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21.11.12

शिक्षा - अर्थ व समाज

औपचारिक व अनौपचारिक शिक्षा का स्वरूप तथा शिक्षा के उद्देश्यों की समझ ही पर्याप्त न होगी यदि हम उसे आधुनिक अर्थतन्त्र और समाज की गतिमयता से न जोड़ें। जो भी संपर्कसूत्र हैं और जिन सिद्धांतों पर शिक्षा, अर्थ और समाज संवाद स्थापित किये हुये हैं, उन पर गहनता से विचार की आवश्यकता है। यदि इन बिन्दुओं का समुचित विश्लेषण किया जा सके तो उन परस्पर प्रभावों को उभारा जा सकता है जो वांछित हैं और उन पर नियन्त्रण गाँठा जा सकता है जो सबके लिये हानिप्रद हैं। विश्लेषण हेतु विषय केवल औपचारिक शिक्षा तक ही सीमित रखा जायेगा।

शिक्षा के तीन उद्देश्य मात्र बौद्धिक कल्पनाशीलता में नहीं जी सकते हैं। उन्हें भौतिक धरातल में लाने के लिये एक तन्त्र स्थापित करना होता है, साधन आवश्यक हैं, समाज को प्रतिभागिता भी आवश्यक है, जिनको लाभ मिल रहा है और जो लाभ पहुँचा रहे हैं, दोनों के लिये। शिक्षा से समाज की अपनी अपेक्षायें हैं, विद्यार्थियों के अपने सपने हैं, शिक्षातन्त्र कहाँ तक इन दोनों को साथ साथ निभा पा रहा है, अर्थतन्त्र का स्वरूप किस तरह इस पूरी रचना को अस्थिर कर रहा है, ये सब बड़े ही रोचक बिन्दु हैं, इन सबको पृथकता से और भलीभाँति समझ कर ही शिक्षा पर कुछ साधिकार कहा जा सकता है।

भले ही विश्व के समस्त तन्त्रों को रचने और चलाने में शिक्षा का सहयोग रहता है, पर शिक्षा के लिये स्थापित तन्त्र में भी तीन प्रमुख विमायें हैं। शिक्षार्थी, शिक्षक और शिक्षा-सामग्री। शिक्षक के लिये शिक्षण एक व्यवसाय है, उसे अपना घर चलाना है, साथ ही साथ उनके ऊपर बच्चों के भविष्य का महत उत्तरदायित्व है। यदि गुणवत्ता न साधी जायेगी तो पूरी की पूरी पीढी हाथ से निकल जाने का भय है। गुणवत्ता साधने के लिये योग्य और कुशल शिक्षकों को लाना होगा, एक विषय जो सीधे सीधे समाज के आर्थिक पक्ष से जुड़ा है।

बच्चे के लिये भविष्य में धन कमाने के अतिरिक्त स्वयं को स्थापित करने की चाह अधिक महत्वपूर्ण है, उसके स्वप्न और अभिरुचि के अनुसार चल सकने की चाह, समाज को सार्थक योगदान दे सकने की चाह। शिक्षा सामग्री जहाँ एक ओर समाज की दिशा निर्धारित करती है वहीं दूसरी ओर शेष विश्व तन्त्रों को भी पोषित करने में सहायक है।

अब अर्थतन्त्र के दृष्टिकोण से देखा जाये तो पूरा विश्व माँग और आपूर्ति के चक्र पर चलता है। जिसकी माँग अधिक उसका मूल्य अधिक, जिसका मूल्य अधिक उस ओर सबका झुकाव अधिक, अधिक झुकाव अधिक आपूर्ति लाता है, अधिक आपूर्ति मूल्य कम कर देती है, तब झुकाव भी कम हो जाता है, तब आपूर्ति कम हो जाती है और माँग बढ़ जाती है। यही चक्र चलता रहता है, अर्थतन्त्र घूमता रहता है। किसी भी व्यवसाय के दो पक्ष शिक्षा से पोषित होते हैं, एक है तकनीक, दूसरे हैं प्रशिक्षित कर्मचारी। जिसकी माँग अधिक होती है, उससे सम्बन्धित तकनीक में अनुसंधान और उसमें शिक्षित युवा, दोनों ही उफान पर पहुँच जाते हैं। उस क्षेत्र में अधिक अवसर और धन, और उसके प्रति समाज का रुझान।जिन क्षेत्रों से माँग नहीं आती है पर संभावनाओं से भरे हुये है, उन क्षेत्रों का कोई नामलेवा भी नहीं है।

शिक्षक क्या गुणवत्ता दे पा रहे हैं, बच्चों की क्या आकाक्षायें हैं, समाज क्या चाहता है और अर्थतन्त्र के वाहक हमें कहाँ लिये जा रहे हैं, इन चारों पाटों में हमारी शिक्षा व्यवस्था पिसी हुयी है। इन चारों की खिचड़ी हमारी शिक्षा सामग्री में दिखायी पड़ती है, कम या अधिक। जब भी बाजार की अर्थव्यवस्था अपना आधिपत्य जमाने लगती है, शिक्षाव्यवस्था धन उत्पन्न करने वाली मशीन का बड़ा अंग बन कर रह जाती है, उसमें पिसते शिक्षार्थी और हताश होते अभिभावक भी उसकी धुरी में घूमने लगते हैं। जब वह क्षेत्र सहसा झटक जाता है, जब उसमें अवसर सिकुड़ जाते है, संसाधन अतिरिक्त हो जाते हैं, तब सब के सब नैराश्य में डुबकी लगाने लगते हैं।

शिक्षातन्त्र की अर्थतन्त्र पर इतनी निर्भरता उचित नहीं है। इसके तीन पक्ष बहुत ही घातक हैं। पहला तो अर्थतन्त्र केवल तकनीकी शिक्षा को सहारा देगा क्योंकि तकनीक अर्थतन्त्र को सहारा देती है। थोड़ी बहुत दिशा प्रबन्धन व वित्तीय शिक्षा को भी मिल जायेगी, पर ये तो उच्च शिक्षा के क्षेत्र हैं, प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा को कौन सहारा देगा तब? दूसरा घातक पक्ष यह होगा कि जब धन लगेगा तो वह फीस के रुप में वसूला भी जायेगा, सक्षम शिक्षा प्राप्त कर लेंगे और निर्धन अक्षम अशिक्षित रह जायेंगे। धन केवल धन को पोषित करेगा, जन को नहीं। तीसरा घातक पक्ष होगा, उन विषयों को लुप्त होना जिनमें किसी भी व्यवसाय में लाभ देने की क्षमता नहीं है, इतिहास, साहित्य आदि जैसे कितने ही विषय अपना अस्तित्व खो बैठेंगे तब।

शिक्षातन्त्र की अर्थतन्त्र पर निर्भरता शून्य भी नहीं की जा सकती है, यदि यह हुआ तो सब कल्पनाशीलता में खो जायेंगे, कर्मशीलता अपवाद हो जायेगी समाज में तब। सम्पर्कसूत्र बनाये रखना आवश्यक है जिससे शिक्षा न केवल अपने उद्देश्यों में सफल होती रहे, वरन शिक्षकों और शिक्षार्थियों के पास पर्याप्त आर्थिक कारण रहें किसी विषय को चुनने के लिये। बाजार आधारित अर्थव्यवस्था का कुप्रभाव कम हो जाता है जब अर्थव्यवस्था का विस्तार बढ़ता है। तब एक क्षेत्र में आयी उठापटक अर्थव्यवस्था, समाज और शिक्षा को अधिक प्रभावित नहीं करती है। शिक्षा का कोई क्षेत्र, कोई भी अभिरुचि ऐसी न रह जाये जिसमें जीवन यापन की संभावना कम हो।

एक बात तो तय है कि सब कुछ बाजार की अर्थव्यवस्था के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है। शिक्षाव्यवस्था के त्यक्त पक्षों में शक्ति लाने का कार्य सरकार का है। सुदृढ़ और सार्वभौमिक आधारभूत शैक्षणिक सुविधायें, सबको शिक्षा, निशुल्क शिक्षा, योग्य और कर्मठ शिक्षकों का चयन, शिक्षकों को यथानुरूप अच्छा वेतन, अर्थव्यवस्था का शिक्षा के अन्य अंगों में विस्तार, ये सब कार्य ऐसे हैं जो शिक्षा को सशक्त करने में सक्षम हैं। ऊर्जा व्यर्थ न हो, व्यक्ति समर्थ हों, यही तो अर्थ है अच्छे शिक्षातन्त्र का। क्या छूट गया तब और कौन सा आकाश रिक्त रह गया, यह मननीय बिन्दु अगली पोस्ट में।

10.10.12

शाम है धुआँ धुआँ

शाम थी, वह भी रविवार की, बैठकर सोच रहा था कि सप्ताहान्त कितना छोटा होता है, केवल दो दिन का। क्या न कर डालें इन दो दिनों में, यह सोचने में और उसके लिये समुचित साँस भरने में एक दिन निकल जाता है। दूसरा दिन पिछले सप्ताह की थकान मिटाने में और आने वाले सप्ताह के लिये ऊर्जा संचित करने में ढल जाता है।

इस बार पक्का था कि शनिवार श्रीमतीजी फिल्म दिखाने के लिये घेरने वाली हैं, मन मार के मन भी बना लिया था कि दिखा देंगे। यहाँ एक फिल्म में लगभग दो हजार शहीद हो जाते हैं, ढाई सौ से कम तो कोई भी टिकट नहीं। अब फिल्म भी सूखी नहीं दिखायी जा सकती है, बिना पॉपकार्न, नैचो और पेप्सी के बच्चों को फिल्म समझ भी नहीं आती है, इन तत्वों के बिना फिल्म अनाकर्षक लगती है। ऐसा नहीं है कि हम अपनी तरफ से कोई तैयारी नहीं करते हैं, दोपहर को समुचित भोजन करा के चलते हैं जिससे फिल्म के पहले ही भूख न लग जाये, पर मध्यान्तर होते होते सब कुछ हजम हो जाता है। बच्चों और श्रीमतीजी के सामने हमारी चालाकी आज तक नहीं चल पायी है। यदि कभी ना नुकुर की तो श्रीमतीजी बच्चों की हितैषी बन बैठती हैं, कृपणमना होने के ढेरों आक्षेप लगने लगते हैं। अब बच्चों को और उनकी माताजी को कैसे समझाया जाये कि हम तो तीस-चालीस रुपये में फिल्म देख आते थे। चार लोगों के टिकट के लिये १६० रुपये और मध्यान्तर में ४० रुपये के समोसे और कोल्डड्रिंक्स, कुल मिलाकर २०० रु।

कितनी भी जीडीपी बढ़ जाये, कितनी भी मँहगाई बढ़ जाये, २०० रु की जगह २००० रु जाते हैं, तो अटपटा लगता है, हृदय बैठने लगता है। फिल्में वही हैं, अभिनेता वही हैं, सिनेमा हॉल के स्थान पर मल्टीप्लेक्स आ जाने से फिल्म देखने में १८०० अतिरिक्त लगने लगे हैं। देश की अर्थव्यवस्था भले ही सुधर गयी हो, हमारी तो हर बार इसी तरह भड़भड़ा जाती है। कई लोग कह सकते हैं कि फिल्म देखना तो उपभोग की श्रेणी में आता है, न कि आवश्यकता की श्रेणी में। उनको बस यही कहा जा सकता है कि यह हमारे लिये विवशता की श्रेणी में आता है। मल्टीप्लेक्स आ जाने से सिनेमा हॉल में फिल्में देखना कृपणता के कार्यों में गिना जाने लगा है। यहाँ पर जितने भी सिनेमा हॉल होते थे, सब के सब ढहाये जा रहे हैं और उनके स्थान पर मॉल और मल्टीप्लेक्स तैयार हो रहे हैं। जब हर परिवार में मल्टीप्लेक्स में फिल्म देखने के दीवाने बढ़ने लगें, तो सबकी आशायें बढ़ने लगती हैं। पहले जो काम २०० में होता था, उसके लिये २००० मिलने की संभावनायें बन जायें, तो अर्थव्यवस्था में उभार आना ही है, जीडीपी बढ़नी ही है, देश का विकास होना ही है।

पर इस बार भाग्य ने हमारे पक्ष में पलटा खाया, शनिवार को ही पूरे कर्नाटक बन्द की घोषणा हो गयी। विषय अत्यधिक संवेदनशील था, कावेरी के जल के बटवारे ने स्थिति गम्भीर कर दी थी, पूरा बंगलोर लगा कि जगा ही नहीं। कई स्थानों पर ट्रेनें रोक दी गयी थीं। लम्बी दूरी की ट्रेनों सहित कई ट्रेनें निरस्त भी करनी पड़ीं। पहले तो इस व्यस्तता में दिन निकल गया और सायं भी मॉल बन्द होने के कारण फिल्म देखने का कार्यक्रम पूरी तरह टल गया। अगले दिन समाचार पत्रों में पढ़ा कि उस दिन देश की अर्थव्यवस्था को कई करोड़ का घाटा हुआ। सोचने लगे कि उस घाटे में क्या स्वरूप रहा होगा, बहुत कुछ तो समझ नहीं आया, बस इतना निश्चित था कि उसमें हमारे न खर्च होने वाले दो हजार रुपये भी हैं। इस सप्ताह तो बच गये, पर पता नहीं कि आने वाले सप्ताह में ईश्वर कैसे सहायता करेगा? यदि ईश्वर ने सहायता नहीं की तो देश की अर्थव्यवस्था में हम भी २००० रु की आहुति चढ़ा देंगे। कावेरी जल विवाद में यहाँ की अर्थव्यवस्था अभी और कितनी प्यासी रह जायेगी, कहना कठिन है। यहाँ का वातावरण देख कर लगता है, या तो जल में प्रवाह रहेगा या अर्थव्यवस्था में।

रविवार का दिन हमें पूरी तरह से मुक्त रखा जाता है, इसी दिन का प्रताप है कि सप्ताह भर के लिये दो पोस्टों का लेखन हो पा रहा है। कोई निश्चित कार्यक्रम नहीं, अपनी ओर से भेंट के लिये कोई पहल नहीं, बस अपने साथ, अपने परिवार के साथ। कहने को तो यह सूर्यदेव का दिन होता है, प्रखर चमकने के लिये पर हम स्वयं में खोये रहते हैं,स्वयं में सोये रहते हैं। सायं विश्वकप का मैच देखना था, अपने पड़ोसी के घर में, भोजन के साथ, अतः दोपहर को भोजन के बाद झपकी मार ली। सुबह से टीवी पर दोषारोपणों का इतना विषवमन हो चुका था कि लग रहा था कि टीवी देखना बन्द नहीं किया तो देश की स्थिति की तरह हम भी पाताल पहुँच जायेंगे। टीवी बन्द करने से सहसा अच्छा लगने लगा, लगा कि देश की समस्यायें थोड़ी कम हो चली हैं। इतनी मानसिक थकान हो चली थी कि आँख बन्द कर सोचने में ही नींद आ गयी।

ऐसी ही एक निश्चिन्त नींद और आगामी भोज के आनन्द के बीच का समय था, शाम थी वह रविवार की। कुछ न होने और कुछ न खोने की बीच की स्थिति में बैठे थे। श्रीमतीजी सायं के पंचायत-कम-टहलने में व्यस्त थीं, बच्चे आने वाले पाँच दिनों का खेलने का कोटा आज ही पूरा कर लेने में श्रमनिरत थे। मन में कोहरे जैसा आनन्द आ रहा था, न कुछ दिख रहा था, न कुछ देखने की इच्छा ही थी।

पर आनन्द की इस स्थिति में बाधा पड़ गयी, घर के पीछे से हल्का हल्का धुआँ आ रहा था। लगा कहीं कोई कूड़ा तो नहीं जला रहा है, संभावना बहुत कम थी, क्योंकि श्रीमतीजी सारे कूड़े से खाद बनवा देती हैं, जलाने के लिये कुछ बचता ही नहीं है। पता किया गया, आउटहाउस में कोई चूल्हा जलाये हुये था, वहीं से धुआँ घर के अन्दर घुस रहा था। बंगलोर की हल्की ठंडी और मदिर हवा में यदि धुआँ मिल जाये तो रस का सारा तारतम्य चौपट हो जाता है। जहाँ तक मुझे याद था कि बहुत कम ही ऐसा हुआ था जब पीछे से धुआँ आया हो, उनके घर में गैस थी और खाना उसी पर बनता है। यद्यपि यहाँ पर पेड़ बहुत हैं और उनकी सूखी टहनियाँ गिरती रहती हैं, पर भोजन बनाने के लिये रसोईगैस का ही प्रयोग होता है। यहाँ जाड़ा भी नहीं पड़ता है, लकड़ी जलाकर सेंकने का भी कोई प्रश्न नहीं उठता है।

धीरे धीरे जब भेद खुला, तब देश में हो रहे आर्थिक सुधारों के प्रभाव और गति का पता चला। एक सप्ताह पहले जो निर्णय टीवी पर बहसों का अंग था, वह अपने निष्कर्ष पा रहा था, हमारे घर के पीछे। जो तथ्य सामने आये, बड़े रोचक थे। यद्यपि उस घर में रसोई चूल्हा था, पर आने वाले ६ महीनों में मात्र ३ गैस सिलिण्डर मिलने के कारण प्रत्येक सिलिण्डर को २ माह चलाने की विवशता थी। जहाँ पर माह में एक सिलिण्डर की आवश्यकता हो, वहाँ उसे दो महीने खींचने के लिये हर दूसरे दिन चूल्हे पर खाना बनाना पड़ेगा। ईश्वर की कृपा से यहाँ पर पेड़ पर्याप्त हैं, सूखी टहनियों की कमी नहीं है, कुछ नहीं तो हर दूसरे दिन तो चूल्हा जलाया ही जा सकता है। आउटहाउस वाला आकर बोला 'क्या करेगा साहब, आप तो सब जानते ही हैं।' हम भी अपने कल्पना लोक से धीरे से उतर आये, धुआँ अब तक मन में उतर गया था।

फिल्म हो, बंद हो या धुआँ हो, देश की अर्थव्यवस्था हर पर सीधा प्रभाव डालती है। एक सप्ताहान्त के दो दिनों में जब इतना मिल गया तो पूरे सप्ताह में क्या हाल होगा, राम जाने। अब तो हर शाम धुँआ धुँआ हो, तो कोई आश्चर्य नहीं, इसकी आदत डालनी होगी। संभवतः कुछ दिनों में धुयें के सौन्दर्यपक्ष को कविता में सहेजने की दृष्टि विकसित हो जाये।

6.7.11

व्यवस्थित परिवेश

सुबह का समय, दोनों बच्चों को विद्यालय भेजने में जुटे माता-पिता। यद्यपि बेंगलुरु में विद्यालय सप्ताह में 5 दिन ही खुलते हैं पर प्रतिदिन 7 घंटों से भी अधिक पढ़ाई होने के कारण दो मध्यान्तरों की व्यवस्था है। दो मध्यान्तर अर्थात दो टिफिन बॉक्स अर्थात श्रीमतीजी को दुगना श्रम, वह भी सुबह सुबह। शेष सारा कार्य तब हमें ही देखना पड़ता है। अब कभी एक मोजा नहीं मिलता, कभी कोई पुस्तक, कभी बैज, कभी और कुछ। परिचालन में आने के पहले तक, सुबह के समय व्यस्तता कम ही रहती थी, तो इन खोज-बीन के क्रिया-कलापों में अपना समुचित योगदान देकर प्रसन्न हो लेते थे। समस्या गम्भीर होती जा रही थी, अस्त-व्यस्त प्रारम्भ के परिणाम दिन में दूरगामी हो सकते थे, अतः कुछ निर्णय लेने आवश्यक थे।

अब दोनों बच्चों को बुलाकर समझाया गया। रात को ही अगले दिन की पूरी तैयारी करने के पश्चात ही सोना अच्छा है। प्रारम्भ में कई बार याद दिलाना पड़ा पर धीरे धीरे व्यवस्था नियत रूप लेने लगी। बस्ता, ड्रेस, गृहकार्य इत्यादि पहले से ही हो जाने से हम सबके लिये आने वाली सुबह का समय व्यवस्थित हो गया।

विद्यालय जाने की प्रक्रिया एक उदाहरण मात्र है, घर के प्रबन्धन में ऐसी बहुत सी व्यवस्थाओं को मूर्तरूप देना पड़ता है। हर वस्तु का एक नियत स्थान हो और हर वस्तु उस नियत स्थान पर हो। यदि घर में सामान अव्यवस्थित पड़ा हो, हमें अटपटा लगता है। हमारे पास कितना भी समय हो पर किसी अन्य स्थान पर रखी वस्तु को ढूढ़ने में व्यय श्रम और समय व्यर्थ सा प्रतीत होता है, उपयोग के बाद किसी वस्तु को समुचित स्थान पर रखने में उससे कहीं कम श्रम और समय लगता है।

एक व्यवस्थित परिवेश में स्वयं को पाने का आनन्द ही कुछ और है। छोटे से छोटे विषय पर किया हुआ विचार किसी भी स्थान को एक सौन्दर्यपूर्ण आकार दे देता है। किसी भी स्थान को व्यवस्थित करने में लगी ऊर्जा उसके सौन्दर्य से परिलक्षित होती है। कुछ लोग कह सकते हैं कि इस व्यवस्था रूपी सौन्दर्य से विशेष अन्तर नहीं पड़ता है पर उन्हें भी अव्यवस्थित स्थान क्षुब्ध कर जाता है।

किसी भी तन्त्र, परिवार, संस्था, समाज और देश का कुशल संचालन इसी आधार पर होता है कि वह कितना व्यवस्थित है। जो कार्य सीधे होना चाहिये, यदि उसमें कहीं विलम्ब होता है या अड़चन आती है तो असहज लगता है। यही असहजता आधार बनती है जिससे तन्त्र और भी व्यवस्थित किया जा सकता है।

कई व्यवस्थायें बहुत पुरानी होती हैं, कालान्तर में न जाने कितने अवयव उसमें जुड़ते जाते हैं, हम अनुशासित से उनका बोझ उठाये चलते रहते हैं। परम्पराओं का बोझ जब असह्य होता है तो उसमें विचार की आवश्यकतायें होती हैं, सरलीकरण की आवश्यकतायें होती हैं। क्या कोई दूसरा मार्ग हो सकता है, क्या प्रक्रिया का समय और कम किया जा सकता है, क्या बिना इसके कार्य चल सकता है, अन्य स्थानों पर कैसे कार्य होता है, बहुत से ऐसे प्रश्न हैं जो घुमड़ते रहने चाहिये। प्रश्न पूछने का भय और अलग दिखने की असहजता हमें अव्यवस्थाओं का बोझ लादे रहने पर विवश कर देती है। जटिल तन्त्रों का बोझ असह्य हो जाता है, सरलता स्फूर्तमयी होती है। प्रबन्धन का सार्थक निरूपण एक व्यवस्थित परिवेश की अनुप्राप्ति ही है।

कोई भी क्षेत्र चुनिये, घर से ही सही, अपने कपड़ों से ही सही, पूछिये कि क्या आपको उन सब कपड़ों की आवश्यकता है? जब तक आप संतुष्ट न हो जायें किसी गरीब को दिये जाने वाले थैले में उनको डालते रहिये।

यही प्रश्न अब हर ओर पूछे जाने हैं, हर तन्त्र सरल होना है, हर तन्त्र व्यवस्थित होना है, हर तन्त्र सौन्दर्यपूर्ण होना है।

4.8.10

मॉल और माइक्रोसॉफ्ट

तब पढ़ाई हो, यह कारण रहता था  पिता जी के साथ बाजार न जाने का। अब लड़ाई न हो, इस कारण से बाजार जाना पड़ता है। हमारी भागने की प्रवृत्ति हमको घेर के वहाँ पर ले आती है जहाँ पर कोई विकल्प नहीं रहता और अन्ततः वही कार्य करने पड़ते हैं, जिनसे हम सदैव भागते रहते हैं।

हम जैसे प्रशिक्षार्थियों के लिये मॉल खुल जाने से यह कार्य अब उतना कष्टप्रद नहीं रह गया है। बाज़ारों के धूल-धक्कड़ से दूर मॉल का शीतल वातावरण व मनपसन्द वस्तुयें चुन पाने की सुविधा हम सबको सुहाती भी है। अब बच्चों का भविष्य हमारे वर्तमान की तरह न हो इसलिये उन्हें भी साथ ले लिया जाता है। मॉल में देवला ट्रॉली पकड़ती हैं और पृथु लिस्ट से सामान बता कर उसमें डालते रहते हैं। हमारा कार्य शंकाओं का समाधान करना होता है, कारण सहित। पारिश्रमिक कितना दिया गया, यह तब पता लगता है जब घर आकर लिस्ट के बाहर के सामानों का जोड़ होता है। कुछ दिनों में दोनों  इतने योग्य हो जायेंगे कि स्वयं जाकर ही खरीददारी कर आया करेंगे। बाल श्रम नहीं है, यह उनकी तैयारी है आगामी जीवन के लिये।

मॉल में बिलिंग यन्त्रवत सी लगती है। एक लड़का 'बार कोडिंग मशीन' के सम्मुख सामान दिखाता और आगे बढ़ा देता। 2000 का बिल बनाने में 30 सेकेण्ड समय लगा होगा। किसी गणितीय भूल की संभावना नहीं और समय की बचत भी।

इस पूरे प्रकरण में बस एक बात खटकी। मुझे अनायास ही अपने विद्यालय के एक मित्र अनुराग की याद आ गयी, वह अभी माइक्रोसॉफ्ट में है।

अनुराग की गणितीय गणना करने की क्षमता हम सबसे कहीं अधिक थी। कारण था बचपन में उसका अपने पिता जी की दुकान में बहुधा अकेले बैठना। छोटे कस्बे में छोटा व्यवसाय था। कोई कैलकुलेटर नहीं, कोई कम्प्यूटर नहीं, सब गणना मानसिक। भूल का अर्थ था हानि। वही क्षमता उसे पहले आई आई टी तक लायी और अन्ततः माइक्रोसॉफ्ट तक ले गयी।

मॉल संस्कृति जिस गति से फैल रही है, लगता है कि कुछ ही समय में सारे के सारे छोटे व्यवसायों और व्यवसायियों को सुरसावत निगल जायेगी। मॉल में लगी भीड़ इसका प्रमाण मात्र है। सीधे उत्पादन से उपभोक्ता तक सामान लाने की पूरी प्रक्रिया कम्प्यूटरों पर बिछी हुयी है। उद्देश्य लागत न्यूनतम करना है।

अब छोटे व्यवसाय नहीं रहेंगे तो कई और अनुराग उन दुकानों में कैसे बैठेंगे? कैसे उनकी गणितीय क्षमता पल्लवित हो सकेगी? माइक्रोसॉफ्ट को तब कैसे उतने योग्य मस्तिष्क मिल पायेंगे?

बिलिंग के 25 काउण्टरों में मुझे एक भी अनुराग नहीं दिखा, दिखा तो एक अर्थव्यवस्था का वह चेहरा जिसे न छोटी दुकानों की आवश्यकता है और न उसमें बैठने वालों अनुरागों की। मुझे यह भी दिखा कि भारत अपनी जिस बौद्धिक और मानसिक क्षमता पर इतना इतराता है, उनका भी मूल्य कम कर देंगे बाजार-व्यवस्था के समर्थक। अब मुहल्ले में आर्थिक समस्याग्रस्त लोगों को उधार कौन देगा? अब माइक्रोसॉफ्ट को अनुराग कौन देगा? हम जैसे विद्यार्थियों को ईर्ष्या करने के लिये अनुराग कौन देगा?

कई अनुराग खो गये हैं इन्ही मॉलों में। किसी को भी, किसी भी मॉल में, कभी भी यदि अनुराग दिखे तो मुझे बता दें। मुझे तो बस मेरा अनुराग वापस चाहिये।