सप्ताहन्त का एक दिन नियत रहता है, सब्जी, फल और राशन की खरीददारी के लिये, यदि संभव हो सके तो शनिवार की सुबह। जब आईटी शहर के नागरिक शुक्रवार की पार्टी के बाद अलसाये से ऊँघ रहे होते हैं, मुझे मॉल खाली मिलता है, सारा का सारा सामान ताजा और व्यवस्थित, भुगतान काउण्टर आपकी प्रतीक्षा में, सब कर्मचारी आपकी सहायता करने को उद्धत। घर से बलात भेजे गये मानुष को जब स्वतन्त्र देवता जैसा सम्मान मिलता है, तो सब्जी खरीदने जैसा कर्म भी अत्यन्त रोचक हो जाता है।
घर से जो सूची बनाकर जाता हूँ आईफोन पर, वह भी मॉल में सामानों के क्रम के अनुसार होती है, सब्जी, फल, राशन और अन्त में साबुन आदि। सूची सबके सम्मिलित प्रयासों से बनती है, बच्चों की किसी विशेष सूप की फरमाईश, श्रीमतीजी की किसी व्यञ्जन बनाने की उत्कण्ठा, रसोई में समाप्तप्राय आटा, दाल, चीनी, चावल आदि के बारे में हमारे रसोईये जी की घोषणा। सप्ताह भर के बाद तैयार हुयी सूची में बहुधा कोई सामान छूट ही जाता है क्योंकि यदि ऐसा न हो, तो सामान खरीदते समय श्रीमतीजी के मोबाइल पर मिले निर्देशों से वंचित होने लगेगा जीवन। खरीददारी मुख्यतः सूची पर ही आधारित होती है पर इतने बड़े मॉल में घंटे भर बने रहने से कई और आवश्यक वस्तुयें दिख जाती हैं, घर में सामान अधिक ही आ जाता है, कुछ छूटने की घटना यदा कदा ही होती है।
कहते हैं कि आप जिस चीज से भागना चाहते हैं, वह जीवन भर आपका पीछा करती है, मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। बचपन में पिताजी सब्जी खरीदने जाते थे, सप्ताह में दो दिन हाट लगती थी गृहनगर में, बहुत भीड़ रहती थी मानो पूरा शहर उमड़ आता हो वहाँ। पता नहीं भविष्य में गृहस्थी का क्या स्वरूप रहेगा, पता नहीं भविष्य में पति पत्नी की भूमिकायें क्या हो जायेंगी, संभवतः यही सोचकर पिताजी मुझे भी साथ ले जाते थे। सोचते होंगे, चलो कुछ तो सीख लेगा, यदि बाहर रहकर पढ़ना पड़े तो कम से कम खाना बनाकर पेट तो भर लेगा। बाहर रहकर पढ़ने के लिये यह सब जानना तो अत्यन्त आवश्यक था, पिताजी ने किया था, छोटे भाई ने भी बाद में किया, अब स्थिति यह है कि घर में मुझे छोड़कर सब खाना बना लेते हैं, बहुत अच्छा।
हाथ में एक छोटा झोला उठाये, भीड़ की रोचकता में गर्दन मटकाते हुये पिताजी के पीछे लगा रहता था। गेहूँ, चावल, दाल के दानों में जाने क्या देखकर खरीदते थे, समझ नहीं आता था। आलू, टमाटर, प्याज, एक एक को चारों ओर से देख कर क्या निश्चित करते होंगे, समझ नहीं आता था। पालक, मेथी, धनिया, पुदीना, ताजा और बासी में कैसे अन्तर करते थे, समझ नहीं आता था। हल्दी, जीरा, मसाला की महक कैसे परखते थे, समझ नहीं आता था। बस एक सहायक की तरह पीछे लगा रहता था, बस इस आस में कि किसी तरह अन्त में गन्ने का रस या बरफ के लच्छे खाने को मिल जाये, पर उसके लिये धूल भरे वातावरण में इतना श्रम करना खलता था। भगवान ने सुन ली, छात्रवास रहने आ गया, इस साप्ताहिक श्रम से छूट मिल गयी, उसके बाद पिताजी छोटे भाई को अपने साथ बाजार ले जाने लगे।
शेष पढ़ाई छात्रावास में, प्रशिक्षण और रेलवे में नौकरी, हर जगह बना बनाया खाना मिलता रहा। विवाह के बाद भी घर में रसोईया लगा रहा, सब्जी, राशन आदि आता रहा, हम अपने भय से मुक्त बने रहे, जो मिलता रहा, वह खाते रहे। कभी किसी व्यंजन विशेष के लिये आग्रह नहीं किया, कभी किसी खाने में कमी इंगित नहीं की। ऐसा लगने लगा कि पिता जी ने जो समय मुझे खरीददारी सिखाने में निवेश किया था उसका कोई प्रतिफल आ ही नहीं रहा है। जहाँ तक हो सका मैं खरीददारी से भागता रहा। अवसर भी अपनी प्रतीक्षा में था और बचपन में सीखी हुयी चीजें व्यर्थ नहीं जानी थीं, इन दोनों का सुयोग बंगलुरु में बनने लगा।
वस्तुतः तीन कारण रहे, पहला कारण हमारे रसोईयेजी का व्यक्तिगत कारणों से कई बार अपने गाँव जाना रहा। श्रीमतीजी को रसोई का पूरा कार्य करने के बाद यह सम्भव नहीं रहता था कि खरीददारी कर सकें, अतः हमको ही उस उत्तरदायित्व का निर्वाह करना पड़ा। दूसरा कारण खानपान के क्षेत्र में बच्चों की वैश्विक मानसिकता का रहा। अपने विद्यालय में पिछले दिन आये टिफिनबाक्सों के आधार पर अगले दिन की माँग रखे जाने के कारण, हर बार हम ही को प्रस्तुत होना पड़ा, या तो बाहर जाकर खिलाने के लिये या घर में बनाने हेतु आवश्यक सामग्री लाने के लिये। इटली, थाईलैण्ड, चीन, मेक्सिको, अमेरिका के व्यंजनों के साथ साथ ठेठ दक्षिण भारतीय भोजन के लिये साधन जुटाने का भार हमको ही सौंप दिया गया। तीसरा कारण मॉल में स्वयं चुनने की सुविधा व स्वच्छ और वातानुकूलित परिवेश रहा।
यह कार्य पुनः प्रारम्भ करना थोड़ा भारीपन अवश्य लाया पर बचपन में पाये तीन वर्षों के अनुभव के कारण अधिक कठिनाई नहीं हुयी। कई बार तो कार्य भार स्वरूप निपटाया पर धीरे धीरे रस आने लगा। एक एक आलू, प्याज, टमाटर, मटर छाँट के रखने में ऐसा लगने लगा मानो अपने परिवार के लिये एक स्वादिष्ट और पौष्टिक भोजन जुटाने में उपयोगी योगदान कर रहे हैं। घर में बच्चों ने जब मटर छीलकर खायी और कहा कि बड़ी मीठी और ताजी मटर है, तो सहसा एक एक मटर चुनना याद आ गया। साथ ही याद आया एक और व्यक्ति जो झोले में मुठ्ठी भर भरकर मटर डाल रहा था, संभवतः वह बचपन में अपने पिताजी के साथ बाजार नहीं गया होगा या उसे इस कार्य में रस नहीं आ रहा होगा।
पिताजी का सिखाया व्यर्थ नहीं गया, घर के लिये राशन, सब्जी आदि खरीदने से अधिक आत्मीय पारिवारिक अवसर सरलता से मिलता भी नहीं हैं। अगली बार से पृथु को भी ले जाऊँगा, भविष्य का क्या भरोसा, सुना है कई पतियों को घर में खाना बनाने का कार्य अधिक रुचिकर लगने लगा है।