढ़ने का क्रम तभी से चल पड़ा। पहले तो घर में रखी सारी साहित्यिक पुस्तकें पढ़ लीं, कहानी के रूप में लिखे ग्रन्थ पढ़ डाले, सोवियत संघ से आने वाली कई मैगज़ीन पढ़ डालीं और जब धीरे धीरे ये समाप्त हो चलीं तो अपने चाचाजी द्वारा पढ़े गये और सहेजे गये ढेरों जासूसी और चटपटे सामाजिक उपन्यास पढ़ डाले। जीवन में उतना निश्चिंत समय फिर कभी नहीं मिला। दस वर्ष की अवस्था में न यह ज्ञान था कि क्या पठनीय है, भारी भरकम तर्कों का क्या अर्थ है, और किस पुस्तक का क्या महत्व है? बस पढ़ते गये, एक नशा सा समझ कर चढ़ाते गये, एक परमहंसीय मानसिकता से पुस्तकें पढ़ीं तब।

धीरे धीरे अनुभव आया, अच्छी पुस्तकों के बारे में पता चला, किन पुस्तकों को पढ़ना समय व्यर्थ करने सा था, वह भी पता चला। यह भी पता चला कि इतनी पुस्तकें हैं जगत में कि सारी पढ़ी भी नहीं जा सकती हैं। अपनी संस्कृति से परे और भी रंग हैं पुस्तकों के इन्द्रधनुष में। अभिरुचि किसी विषय विशेष के प्रति नहीं, बस पढ़ने के प्रति बनी रही। शिक्षापद्धति के अन्तर्गत पाठ्यक्रम की पुस्तकों ने आकर डेरा जमा लिया, घर के सीमित आकार और दिन के सीमित समय को पूरा घेर लिया। कई वर्ष अपनी रुचि का ठीक से पढ़ ही नहीं पाया। विद्यालय का पुस्तकालय अधिक बड़ा नहीं था और शीघ्र ही सारी पुस्तकें पहचानी सी लगने लगीं। अस्तित्व के लिये संघर्ष ने प्रतियोगी परीक्षाओं से संबधित पुस्तकों के पढ़ने को विवश कर दिया, पढ़ने की प्यास बुझी ही नहीं, मन अतृप्त बना रहा।

आईआईटी कानपुर का पुस्तकालय, जीवन में एक श्रेष्ठ उपहार बनकर आया। इतना बड़ा पुस्तकालय पहले कभी नहीं देखा था। कोई ऐसा विषय नहीं देखा जिससे संबन्धित उत्कृष्ट पुस्तकें वहाँ उपस्थित न हों। हिन्दी, दर्शन, इतिहास, शोध का इतना बड़ा संग्रह एक आश्चर्य था मेरे लिये। विज्ञान और इन्जीनियरिंग से संबन्धित पुस्तकों के बारे में तो कहना ही क्या? बहुधा जब कल पुर्जों और उनकी गतियों से मन ऊबने लगता था तो कोई न कोई रोचक छाँह मिल जाती थी पुस्तकों की। न जाने कितने विषय पर कितनी पुस्तकें पढ़ डाली वहाँ पर। जब किसी एक अभिरुचि में बँधने का नहीं सोचा तो सारी पुस्तकें आकर्षित करती रहीं। भौतिकी से लेकर पराभौतिकी तक, विलास से लेकर अध्यात्म तक, इतिहास से लेकर भविष्य तक और दर्शन के न जाने कितने विचारपुंज, सब आँखों के सामने से निकल गये।

बहुत बार ऐसा होता था कि कोई अच्छा वाक्य पढ़ा तो उसे याद करने का मन हो उठता था। याद करना और समय आने पर उसका उपयोग कर अंक बटोर लेने की आदत वर्तमान शिक्षापद्धति के प्रभाव स्वरूप अब तक स्वभाव से बँधी हुयी थी। ऐसा करने से सदा ही पुस्तक का तारतम्य टूट जाता है। औरों के सजाये शब्द आपके जीवन में वैसे ही उतर आयेंगे, यह बहुत ही कम होता है, एक आकृति सी उभरती है विचारों की, एक बड़ा सा स्वरूप समझ का। धीरे धीरे वाक्यों को याद करने की बाध्यता समाप्त हो गयी और पुस्तकों को आनन्द निर्बाध हो गया। थककर पुस्तकालय में बहुत बार सो भी गया, भारी भारी स्वप्न आये, निश्चय ही वहाँ के वातावरण का प्रभाव व्याप्त होगा स्वप्नलोक में भी।

अब समय अपना है, कोई परीक्षा भी नहीं उत्तीर्ण करनी है, पर जीवन यापन करने में समय की कमी हो चली है। कभी कभी मन को समझाने का प्रयास करता हूँ कि कितना कुछ पढ़ लिया है, एक स्पष्ट समझ विकसित भी हो गयी है, तो और पुस्तकें पढ़ने की क्या आवश्यकता? यह तर्क थोड़े समय के लिये आहत मन को सहला तो देता है पर पुस्तकों की दुकान जाते रहने से रोक नहीं पाता है। कुछ और खरीदने जाता हूँ तो पैर स्वतः ही पुस्तकों की ओर खिंचे चले जाते हैं।

पुस्तकों के बीच पहुँच कर लगता है कि विश्व के श्रेष्ठ मस्तिष्कों के बीच आकर बैठ गया हूँ। वहाँ जाकर यह पता लगता है कि कितना कुछ लिखा जा रहा है, किन विषयों पर लिखा जा रहा है। यह जानना बहुत ही आवश्यक है कि श्रेष्ठ मस्तिष्कों के चिन्तन की दिशा क्या है, किन संस्कृतियों में क्या विषय प्रधान हो चले हैं और किन विषयों को अब अधिक महत्व नहीं दिया जा रहा है। यह समझना और जानना धीरे धीरे एक अभिरुचि के रूप में विकसित होता जा रहा है। बैठे बैठे कइयों पुस्तकें उलट लेता हूँ, सारांश समझ लेता हूँ, अच्छी लग ही जाती हैं, खरीद लेता हूँ। बौद्धिक प्यास बुझाकर वापस आता हूँ, कि थोड़े दिन संतृप्त रहेगा मन। पर क्या करूँ, उनके आसपास से कभी निकलना होता है तो बलात खींच लेता है उनका आकर्ष। खिंचा चला जाता हूँ, जब पुस्तकें बुलाती हैं।

10.10.12

शाम है धुआँ धुआँ

शाम थी, वह भी रविवार की, बैठकर सोच रहा था कि सप्ताहान्त कितना छोटा होता है, केवल दो दिन का। क्या न कर डालें इन दो दिनों में, यह सोचने में और उसके लिये समुचित साँस भरने में एक दिन निकल जाता है। दूसरा दिन पिछले सप्ताह की थकान मिटाने में और आने वाले सप्ताह के लिये ऊर्जा संचित करने में ढल जाता है।

इस बार पक्का था कि शनिवार श्रीमतीजी फिल्म दिखाने के लिये घेरने वाली हैं, मन मार के मन भी बना लिया था कि दिखा देंगे। यहाँ एक फिल्म में लगभग दो हजार शहीद हो जाते हैं, ढाई सौ से कम तो कोई भी टिकट नहीं। अब फिल्म भी सूखी नहीं दिखायी जा सकती है, बिना पॉपकार्न, नैचो और पेप्सी के बच्चों को फिल्म समझ भी नहीं आती है, इन तत्वों के बिना फिल्म अनाकर्षक लगती है। ऐसा नहीं है कि हम अपनी तरफ से कोई तैयारी नहीं करते हैं, दोपहर को समुचित भोजन करा के चलते हैं जिससे फिल्म के पहले ही भूख न लग जाये, पर मध्यान्तर होते होते सब कुछ हजम हो जाता है। बच्चों और श्रीमतीजी के सामने हमारी चालाकी आज तक नहीं चल पायी है। यदि कभी ना नुकुर की तो श्रीमतीजी बच्चों की हितैषी बन बैठती हैं, कृपणमना होने के ढेरों आक्षेप लगने लगते हैं। अब बच्चों को और उनकी माताजी को कैसे समझाया जाये कि हम तो तीस-चालीस रुपये में फिल्म देख आते थे। चार लोगों के टिकट के लिये १६० रुपये और मध्यान्तर में ४० रुपये के समोसे और कोल्डड्रिंक्स, कुल मिलाकर २०० रु।

कितनी भी जीडीपी बढ़ जाये, कितनी भी मँहगाई बढ़ जाये, २०० रु की जगह २००० रु जाते हैं, तो अटपटा लगता है, हृदय बैठने लगता है। फिल्में वही हैं, अभिनेता वही हैं, सिनेमा हॉल के स्थान पर मल्टीप्लेक्स आ जाने से फिल्म देखने में १८०० अतिरिक्त लगने लगे हैं। देश की अर्थव्यवस्था भले ही सुधर गयी हो, हमारी तो हर बार इसी तरह भड़भड़ा जाती है। कई लोग कह सकते हैं कि फिल्म देखना तो उपभोग की श्रेणी में आता है, न कि आवश्यकता की श्रेणी में। उनको बस यही कहा जा सकता है कि यह हमारे लिये विवशता की श्रेणी में आता है। मल्टीप्लेक्स आ जाने से सिनेमा हॉल में फिल्में देखना कृपणता के कार्यों में गिना जाने लगा है। यहाँ पर जितने भी सिनेमा हॉल होते थे, सब के सब ढहाये जा रहे हैं और उनके स्थान पर मॉल और मल्टीप्लेक्स तैयार हो रहे हैं। जब हर परिवार में मल्टीप्लेक्स में फिल्म देखने के दीवाने बढ़ने लगें, तो सबकी आशायें बढ़ने लगती हैं। पहले जो काम २०० में होता था, उसके लिये २००० मिलने की संभावनायें बन जायें, तो अर्थव्यवस्था में उभार आना ही है, जीडीपी बढ़नी ही है, देश का विकास होना ही है।

पर इस बार भाग्य ने हमारे पक्ष में पलटा खाया, शनिवार को ही पूरे कर्नाटक बन्द की घोषणा हो गयी। विषय अत्यधिक संवेदनशील था, कावेरी के जल के बटवारे ने स्थिति गम्भीर कर दी थी, पूरा बंगलोर लगा कि जगा ही नहीं। कई स्थानों पर ट्रेनें रोक दी गयी थीं। लम्बी दूरी की ट्रेनों सहित कई ट्रेनें निरस्त भी करनी पड़ीं। पहले तो इस व्यस्तता में दिन निकल गया और सायं भी मॉल बन्द होने के कारण फिल्म देखने का कार्यक्रम पूरी तरह टल गया। अगले दिन समाचार पत्रों में पढ़ा कि उस दिन देश की अर्थव्यवस्था को कई करोड़ का घाटा हुआ। सोचने लगे कि उस घाटे में क्या स्वरूप रहा होगा, बहुत कुछ तो समझ नहीं आया, बस इतना निश्चित था कि उसमें हमारे न खर्च होने वाले दो हजार रुपये भी हैं। इस सप्ताह तो बच गये, पर पता नहीं कि आने वाले सप्ताह में ईश्वर कैसे सहायता करेगा? यदि ईश्वर ने सहायता नहीं की तो देश की अर्थव्यवस्था में हम भी २००० रु की आहुति चढ़ा देंगे। कावेरी जल विवाद में यहाँ की अर्थव्यवस्था अभी और कितनी प्यासी रह जायेगी, कहना कठिन है। यहाँ का वातावरण देख कर लगता है, या तो जल में प्रवाह रहेगा या अर्थव्यवस्था में।

रविवार का दिन हमें पूरी तरह से मुक्त रखा जाता है, इसी दिन का प्रताप है कि सप्ताह भर के लिये दो पोस्टों का लेखन हो पा रहा है। कोई निश्चित कार्यक्रम नहीं, अपनी ओर से भेंट के लिये कोई पहल नहीं, बस अपने साथ, अपने परिवार के साथ। कहने को तो यह सूर्यदेव का दिन होता है, प्रखर चमकने के लिये पर हम स्वयं में खोये रहते हैं,स्वयं में सोये रहते हैं। सायं विश्वकप का मैच देखना था, अपने पड़ोसी के घर में, भोजन के साथ, अतः दोपहर को भोजन के बाद झपकी मार ली। सुबह से टीवी पर दोषारोपणों का इतना विषवमन हो चुका था कि लग रहा था कि टीवी देखना बन्द नहीं किया तो देश की स्थिति की तरह हम भी पाताल पहुँच जायेंगे। टीवी बन्द करने से सहसा अच्छा लगने लगा, लगा कि देश की समस्यायें थोड़ी कम हो चली हैं। इतनी मानसिक थकान हो चली थी कि आँख बन्द कर सोचने में ही नींद आ गयी।

ऐसी ही एक निश्चिन्त नींद और आगामी भोज के आनन्द के बीच का समय था, शाम थी वह रविवार की। कुछ न होने और कुछ न खोने की बीच की स्थिति में बैठे थे। श्रीमतीजी सायं के पंचायत-कम-टहलने में व्यस्त थीं, बच्चे आने वाले पाँच दिनों का खेलने का कोटा आज ही पूरा कर लेने में श्रमनिरत थे। मन में कोहरे जैसा आनन्द आ रहा था, न कुछ दिख रहा था, न कुछ देखने की इच्छा ही थी।

पर आनन्द की इस स्थिति में बाधा पड़ गयी, घर के पीछे से हल्का हल्का धुआँ आ रहा था। लगा कहीं कोई कूड़ा तो नहीं जला रहा है, संभावना बहुत कम थी, क्योंकि श्रीमतीजी सारे कूड़े से खाद बनवा देती हैं, जलाने के लिये कुछ बचता ही नहीं है। पता किया गया, आउटहाउस में कोई चूल्हा जलाये हुये था, वहीं से धुआँ घर के अन्दर घुस रहा था। बंगलोर की हल्की ठंडी और मदिर हवा में यदि धुआँ मिल जाये तो रस का सारा तारतम्य चौपट हो जाता है। जहाँ तक मुझे याद था कि बहुत कम ही ऐसा हुआ था जब पीछे से धुआँ आया हो, उनके घर में गैस थी और खाना उसी पर बनता है। यद्यपि यहाँ पर पेड़ बहुत हैं और उनकी सूखी टहनियाँ गिरती रहती हैं, पर भोजन बनाने के लिये रसोईगैस का ही प्रयोग होता है। यहाँ जाड़ा भी नहीं पड़ता है, लकड़ी जलाकर सेंकने का भी कोई प्रश्न नहीं उठता है।

धीरे धीरे जब भेद खुला, तब देश में हो रहे आर्थिक सुधारों के प्रभाव और गति का पता चला। एक सप्ताह पहले जो निर्णय टीवी पर बहसों का अंग था, वह अपने निष्कर्ष पा रहा था, हमारे घर के पीछे। जो तथ्य सामने आये, बड़े रोचक थे। यद्यपि उस घर में रसोई चूल्हा था, पर आने वाले ६ महीनों में मात्र ३ गैस सिलिण्डर मिलने के कारण प्रत्येक सिलिण्डर को २ माह चलाने की विवशता थी। जहाँ पर माह में एक सिलिण्डर की आवश्यकता हो, वहाँ उसे दो महीने खींचने के लिये हर दूसरे दिन चूल्हे पर खाना बनाना पड़ेगा। ईश्वर की कृपा से यहाँ पर पेड़ पर्याप्त हैं, सूखी टहनियों की कमी नहीं है, कुछ नहीं तो हर दूसरे दिन तो चूल्हा जलाया ही जा सकता है। आउटहाउस वाला आकर बोला 'क्या करेगा साहब, आप तो सब जानते ही हैं।' हम भी अपने कल्पना लोक से धीरे से उतर आये, धुआँ अब तक मन में उतर गया था।

फिल्म हो, बंद हो या धुआँ हो, देश की अर्थव्यवस्था हर पर सीधा प्रभाव डालती है। एक सप्ताहान्त के दो दिनों में जब इतना मिल गया तो पूरे सप्ताह में क्या हाल होगा, राम जाने। अब तो हर शाम धुँआ धुँआ हो, तो कोई आश्चर्य नहीं, इसकी आदत डालनी होगी। संभवतः कुछ दिनों में धुयें के सौन्दर्यपक्ष को कविता में सहेजने की दृष्टि विकसित हो जाये।

6.10.12

बच्चों की संस्कृति

अपनी संस्कृति पर गर्व होना स्वाभाविक है, पर सारा जीवन अपनी संस्कृति के एकान्त में नहीं जिया जा सकता है, अन्य संस्कृतियाँ प्रभावित करती हैं। पहले का समय था, संस्कृतियों के बीच का संवाद सीमित था, परस्पर प्रभाव सीमित था, जो बाहर जाते थे वे ही बाहर की संस्कृति के कुछ अंश ले आते थे, पर दूसरी संस्कृति में जीवन निभा पाने के समुचित श्रम के पश्चात। आज न जाने कितनी फुहारें बरसती हैं, बड़ा ही कठिन होता है, भीग न पाना। हर संस्कृति की एक जीवनशैली है, अपने सिद्धान्त हैं और उसमें पगी दिनचर्या। औरों की संस्कृति पहले तो रोचक लगती है, पर धीरे धीरे रोचकता हृदय बसने लगती है, हम औरों की संस्कृति के पक्ष अपना लेते हैं, अपनी सुविधानुसार, अपनी इच्छानुसार।

मुझे भी अपनी संस्कृति पर गर्व है, खोल पर नहीं, उसकी आत्मा पर है। कई कारण हैं उसके, वर्षों की समझ के बाद निर्मित हुये हैं वे कारण। बहुत कारण ऐसे हैं, जो सिद्ध न कर पाऊँ, समझा न पाऊँ, भावानात्मक हैं, बौद्धिक हैं, आध्यात्मिक हैं। आवश्यकता भी नहीं है कि उनके लिये तर्कों से श्रेष्ठता के महल निर्माण करूँ, अनुभवजन्य तथ्य तर्कों की वैशाखियाँ पर निर्भर भी नहीं रहते हैं। यह भी नहीं है कि मुझे अन्य संस्कृतियों से कोई अरुचि हो, जब खोल अनावश्यक हो जाते हैं तो तुलना करने के लिये बहुत कम बिन्दु ही रह जाते हैं। सिद्धान्तों की मौलिकता में किसी भी संस्कृति को समझना कितना सरल हो जाता है, कम समझना होता है तब, गहरा समझना होता है तब। कबिरा की 'मरम न कोउ जाना', यही पंक्ति पथप्रदर्शन करने लगती है। किसी संस्कृति का श्रेष्ठ स्वीकार करना ही उस संस्कृति का समुचित आदर है। खोल का ढोल पीटने वाले, न अपनी संस्कृति को समझ पाते हैं, न औरों की।

आज आधुनिक एक आभूषण बन गया है, पुरातन एक अभिशाप। भविष्य सदा ही अधिक संभावनायें लिये होता है, भूतकाल से कहीं अधिक मात्रा में, कहीं अधिक स्पष्टता में। पुरातन को अपने दोषों का कारण मान, सब कुछ उसी पर मढ़ हम हल्के हो लेते हैं, कोई भार नहीं, कोई अनुशासन नहीं, कोई नियम नहीं, उन्मुक्त पंछी से। यदि यही आधुनिकता के रूप में परिभाषित होना है, तब तो हम स्वयं को संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में कभी समझे ही नहीं। आधुनिकता और खुले विचार वालों ने अपनी स्वच्छन्दता के सीमित आकाश में संस्कृति की उस असीमित आकाशगंगा को तज दिया है, जिसमें हम सब सदियों से निर्बाध और आनन्दित हो विचरण करते रहे हैं।

संस्कृति की हमारी संकर समझ उस समय उभर कर सामने आ जाती है, जब हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे पाश्चात्य संस्कृति सीखें, उनकी तरह विकसित हों, उनकी तरह आत्मविश्वास से पूर्ण दिखें, पर घर की मान्यताओं, परम्पराओं और संस्कारों को अक्षुण्ण रखे। जो भी कारण रहा हो, भारतीय संस्कृति शापित रही हो या शासित रही हो, आधुनिक परिवेश में श्रमशीलता, अनुशासन और कर्मप्रवृत्तता भारतीय संस्कृति के अनुपस्थित शब्द रहे हैं। वानप्रस्थ और सन्यास वर्षों में अध्यात्म का संतोष और जीवन समेटने की चेष्टाओं को ब्रह्मचर्य और गृहस्थ में ही स्वीकार कर लेने से जो अकर्मण्यता हमारी जीवनशैली में समा गयी है, उसकी भी उत्तरदायी है संस्कृति के बारे में हमारी संकर समझ।

क्या करें, संस्कृति का सही अर्थ बच्चों को समझाने बैठें या उन्हें स्वयं ही समझने दें? कपाट बन्द करने से उसके कूप मण्डूक हो जाने का भय है, कपाट खोल देने से वाह्य संस्कृतियों के दुर्गुण स्वीकारने का भय? जब हमें चकाचौंध भाती है तो उन्हें भला क्यों न अच्छी लगेगी, क्या तब बच्चे लोभ संवरण कर पायेंगे? बहुत से ऐसे ही प्रश्न उठ खड़े होते हैं जब बच्चों का परिचय हम अन्य संस्कृतियों से करवाते हैं। क्या उपाय है, संस्कृति की आत्मा सिखायें, या खोल चढ़ा दें, या उसे स्वयं ही समझने दें? उत्तर तो पाने ही हैं, अनभिज्ञता हर दृष्टि से घातक है। बहुत बार बस यही लगता है कि जो भी सिखाना हो, जो भी श्रेष्ठ हो, उसे स्वयं के जीवन में उतार लीजिये, बच्चे समझदार होते हैं, सब देख देखकर ही समझ लेते हैं।

एक मित्र के बारे में कहना चाहूँगा, वह पूर्ण नास्तिक, कारण बड़ा रोचक है पर। बचपन में अपने पिता को देखता था, बहुत अधिक पूजा पाठ करते थे, धार्मिक थे। भ्रष्टाचार का धन और परिवारजनों, विशेषकर पत्नी के प्रति अप्रिय व्यवहार। यह विरोधाभास उसको कभी समझ न आया, उसे लगा कि इस विरोधाभास का स्रोत धर्म ही हो, किसी से कभी कुछ नहीं कहा, बस वह ईश्वर से रूठ गया, जीवन भर के लिये नास्तिक हो गया। देखा जाये तो हमारा जीवन ही बच्चों के लिये हमारी संस्कृति का जीवन्त उदाहरण है, वही पर्याप्त होता है बस, प्रभावित करने में शब्द आदि निष्प्राण हो जाते हैं, अन्त में व्यवहार ही अनुसरणीय हो जाता है।

पाश्चात्य समाज में बच्चे अधिक स्वतन्त्र होते हैं, विकास के लिये एक आवश्यक गुण है यह। अपने जीवन के दो महत्वपूर्ण निर्णय स्वयं करते हैं वे, जीवन यापन कैसे करना है और जीवन यापन किसके साथ करना है? हम अपनी संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में देखेंगे तो संभवतः हजम न कर पायें, पर उनके लिये यह स्वाभाविक व्यवहार है। यदि आप चाहेंगे कि आपके बच्चे भी उनकी तरह स्वतन्त्र बने या स्मार्ट बने, तो उन्हें बचपन से ही अपने निर्णय लेने के लिये उकसाना होगा। तब निर्णयों में मतभेद भी होंगे, कई बार मर्यादा दरकती हुयी सी लगेगी। जो बच्चे आपके निर्णयों से सहमत न हो अपना पंथ सोचने लगते हैं, उन्हें बागियों की उपाधि मिल जाती है। जो बच्चे आपके निर्णयों से असहमत होकर कार्यों में रुचि खो देते हैं और अनमने हो जाते हैं, उन्हें आप नकारा की संज्ञा से सुशोभित कर देते हैं। स्वतन्त्र दोनों ही होते हैं, जीवन अपना दोनों ही जीते हैं, बहुधा अपने कार्य में अत्यधिक सफल भी रहते हैं, पर समाज की दृष्टिकोण से आदर्श बच्चे नहीं कहे जाते हैं।

माना कि पाश्चात्य दृष्टिकोण में बहुत दोष हैं, आध्यात्मिक आधार पर भारतीय संस्कृति कहीं उन्नत है, सामाजिक संरचना और संबंधों के निर्वाह में हमारा समाज अधिक स्थायी है, एक कष्ट पर दसियों हाथ सहायता करने को तत्पर रहते हैं। तो क्या हम भौतिकता की आधारभूत आवश्यकताओं पर भी ध्यान न दें, सन्तोष की चादर ओढ़ अपने सांस्कृतिक वर्चस्व के स्वप्न देखें? पृथु के पास एक मोटी पुस्तक है, टॉप टेन ऑफ ऐवरीथिंग, उसमें वह देखता है कि अपना देश विकास के मानकों के आधार पर पाश्चात्य देशों के सामने कहीं नहीं टिकता है, पूछता है कि हम सबमें पीछे क्यों हैं? क्या उसको यह बताना ठीक रहेगा कि विवाह तक तो यहाँ का युवा अपने हर निर्णय के लिये अपने बड़ों का मुँह ताकता रहता है, यौवन भर औरों के द्वारा प्रायोजित और संरक्षित जीवन जीता है, प्रौढ़ होते ही असहाय हो अन्त ताकने लगता है और आध्यात्मिक हो जाता है। कब उसे समय मिलता है अपने स्वप्न देखने का, उन्हें साकार करने का? संभावित ऊर्जा सदा ही संभावना बनी रहती है, कोई आकार नहीं ले पाती है।

हम इस भय में जीते रहते हैं कि हमें अपने बच्चों और आने वाली पीढ़ी के लिये सुविधामयी जीवन संजो के जाना है, वही भय हमारे बच्चों में मूर्तरूप ले जी रहा है। सब के सब सधे भविष्य की ओर भागे जा रहे हैं, स्थापित तन्त्रों के सेवार्थ, उन तन्त्रों में जुत जाना चाहते हैं जो विश्व में बहुत नीचे हैं। हजारों की एक ऐसी सेना तैयार हो जिनके मन में दिवा स्वप्न हों, श्रेष्ठतम और उत्कृष्टतम पा जाने की उद्दाम ललक हो, हर ऐसे क्षेत्र में देश को स्थापित करने का विश्वास हो जिनके लिये हम जीभ लपलपाते रहते हैं। इस तरह की शक्ति तो एक दिन में चमत्कारस्वरूप मिलने से रही, बच्चे रोजगार ढूढ़ने में लगे रहे तो रोजगार के अतिरिक्त कुछ पा भी नहीं पायेंगे, देश में नहीं मिलेगा तो विदेश सरक जायेंगे।

हमारा देश सर्वाधिक युवा देश है, कारण है कि बच्चे अधिक हैं। अब दो विकल्प हैं, या तो बच्चों को अतिसंरक्षित जीवन जिलाते रहें और भविष्य में जब प्रतियोगिता की मारकाट अपने चरम पर होगी, उन्हें उन पर ही छोड़ दिया जाय, भाग्य के भरोसे। एक पतले रास्ते पर भला कितने लोग चल पायेंगे? दूसरा विकल्प यह है कि अपने बच्चों को दृढ़ और सशक्त बनायें जिससे न केवल वे अपनी राह गढ़ेंगे वरन न जाने कितनों को अपने साथ लेकर चलेंगे।

निर्णय आपको करना है कि बच्चों के निर्णय कौन लेगा? निर्णय आपको करना है कि बच्चों की संस्कृति क्या हो? निर्णय आपको करना है कि संस्कृतियों के बन्द किलों में ही बच्चे रहें या सबके ऊपर उड़ें, आसमान में? निर्णय आपको करना है कि संस्कृति को बचाये रखने वाले बचे रहें और संस्कृति को बचाये रखे या संस्कृति में सिमटे हुये विश्वपटल से अवसान कर जायें? भविष्य के निर्णय तो आज के बच्चे लेंगे, पर उन्हें इस योग्य बनाने के निर्णय आपको लेने हैं, आज ही।

3.10.12

मैं समय की भँवर में हूँ

परिस्थितियों में बँधा मैं, राह मेरी बनी कारा,
श्रव्य केवल प्रतिध्वनियाँ, यदि किसी को भी पुकारा,
देखना है, और कब तक, स्वयं तक फिर पहुँचता हूँ?
मैं समय की भँवर में हूँ ।।१।।

और देखो, जीवनी-क्रम, स्वतः घटता जा रहा है,
उदित सूरज जो अभी था, अस्त होता जा रहा है,
रात-दिन के बीच सारा, बचा जो जीवन लुटा दूँ?
मैं समय की भँवर में हूँ ।।२।।

कभी मन में हूक उठती, ध्येय का दीपक कहाँ है,
जो विचारों से बनाया, मार्ग अभिलाषित कहाँ है,
काल सागर के थपेड़े, स्वयं को निष्क्रिय, भुला दूँ?
मैं समय की भँवर में हूँ ।।३।।

और यूँ बहती नदी में, स्वयं को यदि छोड़ दूँगा,
क्या रहे पहचान मेरी, और क्या परिचय कहूँगा,
धिक है यौवन, काल संग ना, हाथ दो दो आज कर लूँ।
मैं समय की भँवर में हूँ ।।४।।



29.9.12

बच्चों की खिलती मुस्कान

भाग्य ने अपने सारे दाँव कॉन्क्रीट के जंगलों में लगा दिये हैं, बड़े नगरों में ही समृद्धि की नयी परिभाषायें गढ़ने में लगी हैं सभ्यतायें। आलोक को अपनी प्रतिभा और सृजनशीलता के लिये ढेरों संभावनायें थी यहाँ पर, अच्छी नौकरी थी, भव्य भविष्य था, पर मन के अन्दर और बाहर साम्य स्थापित नहीं हो पा रहा था। बंगलोर जैसा बड़ा नगर भी उसके हृदय के विस्तृत वितान को समेटने में असमर्थ था। एक दिन उसने सामान समेटा और जा पहुँचा गोवा, जहाँ पर सागर की मदमाती लहरें थीं, क्षितिज में जल और आकाश का मिलन दिखता था और स्थानीय निवासियों के प्रतिरोध ने कॉन्क्रीट का कद पेड़ों के ऊपर जाने नहीं दिया था। यहाँ प्रकृति अपने मोहक स्वरूप में अभी भी विद्यमान थी। बस यहीं आलोक का मन तनिक स्थिर हुआ, एक मकान किराये पर लिया, एक कमरे में अपना स्टूडियो स्थापित किया और चित्रकला में डूब गया, उन रंगों में डूब गया जिनके गाढ़ेपन में उसके भाव गहराते थे, जिनकी छिटकन स्मृतियाँ बन फैल जाती थी, मन को सम्मोहित कर लेती थी।

स्थानीय निवासियों को धीरे धीरे चित्रकला के इस दीवाने के बारे में ज्ञात हुआ, उत्सुकतावश ही सही, विचार विनिमय हुआ, संवाद हुआ, कई स्थानों पर उसे अपनी बात कहने के लिये बुलाया गया। संवेदनशीलों के संसार में आपका आनन्द बढ़ता ही है, आपकी प्रतिभा और सदाशयता कई और रूपों में बह जाना चाहती है, आपकी अभिव्यक्ति थोड़ी और मुखर हो जाना चाहती है। 'हमारा स्कूल' नाम की एक संस्था जो झुग्गियों में रहने वाले, निर्धन, समाज के दूसरे छोर पर त्यक्त अवस्थित समूह के बच्चों के विकास में हृदय से लगी थी, उनकी संचालिका ने आलोक को मना लिया, उन बच्चों को थोड़ी बहुत चित्रकला सिखाने के लिये, प्रत्येक रविवार।

नियत दिन आया, सारे बच्चे नहा धोकर आलोक की प्रतीक्षा कर रहे थे, उन बच्चों में ट्रक ड्राइवरों, निर्माण कार्य में लगे मजदूरों, घर मे काम करने वाली बाइयों, मछुआरों और वेश्याओं के बच्चे थे। संवाद खुला, 'मैं कलाकार हूँ और दिनभर बैठा बैठा चित्र बनाता रहता हूँ' आलोक ने परिचय दिया। सब ठहाका मार के हँस पड़े, 'अच्छा आप अभी तक चित्र बनाते हो, ऑफिस नहीं जाते हो?' एक बच्चा बोल पड़ा। आलोक ने धीरे से अपने द्वारा बनाये आधुनिक कला के कई चित्र सामने रख दिये, बच्चे उत्सुकता से देखने लगे। वे सारे चित्र जिन्हें कलाजगत में बड़ी उत्साहजनक टिप्पणियाँ मिली थीं, आज उन बच्चों के अवलोकन के लिये प्रस्तुत थे। सबने ध्यान से देखा, कुछ को कुछ भी समझ नहीं आया, कुछ को कुछ समझ आया, कुछ ने कुछ समझने जैसी आँखें सिकोड़ीं और अन्त में एक ने कह ही दिया कि यह तो बड़ा गिचपिच सा लग रहा है।

'जब आप बनाते हो तो अच्छा लगता है, जब हम बनाते हैं तो अच्छा ही नहीं बनता है।' एक बच्ची बोली। 'पर मैं तो बस आपकी तरह ही बनाता हूँ' आलोक ने समझाया। 'अच्छा आप इतने बड़े हो गये हो और अभी तक हमारी तरह ही बनाते हो' कहीं से आवाज़ आयी। आलोक के अहं को इतनी ठेस आज तक नहीं पहुँची थी। आलोक ने घर आकर अब तक के एकत्रित आर्ट पेपर, रंग, ब्रश आदि इकठ्ठा किये और अगले दिन वहाँ पहुँचा। हर एक बच्चे के सामने एक आर्ट पेपर था, सब शान्त बैठे थे, उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे क्या बोलें, क्या करें?

'यदि हम अच्छा नहीं बना पाये तो, यदि यह पेपर खराब हो गया तो?' उनकी आँखों के प्रश्न वाक्य का रूप पा गये। 'अच्छा क्या होता है?' बिल्कुल शान्ति, 'बुरा क्या होता है?' और भी सन्नाटा। आलोक ने एक पेपर उठाया, उनके साथ बैठ गया और हाथों में चारकोल लेकर अपना ही स्केच बनाने लगा। सब उसे घेरकर खड़े हो गये और ध्यान से देखने लगे, आलोक इतनी एकाग्रता से लगा था कि मानो अपने आलोचकों के गढ़ में जाकर उन्हें प्रभावित कर रहा हो। आकृति उभरी, गंजा सर, गोल चश्मा और एक टीशर्ट। 'अहा, यह तो गाँधीजी लग रहे हैं, टीशर्ट पहने।' छह वर्ष का करन सहसा बोल उठा। बच्चों का धैर्य बह निकला, सब चित्र बनाने में लग गये, जिसे जो भी सूझा, जैसे भी सूझा। आलोक देखकर मुदित होता रहा, बच्चे कागज पर अपने बचपन के रंग बिखेरते रहे।

आलोक ने सारे चित्र दीवार पर लगा दिये, अपने चित्र के साथ ही। 'अब बताओ कि इनमें सबसे खराब कौन सा लग रहा है?' आलोक ने पूछा। सब मौन, कई बार कहने पर सबने अन्ततः एक चित्र निकाला। आलोक ने वह चित्र सामने वाली दीवार पर लगा दिया और पूछा कि अब बताओ कि अब कैसा लग रहा है? 'अब तो यह भी अच्छा लग रहा है', कई बच्चे बोल पड़े। बच्चों को समझ नहीं आ रहा था कि यही चित्र जब सबके साथ था तो खराब लग रहा था, अकेला लगा दिया तो अच्छा लग रहा है।

'बच्चों, तुम लोग भी जब स्वयं को भीड़ के साथ रखते हो तो स्वयं को कमतर समझने लगते हो, कभी कम धनी समझते हो, कभी कम भाग्यशाली समझते हो, कभी कम सुन्दर समझते हो। जब स्वयं को भीड़ से अलग रखकर देखोगे, स्वयं को दर्पण में जाकर देखोगे तो तुम्हें भी स्वयं पर गर्व करने के ढेरों कारण मिल जायेंगे।' आलोक ने व्याप्त संशय दूर कर दिया। सब मुस्करा उठे, बस एक छुटका नहीं, वह थक कर सो चुका था। सारे बच्चे आज स्वयं पर एक नया विश्वास लेकर घर पहुँचेगे, सबके चेहरे पर गजब का आत्मसन्तोष झलक रहा था।

हर सप्ताह बच्चे बड़ी आतुरता से अपने टीशर्ट वाले गाँधीजी से मिलने की प्रतीक्षा करते हैं, उन्हें चित्रकला भी अच्छी लग रही है और स्वयं का समझना भी, हर बार उनका आत्मविश्वास बढ़ रहा है। आलोक को भी रविवार की प्रतीक्षा रहती है। एक दिन संचालिका ने आलोक से उसकी फीस के बारे में पूछा, आलोक ने मुस्कराते हुये कहा कि उसकी फीस बच्चों से मिल जाती है। आश्चर्य से संचालिका ने कारण पूछा।

'मैं कई नगरों में कार्यशालायें आयोजित करता हूँ, सबको एक चित्र बनाने को देता हूँ, आधे समय के बाद सबके चित्र आपस में बदल देता हूँ और एक दूसरे के चित्र पूरे करने को कहता हूँ। नगर के बच्चे कहते हैं कि यह ठीक नहीं है, हमारा चित्र आपने दूसरे को कैसे दे दिया, हमने इतनी मेहनत से बनाया था? ठीक उसी तरह जिस तरह आधुनिक मैनेजर अपनी योजनाओं से चिपका रहता है, अपनी उपलब्धियों से चिपका रहता है, दूसरों के कार्य उसके लिये महत्वहीन हों मानो। और इन बच्चों को देखो, इन्होने आज तक कभी कोई शिकायत नहीं की है, इन्हें जो भी, जैसा भी, आधा अधूरा चित्र दे दो, उसे भी अच्छा बनाने में लग जाते हैं। काश हम सब भी अन्य की कृतियों और कार्यों के प्रति यही भाव रखें, सब विशिष्ट हैं। मैं हर बार इनके पास बस यही सीखने आता हूँ और यही मेरा पारिश्रमिक भी है।' आलोक प्रवाह में बोलता जा रहा था।

आलोक वहाँ हर रविवार जाता है, सब सोचते हैं कि आलोक उन्हें कला सिखाने जाता है, पर यह केवल आलोक ही जानता है कि वह वहाँ बच्चों से क्या सीखने जाता है?



(यह कहानी जेन गोपालकृष्णन ने अंग्रेजी में वर्णित की है और सर्वप्रथम 'चिकेन सूप फॉर सोल - इंडियन टीचर' में प्रकाशित हुयी है। आलोक और जेन के प्रति आभार)

26.9.12

बच्चों का जीवन

'ऐसी क्या चीज है, जो आपको तो नहीं मिलती है पर आपसे उसकी आशा सदैव की जाती है', आलोक ने बच्चों से पूछा। इज्जत या आदर, उत्तर मिलने में अधिक देर नहीं लगी, और बहुत बच्चों ने यह उत्तर दिया। उत्तर सही भी है, बच्चे के दृष्टिकोण से देखें, उससे सदा ही आशा की जाती है कि वह अपने माता-पिता, गुरुजनों और अग्रजों का आदर करे, पर उसे सदा ही अनुशासनात्मक, उपदेशात्मक और प्रताड़ित करते हुये से आदेश मिलते हैं। किसी के जीवन में इसकी मात्रा कम रही होगी, किसी के जीवन में अधिक, पर भूला तो कोई भी नहीं होगा। बच्चों के लिये अन्याय और अनादर भूलना बहुत कठिन होता है। झाँसी प्रवास के समय हमारे पुत्र की पूरी कक्षा को किसी एक की उद्दण्डता के लिये दण्ड मिला, बहुधा शान्त से रहने वाले हमारे सुपुत्र जी इसको पचा नहीं पाये और बहुत क्रोधित हुये। क्रोध तो धीरे धीरे शान्त हो गया पर उनकी स्मृति में उन अध्यापक के प्रति एक निम्न धारणा बन गयी। ऐसी चीजें भूलना कठिन भी होती हैं, जहाँ जहाँ मुझे बिना मेरी भूल के डाँट या मार पड़ी है, वे सारे स्थान, व्यक्ति और घटनायें स्पष्ट याद हैं। बड़े होने के बाद बहुत से अन्याय या तो भूल गया हूँ या क्षमा करता आया हूँ, पर बचपन के नहीं भूलते हैं, न जाने क्यों?

आलोक चित्रकार हैं, मित्र हैं और गोवा में रहते हैं। बच्चों के विषय में अत्यन्त संवेदनशील है और बच्चों के उन्मुक्त विकास के बारे में अद्भुत विचारों से परिपूर्ण भी। जो तथ्य उसको सर्वाधिक कचोटता है कि किस प्रकार हम समाज के रूप में अपनी ही क्षमताओं और संभावनाओं का हनन करते रहते हैं, बचपन से अब तक। हम कैसे अपने बच्चों के प्रति अति अतिसंरक्षणमना हो जाते हैं, उसकी राह की दोनों ओर दीवार बनाते हुये चलते हैं और अपनी इस मूढ़ता को सफलता मानकर प्रसन्न भी हो लेते हैं। आलोक की माने तो बच्चे प्राकृतिक रूप से चित्रकार होते हैं, सबसे अच्छे, उनके हाथ में रंग और ब्रश पकड़ाकर देखिये बस, उनकी अभिव्यक्ति पवित्रतम और सृजनतम होती है। धीरे धीरे वे बड़े हो जाते हैं, उनके ऊपर दायित्वों, कर्तव्यों और आकड़ों का बोझ डाल देते हैं हम सब, बड़ा होते होते वह सारी चित्रकला भूल जाता है।

यद्यपि आलोक बहुत अच्छे चित्रकार हैं पर उन्हें भी लगता है कि बड़े होने के प्रयास में वह थोड़ी बहुत चित्रकला भूल गये हैं। यही कारण है कि उन्हें बच्चों के साथ समय बिताना अच्छा लगता है। पहला कारण यह कि बच्चों के व्यवहार में कोई कृत्रिमता नहीं होती और दूसरा यह कि बच्चों के साथ रहने से हर बार उसे कुछ न कुछ सीखने को मिल जाता है, अपनी चित्रकला के लिये, अपने व्यक्तित्व के लिये। आलोक नियमतः प्रत्येक रविवार सड़क पर रहने वाले या अतिनिर्धनता में जीवन यापन करने वाले बच्चों को चित्रकला सिखाते हैं, एक संस्था के लिये, मुफ्त में। यही नहीं, आलोक उस संस्था के प्रति कृतज्ञ भी रहते हैं क्योंकि उनका कहना है कि हर बार वह उन बच्चों से कुछ सीख कर ही जाते हैं। हम सब पर भी यही नियम लागू होता है, जब कभी भी आपके पास विचारों की कमी हो या विचारों के प्रवाह में स्तब्धता हो, तो बच्चों को देखिये, बच्चों के साथ समय बिताइये, बच्चों से सीखिये।

उपरोक्त प्रश्न, ऐसी ही एक कक्षा के समय पूछा था आलोक ने। प्रश्न अच्छा खासा समझा हुआ था और उत्तर अन्ततः वहीं पर जाना था। बच्चों की तार्किक क्षमता को कमतर समझने की हमारी मानसिकता को झटका तब लगता है जब बच्चे सीधा और अन्तिम उत्तर दे देते हैं। उत्तर इतना सटीक और बहुतायत में मिलेगा, यह आलोक के लिये भी आश्चर्य का विषय था। बच्चों से यह प्रश्न सीधे भी पूछा जा सकता था कि कौन आपको अच्छा लगता है, कौन नहीं। बच्चों के लिये अच्छा लगने या अच्छा न लगने का केवल एक ही मानक है, कि कौन उनके अस्तित्व का आदर करता है या कौन नहीं।

इसके पहले कि इस विषय में प्रतिप्रश्न खड़े हो जायें, इस बात को स्पष्ट कर देता हूँ कि अनुशासन और अनादर में अन्तर है। पारिवारिक अनुशासन आवश्यक है और वह बड़ों को अपने आचरण से स्थापित करना होता है, बच्चों को श्रम का गुण सिखाना हो तो स्वयं भी खटना होता है। अनुशासन का यह स्वरूप आदर के साथ संप्रेषित होता है। कुछ स्वयं न करें और स्वयं को बच्चों को थोप दें, यह अनुशासन तो है पर अनादर के साथ। अनुशासन के अतिरिक्त बहुत से ऐसे निर्णय होते हैं जिनमें हम अपने बच्चों की चिन्तन प्रक्रिया को मान नहीं देते हैं, उनके उत्साह को अपने अनुभव से ढकने का प्रयास करते हैं। निश्चय ही बड़ों ने अधिक जीवन जिया है और उनके अन्दर अपने बच्चों के योगक्षेम की भावना भी अधिक है, पर उस अनुभव से और उस प्यार से बच्चों की निर्णय प्रक्रिया को बल मिले, न कि अनादर।

आलोक बचपन से ही चित्रकार बनना चाहता था, उसे घर में थोड़ा प्रतिरोध और बहुत सहयोग मिला, उसके निर्णय को आदर मिला, उसने अपना जीवन बचपन से ही स्थापित दिशा में बढ़ाया। जब बचपन से ही आपके अस्तित्व को सम्मान मिलता है, लाड़ दुलार से थोड़ा अधिक गंभीर, तो जीवन जीने का आत्मविश्वास कई गुना बढ़ जाता है। निर्णय तो देर सबेर लेने ही होते हैं, यदि आप बचपन में नहीं लेंगे तो बड़े होकर आपका पीछा करेंगे। अपने निर्णय लेने से साहस बढ़ता है। कई मित्रों को जानता हूँ जो अभी भी स्वतन्त्र निर्णय लेने में घबराते हैं, दूसरे का मुँह ताकने लगते हैं। माता पिता के रूप में हम उनके शुभचिन्तक अवश्य हो सकते है, उन्हें अपने अनुभव व ज्ञान के आधार पर समुचित सलाह भी दे सकते हैं, पर निर्णय बच्चों को ही लेने देना हो। अपने लिये निर्णयों में मन खपा देने की ऊर्जा आ जाती है बालमनों के अन्दर।

वहीं दूसरी ओर अपना बचपन देखता हूँ तो निर्णय लेने की सारी स्वतन्त्रता थी, छात्रावास में रहने से निर्णय-प्रक्रिया समय के पहले ही पक गयी। कभी कभी बच्चों से विनोद में पूछता हूँ कि वे बड़े होकर क्या बनना चाहते हैं तो वे उल्टा प्रश्न ही दाग देते हैं, कि आपके पिताजी आपको क्या बनाना चाहते थे? जब कहता हूँ कि मुझे पूरी स्वतन्त्रता थी निर्णय लेने की कि मैं क्या बनना चाहता हूँ, तो उन्हें बड़ा अच्छा लगता है कि घर में बच्चों का अधिकार न हड़पने की परम्परा है। अगला प्रश्न और पेचीदा होता है, कि आपको जब छूट थी और आपने जो चाहा, वह बन भी गये तो अब लैपटॉप के आगे बैठकर लिखते क्या रहते हो? स्मृतियाँ सामने घूम जाती हैं और मैं बच्चों को मन का सच बता देता हूँ।

स्वतन्त्रता थी और मन में इच्छा गणितज्ञ बनने की थी, गहरी रुचि भी थी गणित में, सवालों और अंकों से मित्रता सी रहती थी। यदि और अधिक नहीं सोचता तो निश्चय ही किसी विश्वविद्यालय में गणित की गुत्थियाँ सुलझा रहा होता, अंकों की भाषा विद्यार्थियों को सिखा रहा होता। आईआईटी में प्रवेश भी मिल गया और तब वह समय आया जब यह निर्णय करना था कि अन्ततः क्या करना है? जब निर्णय लेने की स्वतन्त्रता मिलती है तो व्यक्ति समय के पहले ही प्रौढ़ हो जाता है, माता-पिता ने जब बालमन को यह आदर दिया तो बरबस ही मन यह जानने लग गया कि भला माता-पिता क्या चाहते हैं? एक बार उनके मन की जानी तो मन ने निश्चय कर लिया कि सिविल सेवा में जाना है, सफलता मिली और रेलवे में आना हुआ, कार्य में मनोयोग से लगे भी हैं। बहुत पहले से लेखन भी होता था, अब धीरे धीरे लेखन में मन लगने लगा है, अंकों से खेलने वाला बालमन अब शब्दों के अर्थ समझ रहा है, और अब तो यह भी पता नहीं कि अभी अस्तित्व के कितने खोल उतरने शेष हैं?

बच्चों के आँखों में चमक तो आयी पर उसका अर्थ मुझे समझ न आया। उन्हें आलोक की भी कथा ज्ञात है, आलोक ने बचपन में एक निर्णय लिया और उसमें अपना जीवन पहचान भी चुका है। मैं अब भी निर्णयों के कई मोड़ों से होकर निकल रहा हूँ, चल रहा हूँ और स्वयं को चलते देख भी रहा हूँ। बच्चों को ज्ञात है कि उन पर कोई निर्णय थोपा नहीं जायेगा, जब भी लेंगे, जो भी लेंगे, वह उनका अपना निर्णय होगा। उनकी आँखों में कोई निर्णय लेने की शीघ्रता भी नहीं है, वे दोनों ही अभी अपने बचपन का आनन्द उठाने में व्यस्त हैं।

उनके प्रति हमारा व्यवहार अनुशासनप्रद भी रहेगा और आदरयुक्त भी, हमारे हाथ इतने दूर भी रहेंगे कि उन्हें दौड़ने में बाधा न हो और इतने पास भी कि गिरने पर उन्हें सम्हाल सकें।

22.9.12

एक आवश्यक निर्णय

बंगलोर की नगरीय व्यवस्थायें सुदृढ़ हैं, तन्त्र कार्यरत रहता है। पहले यही लगता था कि जहाँ पर इतने अधिक लोग रहते हों, वहाँ पर कोई अव्यवस्था न फैले, यह कैसे संभव है? ट्रैफिक की अधिकता के कारण बहुधा जाम लग जाते हैं, लेकिन धीरे ही सही पर गति बनी रहती है, अनुशासन भी रहता है और ट्रैफिक पुलिस की उपस्थिति भी। पानी और बिजली व्यवस्था उस गति से नहीं फैल पा रही है जिस गति से नगर बढ़ रहा है, पर जहाँ भी है, सुचारु रूप से चल रही है। भविष्य का चिन्तन थोड़ा उद्वेलित कर सकता है क्योंकि बंगलोर अभी भी हर प्रकार से जनसंख्या के आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। अच्छा मौसम, नौकरियों की प्रचुरता, अच्छे लोग, सुदृढ़ विधि व्यवस्था, उन्नत शिक्षा, ये सब कारक हैं जो भविष्य में भी आने वाली जनसंख्या का प्रवाह बनाये रखेंगे।

एक और पक्ष जिस पर नगर में रहने वालों का अधिक ध्यान नहीं जा पाता है, वह है यहाँ की सफाई व्यवस्था। सामने से इतना अधिक कार्य होता नहीं दिखता है पर नगर स्वच्छ रहता है, नियत स्थान पर ही कूड़ा मिलता है, सड़कें और गलियाँ स्वच्छ मिलती हैं। सफाई कर्मचारी, जिन्हें यहाँ पर पौरकर्मिका भी कहा जाता है, बहुत सुबह से ही सफाई में लग जाते हैं। कई बार रात्रि निरीक्षण से वापस आते समय ब्रह्ममुहूर्त में उन्हें बंगलोर की सड़कों पर कार्य करते हुये देखा तो न केवल सुखद आश्चर्य हुआ वरन यह भी पता लगा कि कैसे बंगलोर इतना स्वच्छ रह पाता है। सुबह की व्यस्तता के बाद, जब घरों का कूड़ा बाहर आ जाता है और सड़कों से कार्यालय और विद्यालय आदि जाने वाले वाहनों की संख्या कम हो जाती है, तो महापालिका के ट्रक कूड़ा समेटते हुये दिखते हैं। कुछ स्थानों से दैनिक कूड़ा समेटा जाता है, कुछ स्थानों से साप्ताहिक, पर एक सततता बनी रहती है जिससे बंगलोर यथासंभव स्वच्छ रहता है।

नगर को स्वच्छ रखने में नागरिकों के अनुशासन का योगदान भी कम नहीं है। यदि कूड़ा नियत स्थान पर न डाला जाये तो सफाई तन्त्र कुछ ही दिनों में ढह जायेगा। यही नहीं सार्वजनिक स्थानों में भी नागरिक थोड़ा श्रम और समय देते हैं पर कूड़ा कूड़ेदान में ही जाकर फेंकते हैं। बिना किसी दण्ड प्रावधान के इतना आत्मानुशासन निश्चय ही प्रशंसनीय है। नगर को स्वच्छ रखने और उसे संक्रामक बीमारियों से मुक्त रखने का कार्य बड़ा है पर आवश्यक भी है। कुछ भी हो, प्राथमिकता देकर इसका निष्पादन करना ही होता है।

लगभग एक माह पहले, कुछ प्रशासनिक कारणों से नगर के पौरकर्मिका हड़ताल पर चले गये। कारण स्वाभाविक था। नगर का एकत्र कूड़ा आस पास के गाँवों की निचली भूमि को भरने के लिये डाला जाता था, कालान्तर में कूड़ा दब जायेगा और ऊपर का स्थान नगर विस्तार में काम आयेगा। अब जिस स्थान पर नगर भर का कूड़ा फेंका जाता था, वहाँ के स्थानीय निवासियों ने उसका विरोध करना प्रारम्भ कर दिया, कारण उस कूड़े से फैलने वाली दुर्गन्ध और बीमारियाँ ही होगा। विवाद हुआ और हड़ताल हो गयी। यहाँ नगर में हर स्थान पर अव्यवस्था फैल गयी, कूड़े का अम्बार और उसकी सड़न से उठने वाली दुर्गन्ध ने नगर को भी व्याप्त कर लिया। दुर्गन्ध तक ही सीमित होता तो बच कर निकला जा सकता था पर स्वास्थ्य पर भी प्रभाव पड़ने की संभावना बनी हुयी थी। डेंगू से ग्रसित लोगों की संख्या से व्याप्त गंदगी को मापा जा सकता है। कई स्थानों पर डेंगू के मरीज भर्ती भी हुये। सरकार समय रहते चेत गयी, गाज प्रशासनिक अधिकारी पर गिरी, नये अधिकारी नियुक्त हुये। अब समय व्याप्त अव्यवस्था को समेटने का था, इस घटना की पुनरावृत्ति न हो उसके उपाय करने का था, साथ ही साथ ऐसा पुनः होने की स्थिति में सड़न और दुर्गन्ध की मात्रा सीमित की जा सके, उससे सम्बन्धित निर्णय लेने का था।

निर्णय आवश्यक थे, आलोचना हुयी थी, साख पर बाट लगी थी। सारे लंबित प्रस्ताव पारित हो गये, लगा मानो इसी समस्या में उनका उद्धार निहित था। जो भी निष्कर्ष आये, वे बंगलोर के हित में ही थे, इस स्तर पर उतर कर सोचना आवश्यक था। इस बार के निर्णयों को कानून के रूप में लागू करने का प्रयास किया जा रहा है। समय भागा जा रहा था, यदि निर्णय अभी न लिये जाते तो आने वाले समय में यह समस्या विकराल रूप धर लेती। यही नहीं, यहाँ का उदाहरण देश भर की सभी नगरपालिकाओं को भी अपनाना चाहिये।

कूड़ा प्रमुखतः ६ तरह का होता है। घर की सब्जियों आदि से निकला गीला कूड़ा, कागज और ग्लास आदि की तरह पुनः उपयोग में लाये जाना वाला सूखा कूड़ा, पत्ती पौधों आदि से निकला कार्बनिक कूड़ा, धूल और निर्माण कार्य से निकला कूड़ा, अस्पतालों से निकला चिकित्सीय कूड़ा और अन्त में इलेक्ट्रॉनिक हानिकारक कूड़ा। हर तरह के कूड़े का निष्पादन अलग तरह से होता है। घर से हर तरह का कूड़ा निकलता भी नहीं है, मुख्यतः पहले तीन तरह का कूड़ा ही अधिक मात्रा में होता है। इन सब तरह के कूड़े को हमें अब अपने घर में ही अलग करना होगा, महापालिका के कर्मचारी उन्हें उसी रूप में एकत्र करेंगे, आपके द्वारा ऐसा नहीं करने में आपका कूड़ा स्वीकार नहीं किया जायेगा। निश्चय ही यह बड़ा प्रभावी निर्णय है, नागरिकों को कार्य अधिक करना पड़ेगा, महापालिका को कार्य अधिक करना होगा, पर नगर स्वच्छ रहेगा। उपरोक्त नियम अक्टूबर माह से लागू हो जायेंगे, इससे संबंधित सुझावों को भेजने के लिये एक संपर्क भी दिया है।

एक महत्वपूर्ण दिशा तो मिल गयी है, बंगलोर को स्वच्छ रखने के प्रयासों को, पर उसे कहीं और आगे ले जाने की आवश्यकता है।

प्रतिदिन बंगलोर में लगभग ५००० टन कूड़ा निकलता है, लगभग ५०० ट्रक के बराबर या दो मालगाड़ियों के बराबर। इसमें ७० प्रतिशत कूड़ा ऐसा होता है जो जैविक होता है। यह खाद्य पदार्थों से आता है और विघटनशील होता है, यही सड़न उत्पन्न करता है। इस जैविक कूड़े में लगभग ६० प्रतिशत तक पानी होता है। सम्प्रति सारे कूड़े को हम एकत्र करते हैं और नगर के बाहर ले जाते हैं। यदि इस जैविक कूड़े को हम स्थानीय रूप से कम्पोस्टिंग करें तो उसमें शेष ४० प्रतिशत खाद मिलेगी हमें, वह खाद जो अत्यन्त उच्चस्तरीय होती है और स्थानीय रूप से खप भी जाती है। जिन घरों में पशुपालन होता है, वहाँ तो जैविक खाद्यशेष पशुओं को दे दिये जाते हैं और तब हमें गोबर के रूप में खाद मिलती है। मध्य नगर में पशुपालन तो संभव नहीं है पर कम्पोस्टिंग करके खाद तो बनायी ही जा सकती है। लाभ दुगुना है, प्रतिदिन ५०० के स्थान पर १५० ट्रक ही आवश्यक होंगे कूड़ा ढोने के लिये और साथ ही साथ प्रतिदिन १४०० टन की जैविक खाद भी मिलेगी। अभी तो सारी ऊर्जा और प्रयास कूड़े को ढोने में ही व्यर्थ हो रहे हैं।

वैसे तो श्रीमतीजी की बहुत सी अभिरुचियाँ हमारे लिये मँहगी पड़ती हैं पर कम्पोस्टिंग के प्रति उनकी लगातार बढ़ती हुयी ललक अब न केवल रंग लाने लगी है, वरन हमें भी भाने लगी हैं। जब उन्होंने बंगलोर जैसे बड़े नगर में उपस्थित सम्भावनायें गणनाओं के समेत समझायीं तब से यही लग रहा है कि स्थानीय स्तर पर कम्पोस्टिंग को बढ़ावा देना चाहिये। गावों और छोटे कस्बों में लोग पशुपालन करके जैविक कूड़े को गोबर के माध्यम से जैविक खाद में बदल सकते हैं और नगरों में जहाँ पशुपालन संभव नहीं है, वहाँ सबके लिये कम्पोस्टिंग महापालिकाओं की ओर से प्रोत्साहित की जानी चाहिये। यह एक और आवश्यक निर्णय हो, हर नागरिक के लिये।

19.9.12

एप्पल का मूल्य

अभी तक की सर्वाधिक मूल्यवान कम्पनी का स्थान पाने के बाद अपेक्षाओं का जो अंबार एकत्र होता है, उसे समेट कर व्यवस्थित रख पाना उस कम्पनी की अगली चुनौती बन जाती है। शीर्ष पर होने का धर्म उत्सवीय कम और चिन्तनशील अधिक होता है। ऊँचाई पर तनिक बैठ कर सुस्ता लेने में लुढ़क जाने का भय है, सबकी दृष्टि आप पर जो है, प्रतियोगिता गलाकाट जो है। नयी तकनीकों का विस्तार और उनके प्रयोगों का अधिकार, दोनों कार्य उस कम्पनी की क्षमता को सतत तौलते रहते हैं। यह केवल कम्पनियों पर ही लागू नहीं होता है वरन ऊँचाई पर पहुँचे व्यक्तियों, समाजों और सभ्यताओं पर भी सटीक बैठता है।

लगभग वर्ष भर पहले जब स्टीव जॉब्स का निधन हुआ था, उस समय एप्पल से मात्र प्रारम्भिक परिचय हुआ था। तब मैकबुक एयर माह भर पुराना था और आईफोन लिये जाने में दो माह शेष थे। स्टीव जाब्स के व्यक्तित्व ने प्रभावित किया था, बहुत कुछ इसलिये कि सफलता प्रभावित करती है, बहुत कुछ इसलिये भी कि तलहटी तक गिर कर शिखर को छूने वालों की विश्व उपासना करता है, उनका संघर्ष सबको अभिभूत करता है। स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय में दिये गये अभिभाषण ने उनके व्यक्तित्व के आधारभूत गुणों से सारे विश्व को अवगत कराया था। मृत्यु को देख कर वापस आने वाले जीवन अपना समय व्यर्थ नहीं करते है, पैन्क्रियाटिक कैंसर से बच कर निकले जो ६ वर्ष उन्होंने व्यतीत किये हैं, वे न केवल एप्पल के लिये मूल्यवान थे वरन विश्व की दिशा नियत करने में सक्षम भी। मेरे लिये इस धारणा के सत्यापन का आधार एप्पल उत्पादों का वर्ष भर किया हुआ उपयोग रहा, मैकबुक एयर और आईफोन का उपयोग रहा।

निश्चय ही एप्पल के उत्पाद मँहगे होते हैं, और उन्हें खरीदने के पहले आपको दो बार सोचना होता है। आर्थिक अवलोकन आवश्यक है पर यह भी सच है कि हम सबसे सस्ती चीज भी नहीं खरीदते हैं। आवश्यकता के अनुसार मापदण्ड निश्चित करने के बाद हम गुणवत्ता का ही आधार लेते हैं, अधिक गुणवत्ता के लिये अधिक धन खर्च करना स्वाभाविक भी है। संभवतः यही हुआ मैकबुक एयर की खरीद में, एक ऐसा लैपटॉप देख रहा था जो हल्का हो, बैटरी पर अधिक समय चलने वाला हो और संरचना में सुदृढ़ हो। इस विषय पर कई दिन अनुसंधान किया पर किसी और उत्पाद को इसके निकट नहीं पाया। वर्षों विण्डो पर कार्य करते बीते थे अतः नये परिवेश में ढलना प्रारम्भ में तनिक कठिन रहा, पर धीरे धीरे कार्य ने गति पकड़ ली। आईफोन का खरीदना और भी रोचक रहा, विण्डो मोबाइल ४ वर्ष का हो चुका था, नोकिया, एलजी और ब्लैकबेरी के हिन्दी टाइप करने वाले तीन और मोबाइल उपयोग में लाया पर संतुष्टि नहीं मिली। उसी समय आईफोन पर हिन्दी पूर्ण रूप में आयी थी, जबकि एण्ड्रॉयड आदि विकासशील स्थिति में थे। आईफोन थोड़ा प्रयोग कर देखा, बहुत अच्छा लगा, खरीद लिया। दोनों में ही धन थोड़ा अधिक लगा था, पर एक वर्ष के उपयोग में पायी संतुष्टि के आधार पर यह कह सकता हूँ कि दोनों ही निर्णय गर्व करने योग्य थे।

आधुनिक डिजिटल जीवन के तीन अंग होते हैं, कम्प्यूटर या लैपटॉप, मोबाइल, इण्टरनेट। अपने अपने क्षेत्रों में इन तीनों का अलग अलग उपयोग भी किया जा सकता है और समन्वय स्थापित करके भी। इनका प्रभावी उपयोग करने वाले जानते हैं कि इनका भी अपना पारितन्त्र है, एक अवयव दूसरे का प्रेरक और पूरक है। कहने को तो मोबाइल न जाने कितने कार्य कर सकता है,फिर भी सुविधा के लिये हमें लैपटॉप का उपयोग करना पड़ता है। इसी प्रकार लैपटॉप भी सारे कार्य करता है पर हर स्थान पर ले नहीं जाया जा सकता है। कई ऐसे कार्य हैं जो हम दोनों में ही करते हैं और कई बार ऐसा भी होता है कि दोनों ही उपस्थित नहीं होते हैं, उस समय इण्टरनेट के माध्यम से हम अपने कार्य तक पहुँचना चाहते हैं। सारी आधुनिक कम्पनियाँ लैपटॉप, मोबाइल और इण्टरनेट सेवाओं के इस पारितन्त्र को स्थापित करने में लगी हैं। ध्यान से देखें तो किसी भी कम्पनी के पास तीनों अवयव उपस्थित नहीं हैं, सिवाय एप्पल के। माइक्रोसाफ्ट के पास मोबाइल का निर्माण नहीं है, इण्टरनेट सेवायें भी कम हैं। गूगल के पास कम्प्यूटर नहीं है, इसी प्रकार किसी भी बड़ी कम्पनी को देखें तो कोई न कोई अवयव अनुपस्थित मिलेगा।

क्या सुदृढ़ पारितन्त्र स्थापित करने के लिये सारे अवयवों का एक कम्पनी के साथ होना आवश्यक है? क्या सॉफ्टवेयर बनाने वाले हार्डवेयर भी बनायें? जी हाँ, यदि एलन के की माने तो, उनके अनुसार यदि कोई अपने सॉफ्टवेयर के प्रति गम्भीर है तो उन्हें अपना हार्डवेयर स्वयं बनाना चाहिये। इस तर्क में बल है और इसे समझना सरल भी। जब हम कोई ऐसा उत्पाद बनाते हैं जिसमें सभी को संतुष्ट कर सकें या जिसमें सभी के लिये संभावनायें हो तो बहुधा एक आम सा उत्पाद बन कर सामने आता है। वह उत्पाद भारी होता है और उसमें कई अनावश्यक चीजें कम की जा सकती हैं। आन्तरिक समन्वय वाह्य समन्वय से कहीं अधिक प्रभावी होता है। एप्पल इन तीनों ही क्षेत्रों में सिद्धहस्त है, और उनके आपसी समन्वय में कोई घर्षण भी नहीं है। मैकबुक एयर, आईपैड, आईफोन, आईक्लाउड और आईट्यून्स आदि अपने क्षेत्रों के उत्कृष्टतम उत्पाद हैं। वर्ष भर के अनुभव में इन सबको ढंग से समझने का अवसर मिला और एप्पल के पारितन्त्र की गुणवत्ता और उत्कृष्टता पर कोई सन्देह नहीं रहा।

स्टीव जाब्स जेन से प्रभावित थे, जेन सरलता को महत्व देता है। सरलता हर क्षेत्र में, जीवन में भी, कार्यक्षेत्र में भी। अनावश्यक को तब तक तजते जाना, जब तक अस्तित्व में पूर्णता न छलकने लगे। पता नहीं क्यों पर मुझे एप्पल के हर उत्पाद जेन के डिजिटल प्रतिरूप लगते हैं। उत्पादों को आकार इतना छोटा कर पाना और इतने कम में इतना अधिक भर पाना तब तक संभव नहीं हो सकता जब तक अनावश्यक आयतन हटा न दिया गया हो। जब उनके आईपॉड डिजाइनर ने कहा कि उन्होने आईपॉड का न्यूनतम आकार पा लिया है, तो उन्होने आईपॉड को एक एक्वेरियम में डाला दिया और कहा कि जब तक बुलबुले निकलना बन्द न हो जाये तब तक उसका आकार कम करें। उत्पाद डिजाइन में भी दर्शन समाहित किया जा सकता है, यह एप्पल के उत्पादों में देखा जा सकता है। सरलता का यही स्वरूप आईफोन में मात्र एक होम बटन के रूप में भी देखा जा सकता है और मैकबुक एयर की एकल एल्युमुनियम बॉडी में भी। यही सरलता सॉफ्टवेयर और ऑपेरेटिंग तन्त्र में दिखायी पड़ती है, यही कारण है कि एप्पल की ऊर्जा खपत न्यूनतम है और उत्पाद बिना रिचार्ज किये लम्बे चलते हैं।

एप्पल का दूसरा सशक्त पक्ष है कि डिजाइन संबंधी किसी भी तत्व को मूल से देखना। एप्पल के उत्पादों में कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे उन्नत बनाने का प्रयास न किया गया हो। चिप, बॉडी, बैटरी, स्क्रीन, कैमरा, स्पीकर, हर वस्तु में हर बार कुछ न कुछ नया किया है। इतने श्रम और शोध ने न केवल एप्पल के उत्पादों को शीर्षतम स्तर पर पहुँचा दिया वरन प्रतियोगियों को भी बाध्य किया कि वे भी सृजन की राह पर बढ़ें। यदि कहा जाये कि एप्पल लगातार इस व्यवसाय के मानक तय कर रही है तो अतिश्योक्ति नहीं होगा।

जब आप सर्वश्रेष्ठ करने की ठान लें तो आप के लिये यह पता करना आवश्यक नहीं कि ग्राहकों को क्या चाहिये। स्टीव जाब्स ने माँग जानने के लिये कभी कोई ग्राहक सर्वेक्षण नहीं कराया। अपनी ओर से सर्वश्रेष्ठ देकर सदा ही ग्राहकों को चकित करने की परम्परा रही है एप्पल में। ग्राहकों ने भी सदा ही उस गहन श्रम और शोध को सर आँखों पर बिठाया और अब स्थिति यह है कि लोग महीनों पहले से एप्पल के नये उत्पाद आने की प्रतीक्षा करते हैं।

एप्पल ने यहाँ तक निर्धारित किया कि उपयोगकर्ता के लिये सर्वश्रेष्ठ उपयोग-विधियाँ क्या हों। स्टाइलस के स्थान पर ऊँगली के उपयोग ने सारे अनुभव को सरल और त्वरित कर दिया। धीरे धीरे एप्पल की उपयोग-विधियाँ मानक हो गयीं और अभी भी वही दिशा बनी हुयी है।

मैकबुक एयर, आईफोन और आईक्लाउड के माध्यम से हमारा प्रशासनिक और साहित्यिक कार्य निर्बाध हो गया है। सरलता और सततता कार्यशैली के मूलमन्त्र बन गये हैं। समय का भरपूर उपयोग और उत्पादकता बढ़ाने में एप्पल ने एक महत योगदान दिया है। मेरे लिये तो एप्पल का मूल्य गहरा है और मापा नहीं जा सकता है, शोधपरक और श्रमशील एप्पल मेरे लिये सदा ही मूल्यवान बनी रहेगी।

15.9.12

फ्रस्टियाओ नहीं मूरा

बड़ी दिलासा देते हैं ये शब्द, विशेषकर तब, जब पति जेल में हो, पति अपनी पत्नी को यह गाने को कहता हो और उसकी पत्नी सस्वर गा रही हो। बाहुबली पति का आत्मविश्वास बढ़ा जाता है, यह गीत। उसकी दृष्टि से देखा जाये तो स्वाभाविक ही है, बाहर का विश्व बेतहाशा भागा जा रहा है, उसके प्रतिद्वन्दी उसके अधिकारक्षेत्र में पैर पसार रहे हैं और वह है कि जेल में पड़ा हुआ है। गीत समाप्त होता है, मिलाई का समय समाप्त होता है, दोनों की व्यग्रता शान्त होती है। फिल्म देख रहे दर्शकों को भी आस बँधती है कि अब फैजल बदला लेगा, गीत के माध्यम से उसे तत्व ज्ञान मिल चुका है, ठीक उसी तरह जिस तरह कृष्ण ने व्यग्र हो रहे अर्जुन को जीवन का मूल तत्व समझाया था।

ध्यान से सुनिये यह गीत, हर पद में एक अंग्रेजी शब्द है, फ्रस्टियाओ, नर्भसियाओ, मूडवा, अपसेटाओ, रांगवा, सेट राइटवा, लूसिये, होप, फाइटवा। इन सबको मिलाकर एक गीत बनाया है, लोकसंगीत का मधुर मिश्रण है, भाव, विभाव और संचारी भाव हैं, निष्कर्ष है गजब का प्रभाव। विश्वविजेता रहे अंग्रेजों की अंग्रेजी की देशी दुर्दशा होते देख शब्दशास्त्री कितने ही भौंचक्के हो जायें, पर इन शब्दों को अर्थसहित जिस सहजता से हमने अपनी संस्कृति में आत्मसात किया है, उतना आत्मविश्वास तो इस शब्द को अंग्रेजी में बोलते समय भी नहीं आता होगा। यदि अंग्रेजों ने हमें अंग्रेजियत सिखायी तो हमने भी अंग्रेजी शब्दों को अल्हड़ देशीपना सिखा दिया है।

संस्कृति, भाषा और भाव के पारस्परिक प्रभाव से ऊपर उठें और इस पर विचार करें कि फ्रस्टियाना होता क्यों है? इस प्रक्रिया को समझते ही उससे संबद्ध लघुप्रभाव और उससे निदान के उपाय समझ में आ जायेंगे। मनोवैज्ञानिक भले भी कितनी कठिन कठिन परिभाषायें गढ़ लें पर उदाहरणों के माध्यम से समझना ही मस्तिष्क में स्थायी रहता है। फिल्म का परिवेश धनबाद के निकट वासेपुर का है, जहाँ पर कोयले और उससे संबद्ध व्यवसायों में अनापशनाप धन कमाने की न जाने कितनी संभावनायें हैं। दोहन, संदोहन और महादोहन चल रहा है, अव्यवस्था का राज है, शक्ति का नाद ही स्पष्ट सुनायी पड़ता है, आपाधापी मची है। समर्थक, विरोधी नित नये तिकड़म लगा रहे हैं, और सहसा विकास की इस विधा को न समझने वाली पुलिस तुच्छ से अपुलसीय कारणों में नायक फैजल को जेल के अन्दर डाल देती है। अब बताईये कि वह फ्रस्टियाये न, तो क्या करे?

थोड़ा और सरल ढंग से समझें। जब माँग अधिक होती है और आपूर्ति कम, तो प्राप्ति के लिये संघर्ष बढ़ता है। अब जो लोग सक्षम होते हैं, वे उस संघर्ष में कुछ प्राप्त कर लेते हैं, शेष सब फ्रस्टियाने लगते हैं। कॉलेज में प्रवेश के लिये यही होता है, कॉलेज में जाने के बाद सौन्दर्यमना युवाओं में यही होता है, नौकरी पाने के बाद यही होता है और यही क्रम अन्य क्षेत्रों में धीरे धीरे बढ़ता रहता है। कुछ न पा पाने की अवस्था फ्रस्टियाने का मूल स्रोत है। पर ऐसा नहीं है कि फ्रस्टियाना पूरी तरह से वाह्य कारणों पर ही आधारित हो। निश्चय ही यह एक बड़ा कारक है, पर अपनी क्षमताओं और अपने अधिकार के बारे में हमारा आकलन भी उसके लिये उत्तरदायी है। अब बताईये, फैजल अगर वासेपुर से संतुष्ट रहते और धनबाद में हस्तक्षेप न करते तो फ्रस्टियाने की मात्रा कम की जा सकती थी। हम स्वयं को महारथी समझते हैं और जब भाग्य या घटनायें हमें पैदल कर देती हैं, तो हम फ्रस्टियाने लगते हैं।

जब जीवन में भय अधिक होता है तो व्यक्ति अल्पकालिक लाभों की ओर भागता है, जब अनिश्चितता अधिक होती है तब व्यक्ति अधीर हो जाता है, सब कुछ कर डालने के लिये। इस अवस्था को उन्माद कह लें या व्यग्रता। उन्माद अनियन्त्रित होता है, बढ़ता जाता है, अवरोध क्षोभ उत्पन्न करता है, असफलता अवसाद ले आती है। तब फिर से किसी को यह गाना गाना होता है, सस्वर। बहुत लोगों को बड़े प्रलोभन की सतत आस क्षोभ में नहीं जाने देती है। छोटे मोटे अवरोधों को पार करने के लिये यही स्वप्न पर्याप्त होते हैं। पुराने समय में जब आक्रमणकारी सैनिक युद्ध के लिये निकलते थे तो उन्हें भी प्रलोभन दिया जाता था कि जीत के बाद लूट में मुक्त हस्त मिलेगा, हर तरह की लूट में। उन्माद जब तक बना रहता है, कार्य चलता रहता है, उन्माद कम हुआ तो फ्रस्टियाना प्रारम्भ हो जाता है।

जहाँ जीवन बुलबुले सा हो जाता है, वहाँ सुख को तुरन्त ही भोग लेने की मानसिकता विकसित हो जाती है, वहाँ समाज का दीर्घकालिक स्वरूप क्षयमान होने लगता है। गैंग ऑफ वासेपुर बस वही कहानी चीख चीख कर बतला रहा है। कोयले से भी अधिक काली वहाँ की कहानी है। अथाह सम्पदा पड़ी है वहाँ, सबके लिये, पर वर्चस्व का युद्ध उसे भी शापित कर देता है। उन्नत सभ्यताओं को देख चुके लोगों को यदि मानव अस्तित्व का दूसरा छोर समझना हो तो उन्हें यह फिल्म अवश्य देखनी चाहिये।

अल्पकालिक मानसिकता फ्रस्टियाने का प्रमुख कारण है, और अल्पकालिक घटनाओं को दीर्घकालिक परिप्रेक्ष्य में रख देना उसका निदान है। जब भी यह स्थिति आती है तब लक्षण चीख चीख कर अपनी उपस्थिति बताते हैं। अर्जुन भी इसी में लपट गये थे, शरीर से पसीना आना, मुख सूख जाना, हाथों में कम्पन होना, गीता के प्रथम अध्याय में सारे लक्षण ढंग से वर्णित हैं। कृष्णजी को तुरन्त ही समझ आ गया था कि ये फ्रस्टियाने के लक्षण हैं और अर्जुन किसी अल्पकालिक अवस्था के फेर में पड़े हुये हैं। कृष्ण के तर्कों की पहली श्रंखला आत्मा के बारे में होती है, अभिप्राय स्पष्ट था कि यदि आप आत्मा हो तो अल्पकालिक कैसे सोच सकते हो, एक जन्म के बारे व्यथित होने का क्या लाभ।

अर्जुन पढ़े लिखे थे, उन्हें न केवल यह बात तुरन्त समझ में आ गयी वरन उसके बाद उन्होंने हम सबके लाभ के लिये ढेरों प्रश्न पूछ डाले। हमारे लिये तो गीता का दूसरा अध्याय पर्याप्त है, स्वयं को आत्मा समझ लेने के पश्चात सारे सुख दुख तो सर्दी गर्मी जैसे लगने लगते हैं। लगने लगता है कि जब इतना लम्बा चलना है तो पथ में लगे एक काँटे या पथ में दिखे एक फूल का क्या महत्व? संभवतः यही कारण है कि दूसरा अध्याय पूरा होते होते मन शान्त हो जाता है, और संतुष्टि में नींद भी आ जाती है। वासेपुर के लोगों को गीता समझ आये न आये पर होपवा अवश्य समझ आता है। होप या आशा पर ध्यान जाते ही परिप्रेक्ष्य दीर्घकालिक हो जाता है। तब थोड़ा समय दिखता है, क्षोभ और साम्य के बीच, समय जिसमें बिगड़े हुये कारकों को ठीक किया जा सकता है।

यह गाना देशी है और बहुत प्रभावी है, कई बार इसे प्रयोग कर चुका हूँ, अपने ऊपर, अपने साथी अधिकारियों पर और अपनी श्रीमतीजी पर भी। रामबाण की तरह असर करता है, और सबसे अच्छी बात यह है कि इसे गाने के लिये कण्ठ पर अधिक जोर डालने की आवश्यकता भी नहीं है। हमने श्रीमतीजी को भी सिखा दिया है। चेहरे के भाव छिपाना तो हमें वैसे भी नहीं आता था, अब उनके कण्ठ के स्वर को सहना भी सीख रहे हैं।

विश्वास नहीं होता, तो गाकर देख लीजिये….फ्रस्टियाओ नहीं मूरा….

12.9.12

ध्यान से देखो, थोड़ा और ध्यान से

दर्पण देखता गया, पंथ खुलता गया। चेहरे पर दिखता, त्वचा का ढीला पड़ता कसाव, जो यह बताने लगा है कि समय भागा जा रहा है। शरीर की घड़ी गोल गोल न घूमकर सिकुड़ सिकुड़ सरकती है, शक्ति और सौन्दर्य के प्रतिमानों को धूमिल करती हुयी सरकती है, समय अपना प्रभाव धीरे धीरे व्यक्त करता है। शरीर सरलता की ओर सरकता है, निर्जीव पड़े केश-गुच्छ कम हो जाते हैं, श्वेतरंगी हो जाते हैं, बाहों और वक्ष के माँसल अवयव सपाट और कोमल होने लगते हैं, चेहरे पर पल पल बदलते भाव एकमना हो जाते हैं, जीवन प्रतीक्षारत सा दिखने लगता है। अन्त दिखते ही जीवन ठिठक जाता है, संशय अपना लेता है, गतिहीन होने लगता है, धीरे धीरे।

थोड़ा और ध्यान से दर्पण देखता हूँ। मन यह विश्वास दिलाना चाहता है कि तुम अब भी वही हो, दर्पण के असत्य को स्वीकार मत करो, तनिक और ध्यान से देखो, कुछ भी तो नहीं बदला है। मन की बात का विश्वास होता ही नहीं है, सच भी हो तब भी नहीं, इतने छल सहने के बाद भला कौन विश्वास करेगा मन का। आज दर्पण को देख रहा हूँ तो मन की मानने का मन नहीं कर रहा है। मन समझ जाता है कि दर्पण सत्य बता रहा है, मन की माया रण हार रही है। मन आँख बन्द कर सोचने को कहता है, क्षय का पीड़ामयी आक्रोश तो वैसे भी नहीं सम्हाला जा रहा था आँखों से, आँखें बन्द हो जाती हैं।

आँख बन्द कर जब शरीर का भाव खोता है तो लगता है कि हम अभी भी वही हैं जो कुछ वर्ष पहले थे, कुछ दिन पहले भी स्वयं के बारे में जो अनुभूति थी, वह अभी भी विद्यमान है, कुछ भी नहीं बदला है, सब कुछ वही है। बन्द आँखों में एक भाव, खुली में दूसरे। मन की माया सच है या कि दर्पण का दर्शन। कठिन प्रश्न है, काश अपना चेहरा न दिखता, काश दर्पण ही न होता।

चिन्तन की लहरें उछाल ले रही हों तो किसी और कार्य में मन भी तो नहीं लगता है। सामने दर्पण है, मन के भाव अस्त-व्यस्त कपड़ों से फैले हुये हैं, न समेटने की इच्छा होती है, न ही दृष्टि हटाने का साहस। स्मृतियों का एक एक कपड़ा निहारने लगता हूँ, लगा कि सबको एक बार ढंग से देख लूँगा तो मन शान्त हो जायेगा। जीवन बचपन से लेकर अब तक घूम जाता है, संक्षिप्त सा।

बचपन की प्रथम स्मृति से लेकर अब तक के न जाने कितने रूप सामने दिखने लगते हैं, सब के सब स्पष्ट से सामने आ जाते हैं, मानो वे भी सजे धजे से राह देख रहे थे, स्मृतियों की बारात में जाने के लिये। बचपन की अथाह ऊर्जा, निश्छल उच्श्रंखलता और अपरिमित प्रवाह अब भी अभिभूत करता है। फिर न जाने क्या ग्रहण लग गया उसे, उस पर सबकी आशाओं और आकांक्षाओं की धूल चढ़ने लगी, दायित्वों और कर्तव्यों के न जाने कितने गहरे दलदल में फँसा हुआ है अभी तक। हर दिन कुछ न कुछ बदलता गया, धीरे धीरे। जब इतना कुछ बदल गया तो क्यों मन यह दम्भ पाले है कि कुछ नहीं बदला है? आँख खुली रहने पर दर्पण मन को झुठलाता है, आँख बन्द करने पर भी मन की नहीं चलती, स्मृतियाँ मन को झुठलाने लगती हैं।

आँखे फिर खुल जाती हैं, दर्पण आपके सामने आपका चेहरा फिर प्रस्तुत कर देता है। निष्कर्ष अब भी दूर हैं, साम्य नहीं है, अन्दर और बाहर। क्यों, कारण ज्ञात नहीं, पर दर्पण से कभी इतना गहरा संवाद हुआ ही नहीं। जब भी चिन्तन हुआ, मन उस पर हावी रहा, सारी परिभाषायें, सारे परिचय, सारे अवलोकन, सारे निर्णय मन के ही रास्ते होकर आये। दर्पण के रूप में आज कोई मिला है जो मन को ललकार रहा है।

मन हारता है तो आपको भरमाने लगता है। दर्पण आज मन का एकाधिकार ध्वस्त करने खड़ा है, वह बताना चाह रहा है कि आप बदल चुके हैं, सब बदल चुके हैं, मन है कि यह मानने को तैयार ही नहीं, किसी भी रूप में नहीं। यह उहापोह वातावरण गरमा देती है, वहाँ से हटना असंभव सा हो जाता है। मैं दर्पण फिर देखता हूँ, कभी मुझे एक पुरुष दिखता है, कभी एक भारतीय, कभी एक हिन्दू, कभी एक हिन्दीभाषी, कभी एक लेखक, और अन्दर झाँकता हूँ तो कुछ और नहीं दिखता है, सब की सब उपाधियाँ अलग अलग झलकती हैं। पलक झपकती है, तो कभी एक पुत्र, कभी एक भाई, कभी एक पति, कभी एक पिता, संबंधों के जाल दर्पण पुनः धुँधला देते हैं। आँख फाड़ कर और ध्यान से देखता हूँ, तो परिचितों की आकाक्षाओं से निर्मित भविष्य के व्यक्तित्व दिखने लगते हैं। लोगों की आशाओं पर खरा न उतर पाने का भाव भला दर्पण को कैसे ज्ञात हुआ? नहीं, नहीं, चेहरा ही नहीं छिपा पा रहा है, यह भाव।

मन झूठा सिद्ध हो चला था, वह यह समझा ही नहीं पा रहा था कि मैं अब भी वही हूँ, जो पिछले ४० वर्षों से उसके निर्देशों पर नृत्य किये जा रहा हूँ। आज दर्पण ने मुझे मेरे इतने रूप दिखा दिये थे कि किसी पर कोई विश्वास ही नहीं रहा, व्यक्तित्व बादलों सा हो गया, हर समय अपना आकार बदलने लगा। कुछ भी पहचाना सा नहीं लगता है, कोई ऐसी डोर नहीं दिखती है जो मुझे मुझसे मिला दे।

स्वयं के खो जाने की पीड़ा अथाह है, एक गहरी सी लहराती हुयी रेख उभर आती है पीड़ा की, विश्वास हो उठता दर्पण पर, विश्वास हो आता है अपने खोने का। मन थक हार कर शान्त बैठ जाता है, एक निर्धन और गृहहीन सा।

आँखे धीरे धीरे फिर खुलती हैं, दर्पण अब भी सामने है, कुछ धँुधला सा दिखता है, आँखों का खारापन पोंछता हूँ। चेहरा पूर्ण संयत हो चला है, सारी उपाधियाँ चेहरे से विदा ले चुकी हैं, चेहरे के कोई भाव नहीं दिखते हैं, बस दिखती हैं तो आँखें। अहा, कोई जाना पहचाना सा दिखता है, अपनी आँखों में अपनी पहचान दिखने लगती है, वह आँखे जिससे अभी तक सारी दुनिया मापते आयें हैं। आँखों में और गहरे देखता हूँ, उसमें बिखरे हुये सारे व्यक्तित्वों का केन्द्र दिखने लगता है। कुछ और देर देखता रहता हूँ, सब कुछ सिमटने लगता है, सब कुछ व्यवस्थित होने लगता है। मन सहसा ऊर्जा पा जाता है, उसे स्वयं को सत्य सिद्ध करने का अवसर मिल जाता है, मन इस बार धैर्य नहीं खोता है, बस यही कहता है…

ध्यान से देखो, थोड़ा और ध्यान से...

8.9.12

विस्तार जगत का पाना है

आयाम विचारों का सीमितरह चार दीवारों के भीतर,
लगता था जान गया सब कुछअपने संसारों में जीकर,
कुछ और सिमट मैं जाता थाअज्ञान सुखद हो जाता था,
अपने घर में ही घूम रहामन आत्म-मुग्ध-मदिरा पीकर ।।१।।

करते अन्तरमन अवलोकनसंगूढ़ प्रश्न उठते जब भी,
यदि व्यथित विचारों की लड़ियाँतब लिये समस्या जीवन की,
हम चीखे थे उद्गारों कोजो भेद सके दीवारों को,
पर सुनते थे दीवारों सेअनुनाद वहीसंवाद वही ।।२।।

लगता कुछ और बड़ी दुनियाहटकर विस्तारों से घर के,
थे रमे स्वजीवन में पूरेहम घर से दूर नहीं भटके,
मनजीवन अपना चित-परिचितपर शेष प्रभावों से वंचित,
भर लेने थे सब अनुभव-घटजो रहे अधूरे जीवन के ।।३।।

वनकुंजों में कोयल कूँकेगूँजे मधुकर मधु-उपवन में,
नदियाँ कल कलझरने झर झरबँध प्रकृति पूर्ण आलिंगन में,
चिन्तन नभ में उड़ जाना थाउड़ बादल में छिप जाना था,
संग बूँद चीरते पवन-पुंजसागर ढूढ़ूँ नीरव मन में ।।४।।

मेघों का गर्जन अर्थयुक्तपृथ्वी का कंपन समझूँगा,
माँ प्रकृति छिपाये आहत मनआँखों का क्रन्दन पढ़ लूँगा,
सुन चीख गरीबीभूख भरीअँसुअन बन मन की पीर ढरी,
तन कैसे जीवन ढोता हैअध्याय हृदयगत कर लूँगा ।।५।।

यदि संस्कार क्षयमान हुयेहोती परिलक्षित फूहड़ता,
वह शक्ति-प्रदर्शनअट्टहासलख राजनीति की लोलुपता,
जीवन शापित हर राहों मेंभर कुरुक्षेत्र दो बाहों में,
कर छल-बलपल पल खेल रहीपूछूँगाकैसी जनसत्ता ।।६।।

चहुँ ओर हताशा बिखरी हैबन बीज जगत के खेतों में,
देखूँगा निस्पृहजुटे हुयेसब भवन बनाते रेतों में,
जीवन के पाँव बढ़ायेंगेअपने उत्तर पा जायेंगे,
सब चीख चीख बतलाना हैकब तक कहते संकेतों में ।।७।।

कविता संग रहते ऊब गयीउसको भी भ्रमण कराना है,
एक नयी हवाएक नयी विधाजीवन में उसके लाना है,
अभिव्यक्ति बनी थी जीवन कीबनकर औषधि मेरे मन की,
वह संग रहीपर उसको भीविस्तार जगत का पाना है ।।८।।