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24.10.12

लैपटॉप या टैबलेट - तकनीकी पक्ष

जीवन में लैपटॉप की आवश्यकता सबसे पहले तब लगी थी, जब कार्यालय और घर के डेस्कटॉपों पर पेनड्राइव के माध्यम से डाटा स्थानान्तरित करते करते पक गया था। लैपटॉप आने से दोनों डेस्कटॉप मेरे लिये अतिरिक्त हो गये। लैपटॉप की और छोटे होने की चाह बनती ही रही, कारण रहा, उस १५.६ इंच के लैपटॉप को ट्रेन यात्रा और कार यात्रा के समय अधिकतम उपयोग न कर पाने की विवशता। १२ सेल की बैटरी के साथ लगभग ४ किलो का उपकरण सहजता से यात्रा में उपयोगी नहीं हो सकता था। बैठकों में भी १५.६ इंच का लैपटॉप अपने सामने रखना अटपटा सा लगता था, लगता था कि कोई और व्यक्ति सामने आकर बैठ गया हो। अन्ततः वह लैपटॉप दो डेस्कटॉपों के स्थानापन्न के रूप में बना रहा।

मेरी यह चाह संभवतः तकनीक की भी राह रही, बहुतों को यही समस्या रही होगी, बहुत लोग लैपटॉप का उपयोग और अधिक स्थानों पर करना चाहते होंगे। १० इंच की छोटी स्क्रीन की ढेरों नेटबुक बाजार में आयीं, पर बाधित और सीमित क्षमता के कारण अपना समुचित स्थान नहीं बना पायीं। लैपटॉप की क्षमता एक मानक बन चुकी थी और कोई उससे कम पर सहमत भी नहीं था। १३ इंच के कई लैपट़ॉप बड़ी संभावना लेकर आये, पर उसमें भी भार अधिक कम नहीं हुआ, हाँ छोटी स्क्रीन पर अधिक न समेट पाने के कारण कार्य करने पर आँखों को बड़ा कष्ट सा होता रहा। जूम करना, विण्डो बदलना आदि ढेर सारे कार्य करने के लिये माउस से हैण्डल ढूढ़ना बड़ा कष्टकर कार्य हो जाता था।

तकनीक अपने रास्ते ढूढ़ ही लेती है। हार्डड्राइव, बैटरी, चिप, स्क्रीन आदि क्षेत्रों में गजब का विकास हुआ और जो उत्पाद सामने आया, उनका नामकरण अल्ट्राबुक्स हुआ। मैकबुक एयर की डिजायन एक मानक बन गयी, जिस पर अन्य मॉडल आधारित होने लगे। ११.६ और १३ इंच की स्क्रीन, वजन १.० और १.३ किलो। इससे हल्के लैपटॉप पहले कभी नहीं बने थे। उन्हे तो चलते चलते भी उपयोग में लाया जा सकता है, एक हाथ से उठा कर दूसरे हाथ से टाइप किया जा सकता है।

लैपटॉप में टचपैड ने माउस का प्रयोग लगभग समाप्त ही कर दिया था, पर उपयोग की दृष्टि से टचपैड का स्क्रीन पर पूर्ण नियन्त्रण उसके बड़े होने और बहुआयामी कार्य करने से आया। पिंच जूम, सरकाना, पलटना, पिछले पृष्ठ पर जाना, नयी विण्डो खोलना आदि टचपैड से होने लगा, स्क्रीन का सारा नियन्त्रण विधिवत रूप से ऊँगलियों से ही होने लगा। इसका सीधा प्रभाव यह पड़ा कि ११.६ इंच की छोटी स्क्रीन भी गतिशील और बड़ी लगने लगी।

स्क्रीन को छोटा और भार को कम करने में भौतिक कीबोर्ड एक बाधा था, जगह घेरता था और भारी होता था। उन्हे हटा कर स्क्रीन में ही छूकर कार्य करने की तकनीक ने टैबलेट को जन्म दिया। १० इंच का टैबलेट पर्याप्त लगा, सारे कार्य निपटाने में। इस प्रयास में भार और आकार तो कम हो गया पर दो विकार अनचाहे ही आ गये। एक तो ओएस अपनी पूर्ण क्षमता से रहित हो गया और दूसरा स्क्रीन का आकार कीपैड के कारण और सीमित हो गया। १० इंच का टैबलेट ६०० ग्राम के आसपास सिमट आया, कहीं भी ले जाने के लिये सुविधाजनक।

श्रीमतीजी के आईपैड में कई बार प्रयास किया कि कम से कम एक पोस्ट के बराबर लेखन करें। कीपैड के माध्यम से टाइप करने से न तो वह गति आयी और न ही वह सहजता जो मेकबुक एयर के चिकलेट कीबोर्ड से मिलती है। संभवतः ऊँगलियाँ इस तरह टाइप करने की अभ्यस्त ही नहीं हैं। एक अलग भौतिक कीबोर्ड लेने से और टैबलेट की स्क्रीन को बचाने का कवर लेने से, टैबलेट का भार और आकार लगभग मैकबुक एयर के बराबर ही हो जाता है, सम्हालने में मैकबुक एयर से कहीं अधिक कठिनाई के साथ। मैकबुक एयर बन्द करते ही पूरी तरह सुरक्षित हो जाती है।

यही कारण रहे कि हमने मैकबुक एयर को आईपैड के ऊपर चुना, पूरी क्षमता और सबसे हल्का। चर्चा में है कि बाजार में विण्डोज ८ पर आधारित टैबलेट आने वाला है, उसमें लैपटॉप की क्षमता रहेगी। ऐसे टैबलेट का भार और आकार निश्चय ही उत्सुकता का विषय रहेगा। बहुत लोग जो अधिक लेखन आदि नहीं करते हैं, उनके लिये हल्के टैबलेट बड़े लाभदायक हो सकते हैं, पर मेरे लिये लैपटॉप से अधिक उपयोगी कुछ भी नहीं है। मैकबुक एयर के रूप में सर्वश्रेष्ठ लैपटॉप का अनुभव अत्यन्त संतुष्टिपूर्ण रहा है। श्रीमतीजी अपने आईपैड से अत्यन्त प्रसन्न हैं, उनकी आवश्यकता के लिये टैबलेट ही सर्वोत्तम है।

यदि टैबलेट के विषय में कोई एक पक्ष है जो सर्वाधिक सशक्त लगता है, तो वह है इसकी बैटरी। लगभग दुगना समय टैबलेट चलता है। अधिक क्षमता के यन्त्र अधिक ऊर्जा लेते हैं, यही कारण है कि हमें अधिक ऊर्जा खपानी पड़ती है। लैपटॉप आधारित उपकरणों पर जीवन बीतने से टैबलेट थोड़ा सकुचाया सा दिखता है, पर कुछ एक कार्यों को छोड़ दें तो टैबलेट लैपटॉप के सारे कार्य कर सकता है। घर में यदि एक लैपटॉप है तो अन्य लोग टैबलेट से काम चला सकते हैं। टैबलेट लैपटॉप की तुलना में अधिक सस्ता भी होता है। यदि एक घर के सारे उपकरणों को एक पारितन्त्र के रूप में कार्य करते हुये समझें तो, एक लैपटॉप का पहले से होना टैबलेट के लिये मार्ग प्रशस्त करता है।

मोबाइल के दृष्टिकोण से भी देखा जाये तो अधिक शक्तिशाली मोबाइल टैबलेट के ढेरों कार्य कर सकता है, पर आकार छोटा होने के कारण वही कार्य करने में उतनी सहजता नहीं आ पाती है। कार में जाते समय या रसहीन बैठकों में बैठे हुये मोबाइल से न जाने कितने कार्य हो जाते हैं। यह मानकर चलता हूँ कि कोई याद आयी पंक्ति या विचार छूट न जाये और एक भी पल व्यर्थ न जाये, मोबाइल इन दोनों स्थितियों में उत्पादकता बनाये रखता है। आईक्लाउड के माध्यम से प्रयासों में सततता भी बनी रहती है।

अनुभव और तकनीक के आधार पर मैकबुक एयर और आईफोन की जोड़ी मेरे लिये पर्याप्त है और उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रही है। अब इन दो उपकरणों के आधार पर कार्यशैली और जीवनशैली किस प्रकार विकसित हो रही, यह अगली पोस्ट का विषय रहेगा। 

20.10.12

लैपटॉप या टैबलेट - अनुभव पक्ष

पता नहीं जो लोग ढेरों पैसा कमा लेते होंगे, वे अपनी वसीयत कैसे लिखते होंगे, बड़ा ही कठिन कार्य है यह, पहले संग्रहण करो फिर बाँट दो। हम तो एक एक संग्रह में पसीना बहा देते हैं, खरीदने के पहले ही उसके निस्तारण का निर्णय लेना पड़ता है। ऐसा ही कुछ हमारे घर में भी हुआ, बड़ी रोचकता से भरा, संभवतः सबके साथ कुछ ऐसा ही होता होगा।

हम मैकबुक एयर और आईफोन खरीद चुके थे और अपने घर में ही विकसित देशों के नागरिक की तरह रह रहे थे। घर के शेष तीन लोग पुराने उपकरणों के साथ थे और स्वयं को विकासशील देश के नागरिक की तरह समझ रहे थे। वितरण इस प्रकार था, डेस्कटॉप व पुराना आईपॉड बच्चों के हिस्से में, हमारे द्वारा मुक्त किया गया तोशीबा का लैपटॉप व ब्लैकबेरी का मोबाइल श्रीमतीजी के हिस्से में और एप्पल के दो नवीनतम उत्पाद हमारे हिस्से में। वितरण आवश्यक था, नहीं तो सबको एक साथ ही एक उपकरण में कार्य करने की सूझती है।

लगा था कि वितरण बड़े ही न्यायप्रिय दृष्टि से हुआ है, न केवल शान्ति बनी रहेगी वरन प्रसन्नता भी बिखरेगी। ऐसा नहीं हुआ, हमारे घर में ही हमारे विरुद्ध विरोध के स्वर उठने लगे। अपने लिये तो इतना अच्छा ले लिया, हम लोगों के लिये पुराना, यह डेस्कटॉप कितनी आवाज करता है, हमारा सिस्टम कितने धीरे चलता है, आप तो घर में कभी भी बैठ कर काम कर लेते हैं, आदि आदि। हमें लगने लगा कि एक स्थिति बन रही है जिसमें घर का मुखिया अपने लिये सारी सुविधायें रख कर औरों को उनसे वंचित रखता है। हमारा ग्लानि भाव धीरे धीरे बढ़ने लगा, उससे बाहर निकलना आवश्यक था।

विकल्प अधिक नहीं थे। निर्णय लिये जाने आवश्यक थे, पर इस बार ऐसा कोई निर्णय नहीं लेना चाहता था, जिससे असंतुष्टि बनी रहे, निर्णय में सबको सहभागी बनाना आवश्यक था। बहुत सोच विचार कर एक प्रस्ताव हमने परिवार-परिषद में रखा। बहुत कम होता है कि लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सब प्रसन्न रहें, किसी एक का हित साधा जाता है तो दूसरा रूठ जाता है। बहुत कम ही ऐसे समाधान होते हैं, जो सबको अपना सा लगे। सीमित संसाधन होते हैं और सबको बांटे भी नहीं जा सकते हैं।

निश्चय किया गया कि एक आईपैड ले लेते हैं और डेस्कटॉप को विदा कर देते हैं। डेस्कटॉप बहुत ऊर्जा खा रहा था, तुलना की जाये तो उसी कार्य के लिये लगभग २० गुना। हम मैकबुक एयर और आईफोन रखे रहेंगे, श्रीमतीजी को आईपैड और ब्लैकबेरी और बच्चों को तोशीबा का लैपटॉप व आईपॉड। यही नहीं, इस बात का भी निर्णय लिया गया कि चार वर्ष बाद जब हमारा मैकबुक एयर और आईफोन पृथु को मिलेंगे, श्रीमतीजी के उपकरण देवला को मिलेंगे, हम लोग तब तकनीक के नये प्रयोग पुनः प्रारम्भ करने के लिये स्वच्छन्द रहेंगे। अगले चार वर्षों में तोशीबा का लैपटॉप ९ वर्ष का जीवन जी लेगा और आईपॉड भी लगभग ७ वर्ष की उपयोगिता निभा जायेगा, उसके बाद दोनों सेवानिवृत्त हो जायेंगे। उत्तराधिकार नियत करने से बच्चों को हमारे उपकरणों से लगाव हो चला है, विरोध के स्वर भी शमित हो गये हैं और भविष्य में और आधुनिक उपकरण लेने के लिये निश्चयात्मकता भी हो गयी है।

मूल प्रश्न अभी भी वहीं टँगा है कि लैपटॉप या टैबलेट। यद्यपि जिस समय मैंने मैकबुक एयर लिया था, उस समय पर्याप्त समय दिया था और विश्लेषण किया था, यह निर्धारित करने के लिये कि लैपटॉप लें या टैबलेट, और वह भी किस कम्पनी का। उस समय शोरूम में ही जाकर दोनों का अनुभव लिया था, तब भार की दृष्टि से, धन की दृष्टि से, सम्हालने की दृष्टि से, कार्य विशेष की दृष्टि से, हर प्रकार से यही निर्णय लिया कि मैकबुक एयर ही लेना है। तब समय भी कम था और विश्लेषण बौद्धिक अधिक था, व्यवहारिक कम। अब जब घोर पारिवारिक कारणों से आईपैड भी घर में आ गया है और लगभग ७ माह का अनुभव दे चुका है, दोनों की तुलना अपना रंग बदल चुकी है, कुछ तथ्य नये आये हैं और कुछ पुराने तथ्य गलत सिद्ध हुये हैं। साथ ही साथ मोबाइल की उपस्थिति ने विश्लेषण को एक नयी गहराई दी है।

लैपट़ॉप, टैबलेट और स्मार्टफोन, तीनों रखने का कोई औचित्य नहीं है, पर केवल दो से भी पूरा कार्य नहीं चल सकता है। यह वाक्य भ्रमित करने वाला लग सकता है, पर इसके पीछे कारण है, एक द्वन्द्व छिपा है, एक दर्शन छिपा है। यदि आप गतिमय रहेंगे तो सारी क्षमतायें ढोकर नहीं चल सकते। मोबाइल फोन गतिमयता का प्रतीक है, लैपटॉप क्षमताओं का। टैबलेट दोनों के बीच का है, इसमें गतिमयता भी है और क्षमता भी, पर समय पड़ने पर दोनों के कई कार्य नहीं कर पाता है।

यदि आपके पास तीनों है तो कुछ न कुछ अतिरिक्त है, लगभग २० प्रतिशत। यदि आपके पास केवल लैपटॉप और मोबाइल है तो आपका कुछ न कुछ छूट रहा है, लगभग २० प्रतिशत। तीनों उपकरण लेकर न केवल आप अधिक धन खर्च करेंगे वरन तीनों के सामञ्जस्य के लिये ढेरों समय भी व्यर्थ करेंगे, भ्रम बना रहेगा और सततता बाधित होगी, वह भी अलग से। लेकिन दो उपकरण होने पर भी आपको २० प्रतिशत उपयोगिता की रिक्तता अपनी ओर से भरनी पड़ती है। यह रिक्तता भी तीन तरह से भरी जा सकती है या तीसरे उपकरण का आंशिक उपयोग करके, या अपनी आदतों में बदलाव लाकर या उन्नत तकनीक अपना कर। तीनों को उदाहरणों से स्पष्ट करना आवश्यक है।

श्रीमतीजी के पास टैबलेट और मोबाइल है, उनका लगभग सारा कार्य गतिमयता से हो जाता है। लगभग २० प्रतिशत कार्य छूटता है, बड़ी फिल्में नहीं देख पाती हैं, फोटो आदि नहीं सहेज पाती है, गाने इत्यादि डाउनलोड नहीं कर पाती हैं, १६ जीबी से अतिरिक्त कुछ सहेजने के लिये उन्हें सोचना पड़ता है, हम पर या बच्चों पर निर्भर रहना पड़ता है। उन्हें संकोच नहीं होता है, हम सब भी उन्हें तकनीक सिखाने को तत्पर रहते हैं, वह तीसरे उपकरण का आंशिक उपयोग करके अपना कार्य चला लेती हैं।

दूसरी श्रेणी में हमारे एक मित्र हैं, घर में एक बड़ा सा लैपटॉप है और हाथ में औसत से अधिक क्षमता का मोबाइल। गतिमयता का पर्याप्त कार्य मोबाइल से कर लेते हैं, ईमेल देख लेते हैं, फेसबुक स्टेटस चेक कर लेते हैं, छोटे मोटे नोट्स भी लिख लेते हैं। घर पहुँचकर ही वे अपने शेष कार्य कर पाते हैं, ब्लॉग पर टिप्पणी करना, लेख लिखना, शोध करना। उन्होंने अपनी आदतों में यह बसा लिया है कि कब क्या करना है? जो २० प्रतिशत की यह रिक्तता है, वह उससे संतुष्ट हैं।

तीसरी श्रेणी में हम जैसे लोग आते हैं। हम न तो किसी पर निर्भर रहना चाहते हैं और न ही अपनी आदतों में ही कोई बदलाव लाना चाहते हैं। हम २० प्रतिशत की रिक्तता तकनीक से भरना चाहते हैं। एक ऐसा लैपटॉप ढूढ़ते हैं जो पूरी क्षमता का हो, हल्का हो और कहीं भी ले जाया जा सके। साथ ही साथ एक ऐसा मोबाइल जो सारे कार्य करने में सक्षम हो, क्षमताओं से भरा हो। हर कम्पनी के नये मॉडल इसी दिशा में आ रहे हैं और अधिक मँहगे भी हैं। धन व्यय करना तभी करना चाहिये जब हम में उन उपकरणों की पूरी क्षमता निचोड़ने की इच्छाशक्ति हो।

तीसरी श्रेणी के समक्ष उपस्थित विकल्पों और तकनीक से जुड़े पहलुओं पर चर्चा अगली पोस्ट में।

12.10.11

मैकपूर्ण अनुभव का एक माह

पिछली पोस्ट में मैकबुक एयर की विस्तृत समीक्षा नहीं कर पाया था, कारण था उसकी कार्यप्रणाली को समझने में लगने वाला समय। अपनी आवश्यकतानुसार सही लैपटॉप पा जाने के बाद उस पर कार्य करना अभी शेष था। दो विकल्प थे, पहला पुराने लैपटॉप पर कार्य करते करते नये के बारे में धीरे धीरे ज्ञान बढ़ाना, दूसरा था सारा कार्य नये में स्थानान्तरित कर पूर्णरूपेण कार्य प्रारम्भ कर देना। यद्यपि मुझे मैकबुक में विण्डो चलाने की तीन विधियाँ ज्ञात थीं पर मैक पर बिना प्रयास करे उसे छोड़ देना मुझे स्वीकार नहीं था। एक शुभचिन्तक ने भी कम से कम एक माह मैक उपयोग करने के पश्चात ही कोई निर्णय लेने को कहा था। मैने मैकपूर्ण अनुभव का एक माह जीने का निश्चय किया।

सर्वप्रथम कार्य था, अपने सारे सम्पर्क, बैठक, कार्य व नोट का मोबाइल व मैक के बीच समन्वय करना। ब्लैकबेरी के डेक्सटॉप मैनेजर के माध्यम से वह कार्य कुछ ही मिनटों में हो गया। विण्डो के आउटलुक के स्थान पर मैक में तीन प्रोग्राम होते हैं, मेल, एड्रेस बुक व आईकैल। मेरा मोबाइल अब दो लैपटॉपों के बीच का समन्वय सूत्र भी है।

दूसरा था ब्रॉउज़र का चुनाव, सफारी में थोड़ा कार्य कर के देखा, क्रोम जितना सहज नहीं लगा। अन्ततः क्रोम डाउनलोड कर लिया, सारे बुकमार्क्स आदि के सहित। देवनागरी इन्स्क्रिप्ट लेआउट मैक में है, कीबोर्ड पर दो कारणों से स्टीकर नहीं लगाये, पहला अभ्यास और दूसरा कीबोर्ड का बैकलिट होना। मैं पिछले कई दिनों से आपके ब्लॉग पर टिप्पणियाँ मेरे मैक से ही बरस रही हैं, उसमें से अधिकांशतः बच्चों के सोने के बाद रात के अँधेरे में बैकलिट कीबोर्ड के माध्यम से टाइप की गयी हैं।

तीसरा था अपने समस्त लेखन को वननोट के समकक्ष किसी प्रोग्राम में सहेजना। इण्टरनेट पर चार सम्भावितों में ग्राउलीनोट्स लगभग वननोट जैसा ही था। वननोट से सभी लेखों को वर्ड्स में बदल कर मैक पर ले गया। नये रूप में उन्हें व्यवस्थित करने का कार्य लगभग आधा दिन खा गया। पिछली चार पोस्टें ग्राउलीनोट्स में ही लिखी गयी हैं। यद्यपि ऑफिस सूट का अधिक उपयोग नहीं करता हूँ पर किसी संभावित आवश्यकता के लिये ओपेन ऑफिस डाउनलोड कर लिया है।

एक टैबलेट पैड का उपयोग पुराने लैपटॉप के साथ करता था, मुक्त हाथ से लिखने व चित्रों पर आड़ी तिरछी रेखायें बनाने के लिये। अपने भावों को शब्दों के अतिरिक्त रेखाओं से व्यक्त करने के लिये वह मैक में अनिवार्य था मेरे लिये। निर्माता की साइट पर गया, उस मॉडल से सम्बद्ध मैक पर चलने वाला ड्राइवर डाउनलोड किया और इन्स्टॉल कर दिया। ६x८ इंच का पैड मैकबुक की स्क्रीन के ही आकार का है। टैबलेट पैड दोनों बच्चों को बहुत सुहाता है, बहुधा ही चित्र बनाने के लिये उसका अधिग्रहण होता रहता है, किसी प्रकार मैने भी आवारगी में बह रहे विचारों को मुक्त हस्त से व्यक्त कर दिया।

११.६ इंच की स्क्रीन में शब्द मोती से स्पष्ट दिखते हैं, फोन्ट का आकार बढ़ाना, पृष्ठों पर तीव्र भ्रमण व अन्य स्थान पर पहुँचने का कार्य उन्नत ट्रैकपैड की सहायता से आशातीत सहज हो जाता है। ४ जीबी रैम व १२८ जीबी सॉलिड स्टेट हार्डड्राईव में फाइलें व प्रोग्राम पलक झपकते ही प्रस्तुत हो जाते हैं। १ किलो के सर्वाधिक पतले लैपटॉप को कहीं भी रखकर ले जाने व कहीं भी खोलकर उस पर लिखने की सुविधा किसी सुखद अनुभव का स्थायी हो जाना है।

बैटरी एक सुखद आश्चर्य रही मेरे लिये। जब लेखन करता हूँ तो वाई फाई बन्द कर देता हूँ। विशुद्ध लेखन में ६ घंटे व विशुद्ध इण्टरनेटीय भ्रमण में ४ः३० घंटे का समय उत्पाद पर दी गयी समय सीमा से कहीं अधिक था। बैटरी को पुनः पूरा चार्ज करने में मात्र १ः३० घंटे का ही समय लगता है। इस उत्कर्ष मानक को पाने के लिये मैक ने कई महत्वपूर्ण सफल प्रयोग किये हैं जिसका शोध एक अलग पोस्ट में लिखूँगा। यह शोध भविष्य में एक अवरोध रूप में खड़ा रहेगा, विण्डो में वापस लौटने के विचारों के सम्मुख।

अभी तक की यात्रा तो संतुष्टिपूर्ण है, पूरे निष्कर्षों पर पहुँचने तक अनुप्रयोग होते रहेंगे, मैकपूर्ण अनुभव का माह प्रवाहमय बना रहेगा।

17.9.11

अहा, लैपटॉप

पिछला एक माह उहापोह में बीता, कारण था नये लैपटॉप का चुनाव। पिछला लैपटॉप 5 वर्ष का होने को था और आधुनिक तकनीक में अपनी गति और भार की दृष्टि से मेरी यथा संभव सहायता कर रहा था। इतने दिन साथ घूमते घूमते थकान का अनुभव कर रहा था पर घर में शान्ति से बैठ सेवायें देने पर सहमत था। जिस यन्त्र पर हाथ सधा हुआ था, जिसके बारे में एक एक तथ्य ज्ञात था, जो मेरी सारी सूचनाओं को वर्षों को सहेजे हुये था, उसे छोड़ कुछ और अपनाना मेरे लिये कठिन था।

मेरे लिये कई निर्णय लेना आवश्यक था। 5 वर्ष पहले तक परिस्थितियाँ भिन्न थीं, लैपटॉप से अपेक्षायें भिन्न थीं, कई महत्वपूर्ण तत्व आकार ले रहे थे, तकनीकी क्षमतायें वर्तमान की आधी थीं, इण्टरनेट मोबाइल का प्रयोग विस्फोटित होने को तैयार बैठा था। उस समय जो मॉडल लिया था, वह अपने आप में सक्षम था, समयानुसार था, बाजार में अग्रणी था। उसकी पूर्ण क्षमताओं के उपयोग ने बहुत कुछ सिखाया है। जब भी जीवन को अधिक व्यवस्थित करने का समय आया या कम समय में अधिक निचोड़ने की आवश्यकता हुयी, लैपटॉप ने एक समर्थ सहयोगी की भूमिका निभायी है।

आधुनिक संदर्भों में लैपटॉप के चयन के लिये जिन बिन्दुओं पर निर्णय लेने थे उसे निर्धारित करने के लिये मुझे पिछले 5 वर्षों में हुये बदलाव को समझना आवश्यक हो गया। फैशन, सुन्दरता या आकार से प्रभावित होकर एक ऐसे लैपटॉप का चुनाव करना था जो आपके जीवन का अभिन्न अंग हो, आपकी कार्यशैली से सहज मेल खाता हो। अपनी रुचियों पर आधारित कार्यों को सरल और व्यवस्थित कर सकना, यही एकल उद्देश्य था चयन प्रक्रिया का। तीन महत्वपूर्ण बदलाव हुये, पहला ब्लॉग क्षेत्र में पदार्पण और नियमित लेखन, दूसरा कार्यक्षेत्र में गुरुतर दायित्व और निर्णय प्रक्रिया, तीसरा बच्चों के ज्ञानार्जन की तीव्रता में पिता का सहयोग। स्वाध्याय और जीवन का सरलीकरण पहले की ही तरह उपस्थित थे।

पहला था स्क्रीन का आकार, स्क्रीन का बड़ा होना अधिक बैटरी माँगता है, स्क्रीन का छोटा होना आँखों पर दबाव डालता है। बड़ी स्क्रीन में फिल्में देखने का सुख है तो छोटी स्क्रीन में लैपटॉप को कहीं भी ले जाने की सहजता। मध्यममार्ग अपनाकर 12-13 इंच की स्क्रीन निश्चित की गयी।

अगला निर्णय था, टैबलेट या नियमित कीबोर्ड। स्क्रीन पर वर्चुअल कीबोर्ड सदा ही एक विकल्प था पर अधिक टाईपिंग की स्थिति में स्क्रीन पर टाईप करना अनुपयुक्त और थका देने वाला था। आईपैड एचपी टचस्मार्ट की स्क्रीनों पर एक घंटे का समय बिताने के बाद नियमित कीबोर्ड अधिक सहज लगे। जहाँ अन्य टैबलेटों के ओएस कम क्षमता से युक्त थे वहीं विन्डोज के टैबलेट अपने नवजात स्वरूप में थे।

प्रॉसेसर की गति और क्षमता में आये परिवर्तन ने हम सबको अभिभूत किया है, संभवतः हमारी आवश्यकताओं से अधिक। भविष्य का ध्यान रखकर भी आई-5 और 4 जीबी रैम ही पर्याप्त लगा।

मेरी हार्ड डिस्क कभी भी 30 जीबी से अधिक भरी नहीं रही, कारण फिल्मों और गीतों के लिये 500 जीबी की वाह्य हार्ड डिस्क का होना। यदि कम हार्ड डिस्क में अच्छा लैपटॉप मिल सकता था तो उसका स्वागत था।

बैटरी का समय महत्वपूर्ण था, एक बार में कम से कम चार घंटे की बैटरी आवश्यक थी मेरे लिये। बड़ी बैटरी लैपटॉप का भार बढ़ाती हैं, छोटी बैटरी आपकी चिन्ता। 

इन सीमाओं में इण्टरनेट पर माह भर का शोध करने के पश्चात कई मॉल में जाकर उनका भौतिक अनुभव लिया।

पूरे घटनाक्रम में नाटकीय मोड़ तब आया जब एप्पल के शोरूम में नया मैकबुक एयर देखा। प्रेम विवाह नहीं किया अतः पहली दृष्टि  का प्रेम क्या होता था, ज्ञात नहीं था। इसे देखकर मन में जो भाव उमड़े उनका वर्णन कर पाना मेरे लिये संभव नहीं है, पर इतनी छोटी आकृति में उपरिलिखित क्षमतायें भर पाना एक चमत्कार से कम नहीं है। स्टीव जॉब को इस कार्य के लिये नमन।

यह मत पूछियेगा कि एप्पल के इस मँहगे मॉडल के लिये अतिरिक्त धन की पीड़ा आपसे कैसे सहन हुयी? श्रीमतीजी के वक्र नेत्रों की चिन्ता करते हुये मैं अपने नवोदित प्यार पर अतिरिक्त 15000 खर्च कर आया, प्यार किया तो डरना क्या? अब प्यार का पागलपन तो देखिये, 22 वर्षों के विण्डो के संचित ज्ञान को छोड़ मैं मैक ओएस सीखने बैठा हूँ, आशा है सारे नखरे सह लूँगा। 

आप बस एक चित्र देख लीजिये। आपको चेता रहा हूँ आपका मन डोल जाये तो दोष  दीजियेगा।