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26.9.12

बच्चों का जीवन

'ऐसी क्या चीज है, जो आपको तो नहीं मिलती है पर आपसे उसकी आशा सदैव की जाती है', आलोक ने बच्चों से पूछा। इज्जत या आदर, उत्तर मिलने में अधिक देर नहीं लगी, और बहुत बच्चों ने यह उत्तर दिया। उत्तर सही भी है, बच्चे के दृष्टिकोण से देखें, उससे सदा ही आशा की जाती है कि वह अपने माता-पिता, गुरुजनों और अग्रजों का आदर करे, पर उसे सदा ही अनुशासनात्मक, उपदेशात्मक और प्रताड़ित करते हुये से आदेश मिलते हैं। किसी के जीवन में इसकी मात्रा कम रही होगी, किसी के जीवन में अधिक, पर भूला तो कोई भी नहीं होगा। बच्चों के लिये अन्याय और अनादर भूलना बहुत कठिन होता है। झाँसी प्रवास के समय हमारे पुत्र की पूरी कक्षा को किसी एक की उद्दण्डता के लिये दण्ड मिला, बहुधा शान्त से रहने वाले हमारे सुपुत्र जी इसको पचा नहीं पाये और बहुत क्रोधित हुये। क्रोध तो धीरे धीरे शान्त हो गया पर उनकी स्मृति में उन अध्यापक के प्रति एक निम्न धारणा बन गयी। ऐसी चीजें भूलना कठिन भी होती हैं, जहाँ जहाँ मुझे बिना मेरी भूल के डाँट या मार पड़ी है, वे सारे स्थान, व्यक्ति और घटनायें स्पष्ट याद हैं। बड़े होने के बाद बहुत से अन्याय या तो भूल गया हूँ या क्षमा करता आया हूँ, पर बचपन के नहीं भूलते हैं, न जाने क्यों?

आलोक चित्रकार हैं, मित्र हैं और गोवा में रहते हैं। बच्चों के विषय में अत्यन्त संवेदनशील है और बच्चों के उन्मुक्त विकास के बारे में अद्भुत विचारों से परिपूर्ण भी। जो तथ्य उसको सर्वाधिक कचोटता है कि किस प्रकार हम समाज के रूप में अपनी ही क्षमताओं और संभावनाओं का हनन करते रहते हैं, बचपन से अब तक। हम कैसे अपने बच्चों के प्रति अति अतिसंरक्षणमना हो जाते हैं, उसकी राह की दोनों ओर दीवार बनाते हुये चलते हैं और अपनी इस मूढ़ता को सफलता मानकर प्रसन्न भी हो लेते हैं। आलोक की माने तो बच्चे प्राकृतिक रूप से चित्रकार होते हैं, सबसे अच्छे, उनके हाथ में रंग और ब्रश पकड़ाकर देखिये बस, उनकी अभिव्यक्ति पवित्रतम और सृजनतम होती है। धीरे धीरे वे बड़े हो जाते हैं, उनके ऊपर दायित्वों, कर्तव्यों और आकड़ों का बोझ डाल देते हैं हम सब, बड़ा होते होते वह सारी चित्रकला भूल जाता है।

यद्यपि आलोक बहुत अच्छे चित्रकार हैं पर उन्हें भी लगता है कि बड़े होने के प्रयास में वह थोड़ी बहुत चित्रकला भूल गये हैं। यही कारण है कि उन्हें बच्चों के साथ समय बिताना अच्छा लगता है। पहला कारण यह कि बच्चों के व्यवहार में कोई कृत्रिमता नहीं होती और दूसरा यह कि बच्चों के साथ रहने से हर बार उसे कुछ न कुछ सीखने को मिल जाता है, अपनी चित्रकला के लिये, अपने व्यक्तित्व के लिये। आलोक नियमतः प्रत्येक रविवार सड़क पर रहने वाले या अतिनिर्धनता में जीवन यापन करने वाले बच्चों को चित्रकला सिखाते हैं, एक संस्था के लिये, मुफ्त में। यही नहीं, आलोक उस संस्था के प्रति कृतज्ञ भी रहते हैं क्योंकि उनका कहना है कि हर बार वह उन बच्चों से कुछ सीख कर ही जाते हैं। हम सब पर भी यही नियम लागू होता है, जब कभी भी आपके पास विचारों की कमी हो या विचारों के प्रवाह में स्तब्धता हो, तो बच्चों को देखिये, बच्चों के साथ समय बिताइये, बच्चों से सीखिये।

उपरोक्त प्रश्न, ऐसी ही एक कक्षा के समय पूछा था आलोक ने। प्रश्न अच्छा खासा समझा हुआ था और उत्तर अन्ततः वहीं पर जाना था। बच्चों की तार्किक क्षमता को कमतर समझने की हमारी मानसिकता को झटका तब लगता है जब बच्चे सीधा और अन्तिम उत्तर दे देते हैं। उत्तर इतना सटीक और बहुतायत में मिलेगा, यह आलोक के लिये भी आश्चर्य का विषय था। बच्चों से यह प्रश्न सीधे भी पूछा जा सकता था कि कौन आपको अच्छा लगता है, कौन नहीं। बच्चों के लिये अच्छा लगने या अच्छा न लगने का केवल एक ही मानक है, कि कौन उनके अस्तित्व का आदर करता है या कौन नहीं।

इसके पहले कि इस विषय में प्रतिप्रश्न खड़े हो जायें, इस बात को स्पष्ट कर देता हूँ कि अनुशासन और अनादर में अन्तर है। पारिवारिक अनुशासन आवश्यक है और वह बड़ों को अपने आचरण से स्थापित करना होता है, बच्चों को श्रम का गुण सिखाना हो तो स्वयं भी खटना होता है। अनुशासन का यह स्वरूप आदर के साथ संप्रेषित होता है। कुछ स्वयं न करें और स्वयं को बच्चों को थोप दें, यह अनुशासन तो है पर अनादर के साथ। अनुशासन के अतिरिक्त बहुत से ऐसे निर्णय होते हैं जिनमें हम अपने बच्चों की चिन्तन प्रक्रिया को मान नहीं देते हैं, उनके उत्साह को अपने अनुभव से ढकने का प्रयास करते हैं। निश्चय ही बड़ों ने अधिक जीवन जिया है और उनके अन्दर अपने बच्चों के योगक्षेम की भावना भी अधिक है, पर उस अनुभव से और उस प्यार से बच्चों की निर्णय प्रक्रिया को बल मिले, न कि अनादर।

आलोक बचपन से ही चित्रकार बनना चाहता था, उसे घर में थोड़ा प्रतिरोध और बहुत सहयोग मिला, उसके निर्णय को आदर मिला, उसने अपना जीवन बचपन से ही स्थापित दिशा में बढ़ाया। जब बचपन से ही आपके अस्तित्व को सम्मान मिलता है, लाड़ दुलार से थोड़ा अधिक गंभीर, तो जीवन जीने का आत्मविश्वास कई गुना बढ़ जाता है। निर्णय तो देर सबेर लेने ही होते हैं, यदि आप बचपन में नहीं लेंगे तो बड़े होकर आपका पीछा करेंगे। अपने निर्णय लेने से साहस बढ़ता है। कई मित्रों को जानता हूँ जो अभी भी स्वतन्त्र निर्णय लेने में घबराते हैं, दूसरे का मुँह ताकने लगते हैं। माता पिता के रूप में हम उनके शुभचिन्तक अवश्य हो सकते है, उन्हें अपने अनुभव व ज्ञान के आधार पर समुचित सलाह भी दे सकते हैं, पर निर्णय बच्चों को ही लेने देना हो। अपने लिये निर्णयों में मन खपा देने की ऊर्जा आ जाती है बालमनों के अन्दर।

वहीं दूसरी ओर अपना बचपन देखता हूँ तो निर्णय लेने की सारी स्वतन्त्रता थी, छात्रावास में रहने से निर्णय-प्रक्रिया समय के पहले ही पक गयी। कभी कभी बच्चों से विनोद में पूछता हूँ कि वे बड़े होकर क्या बनना चाहते हैं तो वे उल्टा प्रश्न ही दाग देते हैं, कि आपके पिताजी आपको क्या बनाना चाहते थे? जब कहता हूँ कि मुझे पूरी स्वतन्त्रता थी निर्णय लेने की कि मैं क्या बनना चाहता हूँ, तो उन्हें बड़ा अच्छा लगता है कि घर में बच्चों का अधिकार न हड़पने की परम्परा है। अगला प्रश्न और पेचीदा होता है, कि आपको जब छूट थी और आपने जो चाहा, वह बन भी गये तो अब लैपटॉप के आगे बैठकर लिखते क्या रहते हो? स्मृतियाँ सामने घूम जाती हैं और मैं बच्चों को मन का सच बता देता हूँ।

स्वतन्त्रता थी और मन में इच्छा गणितज्ञ बनने की थी, गहरी रुचि भी थी गणित में, सवालों और अंकों से मित्रता सी रहती थी। यदि और अधिक नहीं सोचता तो निश्चय ही किसी विश्वविद्यालय में गणित की गुत्थियाँ सुलझा रहा होता, अंकों की भाषा विद्यार्थियों को सिखा रहा होता। आईआईटी में प्रवेश भी मिल गया और तब वह समय आया जब यह निर्णय करना था कि अन्ततः क्या करना है? जब निर्णय लेने की स्वतन्त्रता मिलती है तो व्यक्ति समय के पहले ही प्रौढ़ हो जाता है, माता-पिता ने जब बालमन को यह आदर दिया तो बरबस ही मन यह जानने लग गया कि भला माता-पिता क्या चाहते हैं? एक बार उनके मन की जानी तो मन ने निश्चय कर लिया कि सिविल सेवा में जाना है, सफलता मिली और रेलवे में आना हुआ, कार्य में मनोयोग से लगे भी हैं। बहुत पहले से लेखन भी होता था, अब धीरे धीरे लेखन में मन लगने लगा है, अंकों से खेलने वाला बालमन अब शब्दों के अर्थ समझ रहा है, और अब तो यह भी पता नहीं कि अभी अस्तित्व के कितने खोल उतरने शेष हैं?

बच्चों के आँखों में चमक तो आयी पर उसका अर्थ मुझे समझ न आया। उन्हें आलोक की भी कथा ज्ञात है, आलोक ने बचपन में एक निर्णय लिया और उसमें अपना जीवन पहचान भी चुका है। मैं अब भी निर्णयों के कई मोड़ों से होकर निकल रहा हूँ, चल रहा हूँ और स्वयं को चलते देख भी रहा हूँ। बच्चों को ज्ञात है कि उन पर कोई निर्णय थोपा नहीं जायेगा, जब भी लेंगे, जो भी लेंगे, वह उनका अपना निर्णय होगा। उनकी आँखों में कोई निर्णय लेने की शीघ्रता भी नहीं है, वे दोनों ही अभी अपने बचपन का आनन्द उठाने में व्यस्त हैं।

उनके प्रति हमारा व्यवहार अनुशासनप्रद भी रहेगा और आदरयुक्त भी, हमारे हाथ इतने दूर भी रहेंगे कि उन्हें दौड़ने में बाधा न हो और इतने पास भी कि गिरने पर उन्हें सम्हाल सकें।