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21.12.13

रिक्त मनुज का शेष रहेगा

यही दृश्य हमने देखा था
हम कार्यालय से उतरे थे,
दिन के कार्य दिवंगत कर के,
देखा सम्मुख उतरे आते,
मित्र हमें जो मन से भाते,
पीछे आये दो सेवकगण,
वाहन में कुछ करके अर्पण,
ठिठके पग, जब देखा जाकर,
आँखे फैली दृश्य समाकर,
भर भर घर फ़ाइल के बक्से,
हम पूछे तो बोले हँस के,
शेष रहा जो कार्य करेंगे,
घर जाकर वह रिक्त भरेंगे,
काम बहुत है, समय बहुत कम,
इसी विवशता में डूबे हम।

प्रश्न चिन्ह जब रहा उपस्थित,
खोले मन के द्वार अनिश्चित,
हम औरों के जैसे ही थे,
किन्तु आज तक बड़े जतन से,
इस स्थिति को पाला पोसा,
सबका हम पर पूर्ण भरोसा,
चाहें, अब कितना भी चाहें,
चक्रव्यूह से निकल न पायें,

जब भी दिन कुछ हल्का दिखता,
ईश्वर ढेरों उलझन लिखता,
सब जन आते, कहते आकर,
गहन समस्या सम्मुख लाकर,
दर्शनीय हों मार्ग हमारे,
आये हम सब द्वार तुम्हारे,
सुनते हम भी तत्पर होकर,
समयचक्र की सब सुध खोकर,
समाधान की राह निकलती,
पहियों की गति आगे बढ़ती,
मन में भाव जगें करने के,
तन्त्र व्याप्त कंटक हरने के,

उनसे निपटे तो ऊपर से,
आते बारम्बार संदेशे,
अनुभव की है हानि निरन्तर,
पकड़े जाते समय समय पर,
सम्बंधित या आरम्भिक ही,
संशय किंचित, सामूहिक भी,
कार्य सभी उलझाये रहते,
बैठक में बैठाये रहते,

कार्यक्षेत्र में कभी निरीक्षण, 
मानकता के गहन परीक्षण,
इतने विस्तारों में जीना,
गतिमयता, विश्राम कभी ना,
कार्यालय में क्षणभर को ही,
दिन पूरा हो जाता यों ही,
फाइल रहें दर्शन की प्यासी,
महत प्रतीक्षा, और अभिलाषी,
नहीं छोड़ तब जाना होता,
यह संबंध निभाना होता,

सुने शब्द, मन नम हो आया,
किन्तु बुद्धि ने तुरत चेताया,
बोले हम, हमको संवेदन,
किन्तु आप से एक निवेदन,
घर में रहते तीन जीव हैं,
उनके भी सपने सजीव हैं,
कर्तव्यों के मौन पढ़ रहे,
किन्तु अघोषित मौन गढ़ रहे, 
जितना आवश्यक कार्यालय,
उतना आवश्यक हृदयालय,
तनिक देर यदि हो भी जाये,
शेष कार्य पर घर न आये,
घर में बस घर का गुंजन हो,
संबंधों का अभिनन्दन हो,

सच पूछो अच्छा लगता है,
कर्मशील सच्चा लगता है,
किन्तु नहीं वंचित रह जाये,
कर्मठ भी शीतलता पाये,
द्वन्द्व सदैव विशेष रहेगा,
रिक्त मनुज का शेष रहेगा।

31.10.12

एक बड़ा था पेड़ नीम का

बचपन की सुन्दर सुबहों का भीना झोंका,
आँख खुली, झिलमिल किरणों को छत से देखा,
छन छन कर जब पवन बहे, तन मन को छूती,
शुद्ध, स्वच्छ, मधुरिम बन थिरके प्रकृति समूची,

आज सबेरा झटके से उग आया पूरा,
नही सलोनी सुबह, लगे कुछ दृश्य अधूरा,
आज नहीं वह पेड़, कभी जो वहाँ बड़ा था,
तना नहीं, ईटों का राक्षस तना खड़ा था,

पत्तों की हरियाली हत, अब नील गगन है,
नीम बिना भी पवन मगन है, सूर्य मगन है,
वही सुबह है, विश्व वही, है जीवन बहता,
आज नहीं पर, हृदय बसा जो तरुवर रहता,

खटक रहा अस्तित्व सुबह का, निष्प्रभ सूरज,
आज नहीं है नीम, बड़ा था, चला गया तज,
किस विकास को भेंट, ढह गया किस कारणवश,
किस लालच ने छीना मेरा प्रात-सुखद-रस,

सबने मिल कर काटा उसको,
बढ़ा लिया टुकड़ा जमीन का,
एक बड़ा था पेड़ नीम का।

18.2.12

मटर की फलियाँ

सप्ताहन्त का एक दिन नियत रहता है, सब्जी, फल और राशन की खरीददारी के लिये, यदि संभव हो सके तो शनिवार की सुबह। जब आईटी शहर के नागरिक शुक्रवार की पार्टी के बाद अलसाये से ऊँघ रहे होते हैं, मुझे मॉल खाली मिलता है, सारा का सारा सामान ताजा और व्यवस्थित, भुगतान काउण्टर आपकी प्रतीक्षा में, सब कर्मचारी आपकी सहायता करने को उद्धत। घर से बलात भेजे गये मानुष को जब स्वतन्त्र देवता जैसा सम्मान मिलता है, तो सब्जी खरीदने जैसा कर्म भी अत्यन्त रोचक हो जाता है।

घर से जो सूची बनाकर जाता हूँ आईफोन पर, वह भी मॉल में सामानों के क्रम के अनुसार होती है, सब्जी, फल, राशन और अन्त में साबुन आदि। सूची सबके सम्मिलित प्रयासों से बनती है, बच्चों की किसी विशेष सूप की फरमाईश, श्रीमतीजी की किसी व्यञ्जन बनाने की उत्कण्ठा, रसोई में समाप्तप्राय आटा, दाल, चीनी, चावल आदि के बारे में हमारे रसोईये जी की घोषणा। सप्ताह भर के बाद तैयार हुयी सूची में बहुधा कोई सामान छूट ही जाता है क्योंकि यदि ऐसा न हो, तो सामान खरीदते समय श्रीमतीजी के मोबाइल पर मिले निर्देशों से वंचित होने लगेगा जीवन। खरीददारी मुख्यतः सूची पर ही आधारित होती है पर इतने बड़े मॉल में घंटे भर बने रहने से कई और आवश्यक वस्तुयें दिख जाती हैं, घर में सामान अधिक ही आ जाता है, कुछ छूटने की घटना यदा कदा ही होती है।

कहते हैं कि आप जिस चीज से भागना चाहते हैं, वह जीवन भर आपका पीछा करती है, मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। बचपन में पिताजी सब्जी खरीदने जाते थे, सप्ताह में दो दिन हाट लगती थी गृहनगर में, बहुत भीड़ रहती थी मानो पूरा शहर उमड़ आता हो वहाँ। पता नहीं भविष्य में गृहस्थी का क्या स्वरूप रहेगा, पता नहीं भविष्य में पति पत्नी की भूमिकायें क्या हो जायेंगी, संभवतः यही सोचकर पिताजी मुझे भी साथ ले जाते थे। सोचते होंगे, चलो कुछ तो सीख लेगा, यदि बाहर रहकर पढ़ना पड़े तो कम से कम खाना बनाकर पेट तो भर लेगा। बाहर रहकर पढ़ने के लिये यह सब जानना तो अत्यन्त आवश्यक था, पिताजी ने किया था, छोटे भाई ने भी बाद में किया, अब स्थिति यह है कि घर में मुझे छोड़कर सब खाना बना लेते हैं, बहुत अच्छा।

हाथ में एक छोटा झोला उठाये, भीड़ की रोचकता में गर्दन मटकाते हुये पिताजी के पीछे लगा रहता था। गेहूँ, चावल, दाल के दानों में जाने क्या देखकर खरीदते थे, समझ नहीं आता था। आलू, टमाटर, प्याज, एक एक को चारों ओर से देख कर क्या निश्चित करते होंगे, समझ नहीं आता था। पालक, मेथी, धनिया, पुदीना, ताजा और बासी में कैसे अन्तर करते थे, समझ नहीं आता था। हल्दी, जीरा, मसाला की महक कैसे परखते थे, समझ नहीं आता था। बस एक सहायक की तरह पीछे लगा रहता था, बस इस आस में कि किसी तरह अन्त में गन्ने का रस या बरफ के लच्छे खाने को मिल जाये, पर उसके लिये धूल भरे वातावरण में इतना श्रम करना खलता था। भगवान ने सुन ली, छात्रवास रहने आ गया, इस साप्ताहिक श्रम से छूट मिल गयी, उसके बाद पिताजी छोटे भाई को अपने साथ बाजार ले जाने लगे।

शेष पढ़ाई छात्रावास में, प्रशिक्षण और रेलवे में नौकरी, हर जगह बना बनाया खाना मिलता रहा। विवाह के बाद भी घर में रसोईया लगा रहा, सब्जी, राशन आदि आता रहा, हम अपने भय से मुक्त बने रहे, जो मिलता रहा, वह खाते रहे। कभी किसी व्यंजन विशेष के लिये आग्रह नहीं किया, कभी किसी खाने में कमी इंगित नहीं की। ऐसा लगने लगा कि पिता जी ने जो समय मुझे खरीददारी सिखाने में निवेश किया था उसका कोई प्रतिफल आ ही नहीं रहा है। जहाँ तक हो सका मैं खरीददारी से भागता रहा। अवसर भी अपनी प्रतीक्षा में था और बचपन में सीखी हुयी चीजें व्यर्थ नहीं जानी थीं, इन दोनों का सुयोग बंगलुरु में बनने लगा।

वस्तुतः तीन कारण रहे, पहला कारण हमारे रसोईयेजी का व्यक्तिगत कारणों से कई बार अपने गाँव जाना रहा। श्रीमतीजी को रसोई का पूरा कार्य करने के बाद यह सम्भव नहीं रहता था कि खरीददारी कर सकें, अतः हमको ही उस उत्तरदायित्व का निर्वाह करना पड़ा। दूसरा कारण खानपान के क्षेत्र में बच्चों की वैश्विक मानसिकता का रहा। अपने विद्यालय में पिछले दिन आये टिफिनबाक्सों के आधार पर अगले दिन की माँग रखे जाने के कारण, हर बार हम ही को प्रस्तुत होना पड़ा, या तो बाहर जाकर खिलाने के लिये या घर में बनाने हेतु आवश्यक सामग्री लाने के लिये। इटली, थाईलैण्ड, चीन, मेक्सिको, अमेरिका के व्यंजनों के साथ साथ ठेठ दक्षिण भारतीय भोजन के लिये साधन जुटाने का भार हमको ही सौंप दिया गया। तीसरा कारण मॉल में स्वयं चुनने की सुविधा व स्वच्छ और वातानुकूलित परिवेश रहा।

यह कार्य पुनः प्रारम्भ करना थोड़ा भारीपन अवश्य लाया पर बचपन में पाये तीन वर्षों के अनुभव के कारण अधिक कठिनाई नहीं हुयी। कई बार तो कार्य भार स्वरूप निपटाया पर धीरे धीरे रस आने लगा। एक एक आलू, प्याज, टमाटर, मटर छाँट के रखने में ऐसा लगने लगा मानो अपने परिवार के लिये एक स्वादिष्ट और पौष्टिक भोजन जुटाने में उपयोगी योगदान कर रहे हैं। घर में बच्चों ने जब मटर छीलकर खायी और कहा कि बड़ी मीठी और ताजी मटर है, तो सहसा एक एक मटर चुनना याद आ गया। साथ ही याद आया एक और व्यक्ति जो झोले में मुठ्ठी भर भरकर मटर डाल रहा था, संभवतः वह बचपन में अपने पिताजी के साथ बाजार नहीं गया होगा या उसे इस कार्य में रस नहीं आ रहा होगा।

पिताजी का सिखाया व्यर्थ नहीं गया, घर के लिये राशन, सब्जी आदि खरीदने से अधिक आत्मीय पारिवारिक अवसर सरलता से मिलता भी नहीं हैं। अगली बार से पृथु को भी ले जाऊँगा, भविष्य का क्या भरोसा, सुना है कई पतियों को घर में खाना बनाने का कार्य अधिक रुचिकर लगने लगा है।

29.10.11

दीवाली और घर की सफाई

दीवाली के पहले की एक परम्परा होती है, घर की साफ़ सफाई। घर में जितना भी पुराना सामान होता है, वह या तो बाँट दिया जाता है या फेंक दिया जाता है। वर्षा ऋतु की उमस और सीलन घर की दीवारों और कपड़ों में भी घुस जाती है। उन्हें बाहर निकालकर पुनः व्यवस्थित कर लेना स्वास्थ्य की दृष्टि से भी बहुत आवश्यक है। जाड़े के आरम्भ में एक बार रजाई-गद्दों और ऊनी कपड़ों को धूप दिखा लेने से जाड़ों से दो दो हाथ करने का संबल भी मिल जाता है। पुराने कपड़ों को छोड़ने का सीधा सा अर्थ है नयों को सिलवाना। नयेपन का प्रतीक है, दीवाली का आगमन।

बचपन से यही क्रम हर बार देखा। इस प्रक्रिया के बाद, घर के वातावरण में आया हल्कापन सदा ही अगली बार के उत्साह का कारण बना रहा। विवाहोपरान्त नयी गृहस्थी में भी वार्षिक नवीनीकरण से ऊर्जा मिलती रही। अभी तक तो सबका सामान व्यवस्थित रखने में स्वयं ही जूझना पड़ता था, सामान मुख्यतः व्यक्तिगत और सबके साझा उपयोग का, साथ में बच्चों का भी थोड़ा बहुत। श्रीमतीजी का सामान व्यवस्थित करने की न तो क्षमता है और न ही अनुमति। इस बार हमने बच्चों को भी इस प्रक्रिया में सक्रिय भाग लेने को कहा, उन्हे अपने सामान के बारे में निर्णय लेने को भी कहा। बच्चों को अपने सामान की उपयोगिता समझने व उसे सहेजने का गुण विकसित होते देखना किसी भी पिता के लिये गर्व का विषय है।

दोनों बच्चों के अपने अलग कमरे हैं। दोनों को बस इतना कहा गया कि कोई भी वस्तु, कपड़ा या खिलौना, जो आप उपयोग में नहीं लाते हैं, आप उन्हें अपने कमरे से हटा दें, वह इकठ्ठा कर घर में काम करने वालों को बाँट दिया जायेगा। उसके पहले उदाहरण स्वरूप मैंने अपना व्यक्तिगत सामान लगभग २५% कम करते हुये शेष सबको एक अल्मारी में समेट दिया। साझा उपयोग के सामान, फर्नीचर व पुराने पड़ गये इलेक्ट्रॉनिक सामानों को निर्ममता से दैनिक उपयोग से हटा दिया। अपने कमरे में जमीन पर ही बिस्तर बिछा कर सोने से एक बेड को विश्राम मिल गया। ऊर्जा सोखने वाले डेस्कटॉप को हटा वहाँ अपना पुराना लैपटॉप रख दिया। एक अतिरिक्त सोफे को भी ड्रॉइंग-कक्ष से विदा दे गैराज भेज दिया गया।

अपने कक्ष व ड्राइंग-कक्ष में इस प्रकार व्यवस्थित किये न्यूनतम सामान से वातावरण में जो ऊर्जा व हल्कापन उत्पन्न हुआ, उसका प्रभाव बच्चों पर पड़ना स्वाभाविक था। उन्हें यह लगा कि कम से कम सामान में रहने का आनन्द अधिकतम है। अधिक खिलौनों का मोह निश्चय ही उनपर बना रहता यदि न्यूनतम सामान का आनन्द उन्होने न देखा होता। आवश्यक दिशानिर्देश देकर हम तो कार्यालय चले गये, लौटकर जो दृश्य हमने देखा, उसे देखकर सारा अस्तित्व गदगद हो उठा।

एक दिन के अन्दर ही दोनों के कमरे अनावश्यक व अतिरिक्त सामानों से मुक्ति पा चुके थे। पुराने के मोह और भविष्य की चिन्ता से कहीं दूर वर्तमान में जीने का संदेश ऊर्जस्वित कर रहे थे दोनों कमरे। न्यूनतम में रह लेने का उनका विश्वास, उनके स्वयं निर्णय लेने के विश्वास के साथ बैठा निश्चिन्त दिख रहा था। उनके द्वारा त्यक्त सामानों से उठाकर कुछ सामान मुझे स्वयं उनके कमरे में वापस रखना पड़ा।

पुराने सामानों को सहेज कर रख लेने का मोह, संभवतः वह आगे कभी काम आ जाये, या उससे कोई याद जुड़ी हो, साथ ही भविष्य के लिये सुदृढ़ आधार बनाने की दिशा में घर में ठूँस लिये गये सामान, दोनों के बीच हमारा वर्तमान निरीह सा खड़ा रहता है। वर्तमान का सुख अटका रहता है, अस्तित्व के इसी भारीपन में। मेरे लिये यही क्या कम है कि बच्चों में यह समझ विकसित हो रही है कि उनके लिये क्या आवश्यक है, क्या नहीं? हल्केपन के आनन्द के सामने त्यक्त व अनुपयोगी सामानों का क्या मूल्य, संभवतः उन्हें अपना उचित स्वामी मिल ही जायेगा।

घर आयी इस नवप्राप्त ऊर्जा में दीवाली के दियों का प्रकाश जगमगा उठा है। हर वर्ष के क्रम को इस वर्ष एक विशेष सम्मान मिला है, मेरे घर में दीवाली इस बार सफल हुयी है। बस एक कमरा अभी भी भण्डारवत है, श्रीमतीजी का, पर हम तीनों का दबाव उस पर बना रहेगा, अगली दीवाली तक।

12.3.11

डरे डरे से मोरे सैंया

जब मन में छिपा हुआ सत्य अप्रत्याशित रूप से सामने आ जाता है, तब न कुछ बोलते बनता है और न कहीं देखते बनता है। बस अपनी चोरी पर मुस्करा कर माहौल को हल्का कर देते हैं। आप अपने घर पर हैं, चारों ओर परमहंसीय परिवेश निर्मित किये बैठे हैं, संभवतः ब्लॉग पढ़ रहे हैं। आपकी श्रीमतीजी आती हैं और चेहरे पर स्मित सी मुस्कान लिये हुये कुछ कहना प्रारम्भ ही करती हैं कि आप आगत की आशंका में उतराने लगते हैं। आप कहें न कहें पर आपका चेहरा पहले ही आपके मन की बात कह जाता है। अब चेहरा कहाँ तक कृत्रिमता ओढ़े बैठा रहेगा, जो मन में होगा वह व्यक्त ही कर देगा। अब यह देखकर श्रीमतीजी आप पर यह सत्य उजागर कर दें तो आपको कैसा लगेगा?

"मैं कुछ भी बोलना प्रारम्भ करती हूँ तो आपके चेहरे पर प्रश्नवाचक भय पहले से आकर बिराज जाता है"

सत्य है, झुठलाया नहीं जा सकता है, बहुधा आपके साथ ऐसा ही होता होगा। जानबूझ कर नहीं पर अवचेतन में ऐसा भाव क्यों बैठ गया है, कोई मनोवैज्ञानिक ही बता सकता है। कई बार ऐसा होता है कि बात बहुत छोटी सी निकलती है, साथ में आपके राहत की साँस भी। बड़ी बात भी समझाने से अन्ततः मान जाती हैं श्रीमतीजी। पर इस भय का निवारण अभी तक नहीं हो पाया है। ऐसा क्या हो जाता है कि आप कुछ भी सुनने के पहले ही भयभीत हो जाते हैंऐसा क्यों लगने लगता है कि श्रीमतीजी की सारी माँगें आपको समस्याग्रस्त करने वाली हैंपरिवार में आशंकाओं के बादल कब आपके मन में झमाझम बरसने लगते हैं, कोई नहीं जानता, मौसम विज्ञान के बड़े बड़े पुरोधा भी नहीं बता सकते हैं।

संवाद पर अनेकों शास्त्र लिखे ऋषियों ने पर पता नहीं क्यों पारिवारिक संवाद को इतना महत्व नहीं दिया गया? संभवतः परिवार में जो एकमार्गी संप्रेषण होता हो वह संवाद की श्रेणी में आता ही न हो। आदेश और संवाद में अन्तर ही इस प्रतीत होती सी भूल का कारण होगा। यह भी हो सकता है कि ज्ञान पाने के लिये अविवाहित रहने की बाधा इस विषय से अधिक न्याय न कर पायी हो। विवाह न करने से जितना ज्ञान जीवन भर प्राप्त होता है उतना तो कुछ ही वर्षों का वैवाहिक जीवन आपको भेंट कर देता है। ज्ञान चक्षु शीघ्र खोलने हों, कुण्डलनी जाग्रत करनी हो तो बिना कुछ सोचे समझे विवाह कर लीजिये और यदि विवाह कर चुके हों तो अपनी धर्मपत्नी की बातों को ध्यानपूर्वक सुनना प्रारम्भ कर दीजिये।

अब इतना ज्ञान प्राप्त करने के बाद भी हम श्रीमतीजी के वाक-अस्त्रों के सामने असंयत दिखायी पड़ते हैं। भय इसी बात का ही रहता है कि छोटी छोटी सी लगने वाली बातें न जाने कितनी मँहगी पड़ जायेंगी। बच्चों को भी लगने लगा है कि पिता पुरुरवा के स्तर से उतर कर हर वर्ष प्रभावहीन होते जा रहे हैं और माता उर्वशी के सारे अधिकार समेट अपनी कान्ति की आभा का विस्तार करने में व्यस्त हैं। कोई दिनकर पुनः आये और नयी उर्वशी का रूप गढ़े, पारिवारिक संदर्भों में।

एक बड़ा ही स्वस्थ हास्य धारावाहिक हम सब बैठकर देखते हैं, तारक मेहता का उल्टा चश्मा। लगता है उस धारावाहिक के दो पात्र हमारे घर में पहले से रह रहे हैं। मैं 'दयनीय जेठालाल' और श्रीमतीजी 'निर्भीक दया भाभी' बनती जा रही हैं।

हमारे तो विवाह का जो अध्याय 14 फरवरी से चला था, अब 8 मार्च पर आकर ही ठहर गया।

मेरी कहानी है, मैं स्वयं झेलूँगा पर यदि आप अपनी श्रीमतीजी को इस विषय पर कुछ गाने के लिये कहेंगे तो संभवतः आपको भी यही स्वर सुनने को मिलेगा।

मोरे सैंया मोहे बहुतै सुहात हैं,
जो परस देओ बस वही खात हैं,
न जाने काहे छोटी छोटी बात मा,
पहले से घबराय जात हैं।

डरे डरे से मोरे सैंया,
पहले तो सब सुन लेते, अब ध्यान कहाँ है तोरे सैंया।
(धुन पीपली लाइवमँहगाई डायन)